Category Archives: Ved & Puranas

रायपुर आश्रम में शिव रूद्रअभिषेक

रायपुर आश्रम में शिव रूद्रअभिषेक

पूज्य बापूजी की कृपा से 24 जुलाई 2017 को महिला उत्थान मण्डल के बहनों द्वारा भगवन शिवजी के पवित्र श्रावन माह में सावन सोमवारी के उपलक्ष्य पर संत श्री आशारामजी आश्रम रायपुर (छ.ग.) में शिव रूद्रअभिषेक का आयोजन किया गया |

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रायपुर में काँवरियो को प्रसादी वितरण

 रायपुर में काँवरियो को प्रसादी वितरण

        समाज की सेवा में तत्पर युवा सेवा संघ ने, संत श्री आशारामजी बापू की पावन प्रेरणा से,बोलबम की यात्रा करने वाले प्यारे कांवरियों की सेवा करने का आयोजन किया |महादेव घाट,रायपुर  के पास वाले चौराहे पर प्रातः से पंडाल लगाकर, आते जाते कांवरियों को बैठाकर पुलाव प्रसादी, शीतल जल, शरबत, तुलसी की आयुर्वेदिक गोलियों से तृप्त करने में, संघ के युवक लगे थे | साथ ही जिन कांवरियों के पैरों में छाले हो जाते हैं, उनके लिए मेडिकल उपचार का भी प्रबंध था | कांवरियों के साथ नर रुपी नारायणो के लिए भी प्रसादी की व्यवस्था की गयी थी जिसका अभी राहगीरों ने भरपूर आनंद उठाया |

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श्री योग वशिष्ठ महारामायण (वैराग्य प्रकरण) – जगदविपर्ययवर्णन – भाग १

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|| ॐ श्री परमात्मेय नम: ||

श्री योग वशिष्ठ महारामायण

प्रथम वैराग्य प्रकरण

जगदविपर्ययवर्णन – भाग १ 

श्रीरामजी बोले कि हे मुनीश्वर ! जितना जंगम जगत दीखता है वह सब नाशरूप है, कुछ भी स्थिर न रहेगा | जो खाई थी वह जल से पूर्ण हो गई है और जो बड़े जल से भरे हुए समुद्र दीखते थे वे खाईरूप हो गये; जो सुंदर बगीचे थे वे आकाश की नाई शून्य हो गये और जो शून्य स्थान थे वे सुंदर वृक्ष होकर वन में दृष्टि आते हैं | जहाँ बस्ती थी वहाँ उजाड़ हो गई और जहाँ उजाड़ थी वहाँ – वहाँ बस्ती हो गई | जहाँ गढ़े थे वहाँ पर्वत हो गये और जहाँ बड़े पर्वत थे वहाँ समान पृथ्वी हो गई | हे मुनीश्वर ! इस प्रकार पदार्थ देखते – देखते विपर्यय हो जाते हैं, स्थिर नहीं रहते तो फिरमैं किसका आश्रय करूँ और किसके पाने का यत्न करूँ ? ये पदार्थ तो सब नाशरूप हैं | जो बड़े ऐश्वर्य से सम्पन्न और बड़े कर्तव्य करते और बड़े वीर्यवान तेजवान हुए हैं वे भी मरणमात्र हो गये हैं तो हम सरीखों की क्या वार्ता हैं ? सब नाश होते हैं तो हमें भी घड़ी पल में चला जाना है |

हे मुनीश्वर ! ये पदार्थ बड़े चंचलरूप हैं; एकरस कदाचित नहीं रहते | एक क्षण में कुछ हो जाते और दूसरे क्षण में कुछ हो जाते हैं | एक क्षण में दरिद्री हो जाते और दूसरे क्षण में सम्पदावान हो जाते हैं | एक क्षण में जीते दृष्टि आते हैं, और दूसरे क्षण में मर जाते हैं और एक क्षण में फिर जी उठते हैं | इस संसार की स्थिरता कभी नहीं होती | ज्ञानवाँ इसकी आस्था नहीं करते | एक क्षण में समुद्र के प्रवाह के ठिकाने मरुस्थल हो जाते हैं और मरुस्थल में जल के प्रवाह हो जाते हैं | हे मुनीश्वर ! इस जगत का आभास स्थिर नहीं रहता | जैसे बालक का चित्त स्थिर नहीं रहता वैसे ही जगत का पदार्थ एक भी स्थिर नहीं रहता | जैसे नट नाना प्रकार के स्वाँग धरता है वैसे ही जगत के पदार्थ और लक्ष्मी एकरस नहीं रहती | कभी पशु मनुष्य हो जाता है, स्थावर जंगम हो जाता है और जंगम का स्थावर हो जाता है, मनुष्य का देवता हो जाता और देवता का मनुष्य हो जाता है | इसी प्रकार घटी यंत्र की नाई जगत की लक्ष्मी स्थिर नहीं रहती; कभी उर्ध्व को जाती है और कभी अध्: को जाती है; स्थिर कभी नहीं रहती; सदा भटकती रहती है | हे मुनीश्वर ! जितने पदार्थ दृष्टि आते हैं वे सब नष्ट हो जावेंगे किसी भान्ति स्थिर न रहेंगे | ये सब नदियाँ बडवाग्नि में ली हो जावेंगी और जितने पदार्थ हैं वे सब अभावरुपी बडवाग्नि को प्राप्त होंगे | बड़े – बड़े बलिष्ठ भी मेरे देखते ही देखते लीन हो गये हैं जो बड़े – बड़े सुंदर स्थान थे वे शून्य हो गये और सुंदर ताल और बगीचे जो मनुष्यों से परिपूर्ण थे शून्य हो गये | मरुस्थल की भूमि सुंदर हो गई और घट के पट हो गये हैं | वर के शाप हो जाते हैं और शाप के वर हो जाते हैं | इसी प्रकार हे विप्र ! जो जगत दृष्टि आता है वह कभी सम्पत्तिमान और कभी आपत्तिमान दृष्टि में आता है और महाचपल है |

