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धमतरी में प्रसादी वितरण

धमतरी में प्रसादी वितरण 

दिनाँक  1 अगस्त को  युवा सेवा संघ एवं साधक परिवार द्वारा कावंरियो एवं दर्शनार्थियो को रुद्रेश्वर महादेव मंदिर प्रांगड़ – रुद्री धमतरी (छ.ग.) में सत्साहित्य ,प्रसादी (हलवा  व पुलाव ) का वितरण किया गया  ।

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रविवारी सप्तमी – १० जुलाई २०१६

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रविवारी सप्तमी
१० जुलाई को रविवारी सप्तमी का ‘अति दुर्लभ योग ‘ आ रहा है ,

जो के १० जुलाई दोपहर ३-०९ से से ११ जुलाई सूर्योदय तक रहेगा. इस दौरान जप , ध्यान का लाख गुना फल मिलेगा |

रविवारी सप्तमी को घातक बीमारी दूर करने के लिए : रविवार सप्तमी के दिन अगर कोई नमक मिर्च बिना का भोजन करे और सूर्य भगवान की पूजा करे , तो उस घटक बीमारियाँ दूर हो सकती हैं , अगर बीमार व्यक्ति न कर सकता हो तो कोई ओर बीमार व्यक्ति के लिए यह व्रत करे |

सूर्य पूजन विधि :
१) सूर्य भगवान को तिल के तेल का दिया जला कर दिखाएँ , आरती करें |
२) जल में थोड़े चावल ,शक्कर , गुड , लाल फूल या लाल कुमकुम मिला कर सूर्य भगवान को अर्घ्य दें |

सूर्य अर्घ्य मंत्र :

1. ॐ मित्राय नमः।
2. ॐ रवये नमः।
3. ॐ सूर्याय नमः।
4. ॐ भानवे नमः।
5. ॐ खगाय नमः।
6. ॐ पूष्णे नमः।
7. ॐ हिरण्यगर्भाय नमः।
8. ॐ मरीचये नमः।
9. ॐ आदित्याय नमः।
10. ॐ सवित्रे नमः।
11. ॐ अर्काय नमः

“जपा कुसुम संकाशं काश्य पेयम महा द्युतिम । तमो अरिम सर्व पापघ्नं प्रणतोस्मी दिवाकर ।।”

 

मासिक शिवरात्रि – २ जुलाई २०१६

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कर्ज-मुक्ति के लिए मासिक शिवरात्रि – 02 जुलाई 2016 शनिवार 

1. हर मासिक शिवरात्रि को सूर्यास्‍त के समय घर में बैठकर अपने गुरुदेव का स्मरण करके शिवजी का स्मरण करते करते ये 17 मंत्र बोलें, जिनके सिर पर कर्जा ज्यादा हो, वो शिवजी के मंदिर में जाकर दिया जलाकर ये 17 मंत्र बोले।इससे कर्जा से मुक्ति मिलेगी –

ॐ नमःशिवाय नम:
ॐ सर्वात्मने नम:
ॐ त्रिनेत्राय नम:
ॐ हराय नम:
ॐ इन्द्र्मुखाय नम:
ॐ श्रीकंठाय नम:
ॐ सद्योजाताय नम:
ॐ वामदेवाय नम:
ॐ अघोरह्र्द्याय नम:
ॐ तत्पुरुषाय नम:
ॐ ईशानाय नम:
ॐ अनंतधर्माय नम:
ॐ ज्ञानभूताय नम:
ॐ अनंतवैराग्यसिंघाय नम:
ॐ प्रधानाय नम:
ॐ व्योमात्मने नम:
ॐ युक्तकेशात्मरूपाय नम:

2. आर्थिक परेशानी से बचने हेतु हर महीने में मासिक शिवरात्रि आती है | तो उस दिन जिसके घर में आर्थिक कष्ट रहते है वो शाम के समय या संध्या के समय जप-प्रार्थना करें एवं शिवमंदिर में दीप-दान करे। और रात को जब 12 बज जायें तो थोड़ी देर जाग कर जप और एक श्री हनुमान चालीसा का पाठ करें। तो आर्थिक परेशानी दूर हो जायेगी।

