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Bapuji ki Bhavishya Vaani

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देखें आश्चर्यजनक और चमत्कारिक वीडियो…
पूज्य बापूजी ने पहले ही कह दिया था…
साजिश करने वाले क्या-क्या साजिश कर रहे हैं मैं तैयार बैठा हूँ । बहुत बहुत तो जेल जाना है । जेल भरो करेंगे । उधर का भी मजा लेके आयेंगे ।

(अब देखिये बापूजी की त्रिकाल दर्शिता-पहले ही पता चल गया था कि जेल भेजने की साजिश है । )
( दूसरा 3 साल पहले हरिद्वार के एकांत सत्संग में सुना था बापूजी बोले की एसे भी दिन आएंगे कि जेल जाना पडेगा । )

पाप करना बुरा है लेकिन झूठ-मूठ में कोई जेल भेजता है, तो नानक जी भी जेल जाकर आये थे तो नानक जी अपराधी थोडिको थे । लेकिन ओर चमके । अपन ओर चमक के आ जायेंगे क्या फरक पड़ता है ।

लेकिन जेल भरो करने पर भी प्रकृति क्या करेगी वो जान लेंगे समझ लेंगे ।निर्दोष को कोई सताता है तो उसके ऊपर भी कुदरत का प्रकोप होता है…… ।

( दूसरी आश्चर्य कारक घटना देखिये इस विडियो में…बापूजी बोले कि ये सत्रहवीं बार आया हूँ तुम लोगों के बीच । सोलह बार पहले आ चुका हूँ ।)

श्री योग वशिष्ट महारामायण में भी ये लिखा हुआ है कि भगवान् रामजी के गुरुदेव श्री वशिष्ट जी कहते हैं भगवान कृष्ण इस धरती पर सोलह बार तो आ चुके हैं । अब समझ जाइये कि….

जोधपुर होस्पिटल में भी दिखा बापूजी का चमत्कार…..

g71जोधपुर होस्पिटल में भी दिखा बापूजी का चमत्कार…..
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जी हाँ नागौर (राज.) के रहने वाले एक व्यक्ति का जब बापूजी को देखते ही बदल गया सारा जीवन नशे की लत तो छूटी पर शरीर की भयंकर बिमारियाँ भी निकल गयी ।

7 लाख रूपये खर्च कर चुका नशे में, केवल एक बार बापूजी के कह देने से नशा छूट गया ।
21 दिन तक लगातार खडा रहा नींद नहीं आती थी, बापूजी ने अपने हाथों से प्रसाद दिया और एक मंत्र जप करने को कहा दो चार घंटे में ही वो आदमी आराम की नींद सो गया ।
नागौर के रहने वाले पूर्ण कुमार जो लाखों रूपये नशे में खर्च कर चुके थे, नशे के कारण 21 दिन तक नींद नहीं आई जागता रहा सारी दुनीया सोती रही पर इनकी नींद उड गयी । घर नर्क बन चुका था अपने घर में अपनी घरवाली को नशे की हालत में पीटता था ।

बापूजी का आशिर्वाद मिला नशा तो छूटा घर परिवार में सुख शांति भी आयी । शरीर की बिमारीयाँ भी चली गयी ।

हुआ कुछ यूं के जोधपुर हास्पिटल में बापूजी को इलाज के लिए कई बार जाना पडा है पूज्य बापूजी के इलाज के लिए उन्हें होस्पिटल ले जाया जाता था वहाँ बहुत से ऐसे मरीज भी थे जिन्हें बापूजी से मिलने का मौका मिला इनमें ये पूर्ण कुमार भी थे जिन्हें 21 दिनों से लगातार नींद नहीं आ रही थी । और नशे की इतनी लत पड गयी थी कि नशे के बिना सारा शरीर लाचार हो जाता था । इन्हें होस्पिटल में बापूजी से बात करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ । इन्होंने बापूजी को बताया मैं नशा करता हूँ मेरा घर बरबाद हो गया अब नशे की लत छोडना चाहता हूँ पर छूटती नहीं । बापूजी ने सहज में ही कहा कैसे नहीं छूटती मैं देखता हूँ । ये प्रसाद खा सब ठीक हो जायेगा । उस प्रसाद में जुडे संत महापुरुष बापूजी के आशिर्वाद ने जैसे पूर्ण सिंह की जिंदगी बदल दी । और नशा तो छूटा पर शरीर की सारी बिमारियाँ भी चली गयी । और ये के कुछ ही घंटों में जीवन की काया बदल गयी ।

पूर्ण सिंह जी कहते हैं बापूजी पर श्रद्धा ना रखने वाले आँख वाले अंधे हैं वो आज इतने बडे महान संत को पहचान नहीं पा रहे हैं । बापूजी साक्षात भगवान के अवतार हैं । मैं उनको प्रणाम करता हूँ । जब बापूजी हास्पिटल में आते थे तो वहाँ रहने वाले सभी मरीज कहा करते थे ये वो महान संत हैं इनके चरणों की धूल भी हमें छूने को मिल जाये तो हमारा जीवन बदल जायेगा । इन बाबाजी के चरणों में हमारा प्रणाम है । बापूजी तो वो संत हैं जो अपनी पीडा ना देखकर दूसरों की पीडा हरने में लग जाते हैं । प्रणाम है मेरा शत शत प्रणाम है बापूजी के चरणों में……

मैंने ये पंक्ति चरितार्थ होते देखी है —
वैष्णव जन तो तेने कहिये जे पीड पराई जाणे रे…..।
बापूजी के चरणों में मेरा शत शत नमन !

आज संत आशारामजी बापू को समझने में कमी रखने वाले आँख वाले अंधों को ये विडियो जरूर देखना चाहिए की जोधपुर में भी देखने को मिल रहे हैं संतों की कृपा के चमत्कार ।

सत्य क्या है ? हम क्या करें ?…आदि (भाग- ५ और भाग – ६)

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भाग- ५ 

प्रश्न २१ – बापूजी को बेल या बाइज्जत बरी होने के बाद भविष्य में हमें फिर से ऐसा बुरा वक्त न देखना पड़े ,उसकी जिम्मेदारी /तैयारी आश्रम संचालक लेगे /करेगे ?

