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गरुड़पुराण – अध्याय – १०१

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| ॐ श्रीपरमात्मने नम: | ॐ श्री गणेशाय नम: | ॐ नमो भगवते वासुदेवाय |

गरुडपुराण

आचारकाण्ड

अध्याय – १०१

ग्रहशान्ति – निरूपण

याज्ञवल्क्यजी ने कहा – हे मुनियों ! लक्ष्मी एवं सुख-शान्ति के इच्छुक तथा ग्रहों की दृष्टी से दु:खित जनों को ग्रहशान्ति के लिये तत्सम्बन्धित यज्ञ करना चाहिये | विद्वानों के द्वारा सूर्य, सोम, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहू और केतु – ये नौ ग्रह बताये गये हैं | इनकी अर्चा के लिये इनकी मूर्ति क्रमश: इन द्रव्यों से बनानी चाहिये – ताम्र, स्फटिक, रक्तचन्दन, स्वर्ण, सुवर्ण, रजत, अयस ( लोहा ), सीसा तथा कांस्य | अर्थात सूर्यग्रह के लिये ताम्र धातु, चन्द्र के लिये स्फटिक, मंगल के लिये रक्तचन्दन, बुध एवं बृहस्पति के लिये स्वर्ण, शुक्र के लिये रजत, शनि के लिये लोहा, राहू के लिये सीसा तथा केतु के लिये कांस्य धातु प्रशस्त है |

सूर्यका वर्ण लाल, चन्द्रमा का सफेद, मंगल का लाल, बुध तथा बृहस्पति का पीला, शुक्र का श्वेत, शनि, राहू और केतुका काला वर्ण होता है | इसी वर्ण के इनके द्रव्य भी होते है | एक पाटेपर वस्त्र बिछाकर ग्रहवर्णों के अनुसार निर्दिष्ट द्रव्यों के द्वारा विधिपूर्वक उनकी स्थापना तथा पूजा- होम करें | उन्हें सुवर्ण, वस्त्र तथा पुष्प समर्पित करे | उनके लिये गंध, बलि, धूप, गुग्गुल भी देना चाहिये | तत्पश्चात मन्त्रों के द्वारा प्रत्येक ग्रह – देवता के निमित्त चरु पदार्थ अर्पित करना चाहिये |

उसके बाद यथाक्रम ‘ॐ आकृष्णेन रजसा’ इस मन्त्र के द्वारा सूर्य, ‘ ॐ इमं देवा’ मन्त्रसे चन्द्र, ‘ॐ अग्निर्मूर्धादिव: ककुत ‘ मन्त्र के द्वारा मंगल, ‘ ॐ उद्बुध्यस्व’ मन्त्र से बुध, ‘ॐ बृहस्पते’ मन्त्र से बृहस्पति, ‘ॐ अत्रात्परिस्त्रूतम’ मन्त्रसे शुक्र, ‘ॐ शं नो देवी’ मन्त्र के द्वारा शनि, ‘ॐ कयानश्चि’ मन्त्र से राहू तथा ‘ॐ केतुं कृण्वन’ मन्त्र के द्वारा केतु ग्रह के लिये आहुति देनी चाहिये |

इन ग्रहों के लिये क्रमसे मन्दार, पलाश, खैर, अपामार्ग ( चिचड़ा ), पिप्पल, गूलर, शमी, दूर्वा और कुश की समिधाएँ विहित है | इन समिधाओं को घृत, दधि तथा मधुसे मिश्रितकर हवन करना चाहिये | तदनन्तर क्रमानुसार उपर्युक्त मन्त्रों के द्वारा पदार्थों की आहुति प्रदान करें | यथा – सूर्यके लिये गुड़, चन्द्र के लिये भात, मंगल के लिये पायस, बुध के लिये साठी चावल की खीर, बृहस्पति के लिये दही – भात, शुक्र के लिये घृत, शनि के लिये अनेक वर्ण के पकाये हुए धान्य की आहुति देनी चाहिये |

द्विज को चाहिये कि इसी क्रमसे प्रत्येक ग्रह के लिये अन्न भी दानरूप में दें | तदनन्तर प्रत्येक ग्रह के निमित्त यथाक्रम – धेनु, शंख, बैल, सुवर्ण, वस्त्र, अश्व, कृष्णा गौ, अयस  तथा छाग की दक्षिणा देनी चाहिये | इस प्रकार ग्रहों की सदैव पूजा करने से मनुष्य को राज्यादि फल प्राप्त होते हैं |

नारायण नारायण

 

शिवपुराण – १८६

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श्रीपुराणपुरुषोत्तमाय नम :
ॐ श्री गणेशाय नम:
भवाब्धिमग्नं दिनं मां समुन्भ्दर भवार्णवात | कर्मग्राहगृहीतांग दासोऽहं तव् शंकर ||

श्री शिवपुराण – माहात्म्य

रूद्रसंहिता, पंचम ( युद्ध ) खंड

अध्याय – १८६

दुन्दुभिनिर्ह्लाद नामक दैत्य का व्याघ्ररूप से शिवभक्तपर आक्रमण करने का विचार और शिवद्वारा उसका वध

सनत्कुमारजी कहते है – व्यासजी ! अब मैं चन्द्रमौलिके उस चरित्र का वर्णन करूँगा, जिसमें शंकरजी ने दुन्दुभिनिर्ह्लाद नामक दैत्य को मारा था | तुम सावधान होकर श्रवण करो | दितिपुत्र महाबली हिरण्याक्ष के विष्णुद्वारा मारे जानेपर दिति को बहुत दुःख हुआ | तब देवशत्रु दुन्दुभिनिर्ह्लाद ने उसको आश्वासन देकर यह निश्चय किया कि ‘देवताओं के बल ब्राह्मण है | ब्राह्मण नष्ट हो जायँगे तो यज्ञ नहीं होंगे, यज्ञ न होनेपर देवता आहार न पाने से निर्बल हो जायेंगे | तब मैं उनपर सहज ही विजय पा लूँगा |’ यों विचारकर वह ब्राह्मणों को मारने लगा | ब्राह्मणों का प्रधान स्थान वाराणसी है, यह सोचकर वह काशी पहुँचा और वन में वनचर समिधा लेते हुए, जल में जलचर बनकर स्नान करते हुए और रात में व्याघ्र बनकर सोते हुए ब्राह्मणों को खाने लगा |

एक बार शिवरात्रि के अवसरपर एक भक्त अपनी पर्णशाला में देवाधिदेव शंकर का पूजन करके ध्यानस्थ बैठा था | बलाभिमानी दैत्यराज दुन्दुभिनिर्ह्लाद ने व्याघ्र का रूप धारण करके उसे खा जानेका विचार किया; परन्तु यह भक्त दृढ़चित्त से शिवदर्शन की लालसा लेकर ध्यान में तल्लीन हो रहा था, इसके लिये उसने पहले से ही मन्त्ररूपी अस्त्र का विन्यास कर लिया था | इस कारण वह दैत्य उसपर आक्रमण करने में समर्थ न हो सका | इधर सर्वव्यापी भगवान शम्भु को उस दुष्ट रूपवाले दैत्य के अभिप्राय का पता लग गया | तब शंकर ने उसे मार डालने का विचार किए | इतने में, ज्यों ही उस दैत्य ने व्याघ्ररूप से उस भक्त को अपना प्राप्त बनाना चाहा, त्यों ही जगत की रक्षा के लिये मणिस्वरूप तथा भक्तरक्षण में कुशल बुद्धिवाले त्रिलोचन भगवान शंकर वहाँ प्रकट हो गये और उसे बगल में दबोचकर उसके सिरपर वज्र से भी कठोर घूँसे से प्रहार किया | उस मुष्टि- प्रहार से तथा काँख में दबोचकर से वह व्याघ्र अत्यंत व्यथित हो गया और अपनी दहाड़ से पृथ्वी तथा आकाश को कँपाता हुआ मृत्यु का प्राप्त बन गया | उस भयंकर शब्द को सुनकर तपस्यियों का ह्रदय काँप उठा | वे रात में ही उस शब्द का अनुसरण करते हुए उस स्थानपर आ पहुँचे | वहाँ परमेश्वर शिव को बगल में उस पापीको दबाये हुए देखकर सब लोग उनके चरणों में पड़ गये और जब-जयकार करते हुए उनकी स्तुति करने लगे |

तदनन्तर महेश्वर ने कहाजो मनुष्य यहाँ आकर श्रद्धापूर्वक मेरे इस रूप का दर्शन करेगा, निस्संदेह मैं उसके सारे उपद्रवों को नष्ट कर दूँगा | जो मानव मेरे इस चरित्र को सुनकर और ह्रदय में मेरे इस लिंग का स्मरण करके संग्राम में प्रवेश करेगा, उसे अवश्य विजय की प्राप्ति होगी |

मुने ! जो मनुष्य व्याघ्रेश्वर के प्राकट्य से सम्बन्ध रखनेवाले इस परमोत्तम चरित्र को सुनेगा अथवा दूसरे को सुनायेगा,पढ़ेगा या पढ़ायेगा, वह अपनी समस्त मनोवांछित वस्तुओं को प्राप्त कर लेना और अंत में सम्पूर्ण दु:खों से रहित होकर मोक्ष का भागी होगा | शिवलीलासम्बन्धी अमृतमय अक्षरों से परिपूर्ण यह अनुपम आख्यान स्वर्ग, यश और आयुका देनेवाला तथा पुत्र-पौत्र की वृद्धी करनेवाला है |

– ॐ नम: शिवाय –

विष्णुपुराण – चतुर्थ अंश – १

Beautiful golden sunrise
ॐ श्री मन्नारायणाय नम:
नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम | देवी सरस्वती व्याप्तं ततो जयमुदिरयेत ||

श्रीविष्णुपुराण

चतुर्थ अंश

अध्याय – पहला

वैवस्वतमनु के वंश का विवरण

श्रीमैत्रेयजी बोले – हे भगवन ! सत्कर्म ने प्रवृत्त रहनेवाले पुरुषों को जो करने चाहिये उन सम्पूर्ण नित्य-नैमित्तिक कर्मों का आपने वर्णन कर दिया || १ || हे गुरो ! आपने वर्ण-धर्म और आश्रम-धर्मों की व्याख्या भी कर दी | अब मुझे राजवंशों का विवरण सुनने की इच्छा है, अत: उनका वर्णन कीजिये || २ ||

श्रीपराशरजी बोलेहे मैत्रेय ! अब तुम अनेकों यज्ञकर्ता, शूरवीर और धैर्यशाली भूपालों से सुशोभित इस मनुवंश का वर्णन सुनो जिसके आदिपुरुष श्रीब्रह्माजी है || ३ || हे मैत्रेय ! अपने वंश के सम्पूर्ण पापों को नष्ट करने के लिये इस वंश-परम्परा की कथाका क्रमश: श्रवण करो || ४ ||

उसका विवरण इसप्रकार है – सकल संसार के आदिकारण भगवान विष्णु हैं | वे अनादि तथा ऋक – साम – यजु: स्वरुप हैं | उन ब्रह्मस्वरूप भगवान विष्णु के मूर्त्तरूप ब्रह्माण्डमय हिरण्यगर्भ भगवान ब्रह्माजी सबसे पहले प्रकट हुए || ५ || ब्रह्माजी के दायें अँगूठे से दक्षप्रजापति हुए, दक्ष से अदिति हुई तथा अदिति से विवस्वान और विवस्वान से मनुका जन्म हुआ || ६ || मनु के इक्ष्वाकु, नृग, धृष्ट, शर्याति, नरिश्यंत, प्रांशु, नाभाग, दिष्ट, करूप, और पृषध्र दस पुत्र हुए || ७ ||

मनुने पुत्र की इच्छा से मित्रावरुण नामक दो देवताओं के यज्ञ का अनुष्ठान किया || ८ || किन्तु होता हे विपरीत संकल्प यज्ञ में विपर्यय हो जाने से उनके ‘इला’ नामकी कन्या हुई || ९ || हे मैत्रेय ! मित्रावरुण की कृपासे वह इला ही मनुका ‘सुद्युम्र’ नामक पुत्र हुई || १० || फिर महादेवजी के कोप (कोपप्रयुक्त शाप) से वह स्त्री होकर चन्द्रमा के पुत्र बुध के आश्रम के निकट घूमने लगी || ११ ||

बुध ने अनुरक्त होकर उस स्त्री से पुरुरवा नामक पुत्र उत्पन्न किया || १२ || पुरुरवा के जन्म के अनन्तर भी परमर्षिगण ने सुद्युम्र को पुरुषत्वलाभ की आकांक्षासे क्रतुमय ऋग्यजु:सामाथर्वमय, सर्ववेदमय, मनोमय, ज्ञानमय, अन्नमय और परमार्थतः अकिचिन्मय भगवान यज्ञपुरुष यथावत यजन किया | तब उनकी कृपासे इला फिर भी सुद्युम्र हो गयी || १३ || उस (सुद्युम्र) के भी उत्कल, गय और विनत नामक तीन पुत्र हुए || १४ || पहले स्त्री होने के कारण सुद्युम्र को राज्याधिकार प्राप्त नहीं हुआ || १५ || वसिष्ठजी के कहने से उनके पिताने उन्हें प्रतिष्ठान नामक नगर दे दिया था, वही उन्होंने पुरुरवा को दिया || १६ ||

पुरुरवा की सन्तान सम्पूर्ण दिशाओं में फैले हुए क्षत्रियगण हुए | मनुका पृषध्र नामक पुत्र गुरु की गौ का वध करने के कारण शुद्र हो गया || १७ || मनुका पुत्र करुष था | करुष से कारुष नामक महाबली और पराक्रमी क्षत्रियगण उत्पन्न हुए || १८ || दिष्ट का पुत्र नाभाग वैश्य हो गया था, उससे बलन्धन नामका पुत्र हुआ || १९ || बलन्धन से महान कीर्तिमान वत्सप्रीति, वत्सप्रीति से प्रांशु और प्रांशु से प्रजापति नामक इकलौता पुत्र हुआ || २० – २२ || प्रजापति से खनित्र, खनित्र से चाक्षुष तथा चाक्षुष से अति बल-पराक्रम- सम्पन्न विंश हुआ || २३ – २५ || विंश से विविंशक, विविंशक से खनिनेत्र, खनिनेत्र से अतिविभूति और अतिविभूतिसे अति बलवान और शूरवीर करन्धम नामक पुत्र हुआ || २६ – २९ || करन्धम से अविक्षित हुआ और अविक्षितके मरुत्त नामक अति बल-पराक्रमयुक्त पुत्र हुआ, जिसके विषय में आजकल भी ये दो श्लोक गाये जाते हैं || ३० – ३१ ||

‘मरुत्त का जैसा यज्ञ हुआ था वैसा इस पृथ्वीपर और किसका हुआ है, जिसकी सभी याज्ञिक वस्तुएँ सुवर्णमय और अति सुंदर थीं || ३२ || उस यज्ञ में इंद्र सोमरस से और ब्राह्मणगण दक्षिणा से परीतृत्प हो गये थे, तथा उसमें मरुद्रण परोसनेवाले और देवगण सदस्य थे’ || ३३||

