Category Archives: Bramhapuran

ब्रह्मपुराण अध्याय – ७३

brmhapuran|| ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ||

ब्रह्मपुराण

अध्याय – ७३

श्रीब्रह्मपुराण की महिमा तथा ग्रन्थ का उपसंहार

लोमहर्षणजी कहते हैं – द्विजवरो ! इसप्रकार पूर्वकाल में महर्षि व्यासने सारभूत निर्दोष वचनोंद्वारा मधुरवाणी में मुनियों को यह पुराण सुनाया था | इसमें अनेक शास्त्रों के शुद्ध एवं निर्मल सिद्धांतों का समावेश हैं | यह सहज शुद्ध है और अच्छे शब्दों के प्रयोग से सुशोभित होता है | इसमें यथास्थान पूर्वपक्ष और सिद्धांतका प्रतिपादन किया गया है | इस पुराण को न्यायानुकुल रीति से सुनाकर परम बुद्धिमान वेदव्यासजी मौन हो गये | वे श्रेष्ठ मुनि भी सम्पूर्ण मनोवांछित फलों को देनेवाले तथा वेदों के तुल्य माननीय इस आदि ब्रह्मपुराण को सुनकर बहुत प्रसन्न और विस्मित हुए | उनहोंने मुनिवर श्रीकृष्णद्वैपायन व्यासकी बारंबार प्रशंसा की |

मुनि बोले – मुनिश्रेष्ठ ! आपने हमें वेदों के तुल्य प्रामाणिक तथा सम्पूर्ण अभीष्ट फलों को देनेवाला सर्वपापहारी श्रेष्ठ पुराण सुनाया हैं | यह कितने हर्ष की बात है | हमने भी इस विचित्र पदोंवाले पुराण का अक्षर-अक्षर सुना है | प्रभो ! तीनों लोकों में ऐसी कोई वस्तु नही हैं, जो आपको विदित न हो | महाभाग ! आप देवताओं में बृहस्पतिकी भान्ति सर्वज्ञ है, महाप्राज्ञ और ब्रह्मनिष्ठ हैं | महामते ! हम आपको नमस्कार करते हैं | आपने महाभारत में सम्पूर्ण वेदों के अर्थ प्रकट किये है | महामुने ! आपके सम्पूर्ण गुणों का वर्णन करने में कौन समर्थ हैं | जिन्होंने छहों अन्गोंसहित चारों वेदों तथा सम्पूर्ण व्याकरणों को पढकर महाभारत शास्त्र की रचना की, उन ज्ञानात्मा भगवान वेदव्यास को नमस्कार है | प्रफुल्ल कमलदल के समान बड़े-बड़े नेत्रों तथा विशाल बुद्धिवाले व्यासजी ! आपको नमस्कार है | आपने महाभारतरूपी तेल से भरे हुए ज्ञानरुपी दीपक को जलाया है |

नमोऽस्तु ते व्यास विशालबुद्धे फुल्लारविंदातपत्रनेत्र |
येन त्वया भारततैलपूर्ण: प्रज्वालितो ज्ञानमय: प्रदीप: ||

यों कहकर उन महर्षियों ने व्यासजी का पूजन किया | फिर व्यासजी ने भी उन सबका सम्मान किया | तत्पश्च्यात वे कृतार्थ होकर जैसे आये थे, उसी प्रकार अपने आश्रम को लौट गये |

मुनिवरो ! आपने हमसे जिसप्रकार प्रश्न किया था, उसके अनुसार हमने भी सब पापों का नाश करनेवाले परम पुण्यमय इस सनातन पुराण का वर्णन किया | श्रीव्यासजी की कृपा से ही मैंने यह सब कुछ आपलोगों को सुनाया है | ग्रहस्थ, संन्यासी और ब्रह्मचारी – सबको ही इस पुराण का श्रवण करना चाहिये | यह मनुष्यों को धन और सुख देनेवाला, परम पवित्र एवं पापों का दूर करनेवाला है | परम कल्याण की अभिलाषा रखनेवाले ब्रह्मपरायण ब्राह्मण आदि को संयम और प्रयत्नपूर्वक यह पुराण सुनना चाहिये | इसको सुननेसे ब्राह्मण विद्या, क्षत्रिय संग्राम में विजय, वैश्य अक्षय धन और शुद्र सुख पाता है | पुरुष पवित्र होकर जिस-जिस काम्य वस्तुका चिन्तन करते हुए इस पुराण का श्रवण करता हैं, उस-उसको निश्चय ही प्राप्त कर लेता हैं | यह ब्रह्मपुराण भगवान विष्णु से सम्बन्ध रखनेवाला हैं | इससे सब पापों का नाश हो जाता हैं | यह सब शास्त्रों से विशिष्ट और समस्त पुरुषार्थों का साधक है |

यह जो मैंने आपलोगों को वेदतुल्य पुराण का श्रवण कराया हैं, इसको सुननेसे सब प्रकार के दोषों से प्राप्त होनेवाली पापराशि का नाश हो जाता हैं | प्रयाग, पुष्कर, कुरुक्षेत्र तथा अर्बुदारन्य (आबू) में उपवास करनेसे जो फल मिलता है, वह इसके श्रवणमात्र से मिल जाता हैं | एक वर्षतक अग्नि में हवन करने से पुरुष को जो महापुण्यमय फल प्राप्त होता है, वह इसे एक बार सुनने से ही मिल जाता हैं | जेष्ठ मास के शुक्लपक्ष की द्वादशी को यमुना में स्नान करके मथुरापूरी में श्रीहरि के दर्शन से मनुष्य जिस फलका भागी होता है, वह एकाग्रचित्त होकर इस ब्रह्मपुराण की कथा कहने से ही प्राप्त हो जाता हैं | जो इसका पाठ अथवा श्रवण करता है, वह भी उसी फलको प्राप्त करता है | जो मनुष्य प्रतिदिन श्रद्धापूर्वक इस वेदसम्मित पुराण का पाठ या श्रवण करता हैं, वह भगवान् विष्णु के धाम में जाता हैं और जो ब्राह्मण मन और इन्द्रियों को संयम में रखकर पर्वों के दिन तथा एकादशी और द्वादशी तिथि को ब्रह्मपुराण बाँचकर दूसरों को सुनाता हैं, वह वैकुण्ठ धाम में जाता हैं |

इदं हि श्रद्धया नित्यं पुराणं वेदसम्मितम | य: पठेच्छणुयान्मर्त्यं: स याति भुवनं हरे: ||
श्रावयेदब्राह्मणों यस्तु सदा पर्वसु संयत: | एकादश्यां द्वादश्यां च विष्णुलोकं स गच्छति ||

यह पुराण मनुष्यों को यश, आयु, सुख, कीर्ति,बल, पुष्टि तथा धन देनेवाला और अशुभ स्वप्नों का नाश करनेवाला है | जो प्रतिदिन तीनों संध्याओं के समय एकाग्रचित्त हो श्रद्धापूर्वक इस श्रेष्ठ उपाख्यान का पाठ करता हैं, वह सम्पूर्ण अभीष्ट वस्तुओं को प्राप्त कर लेता है न| इसको पढने और सुनने से रोगातुर मनुष्य रोगसे, कैद में पड़ा हुआ पुरुष वहाँ के बंधन से, भय से डरा हुआ मानव भय से तथा आपत्तिग्रस्त पुरुष आपत्ति से छुट जाता हैं | इतना ही नहीं; इसके पाठ और श्रवण से पूर्वजन्मों के स्मरण की शक्ति, विद्या, पुत्र, धारणावती बुद्धि, पशु, धैर्य, धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को भी मनुष्य प्राप्त कर लेता हैं | जिन-जिन कामनाओं को मनमें लेकर मनुष्य संयतचित्त से इस पुराण का पाठ करता हैं, उन सबकी उसे प्राप्ति हो जाती है – इसमें तनिक भी संदेह नही हैं |

जो मनुष्य एकमात्र भगवान की भक्ति में चित्त लगाकर पवित्र हो अभीष्ट वर देनेवाले लोकगुरु भगवान विष्णु को प्रणाम करके स्वर्ग और मोक्ष प्रदान करनेवाले इस पुराण का निरंतर श्रवण करता हैं, उसके सारे पाप छुट जाते हैं | वह इस लोक में उत्तम सुख भोगकर स्वर्ग में भी दिव्य सुख का अनुभव करता हैं | तत्पश्चात प्राकृत गुणों से मुक्त हो भगवान विष्णु के निर्मल पद को प्राप्त होता है | इसलिये एकमात्र मुक्तिमार्ग की इच्छा रखनेवाले स्वधर्मपरायण श्रेष्ठ ब्राह्मणों को, मन और इन्द्रियों को वश में रखनेवाले कल्याणकामी उत्तम क्षत्रियों को, विशुद्ध कुल में उत्पन्न वैश्यों को तथा धर्मनिष्ठ शूद्रों को भी प्रतिदिन इस पुराण का श्रवण करना चाहिये | यह बहुत ही उत्तम, अनेक फलों से युक्त तथा धर्म, अर्थ एवं मोक्ष प्रदान करनेवाला है | आप सब लोग श्रेष्ठ पुरुष है, अत: आपकी बुद्धि निरंतर धर्म में लगी रहे | एकमात्र धर्म ही परलोक में गये हुए प्राणी के लिये बन्धु की भान्ति सहायक है | धन और स्त्री आदि भोगों का चतुर – से – चतुर मनुष्य भी क्यों न सेवन करे, उनपर न तो कभी भरोसा किया जा सकता हैं और न वे सदा स्थिर ही रहते हैं | मनुष्य धर्म से ही राज्य प्राप्त करता हैं, धर्म से ही वह स्वर्ग में जाता हैं तथा धर्म से ही मानव आयु, कीर्ति, तपस्या एवं धर्म का उपार्जन करता हैं और धर्म से ही उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है | इस लोक में तथा परलोक में भी धर्म ही मनुष्य के लिये माता-पिता और सखा है | इस लोकमें भी धर्म ही रक्षक है और वही मोक्ष की भी प्राप्ति करानेवाला है | धर्म के सिवा कुछ भी काम नहीं आता | यह श्रेष्ठ पुराण परम गोपनीय तथा वेद के तुल्य प्रामाणिक है | खोटी बुद्धिवाले और विशेषत: नास्तिक पुरुष को इसका उपदेश नही देना चाहिये | यह श्रेष्ठ पुराण पापों का नाश तथा धर्म की वृद्धि करनेवाला है | साथ ही इसे अत्यंत गोपनीय माना गया है | मुनियों ! मैंने आपलोगों के सामने इसका कथन किया उअर आपने भी इसे भलीभांति सुन लिया |

धर्मेण राज्यं लभते मनुष्य: स्वर्ग च धर्मेण नर: प्रयाति | आयुश्च्य कीर्ति च तपश्व धर्म धर्मेण मोक्षं लभते मनुष्य: ||
धमोंऽत्र मातापितरौ नरस्य धर्म: सखा चात्र परे च लोके | त्राता च धर्मस्त्विह मोक्षदश्व धर्मादृते नास्ति तू किंचिदेव ||
इदं रहस्यं श्रेष्ठं च पुराणं वेद्सम्मितम | न देयं दुष्टमतये नास्तिकाय विशेषत: ||
इदं मयोक्तं प्रवरं पुराणं पापापहं धर्मविवर्धनं च | श्रुतं भवद्भि: परमं रहस्यमाज्ञापयध्वं मुनयो व्रजामि ||

– नारायण नारायण –
– इति श्री ब्रह्मपुराण सम्पूर्ण –
– ॐ तत्सदब्रह्मार्पणमस्तु –

===== ॐ =====

ब्रह्मपुराण अध्याय – ७२

brmhapuran|| ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ||

ब्रह्मपुराण

अध्याय – ७२

योग और सांख्य का वर्णन

व्यासजी कहते हैं – जिस प्रकार दुर्बल मनुष्य पानी के वेग में  बह जाता हैं , उसीप्रकार निर्बल योगी विषयों से विचलित हो जाता हैं | किन्तु उसी महान प्रवाह को जैसे हाथी रोक देता हैं, वैसे योग का महान बल पाकर योगी भी समस्त विषयों को रोक लेता हैं, उनके द्वारा विचलित नही होता | योगशक्तिसम्पन्न पुरुष स्वतंत्रापूर्वक समस्त प्रजापतियों, मनुओं तथा महाभूतों में प्रवेश कर जाते हैं | अमित तेजस्वी योगी के ऊपर क्रोध में भरे हुए यमराज, काल और भयंकर पराक्रम दिखानेवाली मृत्युका भी जोर नहीं चलता | वह योगबल पाकर अपने हजारों रूप बना सकता और उन सबके द्वारा इस पृथ्वीपर विचर सकता हैं | फिर तेज को समेट लेनेवाले सूर्य की भान्ति वह उन सभी रूपों को अपने में लीन करके उग्र तपस्या में प्रवृत्त हो जाता हैं | बलवान योगी बंधन तोड़ने में समर्थ होता हैं | उसमें अपने को मुक्त करने की पूर्ण शक्ति होती है |