3. प्रति वर्ष में एक महाशिवरात्रि आती है और हर महीने में एक मासिक शिवरात्रि आती है। उस दिन शाम को बराबर सूर्यास्त हो रहा हो उस समय एक दिया पर पाँच लंबी बत्तियाँ अलग-अलग उस एक में हो शिवलिंग के आगे जला के रखना |बैठ कर भगवान शिवजी के नाम का जप करना प्रार्थना करना, | इससे व्यक्ति के सिर पे कर्जा हो तो जल्दी उतरता है, आर्थिक परेशानियाँ दूर होती है ।

-श्री सुरेशानंन्दजी

गुरुपुष्यामृतयोग – १२ मई २०१६

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गुरुपुष्यामृत योग – गुरूवार – १२ मई २०१६  ( सूर्योदय से रात्रि 10.47 तक ) 

पुष्टिप्रदायक पुष्य नक्षत्र का वारों में श्रेष्ठ गुरूवार से योग होने पर यह अति दुर्लभ गुरुपुष्यामृत योग कहलाता हैं |

‘सर्वसिद्धिकर: पुष्य’ इस शास्त्रवचन के अनुसार पुष्य नक्षत्र सर्वसिद्धिकर हैं | शुभ, मांगलिक कर्मों के संपादानये गुरुपुष्यामृत योग वरदान सिद्ध होता है | व्यापारिक कार्यों के लिए तो यह विशेष लाभदायी माना गया है |

इस योग में किया गया जप, ध्यान, दान, पुण्य महाफलदायी होता है; परन्तु पुष्य में विवाह व उससे सबंधित सभी माँगलिक कार्य वर्जित हैं | 

– पूज्य बापूजी

Budhwari Ashtmi- 8 July 2015

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बुधवारी अष्टमी – ( ८ जुलाई – दोपहर : २-५६ से ९ जुलाई सूर्योदय  तक)

Pujya Bapuji said that doing japa and meditation (dhyan) on Budhwar Ashtmi  is lakh times more beneficial as compared to doing the same on any other day. He further mentioned that performing japa and meditation on these days would afford the same high religious merits as doing them on the supremely holy nights of Diwali, Holi, Shivratri, Janmashtami or during an eclipse.

Pujya Bapuji has advised that for reaping rich spiritual benefits, a sadhak should try & practice the following on these dayes

i. Observe Maun (silence) or speak as little as possible

ii. Devote maximum time to japa & meditation (dhyan)

iii. If possible, do upvaas (fast) and stay only on milk.

iv. Sleep on the ground on the day and on the night before as well.

v. On the night before the sacred day the sadhak should make a firm resolve, “Tomorrow, I will observe maun (silence), study the holy scriptures & other Satsang books like Divya Prerna Prakash,Jeevan Vikas & Ishvar ki Or, and will engage myself constantly in japa and meditation.”

दक्षिणायन आरम्भ – २१ जून २०१५

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दक्षिणायन आरम्भ – २१ जून २०१५

पुण्यकाल : सूर्योदय से सूर्यास्त तक

इस दिन किये जप – ध्यान व पुण्यकर्म का कोटि – कोटि गुना अधिक व अक्षय फल होता है | – पद्म पुराण

रायपुर में माला पूजन व अनुष्ठान

2 जून वट पूर्णिमा पर रायपुर आश्रम (छ.ग.) में सामूहिक माला पूजन के  साथ  अनुष्ठान का प्रारंभ किया गया   |अपनी सुशुप्त शक्तियों को जगाने के लिए साधको के लिए प्रत्येक वर्ष की भाती इस वर्ष भी बड़ो के लिए गुरु मंत्र व विद्यार्थियों के लिए  सरसत्य मंत्र सामूहिक अनुष्ठान का प्रारंभ कबीर जयंती देवस्नान  पूर्णिमा को प्रारंभ किया गया |DSCN6457 DSCN6479DSCN6469 DSCN6432

