Category Archives: Bhavishya Puran

भविष्यपुराण भाग – १३०

bhavishy_puranॐ श्रीपरमात्मने नम :
श्रीगणेशाय नम:
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय

भविष्यपुराण

उत्तरपर्व

अध्याय – २९

स्थालीनदान की महिमा में द्रोपदी के पूर्वजन्म की कथा

महाराज युधिष्ठिरने कहा – भगवन ! आपके द्वारा अन्नदान के माहात्म्य को सुनकर मुझे भी एक बात स्मरण आ रही है | जिसे मैंने अपनी आँखों से देखा है, उसे मैं आपको सुनाता हूँ | जिस समय दुर्योधन, कर्ण, शकुनि आदिने द्युतक्रीडा में छलसे हमारे राज्यको सचिन लिया और हमलोग द्रोपदी के साथ वल्कल वस्त्र तथा मृग-चर्म धारणा कर वनको जा रहे थे, उससमय नगर के लोग और सदाचारी ब्राह्मण स्नेंह से हमारे साथ चलने लगे | उन्हें देखकर मुझे बड़ा दुःख हुआ और मैं यह सोचने लगा की जो व्यक्ति ब्राह्मण, मित्र, भृत्य आदि का पोषण करता हैं, उसीका जीवन सफल है | अपना पेट तो मनुष्य, जिव, जन्तु, पशु, पक्षी सभी भर लेते है | अभ्यागत, सुह्र्द्वर्ग और कुटुंब को छोडकर जो व्यक्ति केवल अपना ही पेट भरता है, वह जीवित होते हुए भी मरे हुए के समान है | यही सोचकर मैंने उन ब्राह्मणों से कहा कि आपलोग त्रिकालज्ञ और ज्ञान-विज्ञान में पारंगत है और मेरे स्नेह के वशीभूत होकर ही आये है | अब कोई ऐसा उपाय बतानेकी कृपा कीजिये जिससे कि भाई, बन्धु, मित्र, भृत्यसहित आपलोगों के लिये भी भोजन आदि का प्रबंध हो सके, क्योंकि इस निर्जन वनमें हमे बारह वर्ष बीतना है | मेरे इसप्रकार के वचन को सुनकर मैत्रेय मुनिने मुझसे कहा कि कौन्तेय ! एक प्राचीन वृतांत मैंने दिव्य दृष्टि से देखा है, जिसे मैं कह रहा हूँ, आप ध्यान से सुने |

किसी समय एक तपोवन में कोई दुर्भगा, दरिद्रा, ब्र्ह्चारिणी ब्राह्मणी निवास कर रही थी | वह इस दशा में भी प्रतिदिन ब्राह्मणों का पूजन किया करती | उसकी शम-डीएम से परिपूर्ण श्रद्धा को देखकर एक दिन ब्राह्मणों ने प्रसन्न होकर उससे कहा- -‘सुव्रते ! ह्मोल्ग तुमसे बहुत प्रसन्न हैं, तुम कोई वर माँगों |’ तब ब्राह्मणी ने कहा- ‘महाराज ! किसी व्रत अथवा दान की ऐसी विधि बताने की कृपा कीजिये, जिसके कहने से मैं पतिकी प्रिय, पुत्रवती, सौभाग्यवती, धनाढ्य तथा लोक में प्रशंसा के योग्य हो जाऊँ |’

ब्राह्मणी का यह वचन सुनकर वसिष्ठजी ने कहा कि ब्राह्मणि ! मैं तुम्हें सभी मनोरथों को पूर्ण करनेवाले स्थालीदान की विधि बता रहा हूँ | पांच सौ पल, दो सौ पचास पल अथवा एक सौ पचीस पल ताबें का पात्र बनाये अथवा सामर्थ न हो तो मिटटी की उत्तम हांड़ी बना ले | वह गहरी और सुदृढ़ हो | उसे मूंगा तथा चावल से बने पदार्थ से भरकर चन्दन से चर्चित कर एक मंडल के मध्य में स्थापित कर ले तथा उसके समीप सब प्रकार शाक, जलपात्र, घी का पात्र रखे और पुष्प, धुप, दीप, नैवेद्य, वस्त्र आदि से उसका पूजन करे और इसप्रकार उस पात्र की प्रार्थना करे –

ज्वलज्ज्वलनपार्श्वस्वैस्तन्डूलै: सजलैरपि |
न भवेभ्दोज्यसंसिद्धिर्भूतानां पिठरी विना ||
त्वं सिद्धि: सिद्धिकामानां त्वं पुष्टि: पुष्टिमिच्छताम |
अतस्त्वां प्रणमाम्याशु सत्यं कुरु वचो मम ||
ज्ञातिबंधूसुह्र्भ्दर्गे विप्रे प्रेष्यजने तथा |
अभुक्तवति नाश्वीयात तथा भव वरप्रदा || (उत्तरपर्व १७०/२२-२४)

इसका भाव यह है कि समीप ही प्रज्वलित अग्नि हो, चावल हो तथा जल भी हो, किन्तु यदि स्थाली न हो तो भोजन नहीं पकाया जा सकता | स्थाली ! तुम सिद्धि चाहनेवालों के लिये सिद्धि तथा पुष्टि चाहनेवालों के लिये पुष्टि-स्वरुप हो | मैं तुम्हें प्रणाम करता हूँ | मेरी बातको सत्य करो | मेरे ज्ञातिवर्ग, सुह्र्व्दर्ग, बंधुवर्ग तथा भूत्यवर्ग आदि जबतक भोजन न करे ले, तबतक तुममे से भोजन घटे नहीं – ऐसा वर प्रदान करो |

यह मन्त्र पढकर बह पात्र द्विजश्रेष्ठ को दान कर दे | यह दान रविवार, संक्रांति, चतुर्दशी, अष्टमी, एकादशी अथवा तृतीया को करना चाहिये | वसिष्ठजी का यह उपदेश मानकर वह ब्राह्मणी नित्य ब्राह्मणों को दक्षिणासहित स्थालीपात्र देने लगी | पार्थ ! उसी पुण्य के प्रभाव से जन्मान्तर में वाही ब्राह्मणी द्रोपदीरूप में तुम्हारी भार्या हुई है और दान देने में द्रोपदी का हाथ कभी शून्य नहीं रहेगा; क्योंकि यह द्रोपदी, सती, शची, स्वाहा, सावित्री, भू, अरुंधती तथा लक्ष्मी के रूप में जहाँ रह रही हो, वहाँ फिर कौन सा पदार्थ दुर्लभ हो सकता है | इतना कहकर मैत्रेय मुनिने कहा कि महाराज युधिष्ठिर ! यह द्रोपदी अपनी स्थाली से अन्न दे तो सम्पूर्ण जगत को तृप्त कर सकती है, फिर इन थोड़े से ब्राह्मणों के भोजन आदि के विषय में आप क्यों चिंतित होते है ?

मैत्रेयजी का ऐसा वचन सुनकर भगवन ! हमलोगों ने भी वैसा ही किया और सभी परिजनों के साथ ब्राह्मणों को नित्य भोजन कराने लगे | प्रभि ! अन्नदान के प्रसंग से यह स्थालीदान के विधि मैंने कही, इसलिये आप मेरी धृष्टता को क्षमा करे | जो व्यक्ति सुंदर ताम्र की स्थाली बनाकर चावलों से उसे भरकर पर्व-दिन में इस विधि से ब्राह्मण को देता है, उसके हर सुह्द, सम्बन्धी, बांधव, मित्र, भृत्य और अतिथि नित्य भोजन करें तो भी भोजन की कमी नहीं होती |

इति श्री भविष्यपुराण का उत्तरपर्व का उनत्तीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ |

हरि ॐ हरि ॐ

|| इति श्री भविष्यपुराण ग्रन्थ सम्पूर्ण ||

भविष्यपुराण भाग – १२९

bhavishy_puran ॐ श्रीपरमात्मने नम :
श्रीगणेशाय नम:
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय

भविष्यपुराण

उत्तरपर्व

अध्याय – २८

अन्नदान की महिमा के प्रसंग में राजा श्वेत और एक वैश्य की कथा

भगवान् श्रीकृष्ण कहते है – महाराज ! किसी समय मुनियों ने अन्नदान का जो माहात्म्य कहा था, उसे मैं कह रहा हूँ, आप एकाग्रचित होकर सुने |अनघ ! आप अन्नदान करें, जिससे तत्काल संतुष्टि प्राप्त होती है | वन में श्रीरामचंद्रजी ने दु:खी होकर लक्ष्मण से कहा था – ‘लक्ष्मण ! सम्पूर्ण पृथ्वी अन्नसे परिपूर्ण हैं, फिर भी हमलोगों को अन्न नहीं मिल रहा हैं, इससे यही जान पड़ता है कि हमलोगों ने पूर्वजन्मों में ब्राह्मणों को कभी अन्न का भोजन नहीं कराया |’ मनुष्य जिस कर्मरूपी बीज को बोता है, जैसा कर्म करता हैं, वह उसीका फल पाटा हैं | संसार में यह ठीक ही कहा जाता है कि बिना दिये कुछ नहीं मिलता | भोजन योग्य जिस अन्न का दान किया जाता हैं, वह अन्न दान परम श्रेयस्कर हैं | भारत ! भोज्य पदार्थों में बहुत से पदार्थ है, किन्तु अन्न का दान सब दानों से श्रेष्ट दान है | सत्य से बढकर कोई पुण्य नहीं, संतोष से बड़ा कोई सुख नही और अन्नदान से बढकर कोई दान नहीं है | स्नान, अनुलेपन और वस्त्राअलंकारों से मनुष्यों को वैसी तृप्ति नहीं होती, जैसी भोजन से होती है | इस विषय में एक इतिहास है –