क्रमश : 

 

श्री योग वशिष्ठ महारामायण (वैराग्य प्रकरण) – सर्वपदार्थाभाववर्णन – अंतिम भाग

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|| ॐ श्री परमात्मेय नम: ||

श्री योग वशिष्ठ महारामायण

प्रथम वैराग्य प्रकरण

सर्वपदार्थाभाववर्णन – अंतिम भाग 

हे मुनीश्वर ! तृष्णा बड़ी चंचल है, किसी को स्थिर नहीं होने देती | मोहरूपी एक वृक्ष है उसके चारों ओर स्त्रीरुपी बेलि है सो विषसे पूर्ण है | उस पर चित्तरूपी भँवरा आ बैठता है तब स्पर्शमात्र से नाश होता है | जैसे मोर का पुच्छ हिलता है वैसे ही अज्ञानी का चित्त चंचल रहता है, इसलिए वह मनुष्य पशु के समान है | जैसे पशु दिन को जंगल में जा आहार करते और चले फिरते है और रात्रि को घर में आय खूँटे से बाँधे जाते हैं वैसे ही मुर्ख मनुष्य भी दिन को घर छोडके व्यवहार में फिरते हैं और रात्रि को आ अपने घर में स्थिर होते हैं | पर इससे परमार्थ की कुछ सिद्धि नहीं होती, वे अपना जीवन वृथा गँवाले है | बाल्यावस्था में तो शून्य रहता है और युवावस्था में काम से उन्मत्त होता है | उस काम से चित्तरूपी उन्मत्त हस्ती स्त्रीरुपी कन्दरा में जा स्थिर होता है, पर वह भी क्षणभंगुर है | फिर वृद्धावस्था आती है उससे शरीर कृश हो जाता है | जैसे बर्फ से कमल जर्जरीभाव को प्राप्त होता है वैसे ही जरा से शरीर जर्जरीभाव को प्राप्त होता है और सब अंग क्षीण हो जाते हैं; पर एक तृष्णा बढ़ जाती है |   