द्विजवरो ! ये मैंने योग की स्थूल शक्तियाँ बतायी हैं | अब दृष्टांत के लिये योग से प्राप्त होनेवाली कुछ सूक्ष्म शक्तियों का वर्णन करूँगा तथा आत्म-समाधि के लिये जो चित्तकी धारणा की जाती हैं, उसके विषय में भी कुछ सूक्ष्म दृष्टांत बतलाऊँगा | जिस प्रकार सदा सावधान रहनेवाला धनुर्धर वीर चित्तको एकाग्र करके प्रहार करनेपर लक्ष्य को वेध देता हैं, उसीप्रकार जो योगी मन को परमात्मा के ध्यान में लगा देता हैं, वह नि:संदेह मोक्ष प्राप्त कर लेता हैं | जैसे सावधान मल्लाह समुद्र में पड़ी हुई नावको शीघ्र ही किनारे लगा देता हैं, उसीप्रकार योग के अनुसार तत्त्वको जाननेवाला पुरुष समाधि के द्वारा मन को परमात्मा में लगाकर देह का त्याग करने के अनन्तर दुर्गम स्थान (परम-धाम) को प्राप्त होता हैं | जिस प्रकार सावधान सारथि अच्छे घोड़ों को रथ में जोतकर धनुर्धर श्रेष्ठ वीर को तुरंत अभीष्ट स्थानपर पहुँचा देता हैं, वैसे ही धारणाओं में चित्त को एकाग्र करनेवाला योगी लक्ष्य की ओर छूटे हुए, बाण की भान्ति शीघ्र परम पदको प्राप्त कर लेता हैं | जो समाधि के द्वारा अपने आत्मा को परमात्मा में लगाकर स्थिर भाव से बैठा रहता है, उसे अजर (बुढ़ापे से रहित) पद की प्राप्ति होती है | योग के महान व्रत में एकाग्रचित्त रहनेवाला जो योगी नाभि, कंठ, पार्श्वभाग, ह्रदय, वक्ष:स्थल, नाक, कान, नेत्र और मस्तक आदि स्थानों में धारणा के द्वारा आत्मा को परमात्मा के साथ युक्त करता हैं, वह पर्वत के समान महान शुभाशुभ कर्मों को भी शीघ्र ही भस्म कर डालता हैं और इच्छा करते ही उत्तम योग का आश्रय ले मुक्त हो जाता हैं |

निर्मल अंत:करणवाले यति परमात्मा को प्राप्त करके तद्रूप हो जाते हैं | उन्हें अमृतत्त्व मिल जाता हैं, फिर वे संसार में नही लौटते | ब्राह्मणों ! यही परम गति है | जो सब प्रकार के द्वन्दो से रहित, सत्यवादी, सरल तथा सम्पूर्ण प्राणियोंपर दया करनेवाले हैं, उन महात्माओं को ही ऐसी गति प्राप्त होती है |

मुनि बोले – साधुशिरोमणे | दृढ़तापूर्वक व्रतका पालन करनेवाले यति उत्तम स्थानस्वरुप भगवान को प्राप्त होकर क्या निरंतर उन्हीं में रमण करते रहते हैं ? अथवा ऐसी बात नही है ? यहाँ जो तथ्य हो, उसका यथावत वर्णन कीजिये | आपके सिवा दूसरे किसी से हम ऐसा प्रश्न नहीं कर सकते |

व्यासजी ने कहा – मूनिवरो ! आपने जो प्रश्न किया है, वह उचित ही है | यह विषय बहुत ही कठिन हैं | इसमें विद्वानों को भी मोह हो जाता हैं | यहाँ भी जो परम तत्त्व की बात है, उसे बतलाता हूँ ; सुनो |

इसविषय में कपिल के सांख्यमत का अनुसरण करनेवाले महात्माओं का विचार उत्तम मना गया है | देहधारियों की इन्द्रियाँ भी अपने सूक्ष्म शरीर को जानती है; क्योंकि वे आत्मा के करण हैं और आत्मा भी उनके द्वारा सब कुछ देखता हैं | सम्पूर्ण इन्द्रियाँ स्वयं असमर्थ होने के कारण विष के द्वारा मारे हुए सर्पों की भान्ति अपने-अपने गोलकों में विलीन रहती है | उनकी सूक्ष्म गतिका आश्रय लेकर निश्चय ही आत्मा सर्वत्र विचरता हैं | सत्त्व, रज, तम, बुद्धि, मन, आकाश, वायु, तेज, जल और पृथ्वी – इन सबके गुणों को व्याप्त करके क्षेत्रज्ञ आत्मा सम्पूर्ण क्षेत्रों में विचरण करता है | जैसे शिष्य माहात्मा गुरु का अनुसरण करते हैं, उसी प्रकार इन्द्रियाँ क्षेत्रज्ञ आत्मा का अनुसरण करती हैं | सांख्ययोगी प्रकृति का भी अतिक्रमण करके शुद्ध, सूक्ष्म, परात्पर, निर्विकार, समस्त पापों से रहित, अनामय, निर्गुण तथा आनंदमय परमात्मा श्रीनारायण को प्राप्त होते हैं | विप्रवरो ! इस ज्ञान के समान दूसरा कोई ज्ञान नही है | इसके विषय में तुमको संदेह नही करना चाहिये | सांख्यज्ञान सबसे उत्कृष्ट माना गया हैं | इसमें अक्षर, ध्रुव एवं पूर्ण सनातन ब्रह्म का ही प्रतिपादन हुआ है | वह ब्रह्म आदि, मध्य और अंत से रहित, द्वंदों से अतीत, सनातन, कूटस्थ और नित्य है – ऐसा शान्तिपरायण विद्वान पुरुषों का कथन है | इसीसे जगत की उत्पत्ति और प्रलय आदिरूप सम्पूर्ण विकार होते हैं | गूढ़ तत्त्वों की व्याख्या करनेवाले महर्षियों ने शास्त्रों में ऐसा ही वर्णन किया हैं | सम्पूर्ण ब्राह्मण, देवता, वेद तथा सामवेत्ता पुरुष उसी अनंत, अच्युत, ब्राह्मणभक्त तथा परमदेव परमेश्वर की प्रार्थना करते और उनके गुणों का चिन्तन करते रहते हैं |

ब्राह्मणों ! महात्मा पुरुषों में , वेदों में, सांख्य और योग में तथा पुराणों में जो उत्तम ज्ञान देखा गया है, वह सब सांख्य से ही आया हुआ है | बड़े-बड़े इतिहासों में , यथार्थ तत्त्व का वर्णन करनेवाले शास्त्रों में तथा इस लोक में जो कुछ भी ज्ञान श्रेष्ठ पुरुषों के देखनेमे आया है, वह सब सांख्य से ही प्राप्त हुआ है | पूर्ण दृष्टि, उत्तम बल, ज्ञान, मोक्ष तथा सूक्ष्म तप आदि जितने भी विषय बताये गये है, उन सबका सांख्यशास्त्र में यथवंत वर्णन किया गया है | सांख्यज्ञानी सदा सुखपूर्वक कल्याणमय ब्रह्म को प्राप्त होते हैं | उस ज्ञान को धारण करके भी मनुष्य कृतार्थ हो जाते हैं | सांख्य का ज्ञान अत्यंत विशाल और परम प्राचीन है | यह महासागर के समान अगाध, निर्मल और उदार भावों से पूर्ण हिया | इस अप्रमेय ज्ञान को भगवान नारायण ही पूर्णरूप से धारण करते हैं | मुनिवरो ! यह मैंने तुमसे परम तत्त्व का वर्णन किया | यह सम्पूर्ण पुरातन विश्व भगवान नारायण से ही प्रकट हुआ हैं | वे ही सृष्टि के समय संसार की सृष्टि और संहारकाल में उसका संहार करते हैं |

– नारायण नारायण –

ब्रह्मपुराण अध्याय – ७१

brmhapuran
|| ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ||

ब्रह्मपुराण

अध्याय – ७१

आत्यंतिक प्रलय का निरूपण, आध्यात्मिक आदि त्रिविध तापों का वर्णन और भगवत्तत्त्व की व्याख्या

व्यासजी कहते हैं – ब्राह्मणों ! आध्यात्मिक आदि तीनों तापों को जानकर ज्ञान और वैराग्य उत्पन्न होनेपर विद्वान आत्यंतिक लय प्राप्त होते हैं | आध्यात्मिक ताप के भी दो भेद है – शारीरिक और मानसिक | शारीरिक ताप के बहुत-से भेद हैं | उनका वर्णन सुनो |

शिरोरोग, प्रतिश्याय (पीनस), ज्वर, शूल, भगन्दर, गुल्म (पथ की गाँठ), अर्श (बवासीर), श्ववथु (सुजन), दमा, वमन (छदि) आदि तथा नेत्ररोग, अतीसार और कुष्ठ आदि शरीरिक कष्टों के भेद से दैहिक ताप के अनेक भेद हो जाते है | अब मानस ताप का वर्णन सुनो | काम, क्रोध, भय,द्वेष, लोभ, मोह, विषाद, शोक, असूया (दोषदृष्टि), अपमान, ईर्ष्या, मात्सर्य तथा पराभव आदि के भेद से मानस ताप के अनेक रूप है | ये सभी प्रकार के ताप आध्यात्मिक माने गये हैं | मृग, पक्षी, मनुष्य आदि तथा पिशाच, सर्प, राक्षस और बिच्छू आदि से मनुष्यों को जो पीड़ा होती है, उसका नाम आधिभौतिक ताप है | शीत, उष्ण, वायु, वर्षा, जल और विद्युत् आदिसे होनेवाले संताप को आधिदैविक कहते हैं | मुनिवरो ! इनके सिवा गर्भ, जन्म, बुढापे, अज्ञान, मृत्यु और नरक से प्राप्त होनेवाले दुःख के भी सहस्त्रों भेद है |

अत्यंत मलसे भरे हुए गर्भाशय में सुकुमार शरीरवाला जीव झिल्ली से लिपटा हुआ रहता है | उसकी पीठ और ग्रीवा की हड्डियाँ मुड़ी होती हैं | माताके खाये हुए अत्यंत तापदायक और अधिक खट्टे, कडवे, चटपटे, गर्म और खारे पदार्थों से कष्ट पाकर उसकी पीड़ा बहुत बढ़ जाती है | वह अपने अंगों को फैलाने या सिकोड़ने में समर्थ नहीं होता | मल और मूत्र के महान पंख में उसे सोना पड़ता हैं, जिससे उसके सभी अंगों में पीड़ा होती हैं | चेतनायुक्त होनेपर भी वह खुलकर साँस नहीं ले सकता | अपने कर्मों के बंधन में बंधा हुआ वह जीव सैकड़ो जन्मों का स्मरण करता हुआ बड़े दुःख से गर्भ में रहता है | जन्म के समय उसका मुख मल-मूत्र, रक्त और वीर्य आदि में लिपटा रहता हैं | प्राजापत्य नामक वायु से आदि में लिपटा रहता हैं | प्राजापत्य नामक वायुसे उसकी हड्डियों के प्रत्येक जोड़ में बड़ी पीड़ा होती है | प्रबल प्रसुतिवायु उसके मूंह को नीचे की ओर कर देती है और वह गर्भस्थ जीव अत्यंत आतुर होकर बड़े क्लेश के साथ माता के उदर से बाहर निकल पाटा है | मुनिवरो ! जन्म लेने के पश्चात बाह्य वायु का स्पर्श होने से अत्यंत मूर्च्छा को प्राप्त होकर वह बालक अपनी सुध-बुध खो बैठता है | दुर्गन्धयुक्त फोड़े से पृथ्वीपर गिरे हुए कीड़े की भांति वह छटपटाता है | उससमय उसे ऐसी पीड़ा होती है, मानो उसके सारे अंगों में काँटे चुभो दिये गये हों अथवा वह आरे से चीरा जा रहा हो | उसे अपने अंगों को खुजलाने की भी शक्ति नहीं रहती | वह करवट बदलने में भी असमर्थ होता है | स्तन-पान आदि आहार भी उसे दूसरों की इच्छा से ही प्राप्त होता है | वह अपवित्र बिछौनेपर पड़ा रहता हैं | उससमय उसे खटमल और डांस आदि काटते है तो भी वह उन्हें हटाने में समर्थ नहीं होता |

मृत्युकाल में मनुष्य का कंठ और हाथ-पैर शिथिल हो जाते हैं | उसका शरीर काँपता रहता हैं | उसे बार-बार मूर्च्छा होती है और कभी थोड़ी-सी चेतना भी आ जाती है | उससमय वह अपने सुवर्ण, धान्य, पुत्र, पत्नी, सेवक और गृह आदि के लिये ममता से अत्यंत व्याकुल होकर सोचता हैं – ‘हाय ! मेरे बिना इनकी कैसी दशा होगी |’ मर्म विदीर्ण करनेवाले महान रोग भयंकर आरे तथा यमराज के घोर बाणों की भांति उसके अस्थि-बन्धनों को काटे डालते हैं | उसकी आँखों की पुतलियाँ घुमने लगती हैं , वह बारंबार हाथ-पैर पटकता है; उसके तालू, ओठ और कंठ सूखने लगते हैं | गला घुरघुरता हैं | उड़ान वायुसे पीडीत होकर कंठ रूँध जाता हैं | उस अवस्था में मनुष्य महान ताप, भूख और प्यास से व्यथित हो यमदूतोंद्वारा दी हुई पीड़ा सहकर बड़े कष्ट से प्राणत्याग करता हैं | फिर क्लेश से ही उसे यातनादेह की प्राप्ति होती है | ये तथा और भी बहुत-से भयंकर दुःख मृत्यु के समय मनुष्यों को भोगने पड़ते है |