वटसावित्री-व्रत

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(अमावस्यांत पक्ष : १७ मई, पूर्णिमांत पक्ष (वट पूर्णिमा) : २ जून)
वृक्षों में भी भगवदीय चेतना का वास है, ऐसा दिव्य ज्ञान वृक्षोपासना का आधार है । इस उपासना ने स्वास्थ्य, प्रसन्नता, सुख-समृद्धि, आध्यात्मिक उन्नति एवं पर्यावरण संरक्षण में बहुत महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है ।
वातावरण में विद्यमान हानिकारक तत्त्वों को नष्ट कर वातावरण को शुद्ध करने में वटवृक्ष का विशेष महत्त्व है । वटवृक्ष के नीचे का छायादार स्थल एकाग्र मन से जप, ध्यान व उपासना के लिए प्राचीन काल से साधकों एवं महापुरुषों का प्रिय स्थल रहा है । यह दीर्घ काल तक अक्षय भी बना रहता है। इसी कारण दीर्घायु, अक्षय सौभाग्य, जीवन में स्थिरता तथा निरन्तर अभ्युदय की प्राप्ति के लिए इसकी आराधना की जाती है ।
वटवृक्ष के दर्शन, स्पर्श तथा सेवा से पाप दूर होते हैं; दुःख, समस्याएँ तथा रोग जाते रहते हैं । अतः इस वृक्ष को रोपने से अक्षय पुण्य-संचय होता है । वैशाख आदि पुण्यमासों में इस वृक्ष की जड में जल देने से पापों का नाश होता है एवं नाना प्रकार की सुख-सम्पदा प्राप्त होती है ।
इसी वटवृक्ष के नीचे सती सावित्री ने अपने पातिव्रत्य के बल से यमराज से अपने मृत पति को पुनः जीवित करवा लिया था । तबसे ‘वट-सावित्री नामक व्रत मनाया जाने लगा । इस दिन महिलाएँ अपने अखण्ड सौभाग्य एवं कल्याण के लिए व्रत करती हैं ।
व्रत-कथा : सावित्री मद्र देश के राजा अश्वपति की पुत्री थी । द्युमत्सेन के पुत्र सत्यवान से उसका विवाह हुआ था । विवाह से पहले देवर्षि नारदजी ने कहा था कि सत्यवान केवल वर्ष भर जीयेगा । किंतु सत्यवान को एक बार मन से पति स्वीकार कर लेने के बाद दृढव्रता सावित्री ने अपना निर्णय नहीं बदला और एक वर्ष तक पातिव्रत्य धर्म में पूर्णतया तत्पर रहकर अंधे सास-ससुर और अल्पायु पति की प्रेम के साथ सेवा की । वर्ष-समाप्ति के दिन सत्यवान और सावित्री समिधा लेने के लिए वन में गये थे । वहाँ एक विषधर सर्प ने सत्यवान को डँस लिया । वह बेहोश होकर गिर गया । यमराज आये और सत्यवान के सूक्ष्म शरीर को ले जाने लगे । तब सावित्री भी अपने पातिव्रत के बल से उनके पीछे-पीछे जाने लगी । यमराज द्वारा उसे वापस जाने के लिए कहने पर सावित्री बोली :