उस चक्रवर्ती मरुत्त के नरिश्यंत नामक पुत्र हुआ तथा नरिश्यंत के दम और दम के राजवर्धन नामक पुत्र उत्पन्न हुआ || ३४ – ३६ || राजवर्धन से सुवृद्धि, सुवृद्धि से केवल और केवल से सुधृति का जन्म हुआ || ३७ – ३९ || सुधृति से नर, नर से चन्द्र और चन्द्र से केवल हुआ || ४० – ४२ || केवल से बन्धुमान, बन्धुमान से वेगवान, वेगवान से बुध, बुध से तृणबिंदु तथा तृणबिंदु से पहले तो इलविला नामकी एक कन्या हुई थी, किन्तु पीछे अलम्बुसा नामकी एक सुन्दरी अप्सरा उसपर अनुरक्त हो गयी | उससे तृणबिंदु के विशाल नामक पुत्र हुआ, जिसने विशाला नामक पूरी बसायी || ४३ – ४९ ||

विशाल का पुत्र हेमचन्द्र हुआ, हेमचन्द्र का चन्द्र, चन्द्रका धूम्राक्षका सृज्जय सहदेव और सहदेव का पुत्र कृशाश्व हुआ || ५० – ५५ || कृशाश्व के सोमदत्त नामक पुत्र हुआ, जिसने सौ अश्वमेध यज्ञ किये थे | उससे जनमेजय हुआ उअर जनमेजय से सुमति का जन्म हुआ | ये सब विशालवंशीय राजा हुए | इनके विषय में यह श्लोक प्रसिद्ध है || ५६ – ६० || तृणबिंदु के प्रसाद से विशालवंशीय समस्त राजालोग दीर्घायु, महात्मा, वीर्यवान और अति धर्मपरायण हुए || ६१ ||

मनुपुत्र शर्याति के सुकन्या नामवाली एक कन्या हुई, जिसका विवाह च्यवन ऋषि के साथ हुआ || ६२ || शर्याति के आनर्त्त नामक एक परम धार्मिक पुत्र हुआ | आनर्त्त के रेवत नामका पुत्र हुआ जिसने कुशस्थली नामकी पूरी में रहकर आनर्त्तदेश का राज्यभोग किया || ६३- ६४ ||

रेवत का भी रैवत ककुद्यी नामक एक अति धर्मात्मा पुत्र था, जो अपने सौ भाइयों में सबसे बड़ा था || ६५ || उसके रेवती नामकी एक कन्या हुई || ६६ || महाराज रैवत उसे अपने साथ लेकर ब्रह्माजी से यह पूछनेके लिये कि ‘यह कन्या किस वर के योग्य है’ ब्रह्मलोक को गये || ६७ || उस समय ब्रह्माजी के समीप हाहा और हूहू नामक दो गन्धर्व अतितान नामक दिव्य गान गा रहे थे || ६८ || वहाँ गान-सम्बन्धी चित्रा, दक्षिणा और धात्री नामक त्रिमार्ग के परिवर्तन के साथ उनका विलक्षण गान सुनते हुए अनेकों युगों के परिवर्तन-कालतक ठहरनेपर भी रैवतजी को केवल एक मुहूर्त ही बीता-सा मालुम हुआ || ६९ ||

गान समाप्त हो जानेपर रैवत ने भगवान कमलयोनि को प्रणाम कर उनसे अपनी कन्याके योग्य वर पूछा || ७० || भगवान ब्रह्माने कहा – “तुम्हे जो वर अभिमत हों उन्हें बताओं” || ७१ || तब उन्होंने भगवान ब्रह्माजी को पुन: प्रणाम कर अपने समस्त अभिमत वरों का वर्णन किया और पूछा कि ‘इनमें से आपको कौन वर पसन्द है जिसे मैं यह कन्या दूँ ?’ || ७२ ||

इसपर भगवान कमलयोनि कुछ सिर झुकाकर मुसकाते हुए बोले || ७३ || :तुमको जो-जो वर अभिमत हैं उनमें से तो अब पृथ्वीपर किसी के पुत्र-पौत्रादि की सन्तान भी नहीं हैं || ७४ || क्योंकि यहाँ गन्धर्वों का गान सुनते हुए तुम्हे कई चतुर्युग बीत चुके हैं || ७५ || इस समय पृथ्वीतलपर अट्ठाईस वे मनुका चतुर्युग प्राय: समाप्त हो चूका है || ७६ || तथा कलियुग का प्रारम्भ होनेवाला है || ७७ || अब तुम अकेले ही रह गये हो, अत: यह कन्या-रत्न किसी और योग्य वर को दो | इतने समय में तुम्हारे पुत्र, मित्र, कलत्र, मंत्रिवर्ग, भूत्यगण, बन्धुगण, सेना और कोशादिका भी सर्वथा अभाव हो चूका है” || ७८-७९ || तब तो राजा रैवत ने अत्यंत भयभीत हो भगवान ब्रह्माजी को पुन: प्रणाम कर पूछा || ८० || ‘भगवन ! ऐसी बात है, तो अब मैं इसे किसको दूँ ?’ || ८१ || तब सर्वलोकगुरु भगवान कमलयोनि कुछ सिर झुकाए हाथ जोडकर बोले || ८२ ||

श्रीब्रह्माजीने कहाजिस अजन्मा, सर्वमय, विधाता परमेश्वर का आदि, मध्य, अंत, स्वरूप, स्वभाव और सार हम नहीं जान पाते || ८३ || कलामुहुर्त्तादिमय काल भी जिसकी विभूति के परिणाम का कारण नहीं हो सकता, जिसका जन्म और मरण नहीं होता, जो सनातन और सर्वदा एकरूप हैं तथा नाम और रूपसे रहित है || ८४ || जिस अच्युत की कृपासे मैं प्रजाका उत्पत्तिकर्ता हूँ, जिसके क्रोध से उत्पन्न हुआ रूद्र सृष्टि का अंतकर्त्ता है तथा जिस परमात्मासे मध्य में जगत्स्थितिकारी विष्णुरूप पुरुष का प्रादुर्भाव हुआ है || ८५ || जो अजन्मा मेरा रूप धारणकर संसार की रचना करता हैं, स्थिति के समय जो पुरुषरूप हैं तथा जो रुद्ररूप से सम्पूर्ण विश्व का ग्रास कर जाता हैं एवं अनंतरूप से सम्पूर्ण जगत को धारण करता हैं || ८६ || जो अव्ययात्मा पाक के लिये अग्निरूप हो जाता हैं, पृथ्वीरूप से सम्पूर्ण लोकों को धारण करता हैं, इन्द्रादिरूप से विश्वका पालन करता हैं और सूर्य तथा चन्द्ररूप होकर सम्पूर्ण अन्धकार का नाश करता हैं || ८७ || जो श्वास-प्रश्वासरूप से जीवों में चेष्टा करता हैं, जल और अन्नरूप से लोक की तृप्ति करता है, तथा विश्वकी स्थिति में संलग्न रहकर जो आकाशरूप से सबको अवकाश देता है || ८८ || जो सृष्टिकर्ता होकर भी विश्वरूप से आप ही अपनी रचना करता है, जगत का पालन करनेवाला होकर भी आप ही पालित होता है तथा संहारकारी होकर भी स्वयं ही संहृत होता है और जो इन तीनों से पृथक इनका अविनाशी आत्मा है || ८९ || जिसमें यह जगत स्थित है, जो आदिपुरुष जगत-स्वरूप है और इस जगत के ही आश्रित तथा स्वयम्भू हैं, हे नृपते ! सम्पूर्ण भूतों का उद्भवस्थान वह विष्णु धरातल में अपने अंश से अवतीर्ण हुआ है || ९० ||

हे राजन ! पूर्वकाल में तुम्हारी जो अमरावती के समान कुशस्थली नामकी पुरी थी वह अब द्वारकापुरी हो गयी है | वहीँ वे बलदेव नामक भगवान विष्णु के अंश विराजमान हैं || ९१ || हे नरेन्द्र ! तुम यह कन्या उन मायामानव श्रीबलदेवजी को पत्नीरूप से दो | ये बलदेवजी संसार में अति प्रशंसनीय है और तुम्हारी कन्या भी स्त्रियों में रत्नस्वरूपा है, अत: इनका योग सर्वथा उपयुक्त है || ९२ ||

श्रीपराशरजी बोले – भगवान ब्रह्माजी के ऐसा कहनेपर प्रजापति रैवत पृथ्वीतलपर आये तो देखा कि सभी मनुष्य छोटे – छोटे, कुरूप, अल्प-तेजोमय, अल्पवीर्य तथा विवेकहीन हो गये हैं || ९३ || अतुलबुद्धि महाराज रैवत ने अपनी कुशस्थली नामकी पुरी और ही प्रकार की देखी तथा स्फटिक पर्वत के समान जिनका वक्ष:स्थल है उन भगवान् हलायुधको अपनी कन्या दे दी || ९४ || भगवान बलदेवजी ने उसे बहुत ऊँची देखकर अपने हलके अग्रभाग से दबाकर नीची कर ली | तब रेवती भी तत्कालीन अन्य स्त्रियों के समान हो गयी || ९५ || तदनन्तर बलरामजी ने महाराज रैवत की कन्या रेवती से विधिपूर्वक विवाह किया तथा राजा भी कन्यादान करने के अनन्तर एकाग्रचित्त से तपस्या करने एक लिये हिमालयपर चले गये || ९६ ||

इति श्रीविष्णुपुराणे चतुर्थेऽशे प्रथमोऽध्यायः

शिवपुराण – १८५

shivpuran9215श्रीपुराणपुरुषोत्तमाय नम :
ॐ श्री गणेशाय नम:
भवाब्धिमग्नं दिनं मां समुन्भ्दर भवार्णवात | कर्मग्राहगृहीतांग दासोऽहं तव् शंकर ||

श्री शिवपुराण – माहात्म्य

रूद्रसंहिता, पंचम ( युद्ध ) खंड

अध्याय – १८५

गजासुर की तपस्या, वर-प्राप्ति और उसका अत्याचार, शिवद्वारा उसका वध, कृत्तिवासा नामसे विख्यात होना तथा कृत्तिवासेश्वर – लिंग की स्थापना करना

सनत्कुमारजी कहते हैं – व्यासजी ! अब परम प्रेमपूर्वक शशिमौलि शिव के उस चरित्र को श्रवण करो, जिसमें उन्होंने त्रिशूलद्वारा दानवराज गजासुरका वध किया था | गजासुर महिवासुरका पुत्र था | जब उसने सुना कि देवताओं से प्रेरित होकर देवीने मेरे पिताको मार दिया था, तब उसका बदला लेने की भावना से उसने घोर तप किया | इसके तपकी ज्वाला से सब जलने लगे | देवताओं ने जाकर ब्रह्माजी से अपना दुःख कहा, तब ब्रह्माजी ने उसके सामने प्रकट होकर उसके प्रार्थनानुसार उसे वरदान दे दिया कि वह काम के वश होनेवाले किसी भी स्त्री या पुरुष से नहीं मरेगा, महाबली और सबसे अजेय होगा |

वर पाकर वह गर्व में भर गया | सब दिशाओं तथा सब लोकपालों के स्थानोंपर उसने अधिकार कर लिया | अंतमे भगवान शंकर की राजधानी आनंदवन काशी में जाकर वह सबको सताने लगा | देवताओं ने भगवान शंकर से प्रार्थना की | शंकर कामविजयी हैं ही | उन्होंने घोर युद्ध में उसे हराकर त्रिशूल में पिरों लिया | तब उसने भगवान शंकर का स्तवन किया | शंकर ने उसपर प्रसन्न होकर इच्छित वर माँगने को कहा |

तब गजासुर ने कहा – दिगम्बरस्वरूप महेशान ! यदि आप मुझपर प्रसन्न है तो अपने त्रिशूल की अग्नि से पवित्र हुए मेरे इस चर्म को आप सदा धारण किये रहे | विभो ! मैं पुण्य गंधों की निधि हूँ, इसलिये मेरा यह चर्म चिरकालतक उग्र तपरूपी अग्नि की ज्वाला में पड़कर भी दग्ध नहीं हुआ हैं | दिगम्बर ! यदि मेरा यह चर्म पुण्यवान न होता तो रणांगण में इसे आपके अंगों का संग कैसे प्राप्त होता | शंकर ! यदि आप तुष्ट हैं तो मुझे एक दूसरा वर और दीजिये | आजसे आपका नाम ‘कृत्तिवासा’ विख्यात हो जाय |

सनत्कुमारजी कहते है – मुने ! गजासुरकी बात सुनकर भक्तवत्सल शंकर ने परम प्रसन्नतापूर्वक महिषासुरनन्दन गज से कहा – ‘तथास्तु’ – अच्छा, ऐसा ही होगा | तदनन्तर प्रसन्नत्मा भक्तप्रिय महेशान उस दानवराज गजसे, जिसका मन भक्ति के कारण निर्मल हो गया था, पुन: बोले |

ईश्वर ने कहा – दानवराज ! तेरा वह पावन शरीर मेरे इस मुक्तिसाधक क्षेत्र काशी में मेरे लिंग के रूप में स्थित हो जाय | इसका नाम कृत्तिवासेश्वर होगा ! यह समस्त प्राणियों के लिये मुक्तिदाता, महान पातकों का विनाशक, सम्पूर्ण लिंगों में शिरोमणि और मोक्षप्रद होगा | यों कहकर देवेश्वर दिगम्बर शिवने गजासुर के उस विशाल चर्म को लेकर ओढ़ लिया |

मुनीश्वर ! उस दिन बहुत बड़ा उत्सव मनाया गया | काशीनिवासी सारी जनता तथा प्रमथगण हर्षमग्न हो गये | विष्णु और ब्रह्मा आदि देवताओं का मन हर्ष से परिपूर्ण हो गया | ये हाथ जोडकर महेश्वर को नमस्कार करके उनकी स्तुति करने लगे |

– ॐ नम: शिवाय –

विष्णुपुराण तृतीय अंश – 18

Beautiful golden sunrise
ॐ श्री मन्नारायणाय नम:
नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम | देवी सरस्वती व्याप्तं ततो जयमुदिरयेत ||

श्रीविष्णुपुराण

तृतीय अंश

अध्याय – अठराहवाँ

मायामोह और असुरों का संवाद तथा राजा शतधनु की कथा

श्रीपराशरजी बोले – हे मैत्रेय ! तदनन्तर मायामोह ने जाकर देखा कि असुरगण नर्मदा के तटपर तपस्या में लगे हुए है || १ || तब उस मयूरपिच्छधारी दिगम्बर और मुण्डितकेश मायामोह ने असुरों से अति मधुर वाणी में इसप्रकार कहा || २ ||

मायामोह बोला – हे दैत्यपतिगण ! कहिये, आपलोग किस उद्देश्यसे तपस्या कर रहे हैं, आपको किसी लौकिक फल की इच्छा है या पारलौकिक की ? || ३ ||

असुरगण बोले – हे महामते ! हमलोगों ने पारलौकिक फल की कामना से तपस्या आरम्भ की है | इस विषय में तुमको हमसे क्या कहना है ? || ४ ||