विप्रवरो ! नरक में गये हुए जीवों को जो पापजनित दुःख भोगने पड़ते हैं, उनकी कोई गणना नहीं हैं | केवल नरक में ही दुःख की परम्परा हो, ऐसी बात नहीं हैं; स्वर्ग में भी जिसके पुण्य का भोग क्षीण हो रहा है और जो पाप के फलभोग से भयभीत है, उसे शान्ति नहीं मिलती | जीव पुन: – पुन: गर्भ में आता और जन्म लेता हैं | कभी वह गर्भ में ही नष्ट हो जाता और कभी जन्म लेने के समय मृत्यु को प्राप्त होता है | कभी जन्मते ही, कभी बाल्यावस्था में और कभी युवावस्था में ही उसकी मृत्यु हो जाती है | विप्रगण ! मनुष्यों के लिये जो-जो वस्तु अत्यंत प्रितिकारक होती है, वही-वही उसके लिये दुःखरूपी वृक्ष का बीज बन जाती है | स्त्री, पुत्र, मित्र आदि और गृह, क्षेत्र तथा धन आदि से पुरुषों को उतना अधिक सुख नहीं मिलता, जितना कि दुःख उठाना पड़ता है | इसप्रकार सांसारिक दुःखरूपी सूर्य के तापसे संतप्त चित्तवाले मानवों को मोक्षरूपी वृक्ष की शीतल छाया के सिवा अन्यत्र कहाँ सुख हैं | अत: विद्वानों ने गर्भ, जन्म और बुढापा आदि स्थानों में होनेवाले अध्यात्मिक आदि त्रिविध दुःखसमूहों को दूर करने के लिये एकमात्र भगवत्प्राप्ति को ही अमोघ औषधि बताया है | उससे बढकर आल्हादजंक और सुखस्वरूप दूसरी कोई ओषधि नहीं है | अत: बुद्धिमान पुरुषों को भगवत्प्राप्ति के लिये सदा ही यत्न करना चाहिये | द्विजवरो ! भगवत्प्राप्ति के दो साधन कहे गये हैं – ज्ञान और कर्म | ज्ञान भी दो प्रकार का है – शास्त्र-जन्य और विवेक-जन्य | शास्त्र-जन्य ज्ञान शब्दब्रह्म का और विवेक –जन्य ज्ञान परब्रह्म का स्वरूप है | अज्ञान गाढ़ अन्धकार के समान है | उसको नष्ट करने के लिये शास्त्र-जन्य ज्ञान दीपक के समान और विवेक-जन्य ज्ञान साक्षात सूर्य के सदृश माना गया है |

मुनिवरो ! मनुजी ने वेदार्थ का स्मरण करके इसके विषय में जो विचार प्रकट किया है, उसे बताता हूँ, सुनो |

ब्रह्म के दो स्वरूप जानने योग्य है – शब्दब्रह्म और परब्रह्म | जो शब्दब्रह्म में पारंगत हैं, वह परब्रह्म को प्राप्त कर लेता हैं | अथर्ववेद की श्रुति कहती हैं कि परा और अपरा – ये दो विद्याएँ जानने योग्य है | परा विद्यासे अक्षरब्रह्म की प्राप्ति होती है तथा ऋग्वेदादि शास्त्र ही अपर विद्या है | वह जो अव्यक्त, जरावस्था से रहित, अचिन्त्य, अजन्मा, अविनाशी, अनिर्देश्य, अरूप, हस्त-पादादि से रहित, सर्वव्यापक, नित्य, सब भूतों का कारण तथा स्वयं कारणरहित है, जिससे सम्पूर्ण व्याप्य वस्तु व्याप्त है, जिसे ज्ञानी पुरुष ही ज्ञानदृष्टि से देखते हैं, वही परब्रह्म और वही परमधाम हैं | मोक्ष की अभिलाषा रखनेवाले पुरुषों को उसीका चिन्तन करना चाहिये | वही भगवान विष्णु का वेदवाक्योंद्वारा प्रतिपादित परम पद है | जो सम्पूर्ण भूतों की उत्पत्ति, प्रलय, आगमन, गमन तथा विद्या और अविद्या को जानता हैं, उसीको ‘भगवान’ कहना चाहिये | त्याग ने योग्य त्रिविध गुण आदि को छोडकर समग्र ज्ञान, समग्र शक्ति, समग्र बल, समग्र ऐश्चर्य, समग्र वीर्य और समग्र तेज ही ‘भगवत’ शब्द के वाच्यार्थ हैं | इस दृष्टि से श्रीविष्णु ही ‘भगवान’ हैं | उन परमात्मा श्रीहरि में सम्पूर्ण भूत निवास करते हैं तथा वे भी सर्वात्मारूप से सब भूतों में स्थित है | अत: वे ‘वासुदेव’ कहे गये हैं | पूर्वकाल में महर्षियों के पूछनेपर स्वयं प्रजापति ब्रह्माने अनंत भगवान वासुदेव के नाम की यह यथार्थ व्याख्या बतलायी थी | सम्पूर्ण जगत के धाता और विधाता भगवान श्रीहरि सम्पूर्ण भूतों में वास करते हैं और सम्पूर्ण भूत उनमें वास करते हैं; इसलिये उनका नाम ‘वासुदेव’ है | वे परमात्मा निर्गुण, समस्त आवरणों से परे और सबके आत्मा है | सम्पूर्ण भूतों की, प्रकृति तथा उसके गुण और दोषों की पहुँच के बाहर है | सम्पूर्ण भुवनों के बीच में जो कुछ भी स्थित है, वह सब उनके द्वारा व्याप्त है | समस्त कल्याणमय गुण उनके स्वरूप है | उन्होंने अपनी मायाशक्ति के लेशमात्र से सम्पूर्ण प्राणियों की सृष्टि की है | वे अपनी इच्छा से मन के अनुरूप अनेक शरीर धारण करते हैं तथा उन्हीं के द्वारा सम्पूर्ण जगत के कल्याण का साधन होता है | वे तेज, बल और ऐश्वर्य के महान भंडार है | पराक्रम और शक्ति आदि गुणों की एकमात्र राशि है तथा परसे भी परे है | उन परमेश्वर में सम्पूर्ण क्लेश आदि का अभाव है | वे ईश्वर ही व्यष्टि और समष्टिरूप है | वे ही अव्यक्त और व्यक्तस्वरूप हैं | सबके ईश्वर, सबके द्रष्टा, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान परमेश्वर नामसे प्रसिद्ध वे ही है | जिसके द्वारा दोषरहित, परम शुद्ध, निर्मल तथा एक रूप परमात्मा का ज्ञान, साक्षात्कार अथवा प्राप्ति होती है, वही ज्ञान है | जो इसके विपरीत हैं, उसे अज्ञान बताया गया है |

– नारायण नारायण –

ब्रह्मपुराण अध्याय – ७०

brmhapuran
|| ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ||

ब्रह्मपुराण

अध्याय – ७०

युगांतकाल की अवस्था का निरूपण

मुनियों ने कहा – धर्मज्ञ ! हमलोग धर्म की लालसा से अब उस कलिकाल के समीप आ पहुँचे हैं, जब कि स्वल्प कर्म के द्वारा हम सुखपूर्वक उत्तम धर्म को प्राप्त कर सकते हैं | अब जिन निमित्तों (लक्षणों) से धर्म का नाश और त्रास एवं उद्वेग करनेवाले युगांतकाल की उपस्थिति जानी जाय, उसे बताने की कृपा करे |

व्यासजी बोले – ब्राह्मणों !
युगांतकाल में प्रजाकी रक्षा न करके केवल कर लेनेवाले राजा होंगे | वे अपनी ही रक्षा में लगे रहेंगे | उससमय प्राय: क्षत्रियेतर राजा होंगे |
• ब्राह्मण शूद्रों के यहाँ रहकर जीवन-निर्वाह करेंगे और शुद्र ब्राह्मणों के आचार का पालन करनेवाले होंगे |
• युगान्तकाल आनेपर श्रोत्रिय तथा काण्डपृष्ठ (अपने कुलका त्याग करके दूसरे कुल में सम्मीलित हुए पुरुष) एक पंक्ति में बैठकर यज्ञकर्म से हीन हविष्य भोजन करेंगे |
• मनुष्य अशिष्ट, स्वार्थपरायण, नीच तथा मद्य और मांस के प्रेमी होकर मित्र-पत्नी के साथ व्यभिचार करनेवाले होंगे |
• चोर राजा की वृत्ति में रहकर अपना काम करेंगे और राजा चोरोंका-सा बर्ताव करेंगे |
• सेवकगण स्वामी के दिये बिना ही उसके धनका उपभोग करनेवाले होंगे | सबको धन की ही अभिलाषा होगी |
• साधू-संतों के बर्ताव का कहीं भी आदर न होगा |
• पतित मनुष्य के प्रति किसी के मन में घृणा न होगी |
• पुरुष नकटे, खुले केशवाले और कुरूप होंगे | स्त्रियाँ सोलह वर्ष की आयु के पहले ही बच्चों की माँ बन जायँगी |
• युगांत में स्त्रियाँ धन लेकर पराये पुरुषों से समागम करेंगी | सभी द्विज वाजसनेयी (बृहदारन्यक उपनिषद के ज्ञाता) बनकर ब्रह्म की बात करेंगे |
• शुद्र तो वक्ता होंगे और ब्राह्मण चांडाल हो जायँगे | शुद्र शठतापूर्ण बुद्धि से जीविका चलाते हुए मूंड-मुंडाकर गेरुआ वस्त्र पहने धर्म का उपदेश करेंगे |
• युगांत के समय शिकारी जीव अधिक होंगे, गौओं की संख्या घटेगी और साधुओं के स्वभाव में परिवर्तन होगा |
• चांडाल तो गाँव या नगर के बीच में बसेंगे और बीच में रहनेवाले ऊँचे वर्ण के लोग नगर या गाँव से बाहर बसेंगे |
• सारी प्रजा लज्जा को तिलांजलि दे उच्छंखलतापूर्ण बर्ताव से नष्ट हो जायगी |
• दो साल के बछड़े हल में जोते जायँगे और मेघ कहीं वर्षा करेगा, कहीं नहीं करेगा |
• शूरवीर के कुल में उत्पन्न हुए सब लोग पृथ्वी के मालिक होंगे | प्रजावर्ग के सभी मानव निम्रश्रेणी के हो जायेंगे | प्राय: कोई मनुष्य धर्म का आचरण नहीं करेगा | अधिकांश भूमि ऊसर हो जायगी |
• सभी मार्ग बटमारों से घिरे होंगे | सभी वर्णों के लोग वाणिज्य-वृत्तिवाले होंगे |
• पिताके धन को उनके दिये बिना ही लडके आपस में बाँट लेंगे, उसे हडप लेने की चेष्टा करेंगे और लोभ आदि कारणों से वे परस्परविरोधी बने रहेंगे |
• सुकुमारता, रूप और रक्त का नाश हो जानेसे नारियाँ बालों से ही सुसज्जित होंगी | उनमें वीर्यहीन ग्रहस्थ की रति होगी |
• युगांतकाल में पत्नी के समान दूसरा कोई अनुराग का पात्र नही होगा | पुरुष थोड़े हों और स्त्रियाँ अधिक, यह युगान्तकाल की पहचान हैं |
• संसार में याचक अधिक होंगे और एक-दूसरे से याचना करेंगे |किन्तु कोई किसी को कुछ न देगा |
• सब लोग राजदंड, चोरी और अग्निकांड आदिसे क्षीण होकर नष्ट हो जायँगे |
• खेती में फल नही लगेंगे |
• तरुण पुरुष बुड्ढोकी तरह आलसी और अकर्मण्य होंगे | जो शील और सदाचार से भ्रष्ट हैं, ऐसे लोग सुखी होंगे |
• वर्षाकाल में जोर से आँधी चलेगी और पानी के साथ कंकड़-पत्थरों की वर्षा होगी |
• युगान्तकाल में परलोक संदेह का विषय हो जायगा |
• क्षत्रिय वैश्यों की भांति धन-धान्य के व्यापार से जीविका चलायेंगे |
• युगान्तकाल में कोई किसीसे बन्धु-बान्धव का नाता नहीं निभायेगा |
• प्रतिज्ञा और शपथ का पालन नहीं होगा | प्राय: लोग ऋण को चुकाये बिना ही हडप लेंगे | लोगों का हर्ष निष्फल और क्रोध सफल होगा |
• दूध के लिये घरमें बकरियाँ बाँधी जायँगी |• इसी प्रकार जिसका शास्त्र में कहीं विधान नहीं हैं; ऐसे यज्ञ का अनुष्ठान होगा | मनुष्य अपने को पंडित समझेंगे और बिना प्रमाण के ही सब कार्य करेंगे |
• जारज, क्रूर कर्म करनेवाले और शराबी भी ब्रह्मवादी होंगे और अश्वमेध-यज्ञ करेंगे | अभक्ष्य-भक्षण करनेवाले ब्राह्मण धन की तृष्णा से यज्ञ के अनधिकारियों से भी यज्ञ करायेंगे | कोई भी अध्ययन नहीं करेगा |
• तारों की ज्योति फीकी पड जायगी, दसों दिशाएँ विपरीत होंगी |
• पुत्र पिताको और बहुएँ सासको अपना काम करने के लिये भेजेंगी | इसप्रकार युगान्तकाल में पुरुष और स्त्रियाँ ऐसा ही जीवन व्यतीत करेंगी |
• द्विजगण अग्निहोत्र और अग्रासन किये बिना ही भोजन कर लेंगे | (बलिवैश्वदेव करके अतिथि आदि के लिये पहले ही जो अन्न निकाल दिया जाता हैं, वह ‘अग्रासन’ कहलाता है|)
• भिक्षा दिये बिना और बलिवैश्वदेव किये बिना ही लोग स्वयं भोजन करेंगे |
• स्त्रियाँ सोये हुए पतियों को धोखा देकर अन्य पुरुषों के पास चली जायँगी |

मुनियों ने कहा – महर्षे ! इसप्रकार धर्म का नाश होनेपर मनुष्य कहाँ जायँगे ? वे कौन-सा कर्म और कैसी चेष्टा करेंगे ? वे किस प्रमाण को मानेंगे ? उनकी कितनी आयु होगी ? और किस सीमातक पहुँचकर वे सत्ययुग प्राप्त करेंगे ?