उत्तर : भविष्य में क्या करना इसमें संचालक स्वतंत्र नहीं है. उनको जैसा आदेश मिलेगा ऐसा वे करेंगे |

प्रश्न २२ – बापूजी को जेल गए ५ महीने का समय हो गया है और आश्रम का लीगल विभाग बापूजी की बेल भी नहीं करा पा रहा है ऐसा क्यों ?

उत्तर :  क्योंकि यह एक राजनैतिक षड्यंत्र है |

प्रश्न २३ – बार बार वकील क्यों बदले जा रहे है ,कभी मेनन कभी राम जेठ मालानी कभी लद्धा ?

उत्तर : यह मेनेजमेंट का विषय है. उनको गुरुदेव का संकेत भी हो सकता है |

प्रश्न २४ – क्या कर कसर से चलकर पैसा बचने के चक्कर में आश्रम का मैनेजमेंट तो नहीं लगा है जिसके कारण बापूजी को बेल नहीं मिल पा रही है ?

उत्तर : साधकों को गुरु के सिद्धांत के अनुसार चलना होता है |करकसर भी तो गुरुजीने सिखाई है और किसीको घूस न देना भी गुरुदेव का सिद्धांत है | और यह एक राजनैतिक षड्यंत्र है जिसे पैसे के बल पर विफल नहीं किया जा सकता |

प्रश्न २५ – क्यों हम अपनी संस्था की इज्जत बेचकर पैसा बचने की बात सोचते हैं ? अगर इज्जत ही नहीं रहेगी तो लोग संस्था से टूट जायेंगे जिससे आश्रम को इतनी आर्थिक हानी होगी जितना यथायोग्य पैंसा खर्चने से नहीं होगी ?

उत्तर : पैसे बचाने के कारण ही इज्जत जा रही है यह बात गलत है | विधर्मियों के धर्मान्तरण के कार्य में बाधा पहुंचती है और मल्टीनेशनल कंपनियों के बिजनेस में बाधा पड़ती है हमारी सेवा सत्संग आदि प्रवृत्तियों से. लोग संस्था से टूट जायेंगे तो उनका दुर्भाग्य होगा |संस्था की सुरक्षा के लिए नैतिक सिद्धांतों का बलिदान देना महापुरुष पसंद नहीं करते |

भाग- ५ 

प्रश्न  २६ – क्या हम दूसरी संस्थाओ से कुछ शिक्षा नहीं ले सकते ?कुछ संस्थाये साधना व अध्यात्मिक जगत में कंगाल है , लोगों का कोई भला करने में सक्षम नहीं है लेकिन वहाँ रिसेप्शन / व्येवहार व व्यवस्था इतनी अछि होती है की केवल सुन्दर व्यवहार के कारण भी कई लोग कई ऐसी संस्थाओं में जाते है, जबकि अपनी संस्था में हर व्यक्ति का पूर्ण रूपेण भला करने की क्षमता है , पूरी दुनिया को दिशा देने की ताकत है , अध्यात्म जगत में शिरोमणि है उसके बावजूद भी केवल हमारा व्यवहार व व्यवस्था ठीक न होने के कारण लोग हमारी संस्था से नहीं जुड़ते है ?

उत्तर : इस प्रश्न में ही उत्तर समाया हुआ है | अध्यात्मिक जगत में कंगाल संस्थाएं लोगो के जीवन का वास्तविक कल्याण करने की क्षमता नहीं रखती इसीलिए लोगों को आकर्षित करने हेतु अच्छी व्यवस्था, खानपान, रहन-सहन की सुविधा, आनेवालों के अहंकार का पोषण करे ऐसा रिसेप्सन आदि के रखना पड़ता है | जिनको अध्यात्मिकता से कोई लेना देना नही ऐसे ही लोग वहाँ जाकर अपना अहं पोषते है | लेकिन जिन महापुरुषों में अध्यात्मिक सामर्थ्य है, और लोगों का वास्तविक कल्याण करने की क्षमता है, वे तो अधिकारी सुपात्र लोगों पर ही कृपा बरसातें है, जिनमे तितिक्षा हो, ईश्वर के लिए कष्ट सहने की तैयारी हो, स्वादिष्ट भोजन के गुलाम ना हों, अपमान भी सह सकें तभी तो आध्यात्मिकता का खज़ाना हजम होता है | उनकी दृष्टी में अधिकारी सुपात्र लोगों को खजाना देने की महत्ता होती है लोगो की संख्या बढाने की नहीं होती | फिर भी जितने कष्ट सहकर गुरुदेव ने यह खजाना पाया है, उतने कष्ट वे हमें सहने नहीं देते | यह उनकी करूणा है | अन्यथा इतिहास में आप पढ़ सकते हो, की राजा भरतरी, गोपीचंद,जानश्रुति आदि बड़े बड़े राजाओं को भारी कसौति में पास होने के बाद ही महापुरुषों की कृपा मिलती थी |

प्रश्न २८ – क्या बापूजी को (सैम दम दंड भेद ) कैसे भी करके छुड़ाने के लिये बापूजी की आज्ञा का उल्लंघन कर देना उचित है ? क्यों की बापूजी तो कभी नहीं चाहेंगे की कोई उन्हें छुड़ाने के लिये जरा सा भी कष्ट या आफत मोल ले |

उत्तर : महापुरुषों को अपना सिद्धांत अपने प्राणों से भी प्यारा होता है. जो उनके सिद्धांत को तोडता है वह शिष्य उनके प्राण ही ले लेता है. सुकरात ने उसको अनितिपूर्वक जेल से मिक्त कर के भगाने कि योजना को अस्वीकार कर के जहर पीना पसंद किया था. यदि महापुरुष भी अन्य लोगों की तरह जीने लगे तो उनकी विशेषता क्या रहेगी?

