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श्री योग वशिष्ठ महारामायण (वैराग्य प्रकरण) – कालनिरूपण – अंतिम भाग

YVMR111016

|| ॐ श्री परमात्मेय नम: ||

श्री योग वशिष्ठ महारामायण

वैराग्य प्रकरण – कालनिरूपण – अंतिम भाग 

ब्रह्मा, विष्णु, रूद्र, कुबेर, आदि सब मूर्ति काल की धरी हुई है | यह उनको भी अन्तर्धान कर देता है | हे मुनीश्वर उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय सब काल से होते हैं | अनेक बेर इसने महाकल्प का भी ग्रास किया है और अनेक बेर करेगा | काल को भोजन करने से तृप्ति कदाचित नहीं होती और कदाचित होनेवाली भी नहीं | जैसे अग्नि घृत की आहुति से तृप्त नहीं होता | वैसे ही जगत और सब ब्रह्मांड का भोजन करके भी काल तृप्त नहीं होता | इसका ऐसा स्वभाव है की इंद्र को दरिद्री कर देता है और दरिद्री को इंद्र कर देता है, सुमेरु को राई बनाता है और राई को सुमेरु करता है | सबसे बड़े ऐश्वर्यवान को नीच कर डालता है और सबसे नीच को ऊँच कर डालता है | बूँद को समुद्र कर डालता है और समुद्र को बूँद करता है | ऐसी शक्ति काल में हैं | यह जीवरूपी मच्छरों को शुभाशुभ कर्मरूपी छुरे से छेदता रहता है | कालरूप का चक्र जीवरूपी हँडिया की शुभ – अशुभ कर्मरूपी रस्सी से बाँधकर फिराता है और जीवरूपी वृक्ष को रात्रि और दिनरुपी कुल्हाड़े से छेदता है | हे मुनीश्वर ! जितना कुछ जगत विलास भासता है काल सबको ग्रास कर लेगा | जीवरूप रत्न का काल डब्बा है सो सबको अपने उदर में डालता जाता है | काल यों खेल करता है कि चन्द्र सूर्यरूपी गेंद को कभी उर्ध्व को उछालता है और कभी नीचे डालता है | जो महापुरुष है वह उत्पत्ति और प्रलय के पदार्थों में से किसी के साथ स्नेह नहीं करता और उसका काल भी नाश नहीं कर सकता | जैसे मुंड की माल महादेवजी गले में धारें हैं वैसे ही यह भी जीवों की माला गले में डालता है |

हे मुनीश्वर ! जो बड़े बलिष्ठ हैं उनको भी काल ग्रहण कर लेता है | जैसे समुद्र बड़ा है उसको बडवानल पान कर लेता है और जैसे पवन भोजपत्र को उड़ाता है वैसे ही काल का भी बल है, किसी की सामर्थ्य नहीं जो इसके आगे स्थित रहे | हे मुनीश्वर ! शान्तिगुण प्रधान देवता; रजोगुण प्रधान बड़े राजा और तमोगुण प्रधान दैत्य और राक्षस हैं उनमें किसी को सामर्थ्य नही जो इसके आगे स्थिर रहे | जैसे तौली में अन्न और जल भर के अग्नि पर चढ़ा देने से अन्न उछलता है और वह अन्न के दाने करछी से कभी ऊपर और कभी नीचे फिर जाते हैं वैसे ही जीवरूपी अन्नके दाने जगतरूपी तौली में पड़े हुए रागद्वेषरूपी अग्नि पर चढ़े है | और कर्मरूपी करछी से कभी ऊपर जाते हैं और कभी नीचे आते हैं | हे मुनीश्वर ! यह काल किसी को स्थिर नहीं होने देता यह महा कठोर है, दया किसी पर नहीं करता | इसका भी मुझको रहता हैं इससे वही उपाय मुझसे कहिये जिससे मैं काल से निर्भय हो जाऊँ |

इति श्रीयोगवाशिष्ठे वैराग्यप्रकरणे कालनिरूपणन्नामाष्टादशस्सर्ग: || १८ ||