हे मुनीश्वर ! यह जीव मनुष्यरूपी पर्वत पर आकाश के फ्ल्रुपी जगत के पदार्थ की इच्छा करता है सो नीचे गिर राग-द्वेषरूपी कण्टक के वृक्ष में जा पड़ेगा | हे मुनीश्वर ! जितने जगत के पदार्थ हैं वह सब आकाश के फूल की नाई नाशवान हैं | इनमें आस्था करनी मुर्खता है | यह तो शब्दमात्र हैं | इनसे अर्थ कुछ सिद्ध नहीं होता | जो ज्ञानवान पुरुष हैं उनको विषय भोग की इच्छा नहीं रहती, क्योंकि आत्मा के प्रकाश से वे इनको मिथ्या जानते हैं | हे मुनीश्वर ! ऐसे ज्ञानवान दुर्विज्ञेय पुरुष हमको तो स्वप्न में भी नहीं भासते | ऐसे विरक्तात्मा दुर्लभ है कि जिनको भोग की इच्छा नहीं और सर्वदा ब्रह्म की स्थित में भासते हैं | ऐसे पुरुषों को संसार की कुछ इच्छा नहीं रहती, क्योंकि यह पदार्थ नाशरूप है | हे मुनीश्वर ! जैसे पर्वत को जिस ओर देखिये पत्थरों से, पृथ्वी मृत्तिका से, वृक्ष काष्ठ से और समुद्र जल से पूर्ण दृष्टि आते हैं वैसे ही शरीर अस्थि माँस से पूर्ण भासता हैं | ये सब पदार्ध पंचतत्व से पूर्ण और नाशरूप हैं ऐसा जानकार ज्ञानी किसी की इच्छा नहीं करता | हे मुनीश्वर ! यह जगत सब नाशरूप हैं, देखते ही देखते नष्ट हो जाता है, मैं उसमें किस का आश्रय करके सुख जाऊँ ? जब युगों की सहस्त्र चौकड़ी व्यतीत होती है तब ब्रह्मा का दिन होता है | उस दिन के क्षय होने से जगत का प्रलय होता है और ब्रह्मा भी काल पाकर नष्ट हो जाता है | ब्रह्मा भी जितने हो गये हैं उनकी संख्या नहीं हो सकती असंख्य ब्रह्मा नष्ट हो गये हैं तो हम सरीखों की क्या वार्ता है | हम किसी भोग की वासना नहीं करते क्योंकि सब चलरूप है, स्थिर रहने के नही, सब नाशरूप हैं, इसलिये इनकी आस्था मुर्ख करते हैं, इनके साथ हमको कुछ प्रयोजन नहीं | जैसे मरुस्थल को देख मृग जलपान करने को दौड़ता और शान्ति नहीं पाता वैसे ही मुर्ख जीव जगत के पदार्थों को सत्य मानकर तृष्णा करता है, परन्तु शान्ति नहीं पाता वैसे ही मुर्ख जीव जगत के पदार्थों को सत्य मानकर तृष्णा करता है, परन्तु शान्ति नहीं पाता क्योंकि सब असाररूप है | स्त्री, पुत्र, और कलत्र जब तक शरीर नष्ट नहीं होता तभी तक भासते हैं, जब शरीर नष्ट हो जायगा तो जाना न जावेगा कि कहाँ गये और कहाँ से आये थे | जैसे तेल और बत्ती से दीपक बड़ा प्रकाशवान दृष्टि आता है, जब बुझ जाता है तब जाना नहीं जाता कि कहाँ गया वैसे ही बत्तीरूप बांधव हैं और उसमें स्नेहरूपी तेल है उससे जो शरीर भासता हैं सो प्रकाश है | जब शरीररूपी दीपक का प्रकाश बुझ जाता है तब जाना नहीं जाता कि कहाँ गया |

हे मुनीश्वर ! बन्धु का मिलाप ऐसा है जैसे कोई तीर्थ यात्रा को संग चला जाता हो सो सब एक क्षण वृक्ष की छाया के नीचे बैठते हैं फिर न्यारे न्यारे हो जाते हैं | जैसे उस यात्रा में स्नेह करना मुर्खता है वैसे ही इनमें भी स्नेह करना मुर्खता है | हे मुनीश्वर ! अहं ममता की रस्सी के साथ बाँधे हुए घटीयंत्र की नाई सब जीव भ्रमते फिरते हैं, उनको शान्ति कदाचित नहीं होती | यह देखने मात्र तो चेतन दृष्टि आता है, परन्तु पशु और बन्दर इन से श्रेष्ठ हैं जिनकी सम्मत देह और इन्द्रियों के साथ बँधी हुई है और आगमापायी हैं उनको आत्मपद की प्राप्ति कठिन है | जैसे पवन से वृक्ष के पात टूट के उड़ जाते हैं फिर उनको वृक्ष के साथ लगना कठिन है वैसे ही जो देहादिक से बाँधे हुए हैं उनको आत्मपद का पाना कठिन है |

हे मुनीश्वर ! हब आत्मपद से विमुख होता है तब जगत को सत्य देखता है और जब आत्मपद की ओर आता है तब संसार इसको बड़ा विरस लगता है | ऐसा पदार्थ जगत में कोई नहीं जो स्थिर रहे, जो कुछ पदार्थ हैं सो नाश को प्राप्त होते हैं | इसमें मैं किसकी आस्था करूँ और किसका आश्रय करूँ सब तो नाशवंत भासते हैं ? वह पदार्थ कहिये जिसका नाश न हो |

इति श्रीयोगवाशिष्ठे वैराग्यप्रकरणे सर्वपदार्थाभाववर्णनन्नाम द्वाविशंतितमस्सर्ग: || २२ ||