प्रश्न २८ – बापूजी के निकट सानिध्य में १८ – २० सालो तक रहने के बाद भी लोग सुधर नहीं पाते ऐसा क्यूँ ? उदाहरण :- अमृत वैद्य,कौसिक, भाना, दिनेश ड्राइवर आदि |

उत्तर : इसका कारण यह है कि वे सुधरना चाहते ही नहीं थे | जो खुद सुधरना नहीं चाहते उनको ब्रह्मा, विष्णु महेश भी सुधार नहीं सकते. और गुरुदेव ने करुणावश अनधिकारी लोगों को भी सुधरने का मौक़ा दिया पर आखिर उन लोगों ने अपनी आसुरी प्रकृति के अनुसार व्यवहार किया | जय विजय विष्णु लोक में रहते थे फिर भी नहीं सुधारे| सनकादी मुनियों का अपमान किया और उनको तीन बार आसुरी योनिमें जाने का शाप भोगना पडा | वे जब हिरण्याक्ष और हिरण्य काशीपु बने तब भी भगवान विष्णु ने वराह और नरसिंह अवतार लेकर उनका उद्धार किया, फिर जब वे रावण और कुम्भकर्ण बने तब राम अवतार लेकर उनका उद्धार किया, जब वे शिशुपाल और दन्त वक्र बने तब कृष्ण अवतार लेकर उनका उद्धार किया. ऐसे आसुरी प्रकृति के लोगों से भी दैवी कार्य कराना गुरुदेव की विशेषता है |

प्रश्न २९ – अगर कोई आश्रम संचालक वरिष्ट संचालक की आज्ञा का पालन नहीं करता है और इससे संस्था को सेवा में विघ्नरूप होता है तो आपके पास इसका क्या समाधान है ?

उत्तर : इसकी प्रमाण सहित जानकारी वरिष्ठ संचालक को देनी चाहिए और फिर क्या करना यह उसकी जिम्मेदारी है |

प्रश्न ३० – किस आश्रम वासी को क्या-क्या अधिकार है ये सब हमें लिखित में मिल सकते है ?

उत्तर : वास्तव में किसी आश्रम वासी को कोई अधिकार ऑफिशियली दिये नहीं जाते | संचालको को भी स्वंतत्र निर्णय लेनेका अधिकार नहीं दिया जाता | ब्रह्मज्ञानी के आश्रम में सब को अपना जोखम उठाकर सेवा करना पड़ता है. कभी कभी अच्छी सेवा के बदले में भी डांट पड सकती है |

सत्य क्या है ? हम क्या करें ?…आदि (भाग- ३ और भाग -४)

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प्रश्न ११ – इतने साल हो गए इस संस्था को काम करते हुए लेकिन हम लोग एक भी राजनीतिक पार्टी को अपना नहीं बना पाए ऐसा क्यों ?अगर किसी राजनीतिक पार्टी का साथ हमें मिला होता तो इतना बवाल नहीं होता ?

उत्तर : महापुरुष किसी राजनैतिक पार्टी के गुलाम नहीं होते, उनकी दृष्टि में राग द्वेष नहीं होता और पार्टी से जुडने के लिए राग द्वेष जरूरी है | ब्रह्मज्ञानी और अन्य लोगों में यही फर्क होता है कि ब्रह्मज्ञानी की दृष्टि में साधक का विकास मुख्य होता है संस्था का विकास या सुरक्षा गौण होती है इसलिए वे कभी किसी पार्टी के संकीर्ण दायरे में फंसाकर अपने साधको का अहित नहीं कर सकते | अन्य लोग साधक का विकास गौण समझते है और संस्था का विकास मुख्य समझते है इसलिए वे किसी राजनैतिक पार्टी के पिट्ठू हो जाते है | ब्रह्मज्ञानी को अपना सिद्धांत अपने प्राणों से भी प्यारा होता है अपने सिद्धांत के लिए राजाओं की चापलूसी करने के बदले गुरु अरजनदेव, गुर हरगोबिन्दजी और गुरु गोबिंदसिंह ने अपनी, अपने शिष्यों की कुर्बानी दे दी तभी वे महापुरुष कहलाते है |

प्रश्न १२ – हम कैसे विश्वास करे की आश्रमवासी इस सड्यंत्र में मिले हुए नहीं है ? सारे आश्रम वाले ठन्डे होकर बैठे है बापूजी की बेल के लिए कुछ भी प्रयास नहीं कर रहे है ?

उत्तर : जिनको यह जिम्मेदारी गुरुदेव के द्वारा सोंपी गई है वे प्रयास कर रहे है | गुरूजी के पास भी अपना राडार है, वे तुरंत समझ जाते है कि कौन आश्रमवासी गद्दार है | वे चाहे तो उनको निकाल सकते है और न चाहे तो नहीं निकाले उनकी सम्मति के बिना आपको किसीको निकालने का अधिकार नहीं है | आपकी धारण गलत है कि वे कुछ भी नहीं कर रहे है | सफल नहीं होने के कई कारण हो सकते है क्योंकि यह कोई साधारण मामला नहीं है इसमें शीर्ष नेता मिले हुए है जिनके आदेश अनुसार कभी कभी न्याय तंत्र भी काम करने को मजबूर होता है |

प्रश्न १३ – बापूजी का गिरफ्तार होना और लाखों -करोड़ो साधको को इतना बड़ा मानसिक आघात पहुचाना क्या ये सब बापूजी की लीला है या षड्यंत्र ?

उत्तर : जीवन्मुक्त महापुरुष के लिए सारा जीवन लीला ही होता है. क्योंकि वे जगत को सच्चा नहीं मानते है और व्यावहारिक दृष्टि से यह एक सुनियोजित षड्यंत्र भी है |

प्रश्न १४ – ऐसा सुनने में आया था कि अभी तो 20 टका षड्यंत्र हुआ है 80 टका तो बाकि है क्या ये बात सही है और अगर सही है तो इसका क्या अर्थ है ?