राजन ! बहुत पहले एक श्वेत नाम के चक्रवर्ती राजा हुए हैं, उन्होंने अनेक यज्ञ किये और अनेक युद्धों में विजय प्राप्त की | अनेक प्रकार का दान दिये और धर्मपूर्वक राज्यपर शासन किया | राजा ने अनेक प्रकार के उत्तम भोग भोगकर अंत में राज्य का परित्याग कर वनमें जाकर तपस्या की | अंत में वे दिव्य विमान में आरूढ़ होकर स्वर्ग गये | वहाँ विद्याधर, किनर आदि के साथ विहार करने लगे | अप्सराएँ उनकी सेवा में रहती थी | गंधर्व उन्हें गीत सुनाकर रिझाते, इंद्र भी उनका बड़ा सम्मान करते थे | राजा को दिव्य वस्त्र, आभूषण, पुष्पमाला आदि पहनने को तो मिलता था, परन्तु भोजन के समय विमान में बैठकर भूलोक में आकर अपने पूर्व-शरीर के मांस को प्रतिदिन खाना पड़ता था | प्रतिदिन मांस का भोजन करने के बाद भी पूर्वजन्म के कर्म के कारण उस पूर्वशरीर का मांस घटता नहीं था | इसप्रकार प्रतिदिन मांस-भक्षण से व्याकुल होकर राजा ने ब्रह्माजी से कहा – ‘ब्रह्मन ! आपके अनुग्रह से मुझे स्वर्ग का सुख प्राप्त हुआ है, सभी देवता मेरा आदर करते है | सभी सामग्री उपभोग के लिये प्राप्त होती रहती है, परन्तु सभी भोगों के रहते हुए भी यह पापिनी क्षुधा कभी शांत नहीं होती, मुझे सदा सताती रहती है | इसी कारण मुझे अपने पूर्व-शरीर के मांस के प्रतिदिन खाने के लिये भूलोक में जाना पड़ता है और इसमें मुझे बड़ी घृणा होती है | मैंने कौन सा ऐसा पाप किया है, जिससे मुझे उत्तम भोजन नही मिलता | आप कृपाकर ऐसा कोई उपाय बताये जिससे मेरा यह दुःख दूर हो जाय |

ब्रह्माजी बोले – राजन ! आपने अनेक प्रकार के दान दिये हैं, बहुत-से यज्ञ किये है और गुरुजनों को भी संतुष्ट किया है, परन्तु ब्राह्मणों को स्वादिष्ट उत्तम व्यजनों का भोजन नहीं कराया | अन्नदान न करने से ही आज आपकी यह दशा हो रही है | अन्नसे बढकर कोई संजीवनी नही | अन्न को ही अमृत जानना चाहिये | इसलिए अब आप पृथ्वीपर जाकर वेदशास्त्र जाननेवाले कुलीन ब्राह्मणों को भोजन कराये | उससे आपका यह दुःख दूर हो जायगा |

ब्रह्माजी का वचन सुनकर राजा श्वेत ने पृथ्वीपर आकर महर्षि अगस्त्यजी को परमभक्ति से भोजन कराया और अपने गले की दिव्य एकावली (माला) को दक्षिणा के रूप में समर्पित किया | अगस्त्यजी को भोजन कराते ही राजा श्वेत संतुष्ट हो गये और सभी देवता वहाँ आकर अतीव आदरपूर्वक राजा को विमान में बैठाकर स्वर्गलोक चले गये | श्रीरामचंद्रजी ने जब रावण का वध कर दिया, तब वह एकावली अगस्त्यजी ने श्रीरामचन्द्रजी को दे दी | यह अन्नदान का ही माहात्म्य है |

मेरा वचन सत्य है कि प्राणियों के लिये अन्नसे बढकर कोई उत्तम पदार्थ नहीं है | अन्न जीवों का प्राण है | अन्न ही तेज, बल और सुख है | इसलिए अन्नदाता प्राणदाता है | भूखा व्यक्ति जिस दुसरे वक्ती के घर आशा करके जाता है और वहाँ से संतुष्ट होकर आता है तो भोजन देनेवाला व्यक्ति धन्य हो जाता है, उसके समान पुण्यकर्मा और कौन होगा ? दीक्षा-प्राप्त स्नातक, कपिला गौ, याज्ञिक, राजा, भिक्षु तथा महोदधि – य सब दर्शनमात्र से पवित्र कर देते हैं | इसलिए घरपर आये भूखे व्यक्ति को जो भोजन न दे सके उसका गृहस्थाश्रम व्यर्थ है | अन्न के बिना कोई अधिक समयतक जीवित नहीं रह सकता | मनुष्यों का दुष्कृत अर्थात किया हुआ दूषित कर्म अन्न में प्रविष्ट हो जाता है, इसलिये जो ऐसे व्यक्ति का अन्न खाता हैं, वह अन्न देनेवाले के दुष्कृत का ही भक्षण करता है | इसके विपरीत अमृतमय पवित्र परान्न का भोजन करनेवाले व्यक्ति का एक महीने का किया हुआ पुण्य अन्नदाता को प्राप्त हो जाता है | जिस अन्न के दान का इतना महत्त्व है, उसका दान क्यों नहीं करते ? जो व्यक्ति ब्राह्मण-अतिथि आदि को भोजन आदि कराने तथा भिक्षा देने के पूर्व ही स्वयं भोजन कर लेता है, वह केवल पाप ही भक्षण करता है | जिस व्यक्ति ने दस हजार या एक हजार ब्राह्मणों को भोजन कराया है, उसने मानो ब्रह्मलोक में अपना स्थान बना लिया |

प्राचीन कालमे वाराणसी में देवता और ब्राह्मणों का पूजक धनेश्वर नामका एक वैश्य रहता था | उसकी दूकान में एक स्थानपर एक सर्पिणी ने अंडा दिया और वह उस अंडे को छोडकर कहीं अन्यत्र चली गयी | वैश्य ने अंडे को देखा और उसपर दयाकर उसकी रक्षा करने लगा | कुछ समय बाद अंडे को फोड़कर कृष्ण सर्प का बच्चा बाहर निकला | उस सर्पके बच्चे को वैश्य प्रतिदिन दूध पिलाता था | वह सर्प भी वैश्य के पैरों पर लोटता, उसके अंगों को चाटता और पुरे घर में निर्भय हो घूमता रहता | वैश्य भी भलीभांति सर्प की रक्षा करता | थोड़े ही समय में वह भयंकर सर्प हो गया | किसी समय की बात है, वह धनेश्वर गंगा स्नान करने के लिये गया था और उसका पुत्र दुकान पर बैठकर सामान बेच रहा था | उसीसमय वह सर्प उस लडके के पैरों के बीच से निकला, जिससे वह लड़का डर गया और उसने सर्प को डंडे से मारा | चोट लगते ही सर्प उछलकर वैश्यपुत्र के सिरपर बैठ गया और क्रोधित होकर कहने लगा – ‘मुर्ख ! मैं तुम्हारे पिताकी शरण में हूँ और तुम्हारे पिताने ही मेरा पालन-पोषण किया है, इसलिये मैं तुम्हारा भी भला ही चाहता था, परन्तु तुमने मुझे अकारण ही प्रताड़ित किया है, इसलिये अब मैं तुम्हें जीवित नही छोडूंगा |’ सर्प के इसप्रकार कहने के साथ ही वैश्य के घर में दु:खी हो सब रोने लगे |

उसीसमय अच्युत, गोविन्द, अनंत आदि भगवान् के पवित्र नामों का उच्चारण करता हुआ स्नान कर वह धनेश्वर भी घर आ गया | पुत्र की वैसी स्थिति देखकर उसने सर्प से कहा –‘पन्नग ! तुम मेरे पुत्र के मस्तकपर फण फैलाये क्यों बैठे ही ? यह ठीक ही कहा गया हैं कि मुर्ख मित्र और हीन जाति में उत्पन्न प्राणी के साथ सम्बन्ध करना अपने हाथ से जलता हुआ अंगारा उठाना है | वणिक की बात सुनकर साँप ने कहा – ‘धनेश्वर ! तुम्हारे पुत्र ने मुझे निरपराध ही मारा है, इसलिये तुम्हारे सामने ही मैं इसका प्राण ले रहा हूँ, जिससे अन्य कोई भी व्यक्ति ऐसा काम न करे |’ यह सुनकर धनेश्वर ने कहा – ‘सर्प ! जो उपकार, भक्ति तथा स्नेह आदि को भूलकर अपने रास्ते से भटक जाय अर्थात अपने कर्तव्यमार्ग को छोड़ दे, उसे कौन रोक सकता हैं, परन्तु क्षणमात्र तुम इस बालक को छोड़ दो, दंश न करो, जिससे मैं ब्राह्मणों को भोजन कराकर अपना और्ध्वदैहिक कर्म अपने हाथ से कर सकूँ, क्योंकि बाद में मेरे पास कोई पुत्र नहीं रहेगा |’ सर्प ने इस बात को स्वीकार कर लिया |

तदनंतर वैश्य ने वेदवेत्ता और जितेन्द्रिय एक हजार ब्राह्मणों तथा सन्यासियों आदि को घी, पायससहित मधुर स्वादिष्ट भोजन कराया | भोजन से संतुष्ट हो ब्राह्मणों ने प्रसन्न होकर कहा –

वणिक्यपुत्र चिरं जीव नश्यन्तु तव शत्रव: |
अभीष्टफलसंसिद्धिरस्तु ते ब्राह्मणाज्ञया || (उत्तरपर्व १६९/६३)

‘वणिक्यपुत्र ! ब्राह्मणों की आज्ञा से तुम चिरंजीवी होओं, तुम्हारे सभी शत्रु नष्ट हो जायें और तुम्हारा मनोरथ सिद्ध हो जाय |’

