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मास – अनुसार देवपूजन

Masanusar-dincharya

Sant Asharamji Bapu

मासा अनुसार देवपूजन –

  • चैत्र मास आता है चैत्र मास में ब्रम्हा, दिक्पाल आदि का पूजन कियाजाता है ताकि वर्षभर हमारे घर में सुख-शांति रहें |
  • वैशाख मास भगवान माधव का पूजन किया जाता है ताकि, मरने के बाद वैकुंठलोक की प्राप्ति हो | ॐ नमो भगवते वासुदेवाय… |
  • जेष्ठ मास में यमराज की पूजा की जाती है ताकि, वटसावित्री का व्रत सुहागन देवियाँ करती है | यमराज की पूजा की जाती है ताकि, सौभाग्य की प्राप्ति हो, दुर्भाग्य दूर हो |
  • आषाढ़ मास में गुरुदेव का पूजन करते है अपने कल्याण हेतु और गुरुदेव कापूजन करते है तो फिर बाकी सब देवी-देवताओं की पूजा से जो फल मिलता है वोफल सद्गुरु की पूजा से भी प्राप्त ही सकता है, शिष्य की भावना पक्की हो की – सर्वदेवो मयो गुरु | सभी देवों का वास मेरे गुरुदेव में हैं | तोअन्य देवताओं की पूजा से अलग-अलग मास में अलग-अलग देव की पूजा से अलग-अलग फल मिलता है पर उसमें द्वैत बना रहता है और फल जो मिलता है वो छुपने वाला होता है | पर गुरुदेव की पूजा-उपासना से ये फल भी मिल जाते है और धीरे-धीरे द्वैत मिटता जाता है | अद्वैत में स्थिति होती जाती है |
  • श्रावण मास में दीर्घायु की प्राप्ति हो, श्रावण मास में शिवजी की पूजाकी जाती है | अकाल मृत्यु हरणं सर्व व्याधि विनाशनम् |
  • भाद्रपद मास में गणपति की पूजा करते है की, निर्विध्नता की प्राप्ति हेतु |
  • आश्विन मास के कृष्ण पक्ष में फिर पितृ पूजन करते है की, वंश वृद्धि हेतु | और अश्विन मास के शुक्ल पक्ष में माँ दुर्गा की पूजा होती है की, शत्रुओं पर विजय प्राप्ति हेतु नवरात्रियों में |
  • कार्तिक मास में लक्ष्मी पूजा की जाती है, सम्पति बढ़ाने हेतु |
  • मार्गशीर्ष मास में विश्वदेवताओं का पूजन किया जाता है कि जो गुजर गये उनके आत्मा शांति हेतु ताकि उनको शांति मिले | जीवनकाल में तो बिचारेशांति न लें पाये और चीजों में उनकी शांति दिखती रही पर मिली नहीं | तो मार्गशीर्ष मास में विश्व देवताओं के पूजन करते है भटकते जीवों के सद्गति हेतु |
  • माघ मास में सूर्य पूजन का विशेष विधान है | भविष्य पुराण आदि में वर्णन आता है | आरोग्यप्राप्ति हेतु बोले, माघ मास आया तो सूर्य उपासना करों |
  • फाल्गुन मास आया तो होली का पूजन किया जाता है.. बच्चों की सुरक्षा हेतु |

Shri Sureshanandji -Ahmedabad 21st July 2013

मन को स्वस्थ व बलवान बनाने के लिए

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आहारशुद्धिः

आहारशुद्धौ सत्त्वशुद्धिः सत्त्वशुद्धौ ध्रुवा स्मृतिः।

ʹआहार शुद्ध होने पर मन शुद्ध होता है। शुद्ध मन में निश्चल स्मृति (अखंड आत्मानुभूति) होती है।ʹ (छान्दोग्य उपनिषद् 7.26,2)

प्राणायामः

प्राणायाम से मन का मल नष्ट होता है। रजो व तमो गुण दूर होकर मन स्थिर व शांत होता है।

height=”311″ />शुभ कर्मः मन को सतत शुभ कर्मों में रत रखने से उसकी विषय-विकारों की ओर होने वाली भागदौड़ रुक जाती है।

मौनः संवेदन, स्मृति, भावना, मनीषा, संकल्प व धारणा – ये मन की छः शक्तियाँ हैं। मौन व प्राणायाम से इन सुषुप्त शक्तियों का विकास होता है।