उत्तर : सनातन धर्म को मिटाने का षड्यंत्र ९00 साल से चल रहा है. बेचारे भोले हिंदू इसे समझ नहीं पाते | जब सनातन धर्म मिट जाएगा तब १00% षड्यंत्र पूरा माना जाएगा. जब सृष्टिकर्ता को सुर्ष्टि समाप्त करनी होगी तब यह हो जाएगा क्योंकि सनातन धर्म के बिना सृष्टि चल ही नहीं सकती |

प्रश्न १४ – वास्तव में यदि कांग्रेस ने राजस्थान में षड्यंत्र किया था तो अभी तो पूर्ण बहुमत के साथ BJP आ चुकी है | फिर भी बापूजी को पहले से ज्यादा सताया जा रहा है , ये सारी बात समझ में नहीं आ रही है ?

उत्तर : सब पार्टियां अपने स्वार्थ से चलती है. किसी धर्म के वोट लेनेके लिए कोई हिंदुत्व का आश्रय ले तो इस से वे वास्तवमें हिन्दुत्ववादी सिद्ध नहीं हो जाते | महापुरुषों का उपयोग सब पार्टियां करती है और बाद में वे कृतज्ञता के बदले कृतघ्नता भी कर सकते है | आखिर तो वे कलजुग के नेता है |

भाग -४ 

प्रश्न १६ – मीडिया में आया की सूरत पुलिस  कमिश्नर ने कहा की नारायण साईं जी ने स्वीकार कर लिया है कि मैंने रेप किया था, इसका क्या मतलब है ?

उत्तर : मिडिया में आया हुआ सब सत्य होता तो फिर कोर्ट की जरूरत ही नहीं रहती | आप कोर्ट के निर्णय का इन्तजार क्यों नहीं करते ? मिडिया तो एक धंधा है. जैसे सिनेमा एक धंधा है. चाहे जैसी स्टोरी बना कर चाहे जैसी फिल्म बनाकर सिनेमावाले पैसे कमा सकते है ऐसे ही मीडियावाले भी कर सकते है |

प्रश्न १७ – जितना पैसा सुप्रचार में लगाया जाता है, अगर उतना पैसा मीडिया / सरकार को घूस दे दे तो शायद भविष्य में बापूजी के खिलाफ इस प्रकार के षड्यंत्र न हो ?

उत्तर : ऐसा तो वे पहले भी कर सकते थे लेकिन वे सत्य का बलिदान देकर अपनी रक्षा करना पसंद नहीं करते | यदि महापुरुष भी ऐसा करने लगे और षड्यंत्र के भय से भ्रष्ट तंत्र का समर्थन करने लगे तो उनमें और अन्य भ्रष्ट पुरुष में फर्क क्या रहा ? ब्रह्मज्ञानी को अपना सिद्धांत अपने प्राणों से भी प्यारा होता है | अपने सिद्धांत के लिए राजाओं की चापलूसी करने के बदले सुकरात, गुरु अरजनदेव, गुर हर-गोबिन्दजी और गुरु गोबिंदसिंह ने अपनी, अपने शिष्यों की कुर्बानी दे दी. तभी वे महापुरुष कहलाते है |

प्रश्न १८ – अपनी संस्था दुनिया की सबसे बड़ी धार्मिक संस्था है उसके बावजूद भी आश्रम में कोई व्यवस्थित मैनेजमेंट नहीं है इसका दोषी कौन है ?

उत्तर : ब्रह्मज्ञानी की दृष्टि में साधक का विकास मुख्य होता है संस्था का विकास या सुरक्षा गौण होती है | इसलिए वे कभी अन्य संस्थाओं जैसा मेनेजमेंट रहने नहीं देते | उडियाबाबा ने ध्यान करनेवाले डॉक्टर को हल चलाने भेज दिया और हल चलानेवाले किसान को ध्यान करने बिठा दिया | जब मित्र संत ने कहा कि इससे तो खेती बिगड जायेगी और उस किसान का ध्यान लगेगा नहीं, उसकी रूचि खेती में थी और डॉक्टर कि रूचि ध्यान में थी | तब बाबा ने कहा कि रूचि ही तो बांधती है. मुझे उनको रूचि के बन्धन से मुक्त करना है | खेती बिगड जाय तो बिगड जाय पर उनका विकास होना चाहिए | बड़े बड़े मेनेजमेंट करनेवाले आये आश्रम में लेकिन वे टिक नहीं पाये क्यों कि वे अपना विकास नहीं चाहते थे | अहंकार का विसर्जन नहीं चाहते थे, अहंकार का पोषण चाहते थे | सेवा कराकर उनका अहंकार पोषकर संस्था का विकास करने से तो संस्था बनाने का उद्देश्य ही मारा जाता है | एकबार ऐसे मेनेजमेंट सुधारने के इच्छुक कुछ वकील, डॉक्टर आदि सज्जन रमण महर्षि के आश्रम में भी गये थे | महर्षि शांत गहरे मौन में बैठे रहे और वे बुद्धिजीवी कुछ बोल न सके. तब महर्षि ने कहा, “कुछ लोग अपने सुधार के लिए आश्रम में नहीं आते. आश्रम को सुधारने के लिए आते है. उनका अपना सुधार कब होगा ?” यह सुनकर वे चुप हो गये. इसलिए आप इस बात के लिए किसीको दोषी मत मानो | ऐसा सोचना ही दोष है कि ब्रह्मज्ञानी के आश्रम में हम चाहे ऐसा मेनेजमेंट हो | क्या आप उनके गुरु हो कि उनको सिखाना चाहते हो कि मेनेजमेंट कैसा होना चाहिए ? आप अच्छे मेनेजमेंट वाली कोई दूसरी संस्था खोज लो| 

प्रश्न १९ – एडवोकेट बी. एम् . गुप्ता ने लाइव कांफ्रेंस में बोला था कि कई आश्रम के ट्रस्टी ही बापूजी को छुड़ाना नहीं चाहते, इसका क्या मतलब है?

उत्तर : एडवोकेट से ज्यादा अक्कल बापूजी में है | वे चाहते तो उन ट्रस्टियों को निकाल देते कैसे लोगों को ट्रस्टी बनाना चाहिए यह बात बापूजी को एडवोकेट से सीखनी पड़ेगी ?