ऐसा कहकर ब्राह्मणों ने वाग्वज्रसे ताड़ित होकर वह सर्प मस्तक से गिरा और मर गया | सर्प को मरा हुआ देखकर धनेश्वर को बड़ा दुःख हुआ और वह सोचने लगा कि मैंने इस सर्प को पुत्रकी भांति पाला था उअर आज यह मेरे ही दोष से मर गया | यह बड़ा ही अनुचित हुआ | उपकार करनेवाले में जो साधुता रखता है, उसकी साधुता में कौन-सी विशेषता रहती है ? अर्थात वह प्रशंसा के योग्य नहीं है, किन्तु जो अप्कारियों में साधुता रखता है, उसकी साधुता ही सराहनीय है |

इस प्रकार अनेक प्रकार से पश्चाताप करते हुए दु:खी होकर वैश्य ने न तो उस दिन भोजन किया, न ही रात्रि में सो सका | प्रात:काल होते ही गंगा में स्नान कर देवता-पितरों का पूजन-तर्पण आदिकर घर आया और पुन: एक हजार ब्राह्मणों को अनेक प्रकार के उत्तम व्यंजनों का भोजन कराकर संतुष्ट किया | इसपर ब्राह्मणों ने प्रसन्न होकर कहा – ‘धनेश्वर ! हमलोग तुमसे बहुत ही संतुष्ट हैं, इसलिये तुम वर माँगों |’ यह सुनकर उसने वर माँगा कि ‘यह मृत सर्प पुंल जीवित हो जाय |’ वैश्य के यह कहनेपर ब्राह्मणों ने अभिमंत्रित जल सर्प के ऊपर छिड़का | जलके छीटे पड़ते ही वह सर्प जीवित हो गया | यह देखकर धनेश्वर बड़ा ही प्रसन्न हुआ और नगर के लोग धनेश्वर की प्रशंसा करने लगे |

महाराज ! यह सहस्त्र ब्राह्मण-भोजन (अन्नदान) का संक्षेप से मैंने माहात्म्य वर्णन किया | जो व्यक्ति ब्राह्मणों को और अभ्यागतों को अन्न देता हैं, वह बहुत दिनतक संसार-सुख को भोगकर विष्णुलोक को प्राप्त कर लेता है |

इति श्री भविष्यपुराण का उत्तरपर्व का अठ्ठाइसवाँ अध्याय समाप्त हुआ |

हरि ॐ हरि ॐ

भविष्यपुराण भाग – १२८

bhavishy_puranॐ श्रीपरमात्मने नम :
श्रीगणेशाय नम:
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय

भविष्यपुराण

उत्तरपर्व

अध्याय – २७

कांचनपुरीव्रत – विधि

भगवान् श्रीकृष्ण कहते है – महाराज ! एक बार विश्व के उत्पत्ति, पालन और संहारकारक अक्षर पुरुषोत्तम भगवान विष्णु श्वेतद्वीप में सुखपूर्वक बैठे हुए थे | उसीसमय जगन्माता लक्ष्मी ने उनके चरणों में पंचाग प्रणाम कर उनसे पूछा – ‘भगवन! आप भक्तोपर अनुकम्पा करनेवाले है | महाभाग ! मुझपर भी दया करके कोई ऐसा रूप-सौभग्यदायक सर्वोत्तम व्रत बतलाये, जिसके आचरण से समस्त तीर्थ आदि पुण्य कर्मों का फल प्राप्त हो जाय |’

भगवान् विष्णु बोले – देवि ! जिस प्रकार आश्रमों में गृहस्थाश्रम, वर्णों में ब्राह्मण, नदियों में गंगा, जलाशयों में समुद्र, देवताओं में विष्णु (मैं) तथा स्त्रियों में तुम (लक्ष्मी) श्रेष्ठ हो, उसी प्रकार व्रतों में कांचनपुरी व्रत उत्तम है | इस व्रत का पहले भगवती पार्वती ने भगवान् शंकर के साथ अनुष्ठान किया था | सीताजी ने भी भगवान् श्रीराम के साथ इसी व्रतका पालन कर अखंड साम्राज्य प्राप्त किया था | दमयन्ती के वियोग में राजा नल ने भी इस व्रत को किया था | वनवासी पांडवों ने भी द्रौपदी के साथ इस व्रत का आचरण किया और सबी कष्टों से मुक्त होकर साम्राज्य-लाभ किया | भद्रे ! यह व्रत स्वर्ग और मोक्ष को प्रदान करनेवाला है | रम्भा, मेनका, इन्द्राणी (शची) सत्यभामा, शाण्डिली, अरुंधती, उर्वशी तथा देवदत्ता आदि श्रेष्ठ स्रियों ने इस व्रत का आचरण करके सौभाग्य, सुख और अपने मनोरथ प्राप्त किये थे | पाताल में नागकन्याओं ने और गायत्री, सरस्वती एवं सावित्री आदि उत्तम देवियों तथा अन्य नारियों ने सभी कामनाओं की पूर्ति की अभिलाषा से इस व्रत का अनुष्ठान किया था | यह व्रत सभी प्रकार के दु:खों का नाशक, प्रीतिवर्धक तथा व्रतों में उत्तम है, इसलिये इस व्रत का मैं वर्णन कर रहा हूँ | इसके अनुष्ठान से ब्रह्महत्या आदि महापातकों के करनेवाले, तौल-माप में कमी करनेवाले, कन्या बेचनेवाले, गौ बेचनेवाले, अगम्यागमन में लिप्त, मांसभक्षी, जारजपुत्र के यहाँ भोजन करनेवाले, भूमिका हरण करनेवाले आदि पापकर्मी भी पापों से नि:संदेह मुक्त हो जाते हैं | इसकी विधि इसप्रकार है –

देवि ! यह कांचनपुरी-व्रत किसी महीने में शुक्ल या कृष्ण पक्ष की तृतीया, एकादशी, पूर्णिमा, संक्रान्ति, अमावस्या तथा अष्टमी को उपवासपूर्वक किया जा सकता है | व्रती इस दिन कांचनपुरी बनवाकर दान करे | वह पुर्वाह्र में नदी आदि के शुद्ध निर्मल जल में स्नान करें | पहले मन्त्रपूर्वक पवित्र मृत्तिका ग्रहणकर उसे शरीर में लगाये फिर जल में गोते लगाये | इस विधि से स्नान कर शुद्धात्मा व्रती घर आये और उस दिन किसी पाखंडी, विधर्मी, धूर्त, शठ आदि से वार्तालाप न करे | अपना हाथ-पैर धोकर पवित्र हो आचमन करे | एक उत्तम जल से भरा स्वर्णयुक्त शंख लेकर उस जल को द्वादशाक्षर-मन्त्र अभिमंत्रित कर ‘हरि’ इस मन्त्र का जप कर जल पी ले | शमीवृक्ष से चार स्तभों से युक्त एक वेदी बनाये जो चार हाथ प्रमाण की हो | वेदी को पुष्पमाला, वितान, दिव्य धूप आदिसे आधिवासित और अलंकृत कर ले | वेदी के मध्य में एक पद्म की रचना करे | मंडल के बीच में सुंदर एक भद्रपीठ का निर्माण कराये | भद्रपीठ के ऊपर सुंदर आसनपर लक्ष्मी के साथ भगवान् जनार्दन की स्थापना करे | मंडल के अग्र भाग में जलपूर्ण कलश की स्थापना कर उसमें क्षीरसागर की कल्पना करे | कलशपर चार पल, दो पल अथवा एक पल की कांचनपुरी की स्वर्णमयी प्रतिमा बनाकर स्थापित करे | उसके आगे कदली-स्तंभ और तोरण लगाये | फिर ब्राह्मणोंद्वारा उसकी प्रतिष्ठा कराये |

उस पूरी के मध्य में विष्णुसंहित लक्ष्मी की सुवर्णमय प्रतिमा की स्थापना करनी चाहिये | पंचामृत से देवेश नारायण तथा लक्ष्मी को स्नान कराकर मन्त्रों का उच्चारण करते हुए चन्दन, पुष्प आदि उपचारोंद्वारा उनका पूजन करना चाहिये | इन्द्रादि लोकपालों की पूजा भी यथाक्रम से करनी चाहिये | विघ्ननिवारण के लिये गणपति तथा नवग्रहों का पूजन कर हवन करना चाहिये | तत्पश्चात पायस, सोहाल, फेनी, मोदक आदि का नैवेद्य अर्पितकर देश-काल के अनुसार फल भी अर्पण करना चाहिये | दस दिशाओं में दस-घृतपूरित दीपक प्रज्वलित करे | पुष्पमाला, चन्दन आदि भी चढ़ाये, साथ ही विष्णुस्तवराज, पुरुषसूक्त आदि का पाठ करे | सोलह सपत्निक ब्राह्मणों में लक्ष्मी-विष्णु की भावना कर पूजा करे | अंत में पूजित सभी पदार्थ उन्हें निवेदित कर प्रार्थना करे कि ‘ब्राह्मण देवता ! भगवान् विष्णु मुझपर प्रसन्न हो जायँ |’ शय्या-दान तथा गो-दान भी करे | जो कांचनपुरी आदि की प्रतिमा पूजित की गयी है , उसे वस्त्र से आच्छादित अपने नेत्रों को वस्त्र से ढककर दीप के साथ मंडप में ले आये और आचार्य कहे – ‘आप सभी कामनाओं को देनेवाली एवं दुःख-दुर्भाग्य को दूर करनेवाली इस रमणीय कांचनपुरी का दर्शन करें |’