मायामोह बोलायदि आपलोगों को मुक्तिकी इच्छा है तो जैसा मैं कहता हूँ वैसा करो | आपलोग मुक्ति के खुले द्वारपर इस धर्म का आदर कीजिये || ५ || यह धर्म मुक्ति में परमोपयोगी है | इससे श्रेष्ठ अन्य कोई धर्म नही है | इसका अनुष्ठान करने से आपलोग स्वर्ग अथवा मुक्ति जिसकी कामना करेंगे प्राप्त कर लेंगे | आप सबलोग महाबलवान है, अत: इस धर्मका आदर कीजिये || ६ – ७ ||

श्रीपराशरजी बोले – इसप्रकार नाना प्रकार की युक्तियों से अतिरंजित वाक्योंद्वारा मायामोह ने दैत्यगण को वैदिक मार्ग से भ्रष्ट कर दिया || ८ || यह धर्मयुक्त हैं और यह धर्मविरुद्ध है, यह सत है और यह असत है, यह मुक्तिकारक है और इससे मुक्ति नहीं होती, यह आत्यन्तिक परमार्थ है और यह परमार्थ नहीं है और यह स्पष्ट ऐसा ही है, यह दिगम्बरों का धर्म है और यह साम्बरों का धर्म है – हे द्विज ! ऐसे अनेक प्रकार के अनंत वादों को दिखलाकर मायामोह ने उन दैत्यों को स्वधर्म से च्युत कर दिया || ९ – १२ || मायामोह ने दैत्यों से कहा था कि आपलोग इस महाधर्म को ‘अर्हत’ अर्थात इसका आदर कीजिये | अत: उस धर्म का अवलम्बन करने से वे ‘आर्हत’ कहलाये || १३ ||

मायामोह ने असुरगण क त्रयीधर्म से विमुक्त कर दिया वे मोहग्रस्त हो गये; तथा पीछे उन्होंने अन्य दैत्यों को भी इसी धर्म में प्रवृत्त किया || १४ || उन्होंने दूसरे दैत्यों को, दूसरोने तीसरों को, तीसरों ने चौथों को तथा उन्होंने औरों को इसी धर्म में प्रवृत्त किए | इसप्रकार थोड़े ही दिनों में दैत्यगण ने वेदत्रयी का प्राय: त्याग कर दिया || १५ ||

तदनन्तर जितेन्द्रिय मायामोह ने रक्तवस्त्र धारणकर अन्यान्य असुरों के पास जा उनसे मृदु, अल्प और मधुर शब्दों में कहा || १६ || ‘हे असुरगण ! यदि तुमलोगों को स्वर्ग अथवा मोक्ष की इच्छा है तो पशुहिसा आदि दुष्टकर्मों को त्यागकर बोध प्राप्त करो || १७ ||

यह सम्पूर्ण जगत विज्ञानमाय है – ऐसा जानो | मेरे वाक्योंपर पूर्णतया ध्यान दो | इस विषय में युधजनों का पदार्थों की प्रतीतिपर ही स्थिर है तथा रागादि दोषों से दूषित हैं | इस संसारसंकट में जीव अत्यंत भटकता रहा है || १८-१९ || इसप्रकार ‘बुध्यत (जानो), बुध्यर्ध्व (समझो), बुध्यत (जानो)’ आदि शब्दों से बुद्धधर्म का निर्देश कर मायामोहने दैत्यों से उनका निजधर्म छुड़ा दिया || २० || मायामोह ने ऐसे नाना प्रकार के युक्तियुक्त वाक्य कहे जिससे उन दैत्यगण ने त्रयीधर्म को त्याग दिया || २१ || उन दैत्यगण ने अन्य दैत्यों से तथा उन्होंने अन्यान्यसे ऐसे ही वाक्य कहे | हे मैत्रेय ! इसप्रकार उन्होंने श्रुतिस्मृतिविहित अपने परम धर्म को त्याग दिया || २२ || हे द्विज ! मोह्कारी मायामोह ने और भी अनेकानेक दैत्यों को भिन्न-भिन्न प्रकार के विविध पाषण्डों से मोहित कर दिया || २३ || इसप्रकार थोड़े ही समय में मायामोह के द्वारा मोहित होकर असुरगण ने वैदिक धर्म की बातचीत करना भी छोड़ दिया || २४ ||

हे द्विज ! उनमें से कोई वेदों की, कोई देवताओं की, कोई याज्ञिक कर्म – कलापों की तथा कोई ब्राह्मणों की निंदा करने लगे || २५ || हिंसा में भी धर्म होता है – यह बात किसी प्रकार युक्तिसंगत नहीं है | अग्नि में हवि जलाने से फल होगा – यह भी बच्चोंकी –सी बात है || २६ || अनेकों यज्ञों के द्वारा देवत्व लाभ करके यदि इंद्र को शमी आदि काष्ठका ही भोजन करना पड़ता है तो इससे तो पत्ते खानेवाला पशु ही अच्छा है || २७ || यदि यज्ञ में बलि किये गये पशुको स्वर्ग की प्राप्ति होती है तो यजमान अपने पिताको ही क्यों नहीं मार डालता ? || २८ || यदि किसी अन्य पुरुष के भोजन करने से भी किसी पुरुष की तृप्ति हो सकती है तो विदेशकी यात्रा के समय खाद्यपदार्थ ले जानेका परिश्रम करने की क्या आवश्यकता है; पुत्रगण घरपर ही श्राद्ध कर दिया करें || २९ || अत: यह समझकर कि ‘यह (श्राद्धादि कर्मकांड) लोगों की अंध-श्रद्धा ही है’ इसके प्रति उपेक्षा करनी चाहिये और अपने श्रेय:साधन के लिये जो कुछ मैंने कहा है उसमें रूचि करनी चाहिये || ३० || हे असुरगण ! श्रुति आदि आप्तवाक्य कुछ आकाश में नहीं गिरा करते | हम, तुम और अन्य सबको भी युक्तियुक्त वाक्यों को ग्रहण कर लेना चाहिये || ३१ ||

श्रीपराशरजी बोले – इसप्रकार अनेक युक्तियों से मायामोह ने दैत्यों को विचलित कर दिया जिससे उनमें से किसीकी भी वेदत्रयी में रूचि नहीं रही || ३२ || इसप्रकार दैत्यों के विपरीत मार्ग में प्रवृत्त हो जानेपर देवगण खूब तैयारी करके उनके पास युद्ध के लिये उपस्थित हुए || ३३ ||

हे द्विज ! तब देवता और असुरों में पुन: संग्राम छिड़ा | उसमें सन्मार्गविरोधी दैत्यगण देवताओंद्वारा मारे गये || ३४ || हे द्विज ! पहले दैत्यों के पास जो स्वधर्मरूप कवच था उसीसे उनकी रक्षा हुई थी | अबकी बार उसके नष्ट हो जानेसे वे भी नष्ट हो गये || ३५ || हे मैत्रेय ! इस समय से जो लोग मायामोहद्वारा प्रवर्तित मार्गका अवलम्बन करनेवाले हुए | वे ‘नग्न’ कहलाये क्योंकि उन्होंने वेदत्रयीरूप वस्त्र को त्याग दिया था ||३६ ||

ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यासी – ये चार ही आश्रमी हैं | इनके अतिरिक्त पाँचवाँ आश्रमी और कोई नहीं है || ३७ || हे मैत्रेय ! जो पुरुष गृहस्थाश्रम को छोड़ने के अनन्तर वानप्रस्थ या संन्यासी नहीं होता वह पापी भी नग्न ही है || ३८ ||

हे विप्र ! सामर्थ्य रहते हुए भी जो विहित कर्म नहीं करता वह उसी दिन पतित हो जाता है और उस एक दिन-रात में ही उसके सम्पूर्ण नित्यकर्मों का क्षय हो जाता है || ३९ || हे मैत्रेय ! आपत्तिकाल को छोडकर और किसी समय एक पक्षतक नित्यकर्म का त्याग करनेवाला पुरुष महान प्रायश्चित्तसे ही शुद्ध हो सकता है || ४० || जो पुरुष एक वर्षतक नित्य-क्रिया नहीं करता उसपर दृष्टि पड जानेसे साधू पुरुष को सदा सूर्यका दर्शन करना चाहिये || ४१ || हे महामते ! ऐसे पुरुष का स्पर्श होनेपर वस्रसहित स्नान करने से शुद्धि हो सकती है और उस पापात्मा की शुद्धि तो किसी भी प्रकार नहीं हो सकती || ४२ ||

जिस मनुष्य के घर से देवगण, ऋषिगण, पितृगण और भूतगण विना पूजित हुए नि:श्वास छोड़ते अन्यत्र चले जाते हैं, लोकमें उससे बढकर और कोई पापी नहीं हैं || ४३ || हे द्विज ! ऐसे पुरुष के साथ एक वर्षतक सम्भाषण, कुशलप्रश्न और उठने-बैठने से मनुष्य उसी के समान पापात्मा हो जाता हैं || ४४ || जिसका शरीर अथवा गृह देवता आदि के नि:श्वास से निहत हैं उसके साथ अपने गृह, आसन और वस्त्र आदिको न मिलावे || ४५ || जो पुरुष उसके घर में भोजन करता है, उसका आसन ग्रहण करता है अथवा उसके साथ एक ही शय्यापर शयन करता है वह शीघ्र ही उसीके समान हो जाता है || ४६ || जो मनुष्य देवता, पितर, भूतगण और अतिथियों का पूजन किये बिना स्वयं भोजन करता हैं वह पापमय भोजन करता हैं; उसकी शुभगति नहीं हो सकती || ४७ ||

जो ब्राह्मणादि वर्ण स्वधर्म को छोडकर परधर्मों में प्रवृत्त होते हैं अथवा हीनवृत्तिका अवलम्बन करते हैं वे ‘नग्न’ कहलाते है ||४८ |\| हे मैत्रेय ! जिस स्थान में चारों वर्णों का अत्यंत मिश्रण हो उसमें रहने से पुरुष की साधूवृत्तियों का क्षय हो जाता है || ४९ || जो पुरुष ऋषि, देव, पितृ, भूत और अतिथिगण का पूजन किये बिना भोजन करता है उससे सम्भाषण करने से भी लोग नरक में पड़ते हैं || ५० || अत: वेदत्रयी के त्याग से दूषित इन नग्नोंके साथ प्राज्ञपुरुष सर्वदा सम्भाषण और स्पर्श आदिका भी त्याग कर दे || ५१ || यदि इनकी दृष्टि पद जाय तो श्रद्धावान पुरुषों का यत्नपूर्वक किया हुआ श्राद्ध देवता अथवा पितृपितामहगण की तृप्ति नहीं करता || ५२ ||

राजा शतधनु की कथा

सुना जाता है, पूर्वकाल में पृथ्वीतलपर शतधनु नामसे विख्यात एक राजा था | उसकी पत्नी शैव्या अत्यंत धर्मपरायणा थी || ५३ || वह महाभाग पतिव्रता, सत्य, शौच और दया से युक्त तथा विनय और निति आदि सम्पूर्ण सुलक्षणों से सम्पन्न थी || ५४ || उस महारानी के साथ राजा शतधनु ने परम-समाधिद्वारा सर्वव्यापक, देवदेव श्रीजनार्दन की आराधना की ||५५ || वे प्रतिदिन तन्मय होकर अनन्यभाव से होम, जप, दान, उपवास और पूजन आदिद्वारा भगवान की भक्तिपूर्वक आराधना करने लगे ||५६ || हे द्विज ! एक दिन कार्तिकी पूर्णिमा को उपवास कर उन दोनों पति-पत्नियों ने श्रीगंगाजी से एक साथ ही स्नान करने के अनन्तर बाहर आनेपर एक पाषण्डी को सामने आता देखा ||५७|| यह ब्राह्मण उस महात्मा राजा के धनुर्वेदाचार्य का मित्र था; अत: आचार्य के गौरववश राजाने भी उससे मित्रवत व्यवहार किया || ५८ || किन्तु उसकी पतिव्रता पत्नीने उसका कुछ भी आदर नहीं किया; वह मौन रही और यह सोचकर कि मैं उपोषिता (उपवासयुक्त) हूँ उसे देखकर सूर्यका दर्शन किया ||५९ || हे द्विजोत्तम ! फिर उन स्त्री-पुरुषोंने यथारीति आकर भगवान् विष्णु के पूजा आदिक सम्पूर्ण कर्म विधिपूर्वक किये || ६० ||

कालान्तर में वह शत्रुजित राजा मर गया | तब, देवी शैव्या ने भी चितारुढ महाराज का अनुगमन किया ||६१ ||

राजा शतधनु ने उपवास-अवस्थामें पाखण्डी से वार्तालाप किया था | अत: उस पाप के कारण उसने कुत्ते का जन्म लिया || ६२ || तथा वह शुभलक्षणा काशीनरेश की कन्या हुई, जो सब प्रकार के विज्ञान से युक्त, सर्वलक्षणसम्पन्ना और जातिस्मरा (पूर्वजन्म का वृतांत जाननेवाली ) थी ||६३|| राजाने उसे किसी वर को देने की इच्छा की, किन्तु उस सुन्दरी के ही रोक देनेपर वह उसके विवाहादि से उपरत हो गये ||६४ ||

तब उसने दिव्य दृष्टि से अपने पति को श्वान हुआ जान विदिशा नामक नगर में जाकर उसे वहाँ कुत्ते की अवस्था में देखा || ६५ || अपने महाभाग पतिको श्वानरूप में देखकर उस सुन्दरी ने उसे सत्कारपूर्वक अति उत्तम भोजन कराया || ६६ || उसके दिये हुए उस अति मधुर और इच्छित अन्नको खाकर वह अपनी जाति के अनुकूल नाना प्रकार की चाटुता प्रदर्शित करने लगा ||६७ || उसके चाटुता करने से अत्यंत संकुचित हो उस बालिकाने कुत्सित योनि में उत्पन्न हुए उस अपने प्रियतम को प्रणाम कर उससे इस प्रकार कहा || ६८ || “महाराज ! आप अपनी उस उदारताका स्मरण कीजिये जिसके कारण आज आप श्वान-योनि को प्राप्त होकर मेरे चाटुकार हुए हैं || ६९ || हे प्रभो ! क्या आपको यह स्मरण नहीं हैं कि तीर्थस्नान के अनन्तर पाखण्डी से वार्तालाप करने के कारण ही आपको यह कुत्सित योनि मिली है ?” || ७० ||

श्रीपराशरजी बोले – काशिराजसुताद्वारा इस प्रकार स्मरण कराये जानेपर उसने बहुत देरतक अपने पूर्वजन्म का चिन्तन किया | तब उसे अति दुर्लभ निर्वेद प्राप्त हुआ || ७१ || उसने अति उदास चित्तसे नगर के बाहर आकर प्राण त्याग दिये और फिर श्रुंगाल – योनि में जन्म लिया || ७२ || तब, काशिराज कन्या दिव्य दृष्टि से उसे दूसरे जन्म में श्रुंगाल हुआ जान उसे देखने के लिये कोलाहल-पर्वतपर गयी || ७३ || वहाँ भी अपने पतिको श्रुंगाल-योनि में उत्पन्न हुआ देख वह सुन्दरी राजकन्य उससे बोली || ७४ || “हे राजेन्द्र ! श्वान-योनि में जन्म लेनेपर मैंने आपसे जो पाखण्ड से वार्तालापविषयक पूर्वजन्म का वृतांत कहा था क्या वह आपको स्मरण हैं ?” || ७५ || तब सत्यनिष्ठों में श्रेष्ठ राजा शतधनु ने उसके इस प्रकार कहनेपर सारा सत्य वृतांत जानकर निराहार रह वन में अपना शरीर छोड़ दिया || ७६ ||