प्रश्न २० – क्या पूरी संस्था में सर्व गुण सम्पन्न व्यक्ति नहीं है जो बापूजी की अनुपस्थति में पूरी संस्था का सुचारू रूप से सञ्चालन कर सके ?जिसके ऊपर सबको विश्वास हो और उसे हर बड़े निर्णय लेने का अधिकार प्राप्त हो और वह करोडो साधको को एकता के सूत्र में फिरोकर आपातकाल में सही मर्ग्दंशन कर सके ?

उत्तर : ऐसा कोई व्यक्ति होता तो बापूजी उसे यह अधिकार अवश्य देते | बापूजी कि उपस्थिति में भी ऐसा कोई आदमी कभी नियुक्त नहीं किया गया जिसे सम्पूर्ण आश्रम की जिम्मेदारी और निर्णय लेने का स्वतंत्र अधिकार दिया गया हो | ऐसा करने से उसका विकास नहीं हो सकता | गुरुभक्ति का सिद्धांत है गुरु की शरणागति और शरणागति का मतलब है स्वतंत्र निर्णय न लेकर गुरु के आदेश से चलाना | ऐसी परिस्थिति में उनकी स्वतंत्र निर्णय लेनेकी क्षमता का विकास नहीं हो सकता कि उसे आपातकाल में काम आये |

सत्य क्या है ? हम क्या करें ?…आदि | साधकों के तीखे प्रश्न और डॉ. प्रेमजी के अनुभव युक्त उत्तर

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भाग -१ 

प्रश्न १ – अगर हमारा पड़ोसी / मित्र बापूजी के बारे में कुछ टोंट मारता है तो क्या करे ?
उत्तर : कोई भी गुरुकी निंदा सुनाये या टोंट मारे तो हमें अपने अनुभव का आदर करना चाहिए. आपका अनुभव है कि चिड़िया हाथी से छोटी है और मछली पानीमें रहती है. अगर कोई केमेरा की तकनीक से चिड़िया को हाथी से बड़ी दिखा दे और मछली को हवामें उडती दिखा दे और यह बात दुनिया के सब मीडिया वाले दिखाने लगे तो क्या आप उसे मान लोगे ? आप का अपना अनुभव ही आप सच्चा मानोगे | निंदक पर हमें दया आनी चाहिए कि उसे हिंदू धर्म के शत्रुओं ने मिडिया के द्वारा brain wash किया है | जब आप जानते हो कि वह झूठ बोलता है, तो आपको उस पर हँसी आनी चाहिए | यदि वह सत्य जानना चाहता हो तो सुप्रचार की पुस्तक या वीडियो क्लिप देनी चाहिए और यदि वह अधिकारी नहीं है तो उसकी उपेक्षा करना चाहिए जैसे गली में कुत्ता भोंकता है तो आप उसके सामने भोंकते नहीं हो, उपेक्षा कर देते हो | भगवान कृष्ण, राम, बुद्ध, महावीर स्वामी, आदि सभी लोक कल्याण में रत रहनेवाले महापुरुषों के शिष्यों को ऐसे दिन देखने पड़े है. यह कोई नई बात नहीं है |

प्रश्न २ – अगर कोई बोले कि बापूजी के बारे मीडिया में इतना इतना चल रहा है ,सारा नहीं लेकिन कुछ दोष तो होगा बापूजी का ?
उत्तर : मिडिया एक धंधा है. पैसे कमाने के लिए वे कुछ भी कर सकते है. जैसे गुंडे लोग पैसे की लालच में किसी निर्दोष की हत्या भी कर देते है ऐसे ही ये लोग चरित्र हनन कर सकते है. अब तक कितने संतो के लिए मिडिया ने बकवास की जैसे शंकराचार्य जयेन्द्र सरस्वती आदि लेकिन जब वे निर्दोष सिद्ध हो गये तब मिडिया ने क्षमा भी नहीं मांगी और वह समाचार दिखाया भी नहीं | भारत में प्रिंट मिडिया पर जितना नियंत्रण है ऐसा टीवी मिडिया पर नहीं है | भारत का ज्यादातर मिडिया ईसाई मिशनरी के हाथों में है. ईसाईयों के पादरी देश में और दुनिया में कितने बलात्कार करते है वह कभी नहीं दिखाते भारत के मीडियावाले | मीडियावाले के न्याय से सत्य का निर्णय हो जाता तो कोर्ट की जरूरत नहीं रहती. कोर्ट का निर्णय आये तब तक आप इन्तेजार क्यों नहीं करते ? फिर भी आपको मिडिया पर ज्यादा भरोसा है और अपने अनुभव पर या ब्रह्मज्ञानी महापुरुष पर विश्वास नहीं है तो आप उनको दोषी मानकर अपने पुण्य नष्ट कर सकते हो.

प्रश्न ३ – पूरी दुनिया इतना गलत- गलत कहती है ,मीडिया वाले प्रमाण सहित दिखाते / बोलते है कही हमारी श्रद्धा न टूट जाए ?
उत्तर : आपकी श्रद्धा का आधार आपका अनुभव होना चाहिए | पूरी दुनिया और मीडियावाले कहे कि सूर्य अँधेरा फैलाता है, पानी से आग बढती है और पेट्रोल से आग शांत होती है, चिंटी हाथी से बड़ी होती है और चूहा शेर का शिकार कर सकता है तो क्या आप मान लोगे ? प्रमाण तो आधुनिक टेक्नोलोजी का उपयोग करके जैसे चाहो बना सकते है | बुद्ध को व्यभिचारी सिद्ध करने के लिए जेतवन में बुद्ध के निवास के पास से निंदकों ने बलात्कार करके एक वैश्या को मार कर गाड़ दी | बाद में वहाँ खोद कर प्रमाण दिखाया लोगों को क्या ऐसे प्रमाण आज का निंदक नहीं बना सकता ? मेरी श्रद्धा मेरे अनुभव पर आधारित है उसे ब्रह्मा, विष्णु और महेश भी नहीं हिला सकते तो दूसरों की क्या बात है ?