श्री योग वशिष्ठ महारामायण (वैराग्य प्रकरण)-सर्वपदार्थाभाववर्णन- भाग १

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|| ॐ श्री परमात्मेय नम: ||

श्री योग वशिष्ठ महारामायण

प्रथम वैराग्य प्रकरण

सर्वपदार्थाभाववर्णन- भाग १ 

श्रीरामजी बोले कि, हे मुनीश्वर ! यह जो नाना प्रकार के सुंदर पदार्थ भासते हैं वह सब नाशरूप हैं, इनकी आस्था मुर्ख करते हैं | यह तो मन की कल्पना से रचे हुए हैं, उनमें से मैं किसकी आस्था करूँ?  हे मुनीश्वर अज्ञानी जीव का जीना व्यर्थ है, क्योंकि जीने से उनका कुछ अर्थ सिद्ध नहीं होता | जब कुमार अवस्था होती है तब बुद्धि मूढ़ होती है, उसमें कुछ विचार नहीं होता | जब युवावस्था आती है तब काम क्रोधादिक विकार उत्पन्न होते हैं ये सदा ढापे रहते हैं | जैसे जाल में पक्षी बँध जाता है और आकाशमार्ग को देख भी नहीं सकता वैसे ही काम क्रोधादिक से ढँका हुआ जीव विचार मार्ग को नहीं देख सकता | जब वृद्धावस्था आती है तब शरीर जर्जरीभूत और महादीन हो जाता है और शरीर को त्याग देता है | जैसे कमल के ऊपर बर्फ पडती है तब उसको भँवर त्याग देता है वैसे ही शरीररूपी कमल को जरा का स्पर्श होता है तब जीवररूपी भँवरा त्याग देता है |

हे मुनीश्वर ! यह शरीर तब तक सुंदर है जब तक वृद्धावस्था नहीं प्राप्त होती | जैसे चंद्रमा का प्रकाश जब तक प्रकाश नहीं रहता वैसे ही जरावस्था के आने से युवावस्था की सुन्दरता जाती रहती है | हे मुनीश्वर ! जरा के आने से शरीर कृश हो जाता है, जैसे वर्षाकाल में नदी बढ़ जाती है वैसे ही जरावस्था में तृष्णा बढ़ जाती है और जिस पदार्थ की तृष्णा करता है वह पदार्थ भी दुःखरूप है, इसलिये तृष्णा करके आप ही दुःख पाटा है | हे मुनीश्वर ! तृष्णारूपी समुद्र में चित्तरूपी बेड़ा पड़ा है और रागद्वेष – रूपी मच्छों से कभी ऊर्ध्व को जाता है और कभी नीचे आता है, स्थिर कदाचित नहीं रहता |

हे मुनीश्वर ! कामरूपी वृक्ष में तृष्णारूप लता और विषयरूपी फूल है, जब जीवरूपी भँवरा उसके ऊपर बैठता है तब विषय रूपी बेलि से मृतक हो जाता है | हे मुनीश्वर ! तृष्णारूपी एक बड़ी नदी है उसमें रागद्वेषादिक बड़े – बड़े मृच्छ रहते हैं | उसी नदी में पड़े हुए जीव दुःख पाते हैं | जिस संसार की इच्छा करता है वह नाशरूप है | हे मुनीश्वर ! तरंगो के समूह के रणरूपी समुद्र को तरजानेवाले को भी मैं शूर नहीं मानता, परन्तु जो इन्द्रियरूपी समुद्र में मनोवृत्तिरूपी तरंग उठते है इस समुद्र के तरजानेवाले को मैं शूर मानता हूँ ऐसी क्रिया अज्ञानी जीव आरंभ करते हैं कि जिसके परिणाम में दुःख हो | जिसके परिणाम में सुख है उसका आरम्भ वे नहीं करते और काम के अर्थ की धारण करते हैं | ऐसी आरम्भ से शरीर की शान्ति के पीछे भी सुख की प्राप्ति नहीं होती | वे कामना करके सदा जलते रहते हैं | जो अनात्मपदार्थ की तृष्णा करते हैं उनको शान्ति कैसे प्राप्त हो ? हे मुनीश्वर ! तृष्णा रूपी नदी में बड़ा प्रवाह है; उसके किनारे पर वैराग्य और संतोष दो वृक्ष खड़े हैं, सो तृष्णा नदी के प्रवाह से दोनों का नाश होता है |

क्रमश:

श्री योग वशिष्ठ महारामायण (वैराग्य प्रकरण) – कालविलासवर्णन

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|| ॐ श्री परमात्मेय नम: ||
श्री योग वशिष्ठ महारामायण
प्रथम वैराग्य प्रकरण
कालविलासवर्णन