फिर वह एक भेड़िया हुआ; उस समय भी अनिंदिता राजकन्या ने उस निर्जन वन में जाकर अपने पतिको उसके पूर्वजन्म का वृतांत स्मरण कराया || ७७ || “हे महाभाग ! तुम भेड़िया नहीं हो, तुम राजा शतधनु हो | तुम अपने पूर्वजन्मों में क्रमश: कुकुर और श्रुंगाल होकर अब भेड़िया हुए हो” || ७८ || इस प्रकार उसके स्मरण करानेपर राजाने जब भेड़िये के शरीर को छोड़ा तो गृध्र – योनि में जन्म लिया | उससमय भी उसकी निष्पाप भार्याने उसे फिर बोध कराया || ७९ || “हे नरेन्द्र ! तुम अपने स्वरूप का स्मरण करो; इन गृध्र-चेष्टाओं को छोडो | पाखण्ड के साथ वार्तालाप करने के दोष से ही तुम गृध्र हुए हो” || ८०||

फिर दूसरे जन्म में काक-योनि को प्राप्त होनेपर भी अपने पतिकी योगबल से पाकर उस सुन्दरी ने कहा || ८१ || “हे प्रभो ! जिनके वशीभूत होकर सम्पूर्ण सामंतगण नाना प्रकार की वस्तुएँ भेंट करते थे वही आप आज काक-योनि को प्राप्त होकर बलिभोजी हुए हैं” ||८२|| इसी प्रकार काक-योनि में भी पूर्वजन्म का स्मरण कराये जानेपर राजाने अपने प्राण छोड़ दिये और फिर मयूर-योनि में जन्म लिया || ८३ ||

मयूरावस्था में भी काशिराज की कन्या उसे क्षण-क्षण में अति सुंदर मयुरोचित आहार देती हुई उसकी टहल करने लगी || ८४ || उससमय राजा जनक ने अश्वमेध नामक महायज्ञ का अनुष्ठान किया; उस यज्ञ में अवभृथ –स्नान के समय उस मयूर को स्नान कराया || ८५ || तब उस सुन्दरी ने स्वयं भी स्नान कर राजाको यह स्मरण कराया कि किस प्रकार उसने श्वान और श्रुंगाल आदि योनियाँ ग्रहण की थीं || ८६ || अपनी जन्म – परम्परा का स्मरण होनेपर उसने अपना शरीर त्याग दिया और फिर महात्मा जनकजी के यहाँ ही पुत्ररूप से जन्म लिया || ८७ ||

तब उस सुन्दरी ने अपने पिताको विवाह के लिये प्रेरित किया | उसकी प्रेरणा से राजाने उसके स्वयंवर का आयोजन किया || ८८ || स्वयंवर होनेपर उस राजकन्या ने स्वयंवर में आये हुए अपने उस पतिको फिर पतिभाव से वरण कर लिया || ८९ || उस राजकुमार ने काशिराजसुता के साथ नाना प्रकार के भोग भोगे और फिर पिता के परलोकवासी होनेपर विदेहनगर का राज्य किया || ९० || उसने बहुत-से यज्ञ किये, याचकों को नाना प्रकार से दान दिये, बहुत-से पुत्र उत्पन्न किये और शत्रुओं के साथ अनेकों युद्ध किये || ९१ || इसप्रकार उस राजाने पृथ्वी का न्यायानुकुल पालन करते हुए राज्यभोग किया और अंत में अपन प्रिय प्राणों को धर्मयुद्ध में छोड़ा || ९२ || तब उस सुलोचना ने पहले के समान फिर अपने चितारुढ पतिका विधिपूर्वक प्रसन्न-मन से अनुगमन किया || ९३ || इससे वह राजा उस राजकन्या के सहित इन्द्रलोक से भी उत्कृष्ट अक्षय लोकों को प्राप्त हुआ || ९४ ||

हे द्विजश्रेष्ठ ! इस प्रकार शुद्ध हो जानेपर उसने अतुलनीय अक्षय स्वर्ग, अति दुर्लभ दाम्पत्य और अपने पुर्वार्चित सम्पूर्ण पुण्य का फल प्राप्त कर लिया || ९५ ||

हे द्विज ! इसप्रकार मैंने तुमसे पाखण्डी से सम्भाषण करने का दोष और अश्वमेध-यज्ञ में स्नान करने का माहात्म्य वर्णन कर दिया || ९६ || इसलिये पाखण्डी और पापाचारियों से कभी वार्तालाप और स्पर्श न करे; विशेषत: नित्य- नैमित्तिक कर्मों के समय और जो यज्ञादि क्रियाओं के लिये दीक्षित हो उसे तो उनका संसर्ग त्यागना अत्यंत आवश्यक है || ९७ || जिसके घर में एक मासतक नित्यकर्मों का अनुष्ठान न हुआ हो उसको देख लेनेपर बुद्धिमान मनुष्य सूर्यका दर्शन करे || ९८ || फिर जिन्होंने वेदत्रयी का सर्वथा त्याग कर दिया है तथा जो पाखण्डीयों का अन्न खाते और वैदिक मत का विरोध करते हैं उन पापात्माओं के दर्शनादि करनेपर तो कहना ही क्या है ? || ९९ || इन दुराचारी पाखण्डियों के साथ वार्तालाप करने, सम्पर्क रखें और उठने – बैठने में महान पाप होता है; इसलिये इन सब बातों का त्याग करे || १०० || पाखण्डी, विकर्मी, विडाल-व्रतवाले [अर्थात छिपे – छिपे पाप करना वैडाल नामक व्रत है | जो वैसा करते हैं ‘वे विडाल-व्रतवाले’ कहलाते है | ], दुष्ट, स्वार्थी और बगुला – भक्त लोगों का वाणी से भी आदर न करे || १०१ || इन पाखण्डी, दुराचारी और अति पापियों का संसर्ग दूरी से त्यागने योग्य है | इसलिये इनका सर्वदा त्याग करे || १०२ ||

इसप्रकार मैंने तुमसे नग्नों की व्याख्या की, जिनके दर्शनमात्र से श्राद्ध नष्ट हो जाता है और जिनके साथ सम्भाषण करने से मनुष्य का एक दिन का पुण्य क्षीण हो जाता है || १०३ || वे पाखण्डी बड़े पापी होते हैं, बुद्धिमान पुरुष इनसे कभी सम्भाषण न करे | इनके साथ सम्भाषण करने से उस दिनका पुण्य नष्ट हो जाता हैं || १०४ || जो बिना कारण ही जटा धारण करते अथवा मूँड मुड़ाते है, देवता, अतिथि आदिको भोजन कराये बिना स्वयं ही भोजन कर लेते हैं, सब प्रकार से शौचहीन हैं तथा जल-दान और पितृ-पिण्ड आदिसे भी बहिष्कृत हैं, उन लोगों से वार्तालाप करने से भी लोग नरक में जाते हैं || १०५ ||

इति श्रीविष्णुपुराणे तृतीयेऽशे अष्टोदशोऽध्यायः

|| इति श्रीपराशरमुनिविरचिते श्रीविष्णुपरत्वनिर्णायके श्रीमति विष्णुमहापुराणे तृतीयोंऽश: समाप्त: ||

शिवपुराण – १८३ से १८४

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श्रीपुराणपुरुषोत्तमाय नम :
ॐ श्री गणेशाय नम:
भवाब्धिमग्नं दिनं मां समुन्भ्दर भवार्णवात | कर्मग्राहगृहीतांग दासोऽहं तव् शंकर ||

श्री शिवपुराण – माहात्म्य

रूद्रसंहिता, पंचम ( युद्ध ) खंड

अध्याय – १८३ से १८४

श्रीकृष्णद्वारा बाण की भुजाओं का काटा जाना, सिर काटने के लिये उद्यत हुए श्रीकृष्ण को शिवका रोकना, बाण को शिवद्वारा उसे अन्यान्य वरदानों के साथ महाकालत्व की प्राप्ति

सनत्कुमारजी कहते हैं – महाप्राज्ञ व्यासजी ! लोकलीला का अनुसरण करनेवाले श्रीकृष्ण और शंकर की उस परम अद्भुत कथा को श्रवण करो | तात ! जब भगवान रूद्र लीलावश पुत्रों तथा गणोंसहित सो गये, तब दैत्यराज बाण श्रीकृष्ण के साथ युद्ध करने के लिये प्रस्थित हुआ | उससमय कुम्भांड उसके अश्वों की बागडोर सँभाले हुए था और वह नाना प्रकार के शस्त्रास्त्रों से सज्जित था | फिर वह महाबली बलिपुत्र भीषण युद्ध करने लगा | इसप्रकार उन दोनों में चिरकालतक बड़ा घोर संग्राम होता रहा, क्योंकि विष्णु के अवतार श्रीकृष्ण शिवरूप ही थे और उधर बलवान बाणासुर उत्तम शिवभक्त था | मुनीश्वर ! तदनन्तर वीर्यवान श्रीकृष्ण, जिन्हें शिवकी आज्ञा से बल प्राप्त हो चूका था, चिरकालतक बाण के साथ यों युद्ध करके अत्यंत कुपित हो उठे | तब शत्रुवीरों का संहार करनेवाले भगवान श्रीकृष्ण ने शम्भू के आदेश से शीघ्र ही सुदर्शन चक्रद्वारा बाण की बहुत-सी भुजाओं को काट डाला | अंत में उसकी अत्यंत सुंदर चार भुजाएँ ही अवशेष रह गयी और शंकर की कृपासे शीघ्र ही उसकी व्यथा भी मिट गयी | जब बाण की स्मृति लुप्त हो गयी और वीरभाव को प्राप्त हुए श्रीकृष्ण उसका सिर काट लेनेके लिये उद्यत हुए, तब शंकरजी मोहनिद्रा को त्यागकर उठ खड़े हुए और बोले |

रूद्र ने कहा – देवकीनंदन ! आप तो सदासे मेरी आज्ञा का पालन करते आये हैं | भगवन ! मैंने पहले आपको जिस काम के लिये आज्ञा दी थी, वह तो आपने पूरा कर दिया | अब बाण का शिरच्छेदन मत कीजिये और सुदर्शन चक्र को लौटा लीजिये | मेरी आज्ञा से यह चक्र सदा मेरे भक्तोंपर अमोघ रहा है | गोविन्द ! मैंने पहले ही आपको युद्ध में अनिवार्य चक्र और जय प्रदान की थी, अब आप इस युद्ध से निवृत्त हो जाइये | लक्ष्मीश ! पूर्वकाल में भी तो अपने मेरी आज्ञा के बिना दधीच, वीरवर रावण और तारकाक्ष आदि के पुरोंपर चक्र का प्रयोग नहीं किया था | जनार्दन ! आप तो योगीश्वर, साक्षात परमात्मा और सम्पूर्ण प्राणियों के हितमें रत रहनेवाले हैं | आप स्वयं ही अपने मनसे विचार कीजिये | मैंने इसे वर दे रखा है कि तुझे मृत्युका भय नहीं होगा | मेरा वह वचन सदा सत्य होना चाहिये | मैं आपपर परम प्रसन्न हूँ | हरे ! बहुत दिन पूर्व यह गर्वसे भरकर उन्मत्त हो उठा और अपने-आपको भूल गया था | तब अपनी भुजाएँ खुजलाता हुआ यह मेरे पास पहुँचा और बोअल – ‘मेरे साथ युद्ध कीजिये |’ तब मैंने इसे शाप देते हुए कहा – ‘थोड़े ही समय में तेरी भुजाओं का छेदन करनेवाला आयेगा | तब तेरा सारा गर्व गल जायगा |’ मेरी ही आज्ञासे तेरी भुजाओं को काटनेवाले ये श्रीहरि आये हैं | ‘अब आप युद्ध बंद कर दीजिये और वर-वधूको साथ लें अपने घरको लौट जाइये ‘ यों कहकर महेश्वर ने उन दोनों में मित्रता करा दी और उनकी आज्ञा ले वे पुत्रों और गणों के साथ अपने निवासस्थान को चले गये |

सनत्कुमारजी कहते हैं – मुने ! शम्भुका कथन सुनकर अक्षत शरीरवाले श्रीकृष्ण ने सुदर्शन को लौटा और विजयश्री से सुशोभित हो वे बाणासुर के अंत:पुर में पधारे | वहाँ उन्होंने ऊषासहित अनिरुद्ध को आश्वासन दिया और बाणद्वारा दिये गये अनेक प्रकार के रत्नसमूहों को ग्रहण किया | ऊषा की सखी परम योगिनी चित्रलेखा को पाकर तो श्रीकृष्ण को महान हर्ष हुआ | इसप्रकार शिव के आदेशानुसार जब उनका सारा कार्य पूर्ण हो गया, तब वे श्रीहरि ह्रदय से शंकर को प्रणाम कर और बलिपुत्र बाणासुर की आज्ञा ले परिवारसमेत अपनी पूरी को लौट गये | द्वारका में पहुँचकर उन्होंने गरुड को विदा कर दिया | फिर हर्षपूर्वक मित्रों से मिले और स्वेच्छानुसार आचरण करने लगे |

इधर नन्दीश्वर ने बाणासुर को समझाकर यह कहा – ‘भक्तशार्दुल ! तुम बारंबार शिवजीका स्मरण करनेवाले हैं, अत: उन आदिगुरू शंकर में मन समाहित करके नित्य उनका महोत्सव करो |’ सब द्वेषरहित हुआ महामनस्वी बाण नंदी के कहने से धैर्य धारण करके तुंरत ही शिवस्थान को गया | वहाँ पहुँचकर उसने नाना प्रकार के स्तोत्रोंद्वारा शिवजी की स्तुति की और उन्हें प्रणाम किया | फिर वह पादों से ठुमकी लगाते हुए और हाथों को घुमाते हुए नाना प्रकार के आलीढ़ और प्रत्यालीढ़ आदि प्रमुख स्थानकोंद्वारा सुशोभित नृत्यों में प्रधान तांडवनृत्य करने लगा | उससमय वह हजारों प्रकार से मुखद्वारा बाजा बजा रहा था और बीच-बीच में भौहों को मटकाकर तथा सिरको कँपाकर सहस्त्रो प्रकार के भाव भी प्रकट करता जाता था | इसप्रकार नृत्य में मस्त हुए महाभक्त बाणासुर ने महान नृत्य करके नतमस्तक हो त्रिशूलधारी चन्द्रशेखर भगवान रूद्र को प्रसन्न कर लिया | तब नाच-गान के प्रेमी भक्तवत्सल भगवान हर हर्षित होकर बाण से बोले |

रूद्रने कहा – बलिपुत्र प्यारे बाण ! तेरे नृत्य से मैं संतुष्ट हो गया हूँ, अत: दैत्येन्द्र ! तेरे मन में जो अभिलाषा हो, उसके अनुरूप बर माँग ले |