मंत्रजपः भगवान के नाम का जप सभी विकारों को मिटाकर दया, क्षमा, निष्कामता आदि दैवी गुणों को प्रकट करता है।

उपवासः (अति भुखमरी नहीं) उपवास से मन विषय-वासनाओं से उपराम होकर अंतर्मुख होने लगता है।

“एकादशी व्रत पापनाशक तथा पुण्यदायी व्रत है। प्रत्येक व्यक्ति को माह में दो दिन  उपवास करना चाहिए।” पूज्य बापू जी

प्रार्थनाः प्रार्थना से मानसिक तनाव दूर होकर मन हलका व प्रफुल्लित होता है। मन में विश्वास व निर्भयता आती है।

सत्यभाषणः सदैव सत्य बोलने से मन में असीम शक्ति आती है।

सद् विचारः कुविचार मन को अवनत व सद् विचार उन्नत बनाते हैं।

प्रणवोच्चारणः दुष्कर्मों का त्याग कर किया गया ૐकार का दीर्घ उच्चारण मन को आत्म-परमात्म शांति में एकाकार कर देता है।

शास्त्रों में दिये गये इन उपायों से मन निर्मलता, समता व प्रसन्नता रूपी प्रसाद प्राप्त करता है।

 

शुभ कार्य की शुरूआत स्वस्तिक बनाकर ही क्यों ?

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स्वस्तिक का भारतीय संस्कृति में बड़ा महत्व है। हर शुभ कार्य की शुरूआत स्वस्तिक बनाकर ही की जाती है। यह मंगल भावना एवं सुख सौभाग्य का प्रतीक है। ऋग्वेद में स्वस्तिक के देवता सवृन्त का उल्लेख है। सवृन्त सूत्र के अनुसार इस देवता को मनोवांछित फलदाता सम्पूर्ण जगत का कल्याण करने और देवताओं को अमरत्व प्रदान करने वाला कहा गया है।
सिद्धांतसार के अनुसार उसे ब्रह्मांड का प्रतीक माना जाता है। इसके मध्य भाग को विष्णु की नाभि, चारों रेखाओं को ब्रह्मा जी के चार मुख, चार हाथ और चार वेदों के रूप में निरुपित करने की भावना है। देवताओं के चारों ओर घूमने वाले आभामंडल का चिन्ह ही स्वस्तिक के आकार का होने के कारण इसे शास्त्रों में शुभ माना जाता है। यह आकार चारों दिशाओं का द्योतक माना गया है।
स्वस्तिक को भारत में ही नहीं, विश्व के अन्य कई देशों में विभिन्न स्वरूपों में मान्यता प्राप्त है। जर्मनी, यूनान, फ्रांस, रोम, मिस्र, ब्रिटेन, अमरीका, स्कैण्डिनेविया, सिसली, स्पेन, सीरिया, तिब्बत, चीन, साइप्रस और जापान आदि देशों में भी स्वस्तिक का प्रचलन है।
तिब्बती इसे अपने शरीर पर गुदवाते हैं और चीन में इसे दीर्घायु एवं कल्याण का प्रतीक माना जाता है। सुख-समृद्धि एवं रक्षित जीवन के लिए ही स्वस्तिक पूजा का विधान है। अधिकांश लोगों की मान्यता है कि स्वस्तिक सूर्य का प्रतीक है। जैन धर्मावलम्बी अक्षत पूजा के समय स्वस्तिक चिन्ह बनाकर तीन बिन्दु बनाते हैं। पारसी उसे चतुर्दीक दिशाओं एवं चारों समय की प्रार्थना का प्रतीक मानते हैं। व्यापारी वर्ग इसे शुभ-लाभ का प्रतीक मानते हैं। बहीखातों में ऊपर श्री लिखा जाता है। इसके नीचे स्वस्तिक बनाया जाता है।
ऐतिहासिक साक्ष्यों में स्वस्तिक का काफी महत्व बताया गया है। मोहनजोदड़ो, हड़प्पा संस्कृति, अशोक के शिलालेखों, रामायण, हरवंश पुराण, महाभारत आदि में इसका अनेक बार उल्लेख मिलता है।