‘‘जहाँ जो मेरे पति को ले जाय या जहाँ मेरा पति स्वयं जाय, मैं भी वहाँ जाऊँ यह सनातन धर्म है । तप, गुरुभक्ति, पतिप्रेम और आपकी कृपा से मैं कहीं रुक नहीं सकती । तत्त्व को जाननेवाले विद्वानों ने सात स्थानों पर मित्रता कही है । मैं उस मैत्री को दृष्टि में रखकर कुछ कहती हूँ, सुनिये । लोलुप व्यक्ति वन में रहकर धर्म का आचरण नहीं कर सकते और न ब्रह्मचारी या संन्यासी ही हो सकते हैं । विज्ञान (आत्मज्ञान के अनुभव) के लिए धर्म को कारण कहा करते हैं, इस कारण संतजन धर्म को ही प्रधान मानते हैं । संतजनों के माने हुए एक ही धर्म से हम दोनों श्रेय मार्ग को पा गये हैं ।
सावित्री के वचनों से प्रसन्न हुए यमराज से सावित्री ने अपने ससुर के अंधत्व-निवारण व बल-तेज की प्राप्ति का वर पाया ।
सावित्री बोली : ‘‘संतजनों के सान्निध्य की सभी इच्छा किया करते हैं । संतजनों का साथ निष्फल नहीं होता, इस कारण सदैव संतजनों का संग करना चाहिए ।
यमराज : ‘‘तुम्हारा वचन मेरे मन के अनुकूल, बुद्धि और बल वर्धक तथा हितकारी है । पति के जीवन के सिवा कोई वर माँग ले ।
सावित्री ने श्वशुर के छीने हुए राज्य को वापस पाने का वर पा लिया ।
सावित्री : ‘‘आपने प्रजा को नियम में बाँध रखा है, इस कारण आपको यम कहते हैं । आप मेरी बात सुनें । मन-वाणी-अन्तःकरण से किसीके साथ वैर न करना, दान देना, आग्रह का त्याग करना – यह संतजनों का सनातन धर्म है । संतजन वैरियों पर भी दया करते देखे जाते हैं ।
यमराज बोले : ‘‘जैसे प्यासे को पानी, उसी तरह तुम्हारे वचन मुझे लगते हैं । पति के जीवन के सिवाय दूसरा कुछ माँग ले ।
सावित्री ने अपने निपूत पिता के सौ औरस कुलवर्धक पुत्र हों ऐसा वर पा लिया ।
सावित्री बोली : ‘‘चलते-चलते मुझे कुछ बात याद आ गयी है, उसे भी सुन लीजिये । आप आदित्य के प्रतापी पुत्र हैं, इस कारण आपको विद्वान पुरुष ‘वैवस्वत कहते हैं । आपका बर्ताव प्रजा के साथ समान भाव से है, इस कारण आपको ‘धर्मराज कहते हैं । मनुष्य को अपने पर भी उतना विश्वास नहीं होता जितना संतजनों में हुआ करता है । इस कारण संतजनों पर सबका प्रेम होता है ।
यमराज बोले : ‘‘जो तुमने सुनाया है ऐसा मैंने कभी नहीं सुना ।
प्रसन्न यमराज से सावित्री ने वर के रूप में सत्यवान से ही बल-वीर्यशाली सौ औरस पुत्रों की प्राप्ति का वर प्राप्त किया । फिर बोली : ‘‘संतजनों की वृत्ति सदा धर्म में ही रहती है । संत ही सत्य से सूर्य को चला रहे हैं, तप से पृथ्वी को धारण कर रहे हैं । संत ही भूत-भविष्य की गति हैं । संतजन दूसरे पर उपकार करते हुए प्रत्युपकार की अपेक्षा नहीं रखते । उनकी कृपा कभी व्यर्थ नहीं जाती, न उनके साथ में धन ही नष्ट होता है, न मान ही जाता है । ये बातें संतजनों में सदा रहती हैं, इस कारण वे रक्षक होते हैं ।