अनन्तर व्रती नेत्र के वस्त्र को खोलकर गुरु के सम्मुख और भगवान् विष्णु को दहीमिश्रित अर्घ्य प्रदान करे और प्रार्थना करे – ‘सभी कामनाओं को पूर्ण करनेवाले भगवान् लक्ष्मीनारायण ! आप इस सुवर्णपूरी के प्रदान करने से मनोवांछित फल पूर्ण करे | नारायण ! लक्ष्मीकांत ! जगन्नाथ ! आप इस अर्घ्य को ग्रहण करे, आपको नमस्कार है |’

इसप्रकार महातेजस्वी भगवान विष्णु को अर्घ्य देकर भक्तिपूर्वक देवी लक्ष्मी को भी अर्घ्य प्रदान करना चाहिये और कहना चाहिये कि ‘देवि ! आप ब्रह्मा, विष्णु, शंकर, पार्वती एवं भगवान् कार्तिकेय से पूजित है | धर्म की कामनसे मेरे द्वारा भी आप पूजित है, आप मुझे सौभाग्य, पुत्र, धन, पौत्र प्रदान करें | देवि ! आप मेरे द्वारा प्रदत्त इस अर्घ्य को ग्रहण कर मुझे सुख प्रदान करे |’ इसप्रकार व्रत को पूर्णकर रात्रि में जागरण करे, निद्रारहित होकर जागरण करने से सौ यज्ञों का फल प्राप्त होता है |

ऐसा करने से व्रती ब्रह्मलोक को प्राप्त कर ब्रह्मा के साथ आनन्दमय जीवन व्यतीत करता है | अनन्तर रूद्रलोक, उसके बाद विष्णुलोक को प्राप्त करता है | देवि ! कांचनपुरी नामक यह व्रत पूर्वसमय में तुमने भी किया था , उसी पुण्य के प्रभाव से त्रैलोक्यपूजित मुझे स्वामी के रूप में तुमने प्राप्त किया हैं |

इति श्री भविष्यपुराण का उत्तरपर्व का सत्तावीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ |

हरि ॐ हरि ॐ

भविष्यपुराण भाग – १२७

bhavishy_puranॐ श्रीपरमात्मने नम :
श्रीगणेशाय नम:
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय

भविष्यपुराण

उत्तरपर्व

अध्याय – २६

महानवमी ( विजयादशमी ) व्रत

भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं – महाराज ! महानवमी सब तिथियों में श्रेष्ठ है | सभी प्रकार के मंगल और भगवती की प्रसन्नता के लिये सब लोगों को और विशेषकर राजाओं को महानवमी का उत्सव अवश्य मनाना चाहिये |

युधिष्ठिर ने पूछा – भगवन ! इस महानवमी-व्रत का आरम्भ कबसे हुआ ? क्या यशोदा के गर्भ से प्रादुर्भूत होने के समय से महानवमी-व्रतका प्रचलन हुआ अथवा इसके पूर्व सत्ययुग आदिमे भी यह महानवमी-व्रत था? इसे आप बतलाने की कृपा करे |

भगवान् श्रीकृष्ण बोले – महाराज ! वह परमशक्ति सर्वव्यापिनी, भावगम्या, अनंता और आद्या आदि नामसे विश्वविख्यात है | उनका काली, सर्वमंगला, माया, कात्यायनी, दुर्गा, चामुंडा तथा शंकरप्रिया आदि अनेक नाम-रुपोंसे ध्यान और पूजन किया जाता है |

देव, दानव, राक्षस, गन्धर्व, नाग, यक्ष, किन्नर, नर आदि सभी अष्टमी तथा नवमी को उनकी पूजा-अर्चना करते हैं | कन्या के सूर्य में आश्विन मास के शुक्ल पक्ष में अष्टमी को यदि मूल नक्षत्र हो तो उसका नाम महानवमी है | यह महानवमी तिथि तीनों लोकों में अत्यंत दुर्लभ है | आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी और नवमी को जगन्माता भगवती श्रीअम्बिका का पूजन करने से सभी शत्रुओं पर विजय प्राप्त हो जाती है | यह तिथि पुण्य, पवित्रता, धर्म और सुख को देनेवाली है | इस दिन मुंडमालिनी चामुंडा का पूजन अवश्य करना चाहिये | सभी कल्पों और मन्वन्तरों में देव, दैत्य आदि अनेक प्रकार के उपचारों से नवमी तिथि को भगवती की पूजा किया करते हैं और तीनों लोकों में अवतार लेकर भगवती मर्यादा का पालन करती रहती है | राजन ! यही पराम्बा जगन्माता भगवती यशोदा के गर्भ से उत्पन्न हुई थी और वे कंस के मस्तकपर पैर रखकर आकाश में चली गयीं और फिर विन्द्याचल में स्थापित हुई, तभी से यह पूजा प्रवर्तित हुई |

भगवती का यह उत्सव पहले से ही प्रसिद्ध था, परन्तु सभी प्राणियों के उपकार के लिये तथा सभी विघ्न-बाधाओं की शान्ति के लिये ही मैंने अपनी बहन के रुपमे भगवती विन्ध्यवासिनी देवी की महिमा का विशेषरूप से प्रचार किया | विन्ध्यवासिनी भगवती के स्थान में नवरात्रि, तीनरात्रि, एकरात्रि उपवास या भगवती की आराधना करनी चाहिये | ग्राम-ग्राम, नगर-नगर और घर-घर में सभी लोगों को स्नान कर प्रसन्नचित्त होकर भक्तिपूर्वक ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शुद्र, स्त्री आदि सभी को भगवती की पूजा करनी चाहिये | विशेषकर राजाओं को तो यह पूजन अवश्य करना चाहिये |

विजय की इच्छा रखनेवाले राजाको प्रतिपदा से अष्टमीपर्यन्त लोहाभिहारिक कर्म (अस्त्र-शस्त्र-पूजन) करना चाहिये | सर्वप्रथम पूर्वोत्तर ढालवाली भूमि में नौ अथवा सात हाथ लम्बा-चौड़ा, पताकाओं से सुसज्जित एक मंडप बनाना चाहिये | उसमें अग्निकोण में तीन मेखला और पीपल के समान योनि से युक्त एक अति सुंदर एक हाथ के कुंड की रचना करनी चाहिये | राजा के चिन्ह-छत्र, चामर, सिंहासन, अश्व, ध्वजा, पताका आदि और सभी प्रकार के अस्त्र-शस्त्र, मंडप में लाकर रखे | उन सबका अधिवासन करे | इसके अनन्तर ब्राह्मण को चाहिये कि वह स्नानकर श्वेत वस्त्र धारणकर मंडपादिकी पूजा करे और फिर ॐकार पूर्वक राजचिन्हों के निर्दिष्ट मन्त्रोद्वारा घृत से संयुक्त पायस से हवन कर्म करे | पूर्वकाल में बहुत ही बलवान, शक्तिशाली लोह नामका एक दैत्य पैदा हुआ था | उसको देवताओं ने मारकर खंड-खंड कर पृथ्वीपर गिरा दिया | वही दैत्य आज लोहा के रूपमें दिखायी पड़ता है | उसी के अंगों से ही विभिन्न प्रकार के लोहे की उत्पत्ति हुई है | इसलिये उसी समय से लोहाभिहारिक कर्म राजाओं को विजय प्राप्त करने में सहायक सिद्ध हुआ, ऐसा ऋषियों नें बतलाया है | हवन का बचा हुआ शेष पायस हाथी और घोड़ों को खिलाकर उनको अलंकृत कर मांगलिक घोष करते हुए रक्षकों के साथ समारोहपूर्वक नगर में घुमाना चाहिये | राजाको भी प्रतिदिन स्नानकर पितरों और देवताओं की पूजा करने के बाद राजचिन्हों की भी भलीभांति पूजा करनी चाहिये | इससे राजा को विजय, कीर्ति, आयु, यश तथा बल की प्राप्ति होती है |

इसप्रकार लोहाभिहारिक कर्म करने के अनन्तर अष्टमी के दिन पुर्वाह में स्नान कर नियमपूर्वक सुवर्ण, चाँदी, पीपल, तांबा, मृतिका, पाषाण, काष्ठ आदि को दुर्गा की सुंदर मूर्ति बनाकर उत्तम सुसज्जित स्थान के बीच सिंहासन के ऊपर स्थापित करे | कुंकुम, चन्दन, सिंदूर आदिसे उस मूर्ति को चर्चित कर कमल आदि पुष्प, धुप, दीप तथा नैवेद्य आदि से अनेक बाजे-गाजे के साथ उनका पूजन करना चाहिये | वन्दीजन स्तुति करें | बहुत से लोग छत्र-चामर आदि राजचिंह लेकर चारों ओर खड़े होकर स्थित रहे | दीक्षायुक्त राजा पुरोहित के साथ बिल्वपत्रों से भगवती की इस मन्त्र से पूजा करे –

जयंती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी |
दुर्गा शिवा क्षमा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तु ते ||
अमृतोभ्दव: श्रीवृक्षो महादेवीप्रिय: सदा |
बिल्वपत्रं प्रयच्छामि पवित्रं ते सुरेश्वरि || ( उत्तरपर्व – १३८?८६-८७)

इसप्रकार पूजनकर उसी दिन से द्रोणपुष्पी (गुमा) से पूजा करनी चाहिये | असुरों के साथ युद्ध करने से जो क्षति भगवती के शरीर को हुई उसकी पूर्ति द्रोणपुष्पी ही हुई | इसलिए द्रोणपुष्पी भगवती को अत्यंत प्रिय है | फिर शत्रुओं के वध के लिये खंड को प्रणामकर सुभिक्ष, राज्य और अपने विजय की प्राप्ति हेतु भगवती से प्रार्थना करनी चाहिये और उनका ध्यान तथा इस स्तुतिका पाठ करना चाहिये –

