Category Archives: Ekant

ब्रह्मज्ञान की ऊँची बात

brahmgyan

सत्संग के मुख्य अंश  :
* अपनी अपनी भावना से भगवान् की आकृति बनाना ये आरम्भिक साधना है | आखरी तो ये है की भगवान की आकृति जिस से बनती है वो अकाल पुरुष सारी आकृतियाँ का अधिष्ठान वो रब ही रह जाता है |
* दो वस्तुओं के मिश्रण का नाम संसार है | एक सच्चीदानंद और दूसरा माया | इन दोनों का परस्पर अध्यास, अध्यरूप इसी का नाम दुनिया है |
* बहुत पसारा मत करो | थोरे की आस अभूत पसारा जिन किया वो भी गए निराश …

व्यक्ति यदि ठान ले तो भगवान् उसके दृढ़ संकल्प को पूरा कर ही देते है ……

vyaktiyadi

सत्संग के मुख्य अंश – 

अपने होते हुए बीते मर गये, अपने जनम से पहले माँ-बाप को जेल जाना पड़े, जनम के आठ वेदिन पूतना जहर लेकर मारने आये, धेनुकासुर, अगासुर, बकासुर, चटकासुर और जाने कितनी मुसीबतें कृष्ण भगवान के जीवन में आयी… और ऐसा भी नहीं की उनकी सदैव विजय हुई उनको युद्ध छोडकर भागना भी पड़ा | फिर भी कृष्ण भगवान् के जीवन में ज्ञान था तो उन्हें था तो उन्हें कोई परिस्थिति दुखी नहीं कर पायी |

जीवन में सुख ही सुख हो, विजय ही विजय हो, ये कोई जरूरी नहीं है, पर जीवन में ज्ञान होना बहुत जरूरी है |

व्यास भगवान् ने भागवत की शुरवात बहुत ही अच्छे श्लोक से की … अधिभौतिक तप, अध्यात्मिक तप और आदिदैविक तप से मुक्त होने के लिये हम परमात्मा जो सैट है,चेतन है और आनंद स्वरूप है उनको नमन करते हैं |

संसार तपे तपता नाम युगों परम अशुद्ध: |

धन, सत्ता आदि मिलने से तप नहीं मिटते लेकिन भगवान का ज्ञान मिलने से भगवान का वैभव प्राप्त हो जाता है और तप जाते रहते है |