प्रश्न ४ – बापूजी ने अगर कुछ भी गलती नहीं की तो बापूजी अभी तक जेल में क्यू है ?उत्तर: क्या गलती करनेवाले ही जेल में रखे जाते है ? गुरु नानक, गुरु हर गोविंदजी, सुकरात, महात्मा गाँधी, अनेक सत्याग्रही, सुकरात, नेल्सन मंडेला, आदि भी कभी जेल में डाले गये थे | क्या उनकी कोई गलती थी ? जब भी किसि राजा या नेता की कुर्सी किसी महापुरुष की प्रसिद्धि से खतरे में आ जाती है तब वे अपनी रक्षा के लिए षड्यंत्र करके और सत्ता का दुरुपयोग करके महापुरुषों को जेल में डाल देते है |

प्रश्न ५ – अगर कोर्ट में बापूजी को दोषी सिद्ध कर दिया जाए तो क्या हम बापूजी को दोषी मन ले ? कोर्ट के निर्णय का आदर करे ?

उत्तर: कोर्ट अगर राजा हरिश्चंद्र जैसे सत्यवादी की है तब तो उसका निर्णय हमेशा सत्य माना जा सकता है | कोर्ट अगर भ्रष्टाचारी, राष्ट्रद्रोही और अधर्मी शासक की है तो उसके सब निर्णय सच्चे नहीं मान सकते | निर्दोष महापुरुषों को कई बार तत्कालीन कोर्ट ने दोषी सिद्ध किये है | सुकरात, ईसा, रहीदासजी, आदि दृष्टांत इतिहास में मौजूद है और इस समय तो ६६% न्यायाधीश भ्रष्ट है ऐसा एक बड़े न्यायाधीश ने ही कहा है |न्याय तंत्र भी आखिर बड़े बड़े नेताओ के आदेश को पालने के लिए मजबूर होता है |

भाग – २ 

प्रश्न ६ – नारायणसाईं जी ने अगर कुछ गलत नहीं किया था तो वो भाग क्यू रहे थे .खुलकर सामने क्यू नहीं आये ?

उत्तर: नारायण साईं ने देखा कि यह एक राजनैतिक साजिश है और उनको भी पकड़कर सताया जाएगा या उनसे जबरदस्ती करके अपराधी होने की बात कबूल करने के लिए मजबूर किया जाएगा, इसलिए शायद वे ऐसे षड्यंत्रकारी के हाथ नहीं आना चाहते थे | और उनकी गिरफ्तारी कानून के तहत नहीं कर रहे थे इसलिए भी उनका अपनी सुरक्षा करना एक अधिकार था | यह बात बाद में कोर्ट ने कही थी कि उनको भगोड़ा कहना उचित नहीं है | उनकी बेल का फैसला कोर्ट के द्वारा न आया हो तब तक उनको पकड़ना गैरकानूनी था | १९७५ में जब इंदिरा गाँधी ने इमरजंसी जाहीर करके बड़े बड़े विपक्षी नेताओं को जेलमें डाल दिये तब सुब्रमनियन स्वामी जैसे बड़े बड़े नेता भी भूगर्भ में चले गये थे |

प्रश्न ७ – मीडिया देख देखकर आम जनता ,बापूजी के खिलाफ होती जा रही है क्या मीडिया पर लगाम नहीं लगाई जा सकती ?

उत्तर : मिडिया एक साधन है उसका उपयोग कोई भी कर सकता है |नेता भी करते है और ईसाई मिशनरी भी करती है | उसपर लगाम डालने के लिए भारत में कड़े कानून बने नहीं है | फिर भी यदि जब मीडिया ने शुरुआत की 2008 में तब यदि हिन्दुओ ने व्यापक विरोध किया होता और सहनशीलता के नाम पर कायरता नहीं दिखाई होती तो मिडिया पर लगाम लग जाती | पर हिंदू तो महापुरुषों की सामर्थ्य का फ़ायदा उठाना ही जानता है, संस्कृति या धर्म की रक्षा के प्रति अपनी जिम्मेदारी मानता ही नहीं |

प्रश्न ८ – साधू संत भी बापूजी के खिलाफ बोल रहे है मीडिया में कई बार हमने सुना है ,पीले कपड़े पहने कई त्रिपुंड धारी बापूजी के विरोध में बोलते है ऐसा क्यू ?

उत्तर: त्रिपुंड धारी होने से या लाल कपडे पहनने से कोई साधू संत नहीं हो जाता | रावण ने भी साधू का वेश बनाया था और कई ठग भी साधू का वेश बनाकर जनता को लूटते है | कोई मठाधीश या किसी संस्था का संस्थापक होने से भी साधू नहीं बन जाता | जैसे सिनेमा वाले किसी दुराचारी एक्टर को भी साधू बनाकर शूटिंग कर लेते है ऐसे मीडियावाले भी कर लेते है | संत कबीर, संत रहिदास, संत ज्ञानेश्वर जैसे सच्चे संतो का तत्कालीन पाखंडी धर्म के ठेकेदारों ने विरोध किया था क्यों कि उनकी दुकानदारी खतरेमें आ गई थी | संत सम्मेलनों में कितने साधू संत बापूजी का समर्थन करते है यह आप क्यों नहीं देखते?

प्रश्न ९ – बापूजी के पास १० हजार करोड़ की प्रापर्टी है . साधू-संतो को इतनी प्रापर्टी की क्या जरुरत है ,साधू को तो अपरिग्रही होना चाहिए ?