सर्वमंगलमांगल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके |
शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ||
कुंकुमेन समालब्धे चन्दनेन विलेपिते |
बिल्वपत्रकृतामाले दुर्गेऽहं शरणं गत: || ( उत्तरपर्व – १३८?९३ – ९४ )

इसप्रकार अष्टमी को सब प्रकार से भगवती का पूजन कर रात्रि को जागरण करना चाहिये और न्रुत्यादिक उत्सव कराना चाहिये | प्रसन्नतापूर्वक रात्रि के बीत जानेपर नवमी को प्रात:काल भगवती को बड़े समारोह के साथ विशेष पूजा करनी चाहिये | अपराह्न समय में रथ के बीच भगवती दुर्गा की प्रतिमा को स्थापित कर पुरे राज्य भर में भ्रमण कराना चाहिये | अपनी सेनासहित राजा को भी साथ रहना चाहिये |

सभी प्रकार के विघ्नों की निवृत्ति के लिये भुतशान्ति करनी चाहिये | जिससे यात्रा निर्विघ्न पूर्ण हो | इस विधि से जो राजा अथवा सामान्य व्यक्ति भगवती की यात्रा करता हैं, वह सभी प्रकार के पापों से छूटकर भगवती के लोक को प्राप्त कर लेता है और उस व्यक्ति को शत्रु, चोर, ग्रह, विघ्न आदि का भय नहीं होता | भगवती के भक्त सदा निरोग, सुखी और निर्भय हो जाते हैं | जो व्यक्ति भगवती के उत्सव विधि का श्रवण करता है या पढ़ता है, उसके भी सभी अमंगल दूर हो जाते है |
इति श्री भविष्यपुराण का उत्तरपर्व का छबीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ |

हरि ॐ हरि ॐ

भविष्यपुराण भाग – १२६

bhavishy_puran

ॐ श्रीपरमात्मने नम :
श्रीगणेशाय नम:
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय

भविष्यपुराण

उत्तरपर्व

अध्याय – २५

श्रावणपूर्णिमा को रक्षाबंधन की विधि

भगवान् श्रीकृष्ण बोले – महाराज ! प्राचीन काल में देवासुर-संग्राम में देवताओंद्वारा दांव पराजित हो गये | दु:खी होकर वे दैत्यराज बलि के साथ गुरु शुक्राचार्यजी के पास गये और अपनी पराजय का वृतांत बतलाया | इसपर शुक्राचार्य बोले- ‘दैत्यराज ! आपको विषाद नहीं करना चाहिये | दैववश काल की गति से जय-पराजय तो होती ही रहती हैं | इससमय वर्षभर के लिये तुम देवराज इंद्र के साथ संधि कर लो, क्योंकि इंद्र-पत्नी शचीने इंद्र को रक्षा-सूत्र बाँधकर अजेय बना दिया है | उसी के प्रभाव से दानवेन्द्र ! तुम इंद्र से परास्त हुए हो | एक वर्षतक प्रतीक्षा करो, उसके बाद तुम्हारा कल्याण होगा | अपने गुरु शुक्राचार्य के वचनों को सुनकर सभी दानव निश्चिन्त हो गये और समयकी प्रतीक्षा करने लगे | राजन ! यह रक्षाबंधन का विलक्षण प्रभाव हैं, इससे विजय, सुख, पुत्र, आरोग्य और धन प्राप्त होता है |

राजा युधिष्ठिर ने पूछा – भगवन ! किस तिथि में किस विधि से रक्षाबंधन करना चाहिये | इसे बतायें |

भगवान् श्रीकृष्ण बोले – महाराज ! श्रावण मास की पूर्णिमा के दिन प्रात:काल उठकर शौच इत्यादि नित्य-क्रियासे निवृत्त होकर श्रुति-स्मृति-विधिसे स्नान कर देवताओं और पितरों का निर्मल जल से तर्पण करना चाहिये तथा उपाकर्म- विधिसे वेदोक्त ऋषियों का तर्पण भी करना चाहिये | ब्राह्मणवर्ग देवताओं के उद्देश्य से श्राद्ध करें | तदनंतर अपराह-काल में रक्षापोटलिका इसप्रकार बनाये- कपास अथवा रेशम के वस्त्र में अक्षत, गौर सर्षप, सुवर्ण, सरसों, दूर्वा तथा चंदन आदि पदार्थ रखकर उसे बाँधकर एक पोटलिका बना ले तथा उसे एक ताम्रपात्र में रख ले और विधिपूर्वक उसको प्रतिष्ठित कर ले | आँगन को गोबर से लीपकर एक चौकोर मंडल बनाकर उसके ऊपर पीठ स्थापित करे और उसके ऊपर मंत्रिसहित राजाको पुरोहित के साथ बैठना चाहिये | उससमय उपस्थित जन प्रसन्न-चित्त रहें | मंगल-ध्वनी करें | सर्वप्रथम ब्राह्मण तथा सुवासिनी स्त्रियाँ अर्ध्यादिके द्वारा राजा की अर्चना करे | अनन्तर पुरोहित उस प्रतिष्ठित रक्षापॉटलिको इस मन्त्र का पाठ करते हुए राजा के दाहिने हाथ में बाँधे –

येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबल: |
तेन त्वामभिबंध्नामि रक्षे मा चल मा चल || (उत्तरपर्व १३७/२०)

तत्पश्चात राजा को चाहिये कि सुंदर वस्त्र, भोजन और दक्षिणा देकर ब्राह्मणों की पुजाकर उन्हें संतुष्ट करे | यह रक्षाबंधन चारों वर्णों को करना चाहिये | जो व्यक्ति इस विधि से रक्षाबंधन करता है, वह वर्षभर सुखी रहकर पुत्र-पौत्र और धनसे परिपूर्ण हो जाता है |

इति श्री भविष्यपुराण का उत्तरपर्व का पचीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ |

हरि ॐ हरि ॐ

भविष्यपुराण भाग – १२५

bhavishy_puranॐ श्रीपरमात्मने नम :
श्रीगणेशाय नम:
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय

भविष्यपुराण

उत्तरपर्व

अध्याय – २४

श्रीकृष्ण-जन्माष्टमीव्रत की कथा एवं विधि

राजा युधिष्ठिर ने कहा – अच्युत ! आप विस्तार से (अपने जन्म-दिन) जन्माष्टमी व्रत का विधान बतलाने की कृपा करे |

भगवान् श्रीकृष्ण बोले – राजन ! जब मथुरा में कंस मारा गया, उससमय माता देवकी मुझे अपनी गोदमें लेकर रोने लगीं | पिता वसुदेवजी भी मुझे तथा बलदेवजी को आलिंकित कर गद्गदवाणी से कहने लगे – ‘आज मेरा जन्म सफल हुआ, जो मैं अपने दोनों पुत्रों को कुशल से देख रहा हूँ | सौभाग्य से आज हम सभी एकत्र मिल रहे है |’ हमारे माता-पिता को अति हर्षित देखकर बहुत से लोग वहाँ एकत्र हुए और मुझसे कहने लगे – ‘भगवन ! आपने बहुत बड़ा काम किया, जो इस दुष्ट कंसको मारा | हम सभी इससे बहुत पीड़ित थे | आप कृपाकर यह बतलाये कि आप माता देवकी के गर्भ से कब आविर्भूत हुए थे ? हम सब उस दिन महोत्सव मनाया करेंगे | आपको बार-बार नमस्कार हैं, हम सब आपकी शरण हैं | आप हम स्भिप्र प्रसन्न होइये | उससमय पिता वसुदेवजी ने भी मुझसे कहा था कि अपना जन्मदिन इन्हें बता दो |’

तब मैंने म्ठुरानिवासी जनों को जन्माष्टमी व्रत का रहस्य बतलाया और कहा – ‘पुरवासियों ! आपलोग मेरे जन्म दिन को विश्व में जन्माष्टमी के नामसे प्रसारित करें | प्रत्येक धार्मिक व्यक्ति को जन्माष्टमी का व्रत अवश्य करना चाहिये | जिस समय सिंह राशिप्र सूर्य और वृषराशिपर चन्द्रमा था, उस भाद्रपद मासकी कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को अर्धरात्रि में रोहिणी नक्षत्र में मेरा जन्म हुआ | वसुदेवजी के द्वारा माता देवकी के गर्भ से मैंने जन्म लिया | यह दिन संसार में जन्माष्टमी नाम से विख्यात होगा | प्रथम यह व्रत मथुरा में प्रसिद्ध हुआ और बाद में सभी लोकों में इसकी प्रसिद्धी हो गयी | इस व्रत के करने से संसार में शान्ति होगी, सुख प्राप्त होगा और प्राणिवर्ग रोगरहित होगा |’

महाराज युधिष्ठिर ने कहा – भगवन ! अब आप इस व्रत का विधान बतलाये, जिस के करने से आप प्रसन्न होते है |