श्रीरामजी बोले कि, हे मुनीश्वर ! जितने पदार्थ भासते हैं वह सब नाशरूप हैं तो मैं किसकी इच्छा करूँ और किसका आश्रय करूँ | इनकी इच्छा करनी मुर्खता है | जितनी चेष्टा अज्ञानी करता है वह सब दुःख के निमित्त है और जीने में अर्थ की सिद्धि कुछ नहीं हैं, क्योंकि बालक अवस्था में मूढ़ता रहती है, कुछ विचार नहीं रहता | जब युवावस्था आती है तब मुर्खता से विषय को सेवता है और मान मोहादि विकारों से मोहा जाता है, उसमें कुछ विचार नहीं होता और स्थिर भी नहीं रहता, दीन का दीन रहकर विषय की तृष्णा करता है, शान्ति नहीं पाता| हे मुनीश्वर ! आयुष्य महाचंचल है और मृत्यु तो निकट है उसमें अन्यथा भाव नहीं होता | हे मुनीश्वर ! जितने भोग हैं वे वे रोग हैं, जिसको सम्पदा जानते हैं वह आपदा है, जिसको सत्य कहते हैं वह असत्यरुप है, जिन स्त्री, पुत्रादिकों को मित्र जानते हैं वह सब बंधन के कर्ता हैं और इन्द्रियाँ महाशत्रुरूप हैं | वह सब मृगतृष्णा के जलवत हैं, यह देह विकारूप है, मन महाचंचल और सदा अशांतरूप है और अहंकार महानीच है, इसने ही दीनता को प्राप्त किया है | इससे जितने पदार्थ इसको सुखदायक भासते हैं वह सब दुःख के देने वाले हैं इससे कदाचित शान्ति नहीं होती | इसी कारण मुझको इनकी इच्छा नहीं | यद्यपि यह देखनेमात्र सुंदर भासते हैं, पर वह सब बडवाग्नि से नाश होते हैं वैसे ही यह पदार्थ भी नष्ट हो जाते हैं | मैं अपनी आयु में कैसे आस्था करूँ ?

हे मुनीश्वर ! बड़े समुद्र, सुमेरु, राक्षस, दैत्य, देवता, सिद्ध, गन्धर्व, पृथ्वी, अग्नि, पवन, यम, कुबेर, वरुण, इंद्र, ध्रुव, चन्द्रमा और बड़े ईश्वर जगत के कर्ता, ब्रह्मा, विष्णु, रूद्र और काल जो सबको भक्षण करता है, काल की स्त्री, सब का आधार आकाश और जितना जगत है यह सब नष्ट हो जावेंगे तो हमारी कौन गिनती है | हम किसकी आस्था करें और किसका आश्रय करें ? यह सब जगत भ्रममात्र हैं; अज्ञानी की इसमें आस्था होती है और हमारी नहीं, क्योंकि जगत भ्रम से उत्पन्न हुआ है | मैं इतना जानता हूँ कि संसार में जीव को इतना दु:खी अहंकार ने किया है |

हे मुनीश्वर ! यह जीव अपने परमशत्रु अहंकार से भटकता फिरता है | जैसे रस्सी से बंधे हुए पतंग कभी ऊर्ध्व और कभी नीचे जाते हैं, स्थिर कभी नहीं रहते वैसे ही जिस अहंकार से कभी ऊर्ध्व और कभी अधो जाता है स्थिर कभी नहीं होता | जैसे अश्व जुते हुए रथ के ऊपर बैठकर सूर्य आकाश मार्ग में फिरता है वैसे ही जीव भ्रमता है, स्थिर कदाचित नहीं होता |
हे मुनीश्वर ! यह जीव परमार्थ सत्य स्वरूप से भूला हुआ भटकता है; अज्ञान से संसार में आस्था करता है और भोग को सुखरूप जानकर उसमें तृष्णा करता है | पर जिसको सुखरूप जानता है वह रोगसमान है और विष से पूर्ण सर्प जीव का नाश करनेवाला है जिसको सत्य जानता है वह सब असत्य है सब काल के मुख में ग्रसे हुए है | हे मुनीश्वर ! विचार के बिना जीव अपना नाश आप ही करता है, क्योंकि इसका कल्याण करनेवाला बोध है | जब सत्य विचार बोध के शरण जाय तो कल्याण हो | जितने पदार्थ है वह स्थिर नहीं रहते | इनको सत्य जानना दुःख के निमित्त है | हे मुनीश्वर ! जब तृष्णा आती है तब आनंद और धैर्य का नष्ट कर देती है | जैसे वायु मेघ का नाश कर डालता है वैसे ही तृष्णा ज्ञान का नाश कर डालती है | इससे मुझे वही उपाय कहिये जिससे जगत का भ्रम मिट जावे और अविनाशी पद की प्राप्ति हो | इस भ्रमरूप जगत की आस्था मैं नहीं देखता | इससे जैसी इच्छा हो वैसा करें, परन्तु जो सुख इसको होने हैं वह अवश्य होंगे कभी न मिटेंगे | चाहे पहाड़ की कन्दरा में बैठें, चाहे कोट में परन्तु जो होने को है वह अवश्य होगा | इस निमित्त यत्न करना मुर्खता है |

इति श्रीयोगवशिष्ठे महारामायण वैराग्यप्रकरणे कालविलासवर्णनन्नामैकविंशतितमस्सर्ग: || २१ ||