कुछ वर्ष पहले पंजाब में पतियाला रियासत के अमरगड कसबे में एक ब्राह्मण का जन्म हुआ, बचपन से ही टांगे अपंग थी | या तो हाथों से अपने शरीर को घसीट कर चलता था, कोई उसे उठाकर ले जाता था .. उसने सुना था भगवान् जगत के नाथ है और उनका मन्दिर ओरिसा में जगन्नाथपूरी में स्थित है | उसने भगवान् का दर्शन करने की ठान ली…. उस समय ट्रेन, बस शुरू नही हुई थी पैदल ही यात्रा करनी पडती थी | गाँववालों ने पहले तो समझाया की तुम्हारी टाँगे नहीं है तुम कुछ कदम तो बड़ी मुस्किल से चलते हो, जगन्नाथपूरी कैसे पहुँचायेगे … लेकिन वो नहीं माना तो घरवाले ने जितना हो सका गुजारा करने के लिये दिया .. ब्राह्मण घसीट – घसीट कर चलने लगा | दो दिन बड़े उत्साह से चला कुछ गाँव पार किये .. और दो दिन की यात्रा से बुरी तरह थककर वो पेड़ के नीचे लेट गया | संध्या का समय था एक अनजाने व्यक्ति जो सब कुछ जानता है आया और उससे पूछा है कौन हो तुम ? और यहाँ क्यूँ पड़े हो, इसपर ब्राह्मण बोला मई ब्राह्मण कुल में जन्मा हूँ और जगन्नाथ जी की यात्रा करने जा रहा हूँ | व्यक्ति खूब जोर से हँसा और बोला अरे ब्राह्मण देवता तुम्हारा पैर तो हैं नहीं, एक दिन में एक मेंल चलना भी असम्भव सा है |फिर तुम जगन्नाथ जी कैसे पहुँचोगे .. इस पर ब्राह्मण बोला व्यक्ति जो ठान लेता है उससे अगर पीछे नहीं हेट तो वो कुछ भी कर सकता हैं | पार्वती ने शिवजी से विवाह करने का ठान लिया फिर सनकादि ऋषियों ने उनको हिलाने की खूब कोशिस की पर फिर भी उन्होंने बोला की मैंने नारदजी को अपना गुरु माना है और उनके कहने पर मैंने ये निश्चय किया है अब अगर मुझे इस निश्चय को पूरा करने के लिए कितने भी जन्म लेने पड़े तो भी मैं इस निश्चय से नहीं हट सकती | और उन्हें भगवान शिव पति रूपों में प्राप्त हुए तो मैं भी इंसान हूँ .. मैं तो सिर्फ मंदिर के ही दर्शन करना चाहता हूँ | भले मेरी रास्ते में ही मृत्यु हो जायें पर मैं हार नहीं मानूँगा | उस व्यक्ति का जीना व्यर्थ है जिसने अपने जीवन में जगन्नाथजी के दर्शन नहीं किये .. इसपर वो व्यक्ति बोला की अगर तुमको यही भगवान का दर्शन हो जाये तो, तो मान जाओगे ? ब्राह्मण ने कहा – हाँ  मुझे कोई आपत्ति नहीं है | और उसके बोलते ही वो व्यक्ति साक्षात जगन्नाथजी के रूप में प्रकट हो गया | मन के संकल्प – विकल्प शांत हो गये, ह्रदय पुलकित हो गया, अत्यात्मिक आनंद का अनुभव हुआ, भाव विभोर हो गया, जगन्नाथजी ने पूछा अब तो संतोष है तुमको बोला ?  हाँ अब मैं संतुष्ट हुआ, गाँववालों को मैं कैसे बताऊँगा की मुझे दर्शन हये.. या तो आप मेरे साथ चलिये या मुझे ऐसी कोई निशानी दीजिये… भगवान् ने उसके आढे- तेढे पैरों पर अपना पैर रखा और दोनों हाथों से ऊपर उठाया.. ब्राह्मण के दोनों पैर सही हो गये और कुब्जा की तरह दिव्य काया प्राप्त हुई .. वो ब्राह्मण दो मैं ही चल कर आ पाया था दौड़ के एक घंटे में ही अपने गाँव पहुँच गया और सभी ये चमत्कार देख कर चकित रह गये और सबने उसके ठीक हुए पैरों को देख कर माना की ऐसा चमत्कार कोई वैद्य, डॉक्टर आदि कोई ऑपरेशन नहीं कर सकता .. ये भगवान  जगन्नाथजी की लीला हैं, उस ब्राह्मण के शरीर से उत्पन्न पुत्रों की वंश परम्परा आज भी चल रही हैं | एवं उसके पौत्रों, परपौत्रों आज भी जिन्दा है |

महापुरुषों के संकल्प में बहुत बल होता है |

mahapurusha

सत्संग के मुख्य अंश
मैं सत्संग विस्तारवाला नहीं करना चाहता हूँ, बस जल्दी – जल्दी में लोकों को जल्द फायदा हो जाय |

इसलिये ॐकार की साधना, दीर्घ प्रणवः का जाप अथवा रात को सोते समय दीक्षा में बताया देता हूँ कि ऐसे नींद करो क्योंकि कम समय में जल्दी अनुभव हो जाय |

कम समय में तुम्हारे विकार – बिकार भाग जाय | कम समय में तुम्हारे पाप – बाप कट जाय | कम समय में तुम्हारी समस्याएँ की समाधान |

मेरे पास अब निवृत्ति का जीवन आ रहा हैं ना !!!