उत्तर : ऋषि, मुनि, त्यागी और तपस्वी में फर्क है | जैसे विद्यार्थी और शिक्षक में फर्क है | विद्यार्थी को कुछ नियम पालने पड़ते हैhomework करना पड़ता है | जब वह परीक्षा में उत्तीर्ण हो जाता है फिर उसे वे नियम पालन और homework नहीं करना पड़ता | वह शिक्षक बन जाता है तब वह विद्यार्थियों को तो homework देता है |पर क्या उसे भी homework करना चाहिए, ऐसा विद्यार्थी कहेगे ? ऐसे ही अपरिग्रह आदि व्रत का पालन करते करते जिसे सत्य का ज्ञान हो गया वह ऋषि पूर्णता को पा चूका है, उसके लिए अपरिग्रह की कोई जरूरत नहीं | प्राचीन काल में ऋषियों के पास इतनी संपत्ति होती थी,कि बड़े बड़े राजा जब आर्थिक संकट में आ जाते थे, तब उनसे लोन लेकर अपने राज्य की अर्थ व्यवस्था ठीक करते थे | कौत्स ब्राह्मण ने अपने गुरु वर्तन्तु को १४ करोड स्वर्ण मुद्रा गुरु दक्षिणा में दी थी | साधू संतो के पास प्रोपर्टी नहीं होगी तो वे धर्म प्रचार का कार्य कैसे करेंगे ? प्राचीन काल में राज्य से धर्म प्रचार के लिए धन दिया जाता था | बुद्ध के प्रचार के लिए अशोक जैसे राजाओं ने अपनी सारी संपत्ति लगा दी और आज के समय में धर्म निरपेक्ष सरकार मंदिरों की संपत्ति और आय को हड़प तो कर लेती है और उसे विधर्मियों को देकर अपना उल्लू सीधा करती है लेकिन हिंदू धर्म के प्रचार के लिए राज्य के कोश से पैसा खर्च नहीं करती | आम हिंदू समाज भी अपने परिवार के लिए ही सब धन खर्च करना जानता है, धर्म की सेवा के लिए १०% आय भी लगाता नहीं| और लोगों के अपवित्र जीवन और उदासीनता के कारण भिक्षा वृत्ति भी अब संभव नहीं है इसलिए आश्रमवासियों के लिए भोजन बनाने के लिए भी संतों को व्यवस्था करनी पड़ती है | उनको व्यापारी मुफ्त में तो दाल, चावल, शक्कर, आदि नहीं देंगे | अपरिग्रह की बात सिर्फ हिंदू साधुओं के लिए ही सिखाई जाती है | विधर्मियों और ईसाई मिशनरियों के लिए कोई नहीं कहता कि उनको संपत्ति की क्या जरूरत है | रोमन केथोलिक चर्च का एक छोटा राज्य है जिसे वेटिकन बोलते है. अपने धर्म के प्रचार के लिए वे हर साल १४५ ,000,000,000 डॉलर खर्च करते है| तो उनके पास कुल कितनी संपत्ति होगी? वेटिकन के किसी भी व्यक्ति को पता नहीं है कि उनके कितने व्यापार चलते है. रोम शहर में 33% इलेक्टोनिक, प्लास्टिक, एर लाइन, केमिकल और इंजीनियरिंग बिजनेस वेटिकन के हाथ में है. दुनिया में सबसे बड़े share holder वेटिकेन वाले है | इटालियन बैंकिंग में उनकी बड़ी संपत्ति है और अमेरिका एवं स्विस बेंको में उनकी बड़ी भारी deposits है | ज्यादा जानकारी के लिए पुस्तक पढाना जिसका नाम है VATICAN EMPIRE. उनकी संपत्ति के आगे आपके भारत के साधुओं के  १००० करोड रुपये कोई मायना नहीं रखते | वे लोग खर्च करते है विश्व में धर्मान्तरण करके लोगों को अपनी संस्कृति, और धर्म से भ्रष्ट करने में, विएतनाम जैसे देशों में युद्ध करने में और अशांति फैलाने में. और भारत के संत खर्च करते है लोगों को शान्ति देने में, उनकी स्वास्थ्य सेवाओं में, आदिवासियों और गरीबों की सेवा में, प्राकृतिक आपदा के समय पीडितों की सेवा में और अन्य लोकसेवा के कार्यों में |

ईसाई मिशनरियां, इस्लाम के प्रचारक भारत में धर्मांतरण करके अपने धर्म की बस्ती बढाने के लिए हर साल अरबों डॉलर खर्च करते है |कम्युनिस्ट एवं बहु राष्ट्रिय कंपनियां भी हिंदुओं को धर्म भ्रष्ट करने के लिए एवं अपनी संस्कृति से विमुख करने के लिए अरबों डॉलर खर्च करती है ताकि उनका इस देश को लूटने का तथा उसे आगे चलकर कम्युनिस्ट राष्ट्र बनानेका लक्ष्य सिध्ध हो सके | तथाकथित धर्म निरपेक्ष सरकार विधर्मियों के साथ मिलकर हिंदुओं को लूटने में सहयोग देती है |ऐसे समय भी भारत के संत इस संस्कृति को बचाने के लिए और हिंदू धर्म की रक्षा के लिए तन, मन ,धन से सेवा करते है फिर भी उनको पैसे नहीं रखने चाहिए या बिजनेस नहीं करना चाहिए ऐसा कहनेवाले हिंदू जो खुद तो धर्म और संस्कृति की रक्षा के प्रति अपना दायित्व नहीं समझते और संतों को उपदेश देते है वे कितने भोले है जैसे कोई कहे कि विदेशी आक्रांताओ, आतंकवादियों, चोर लूटेरों के पास तो भले आधुनिक शस्त्र रहे लेकिन उनसे जनता की सुरक्षा करनेवाले पुलिस और मिलिटरी के जवानों को निःशस्त्र रहना चाहिए. ऐसे भोले लोगों की भी रक्षा करते है संत महापुरुष. उनकी निंदा नहीं करते और उनसे उपराम नहीं हो जाते.