यमराज बोले : ‘‘ज्यों-ज्यों तू मेरे मन को अच्छे लगनेवाले अर्थयुक्त सुन्दर धर्मानुकूल वचन बोलती है, त्यों-त्यों मेरी तुझमें अधिकाधिक भक्ति होती जाती है । अतः हे पतिव्रते और वर माँग ।
सावित्री बोली : ‘‘मैंने आपसे पुत्र दाम्पत्य योग के बिना नहीं माँगे हैं, न मैंने यही माँगा है कि किसी दूसरी रीति से पुत्र हो जायें । इस कारण आप मुझे यही वरदान दें कि मेरा पति जीवित हो जाय क्योंकि पति के बिना मैं मरी हुई हूँ । पति के बिना मैं सुख, स्वर्ग, श्री और जीवन कुछ भी नहीं चाहती । आपने मुझे सौ पुत्रों का वर दिया है व आप ही मेरे पति का हरण कर रहे हैं, तब आपके वचन कैसे सत्य होंगे ? मैं वर माँगती हूँ कि सत्यवान जीवित हो जायें । इनके जीवित होने पर आपके ही वचन सत्य होंगे ।
यमराज ने परम प्रसन्न होकर ‘ऐसा ही हो यह कह के सत्यवान को मृत्युपाश से मुक्त
कर दिया ।
व्रत-विधि : इसमें वटवृक्ष की पूजा की जाती है । विशेषकर सौभाग्यवती महिलाएँ श्रद्धा के साथ ज्येष्ठ शुक्ल त्रयोदशी से पूर्णिमा तक अथवा कृष्ण त्रयोदशी से अमावास्या तक तीनों दिन अथवा मात्र अंतिम दिन व्रत-उपवास रखती हैं । यह कल्याणकारक व्रत विधवा, सधवा, बालिका, वृद्धा, सपुत्रा, अपुत्रा सभी स्त्रियों को करना चाहिए ऐसा ‘स्कंद पुराण में आता है।
प्रथम दिन संकल्प करें कि ‘मैं मेरे पति और पुत्रों की आयु, आरोग्य व सम्पत्ति की प्राप्ति के लिए एवं जन्म-जन्म में सौभाग्य की प्राप्ति के लिए वट-सावित्री व्रत करती हूँ ।
वट के समीप भगवान ब्रह्माजी, उनकी अर्धांगिनी सावित्री देवी तथा सत्यवान व सती सावित्री के साथ यमराज का पूजन कर ‘नमो वैवस्वताय इस मंत्र को जपते हुए वट की परिक्रमा करें । इस समय वट को १०८ बार या यथाशक्ति सूत का धागा लपेटें । फिर निम्न मंत्र से सावित्री को अघ्र्य दें।
अवैधव्यं च सौभाग्यं देहि त्वं मम सुव्रते । पुत्रान् पौत्रांश्च सौख्यं च गृहाणाघ्र्यं नमोऽस्तु ते ।।
निम्न श्लोक से वटवृक्ष की प्रार्थना कर गंध, फूल, अक्षत से उसका पूजन करें।
वट सिंचामि ते मूलं सलिलैरमृतोपमैः । यथा शाखाप्रशाखाभिर्वृद्धोऽसि त्वं महीतले ।
तथा पुत्रैश्च पौत्रैश्च सम्पन्नं कुरु मां सदा ।।
भारतीय संस्कृति वृक्षों में भी छुपी हुई भगवद्सत्ता का ज्ञान करानेवाली, ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ कृति- मानव के जीवन में आनन्द, उल्लास एवं चैतन्यता भरनेवाली है ।
(ऋषि प्रसाद, जून २००७)