व्यासजी बोले – मुनिवरो !
तदनंतर धर्म का नाश होने से समस्त प्रजा गुणहीन होगी शीलका नाश हो जाने सबकी आयु घट जायगी | आयु की हानि से बलकी भी हानि होगी | बल की हानि से शरीर का रंग बदल जायगा | फिर शरीर में रोगजनित पीड़ा होगी | उससे निर्वेद (वैराग्य) होआ | निर्वेद से आत्मबोध होगा और आत्मबोध से धर्मशीलता आयेगी | इसप्रकार अंतिम सीमापर पहुँचकर लोगों को सत्ययुग की प्राप्ति होगी |
• कुछ लोग कोई उद्देश्य लेकर धर्म का आचरण करेंगे, कोई मध्यस्थ रहेंगे | कुछ लोग प्रत्यक्ष और अनुमान को ही प्रमाण मानेंगे | दूसरे लोग सबको अप्रमाण ही मानेगे | कोई नास्तिकतापरायण, कोई धर्मका लोप करनेवाले और कोई द्विज अपनेको पंडित माननेवाले होंगे |
• युगान्तकाल के मनुष्य वर्तमानपर ही विश्वास करनेवाले, शास्त्रज्ञान से रहित, दम्भी और अज्ञानी होंगे | इस प्रकार धर्म की डाँवाडोल परिस्थिति में श्रेष्ठ पुरुष दान और शीलरक्षा में तत्पर हो शुभ कर्मों का अनुष्ठान करेंगे |
• जब जगत के मनुष्य सर्वभक्षी हो जायँ, स्वयं ही आत्मरक्षा के लिये विवश हों – राजा आदि के द्वारा उनकी रक्षा असम्भव हो जाय, जब उनमें निर्दयता और निर्लज्जता आ जाय, तब उसे कषायका लक्ष्ण समझना चाहिये | (क्रोध-लोभ आदिके विकार को कषाय कहते है | युगान्तकाल में वह पराकाष्ठा को पहुँच जाता हैं |)
• जब छोटे वर्णों के लोग ब्राह्मणों की सनातन वृत्तिका आश्रय लेने लगें, तब वह भी कषाय का ही लक्षण हैं |
• युगान्तकाल में बड़े-बड़े भयंकर युद्ध, बड़ी भारी वर्षा, प्रचंड आँधी और जोरों की गर्मी पड़ेगी | यह सब कषाय का लक्षण हैं |
• लोग खेती काट लेंगे, कपड़े चुरा लेंगे, पानी पीने का सामान और पेटियाँ भी चुरा ले जायँगे | कितने ही चोर ऐसे होंगे, जो चोर की संपत्तिका भी अपहरण करेंगे |
• हत्यारों की भी हत्या करनेवाले लोग होंगे | चोरों के द्वारा चोरों का नाश हो जानेपर जनता का कल्याण होगा |
• युगान्तकाल में मर्त्यलोक के मनुष्यों की आयु अधिक-से अधिक तीस वर्ष की होगी |
• लोग दुर्बल, विषय-सेवन के कारण कृष तथा बुढापे और शोक से ग्रस्त होंगे | फिर धीरे-धीरे लोग साधू पुरुषों की सेवा, दान, सत्य एवं प्राणियों की रक्षा में तत्पर होंगे | उस धर्म से लोगों को कल्याण की प्राप्ति होगी | लोगों के गुणों में परिवर्तन होगा उअर धर्म से लाभ होने का अनुमान दृढ़ होता जायगा |
• फिर श्रेष्ठ क्या हैं ? इस बातपर विचार करने से धर्म ही श्रेष्ठ दिखायी देगा | जिसप्रकार क्रमश: धर्म की हानि हुई थी, उसीप्रकार धीरे-धीरे प्रजा धर्म की वृद्धि को प्राप्त होगी | इसप्रकार धर्म को पूर्णरूप से अपना लेनेपर सब लोग सत्ययुग देखेंगे | सत्ययुग में सबका व्यवहार अच्छा होता है और युगान्तकाल में साधू-वृत्ति की हानि बतायी जाती है |
• ऋषियों ने प्रत्येक युग में देश-काल की अवस्था के अनुसार पुरुषों की स्थिति देखकर उनके अनुरूप आशीर्वाद कहा है | धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के साधन, देवताओं की प्रतिक्रिया, पुण्य एवं शुभ आशीर्वाद तथा आयु- ये प्रत्येक युग में अलग-अलग होते है | युगों के परिवर्तन भी चिरकाल से चलते रहते हैं | उत्पत्ति और संहार के द्वारा नित्य परिवर्तनशील यह संसार कभी क्षणभर के लिये भी स्थिर नहीं रहता |

– नारायण नारायण –

ब्रह्मपुराण अध्याय – ६९

brmhapuran
|| ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ||

ब्रह्मपुराण

अध्याय – ६९

श्रीविष्णु में भक्ति होने का क्रम और कलि-धर्म का निरूपण

मुनियों ने कहा – महामते ! हमने भगवान श्रीकृष्ण के समीप जागरणपूर्वक गीत सुनाने का फल सुना, जिससे वह चांडाल परम गति को प्राप्त हुआ | अब जिस तपस्या अथवा कर्म से भगवान विष्णु में हमारी भक्ति हो सके, वह हमें बताइये | इस समय हम यही विषय सुनना चाहते हैं |

व्यासजी बोले – मुनिवरो ! भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति महान फल देनेवाली है | वह मनुष्य को जिस प्रकार होती है, वह सब क्रमश: बतलाता हूँ; ध्यान देकर सुनो | ब्राह्मणों ! यह संसार अत्यंत घोर और समस्त प्राणियों के लिये भयंकर हैं | नाना प्रकार के सैकड़ो दु:खों से व्याप्त और मनुष्यों के ह्रदय में महान मोह का संचार करनेवाला है | इस जगत में पशु-कशी आदि हजारों योनियों में बारंबार जन्म लेने के पश्चात् देहधारी जीव कभी किसी प्रकार मनुष्यका जन्म पाता है | मनुष्यों में भी ब्राह्मणत्व, ब्राह्मणत्वमें भी विवेक, विवेक से भी धर्मनिष्ठ बुद्धि और बुद्धि से भी कल्यानमय मार्गों का ग्रहण होना अत्यंत दुर्लभ है | मनुष्यों के पूर्वजन्म का संचित पाप जबतक नष्ट नहीं हो जाता, तबतक जगन्मय भगवान वासुदेव में उनकी भक्ति नही होती | अत: ब्राह्मणों ! श्रीकृष्ण में जिस प्रकार भक्ति होती है, वह सुनो | अन्य देवतायों के प्रति मनुष्य की जो मन, वाणी और क्रियाद्वारा तद्वतचित्त से भक्ति होती है, उससे यज्ञ में उसका मन लगता हैं; फिर वह एकाग्रचित होकर अग्नि की उपासना करता हैं | अग्निदेव संतुष्ट होनेपर भगवान भास्कर में उसकी भक्ति होती है | तबसे वह निरंतर सूर्यदेव की आराधना करने लगता है | भगवान सूर्य के प्रसन्न होनेपर उसकी भक्ति भगवान शंकर में होती है, फिर वह बड़े यत्न के साथ विधिपूर्वक महादेवजी की पूजा करता है | जब महादेवजी संतुष्ट होते है, तब मनुष्य की भक्ति भगवान श्रीकृष्ण में होती है | तब वह वासुदेवसंज्ञक अविनाशी भगवान जगन्नाथ का पूजन करके भोग और मोक्ष दोनों प्राप्त कर लेता है |

मुनियों ने पूछा– महामुने ! संसार में जो अवैष्णव मनुष्य देखे जाते हैं, वे श्रीविष्णु का पूजन क्यों नही करते ? इसका कारण बतलाइये |

व्यासजी बोले – मुनिवरो ! इस संसार में दो प्रकार के भूतसर्ग विख्यात हैं – एक असुर और दूसरा दैव प्रकृतिका आश्रय लेनेवाले मनुष्य भगवान विष्णु का पूजन करते हैं और आसुरी प्रकृति को प्राप्त हुए लोग श्रीहरि की निंदा किया करते हैं | ऐसे लोग मनुष्यों में अधम है | श्रीहरिकी माया से उनकी बुद्धि मारी गयी है | ब्राह्मणों ! वे श्रीहरि को न पाकर नीच गति में जाते है | भगवान की माया बड़ी गूढ़ है | देवताओं और असुरों के लिये भी उसका ज्ञान होना कठिन है | वह मनुष्यों के ह्रदय में महँ मोह का संचार करती है | जिन्होंने मन को वश में नहीं किया है, ऐसे लोगों के लिये उस माया को पार करना कठिन हैं |

मुनियों ने कहा – महर्षे ! अब हम आपसे जगत के संहार की कथा सुनना चाहते हैं | कल्प के अंत में जो महाप्रलय होता है, उसका वर्णन कीजिये |

व्यासजी बोले – मुनिवरो ! कल्प के अंत में तथा प्राकृत प्रलय में जो जगत का संहार होता है, उसका वर्णन सुनो | सत्ययुग, त्रेता, द्वापर और कलि – ये चार युग है, जो देवताओं के बारह हजार दिव्य वर्षों में समाप्त होते हैं समस्त चतुर्युग स्वरूप से एक-से ही होते है | सृष्टि के आरम्भ में सत्ययुग होता है तथा अंत में कलियुग रहता हैं | ब्रह्माजी प्रथम कृतयुग में जिसप्रकार सृष्टिका आरम्भ करते हैं, वैसे ही अंतिम कलियुग में उसका उपसंहार करते है |

मुनियों ने कहा – भगवन ! कलि के स्वरूप का विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये, जिसमें चार चरणोंवाले भगवान धर्म खंडित हो जाते है |

व्यासजी बोलेनिष्पाप मुनियों ! तुम जो मुझसे कलिका स्वरप पूछते हो, वह तो बहुत बड़ा है; तथापि मैं संक्षेप से बतलाता हूँ, सुनो |
कलियुग में मनुष्यों की वर्ण और आश्रमसम्बन्धी आचार में प्रवृत्ति नही होगी |
• सामवेद, ऋग्वेद और यजुर्वेद की आज्ञा के पालन में भी कोई प्रवृत्त न होगा |
• कलियुग में विवाह को धर्म नहीं माना जायगा |
• शिष्य गुरु के अधीन नहीं रहेंगे |
• पुत्र भी अपने धर्म का पालन नही करेंगे |
• अग्निहोत्र का नियम उठ जायगा | कोई किसी भी कुल में क्यों न उत्पन्न हुआ हो- जो बलवान होगा, वही कलियुग में सबका स्वामी होगा |
• सभी वर्णों के लोग कन्या बेचकर जीवन-निर्वाह करेंगे |
• बाह्मणों ! कलियुग में जिस किसीका जो भी वचन होगा, सब शास्त्र ही माना जायगा |
• कलियुग में सब देवता होंगे और सबके लिये सब आश्रम होंगे | अपनी-अपनी रूचि के अनुसार अनुष्ठान करके उसमें उपवास, परिश्रम और धनका व्यय करना धर्म कहा जायगा |
• कलियुग में थोड़े से ही धनसे मनुष्यों को बड़ा घमंड होगा |
• स्त्रियों को अपने केशोंपर ही रूपवती होने का गर्व होगा | सुवर्ण, मणि और रत्न आदि तथा वस्त्रों के भी नष्ट हो जानेपर स्त्रियाँ केशों से ही शृंगार करेंगी |
• कलियुग की स्त्रियाँ धनहीन पति को त्याग देंगी | उससमय धनवान पुरुष ही युवतियों का स्वामी होगा |
• जो- जो अधिक देगा, उसे-उसे ही मनुष्य अपना मालिक मानेंगे | उससमय लोग प्रभुता के ही कारण सम्बन्ध रखेंगे |
• द्रव्यराशि घर बनाने में ही समाप्त हो जायगी | उससे दान-पुण्यादि न होंगे |
• बुद्धि द्रव्यों के संग्रहमात्र में ही लगी रहेगी | उसके द्वारा आत्मचिंतन न होगा | सारा धन उपभोगमें ही समाप्त हो जायगा | उससे धर्म का अनुष्ठान न होगा |
• कलियुग की स्त्रियाँ स्वेच्छाचारिणी होंगी | हाव-भाव-विलास में ही उनकी स्पृहा रहेगी | अन्याय से धन पैदा करनेवाले पुरुषों से ही उनकी आसक्ति होगी |
• सुह्रदों के निषेध करनेपर भी मनुष्य एक-एक पाई के लिये भी दूसरों के स्वार्थ की हानि कर देंगे |
• कलियुग में सब लोग सदा सबके साथ समानता दावा करेंगे |
• गायों के प्रति तभीतक गौरव रहेगा, जबतक कि वे दूध देती रहेंगी |
• कलियुग की प्रजा प्राय: अनावृष्टि और क्षुधा के भय से व्याकुल रहेगी | सबके नेत्र आकाश की ओर लगे रहेंगे |
• वर्षा न होने से दु:खी मनुष्य तपस्वीजनों की भांति मूल-फल और पत्ते खाकर रहेंगे और कितने ही आत्मघात कर लेगे | कलि में सदा अकाल ही पड़ता रहेगा | सब लोग सदा असमर्थ होकर क्लेश भोगेंगे | कभी किन्हीं मानवों को थोडा सुख भी मिल जायगा |
• सब लोग बिना स्नान किये ही भोजन करेंगे | अग्निहोत्र, देवपूजा, अतिथि-सत्कार, श्राद्ध और तर्पण की क्रिया कोई नहीं करेंगे |
• कलियुग की स्त्रियाँ लोभी, नाटी, अधिक खानेवाली, बहुत सन्तान पैदा करनेवाली और मंद भाग्यशाली होंगी | वे दोनों हाथों से सिर खुजलाती रहेंगी |
• गुरुजनों तथा पति की आज्ञा का भी उल्लंघन करेंगी तथा पर्दे के भीतर नही रहेगी | अपना ही पेट पालेंगी, क्रोध में भरी रहेंगी | देह-शुद्धि की ओर ध्यान नहीं देंगी और असत्य एवं कटु वचन बोलेंगी | इतना ही नहीं, वे दुराचारिणी होकर दुराचारी परुषों से मिलने की अभिलाषा करेंगी |कुलवती स्त्रियाँ भी अन्य पुरुषों के साथ व्यभिचार करेंगी |
• ब्रह्मचारी लोग वेदोक्त व्रत का पालन किये बिना ही वेदाध्ययन करेंगे |
• गृहस्थ पुरुष न तो हवन करेंगे और न सत्पात्र को उचित दान ही देंगे |
• वानप्रस्थ आश्रम में रहनेवाले लोग वन के कंद-मूल आदि से निर्वाह न करके ग्रामीण आहार का संग्रह करेंगे और संन्यासी भी मित्र आदि के स्नेह-बंधन में बँधे रहेंगे |
• कलियुग आनेपर राजालोग प्रजा की रक्षा नहीं करेंगे, अपितु कर लेने के बहाने प्रजा के ही धन का अपहरण करनेवाले होंगे |
• उस समय जिस-जिस के पास हाथी, घोड़े और रथ होंगे, वही-वाही राजा होगा और जो-जो निर्बल होंगे, वे ही सेवक होंगे |
• वैश्यलोग कृषि, वाणिज्य आदि अपने कर्मों को छोडकर शुद्र-वृत्तिसे रहेंगे | शिल्प-कर्म से जीवन-निर्वाह करेंगे | इसी प्रकार शुद्र भी संन्यास का चिन्ह धारण करके भिक्षापर जीवन-निर्वाह करेंगे | वे अधम मनुष्य संस्कारहीन होते हुए भी लोगों को ठगने के लिये पाखंड-वृत्तिका आश्रय लेंगे |
• दुर्भिक्ष और करकी पीड़ा से अत्यंत उपद्र्वग्रस्त होकर प्रजाजन ऐसे देशों में चले जायेंगे, जहाँ गेहूँ और जौ आदि की अधिकता होगी | उससमय वेदमार्ग का लोप, पाखंडकी अधिकता और अधर्म की वृद्धि होने से लोगों की आयु बहुत थोड़ी होगी |
• कलियुग में पाँच, छ: अथवा सात वर्ष की स्त्री और आठ, नौ या दस वर्ष के पुरुषों के ही संताने होने लग जायँगी |
• बारह वर्ष की अवस्था में ही बाल सफेद होने लगेंगे |
• घोर कलियुग आनेपर कोई मनुष्य बीस वर्षतक जीवित नही रहेगा | उस समय लोग मंदबुद्धि, व्यर्थ चिन्ह धारण करनेवाले और दुष्ट अंत:करणवाले होंगे; अत: वे थोड़े ही समय में नष्ट हो जायेंगे |
• जब – जब इस जगत में पाखंड-वृत्ति दृष्टिगोचर होने लगे, तब-तब विद्वान पुरुषों को कलियुग की वृद्धि का अनुमान करना चाहिये |
• जब – जब वैदिक मार्ग का अनुसरण करनेवाले साधू पुरुषों की हानि हो, तब – तब बुद्धिमान पुरुषों को कलियुग की वृद्धि का अनुमान करना चाहिये |
• जब धर्मात्मा मनुष्यों के आरम्भ किये हुए कार्य शिथिल हो जायँ, तब उसमें विद्वानों को कलियुग की प्रधानता का अनुमान करना चाहिये |
• जब – जब यज्ञों के अधीश्वर भगवान पुरुषोत्तम का लोग यज्ञोंद्वारा यजन न करें, तब – तब यह समझना चाहिये कि कलियुगका बल बढ़ रहा हैं |