जिसे लोग बिजनेस समझते है वह भी वास्तवमें राष्ट्र की जनता की सेवा के लिए अनिवार्य प्रकल्प ही होते है |

१.       संतों के उपदेश का प्रचार करने से संस्कृति की रक्षा हो सकेगी |लोग पाश्चात्य विकारी प्रभाव से बचेंगे. नैतिक मूल्यों का और आध्यात्मिक सामर्थ्य का विकास होगा | इसके लिए सत्साहित्य और ऑडियो वीडियो को बेचना अनिवार्य है. इसमें भी वे बिजनेस करने वाली कंपनियों की अपेक्षा बहुत सस्ते दर से इन चीजों को उपलब्ध कराते है |इसका कोई विकल्प है क्या ? यदि ऐसी कंपनियों को बिक्री के अधिकार दे देंगे तो वे इतने सस्ते दाम में नहीं बेचेंगे और लोगों को लूटने का प्रयास करेगी | यदि मुफ्त में देने लगे तो भी लोग कहेंगे कि उनके साहित्य और सत्संग में दम नहीं है इसलिए मुफ्त में बाँट रहे है, और मुफ्त में मिली हुई चीज का लोग आदर नहीं करेंगे \

२.       लोगों को मंत्र दीक्षा देनेके बाद आवश्यक सामग्री जैसे के माला, आसान, साहित्य आदि सब नगरों एवं गांवों में मिलते नहीं है | जहाँ मिलते है वहाँ भी बेचनेवाले duplicate माल देकर लोगों को लूटते है. इसलिए इन चीजों को भी सस्ते दाम में उपलब्ध कराना एक सेवा ही है |

३.       आरोग्य के विषय में सिर्फ उपदेश देनेसे लोगों को लाभ नहीं होता. आयुर्वेद के शुद्ध औषधीय सर्वत्र उपलब्ध नहीं होती | सच्चे आयुर्वेद के डॉक्टर भी अपनी औषधियाँ बनाकर मरीजों को देते है जिससे मरीज को स्वास्थ्य लाभ हो क्योंकि बड़ी बड़ी कंपनियां शुद्ध द्रव्यों से औषधियां नहीं बनाती और आयुर्वेदिक औषधियों की शुद्धि की जाँच करने के कोई साधन नहीं है जैसे एलोपथी की दवाईयों के है | इसलिए शुद्ध औषधियां सस्ते दाम में उपलब्ध कराना भी एक सेवा ही है | इससे लोगों को सैकडो अरबों रुपये का फायदा होता है, उनकी अनावश्यक ऑपरेशनों से रक्षा होती है और विदेशी कंपनियों की लूट पर नियंत्रण होने से देश को सैकडों अरबों रुपये का फायदा होता है. देश की संपत्ति देश में ही रहती है, विदेशियों के पास नहीं जाती |

४.       चाय कोफ़ी तथा कोकाकोला पेप्सी से स्वास्थ्य और धन की कितनी हानि होती यह बता देना एक बात है और उसके विकल्प के रूप में आयुर्वेदिक चाय, स्वास्थ्य वर्धक पेय पदार्थ उनको उपलब्ध कराना दूसरी बात है | जब तक हानिकारक पेय का विकल्प नहीं देंगे तब तक लोग उसे छोड़ नहीं सकेंगे. ऐसे ही फास्टफूड, साबुन, सौंदर्य प्रसाधन, शेम्पू, आदि से कितनी हानि होती है यह बताने के बाद उनके विकल्प के रूप में सस्ते दाम में खजूर, मुल्तानी मिटटी, आयुर्वेदिक साबुन और शेम्पू आदि उपलब्ध कराना भी एक सेवा ही है | इस से लोगों को सैकडो अरबों रुपये का फायदा होता है, और विदेशी कंपनियों की लूट पर नियंत्रण होने से देश को सैकडों अरबों रुपये का फायदा होता है. देश की संपत्ति देश में ही रहती है, विदेशियों के पास नहीं जाती |

५.       भारत की जनता के सबसे गरीब वर्ग का भी शोषण करनेके लिए स्वास्थ्यप्रद प्राकृतिक नमक के स्थान पर स्वास्थ्य को हानी पहुंचानेवाले आयोडीन नमक का प्राकृतिक नमक की बिक्री पर रोक लगाकर इतना प्रचलन बढ़ा दिया गया कि प्राकृतिक नमक किराना की सब दुकानों पर मिलना मुश्किल हो गया | ऐसे शोषकों से जनता को बचानेके लिए सस्ते दाम में प्राकृतिक नमक उपलब्ध कराना भी सेवा ही है | और जिनको आयोडीन नमक की आदत पड़ गई हो उनको वह भी सस्ते दाम में उपलब्ध कराना सेवा है |

इस तरह जो लोग संतों के सेवा कार्य को समझ नहीं पाते वे ही उनको बिजनेस नहीं करना चाहिए ऐसा बकवास करते है.  सुदर्शन चेनल के श्री सुरेश चव्हाणके, जो लोग इस बात को जानते है वे इस बात का समर्थन करते है |

प्रश्न १० – बापूजी बड़ी – बड़ी गाड़ीयों में घूमते है हेलीकॉप्टर में आते – जाते है ,इतना यश ,इतना एश्वर्य ,सब जगह जय -जय होती है,साधू को तो इन सब से बचना चाहिए ? सादा -सूदा जीवन जीना चाहिए ?

उत्तर : आपके उत्तर का एक अंश उत्तर ९ में मिलेगा. साधू और जीवन्मुक्त में फर्क है | साधना करते समय जिसे साधू कहा जाता है उसे आत्मज्ञान पाने के बाद जीवन्मुक्त कहा जाता है जैसे विद्यार्थी और शिक्षक | जीवन्मुक्त होने के बाद उसे यश, ऐश्वर्य आदि से बचने की जरूरत नहीं रहती क्योंकि उसका पतन हो ही नहीं सकता ऐसे पद में वो पहुँच चुके है | लोकसेवा के लिए जो भी साधन उपलब्ध हो उसका वे उपयोग करेंगे तभी तो लोकसेवा व्यापक रूप से कर सकेंगे | जीवन्मुक्त का व्यवहार उसके प्रारब्ध के अनुसार होता है | बलि, जनक, राम, कृष्ण, अश्वपति आदि की तरह वे सम्पूर्ण ऐश्वर्य के साथ राज्य भी कर सकते है और शुकदेव की तरह त्यागी का जीवन भी जी सकते है. उनके लिए कोई बन्धन शास्त्र में बताये नहीं गये | यदि आप किसी जीवन्मुक्त को साधू (साधक) कहते हो तो आप किसी प्रोफ़ेसर को विद्यार्थी कहने कि गलती करते हो और उसे भी homework करना चाहिए और परीक्षा से डरना चाहिए ऐसा सिद्ध करना चाहते हो |