सनत्कुमारजी कहते है – मुने ! शम्भु की बात सुनकर दैत्यराज बाण ने इस इसप्रकार वर माँगा – ‘मेरे घाव भर जायँ, बाहुयुद्ध की क्षमता बनी रहे, मुझे अक्षय गणनायकत्व प्राप्त हो, शोणितपुर में ऊषापुत्र अर्थात मेरे दौहित्रका राज्य हो, देवताओंसे तथा विशेष करके विष्णु से मेरा वैरभाव मिट जाय, मुझमें रजोगुण और तमोगुणसे युक्त दूषित दैत्यभाव का पुन: उदय न हो, मुझमें सदा निर्विकार शम्भु-भक्ति बनी रहे और शिव-भक्तोंपर मेरा स्नेह और समस्त प्राणियोंपर दयाभाव रहे |’ यों शम्भु से वरदान माँगकर बलिपुत्र महासुर बाण अंजलि बाँधे रूद्र की स्तुति करने लगा | उससमय उसके नेत्रों में प्रेमके आँसू छलक आये थे | तदनन्तर जिसके सारे अंग प्रेमसे प्रफुल्लित हो उठे थे, वह बलिनंदन बाणासुर महेश्वर को प्रणाम करके मौन हो गया | अपने भक्त बाणकी प्रार्थना सुनकर भगवान शंकर ‘तुझे सब कुछ प्राप्त हो जायगा’ यों कहकर वहीँ अन्तर्धान हो गये |

तब शम्भु की कृपा से महाकालत्व को प्राप्त हुआ रूद्र का अनुचर बाण परमानंद में निमग्न हो गया | व्यासजी ! इसप्रकार मैंने सम्पूर्ण भुवनों में नित्य क्रीडा करनेवाले समस्त गुरुजनों के भी सद्गुरु शूलपाणि भगवान शंकर का बाणविषयक चरित, जो परमोत्तम है, कर्णप्रिय मधुर वचनोंद्वारा तुमसे वर्णन कर दिया |

– ॐ नम: शिवाय –

विष्णुपुराण – तृतीय अंश – १३ से १७

Beautiful golden sunrise
ॐ श्री मन्नारायणाय नम:
नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम | देवी सरस्वती व्याप्तं ततो जयमुदिरयेत ||

श्रीविष्णुपुराण

तृतीय अंश

अध्याय – १३ से १७

नग्नविषयक प्रश्न, देवताओं का पराजय, उनका भगवान की शरण में जाना और भगवान का मायामोह को प्रकट करना

श्रीपराशरजी बोले – हे मैत्रेय ! पूर्वकाल में महात्मा सगर से उनके पुछ्नेपर भगवान और्व ने इस प्रकार गृहस्थ के सदाचार का निरूपण किया था || १ || हे द्विज ! मैंने भी तुमसे उसका पूर्णतया वर्णन कर दिया | कोई भी पुरुष सदाचार का उल्लंघन करके सद्गति नहीं पा सकता || २ ||

श्रीमैत्रेयजी बोले – भगवन ! नपुंसक, अपविद्ध और रजस्वला आदि को तो मैं अच्छी तरह जानता हूँ [ किन्तु यह नहीं जानता कि ‘नग्न’ किसको कहते हैं ] | अत: इस समय मैं नग्न के विषय में जानना चाहता हूँ || ३ || नग्न कौन है ? और किस प्रकार के आचरणवाला पुरुष नग्न-संज्ञा प्राप्त करता हैं ? हे धर्मात्माओं में श्रेष्ठ ! मैं आपके द्वारा नग्न के स्वरूप का यथावत वर्णन सुनना चाहता हूँ; क्योंकि आपको कोई भी बात अविदित नहीं है || ४ ||

श्रीपराशरजी बोले – हे द्विज ! ऋक, साम और यजु: यह वेदत्रयी वर्णों का आवरणस्वरूप है | जो पुरुष मोहसे इसका त्याग कर देता है वह पापी ‘नग्न’ कहलाता हैं || ५ || हे ब्रह्मन ! समस्त वर्णों का संवरण (ढँकनेवाला वस्त्र) वेदत्रयी ही है; इसलिये उसका त्याग कर देनेपर पुरुष ‘नग्न’ हो जाता है, इसमें कोई संदेह नहीं || ६ || हमारे पितामह धर्मज्ञ वसिष्ठजी ने इस विषय में महात्मा भीष्मजीसे जो कुछ कहा था वह श्रवण करो || ७ || हे मैत्रेय ! तुमने जो मुझसे नग्न के विषय में पूछा है इस सम्बन्ध में भीष्म के प्रति वर्णन करते समय मैंने भी महात्मा वसिष्ठजी का कथन सुना था || ८ ||

पूर्वकालमें किसी समय सौ दिव्यवर्षतक देवता और असुरों का परस्पर युद्ध हुआ | उसमें ह्लाद प्रभुति दैत्योंद्वारा देवगण पराजित हुए || ९ || अत: देवगणने क्षीरसागर के उत्तरीय तटपर जाकर तपस्या की और भगवान विष्णु की आराधना के लिये उस समय इस स्तवका गान किया || १० ||

देवगण बोले – हमलोग लोकनाथ भगवान विष्णु की आराधना के लिये जिस वाणी का उच्चारण करते हैं उससे वे आद्य-पुरुष श्रीविष्णुभगवान प्रसन्न हों || ११ || जिन परमात्मा से सम्पूर्ण भूत उत्पन्न हुए हैं और जिनमें वे सब अंत में लीन हो जायँगे, संसार में उनकी स्तुति करने में कौन समर्थ हैं ? || १२ || हे प्रभो ! यद्यपि आपका यथार्थ स्वरूप वाणीका विषय नहीं है तो भी शत्रुओं के हाथ से विध्वस्त होकर पराक्रमहीन जाने के कारण हम अभयप्राप्ति के लिये आपकी स्तुति करते हैं || १३ || पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, अंत:करण, मूल-प्रकृति और प्रकृति से परे पुरुष – ये सब आप ही है || १४ || हे सर्वभूतात्मन ! ब्रह्मा से लेकर स्तम्बपर्यन्त स्थान और कालादि भेद्युक्त यह मुर्त्तामूर्त्त – पदार्थमय सम्पूर्ण प्रपंच आपही का शरीर है || १५ || आपके नाभि-कमल से विश्व उपकारार्थ प्रकट हुआ जो आपका प्रथम रूप है, हे ईश्वर ! उस ब्रह्मस्वरूप को नमस्कार है || १६ || इंद्र, सूर्य, रूद्र, वसु, अश्विनीकुमार, मरुद्रण और सोम आदि भेद्युक्त हमलोग भी आपही का एक रुप है; अत: आपके उस देवरूप को नमस्कार है || १७ || हे गोविन्द ! जो दम्भमयी, अज्ञानमयी तथा तितिक्षा और दम्भ से शून्य है आपकी उस दैत्य-मूर्ति को नमस्कार है || १८ || जिस मंदसत्त्व स्वरूप में ह्रदय की नाड़ियाँ अत्यंत ज्ञानवाहिनी नहीं होती तथा जो शब्दादि विषयों का लोभी होता हैं आपके उस यक्षरूप को नमस्कार है || १९ || हे पुरुषोत्तम ! आपका जो क्रूरता और मायासे युक्त घोर तमोमय रूप है उस राक्षसस्वरूप को नमस्कार है || २० || हे जनार्दन ! जो स्वर्ग में रहनेवाले धार्मिक जनों के यागादि सद्धर्मोंके फल की प्राप्ति करनेवाला आपका धर्म नामक रूप है उसे नमस्कार हैं || २१ || जो जल-अग्नि आदि गमनीय स्थानों में जाकर भी सर्वदा निर्लिप्त और प्रसन्न्तामय रहता है वह सिद्ध नामक रूप आपही का है; ऐसे सिद्धस्वरूप आपको नमस्कार है || २२ || हे हरे ! जो अक्षमा का आश्रय अत्यंत क्रूर और कामोपभोग में समर्थ आपका द्विजिह्व (दो जीभवाला) रूप है, उन नागस्वरूप आपको नमस्कार है || २३ || हे विष्णो ! जो ज्ञानमय, शांत, दोषरहित और कल्मषहीन है उस आपके मुनिमय स्वरूप को नमस्कार है || २४ || जो कल्पान्तमें अनिवार्यरूप से समस्त भूतोंका भक्षण कर जाता है, हे पुण्डरीकाक्ष ! आपके उस कालस्वरूप को नमस्कार है || २५ ||

जो प्रलयकाल में देवता आदि समस्त प्राणियों को सामान्य भावसे भक्षण करके नृत्य करता है आपके उस रूद्र-स्वरूप को नमस्कार है || २६ || रजोगुण की प्रवृत्ति के कारण जो कर्मों का करणरूप है, हे जनार्दन ! आपके उस मनुष्यात्मक स्वरूप को नमस्कार है || २७ || हे सर्वात्मन ! जो अट्ठाईस ‘वध-युक्त’ तमोमय और उन्मार्गगामी है आपके उस पशुरूप को नमस्कार है || २८ || जो जगत की स्थिति का साधन और यज्ञ का अंगभूत है तथा वृक्ष, लता, गुल्म, वीरूध, तृण और गिरि – इन छ: भेड़ों से युक्त हैं उन मुख्य रूप आपको नमस्कार है || २९ || तिर्यक मनुष्य तथा देवता आदि प्राणी, आकाशादि पंचभूत और शब्दादि उनके गुण – ये सब, सबके आदिभूत आपही के रूप है; अत: आप सर्वात्मा को नमस्कार है || ३० ||

हे परमात्मन ! प्रधान और मह्त्तत्त्वादिरूप इस सम्पूर्ण जगत से जो परे हैं, सबका आदि कारण है तथा जिसके समान कोई अन्य रूप नहीं है, आपके उस प्रकृति आदि करणों के भी कारण रुपको नमस्कार है || ३१ || हे भगवन ! जो शुक्लादि रूपसे, दीर्घता आदि परिमाण से ततः घंटा आदि गुणोंसे रहित है, इसप्रकार जो समस्त विशेषणों का अविषय है तथा परमर्षियों का दर्शनीय एवं शुद्धातिशुद्ध है आपके उस स्वरूप को हम नमस्कार करते है || ३२ || जो हमारे शरीरों में, अन्य प्राणियों के शरीरों में तथा समस्त वस्तुओं में वर्तमान है, अजन्मा और अविनाशी है तथा जिससे अतिरिक्त और कोई भी नहीं है, उस ब्रह्मस्वरूप को हम नमस्कार करते हैं || ३३ || परमपद ब्रह्म ही जिसका आत्मा है ऐसे जिस सनातन और अजन्मा भगवान का यह सकल प्रपंच रूप है, उस सबके बीजभूत, अविनाशी और निर्मल प्रभु वासुदेव को हम नमस्कार करते अहिं || ३४ ||

श्रीपराशरजी बोले – हे मैत्रेय ! स्त्रोत्र के समाप्त हो जानेपर देवताओं ने परमात्मा श्रीहरि को हाथ में शंख, चक्र और गदा लिये तथा गरुडपर आरूढ़ हुए अपने सम्मुख विराजमान देखा || ३५ || उन्हें देखकर समस्त देवताओं ने प्रणाम करने के अनन्तर उनसे कहा – हे नाथ ! प्रसन्न होइये और हम शरणागतों की दैत्यों से रक्षा कीजिये || ३६ || हे परमेश्वर ! ह्लाद प्रभुति दैत्यगण ने ब्रह्माजी की आज्ञा का भी उल्लंघन कर हमारे और त्रिलोकी के यज्ञभागों का अपहरण कर लिया है || ३७ || यद्यपि हम और वे सर्वभूत आपही के अंशज है तथापि अविद्यावश हम जगत को परस्पर भिन्न-भिन्न देखते हैं || ३८ || हमारे शत्रुगण अपने वर्णधर्मका पालन करनेवाले, वेदमार्गावलम्बी और तपोनिष्ठ हैं, अत: वे हमसे नहीं मारे जा सकते || ३९ || अत: हे सर्वात्मन ! जिससे हम उन असुरोंका वध करने में समर्थ हो ऐसा कोई उपाय आप हमें बतलाइये || ४० ||

श्रीपराशरजी बोले – उनके ऐसा कहनेपर भगवान विष्णु ने अपने शरीर से मायामोह को उत्पन्न किया और उसे देवताओं को देकर कहा || ४१ || यह मायामोह उन सम्पूर्ण दैत्यगण को मोहित कर देगा, तब वे वेदमार्ग का उल्लंघन करने से तुमलोगों से मारे जा सकेंगे || ४२ || हे देवगण ! जो कोई देवता अथवा दैत्य ब्रह्माजी के कार्य में बाधा डालते हैं वे सृष्टि की रक्षा में तत्पर मेरे बध्य होते है || ४३ || अत: हे देवगण ! अब तुम जाओ | डरो मत | यह मायामोह आगेसे जाकर तुम्हारा उपकार करेगा || ४४ ||

श्रीपराशरजी बोले – भगवान की ऐसी आज्ञा होनेपर देवगण उन्हें प्रणाम कर जहाँ से आये थे वहाँ चले गये तथा उनके साथ मायामोह भी जहाँ असुरगण थे वहाँ गया || ४५ ||

इति श्रीविष्णुपुराणे तृतीयेऽशे त्रयोदशोऽध्यायः से सप्तदशोऽध्यायः

शिवपुराण – १७९ से १८२

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श्रीपुराणपुरुषोत्तमाय नम :
ॐ श्री गणेशाय नम:
भवाब्धिमग्नं दिनं मां समुन्भ्दर भवार्णवात | कर्मग्राहगृहीतांग दासोऽहं तव् शंकर ||

श्री शिवपुराण – माहात्म्य

रूद्रसंहिता, पंचम ( युद्ध ) खंड

अध्याय – १७९ से १८२

बाणासुर की तपस्या और उसे शिवद्वारा वर-प्राप्ति, शिव की आज्ञा से श्रीकृष्ण का उन्हें जृम्भणास्त्रसे मोहित करके बाण की सेना का संहार करना

व्यासजी बोले – सर्वज्ञ संत्कुमार्जी ! आपने अनुग्रह करके प्रेमपूर्वक ऐसी अद्भुत और सुंदर कथा सुनायी है, जो शंकर की कृपा से ओतप्रोत है | अब मुझे शशिमौलि के उस उत्तम चरित्र के श्रवण करने की इच्छा है, जिसमें उन्होंने प्रसन्न होकर बाणासुर को गणाध्यक्षपद प्रदान किया था |