द्विजवरो ! जब वेदवाद में प्रेम न हो और पाखंड में अनुराग बढ़ता जाय, तब विद्वान पुरुषों को कलियुग की वृद्धि का अनुमान करना चाहिये | ब्राह्मणों कलियुग में पाखंड से दूषित चित्तवाले मनुष्य सबकी सृष्टि करनेवाले जगतपति भगवान विष्णु की आराधना नहीं करेंगे | उससमय पाखण्ड से प्रभावित मनुष्य ऐसा कहेंगे कि ‘देवताओं से क्या लेना हैं | ब्राह्मणों और वेदों से क्या लाभ है | जल से होनेवाली शुद्धि में क्या रखा है | ‘
कलियुग में मेघ थोड़ी वृष्टि करेंगे | खेती में बहुत कम फल लगेंगे और वृक्षों के फल सारहीन होंगे |
• कलि में प्राय: लोग घुटनोतक वस्त्र पहनेगे |
• वृक्षों में शमी की ही अधिकता होगी |
• चारों वर्णों के सब लोग प्राय: शुद्रवत हो जायेंगे |
• कलियुग आनेपर प्राय: छोटे-छोटे धान्य होंगे | अधिकतर बकरियों का दूध मिलेगा और उशीर (खस) ही एकमात्र अनुलेपन होगा |
• कलियुग में अधिकतर सास और सुसर ही लोगों के गुरुजन होंगे | मुनिवरो ! उस समय मनोहारिणी भार्या और साले आदि ही सुह्रद समझे जायेंगे | लोग अपने ससुर के अनुगामी होकर कहेंगे कि ‘कौन किसकी माता हैं और कौन किसका पिता | सब जीव अपने कर्मों के अनुसार ही जन्मते और मरते हैं |’
• उससमय थोड़ी बुद्धिवाले मनुष्य मन, वाणी और शरीर के दोषों से प्रभावित होकर प्रतिदिन बारंबार पाप करेंगे | सत्य, शौच और लज्जा से रहित मनुष्यों के लिये जो-जो दुःख की बात हो सकती हैं, वह सब कलिकाल में होगी |
• संसार में स्वाध्याय, वषटकार, स्वधा और स्वाहा का शब्द नहीं सुनायी देगा | उस समय स्वधर्मनिष्ठ ब्राह्मण कोई विरला ही होगा |
• एक विशेषता अवश्य है , कलियुग में थोडा-सा ही प्रयन्त करनेपर मनुष्य वह उत्तम पुण्यराशि प्राप्त कर सकता हैं, जो सत्ययुग में बहुत बड़ी तपस्या से ही साध्य हो सकती है |

ब्राह्मणों ! कलियुग धन्य है, जहाँ थोड़े ही क्लेशसे महान फल की प्राप्ति होती है तथा स्त्री और शुद्र भी धन्य है | इसके सिवा और भी सुनो |

सत्ययुग में दस वर्षतक तपस्या, ब्रह्मचर्य और जप आदिका अनुष्ठान करने से जो फल मिलता हैं, वह त्रेता में एक वर्ष, द्वापर में एक मास तथा कलियुग में एक दिन-रात के ही अनुष्ठान से मिल जाता हैं | इसलिए मैंने कलियुग को श्रेष्ठ बताया | सत्ययुग में ध्यान, त्रेतामें यज्ञोंद्वारा यजन और द्वापर में पूजन करने से मनुष्य जिस फलको पाता हैं, वही कलियुग में केशव का नाम-कीर्तन करनेमात्र से मिल जाता हैं | धर्मज्ञ ब्राह्मणों ! इस कलियुग में थोड़े-से परिश्रम से ही मनुष्य को महान धर्म की प्राप्ति हो जाती हैं | इसलिये मैं कलियुग से अधिक संतुष्ट हूँ |

शूद्रों की विशेषता का वर्णन 

द्विजों को पहले ब्रह्मचर्य-व्रत का पालन करते हुए वेदाध्ययन करना पड़ता हैं | फिर धर्मत: प्राप्त हुए धन के द्वारा विधिपूर्वक यज्ञ करना पड़ता हैं | इसमें भी व्यर्थ वार्तालाप, व्यर्थ भोजन और व्यर्थ धन द्विजों के पतन के कारण होते हैं ; इसलिये उन्हें सदा संयमी रहना आवश्यक हैं | यदि वे सभी वस्तुओं में विधिका पालन न करें तो उन्हें दोष लगता हैं | यहाँतक कि भोजन और पान आदि भी उनकी इच्छा के अनुसार नहीं प्राप्त होते | वे समस्त कार्यों में परतंत्र होते हैं | इसप्रकार विनीत भाव से महान क्लेश उठाकर वे उत्तम लोकों पर अधिकार प्राप्त करते हैं; परन्तु मन्त्रहीन पाक-यज्ञ का अधिकारी शुद्र केवल द्विजों की सेवा करनेमात्र से अपने लिये अभीष्ट पुण्यलोकों को प्राप्त कर लेता हैं | इसलिये शुद्र अन्य वर्णों की अपेक्षा अधिक धन्यवाद का पात्र हैं | स्त्रियाँ क्यों धन्य हैं, इसका कारण बतलाया जाता हैं | पुरुषों को अपने धर्म के विपरीत न चलकर सदा ही धनोपार्जन करना, उसे सुपात्रों को देना और विधिपूर्वक यज्ञ करना आवश्यक हैं | धन के उपार्जन और संरक्षण में महान क्लेश उठाना पड़ता हैं तथा उसे उत्तम कार्य में लगाने के लिये मनुष्यों को जो गहरी चिंता करनी पडती हैं, वह सबको विदित हैं | ये तथा और भी बहुत से क्लेश सहन करके पुरुष क्रमश: प्राजापत्य आदि शुभ लोक प्राप्त करते हैं; परन्तु स्त्री मन, वाणी और क्रियाद्वारा केवल पतिकी सेवा करनेमात्र से उसके समान लोकोंपर अधिकार प्राप्त कर लेती हैं | वे महान क्लेश के बिना ही उन्ही लोकों में जाती हैं, इसलिये तीसरी बार मैंने स्त्रियों को साधुवाद दिया हैं | ब्राह्मणों ! यह मैंने कलियुग आदि की श्रेष्ठत्ता का कारण बताया हैं | अब तुमलोग जिस उद्देश्य से यहाँ आये हो, उसे पूछो; मैं तुम्हारे इच्छानुसार उसका भी वर्णन करूँगा | जो अपने सद्गुणरूपी जल से समस्त पापरूपी पंख को धो चुके हैं; उनके द्वारा थोड़े ही प्रयत्न से कलियुग में धर्म की सिद्धि हो जाती है | मुनिवरो ! शुद्र केवल द्विजों की सेवा में तत्पर रहने तथा स्त्रियाँ पति की शुश्रूषा करनेमात्र से अनायास ही पुण्यलोक प्राप्त कर लेती है | इसलिये इन तीनों को ही मैंने परम धन्य माना है द्विजातियों को सत्य आदि तीनों युगों में धर्म का साधन करते समय अधिक क्लेश उठाना पड़ता हैं, किन्तु कलियुग में मनुष्य थोड़ी ही तपस्या से शीघ्र ही सिद्धि प्राप्त कर लेते हैं |

मुनिवरो ! जो कलियुग में धर्म का आचरण करते हैं, वे धन्य हैं |

– नारायण नारायण –

ब्रह्मपुराण अध्याय – ६९

brmhapuran
|| ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ||

ब्रह्मपुराण

अध्याय – ६९

श्रीविष्णु में भक्ति होने का क्रम और कलि-धर्म का निरूपण

मुनियों ने कहा – महामते ! हमने भगवान श्रीकृष्ण के समीप जागरणपूर्वक गीत सुनाने का फल सुना, जिससे वह चांडाल परम गति को प्राप्त हुआ | अब जिस तपस्या अथवा कर्म से भगवान विष्णु में हमारी भक्ति हो सके, वह हमें बताइये | इस समय हम यही विषय सुनना चाहते हैं |

व्यासजी बोले – मुनिवरो ! भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति महान फल देनेवाली है | वह मनुष्य को जिस प्रकार होती है, वह सब क्रमश: बतलाता हूँ; ध्यान देकर सुनो | ब्राह्मणों ! यह संसार अत्यंत घोर और समस्त प्राणियों के लिये भयंकर हैं | नाना प्रकार के सैकड़ो दु:खों से व्याप्त और मनुष्यों के ह्रदय में महान मोह का संचार करनेवाला है | इस जगत में पशु-कशी आदि हजारों योनियों में बारंबार जन्म लेने के पश्चात् देहधारी जीव कभी किसी प्रकार मनुष्यका जन्म पाता है | मनुष्यों में भी ब्राह्मणत्व, ब्राह्मणत्वमें भी विवेक, विवेक से भी धर्मनिष्ठ बुद्धि और बुद्धि से भी कल्यानमय मार्गों का ग्रहण होना अत्यंत दुर्लभ है | मनुष्यों के पूर्वजन्म का संचित पाप जबतक नष्ट नहीं हो जाता, तबतक जगन्मय भगवान वासुदेव में उनकी भक्ति नही होती | अत: ब्राह्मणों ! श्रीकृष्ण में जिस प्रकार भक्ति होती है, वह सुनो | अन्य देवतायों के प्रति मनुष्य की जो मन, वाणी और क्रियाद्वारा तद्वतचित्त से भक्ति होती है, उससे यज्ञ में उसका मन लगता हैं; फिर वह एकाग्रचित होकर अग्नि की उपासना करता हैं | अग्निदेव संतुष्ट होनेपर भगवान भास्कर में उसकी भक्ति होती है | तबसे वह निरंतर सूर्यदेव की आराधना करने लगता है | भगवान सूर्य के प्रसन्न होनेपर उसकी भक्ति भगवान शंकर में होती है, फिर वह बड़े यत्न के साथ विधिपूर्वक महादेवजी की पूजा करता है | जब महादेवजी संतुष्ट होते है, तब मनुष्य की भक्ति भगवान श्रीकृष्ण में होती है | तब वह वासुदेवसंज्ञक अविनाशी भगवान जगन्नाथ का पूजन करके भोग और मोक्ष दोनों प्राप्त कर लेता है |