दशहरे के दिन विजय के लिए

bhagwaanदशहरे के दिन

दशहरा के दिन शाम को जब सूर्यास्त होने का समय और आकाश में तारे उदय होने का समय हो वो सर्व सिद्धिदायी विजय काल कहलाता है | उससमय घुमने-फिरने मत जाना | दशहरा मैदान मत खोजना…रावण जलाता हो देखकर क्या मिलेगा ? धुल उडती होगी, मिट्टी उडती होगी रावण को जलाया उसका धुआ वातावरण में होगा…. गंदा वो श्वास में लेना… धुल, मिट्टी श्वास में लेना पागलपन हैं |

ये दशहरे के दिन शाम को घर पे ही स्नान आदि करके, दिन के कपडे बदल के शाम को धुले हुए कपड़े पहनकर ज्योत पहनकर ज्योत जलाकर बैठ जाये | थोडा

“राम रामाय नम: |”

मंत्र जपते, विजयादशमी है ना तो रामजी का नाम और फिर मन-ही-मन गुरुदेव को प्रणाम करे गुरुदेव सर्व सिद्धिदायी विजयकाल चल रहा हैं की हम विजय के लिए ये मंत्र जपते हैं –

“ॐ अपराजितायै नम:”

ये मंत्र १ – २ माला जप करना और  इस काल में श्री हनुमानजी का सुमिरन करते हुए इस मंत्र की एक माला जप करें :-

“पवन तनय बल पवन समाना, बुद्धि विवेक विज्ञान निधाना |
कवन सो काज कठिन जग माहि, जो नही होत तात तुम पाहि ||”

पवन तनय समाना की भी १ माला कर लें उस विजय कालमें, फिर गुरुमंत्र की माला कर लें | फिर देखो अगले साल की दशहरा तक गृहस्थ में जीनेवाले को बहुत-बहुत अच्छे परिणाम देखने को मील सकते हैं |

– श्री सुरेशानंदजी सत्संग – आक्टोबर २०१२ से

पाचन की तकलीफों में परम हितकारी : अदरक

adrakआजकल लोग बिमारियों के शिकार अधिक क्यों हैं ? अधिकांश लोग खाना न पचना, भूख न लगना, पेट में वायु बनना, कब्ज आदि पाचन संबंधी तकलीफों से ग्रस्त हैं और इसीसे अधिकांश अन्य रोग उत्पन्न होते हैं | पेट की अनेक तकलीफों में रामबाण एवं प्रकृति का वरदान है अदरक | स्वस्थ लोगों के लिए यह स्वास्थ्यरक्षक है | बारिश के दिनों में यह स्वास्थ्य का प्रहरी है |

सरल है आँतों की सफाई व पाचनतंत्र की मजबूती

शरीर में जब कच्चा रस (आम) बढ़ता है या लम्बे समय तक रहते हैं, तब अनेक रोग उत्पन्न होते हैं | अदरक का रस आमाशय के छिंद्रों में जमे कच्चे रस एवं कफ को तथा बड़ी आँतों में जमे आँव को पिघलाकर बाहर निकाल देता है तथा छिद्रों को स्वच्छ कर देता है | इससे जठराग्नि प्रदीप्त होती है और पाचन-तंत्र स्वस्थ बनता है | यह लार एवं आमाशय का रस दोनों की उत्पत्ति बढाता है, जिससे भोजन का पाचन बढ़िया होता है एवं अरुचि दूर होती है |

आसान घरेलू प्रयोग                

स्वास्थ्य व भूख वर्धक, वायुनाशक प्रयोग

रोज भोजन से पहले अदरक को बारीक़ टुकड़े-टुकड़े करके सेंधा नमक के साथ लेने से पाचक रस बढकर अरुचि मिटती है | भूख बढती है, वायु नहीं बनती व स्वास्थ्य अच्छा रहता है |

रुचिकर, भूखवर्धक, उदररोगनाशक प्रयोग

१०० ग्राम अदरक की चटनी बनायें एवं १०० ग्राम घी में उसे सेंक लें | लाल होने पर उसमे २०० ग्राम गुड़ डालें व हलवे की तरह गाढ़ा बना लें | (घी न हो तो २०० ग्राम अदरक को कद्दूकश करके २०० ग्राम चीनी मिलाकर पाक बना लें |) इसमें लौंग, इलायची, जायपत्री का चूर्ण मीलायें तो और भी लाभ होगा | वर्षा ऋतू में ५ से १० ग्राम एवं शीत ऋतू में १०-१० ग्राम मिश्रण सुबह-शाम खाने से अरुचि, मंदाग्नि, आमवृद्धि, गले व पेट के रोग, खाँसी, जुकाम, दमा आदि अनेक तकलीफों में लाभ होता है | भूख खुलकर लगती है | बारिश के कारण उत्पन्न बीमरियों में यह अति लाभदायी है |