श्री योग वशिष्ठ महारामायण (वैराग्य प्रकरण) – कालजुगुप्सावर्ण

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|| ॐ श्री परमात्मेय नम: ||

श्री योग वशिष्ठ महारामायण

वैराग्य प्रकरण – कालजुगुप्सावर्ण

श्रीरामजी बोले कि हे मुनीश्वर ! इस काल का महापराक्रम हैं | इसके तेज के सम्मुख कोई नहीं रह सकता | यह क्षण में ऊँच को नीच और नीच को ऊँच कर डालता है | उसका निवारण कोई नहीं कर सकता | सब उसी के भय से काँपते है यह महाभैरव है सब विश्व का ग्रास कर लेता है | इसकी चण्डिकारूप शक्ति है, वह अति बलवान है और नदीरूप है, उसका उल्लंघन कोई नहीं कर सकता | महाकालरूप काली है, उसका बड़ा भयानक आकार है | कालरूप जो रूद्र है उससे अभिन्नरूपी कालिका है वह सबका पान करके पीछे भैरव और भैरवी नृत्य करते हैं | उस काल और कालिका का बड़ा आकार है | उसका आकाश शीश, पाताल में चरण हैं और दशों दिशा भुजा है | सप्त समुद्र उसके हाथ में कंकण हैं; सम्पूर्ण पृथ्वीरूप उसके हाथ में पात्र हैं; और उस पर जो जीव हैं वह भोजन के योग्य है | हिमालय और सुमेर पर्वत दोनों कानों में कुण्डल हैं; चन्द्रमा और सूर्य उसके दोनों लोचन हैं और सब तारागण उसके मस्तक में बिंदु हैं | काल के हाथ में त्रिशूल और मूसल आदि शस्त्र हैं और कालिका के हाथ में ताँतरूपी फाँसी हैं, उससे जीवों को मारती है | ऐसी कालिका देवी सब जीवों का ग्रास करके महाभैरव के आगे नृत्य करती हैं,  अट्टाटट शब्द करती है और जीवों को भोजन करके उनकी मुंड माला गले में धारण करती है |

भैरव के सम्मुख रहने किसी में शक्ति नहीं, जहाँ उजाड़ है वहाँ क्षण में बस्ती कर डालता है और जहाँ बस्ती है वहाँ क्षण में उजाड़ करता है | इसी से उसका नाम देव कहते हैं | बड़े – बड़े पदार्थों को उत्पन्न और नष्ट करता है, स्थिर किसी को नहीं रहने देता, इससे इसका नाम कृतांत है और नित्यरूप भी यही हैं, क्योंकि इसका परिणाम अनित्य है इसी से इसका नाम कर्म है | जब अभावरूपी धनुष हाथ में धरता है तो उससे रागद्वेषरूपी बाण चलाता है और उस बाण से जर्जरीभूत करके नाश करता है | जैसेबालक मृत्तिका की सेना बनाता है और उठाकर नष्ट भी कर देता है वैसे ही काल को उपजाने और नष्ट करने में कुछ यत्न नहीं करना पड़ता |

हे मुनीश्वर ! कालरुपी धीवर है और उसने क्रियारूपी जाल पसारा है | उसमें जीवरूपी पक्षी फँसते हैं सो फँसे हुए शान्ति नहीं पाते | हे मुनीश्वर ! यह तो सब नाशरूप पदार्थ हैं इनमें आश्रय किसका करूँ कि जिसमें सुख हो | यह तो स्थावर जंगमजगत सब काल के मुख में हैं यह सब नाश-रूप मुझको दृष्टि आता है, इससे जो निर्भय पद हो सो मुझको कहिए |

इति श्रीयोगवाशिष्ठे वैराग्यप्रकरणे कालजुगुप्सावर्णन्नाम विशंतितमस्सर्ग: || २० ||

 