मुनियों ने पूछा– महामुने ! संसार में जो अवैष्णव मनुष्य देखे जाते हैं, वे श्रीविष्णु का पूजन क्यों नही करते ? इसका कारण बतलाइये |

व्यासजी बोले – मुनिवरो ! इस संसार में दो प्रकार के भूतसर्ग विख्यात हैं – एक असुर और दूसरा दैव प्रकृतिका आश्रय लेनेवाले मनुष्य भगवान विष्णु का पूजन करते हैं और आसुरी प्रकृति को प्राप्त हुए लोग श्रीहरि की निंदा किया करते हैं | ऐसे लोग मनुष्यों में अधम है | श्रीहरिकी माया से उनकी बुद्धि मारी गयी है | ब्राह्मणों ! वे श्रीहरि को न पाकर नीच गति में जाते है | भगवान की माया बड़ी गूढ़ है | देवताओं और असुरों के लिये भी उसका ज्ञान होना कठिन है | वह मनुष्यों के ह्रदय में महँ मोह का संचार करती है | जिन्होंने मन को वश में नहीं किया है, ऐसे लोगों के लिये उस माया को पार करना कठिन हैं |

मुनियों ने कहा – महर्षे ! अब हम आपसे जगत के संहार की कथा सुनना चाहते हैं | कल्प के अंत में जो महाप्रलय होता है, उसका वर्णन कीजिये |

व्यासजी बोले – मुनिवरो ! कल्प के अंत में तथा प्राकृत प्रलय में जो जगत का संहार होता है, उसका वर्णन सुनो | सत्ययुग, त्रेता, द्वापर और कलि – ये चार युग है, जो देवताओं के बारह हजार दिव्य वर्षों में समाप्त होते हैं समस्त चतुर्युग स्वरूप से एक-से ही होते है | सृष्टि के आरम्भ में सत्ययुग होता है तथा अंत में कलियुग रहता हैं | ब्रह्माजी प्रथम कृतयुग में जिसप्रकार सृष्टिका आरम्भ करते हैं, वैसे ही अंतिम कलियुग में उसका उपसंहार करते है |

मुनियों ने कहा – भगवन ! कलि के स्वरूप का विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये, जिसमें चार चरणोंवाले भगवान धर्म खंडित हो जाते है |

व्यासजी बोलेनिष्पाप मुनियों ! तुम जो मुझसे कलिका स्वरप पूछते हो, वह तो बहुत बड़ा है; तथापि मैं संक्षेप से बतलाता हूँ, सुनो |
कलियुग में मनुष्यों की वर्ण और आश्रमसम्बन्धी आचार में प्रवृत्ति नही होगी |
• सामवेद, ऋग्वेद और यजुर्वेद की आज्ञा के पालन में भी कोई प्रवृत्त न होगा |
• कलियुग में विवाह को धर्म नहीं माना जायगा |
• शिष्य गुरु के अधीन नहीं रहेंगे |
• पुत्र भी अपने धर्म का पालन नही करेंगे |
• अग्निहोत्र का नियम उठ जायगा | कोई किसी भी कुल में क्यों न उत्पन्न हुआ हो- जो बलवान होगा, वही कलियुग में सबका स्वामी होगा |
• सभी वर्णों के लोग कन्या बेचकर जीवन-निर्वाह करेंगे |
• बाह्मणों ! कलियुग में जिस किसीका जो भी वचन होगा, सब शास्त्र ही माना जायगा |
• कलियुग में सब देवता होंगे और सबके लिये सब आश्रम होंगे | अपनी-अपनी रूचि के अनुसार अनुष्ठान करके उसमें उपवास, परिश्रम और धनका व्यय करना धर्म कहा जायगा |
• कलियुग में थोड़े से ही धनसे मनुष्यों को बड़ा घमंड होगा |
• स्त्रियों को अपने केशोंपर ही रूपवती होने का गर्व होगा | सुवर्ण, मणि और रत्न आदि तथा वस्त्रों के भी नष्ट हो जानेपर स्त्रियाँ केशों से ही शृंगार करेंगी |
• कलियुग की स्त्रियाँ धनहीन पति को त्याग देंगी | उससमय धनवान पुरुष ही युवतियों का स्वामी होगा |
• जो- जो अधिक देगा, उसे-उसे ही मनुष्य अपना मालिक मानेंगे | उससमय लोग प्रभुता के ही कारण सम्बन्ध रखेंगे |
• द्रव्यराशि घर बनाने में ही समाप्त हो जायगी | उससे दान-पुण्यादि न होंगे |
• बुद्धि द्रव्यों के संग्रहमात्र में ही लगी रहेगी | उसके द्वारा आत्मचिंतन न होगा | सारा धन उपभोगमें ही समाप्त हो जायगा | उससे धर्म का अनुष्ठान न होगा |
• कलियुग की स्त्रियाँ स्वेच्छाचारिणी होंगी | हाव-भाव-विलास में ही उनकी स्पृहा रहेगी | अन्याय से धन पैदा करनेवाले पुरुषों से ही उनकी आसक्ति होगी |
• सुह्रदों के निषेध करनेपर भी मनुष्य एक-एक पाई के लिये भी दूसरों के स्वार्थ की हानि कर देंगे |
• कलियुग में सब लोग सदा सबके साथ समानता दावा करेंगे |
• गायों के प्रति तभीतक गौरव रहेगा, जबतक कि वे दूध देती रहेंगी |
• कलियुग की प्रजा प्राय: अनावृष्टि और क्षुधा के भय से व्याकुल रहेगी | सबके नेत्र आकाश की ओर लगे रहेंगे |
• वर्षा न होने से दु:खी मनुष्य तपस्वीजनों की भांति मूल-फल और पत्ते खाकर रहेंगे और कितने ही आत्मघात कर लेगे | कलि में सदा अकाल ही पड़ता रहेगा | सब लोग सदा असमर्थ होकर क्लेश भोगेंगे | कभी किन्हीं मानवों को थोडा सुख भी मिल जायगा |
• सब लोग बिना स्नान किये ही भोजन करेंगे | अग्निहोत्र, देवपूजा, अतिथि-सत्कार, श्राद्ध और तर्पण की क्रिया कोई नहीं करेंगे |
• कलियुग की स्त्रियाँ लोभी, नाटी, अधिक खानेवाली, बहुत सन्तान पैदा करनेवाली और मंद भाग्यशाली होंगी | वे दोनों हाथों से सिर खुजलाती रहेंगी |
• गुरुजनों तथा पति की आज्ञा का भी उल्लंघन करेंगी तथा पर्दे के भीतर नही रहेगी | अपना ही पेट पालेंगी, क्रोध में भरी रहेंगी | देह-शुद्धि की ओर ध्यान नहीं देंगी और असत्य एवं कटु वचन बोलेंगी | इतना ही नहीं, वे दुराचारिणी होकर दुराचारी परुषों से मिलने की अभिलाषा करेंगी |कुलवती स्त्रियाँ भी अन्य पुरुषों के साथ व्यभिचार करेंगी |
• ब्रह्मचारी लोग वेदोक्त व्रत का पालन किये बिना ही वेदाध्ययन करेंगे |
• गृहस्थ पुरुष न तो हवन करेंगे और न सत्पात्र को उचित दान ही देंगे |
• वानप्रस्थ आश्रम में रहनेवाले लोग वन के कंद-मूल आदि से निर्वाह न करके ग्रामीण आहार का संग्रह करेंगे और संन्यासी भी मित्र आदि के स्नेह-बंधन में बँधे रहेंगे |
• कलियुग आनेपर राजालोग प्रजा की रक्षा नहीं करेंगे, अपितु कर लेने के बहाने प्रजा के ही धन का अपहरण करनेवाले होंगे |
• उस समय जिस-जिस के पास हाथी, घोड़े और रथ होंगे, वही-वाही राजा होगा और जो-जो निर्बल होंगे, वे ही सेवक होंगे |
• वैश्यलोग कृषि, वाणिज्य आदि अपने कर्मों को छोडकर शुद्र-वृत्तिसे रहेंगे | शिल्प-कर्म से जीवन-निर्वाह करेंगे | इसी प्रकार शुद्र भी संन्यास का चिन्ह धारण करके भिक्षापर जीवन-निर्वाह करेंगे | वे अधम मनुष्य संस्कारहीन होते हुए भी लोगों को ठगने के लिये पाखंड-वृत्तिका आश्रय लेंगे |
• दुर्भिक्ष और करकी पीड़ा से अत्यंत उपद्र्वग्रस्त होकर प्रजाजन ऐसे देशों में चले जायेंगे, जहाँ गेहूँ और जौ आदि की अधिकता होगी | उससमय वेदमार्ग का लोप, पाखंडकी अधिकता और अधर्म की वृद्धि होने से लोगों की आयु बहुत थोड़ी होगी |
• कलियुग में पाँच, छ: अथवा सात वर्ष की स्त्री और आठ, नौ या दस वर्ष के पुरुषों के ही संताने होने लग जायँगी |
• बारह वर्ष की अवस्था में ही बाल सफेद होने लगेंगे |
• घोर कलियुग आनेपर कोई मनुष्य बीस वर्षतक जीवित नही रहेगा | उस समय लोग मंदबुद्धि, व्यर्थ चिन्ह धारण करनेवाले और दुष्ट अंत:करणवाले होंगे; अत: वे थोड़े ही समय में नष्ट हो जायेंगे |
• जब – जब इस जगत में पाखंड-वृत्ति दृष्टिगोचर होने लगे, तब-तब विद्वान पुरुषों को कलियुग की वृद्धि का अनुमान करना चाहिये |
• जब – जब वैदिक मार्ग का अनुसरण करनेवाले साधू पुरुषों की हानि हो, तब – तब बुद्धिमान पुरुषों को कलियुग की वृद्धि का अनुमान करना चाहिये |
• जब धर्मात्मा मनुष्यों के आरम्भ किये हुए कार्य शिथिल हो जायँ, तब उसमें विद्वानों को कलियुग की प्रधानता का अनुमान करना चाहिये |
• जब – जब यज्ञों के अधीश्वर भगवान पुरुषोत्तम का लोग यज्ञोंद्वारा यजन न करें, तब – तब यह समझना चाहिये कि कलियुगका बल बढ़ रहा हैं |

द्विजवरो ! जब वेदवाद में प्रेम न हो और पाखंड में अनुराग बढ़ता जाय, तब विद्वान पुरुषों को कलियुग की वृद्धि का अनुमान करना चाहिये | ब्राह्मणों कलियुग में पाखंड से दूषित चित्तवाले मनुष्य सबकी सृष्टि करनेवाले जगतपति भगवान विष्णु की आराधना नहीं करेंगे | उससमय पाखण्ड से प्रभावित मनुष्य ऐसा कहेंगे कि ‘देवताओं से क्या लेना हैं | ब्राह्मणों और वेदों से क्या लाभ है | जल से होनेवाली शुद्धि में क्या रखा है | ‘
कलियुग में मेघ थोड़ी वृष्टि करेंगे | खेती में बहुत कम फल लगेंगे और वृक्षों के फल सारहीन होंगे |
• कलि में प्राय: लोग घुटनोतक वस्त्र पहनेगे |
• वृक्षों में शमी की ही अधिकता होगी |
• चारों वर्णों के सब लोग प्राय: शुद्रवत हो जायेंगे |
• कलियुग आनेपर प्राय: छोटे-छोटे धान्य होंगे | अधिकतर बकरियों का दूध मिलेगा और उशीर (खस) ही एकमात्र अनुलेपन होगा |
• कलियुग में अधिकतर सास और सुसर ही लोगों के गुरुजन होंगे | मुनिवरो ! उस समय मनोहारिणी भार्या और साले आदि ही सुह्रद समझे जायेंगे | लोग अपने ससुर के अनुगामी होकर कहेंगे कि ‘कौन किसकी माता हैं और कौन किसका पिता | सब जीव अपने कर्मों के अनुसार ही जन्मते और मरते हैं |’
• उससमय थोड़ी बुद्धिवाले मनुष्य मन, वाणी और शरीर के दोषों से प्रभावित होकर प्रतिदिन बारंबार पाप करेंगे | सत्य, शौच और लज्जा से रहित मनुष्यों के लिये जो-जो दुःख की बात हो सकती हैं, वह सब कलिकाल में होगी |
• संसार में स्वाध्याय, वषटकार, स्वधा और स्वाहा का शब्द नहीं सुनायी देगा | उस समय स्वधर्मनिष्ठ ब्राह्मण कोई विरला ही होगा |
• एक विशेषता अवश्य है , कलियुग में थोडा-सा ही प्रयन्त करनेपर मनुष्य वह उत्तम पुण्यराशि प्राप्त कर सकता हैं, जो सत्ययुग में बहुत बड़ी तपस्या से ही साध्य हो सकती है |

ब्राह्मणों ! कलियुग धन्य है, जहाँ थोड़े ही क्लेशसे महान फल की प्राप्ति होती है तथा स्त्री और शुद्र भी धन्य है | इसके सिवा और भी सुनो |

सत्ययुग में दस वर्षतक तपस्या, ब्रह्मचर्य और जप आदिका अनुष्ठान करने से जो फल मिलता हैं, वह त्रेता में एक वर्ष, द्वापर में एक मास तथा कलियुग में एक दिन-रात के ही अनुष्ठान से मिल जाता हैं | इसलिए मैंने कलियुग को श्रेष्ठ बताया | सत्ययुग में ध्यान, त्रेतामें यज्ञोंद्वारा यजन और द्वापर में पूजन करने से मनुष्य जिस फलको पाता हैं, वही कलियुग में केशव का नाम-कीर्तन करनेमात्र से मिल जाता हैं | धर्मज्ञ ब्राह्मणों ! इस कलियुग में थोड़े-से परिश्रम से ही मनुष्य को महान धर्म की प्राप्ति हो जाती हैं | इसलिये मैं कलियुग से अधिक संतुष्ट हूँ |