भगवान श्रीकृष्ण बोले – महाराज ! इस एक ही व्रत के कर लेने से सात जन्म के पाप नष्ट हो जाते है | व्रत के पहले दिन दंतधावन आदि करके व्रतका नियम ग्रहण करे | व्रत के दिन मध्यान्ह में स्नानकर माता भगवती देवकी का एक सूतिका गृह बनाये | उसे पद्मरागमणि और वनमाला आदिसे सुशोभित करे | गोकुल की भांति गोप, गोपी, घंटा, मृदंग, शंख और मांगल्य-कलश आदिसे समन्वित तथा अलंकृत सुतिका-गृह के द्वारपर रक्षा के लिए खंग, कृष्ण छाग, मुशल आदि रखे | दीवालों पर स्वस्तिक आदि मांगलिक चिन्ह बना दे | षष्ठीदेवी की भी नैवेद्य आदि के साथ स्थापना करे | इस प्रकार यथाशक्ति उस सूतिकागृह को विभूषितकर बीच में पर्यंक के ऊपर मुझसहित अर्धसुप्तावस्थावाली, तपस्विनी माता देवकी की प्रतिमा स्थापित करे | प्रतिमाएँ आठ प्रकार की होती हैं –स्वर्ण, चाँदी, ताम्र, पीतल, मृत्तिका, काष्ठ की मणिमयी तथा चित्रमयी | इनमेसे किसी भी वस्तुकी सर्वलक्षणसम्पन्न प्रतिमा बनाकर स्थापित करे | माता देवकी का स्तनपान करती हुई बालस्वरूप मेरी प्रतिमा उनके समीप पलंग के ऊपर स्थापित करे | एक कन्या के साथ माता यशोदा की प्रतिमा भी वहां स्थापित की जाय | सूतिका-मंडप के ऊपर की भित्त्तियों में देवता, ग्रह, नाग तथा विद्याधर आदि की मूर्तियाँ हाथोसे पुष्प-वर्षा करते हुए बनाये | वसुदेवजी को सूतिकागृह के बाहर खंग और ढाल धारण किये चित्रित करना चाहिये | वसुदेवजी महर्षि कश्यप के अवतार हैं और देवकी माता अदितिकी | बलदेवजी शेषनाग के अवतार हैं, नन्दबाबा दक्षप्रजापति के, यशोदा दिति की और गर्गमुनि ब्रह्माजी के अवतार है | कंस कालनेमिका अवतार है | कंस के पहरेदारों को सूतिकागृह के आस-पास निद्रावस्था में चित्रित करना चाहिये | गौ, हाथी आदि तथा नाचती-गाती हुई अप्सराओं और गन्धर्वो की प्रतिमा भी बनाये | एक ओर कालिय नाग को यमुना के ह्रदय में स्थापित करे |

इसप्रकार अत्यंत रमणीय नवसुतिका-गृह में देवी देवकी का स्थापनकर भक्ति से गंध, पुष्प, अक्षत, धूप, नारियल, दाडिम, ककड़ी, बीजपूर, सुपारी, नारंगी तथा पनस आदि जो फल उस देशमें उससमय प्राप्त हों, उन सबसे पूजनकर माता देवकी की इसप्रकार प्रार्थना करे –

गायभ्दि: किन्नराध्यै: सततपरिवृता वेणुवीणानीनादै भृंगारादर्शकुम्भप्रमरकृतकरै: सेव्यमाना मुनीन्द्रै: |
पर्यन्गे स्वास्तृते या मुदित्ततरमना: पुत्रिणी सम्यगास्ते सा देवी देवमाता जयति सुवदना देवकी कान्तरूपा ||

‘जिनके चारों ओर किन्नर आदि अपने हाथों में वेणु तथा वीणा-वाद्यों के द्वारा स्तुति-गान कर रहे हैं और जो अभिषेक-पात्र, आदर्श, मंगलमय कलश तथा चँवर हाथों में लिए श्रेष्ठ मुनिगणोंद्वारा सेवित हैं तथा जो कृष्ण-जननी भलीभांति बिछे हुए पलंगपर विराजमान हैं, उन कमनीय स्वरुपवाली सुवदना देवमाता अदिति-स्वरूपा देवी देवकी की जय हो |’

उससमय यह ध्यान करे कि कमलासना लक्ष्मी देवकी के चरण दबा रही हो | उन देवी लक्ष्मी की – ‘नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नम: |’ इस मन्त्र से पूजा करे | इसके बाद ‘ॐ देवक्यै नम:, ॐ वसुदेवाय नम:, ॐ बलभद्राय नम:, ॐ श्रीकृष्णाय नम:, ॐ सुभद्रायै नम:, ॐ नन्दाय नम: तथा ॐ यशोदायै नम:’ – इन नाम-मन्त्रों से सबका अलग-अलग पूजन करे |

कुछ लोग चन्द्रमा के उदय हो जानेपर चंद्रमा को अर्घ्य प्रदान कर हरि का ध्यान करते हैं, उन्हें निम्नलिखित मन्त्रों से हरि का ध्यान करना चाहिये –

अनघं वामनं शौरि वैकुण्ठ पुरुषोत्तमम |
वासुदेवं हृषीकेशं माधवं मधुसूदनम ||
वाराहं पुण्डरीकाक्षं नृसिंहं ब्राह्मणप्रियम |
दामोदरं पद्यनाभं केशवं गरुड़ध्वजम |
गोविन्दमच्युतं कृष्णमनन्तमपराजितम |
अघोक्षजं जगद्विजं सर्गस्थित्यन्तकारणम |
अनादिनिधनं विष्णुं त्रैलोक्येश त्रिविक्रमम |
नारायण चतुर्बाहुं शंखचक्रगदाधरम |
पीताम्बरधरं नित्यं वनमालाविभूषितम |
श्रीवत्सांग जगत्सेतुं श्रीधरं श्रीपति हरिम || (उत्तरपर्व ५५/४६ – ५०)

इन मन्त्रों से भगवान् श्रीहरि का ध्यान करके ‘योगेश्वराय योगसम्भवाय योगपतये गोविन्दाय नमो नम:’ – इस मन्त्र से प्रतिमा को स्नान कराना चाहिये |अनन्तर ‘यज्ञेश्वराय यज्ञसम्भवाय यज्ञपतये गोविन्दाय नमो नम:’ – इस मंत्रसे अनुलोपन, अर्घ्य, धूप, दीप आदि अर्पण करे | तदनंतर ‘विश्वाय विश्वेश्वराय विश्वसम्भवाय विश्वपतये गोविन्दाय नमो नम: |’ इस मन्त्र से नैवेद्य निवेदित करे | दीप अर्पण करने का मन्त्र इसप्रकार हैं – धम्रेश्वराय धर्मपतये धर्मसम्भवाय गोविन्दाय नमो नम: |’

इसप्रकार वेदी के ऊपर रोहिणी-सहित चन्द्रमा, वसुदेव, देवकी, नन्द, यशोदा और बलदेवजी का पूजन करे, इससे सभी पापों से मुक्ति हो जाती हैं | चंद्रोदय के समय इस मन्त्र से चंद्रमा को अर्घ्य प्रदान करे –

क्षीरोदार्नवसम्भूत अत्रिनेत्रसमुद्भव |
गृहनार्घ्य शशाकेंदों रोहिण्या सहितो मम || (उत्तरपर्व ५५/५४)

आधी रात को गुड और घी से वसोर्धारा की आहुति देकर षष्ठीदेवी की पूजा करे | उसी क्षण नामकरण आदि संस्कार भी करने चाहिये | नवमी के दिन प्रात:काल मेरे ही समान भगवती का भी उत्सव करना चाहिये | इसके अनन्तर ब्राह्मणों को भोजन कराकर ‘कृष्णो में प्रीयताम’ कहकर यथाशक्ति दक्षिणा देनी चाहिये |

धर्मनंदन ! इसप्रकार जो मेरा भक्त पुरुष अथवा नारी देवी देवकी के इस महोत्सव को प्रतिवर्ष करता हैं, वह पुत्र, सन्तान, आरोग्य, धन-धान्य, सदगृह, दीर्घ आयुष्य और राज्य तथा सभी मनोरथों को प्राप्त करता हैं | जिस देशमें यह उत्सव किया जाता है, वहाँ जन्म-मरण, आवागमन की व्याधि, अवृष्टि तथा ईति-भीती आदि का कभी भय नहीं रहता | मेघ समयपर वर्षा करते हैं | पांडूपुत्र ! जिस घर में यह देवकी-व्रत किया जाता हैं, वहाँ अकालमृत्यु नहीं होती और न गर्भपात होता हैं तथा वैधव्य, दौर्भाग्य एवं कलह नहीं होता | जो एक बार भी इस व्रत को करता हैं, वहा विष्णुलोक को प्राप्त होता है | इस व्रत के करनेवाले संसार के सभी सुखों को भोगकर अंत में विष्णुलोक में निवास करते हैं |

इति श्री भविष्यपुराण का उत्तरपर्व का चोवीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ |

हरि ॐ हरि ॐ

भविष्यपुराण भाग – १२४

bhavishy_puranॐ श्रीपरमात्मने नम :
श्रीगणेशाय नम:
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय

भविष्यपुराण

उत्तरपर्व

अध्याय – २३

विशोक –षष्ठी – व्रत

राजा युधिष्ठिर ने कहा – जनार्दन ! आपके श्रीमुख से पंचमी-व्रतों का विधान सुनकर बहुत प्रसन्नता हुई | अब आप षष्ठीव्रतों का विधान बतलाये | मैंने सुना हैं कि षष्ठी को भगवान सूर्य की पूजा करने से सभी व्याधियाँ शांत हो जाती हैं और सभी कामनाएँ पूर्ण हो जाती है |

भगवान् श्रीकृष्ण बोले – महाराज ! सर्वप्रथम मैं विशोक-षष्ठी ववर्त का विधान बतलाता हूँ | इस तिथि को उपवास करने से मनुष्य को कभी शोक नहीं होता | माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी को प्रभातकाल में उठकर दंतधावन करे, कृष्ण तिलों से स्नान आदि द्वारा पवित्र हो कृशर (खिचड़ी) का भोजन करे, रात्रि में ब्रह्मचर्यपूर्वक रहे | दूसरे दिन षष्ठी को प्रभातकाल में उठकर स्नान आदि से पवित्र हो जाय | सुवर्ण का एक कमल बनाये, उसे सूर्यनारायण का स्वरुप मानकर रक्तचन्दन, रक्तकरवीर-पुष्प और रक्तवर्ण के दो वस्त्र, धुप, दीप, नैवेद्य आदि से उनका पूजन करे | तदनन्तर हाथ जोडकर इस मन्त्र से प्रार्थना करे –