Ekadashi Vratam

Ekadashi Devi

Ekadashi Devi

Ekadashi Meaning : (Sanskrit: एकादशी, ekādaśī, “Eleven”, “Eka” – one, “dashi” – ten), also spelled as Ekadasi. This is an important day in Hinduism and especially the Vaishnavite tradition giving an opportunity to the devotees for self-purification, redemption and spiritual progress.

Ekadashi vratam

Ekadashi vratam (fasting) is observed every 11th Tithi (day) of a month of the Hindu calendar. There are two Ekadashi Tithis in a month; one during Shukla Paksha (the bright fortnight) and another during Krishna Paksha (the dark fortnight). Devotees of Lord Vishnu observe this Ekadashi vratam to seek His special blessings.

Ekadashi vratam continues through three days. Devotees take a single meal only in the afternoon of the day before the fasting day to make sure there is no residual food in the stomach on the next day. Devotees observe a strict fast on the Ekadashi day and break it the next day only after sunrise. Eating of all type of grains and cereals is prohibited during Ekadashi fasting.

However, devotees can choose to observe to fast without water, with only water, with only fruits, with one time latex food according to their respective choice and endurance. This dietary regimen must be decided prior to the start of the fast.

Before going into further details, let’s first know the legend behind the origin of Ekadashi. Come, let’s make Ekadashi 2015 more significant by knowing the myth behind it.

Legend of Ekadashi

As per the legend, once Lord Vishnu was lying in Yoga Nidra (yogic sleep). At that time, a demon named Murdanav, came and challenged Lord Vishnu for a fight. As Lord Vishnu was in Yoga Nidra, a damsel appeared from his Ekadash Indri (eleventh sense). As soon as Murdanav had a glimpse of the damsel, he got so attracted that he wanted to marry her. But, the damsel put a condition that first he would have to fight with her. Murdanav became so passionate after seeing the damsel that he agreed to have a fight. In the fight, the demon got killed by the damsel. Lord Vishnu became happy and got pleased by the firm dedication of the damsel. After naming her as Ekadashi, because she had appeared from his Ekadash Indri, He told her to ask for a boon. Goddess Ekadashi requested Lord Vishnu that she wants people to observe a fast on the day of Ekadashi, whereupon people would get free from all evils and sins. Lord Vishnu granted her the boon and said that one observing a fast on an Ekadashi would get Moksha (salvation).

ekadashi dates 2015

 

How to observe Ekadashi

In the Ekadashi morning you should take a shower, sit down calmly and clear your mind. It is important to understand that fasting is not just rejection of food or other eatables. If you give vent to anger or moral deficiency – your observance of the vrata is but faulty. Also, avoid daytime sleep, oil massage and shaving.

If you are unable to observe a complete fast, eat no more than a single meal after midday on the Ekadashi day.

If an Ekadashi coincides with the Dashami (the 10th lunar day) there’s no need to fast; but if it coincides with the Dvadashi (12th Lunar day) it is called “pure Ekadashi” (Mahadvadashi) and it can be observed strictly.

Neither overeat the day before fasting, nor take animal food. Vegetables, fruits, porridge are advisable.

The first meal after the fast should preferably consist of a light curry of black grams or else one can make do with even fresh fruits or juices. Be careful with your ration. Your stomach happens to be at complete rest during a fast, so do not overload it with heavy food while breaking the fast.

Those observing a partial fast should avoid consumption of “Rice”.

Ekadashi finds mention in a number of Puranas. It is associated with Lord Vishnu and ‘Haribhakti Vilas’ talks in detail about its importance. Today, in Hindu religion Ekadasi has come to mean a day to fast. It falls on the 11th day of every lunar fortnight and thus there are two Ekadashi in a month. It is also known as ‘Harivasara’ and ‘Hari din.’ Several Puranas including Padma Purana and Skanda Purana detail about the significance of Ekadeshi.

How to fast on Ekadashi?

How to observe ‘Ekadashi’ is clearly mentioned in ‘Harivasara.’ In modern day, many people will find it difficult to observe it in its entire strictness. Yet, there are a large number of people who observe it. And there are numerous observations on what food one can have? There are also regional variations to the way in which the Ekadasi is observed.

Praying to Vishnu is the order of the day. Some people avoid sleep during Ekadashi nights and listen to religious discourses and perform ‘Arati.’

It is good to go on fast once in a while as it recuperates the body. Ekadashi observance cleans our body and the digestive organs get much needed rest besides imparting religious merits to the devotee.

Those people suffering from ailments and on medications should take the advice of a doctor before fasting. Never torture your body in the name of religion. There is nothing wrong in having fruits or milk but they shouldn’t be taken together or at quick succession. And you can always bring a certain amount of flexibility in the way it is.

Ekadashi Dates 2015