सनत्कुमारजीने कहा – व्यासजी ! परमात्मा शम्भु की उस कथाको, जिसमें उन्होंने प्रसन्न होकर बाणासुर को गणनायक बनाया था, आदरपूर्वक श्रवण करो | इसी प्रसंग में महाप्रभु शंकर का वह सुंदर चरित्र भी आयेगा, जिसमें उन्होंने बाणासुरपर अनुग्रह करके श्रीकृष्ण के साथ संग्राम किया था | व्यासजी ! दक्षप्रजापति की तेरह कन्याएँ कश्यप मुनि की पत्नियाँ थी | वे सब – की – सब पतिव्रता तथा सुशीला थीं | उनमें दिति सबसे बड़ी थी, जिसके लडके दैत्य कहलाते हैं | अन्य पत्नियों से भी देवता तथा चराचरसहित समस्त प्राणी पुत्ररूप से उत्पन्न हुए थे | जेष्ठ पत्नी दिति के गर्भ से सर्वप्रथम दो महाबली पुत्र पैदा हुए, उनमें हिरण्यकशिपु जेष्ठ था और उसके छोटे भाईका नाम हिरण्याक्ष था | हिरण्यकशिपु के चार पुत्र हुए | उन दैत्यश्रेष्ठों का क्रमश: ह्लाद, अनुह्लाद, संह्लाद और प्रह्लाद नाम था | उनमें प्रह्लाद जितेन्द्रिय तथा महान विष्णुभक्त हुए | उनका नाश करने के लिये कोई भी दैत्य समर्थ न हो सका | प्रह्लादका पुत्र विरोचन हुआ, वह दानियों में सर्वश्रेष्ठ था | उसने विप्ररूप से याचना करनेवाले इंद्र को अपना सिर ही दे डाला था | उसका पुत्र बलि हुआ | यह महादानी और शिवभक्त था | इसने वामनरूपधारी विष्णु को सारी पृथ्वी दान कर दी थी | बलिका औरस पुत्र बाण हुआ | वह शिवभक्त, मानी, उदार, बुद्धिमान, सत्यप्रतिज्ञ और सहस्त्रों का दान करनेवाला था | उस असुरराज ने पूर्वकाल में त्रिलोकी को तथा त्रिलोकाधिपतियों को बलपूर्वक जीतकर शोणितपुर में अपनी राजधानी बनाया और वहीँ रहकर राज्य करने लगा | उस समय देवगण शंकर की कृपा से उस शिवभक्त बाणासुर के किंकर के समान हो गये थे | उसके राज्य में देवताओं के अतिरिक्त और कोई प्रजा दु:खी नहीं थी | शत्रुधर्म का बर्ताव करनेवाले देवता शत्रुतावश ही कष्ट झेल रहे थे | एक समय वह महासुर अपनी सहस्त्रों भुजाओं से ताली बजाता हुआ तांडवनृत्य करके महेश्वर शिवको प्रसन्न करने की चेष्टा करने लगा | उसके उस नृत्यसे भक्तवत्सल शंकर संतुष्ट हो गये | फिर उन्होंने परम प्रसन्न हो उसकी ओर कृपादृष्टि से देखा | भगवान शंकर तो सम्पूर्ण लोकों के स्वामी, शरणागतवत्सल और भक्तवांछाकल्पतरु ही ठहरे | उन्होंने बलिनंदन महासुर बाण को वर देने की इच्छा प्रकट की |

मुने ! बलिनंदन महादैत्य बाण शिवभक्तों में श्रेष्ठ और परम बुद्धिमान था | उसने परमेश्वर शंकर को प्रणाम करके उनकी स्तुति की और कहा |

बाणासुर बोला – प्रभो ! आप मेरे रक्षक हो जाइये और पुत्रों तथा गणोंसहित मेरे नगर के अध्यक्ष बनकर सर्वथा प्रितिका निर्वाह करते हुए मेरे पास ही निवास कीजिये |

सनत्कुमारजी कहते है – महर्षे ! वह बलिपुत्र बाण निश्चय ही शिवजी की माया से मोहमें पड़ गया था, इसीलिये उसने मुक्ति प्रदान करनेवाले दुराराध्य महेश्वर को पाकर भी ऐसा वर माँगा | तब ऐश्वर्यशाली भक्तवत्सल शम्भू उसे वह वर देकर पुत्रों और गणों के साथ प्रेमपूर्वक वहीँ निवास करने लगे | एक बार बाणासुर को बड़ा ही गर्व हो गया | उसने तांडवनृत्य करके शंकर को संतुष्ट किया | जब बाणासुरको यह ज्ञात हो गया कि पार्वतीवल्लभ शिव प्रसन्न हो गये हैं, तब वह हाथ जोडकर सिर झुकाये हुए बोला |

बाणासुरने कहा – देवाधिदेव महादेव ! आप समस्त देवताओं के शिरोमणि हैं | आपकी ही कृपासे मैं बली हुआ हूँ | अब आप मेरा उत्तम वचन सुनिये | देव ! आपने जो मुझे एक हजार भुजाएँ प्रदान की हैं, ये तो अब मुझे महान भारस्वरूप लग रही है; क्योंकि इस जोडका और कोई योद्धा ही नहीं मिला | इसलिये वृषध्वज ! युद्ध के बिना इन पर्वत-सरीखी सहस्त्रों भुजाओं को लेकर मैं क्या करूँ | मैं अपनी इन परिपुष्ट भुजाओं की खुजली मिटाने के लिये युद्ध की लालसा से नगरों तथा पर्वतों को चूर्ण करता हुआ दिग्गजों के पास गया; परन्तु वे भी भयभीत होकर भाग खड़े हुए | मैंने यम को योद्धा, अग्निको महान कार्य करनेवाला, वरुण को गौओं का पालनकर्ता गोपाल, कुबेर को गजाध्यक्ष, निऋत्ति को सैरन्ध्री और इंद्र को जीतकर सदा के लिये करद बना लिया है | महेश्वर ! अब मुझे किसी ऐसे युद्ध के प्राप्त होने की बात बताइये, जिसमें मेरी ये भुजाएँ या तो शत्रुओं के हाथों से छूटे हुए शस्त्रास्त्रों से जर्जर होकर गिर जायँ अथवा हजारों प्रकार से शत्रु की भुजाओं को ही गिरायें | यही मेरी अभिलाषा है, इसे पूर्ण करने की कृपा करें |

सनत्कुमारजी कहते हैं – मुनिश्रेष्ठ ! उसकी बात सुनकर भक्तबाधापहारी तथा महामन्युस्वरूप रूद्र को कुछ क्रोध आ गया | तब वे महान अद्भुत अट्टहास करके बोले |

रूद्रने कहा – अरे अभिमानी ! सम्पूर्ण दैत्यों के कुल में नीच ! तुझे सर्वथा धिक्कार है, धिक्कार है ! तू बलिका पुत्र और मेरा भक्त है | तेरे लिये ऐसी बात कहना उचित नहीं है | अब तेरा दर्प चूर्ण होगा | तुझे शीघ्र ही मेरे समान बलवान के साथ अकस्मात महान भीषण युद्ध प्राप्त होगा | उस संग्राम में तेरी ये पर्वत-सरीखी भुजाएँ जलौनी लकड़ी की तरह शस्त्रास्त्रों से छिन्न-भिन्न होकर भूमिपर गिरेगी | दुष्टात्मन ! तेरे आयुधागारपर स्थापित तेरा जो यह मनुष्य के सिरवाला मयूरध्वज फहरा रहा है, इसका जब वायु-भय के बिना ही पतन हो जायगा, तब तू अपने चित्त में समझ लेना कि वह महान भयानक युद्ध आ पहुँचा है | उस समय तू घोर संग्रामका निश्चय करके अपनी सारी सेनाके साथ यहाँ जाना | इस समय तू अपने महल को लौट जा; क्योंकि इसीमें तेरा कल्याण है | दुर्मते ! यहाँ तुझे प्रसिद्ध बड़े-बड़े उत्पात दिखायी देंगे | यों कहकर गर्वहारी भक्तवत्सल भगवान शंकर चुप हो गये |

सनत्कुमारजी कहते हैं – मुने ! यह सुनकर बाणासुरने दिव्य पुष्पों की कलियों से अंजलि भरकर रूद्र की अभ्यर्चना की और फिर उन महादेव को प्रणाम करके वह अपने घरको लौट गया | तदनन्तर किसी समय दैववश उसका वह ध्वज अपने-आप टूटकर गिर गया | यह देखकर बाणासुर हर्षित हो युद्ध के लिये हो गया | वह अपने ह्रदय में विचार करने लगा कि कौन-सा युद्धप्रेमी योद्धा किस देश से आयेगा, जो नाना प्रकार के शस्त्रास्त्रों का पारगामी विद्वान होगा और मेरी शस्त्रों भुजाओं को ईधन की तरह काट डालेगा तथा मैं भी अपने अत्यंत तीखे शस्त्रों से उसके सैकड़ों टुकड़े कर डालूँगा | इसी समय शंकर की प्रेरणा से वह काल आ गया | एक दिन बाणासुरकी कन्या ऊषा वैशाख मासमें माधव की पूजा करके मांगलिक श्रृंगारसे सुसज्जित हो रातके समय अपने गुप्त अंत:पुर में सो रही थी, उसीसमय वह स्त्रीभाव – (कामभाव) प्राप्त हो गयी | तब देवी पार्वती की शक्ति से ऊषा को स्वप्न में श्रीकृष्ण के पौत्र अनिरुद्ध का मिलन प्राप्त हुआ | जागनेपर वह व्याकुल हो गयी और उसने अपनी सखी चित्रलेखा से स्वप्न में मिले हुए उस पुरुष को ला देने के लिये कहा |

तब चित्रलेखाने कहा – देवि ! तुमने स्वप्न में जिस पुरुष को देखा है, उसे भला, मैं कैसे ला सकती हूँ, जब कि मैं उसे जानती ही नहीं | उसके यों कहनेपर दैत्यकन्या ऊषा प्रेमांध होकर मरनेपर उतारू हो गयी, तब उस दिन उसकी उस सखीने उसे बचाया | मुनिश्रेष्ठ ! कुम्भांडकी पुत्री चित्रलेखा बड़ी बुद्धिमती थी, वह बाणतनया ऊषा से पुन: बोली |

चित्रलेखाने कहा – सखी ! जिस पुरुषने तुम्हारे मनका अपहरण किया है, उसे बताओ तो सही | वह यदि त्रिलोकी में कहीं भी होगा तो मैं उसे लाऊँगी और तुम्हारा कष्ट दूर करूँगी |

सनत्कुमारजी कहते हैं – महर्षे ! यों कहकर चित्रलेखाने वस्त्र के परदेपर देवताओं, दैत्यों, दानवों, गन्धर्वो, सिद्धो, नागों और यक्ष आदि के चित्र अंकित किये | फिर वह मनुष्यों का चित्र बनाने लगी | उनमें वृष्णिवंशियों का प्रकरण आरम्भ होनेपर उसने शुरू, वसुदेव, राम, कृष्ण और नरश्रेष्ठ प्रद्युम्न का चित्र बनाया | फिर जब उसने प्रद्युम्ननंदन अनिरुद्ध का चित्र खींचा, तब उसे देखकर ऊषा लज्जित हो गयी | उसका मुख अवनत हो गया और ह्रदय हर्ष से परिपूर्ण हो गया |

ऊषा कहा – सखी ! रात में जो मेरे पास आया था और जिसने शीघ्र ही मेरे चित्तरूपी रत्न को चुरा लिया है, वह चोर पुरुष यही है | तदनन्तर ऊषा के अनुरोध करनेपर चित्रलेखा जेष्ठ कृष्ण चतुर्दशी को तीसरे पहर द्वारकापुरी पहुँचकर क्षणमात्र में ही पलंगपर बैठे हुए अनिरुद्ध को महलमें से उठा लायी | वह दिव्य योगिनी थी | ऊषा अपने प्रियतम को पाकर प्रसन्न हो गयी | इधर अंत:पुर के द्वार की रक्षा करनेवाले बेतधारी पहरेदारों ने चेष्टाओं से तथा अनुमान से इस बातको लक्ष्य कर लिया | उन्होंने एक दिव्य शरीरधारी, दर्शनीय, साहसी तथा समरप्रिय नवयुवक को कन्या के साथ दु:शीलताका आचरण करते हुए देख भी लिया | उसे देखकर कन्या के अंत:पुर की रक्षा करनेवाले उन महाबली पुरुषों ने बलिपुत्र बाणासुर के पास जाकर सारी बातें निवेदन करते हुए कहा |

द्वारपाल बोले – देव ! पता नहीं, आपके अंत:पुर में बलपूर्वक प्रवेश करके कौन पुरुष छिपा हुआ है | वह इंद्र तो नहीं है, जो वेश बदलकर आपकी कन्या का उपभोग कर रहा है ? महाबाहू दानवराज ! उसे यहाँ देखिये, देखिये और जैसा उचित समझिये वैसा कीजिये | इसमें हमलोगों का कोई दोष नहीं है |

सनत्कुमारजी कहते हैं – मुनिश्रेष्ठ ! द्वारपालों का वह वचन तथा कन्या के दूषित होनेका कथन सुनकर महाबली दानवराज बाण आश्चर्यचकित हो गया | तदनन्तर वह कुपित होकर अंत:पुर में जा पहुँचा | वहाँ उसने प्रथम अवस्था में वर्तमान दिव्य शरीरधारी अनिरुद्ध को देखा | उसे महान आश्चर्य हुआ | फिर उसने उसका बल देखने के लिये दस हजार सैनिकों को भेजकर आज्ञा दी की इसे मार डालो | सेनाने अनिरुद्धपर आक्रमण किया | तब अनिरुद्ध ने बात-की-बात में दस हजार सैनिकों को काल के हवाले कर दिया | फिर तो असंख्य सेना-पर-सेना आने लगी और अनिरुद्ध उन्हें कालका ग्रास बनाने लगे |तदनन्तर उन्होंने बाणासुर का वध करने के लिये एक शक्ति हाथ में ली, जो कालाग्नि के समान भयंकर थी | फिर महावीर बलिपुत्र बाणासुर ने, जो महान बलसम्पन्न तथा शिवभक्त था, छलपूर्वक नागपाश से अनिरुद्ध को बाँध लिया | तत्पश्चात बाण कुपित होकर महाबली सूतपुत्र से बोला |

बाणासुरने कहा – सूतपुत्र ! घास-फूस से ढके हुए आगाध कुएँ में ढकेलकर इस पापी को मार डाल | अधिक क्या कहूँ, इसे सर्वथा मार ही डालना चाहिये |

सनत्कुमारजी कहते हैं – मुने ! उसकी यह बात सुनकर उत्तम मंत्रियों से श्रेष्ठ धर्मबुद्धि निशाचर कुम्भांडने बाणासुरसे कहा |

कुम्भांड बोला – देव ! थोडा विचार तो कीजिये | मेरी समझसे तो वह कर्म करना उचित नहीं प्रतीत होता; क्योंकि इसके मारे जानेपर अपना आत्मा ही आहत हो जायगा | पराक्रममें तो यह विष्णु के समान दीख रहा है | जान पड़ता हैं, आपपर कुपित होकर चंद्रचूड़ने अपने उत्तम तेजसे इसे बढा दिया है | साहस में यह शशिमौलि की समानता कर रहा है; क्योंकि इस अवस्थाको पहुँच जानेपर भी यह पुरुषार्थपर ही डटा हुआ है , तथापि यह हमलोगों को तृणवत ही समझ रहा है |

सनत्कुमारजी कहते हैं – व्यासजी ! दानव कुम्भांड राजनीति के ज्ञाताओं में श्रेष्ठ था | वह बाण से ऐसा कहकर फिर अनिरुद्ध से कहने लगा |

कुम्भांड ने कहा – नराधम ! अब तू वीरवर दैत्यराज की स्तुति कर और दीन वाणीसे ‘मैं हार गया’ यों बारंबार कहकर उन्हें हाथ जोडकर नमस्कार कर | ऐसा करनेपर ही तू मुक्त हो सकता हैं |