यथा विशोकं भवनं त्वयैवादित्य सर्वदा |
तथा विशोकता में स्वात त्वभ्दक्तिर्जन्मजन्मनि || (उत्तरपर्व ३८/७)

‘हे आदित्यदेव ! जैसे आपने अपना स्थान शोक से रहित बनाया हैं, वैसे ही मेरा भी भवन सदा शोकरहित हो तथा जन्म-जन्म में आप में भक्ति बनी रहे |’

इस विधिसे पूजनकर षष्ठी को ब्राह्मण-भोजन कराये | गोमूत्र का प्राशन करे | फिर गुड़, अन्न, उत्तम दो वस्त्र और सुवर्ण ब्राह्मण को प्रदान करे | सप्तमी को मौन होकर तेल और लवणरहित भोजन करे और पुराण भी श्रवण करे | इसप्रकार एक वर्षपर्यन्त दोनों पक्षों की षष्ठी का व्रतकर अंत में शुक्ल सप्तमी को सुवर्ण-कमलयुक्त कलश, श्रेष्ठ सामग्रियों से युक्त उत्तम शय्या और पयस्विनी कपिला गौ ब्राह्मण को दान करे | इस विधि से कृपनता छोडकर जो इस व्रत को करता हैं, वह करोड़ों वर्षो से भी अधिक समयतक शोक, रोग, दुर्गति आदि से मुक्त रहता हैं | यदि किसी कामना से यह व्रत किया जाय तो उसकी वह कामना अवश्य पूर्ण होती है और यदि निष्काम होकर व्रत करे तो उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है | जो इस शोक-विनाशिनी विशोक-षष्ठी का एक बार भी उपवास करते हैं, वह कभी दु:खी नहीं होता और इन्द्रलोक में निवास करता है |

इति श्री भविष्यपुराण का उत्तरपर्व का तेविसवाँ अध्याय समाप्त हुआ |

हरि ॐ हरि ॐ

भविष्यपुराण भाग – १२३

bhavishy_puranॐ श्रीपरमात्मने नम :
श्रीगणेशाय नम:
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय

भविष्यपुराण

उत्तरपर्व

अध्याय – २२

श्रीपंचमीव्रत कथा

राजा युधिष्ठिर ने पूछा – भगवन ! तीनों लोकों में लक्ष्मी दुर्लभ हैं; पर व्रत, होम, तप, जप, नमस्कार आदि किस कर्म के करने से स्थिर लक्ष्मी प्राप्त होती है ? आप सब कुछ जाननेवाले हैं, कृपाकर उसका वर्णन करे |

भगवान श्रीकृष्ण बोले – महाराज ! सुना जाता हैं कि प्राचीन काल में भृगुमुनिकी ‘ख्याति’ नामकी स्त्री से लक्ष्मी का आविर्भाव हुआ | भृगु ने विष्णुभगवान के साथ लक्ष्मी का विवाह कर दिया | लक्ष्मी भी संसार के पति भगवान् विष्णु को वर के रूप में प्राप्तकर अपने को कृतार्थ मानकर अपने कृपाकटाक्ष से सम्पूर्ण जगत को आनन्दित करने लगी | उन्हीं से प्राजाओं में क्षेम और सुभिक्ष होने लगा | सभी उपद्रव शांत हो गये | ब्राह्मण हवन करने लगे, देवगण हविष्य-भोजन प्राप्त करने लगे और राजा प्रसन्नतापूर्वक चारों वर्णों की रक्षा करने लगे | इसप्रकार देवगणों को अतीव आनंद में निमग्न देखकर विरोचन आदि दैत्यगण लक्ष्मी की प्राप्ति के लिये तपस्या एवं यज्ञ-यागादि करने लगे | वे सब भी सदाचारी और धार्मिक हो गये | फिर दैत्यों के पराक्रम से सारा संसार आक्रान्त हो गया |

कुछ समय बाद देवताओं को लक्ष्मी का मद हो गया, उन लोगों के सौच, पवित्रता, सत्यता और सभी उत्तम आचार नष्ट होने लगे | देवताओं को सत्य आदि शील तथा पवित्रता से रहित देखकर लक्ष्मी दैत्यों के पास चली गयी और देवगण श्रीविहीन हो गये | दैत्यों को भी लक्ष्मी की प्राप्ति होते ही बहुत गर्व हो गया और दैत्यगण परस्पर कहने लगे कि ‘मैं ही देवता हूँ, मैं ही यज्ञ हूँ, मैं ही ब्राह्मण हूँ, सम्पूर्ण जगत मेरा ही स्वरूप हैं, ब्रह्मा, विष्णु, इंद्र, चन्द्र, आदि सब मैं ही हूँ |’ इसप्रकार अतिशय अहंकारमति दैत्यों की भी यह दशा देखकर व्याकुल हो वह भृगुकन्या भगवती लक्ष्मी क्षीरसागर में प्रविष्ट हो गयी | क्षीरसागर में लक्ष्मी के प्रवेश करने से तीनों लोक श्रीविहीन होकर अत्यंत निस्तेज-से हो गये |

देवराज इंद्र ने अपने गुरु बृहस्पति से पूछा – महाराज ! कोई ऐसा व्रत बताये, जिसका अनुष्ठान करने से पुन: स्थिर लक्ष्मी की प्राप्ति हो जाय |

देवगुरु बृहस्पति बोले – देवेन्द्र ! मैं इस सम्बन्ध में आपको अत्यंत गोपनीय श्रीपंचमी-व्रत का विधान बतलाता हूँ | इसके करने से आपका अभीष्ट सिद्ध होगा | ऐसा कहकर देवगुरु बृहस्पति ने देवराज इंद्र को श्रीपंचमी-व्रत की सांगोपांग विधि बतलायी | तदनुसार इंद्र ने उसका विधिवत आचरण किया | इंद्र को व्रत करते देखकर विष्णु आदि सभी देवता, दैत्य, दानव, गंधर्व, यक्ष, राक्षस, सिद्ध, विद्याधर, नाग, ब्राह्मण, ऋषिगण तथा राजागण भी यह व्रत करने लगे | कुछ काल के अनन्तर व्रत समाप्तकर उत्तम बल और तेज पाकर सबने विचार किया कि समुद्र को मथकर लक्ष्मी और अमुत को ग्रहण करना चाहिये | यह विचारकर देवता और असुर मदंरपर्वत को मथानी और वासुकि नाग को रस्सी बनाकर समुद्र-मंथन करने लगे | फलस्वरूप सर्वप्रथम शीतल किरणोंवाले अति उज्ज्वल चन्द्रमा प्रकट हुए, फिर देवी लक्ष्मी का प्रादुर्भाव हुआ | लक्ष्मी के कृपाकटाक्ष को पाकर सभी देवता और दैत्य परम आनंदित हो गये | भगवती लक्ष्मी ने इनका वरण किया | इंद्र ने राजस-भाव से व्रत किया था, इसलिये उन्होंने त्रिभुवन का राज्य प्राप्त किया | दैत्यों ने तामस-भाव से व्रत किया था, इसलिये ऐश्वर्य पाकर भी वे ऐश्वर्यहीन हो गये | महाराज ! इसप्रकार इस व्रत के प्रभाव से श्रीविहीन सम्पूर्ण जगत फिरसे श्रीयुक्त हो गया |

महाराज युधिष्ठिरने पूछा– यदुत्तम ! यह श्रीपंचमी-व्रत किस विधि से किया जाता हैं, कब से यह प्रारम्भ होता है और इसकी पारणा कब होती हैं ? आप इसे बताने की कृपा करें |

भगवान् श्रीकृष्ण बोले – महाराज ! यह व्रत मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी को करना चाहिये | प्रात: उठकर सौच, दन्तधावन आदि से निवृत्त हो व्रत के नियम को धारण करे | फिर नदी में अथवा घरपर ही स्नान करे | दो वस्र धारण कर देवता और पितरों का पूजन-तर्पण कर घर आकर लक्ष्मी का पूजन करे | सुवर्ण, चाँदी, ताम्र, आरकुट, काष्ठ की अथवा चित्रपट में भगवती लक्ष्मी की ऐसी प्रतिमा बनाये जो कमलपर विराजमान हो, हाथ में कमल-पुष्प धारण किये हो, सभी आभूषणों से अलंकृत हो, उनके लोचन कमल के समान हो और जिन्हें चार श्वेत हाथी सुवर्ण के कलशों के जल से स्नान करा रहे हो | इस प्रकार की भगवती लक्ष्मी की प्रतिमा की निम्नलिखित नाम-मन्त्रों से ऋतूकालोभ्दुत पुरुषोंद्वारा अंगपूजा करे –