शूद्रों की विशेषता का वर्णन 

द्विजों को पहले ब्रह्मचर्य-व्रत का पालन करते हुए वेदाध्ययन करना पड़ता हैं | फिर धर्मत: प्राप्त हुए धन के द्वारा विधिपूर्वक यज्ञ करना पड़ता हैं | इसमें भी व्यर्थ वार्तालाप, व्यर्थ भोजन और व्यर्थ धन द्विजों के पतन के कारण होते हैं ; इसलिये उन्हें सदा संयमी रहना आवश्यक हैं | यदि वे सभी वस्तुओं में विधिका पालन न करें तो उन्हें दोष लगता हैं | यहाँतक कि भोजन और पान आदि भी उनकी इच्छा के अनुसार नहीं प्राप्त होते | वे समस्त कार्यों में परतंत्र होते हैं | इसप्रकार विनीत भाव से महान क्लेश उठाकर वे उत्तम लोकों पर अधिकार प्राप्त करते हैं; परन्तु मन्त्रहीन पाक-यज्ञ का अधिकारी शुद्र केवल द्विजों की सेवा करनेमात्र से अपने लिये अभीष्ट पुण्यलोकों को प्राप्त कर लेता हैं | इसलिये शुद्र अन्य वर्णों की अपेक्षा अधिक धन्यवाद का पात्र हैं | स्त्रियाँ क्यों धन्य हैं, इसका कारण बतलाया जाता हैं | पुरुषों को अपने धर्म के विपरीत न चलकर सदा ही धनोपार्जन करना, उसे सुपात्रों को देना और विधिपूर्वक यज्ञ करना आवश्यक हैं | धन के उपार्जन और संरक्षण में महान क्लेश उठाना पड़ता हैं तथा उसे उत्तम कार्य में लगाने के लिये मनुष्यों को जो गहरी चिंता करनी पडती हैं, वह सबको विदित हैं | ये तथा और भी बहुत से क्लेश सहन करके पुरुष क्रमश: प्राजापत्य आदि शुभ लोक प्राप्त करते हैं; परन्तु स्त्री मन, वाणी और क्रियाद्वारा केवल पतिकी सेवा करनेमात्र से उसके समान लोकोंपर अधिकार प्राप्त कर लेती हैं | वे महान क्लेश के बिना ही उन्ही लोकों में जाती हैं, इसलिये तीसरी बार मैंने स्त्रियों को साधुवाद दिया हैं | ब्राह्मणों ! यह मैंने कलियुग आदि की श्रेष्ठत्ता का कारण बताया हैं | अब तुमलोग जिस उद्देश्य से यहाँ आये हो, उसे पूछो; मैं तुम्हारे इच्छानुसार उसका भी वर्णन करूँगा | जो अपने सद्गुणरूपी जल से समस्त पापरूपी पंख को धो चुके हैं; उनके द्वारा थोड़े ही प्रयत्न से कलियुग में धर्म की सिद्धि हो जाती है | मुनिवरो ! शुद्र केवल द्विजों की सेवा में तत्पर रहने तथा स्त्रियाँ पति की शुश्रूषा करनेमात्र से अनायास ही पुण्यलोक प्राप्त कर लेती है | इसलिये इन तीनों को ही मैंने परम धन्य माना है द्विजातियों को सत्य आदि तीनों युगों में धर्म का साधन करते समय अधिक क्लेश उठाना पड़ता हैं, किन्तु कलियुग में मनुष्य थोड़ी ही तपस्या से शीघ्र ही सिद्धि प्राप्त कर लेते हैं |

मुनिवरो ! जो कलियुग में धर्म का आचरण करते हैं, वे धन्य हैं |

– नारायण नारायण –

ब्रह्मपुराण अध्याय – ६८

brmhapuran
|| ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ||

ब्रह्मपुराण

अध्याय – ६८

श्रीवासुदेव के पूजन की महिमा तथा एकादशी को भगवान के मन्दिर में जागरण करने का माहात्म्य – ब्रह्मराक्षस और चांडाल की कथा

मुनियों ने कहा – महामुने ! श्रीवासुदेव के पूजन में संलग्न रहनेवाले मनुष्य उनका विधिपूर्वक भक्तिभाव से पूजन करके किस गति को प्राप्त होते हैं ?

व्यासजी बोले – मुनिवरो ! तुमने बहुत अच्छी बात पूछी हैं | यह वैष्णवों को सुख देनेवाला विषय हैं, ध्यान देकर सुनो | वैष्णवों के लिये स्वर्ग और मोक्ष दुर्लभ नहीं है | वैष्णव पुरुष जिन-जिन दुर्लभ भोगों की अभिलाषा करते हैं, उन सबको प्राप्त कर लेते हैं | जैसे कोई पुरुष कल्पवृक्ष के पास पहुँच जानेपर अपनी इच्छा के अनुसार फल पाता है, उसी प्रकार भगवान श्रीकृष्ण से सम्पूर्ण अभीष्ट वस्तुओं की प्राप्ति होती है | भक्त मनुष्य श्रद्धा और विधि के साथ जगदगुरु भगवान वासुदेव का पूजन करके धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष – चारों पुरुषार्थ के फलस्वरूप स्वयं भगवान को प्राप्त कर लेते हैं | जो लोग सदा भक्तिपूर्वक अविनाशी वासुदेव की पूजा करते हैं, उनके लिये तीनों लोकों में कुछ भी दुर्लभ नहीं है | संसार में वे मनुष्य धन्य है, जो समस्त मनोवांछित फलों के देनेवाले सर्वपापहारी श्रीहरि का सदा पूजन करते हैं | ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, स्त्री, शुद्र और अन्त्यज – सभी सुरश्रेष्ठ भगवान वासुदेव का पूजन करके परम गति को प्राप्त होते हैं |

दोनों पक्षों की एकादशी को उपवासपूर्वक एकाग्रचित हो विधिपूर्वक स्नान करके धुले हुए वस्त्र पहने | इन्दिर्यों को अपने काबू में रखे और पुष्प, गंध, धूप, दीप, नैवेद्य, नाना प्रकार के उपहार, जप, होम, प्रदक्षिणा, भांति-भान्ति के दिव्य स्तोत्र, मनोहर गीत, वाद्य, दंडवत-प्रणाम तथा ‘जय’ शब्द के उच्चारणद्वारा श्रद्धापूर्वक भगवान विष्णु की विधिवत पूजा करे | पूजन के पश्चात रात्रि में जागरण करके श्रीकृष्ण का चिन्तन करते हुए उनकी कथा-वार्ता करे | अथवा भगवतसंबंधी पदों का गान करे | यों करनेवाला मनुष्य भगवान विष्णु के परम धाम को जाता हैं – इसमें तनिक भी संदेह नहीं है |

मुनियों ने पूछा – महामुने ! भगवान् विष्णु के लिए जागरण करके गीत गाने का क्या फल है ? उसे बताइये | उसका श्रवण करने के लिये हमारे मनमें बड़ी उत्कंठा है |

व्यासजी बोले – मुनिवरो ! भगवान विष्णु के लिये जागरण करते समय गान करनेका जो फल बताया गया है, उसका क्रमश: वर्णन करता हूँ; सुनो | इस पृथ्वीपर अवन्ती नामसे प्रसिद्ध एक नगरी थी, जहाँ शंख, चक्र और गदा धारण करनेवाले भगवान विष्णु विराजमान थे | उस नगरी के एक चांडाल रहता था, जो संगीत में कुशल था | वह उत्तम वृत्ति से धन पैदा करके कुटुंब के लोगों का भरण-पोषण करता था | भगवान विष्णु के प्रति उसकी बड़ी भक्ति थी | वह अपने व्रत का दृढ़तापूर्वक पालन करता था | प्रत्येक मासकी एकादशी तिथि को वह उपवास करता और भगवान के मन्दिर के पास जाकर उन्हें गीत सुनाया करता था | वह गीत भगवान विष्णु के नामों से युक्त और उनकी अवतार-कथा से संबंध रखनेवाला होता था | गांधार, षड्ज, निषाद, पंचम और धैवत आदि स्वरों से वह रात्रि-जागरण के समय विभिन्न गाथाओंद्वारा श्रीविष्णु का यशोगान करता था | द्वादशी को प्रात:काल भगवान को प्रणाम करके अपने घर आता और पहले दामाद, भानजे और कन्याओं को भोजन कराकर पीछे स्वयं सपरिवार भोजन करता था | इसप्रकार विचित्र गीतोंद्वारा भगवान विष्णु की प्रसन्नता का सम्पादन करते हुए उस चांडाल की आयुका अधिकांश भाग बीत गया | एक दिन चैत्र के कृष्णपक्ष की एकादशी तिथि को वह भगवान विष्णु की सेवा करने के लिए जंगली पुष्पों का संग्रह करने के निमित्त भक्तिपूर्वक उत्तम वनमें गया | क्षिप्रा के तटपर महँ वनके भीतर एक बहेड़े का वृक्ष था | उसके नीचे पहुँचनेपर किसी राक्षस ने उस चांडाल को देखा और भक्षण करने के लिये पकड़ लिया | यह देख चांडाल ने उस राक्षस से कहा – ‘भद्र ! आज तुम मुझे न खाओ, कल प्रात:काल खा लेना | मैं सत्य कहता हूँ, फिर तुम्हारे पास लौट आऊँगा | राक्षस ! आज मेरा बहुत बड़ा कार्य हैं, अत: मुझे छोड़ दो | मुझे भगवान विष्णु की सेवा के लिये रात्रि में जागरण करना है | तुम्हें उसमें विघ्न नहीं डालना चाहिये | ब्रह्मराक्षस ! सम्पूर्ण जगत का मूल सत्य ही है, अत: मेरी बात सुनो | मैं सत्यकी शपथ खाकर कहता हूँ, पुन: तुम्हारे पास लौट आऊँगा | परायी स्त्रियों के पास जाने और पराये धनको हडप लेनेवाले मनुष्यों को जिस पाप की प्राप्ति होती है, ब्रह्महत्यारे, शराबी और गुरुपत्नीगामी तथा शुद्रजातीय स्त्री से सम्बन्ध रखनेवाले द्विज को जो पाप होता हैं, कृतघ्न, मित्रघाती, दुबारा ब्याही हुई स्त्री के पति, क्रूरतापूर्ण कर्म-करनेवाले पुरुष, कृपण तथा वन्ध्या के अतिथि को जो पाप लगता हैं, अमावस्या, अष्टमी, षष्ठी और दोनों पक्षों की चतुर्दशी में स्त्रीसमागम से जो पाप होता है, ब्राह्मण यदि रसस्वला स्त्री के पास जाय अथवा श्राद्ध करके स्त्रीसमागम करे, उससे जो पाप लगता हैं, मल-भोजन करनेपर जिस पाप की प्राप्ति होती है, मित्रकी पत्नी के साथ सम्भोग करनेवालों को जो दोष प्राप्त होता है, चुगलखोर, दम्भी, मायावी और मधुघाती को जिस पापकी प्राप्ति होती है, ब्राह्मण को कुछ देनेकी प्रतिज्ञा करके फिर उसे न देनेवाले को जो दोष लगता है, स्त्री-हत्या, बाल-हत्या और मिथ्याभाषण करनेवाले को जिस पापका भागी होना पड़ता है, देवता, वेद, ब्राह्मण, राजा, मित्र और साध्वी स्त्री की निंदा करने से जो पाप होता है, गुरु को झूठा कलंक देने, वन में आग लगाने, गौकी हत्या करने, ब्राह्मणाधम होने और बड़े भाई के अविवाहित रहते स्वयं विवाह कर लेनेपर जो पाप लगता हैं तथा भ्रूणहत्या करनेवाले मनुष्यों को जिस पापकी प्राप्ति होती है – अथवा यहाँ बहुत-से शपथों का वर्णन करने से क्या लाभ | राक्षस ! एक भयंकर शपथ सुन लो; यद्यपि वह कहने योग्य नहीं है तो भी कहता हूँ – अपनी कन्याको बेचकर जीविका चलानेवाले, झूठी गवाही देने एवं यज्ञ के अनधिकारी से यज्ञ करानेवाले मनुष्यों को जिस पापका भागी होना पड़ता हैं तथा, संन्यासी और ब्रह्मचारी को कामभोग में आसक्त होनेपर जिस पापकी प्राप्ति होती है, उक्त सभी पापों से मैं लिप्त हौऊँ, यदि तुम्हारे पास लौटकर न आऊँ |’