अनिरुद्धने कहा – दुराचारी निशाचर ! तुझे क्षत्रिय-धर्म का ज्ञान नहीं है | अरे ! शूरवीर के लिये दीनता दिखाना और युद्ध से मुख मोडकर भागना मरण से भी बढकर कष्टदायक होता है | विरमानी क्षत्रिय के लिये रणभूमि से सदा सम्मुख लड़ते हुए मरणा ही श्रेयस्कर है, भूमिपर पड़कर हाथ जोड़े हुए दीन की तरह मरणा कदापि नहीं |

सनत्कुमारजी कहते है – मुने ! उसी समय समस्त वीरों के, अनिरुद्ध के और मंत्री कुम्भांड के सुनते-सुनते बाणासुर के आश्वासनार्थ आकाशवाणी हुई |

आकाशवाणीने कहा – महाबली बाण ! तुम बलि के पुत्र हो, अत: थोडा विचार तो करो | परम बुद्धिमान शिवभक्त ! तुम्हारे लिये क्रोध करना उचित नहीं है | शिव समस्त प्राणियों के ईश्वर, कर्मो के साक्षी और परमेश्वर हैं | यह सारा चराचर जगत उन्हीं के अधीन है | वे ही सदा रजोगुण, सत्त्वगुण और तमोगुण का आश्रय लेकर ब्रह्मा, विष्णु और रुद्ररूप से लोकों की सृष्टि, भरण-पोषण और संहार करते हैं | वे सर्वान्तर्यामी, सर्वेश्वर, सबके प्रेरक, सर्वश्रेष्ठ, विकाररहित, अविनाशी, नित्य और मायाधीश होनेपर भी निर्गुण है | बलि के श्रेष्ठ पुत्र ! उनकी इच्छासे निर्बल को भी बलवान समझना चाहिये | महामते ! नाना प्रकारकी लीलाओं के रचने में निपुण भक्तवत्सल भगवान शंकर गर्व को मिटा देनेवाले हैं | वे इस समय तुम्हारे गर्वको चूर कर देंगे |

अनिरुद्धने कहा – शरणागतवत्सले ! आप यश प्रदान करनेवाली है, आपका रोष बड़ा उग्र होता है | देवि ! मैं नागपाश से बंधा हुआ हूँ और नागों की विषज्वालासे संतप्त हो रहा हूँ; अत: शीघ्र पधारिये और मेरी रक्षा कीजिये |

सनत्कुमारजी कहते हैं – मुनीश्वर ! जब अनिरुद्ध ने पिसे हुए काले कोयले के समान कृष्णवर्णवाली काली को इसप्रकार संतुष्ट किया, तब जेष्ठ कृष्ण चतुर्दशीकी महारात्रि में वहाँ प्रकट हुई | उन्होंने उन सर्परूपी भयानक बाणों को भस्मसात करके अपने बलिष्ठ मुक्कों के आघात से उस नाग-पंजरको विदीर्ण कर दिया | इसप्रकार दुर्गाने अनिरुद्ध को बंधनमुक्त करके उन्हें पुन: अंत:पुर में पहुँचा दिया और स्वयं यहीं अन्तर्धान हो गयी |इसप्रकार शिव की शक्तिस्वरूपा देवीकी कृपासे अनिरुद्ध कष्ट से छुट गये, उनकी सारी व्यथा मिट गयी और वे सुखी हो गये | इधर तो श्रीकृष्ण और श्रीशिव का बड़ा भयानक युद्ध हुआ | दोनों ओरसे ज्वर छोड़े गये | अंत में श्रीकृष्ण ने स्वयं श्रीरुद के पास आकर उनका स्तवन करके कहा – ‘सर्वव्यापी शंकर ! आप गुणों से निर्लिप्त होकर भी गुणों से ही गुणों को प्रकाशित करते हैं | गिरिशायी भूमन ! आप स्वप्रकाश हैं | जिनकी बुद्धि आपकी मायासे मोहित हो गयी है, वे स्त्री, पुत्र, गृह आदि विषयों में आसक्त होकर दुःखसागर में डूबता उतराते हैं | जो अजितेन्द्रिय पुरुष प्रारब्धवश इस मनुष्य-जन्म को पाकर भी आपके चरणों में प्रेम नहीं करता, वह शोचनीय तथा आत्मवंचक है | भगवन ! आप गर्वहारी हैं, आपने ही तो इस गर्वीले बाण को शाप दिया था; अत: आपकी ही आज्ञासे मैं बाणासुर की भुजाओं का छेदन करने के लिये यहाँ आया हूँ | महादेव ! आप इस युद्ध से निवृत्त हो जाइये | और आज्ञा प्रदान कीजिये की बाण की भुजाओं को काटने की, जिससे आपका शाप व्यर्थ न हो |’

महेश्वर ने कहा – तात ! आपने ठीक ही कहा है कि मैंने ही इस दैत्यराज को शाप दिया है और मेरी ही आज्ञासे आप बाणासुर की भुजाएँ काटने के लिये यहाँ पधारे हैं; किन्तु रमानाथ ! हरे ! क्या करूँ, मैं तो सदा भक्तों के ही अदीन रहता हूँ | ऐसी दशामें वीर ! मेरे देखते बाण की भुजाएँ कैसे काटी जा सकती हैं ? इसलिये मेरी आज्ञा से आप पहले जृम्भणास्त्रद्वारा मुझे जृम्भित कर दीजिये, तत्पश्चात अपना अभीष्ट कार्य सम्पन्न कीजिये |

सनत्कुमारजी कहते है – मुनीश्वर ! शंकरजी के यों कहनेपर शारंगपाणि श्रीहरि को महान विस्मय हुआ | वे अपने युद्ध-स्थानपर आकर परम आनंदित हुए | व्यासजी ! तदनन्तर नाना प्रकार के अस्त्रों के संचालन में निपुण श्रीहरि ने तुरंत ही अपने धनुषपर जृम्भणास्त्रद्वारा जृम्भित हुए शंकर को मोह में डालकर खड्ग, गदा और ऋष्टि आदिसे बाण की सेना का संहार करने लगे |

– ॐ नम: शिवाय –

विष्णुपुराण – तृतीय अंश – ११ से १२

Beautiful golden sunrise
ॐ श्री मन्नारायणाय नम:
नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम | देवी सरस्वती व्याप्तं ततो जयमुदिरयेत ||

श्रीविष्णुपुराण

तृतीय अंश

अध्याय – ग्यारहवाँ – बारहवाँ

ग्रहस्थसम्बन्धी सदाचार का वर्णन

और्व बोले – गृहस्थ पुरुष को नित्यप्रति देवता, गौ, ब्राह्मण, सिद्धगण, वयोवृद्ध तथा आचार्य की पूजा करनी चाहिये और दोनों समय संध्यावन्दन तथा अग्निहोत्रादि कर्म करने चाहिये || १ || गृहस्थ पुरुष सदा ही संयमपूर्वक रहकर बिना कहींसे कटे हुए दो वस्त्र, उत्तम औषधियाँ और गारुड (मरकत आदि विष नष्ट करनेवाले) रत्न धारण करे || २ || वह केशों को स्वच्छ और चिकना रखे तथा सर्वदा सुगंधयुक्त सुंदर वेष और मनोहर श्वेतपुष्प धारण करें || ३ || किसीका थोडा-सा भी धन हरण न करें और थोडा-सा भी अप्रिय भाषण न करे | जो मिथ्या हो ऐसा प्रिय वचन भी कभी न बोले और न कभी दूसरों के दोषों को ही कहे || ४ || हे पुरुषश्रेष्ठ ! दूसरों की स्त्री अथवा दूसरों के साथ वैर करने में कभी रूचि न करे, निन्दित सवारी में कभी न चढ़े और नदीतीर की छाया का कभी आश्रय न ले || ५ || बुद्धिमान पुरुष लोकविदिष्ट, पतित, उन्मत्त और जिसके बहुत-से शत्रु हों ऐसे परपीडक पुरुषों के साथ तथा कुलटा, कुलटा के स्वामी, क्षुद्र, मिथ्यावादी अति व्ययशील, निंदापरायण और दुष्ट पुरुषों के साथ कभी मित्रता न करे और न कभी मार्ग में अकेला चले || ६ – ७ || हे नरेश्वर ! जलप्रवाह के वेग में सामने पड़कर स्नान न करे, जलते हुए घरमे प्रवेश न करे और वृक्ष की चोटीपर न चढ़े || ८ || दाँतो को परस्पर न घिसे, नाक को न कुरेदे तथा मुख को बंद लिये हुए जमुहाई न ले और न बंद मुखसे खाँसे या श्वास करते हुए अधोवायु न छोड़े; तथा नखों को न चबावे, तिनका न तोड़ें और पृथ्वीपर भी न लिखे || १० ||

हे प्रभो ! विचक्षण पुरुष मूँछ-दाढ़ी के बालों को न चबावे, दो ढेलों को परस्पर न रगड़े और अपवित्र एवं निन्दित नक्षत्रों को न देखे || ११ || नग्न परस्त्री को और उदय अथवा अस्त होते हुए सूर्य को न देखे तथा शव और शव – गंध से घृणा न करे, क्योंकि शव – गंध सोम का अंश है || १२ || चौराहा, चैत्यवृक्ष, श्मशान, उपवन और दुष्टा स्त्री की समीपता – इन सबका रात्रि के समय सर्वदा त्याग करे || १३ || बुद्धिमान पुरुष अपने पूजनीय देवता, ब्राह्मण और तेजोमय पदार्थों की छाया को कभी न लाँघे तथा शून्य वनखंडी और शून्य घरमें कभी अकेला न रहे || १४ || प्राज्ञ पुरुष को चाहिये कि अनार्य व्यक्ति का संग न करे, कुटिल पुरुष में आसक्त न हो, सर्प के पास न जाय और जग पड़नेपर अधिक देरतक लेटा न रहे || १३ || हे नरेश्वर ! बुद्धिमान पुरुष जागने, सोने, स्नान करने, बैठने, शय्यासेवन करने और व्यायाम करने में अधिक समय न लगावे || १७ || हे राजेन्द्र ! प्राज्ञ पुरुष दाँत और सींगवाले पशुओं को, ओस को तथा सामनेकी वायु और धूप को सर्वदा परित्याग करे ||१८ || नग्न होकर स्नान, शयन और आचमन न करे तथा केश खोलकर आचमन और देव-पूजन न करे || १९ || होम तथा देवार्चन आदि क्रियाओं में, आचमन में , पुण्याहवाचन में और जप में एक वस्त्र धारण करके प्रवृत्त न हो || २० || संशयशील व्यक्तियों के साथ कभी न रहे | सदाचारी पुरुषों का तो आधे क्षण का संग भी अति प्रशंसनीय होता है || २१ || बुद्धिमान पुरुष उत्तम अथवा अधम व्यक्तियों से विरोध न करे | हे राजन ! विवाह और विवाद सदा समान व्यक्तियों से ही होना चाहिये || २२ || प्राज्ञ पुरुष कलह न बढ़ावे तथा व्यर्थ वैर का भी त्याग करे | थोड़ी-सी हानि सह ले, किन्तु वैर से कुछ लाभ होता हो तो उसे भी छोड़ दे || २३ || स्नान करने के अनन्तर स्नान से भीगी हुई धोती अथवा हाथों से शरीर को न पोछे तथा खड़े-खड़े केशों को न झाडे और आचमन भी न करे || २४ || पैर के ऊपर पैर न रखे, गुरुजनों के सामने पैर न फैलावे और धृष्टतापूर्वक उनके सामने कभी उच्चासनपर न बैठे || २५ ||

देवालय, चौराहा, मांगलिक द्रव्य और पूज्य व्यक्ति – इन सबको बायीं ओर रखकर न निकले तथा इनके विपरीत वस्तुओं को दायीं ओर रखकर न जाय || २६ || चन्द्रमा, सूर्य, अग्नि, जल, वायु और पूज्य व्यक्तियों के सम्मुख पंडित पुरुष मल – मूत्र – त्याग न करे और न थूके ही || २७ || खड़े- खड़े अथवा मार्ग में मूत्र-त्याग न करे तथा श्लेष्मा (थूक), विष्ठा, मूत्र और रक्त को कभी न लाँघे || २८ || भोजन, देव-पूजा, मांगलिक कार्य और जप-होमादि के समय तथा महापुरुषों के सामने थूकना और छींकना उचित नहीं है || २९ || बुद्धिमान पुरुष स्त्रियों का अपमान न करे, उनका विश्वास भी न करे तथा उनसे ईर्ष्या और उनका तिरस्कार भी कभी न करे || ३० || सदाचार – परायण प्राज्ञ व्यक्तियों का अभिवादन किये बिना कभी अपने घरसे न निकले || ३१ || चौराहों को नमस्कार करे, यथासमय अग्निहोत्र करे, दीन-दु:खियों का उद्धार करे और बहुश्रुत साधू पुरुषों का सत्संग करे || ३२ ||

जो पुरुष देवता और ऋषियों की पूजा करता है, पितृगण को पिंडोदक देता है और अतिथि का सत्कार करता है वह पुण्यलोकों को जाता है || ३३ || जो व्यक्ति जितेन्द्रिय होकर समयानुसार हित, मित और प्रिय भाषण करता है, हे राजन ! वह आनंद के हेतुभूत अक्षय लोकों को प्राप्त होता है || ३४ || बुद्धिमान, लज्जावान, क्षमाशील, आस्तिक और विनयी पुरुष विद्वान और कुलीन पुरुषों के योग्य उत्तम लोकों में जाता है || ३५ || अकाल मेघगर्जना के समय, पर्व-दिनोंपर, अशौच काल में तथा चन्द्र और सूर्यग्रहण के समय बुद्धिमान पुरुष अध्ययन न करे || ३६ || जो व्यक्ति क्रोधित को शांत करता है, सबका बन्धु है, मत्सरशून्य है, भयभीत को सांत्वना देनेवाला है और साधू स्वभाव है उसके लिये स्वर्ग तो बहुत थोडा फल है || ३७ || जिसे शरीर-रक्षा की इच्छा हो वह पुरुष वर्षा और धुप में छाता लेकर निकले, रात्रि के समय और वन में दंड लेकर जाय तथा जहाँ कहीं जाना हो सर्वदा जूते पहनकर जाय || ३८ || बुद्धिमान पुरुष को कमर की ओर, इधर-उधर अथवा दूर के पदार्थों को देखते हुए नहीं चलना चाहिये, केवल युगमात्र (चार हाथ) पृथ्वी को देखता हुआ चले || ३९ ||

जो जितेन्द्रिय दोषके समस्त हेतुओं को त्याग देता है उसके धर्म, अर्थ और कामकी थोड़ी-सी भी हानि नहीं होती || ४० || जो विद्या-विनय-सम्पन्न, सदाचारी प्राज्ञ पुरुष पापी के प्रति पापमय व्यवहार नहीं करता, कुटिल पुरुषों से प्रिय भाषण करता हैं तथा जिसका अंत:करण मैत्री से द्रवीभूत रहता हैं, मुक्ति उसकी मुट्ठी में रहती है || ४१ || जो वीतरागमहापुरुष कभी काम, क्रोध और लोभादिके वशीभूत नहीं होते तथा सर्वदा सदाचार में स्थित रहते हैं उनके प्रभाव से ही पृथ्वी टिकी हुई है || ४२ || अत: प्राज्ञ पुरुष को वही सत्य कहना चाहिये जो दूसरों की प्रसन्नता का कारण हो | यदि किसी सत्य वाक्य के कहने से दूसरों को दुःख होता जाने तो मौन रहे || ४३ || यदि प्रिय वाक्य को भी अहितकर समझे तो उसे न कहे; उस अवस्था में तो हितकर वाक्य ही कहना अच्छा है, भले ही वह अत्यंत अप्रिय क्यों न हो || ४४ || जो कार्य इहलोक और परलोक में प्राणियों के हितका साधक हो मतिमान पुरुष मन, वचन और कर्म से उसीका आचरण करें || ४५  ||