अपच: १] भोजन से पहले ताजा अदरक रस, नींबू रस व सेंधा नमक मिलाकर लें एवं भोजन के बाद इसे गुनगुने पानी से लें | यह कब्ज व पेट की वायु में भी हितकारी हैं |

२] अदरक, सेंधा नमक व काली मिर्च को चटनी की तरह बनाकर भोजन से पहले लें |

खाँसी, जुकाम, दमा: अदरक रस व शहद १० – १० ग्राम दिन में ३ बार सेवन करें | नींबू का रस २ बूँद डालें तो और भी गुणकारी होगा |

बुखार : तेज बुखार में अदरक का ५ ग्राम रस एवं उतना ही शहद मिलाकर चाटने से लाभ होता है | इन्फ्लुएंजा, जुकाम, खाँसी के साथ बुखार आने पर तुलसी के १० – १५ पत्ते एवं काली मिर्च के ६ – ७ दाने २५० ग्राम पानी में डालें | इसमें २ ग्राम सौंठ मिलाकर उबालें | स्वादानुसार मिश्री मिला के सहने योग्य गर्म ही पियें |

वातदर्द : १० मि.ली. अदरक के रस में १ चम्मच घी मिलाकर पीने से पीठ, कमर, जाँघ आदि में उत्पन्न वातदर्द में राहत मिलती है |

जोड़ों का दर्द : २ चम्मच अदरक रस में १ – १ चुटकी सेंधा नमक व हींग मिला के मालिश करें |

गठिया : १० ग्राम अदरक छिल के १०० ग्राम पानी में उबाल लें | ठंडा होने पर शहद मिलाकर पियें | कुछ दिन लगातार दिने में एक बार लें | यह प्रयोग वर्षा या शीत ऋतू में करें |

गला बैठना : अदरक रस शहद में मिलाकर चाटने से बैठी आवाज खुलती है व सुरीली बनती है |

सावधानी : रक्तपित्त, उच्च रक्तचाप, अल्सर, रक्तस्राव व कोढ़ में अदरक न खायें | अदरक को फ्रिज में न रखें, रविवार को न खायें |

Increase your Vital Energy by effectively Managing Daily Routine -Pujya Asaramji Bapu

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जिस समय जीवनी शक्ति जिस अंग में ज्यादा हो उस समय उस अंग से काम लेने से स्वास्थ्य अच्छा रहता है |
* सुबह ३ से ५ के बीच प्राणायाम हो जाना चाहिये |
* ५ से ७ के बीच घूमना, टहलना और जरूरी शौच का काम हो जाना चाहिये |
* ७ से ९ के बीच कुछ पी लें – दूध, जल्दी पचेगा |
* ९ से ११ के बीच भोजन कर लें |
* ११ से १ के बीच हृदय विकसित होता है, खाना नही खाना चाहिये |
* १ से ३ के बीच खाना नही खाए, पचे हुए खाने का रस शोषित किया जाता है |
* ३ से ५ के बीच पानी पी लें, मूत्राशय में जीवनी शक्ति होती है |
* पत्थरी का ऑपरेशन नहियो कराये | पत्थर चट पौधे के २ पत्ते धो के चबाके खा लें     कुछ दिन | पत्थरी खत्म |
* किडनी और कान के रोग ठीक करने हों तो ५ से ७ के बीच भोजन क्र लें |
* ९, से ९.१५ थोडा दूध ले सकते हैं अगर लेना चाहें तो |
* ७ से ९ के बीच पढ़े |
* ९ से ११ मेरु रजु में जीवनी शक्ति, यदि आराम करें तो – सीधे या करवट लेकर सोना     चाहिए, विश्राम अच्छा |
* ११ से १ के बीच जीवनी शक्ति पित्ताशय में, जागने से पित्त सबंधी रोग, नेत्र सम्बन्धी   रोग और हार्ट अटेक |
* १ से ३ के बीच लीवर में जीवनी शक्ति |
* पीलिया हों तो १ चुटकी कच्चे चावल फाँके | ॐ खं (खम) ये मन्त्र जपे |