ॐ चपलायै नम:, पादौ पुजयापी’, ‘ॐ चश्वलायै नम:, जानुनी पूजयामि’, ‘ॐ कमलवासिन्यै नम:, कटि पूजयामि’, ‘ ॐ ख्यात्यै नम: नाभिं पूजयामि’ , ‘ॐ मन्मथवासिन्यै नम:, स्तनौ पूजयामि’, ॐ ललितायै नम:, भुजद्वयं पूजयामि’, ‘ॐ उत्कंठीतायै नम:, कंठ पूजयामि’, ‘ॐ माधव्यै नम:, मुखमंडलं पूजयामि’ तथा ‘ॐ श्रियै नम:, शिर: पूजयामि’ आदि नाममन्त्रों से पैर से लेकर सिरतक पूजा करे | इसप्रकार प्रत्येक अंगों की भक्तिपूर्वक पूजाकर अंकुरित विविध धान्य और अनेक प्रकार के फल नैवेद्य में देवी को निवेदित करे | तदनंतर पुष्प और कुंकुम आदि से सुवासिनी स्त्रियों का पूजन कर उन्हें मधुर भोजन कराये और प्रणाम कर बिदा करे | एक प्रस्थ (सेरभर) चावल और घृत से भरा पात्र ब्राह्मण को देकर ‘श्रीश: सम्प्रीयताम’ इसप्रकार कहकर प्रार्थना करे | इसतरह पूजन कर मौन हो भोजन करे और श्री, लक्ष्मी, कमला, सम्पत, रमा, नारायणी, पद्म, धृति, स्थिति, पुष्टि, ऋद्धि तथा सिद्धि – इन बारह नामों से क्रमश: बारह महीनों में भगवती लक्ष्मी की पूजा करे और पूजन के अंत में ‘प्रीयताम’ ऐसा उच्चारण करे | बारहवें महीने की पंचमी को वस्त्र से उतम मंडप बनाकर गंध-पुष्पादि से उसे अलंकृतकर उसके मध्य शय्यापर उपकरणोंसहित भगवती लक्ष्मी की मूर्ति स्थापित करे | आठ मोती, नेत्रपट्ट, सप्त-धान्य, खड़ाऊँ, जूता, छाता, अनेक प्रकार के पात्र और आसन वहाँ उपस्थापित करे | तदनंतर लक्ष्मी का पूजन कर वेदवेत्ता और सदाचार सम्पन्न ब्राह्मण को सवत्सा गौसहित यह सब सामग्री प्रदान करे | यथाशक्ति ब्राह्मणों को भोजन कराकर उन्हें दक्षिणा दे | अंत में भगवती लक्ष्मी से ऋद्धि की कामना से इसप्रकार प्रार्थना करे –

क्षीराब्धिमथनोभ्दुते विष्णोर्वक्ष:स्थलालये |
सर्वकामप्रदे देवि ऋद्धिं यच्छ नमोऽस्तु ते || (उत्तरपर्व ३७/५४)

‘हे देवि ! आप क्षीरसागर के मंथन से उभ्दूत हैं, भगवान् विष्णु का वक्ष:स्थल आपका अधिष्ठान हैं, आप सभी कामनाओं को प्रदान करनेवाली हैं, अत: मुझे भी आप ऋद्धि प्रदान करे, आपको नमस्कार हैं |’

जो इस विधि से श्रीपंचमी का व्रत करता हैं, वह अपने इक्कीस कुलों के साथ लक्ष्मीलोक में निवास करता हैं | जो सौभाग्यवती स्त्री इस व्रत को करती है, वह सौभाग्य, रूप, सन्तान और धन से सम्पन्न हो जाती हैं तथा पति को अत्यंत प्रिय होती है |

इति श्री भविष्यपुराण का उत्तरपर्व का बावीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ |

हरि ॐ हरि ॐ

भविष्यपुराण भाग – १२२

bhavishy_puranॐ श्रीपरमात्मने नम :
श्रीगणेशाय नम:
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय

भविष्यपुराण

उत्तरपर्व

अध्याय – २१

सरस्वती व्रत का विधान और फल

राजा युधिष्ठिर ने पूछा – भगवन ! किस व्रत के करने से वाणी मधुर होती है ? प्राणीको सौभाग्य प्राप्त होता है ? विद्या में अतिकौशल प्राप्त होता है ?, पति -पत्नी का और बंधुजनों का कभी वियोग नहीं होता तथा दीर्घ आयुष्य प्राप्त होता हैं ? उसे आप बतलायें |

भगवान श्रीकृष्ण बोले– राजन ! आपने बहुत उत्तम बात पूछी हैं | इन फलों को देनेवाले सारस्वतव्रत का विधान आप सुने | इस व्रत के कीर्तनमात्र से भी भगवती सरस्वती प्रसन्न हो जाती है | इस व्रत को वत्सरारम्भ में चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी को आदित्यवार से प्रारम्भ करना चाहिये | इस दिन भक्तिपूर्वक ब्राह्मण के द्वारा स्वस्तिवाचन कराकर गंध, श्वेत माला, शुक्ल, अक्षत और श्वेत वस्रादि उपचारों से, वीणा, अक्षमाला, कमंडलु तथा पुस्तक धारण की हुई एवं सभी अलंकारों से अलंकृत भगवती गायत्री का पूजन करे | फिर हाथ जोडकर इन मंत्रो से प्रार्थना करे –

यथा तु देवि भगवान ब्रह्मा लोकपितामह: |
त्वां परित्यज्य नो तिष्ठेत तथा भव वरप्रदा ||
वेदशास्त्राणि सर्वाणि नृत्यगीतादिकं च यत |
वाहितं यत त्वया देवि तथा में सन्तु सिद्धय: ||
लक्ष्मीमेंधा वरा रिष्टिगौरी तुष्टि: प्रभा मति : |
एताभि: पाहि तनुभिरष्टभिमाँ सरस्वति || ( उत्तरपर्व ३५/७-९)

‘देवि ! जिसप्रकार लोकपितामह ब्रह्मा आपका परित्यागकर कभी अलग नहीं रहते, उसीप्रकार आप हमे भी वर दीजिये कि हमारा भी कभी अपने परिवार के लोगों से वियोग न हो | हे देवि ! वेदादि सम्पूर्ण शास्त्र तथा नृत्य-गीतादि जो भी विद्याएँ हैं, वे सभी आपके अधिष्ठान में ही रहती है, वे सभी मुझे प्राप्त हों | हे भगवती सरस्वती देवि ! आप अपनी-लक्ष्मी, मेधा, वरा, रिष्टि, गौरी, तुष्टि, प्रभा तथा मति – इन आठ मूर्तियों के द्वारा मेरी रक्षा करें |’

इस विधि से प्रार्थनाकर मौन होकर भोजन करे | प्रत्येक मासके शुक्ल पक्ष की पंचमी को सुवासिनी स्त्रियों का भी पूजन करे और उन्हें तिल तथा चावल, घृतपात्र, दुग्ध तथा सुवर्ण प्रदान करे और देते समय ‘गायत्री प्रीयताम’ ऐसा उच्चारण करे | सायंकाल मौन रहे | इसतरह वर्षभर व्रत करे | व्रत की समाप्तिपर ब्राह्मण को भोजन के लिये पूर्णपात्र में चावल भरकर प्रदान करे | साथ ही दो श्वेत वस्त्र, सवत्सा गौ, चंदन आदि भी दे | देवी को निवेदित किये गये वितान, घंटा, अन्न आदि पदार्थ भी ब्राह्मण को दान कर दे | पूज्य गुरु का भी वस्त्र, माल्य तथा धन-धान्य से पूजन करे | इस विधि से जो पुरुष सारस्वत व्रत करता हैं, वह विद्वान, धनवान और मधुर कंठवाला होता है | भगवती सरस्वती की कृपा से वह वेदव्यास के समान कवि हो जाता है | नारी भी यदि इस व्रत का पालन करे तो उसे भी पूर्वोक्त फल प्राप्त होता है ||
इति श्री भविष्यपुराण का उत्तरपर्व का इक्कीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ |

हरि ॐ हरि ॐ

भविष्यपुराण भाग – १२१

bhavishy_puranॐ श्रीपरमात्मने नम :
श्रीगणेशाय नम:
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय

भविष्यपुराण

उत्तरपर्व

अध्याय – २०

शान्तिव्रत

भगवान् श्रीकृष्ण बोले – महाराज ! अब मैं पंचमी कल्प में शान्तिव्रत का वर्णन करता हूँ | इसके करने से गृहस्थो को सब प्रकार की शान्ति प्राप्त होती हैं | कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी से लेकर एक वर्षपर्यन्त खट्टे पदार्थों का भोजन न करे | नक्तव्रत कर शेषनाग के ऊपर स्थित भगवान विष्णु का पूजन करे और निम्नलिखित मन्त्रों से उनके अंगों की पूजा करे –

‘ॐ अनन्ताय नम: पादौ पूजयामि’ से भगवान् विष्णु के दोनों पैरों की, ‘ॐ धृतराष्ट्रय नम: कटिं पूजयामि’ से कटिप्रदेश की, ‘ॐ तक्षकाय नम: उदरं पूजयामि’ से उदरदेश की, ‘ ॐ कर्कोटकाय नम: उर: पूजयामि’ से ह्रदय की, ‘ॐ पद्माय नम: कर्णौ पूजयामि’ से दोनों कानों की, ‘ॐ महापद्माय नम: दोर्युगं पूजयामि’ से भुजाओं की, ‘ॐ शंखपालाय नम: वक्ष: पूजयामि’ से वक्ष:स्थल की तथा ‘ॐ कुलिकाय नम: शिर: पूजयामि’ से उनके मस्तक की पूजा करे |

तदनंतर मौन हो भगवान् विष्णु को दूध से स्नान कराये, फिर दुग्ध और तिलों से हवन करे | वर्ष पूरा होने पर नारायण तथा शेषनाग की सुवर्णप्रतिमा बनवाकर उनका पूजन कर ब्राह्मण को दान दे, साथ ही उसे सवत्सा गौ, पायस से पूर्ण कांस्यपात्र, दो वस्र और यथाशक्ति सुवर्ण भी प्रदान करे | तत्पश्च्यात ब्राह्मण-भोजन कराकर व्रत समाप्त करे | जो व्यक्ति इस व्रत को भक्तिपूर्वक करता है, वह नित्य शान्ति प्राप्त करता हैं और उसे नागों का कभी भी कोई भय नही रहता |

इति श्री भविष्यपुराण का उत्तरपर्व का बिसवावाँ अध्याय समाप्त हुआ |

हरि ॐ हरि ॐ