श्री योग वशिष्ठ महारामायण (वैराग्य प्रकरण) – कालविलासवर्णन

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|| ॐ श्री परमात्मेय नम: ||

श्री योग वशिष्ठ महारामायण

वैराग्य प्रकरण – कालविलासवर्णन

श्रीरामजी बोले कि हे मुनीश्वर ! यह काल बड़ा बलिष्ठ है | जैसे राजा के पुत्र शिकार खेलने जाते हैं तो वन में बड़े- बड़े पशु-पक्षी उनसे दुःख पाते हैं वैसे ही यह संसाररूपी वन है उसमें प्राणिमात्र पशु-पक्षी हैं | जब कालरुपी राजपुत्र उसमें शिकार खेलने आता है तब सब जीव भय पाते हैं और जर्जरीभूत होते हैं और वह उनको मारता हैं | हे मुनीश्वर ! यह काल महाभैरव है सबका ग्रास कर लेता है प्रलय में सबका प्रलय कर डालता है और इसकी जो चण्डिका शक्ति है उसका बड़ा उदर है | वह कालिका सबका ग्रास करके पीछे नृत्य करती है | जैसे वन के मृग को सिंह और सिंहनी भोजन करके नृत्य करते हैं वैसे ही जगतरूपी वन में जीवरूपी मृग को भोजन करके काल और कालिका नृत्य करते हैं फिर इन्हीं से जगत का प्रादुर्भाव होता है | नाना प्रकार के पदार्थों को रचते हैं और पृथ्वी, बगीचे, बावली आदि सब पदार्थ इन्ही से उत्पन्न होते हैं | जीवों की उत्पत्ति भी इनसे होती है और एक समय में उनका नाश भी कर देती है | सुनर समुद्र रच के फिर उनमे अग्नि लगा देती है और सुंदर कमल को बनाके फिर उसके उपर बर्फ की वर्षा करती है | जहाँ बड़े – बड़े स्थान बसते हैं उनको उजाड़ डालती है और फिर उजाड़ में बस्ती करती है और नाश भी करती है; किसी को स्थिर नही रहने देती | जैसे बाग़ में वानर आकर वृक्ष को ठहरने नही देता वैसे ही कालरुपी वानर किसी पदार्थ को स्थिर रहने नहीं देता |

हे मुनीश्वर ! इस प्रकार से सब पदार्थ काल से जर्जरीभूत होते हैं | उनका आश्रय में किस रीति से करूँ ? मुझको तो यह सब नाशरूप भासते हैं इससे अब मुझको किसी जगत के पदार्थ की इच्छा नहीं |

इति श्रीयोगवाशिष्ठे कालविलासवर्णनन्नाममैंकोनविशंतितमस्सर्ग: || १९ ||

 

श्री योग वशिष्ठ महारामायण (वैराग्य प्रकरण) – कालनिरूपण – अंतिम भाग

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|| ॐ श्री परमात्मेय नम: ||

श्री योग वशिष्ठ महारामायण

वैराग्य प्रकरण – कालनिरूपण – अंतिम भाग 

ब्रह्मा, विष्णु, रूद्र, कुबेर, आदि सब मूर्ति काल की धरी हुई है | यह उनको भी अन्तर्धान कर देता है | हे मुनीश्वर उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय सब काल से होते हैं | अनेक बेर इसने महाकल्प का भी ग्रास किया है और अनेक बेर करेगा | काल को भोजन करने से तृप्ति कदाचित नहीं होती और कदाचित होनेवाली भी नहीं | जैसे अग्नि घृत की आहुति से तृप्त नहीं होता | वैसे ही जगत और सब ब्रह्मांड का भोजन करके भी काल तृप्त नहीं होता | इसका ऐसा स्वभाव है की इंद्र को दरिद्री कर देता है और दरिद्री को इंद्र कर देता है, सुमेरु को राई बनाता है और राई को सुमेरु करता है | सबसे बड़े ऐश्वर्यवान को नीच कर डालता है और सबसे नीच को ऊँच कर डालता है | बूँद को समुद्र कर डालता है और समुद्र को बूँद करता है | ऐसी शक्ति काल में हैं | यह जीवरूपी मच्छरों को शुभाशुभ कर्मरूपी छुरे से छेदता रहता है | कालरूप का चक्र जीवरूपी हँडिया की शुभ – अशुभ कर्मरूपी रस्सी से बाँधकर फिराता है और जीवरूपी वृक्ष को रात्रि और दिनरुपी कुल्हाड़े से छेदता है | हे मुनीश्वर ! जितना कुछ जगत विलास भासता है काल सबको ग्रास कर लेगा | जीवरूप रत्न का काल डब्बा है सो सबको अपने उदर में डालता जाता है | काल यों खेल करता है कि चन्द्र सूर्यरूपी गेंद को कभी उर्ध्व को उछालता है और कभी नीचे डालता है | जो महापुरुष है वह उत्पत्ति और प्रलय के पदार्थों में से किसी के साथ स्नेह नहीं करता और उसका काल भी नाश नहीं कर सकता | जैसे मुंड की माल महादेवजी गले में धारें हैं वैसे ही यह भी जीवों की माला गले में डालता है |

हे मुनीश्वर ! जो बड़े बलिष्ठ हैं उनको भी काल ग्रहण कर लेता है | जैसे समुद्र बड़ा है उसको बडवानल पान कर लेता है और जैसे पवन भोजपत्र को उड़ाता है वैसे ही काल का भी बल है, किसी की सामर्थ्य नहीं जो इसके आगे स्थित रहे | हे मुनीश्वर ! शान्तिगुण प्रधान देवता; रजोगुण प्रधान बड़े राजा और तमोगुण प्रधान दैत्य और राक्षस हैं उनमें किसी को सामर्थ्य नही जो इसके आगे स्थिर रहे | जैसे तौली में अन्न और जल भर के अग्नि पर चढ़ा देने से अन्न उछलता है और वह अन्न के दाने करछी से कभी ऊपर और कभी नीचे फिर जाते हैं वैसे ही जीवरूपी अन्नके दाने जगतरूपी तौली में पड़े हुए रागद्वेषरूपी अग्नि पर चढ़े है | और कर्मरूपी करछी से कभी ऊपर जाते हैं और कभी नीचे आते हैं | हे मुनीश्वर ! यह काल किसी को स्थिर नहीं होने देता यह महा कठोर है, दया किसी पर नहीं करता | इसका भी मुझको रहता हैं इससे वही उपाय मुझसे कहिये जिससे मैं काल से निर्भय हो जाऊँ |