इति श्रीविष्णुपुराणे तृतीयेऽशे एकादशोऽध्यायः और द्वादशोऽध्यायः

शिवपुराण – १७८

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श्रीपुराणपुरुषोत्तमाय नम :
ॐ श्री गणेशाय नम:
भवाब्धिमग्नं दिनं मां समुन्भ्दर भवार्णवात | कर्मग्राहगृहीतांग दासोऽहं तव् शंकर ||

श्री शिवपुराण – माहात्म्य

रूद्रसंहिता, पंचम ( युद्ध ) खंड

अध्याय – १७८

शुक्राचार्य की घोर तपस्या और इनका शिवजी को चित्ररत्न अर्पण करना तथा अष्टमृर्त्यष्टक – स्तोत्रद्वारा उनका स्तवन करना, शिवजी का प्रसन्न होकर मृतसंजीवनी विद्या प्रदान करना

सनत्कुमारजी कहते है – व्यासजी ! मुनिवर शुक्राचार्य को शिव से मृत्यंजय नामक मृत्युका प्रशमन करनेवाली परा विद्या किस प्रकार प्राप्त हुई थी, अब उसका वर्णन करता हूँ; सुनो |
पूर्वकाल की बात है, इन भृगुनन्दन ने वाराणसीपूरी में जाकर प्रभावशाली विश्वनाथ का ध्यान करते हुए बहुत कालतक घोर तप किया था | वेदव्यासजी ! उस समय उन्होंने वहीँ एक शिवलिंग की स्थापना की और उसके सामने ही एक परम रमणीय कूप तैयार कराया | फिर प्रयत्नपूर्वक उन देवेश्वर को एक लाख बार द्रोणभर पंचामृत से तथा बहुत-से सुगन्धित द्रव्यों से स्नान कराया | फिर एक हजार बार परम प्रीतिपूर्वक चन्दन, वक्षकर्दम [ एक प्रकार का अंग-लेप, जो कपूर, अगुरु, कस्तुरी को मिलाकर बनाया जाता है ] और सुगन्धित उबटन का उस लिंगपर अनुलेप किया | तत्पश्चात सावधानी के साथ परम प्रेमपूर्वक राजचम्पक (अमलतास), धतुर, कनेर, कमल, मालती, कर्णिकार, कदम्ब, मौलसिरी, उत्पल, मल्लिका (चमेली), शतपत्री, सिंधुवार, ढाक, बन्धुकपुष्प (गुलदुपहरी), पुंनाग, नागकेशर, केसर, नवमल्लिक (बेलमोगरा), चिबिलिक (रक्तदला), कुंद (माघपुष्प), मुचुकुन्द (मोतिया), मन्दार, बिल्वपत्र, गूमा, मरुवृक (मरुआ), वृक (धुप), गँठिवन, दौना, अत्यंत सुंदर आमके पल्लव, तुलसी, देवजवासा, बृहत्पत्री, कुशांकू, नंदावर्त (नांदरुख), अगस्त्य, साल, देवदारु, कचनार, कुरबक (गुलखेरा ), दुर्वांकुर, कुरंटक (करसैला) – इनमें से प्रत्येक के पुष्पों और अन्य पल्लवों से तथा नाना प्रकार के रमणीय पत्रों और सुंदर कमलों से शंकरजी की विधिवत अर्चना की | उन्हें बहुत-से उपहार समर्पित किये | तथा शिवलिंग के आगे नाचते हुए शिवसहस्त्रनाम एवं अन्यान्य स्तोत्रों का गान करके शंकरजी का स्तवन किया | इस प्रकार शुक्राचार्य पाँच हजार वर्षोतक नाना प्रकार के विधि-विधान से महेश्वर का पूजन करते रहे; परन्तु जब उन्हें थोडा-सा भी वर देने के लिये उद्यत होते नहीं देखा, तब उन्होंने एक-दूसरे अत्यंत दुस्सह एवं घोर नियमका आश्रय लिया | उससमय शुक्र ने इन्दिर्योंसहित मन के अत्यंत चंचलतारूपी महान दोष को बारंबार भावनारूपी जल से प्रक्षालित किया | इस प्रकार चित्तरत्न को निर्मल करके उसे पिनाकधारी शिव के अर्पण कर दिया और स्वयं घूमकण का पान करते हुए तप करने लगे | इसप्रकार उनके एक सहस्त्र वर्ष और बीत गये | तब भृगुनन्दन शुक्र को यों दृढ़चित्त से घोर तप करते देखकर महेश्वर उनपर प्रसन्न हो गये | फिर तो दक्षकन्या पार्वती के स्वामी साक्षात् विरूपाक्ष शंकर, जिनके शरीर की कान्ति सहस्त्रों सूर्यों से भी बढकर थी, उस लिंग से निकलकर शुक्र से बोले |

महेश्वर ने कहा – महाभाग भृगुनन्दन ! तुम तो तपस्या की निधि हो | महामुने ! मैं तुम्हारे इस अविच्छिन्न तप से विशेष प्रसन्न हूँ | भार्गव ! तुम अपना सारा मनोवांछित वर माँग लो | मैं प्रीतिपूर्वक तुम्हारा सारा मनोरथ पूर्ण कर दूँगा | अब मेरे पास तुम्हारे मनोरथ पूर्ण कर दूँगा | अब मेरे पास तुम्हारे लिये कोई वस्तु अदेय नहीं रह गयी है |

सनत्कुमारजी कहते हैं– मुने ! शम्भु के इस परम सुखदायक एवं उत्कृष्ट वचन को सुनकर शुक्र प्रसन्न हो आनंद समुद्र में निमग्न हो गये | उन कमलनयन द्विजवर शुक्र का शरीर परमानन्द जनित रोमांचके कारण पुलकायमान हो गया | तब उन्होंने हर्षपूर्वक शम्भु के चरणों में प्रणाम किया | उस समय उनके नेत्र हर्ष से खिल उठे थे | फिर वे मस्तकपर अंजलि रखकर जय-जयकार करते हुए अष्टमूर्तिधारी [ पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, यजमान, चन्द्रमा और सूर्य – इन आठों में अधिष्ठित शर्व, भव, रूद्र, उग्र, भीम, पशुपति, महादेव और ईशान – ये अष्टमूर्तियों के नाम है | ] वरदायक शिवकी स्तुति करने लगे |

अष्टमुर्त्यष्टका स्त्रोत्र –

भार्गव ने कहासूर्यस्वरूप भगवन ! आप त्रिलोकी का हित करनेके लिये आकाश में प्रकाशित होते है और अपनी इन किरणों से समस्त अंधकार को अभिभूत करके रातमें विचरनेवाले असुरों का मनोरथ नष्ट कर देते हैं | जगदीश्वर ! आपको नमस्कार है | घोर अन्धकार के लिये चन्द्रस्वरूप शंकर ! आप अमृत के प्रवाह से परिपूर्ण तथा जगत के सभी प्राणियों के नेत्र है | आप अपनी अमर्याद तेजोमय किरणों से आकाश में और भूतलपर अपार प्रकाश फैलाते हैं, जिससे सारा अन्धकार दूर हो जाता हैं; आपको प्रणाम है | सर्वव्यापिन ! आप पावन पथ – योगमार्ग का आश्रय लेनेवालों की सदा गति तथा उपास्यदेव हैं | भुवन-जीवन ! आपके बिना भला, इस लोकमें कौन जीवित रह सकता हैं | सर्पकुल के संतोषदाता ! आप निश्चल वायुरूप से सम्पूर्ण प्राणियों की वृद्धि करनेवाले है, आपको अभिवादन है | विश्व के एकमात्र पावनकर्ता ! आप शरणागतरक्षक और अग्नि की एकमात्र शक्ति है | पावक आपका ही स्वरूप है | आपके बिना मृतकों का वास्तविक दिव्य कार्य दाह आदि नहीं हो सकता | जगत के अंतरात्मा ! आप प्राण –शक्ति के दाता, जगत्स्वरूप और पद-पदपर शान्ति प्रदान करनेवाले है; आपके चरणों में मैं सिर झुकाता हूँ | जलस्वरूप परमेश्वर ! आप निश्चय ही जगत के पवित्रकर्ता और चित्रविचित्र सुंदर चरित्र करनेवाले हैं | विश्वनाथ ! जलमें अवगाहन करने से आप विश्वको निर्मल एवं पवित्र बना देते हैं, इसलिये आपको नमस्कार है | आकाशरूप ईश्वर ! आपसे अवकाश प्राप्त करने के कारण यह विश्व बाहर और भीतर विकसित होकर सदा स्वभाववश श्वास लेता है अर्थात इसकी परम्परा चलती रहती है तथा आपके द्वारा यह संकुचित भी होता है अर्थात नष्ट हो जाता है, इसलिये दयालु भगवन ! मैं आपके आगे नतमस्तक होताहूँ | विश्वम्भरात्मक ! आप ही इस विश्वका भरण-पोषण करते हैं | सर्वव्यापिन ! आपके अतिरिक्त दूसरा कौन अज्ञानान्धकार को दूर करनेमें समर्थ हो सकता है | अत: विश्वनाथ ! आप मेरे अज्ञानरूपी तमका विनाश कर दीजिये | नागभूषण ! आप स्तवनीय पुरुषों में सबसे श्रेष्ठ हैं | इसलिये आप परात्पर प्रभु को मैं बारंबार प्रणाम करता हूँ | आत्मस्वरूप शंकर ! आप समस्त प्राणियों के अंतरात्मा में निवास करनेवाले, प्रत्येक रूप म व्याप्त है और मैं आप परमात्माका जन हूँ | अष्टमूर्ते ! आपकी इन रूप-परम्पराओं से यह चराचर विश्व विस्तार को प्राप्त हुआ है, मुक्तपुरुषों के बन्धो ! आप विश्व के समस्त प्राणियों के स्वरूप, प्रणतजनों के सम्पूर्ण योगक्षेम का निर्वाह करनेवाले और परमार्थ-स्वरूप है | आप अपनी इन अष्टमूर्तियों से युक्त होकर इस फैले हुए विश्वको भलिभाँति विस्तृत करते अहिं, अत: आपको मेरा अभिवादन है |

सनत्कुमारजी कहते हैं – मुनिवर ! भृगुनन्दन शुक्र ने इसप्रकार अष्टमुर्त्यष्टक –स्तोत्रद्वारा शिवजी का स्तवन करके भूमिपर मस्तक रखकर उन्हें बारंबार प्रणाम किया | जब अमित तेजस्वी भार्गवने महादेव की इस प्रकार स्तुति की, तब शिवजी ने चरणों में पड़े हुए उन द्विजवर को अपनी दोनों भुजाओं से पकडकर उठा लिया और परम प्रेमपूर्वक मेघगर्जन की-सी गम्भीर एवं मधुर वाणी में कहा | उससमय शंकरजी के दाँतो की चमक से सारी दिशाएँ प्रकाशित हो उठी थी |

महादेवजी बोले – विप्रवर कवे ! तुम मेरे पावन भक्त हो | तात ! तुम्हारे इस उग्र तपसे, उत्तम आचरणसे, लिंगस्थापनजन्य पुण्यसे, लिंग की आराधना करने से, चित्तका उपहार प्रदान करनेसे, पवित्र अटल भावसे, अविमुक्त महाक्षेत्र काशी में पावन आचरण करने से मैं तुम्हें पुत्ररूप से देखता हूँ; अत: तुम्हारे लिये मुझे कुछ भी अदेय नहीं हैं | तुम अपने इसी शरीरसे मेरी उदरदरी में प्रवेश करोगे और मेरे श्रेष्ठ इन्द्रियमार्ग से निकलकर पुत्ररूप में जन्म ग्रहण करोगे | महाशुछे ! मेरे पास जो मृतसंजीवनी नामकी निर्मल विद्या है, जिसका मैंने ही अपने महान तपोबल से निर्माण किया है, उस महामंत्ररूपा विद्याको आज मैं तुम्हे प्रदान करूँगा; क्योंकि तुम पवित्र तपकी निधि हो, अत: तुममें उस विद्याको धारण करनेकी योग्यता वर्तमान है | तुम नियमपूर्वक जिस-जिसके उद्देश्यसे विद्येश्वर की इस श्रेष्ठ विद्याका प्रयोग करोगे, वह निश्चय ही जीवित हो जायगा – यह सर्वथा सत्य है | तुम आकाश में अत्यंत दीप्तिमान तारारूप से स्थित होओगे | तुम्हारा तेज सूर्य और अग्नि के तेजका भी अतिक्रमण कर जायगा | तुम ग्रहों में प्रधान माने जाओगे | जो स्त्री अथवा पुरुष तुम्हारे सम्मुख रहनेपर यात्रा करेंगे, उनका सारा कार्य तुम्हारी दृष्टि पड़ने से नष्ट हो जायगा | सुव्रत ! तुम्हारे उदय होनेपर जगत में मनुष्यों के विवाह आदि समस्त धर्मकार्य सफल होंगे | सभी नंदा (प्रतिपदा, षष्ठी और एकादशी ) तिथियाँ तुम्हारे संयोग से शुभ हो जायँगी और तुम्हारे भक्त वीर्यसम्पन्न तथा बहुत-सी सन्तानवाले होंगे | तुम्हारे द्वारा स्थापित किया हुआ यह शिवलिंग ‘शुक्रेश’ के नामसे विख्यात होगा | जो मनुष्य इस लिंग की अर्चना करेंगे, उन्हें सिद्धि प्राप्त हो जायगी | जो लोग वर्षपर्यन्त नक्तव्रतपरायण होकर शुक्रवार के दिन शुक्रकूप के जलसे सारी क्रियाएँ सम्पन्न केक शुक्रेश की अर्चना करेंगे, उन्हें जिस फलकी प्राप्ति होगी, वह मुझसे श्रवण करो |

उन मनुष्यों में वीर्य की अधिकता होगी, उनका वीर्य कभी निष्फल नहीं होगा, वे पुत्रवान तथा पुरुषत्व के सौभाग्यसे सम्पन्न होंगे | इसमें तनिक भी संदेह नहीं है | वे सभी मनुष्य बहुत-सी विद्याओं के ज्ञाता और सुख के भागी होंगे | यों वरदान देकर महादेव उसी लिंग में समा गये | तब भृगुनन्दन शुक्र भी प्रसन्नमन से अपने धामको चले गये | व्यासजी ! यों शुक्राचार्य को जिसप्रकार अपने तपोबल से मृत्युंजय नामक विद्या की प्राप्ति हुई थी, वह वृतांत मैंने तुमसे वर्णन कर दिया |

– ॐ नम: शिवाय –