इति श्रीयोगवाशिष्ठे वैराग्यप्रकरणे कालनिरूपणन्नामाष्टादशस्सर्ग: || १८ ||

श्री योग वशिष्ठ महारामायण वैराग्य प्रकरण – कालनिरूपण भाग १

YVMR111016|| ॐ श्री परमात्मेय नम: ||
श्री योग वशिष्ठ महारामायण
वैराग्य प्रकरण – कालनिरूपण – भाग १

श्रीरामजी बोले कि हे मुनीश्वर ! संसाररूपी गढ़ा है उसमें अज्ञानी गिरा है, पर संसाररूपी गढ़ा तो अल्प है और अज्ञानी बड़ा हो गया है | संकल्प विकल्प की अधिकता से बढ़ा है | जो ज्ञानवान पुरुष है वह संसार को मिथ्या जानता है और संसाररूपी जाल में नहीं फँसता और जो अज्ञानी पुरुष है वह संसार को सत्य जानकर उसकी आस्थारुपी जाल में फँसता है और भोग की वाच्छा करता है | वह ऐसा है जसे दर्पण में प्रतिबिम्ब देखकर बालक पकड़ने की इच्छा करता है वैसे ही अज्ञानी संसार को सत्य जानकर जगत के पदार्थ की वाच्छा करता है कि यह मुझे प्राप्त हो और यह न हो | यह सब सुख नाशात्मक हैं अभिप्राय यह की आते हैं और जाते हैं स्थिर नहीं रहते; इनको काल ग्रास करता है | जैसे पक्के अनार को चूहा खा जाता है वैसे ही सब पदार्थों को काल खाता है | हे मुनीश्वर ! यह सब पदार्थ कालग्रसित है | जैसे नेवला सर्प को भक्षण कर जाता है वैसे ही बड़े – बड़े बलि सुमेरु ऐसे गम्भीर पुरुषों को काल ने ग्रसित किया है | जगतरूपी एक गूलर का फल है; उसमें मज्जा ब्रह्मादिक हैं और उसका वन ब्रह्मरूप है | उस ब्रह्मरूप वन में जितने वन हैं सो सब इसका आहार हैं | यह काल सबको भक्षण कर जाता है |
हे मुनीश्वर ! यह काल बड़ा बलिष्ठ है; जो कुछ देखने में आता है सो सब इसने ग्रास कर लिया है | हमारे जो बड़े ब्रह्मादिक है उनका भी काल ग्रास कर जाता है तो और का क्या कहना है जैसे सिंह मृग का ग्रास कर लेता है | काल किसी से जाना नहीं जाता | क्षण, घरी, प्रहर, दिन, मास और वर्षादिक से जानिये सोई काल है और काल की मूर्ति प्रकट नहीं है | यह किसी को स्थिर नहीं देता | एक बेलि, काल ने पसारी है उसकी त्वचा रात्रि है और फूल दिन है और जीवरूपी भौरे उस पर आ बैठते हैं | हे मुनीश्वर ! जगतरूपी गूलर का फल है उसमें जीवरूपी बहुत मच्छर रहते हैं | जैसे तोता अनार का भक्षण करता है वैसे ही काल उस फल का भक्षण करता है | जगतरूपी वृक्ष हैं; जीवरूपी उसके पत्र हैं और कालरुपी हस्ती उसका भक्षण कर जाता है | शुभ – अशुभ रूपी भैसे को कालरुपी सिंह छेद – छेद के खाता है | हे मुनीश्वर ! यह काल महाक्रूर है; किसी पर दया नहीं करता; सबको खा जाता है | जैसे मृग सब कमलों को खा जाता उससे कोई नहीं बचता वैसे ही काल भी सबको खाता है परन्तु एक कमल बचा है उस कमल के शान्ति और मैत्री अंकुर हैं और चेतनामात्र प्रकाश है, इस कारण वह बचा है | कालरुपी मृग इस तक नहीं पहुँच सकता बल्कि इसमें प्राप्त हुआ काल भी लीन हो जाता है | जो कुछ प्रपंच हैं सो सब काल के मुख में हैं |

क्रमशः