चांडाल की यह बात सुनकर ब्रह्मराक्षस को बड़ा विस्मय हुआ | उसने कहा – ‘जाओ, सत्य के द्वारा अपनी की हुई प्रतिज्ञा का पालन करना |’ राक्षस के यों कहनेपर चांडाल फूल लेकर भगवान विष्णु के मन्दिरपर आया | उसने सभी फूल ब्राह्मण को दे दिये | ब्राह्मण ने उन्हें जलसे धोकर उनके द्वारा भगवान विष्णु का पूजन किया और अपने घर की राह ली; किन्तु चांडाल ने मन्दिर के बाहर ही भूमिपर बैठकर उपवासपूर्वक गीत गाते हुए रातभर जागरण किया | रात बीती, सवेरा हुआ और चांडाल ने स्नान करके भगवान को नमस्कार किया; फिर अपनी प्रतिज्ञा सत्य करने के लिये वह राक्षस के पास चल दिया | उसे जाते देख किसी मनुष्य ने पूछा- ‘भद्र ! कहाँ जाते ही ?’ चांडाल ने सब बातें कह सुनायी | तब वह मनुष्य फिर बोला – ‘यह शरीर धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष – चारों पुरुषार्थों का साधन है; अत: विद्वान पुरुष को बड़े यत्न से इसका पालन करना चाहिये | मनुष्य जीवित रहे तो वह धर्म, अर्थ, सुख और श्रेष्ठ मोक्ष-गति को प्राप्त कर लेता हैं | जीवित रहनेपर वह कीर्ति का भी उपार्जन करता हैं | संसार में मरे हुए मनुष्य की कोई चर्चा ही नहीं करता |’ उसकी बात सुनकर चांडाल ने युक्तियुक्त वचनों में उत्तर दिया – ‘भद्र ! मैंने शपथ खायी हैं, अत: सत्य को आगे करके राक्षस के पास जाता हूँ |’ तब उस मनुष्य ने फिर कहा – ‘साधो ! तुम ऐसी मुर्खता क्यों करते हो ? क्या तुमने मनुजी का यह वचन नहीं सुना है – ‘गौ, स्त्री और ब्राह्मण की रक्षा के लिये, विवाह के समय, रति के प्रसंग में , प्राण-संकटकाल में, सर्वस्वका अपहरण होते समय –इन पाँच अवसरोंपर असत्यभाषण से पाप नही लगता |’

उस मनुष्य का कथन सुनकर चांडाल ने पुन: उत्तर दिया – ‘आपका कल्याण हो, आप ऐसी बात मुँह से न निकालें | संसार में सत्यका ही आदर होता हैं | भूतलपर जो कुछ भी सुख-सामग्री है, वह सत्य से ही प्राप्त होती है | सत्य से ही सूर्य तपता हैं, सत्यसे ही जलमे रसकी स्थिति है, सत्यसे ही आग जलती और सत्यसे ही वायु चलती है | मनुष्यों को सत्यसे ही धर्म, अर्थ, काम और दुर्लभ मोक्ष की प्राप्ति होती है; अत: सत्यका परित्याग न करे | लोक में सत्य ही परब्रह्म है, यज्ञों में भी सत्य ही सबसे उत्तम है तथा सत्य स्वर्ग से आया हुआ है; इसलिये सत्य को कभी नही छोड़ना चाहिये |

यों कहकर वह चांडाल उस मनुष्य को चुप कराकर उस स्थानपर गया, जहाँ प्राणियों का वध करनेवाला ब्रह्मराक्षस रहता था | चांडाल को आया देख ब्रह्मराक्षस के नेत्र आश्चर्य से चकित हो उठे | उसने सर हिलाकर कहा – ‘महाभाग ! तुम्हें साधुवाद ! तुम वास्तव में सत्य वचन का पालन करनेवाले हो | तुम तो सत्यस्वरूप हो | मैं तुम्हें चांडाल नही मानता | तुम्हारे इस कर्म से मैं तुम्हे पवित्र ब्राह्मण समझता हूँ | तुम्हारे मुख में कल्याण का निवास है | अब मैं तुमसे धर्म-सम्बन्धी कुछ बाते पूछता हूँ, बताओ | ‘ तुमने भगवान विष्णु के मन्दिर में कौन-सा कार्य किया ? मातंग ने कहा – ‘सुनो, मैंने मन्दिर के नीचे बैठकर भगवान के सामने मस्तक झुकाया और उनका यशोगान करते हुए साड़ी रात जागरण किया |’ ब्रह्मराक्षस ने फिर पूछा – ‘बताओ, तुम्हें इसप्रकार भक्तिपूर्वक विष्णुमन्दिर में जागरण करते कितना समय व्यतीत हो गया ? चांडाल ने हँसकर कहा – ‘राक्षस ! मुझे प्रत्येक मासकी एकादशी को जागरण करते बीस वर्ष व्यतीत हो गये |’ यह सुनकर ब्रह्मराक्षस ने कहा- ‘साधो ! अब मैं तुमसे जो कुछ कहता हूँ, वह करो | मुझे एक रातके जागरण का फल अर्पण करो | महाभाग ! ऐसा करनेसे तुम्हें छुटकारा मिल जायगा; अन्यथा मैं तीन बार सत्यकी दुहाई देकर कहता हूँ कि तुम्हे कदापि नही छोडूँगा |’ यों कहकर वह चुप हो गया |

चांडाल ने कहा – ‘निशाचर ! मैंने तुम्हें अपना शरीर अर्पित कर दिया हैं | अत: अब दूसरी बात करनेसे क्या लाभ | तुम मुझे इच्छानुसार खा जाओ |’ तब राक्षस ने फिर कहा – ‘अच्छा, रातके दो ही पहर के जागरण और संगीत का पुण्य मुझे दे दो | तुम्हें मुझपर भी कृपा करनी चाहिये |’ यह सुनकर चांडाल ने राक्षस ने कहा – ‘यह कैसी बेसिर-पैर की बात करते हो | मुझे इच्छानुसार खा लो | मैं तुम्हे जागरण का पुण्य नहीं दूँगा |’ चांडाल की बात सुनकर ब्रह्मराक्षस ने कहा – ‘भाई ! तुम तो अपने धर्म-कर्म से सुरक्षित हो; कौन ऐसा अज्ञानी और दुष्ट बुद्धिका पुरुष होगा, जो तुम्हारी ओर देखने, तुमपर आक्रमण करने अथवा तुम्हें पीड़ा देने का साहस कर सके | दिन, पापग्रस्त, विषयविमोहित, नरकपीड़ित और मूढ़ जीवपर साधू पुरुष सदा ही दयालु रहते हैं | महाभाग ! तुम मुझपर कृपा करके एक ही याम के जागरणका पुण्य दे दो अथवा अपने घर को लौट जाओ |’ चांडाल ने फिर उत्तर दिया – ‘न तो मैं अपने घर लौटूँगा और न तुम्हे किसी तरह एक याम के जागरण का पुण्य ही दूँगा |’ यह सुनकर ब्रह्मराक्षस हँस पीडीए और बोला – ‘भाई ! रात्रि व्यतीत होते समय जो तुमने अंतिम गीत गाया हो, उसीका फल मुझे दे दो और पाप से मेरा उद्धार करो |’

तब चांडाल ने उससे कहा – ‘यदि तुम आजसे किसी प्राणी का बढ़ न करो तो मैं तुम्हें अपने पिछले गीत का पुण्य दे सकता हूँ; अन्यथा नहीं |’ ‘बहुत अच्छा’ कहकर ब्रह्मराक्षस ने उसकी बात मान ली | तब चांडाल ने उसे आधे मुहूर्त के जागरण और गान का फल दे दिया | उसे पाकर ब्रह्मराक्षस ने चांडाल को प्रणाम किया और प्रसन्न होकर तीर्थों में श्रेष्ठ पृथुदकतीर्थ की ओर चल दिया | वहाँ निराहार रहने का संकल्प लेकर ब्रह्मराक्षस ने प्राण त्याग दिया | उस गीत के फल से पुण्य की वृद्धि होने के कारण उसका उस राक्षसयोनि से उद्धार हो गया | पृथुदकतीर्थ के प्रभाव से दुर्लभ ब्रह्मलोक में जाकर उसने दस हजार वर्षोतक वहाँ निर्भय निवास किया | अंत में वह जितेन्द्रिय ब्राह्मण हुआ और इसे पूर्वजन्म का स्मरण बना रहा | अब चांडाल की शेष कथा कहता हूँ, सुनो ! राक्षस के चले जानेपर वह बुद्धिमान एवं संयमी चांडाल अपने घर आया | उस घटनासे चांडाल के मन में बड़ा वैराग्य हुआ | उसने अपनी पत्नी की रक्षा का भार पुत्रोंपर डाल दिया और स्वयं पृथ्वी की परिक्रमा आरम्भ कर दी | कोकामुख से लेकर जहाँ भगवान स्कन्द के दर्शन होते हैं, वहाँतक गया | स्कन्द का दर्शन करके वह धारा नगरी में गया | वहाँ भी प्रदक्षिणा करके वह पर्वतों में श्रेष्ठ विन्ध्याचलपर जाकर पापमोचन तीर्थ में पहुँचा | वहाँ उस चांडालने स्नान किया, जो सब पापों को दूर करनेवाला है | फिर पापरहित हो वह उत्तम गतिको प्राप्त हुआ |

– नारायण नारायण –

ब्रह्मपुराण अध्याय – ६७

brmhapuran
|| ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ||

ब्रह्मपुराण

अध्याय – ६७

भगवान वासुदेव का माहात्म्य

व्यासजी कहते हैं – जगन्माता पार्वती अपने स्वामी की कही हुई सब बातें आदि से ही सुनकर बहुत प्रसन्न हुई | उससमय वहाँ तीर्थयात्रा के प्रसंग से जो मुनिउस पर्वतपर गये थे, उन्होंने भी शूलपाणि महादेवजी का पूजन और प्रणाम करके सब लोकों के हित के लिये प्रश्न किया |

मुनियों ने कहा – त्रिलोचन ! आपको नमस्कार है | इस रोमांचकारी महाभयंकर संसार में अज्ञानी पुरुष चिरकाल से भटक रहे हैं, वे जन्म-मृत्युरूप संसारबंधन से किस उपाय से मुक्त हो सकते ? बताइये | हम यही सुनना चाहते हैं |

महादेवजी बोले – द्विजो ! कर्मबन्धन में बंधकर दुःख भोगनेवाले मनुष्यों के लिये मैं भगवान वासुदेव से बढकर दूसरा कोई उपाय नही देखता | जो शंख, चक्र और गदा धारण करनेवाले भगवान वासुदेव का मन, वाणी और क्रियाद्वारा विधिपूर्वक पूजन करते हैं, वे परम गति को प्राप्त होते है | जिनका मन जगन्मय भगवान वासुदेव में नही लगा, उनके जीवन से और पशुओं की भाँती चेष्टा से क्या लाभ हुआ |

मुनियों ने कहा – सर्वलोकवन्दित पिनाकधारी भगवान शंकर ! हम भगवान वासुदेव का महात्म्य सुनना चाहते है |

महादेवजी बोले – सनातन पुरुष श्रीहरि ब्रह्माजी से भी श्रेष्ठ हैं | उनका श्रीविग्रह श्यामवर्ण हैं, उनकी कान्ति जाम्बूनद नामक सुवर्ण के समान है | वे मेघरहित आकाश में सूर्य की भांति प्रकाशित होते हैं | उनके दस भुजाएँ हैं | वे महातेजस्वी और देवशत्रुओं के नाशक हैं | उनके वक्ष:स्थल में श्रीवत्स का चिन्ह शोभा पाटा हैं | वे इन्द्रियों के नियंता और सम्पूर्ण देववृन्द के अधिपति है | उनके उदर से ब्रह्मा का और मस्तक से मेरा प्रादुर्भाव हुआ है | सिरके बालोंसे नक्षत्र और ग्रह तथा रोमावलियों से देवता और असुर उत्पन्न हुए | उनके शरीर से ऋषि और सनातन लोक प्रकट हुए है | वे साक्षात ब्रह्माजी तथा संपूर्ण देवताओं के निवासस्थान हैं | वे ही इस सम्पूर्ण पृथ्वी के रचयिता और तीनों लोकों के स्वामी हैं | वे देवताओं के भी देवता और रक्षक हैं | शत्रुओं को ताप देनेवाले, सर्वज्ञ, सर्वस्त्रष्टा, सर्वव्यापी और सब ओर मुखवाले हैं | तीनों लोकों में उनसे बढकर दूसरी कोई वस्तु नहीं हैं | वे सनातन महाभाग गोविन्द के नामसे विख्यात हैं | देवताओं के कार्य की सिद्धि के लिये मानव-शरीर में अवतीर्ण होकर वे समस्त भूपालों का युद्ध में संहार करेंगे | भगवान विष्णु के बिना देवगण अनाथ हैं | अत” उनके बिना ये संसार में देव-कार्य की सिद्धि नहीं कर सकते | सम्पूर्ण भूतों के नायक भगवान विष्णु समस्त प्राणियोंद्वारा वन्दित हैं | वे देवताओं के नाथ, कार्य-कारण-ब्रह्मस्वरूप और ब्रह्मर्षियों को शरण देनेवाले हैं | ब्रह्माजी उनकी नाभि में हैं और मैं शरीर में | सम्पूर्ण देवता भी उनके शरीर में सुखपूर्वक स्थित हैं | वे भगवान् कमल के समान नेत्र धारण करते हैं | उनके गर्भ से श्री का निवास हैं | वे सदा लक्ष्मीजी के साथ रहते हैं | शांर्ग नामक धनुष, सुदर्शन चक्र और नंदक नामक खड्ग उनके आयुध हैं | सम्पूर्ण नागों के शत्रु गरुड उनकी ध्वजा में विराजमान हैं | उत्तम शील, शौच, इन्द्रियसंयम, पराक्रम, वीर्य, सुदृढ़ शरीर, ज्ञान, सरलता, कोमलता, रूप और बल आदि सभी गुणों से वे सुशोभित हैं | उनके पास सम्पूर्ण दिव्यास्त्रों का समुदाय हैं | उनके योगमायामय सहस्त्रों नेत्र हैं | वे विकराल नेत्रोंवाले भी हैं | उनका ह्रदय विशाल हैं | वे अपनी वाणी से मित्रजनों की प्रशंसा करते हैं | कुटुम्बी और बंधुजनों के प्रेमी है | क्षमाशील, अहंकारशून्य और वेदों का ज्ञान प्रदान करनेवाले हैं | वे भयातूरों के भय का अपहरण और मित्रों के आनंद की वृद्धि करनेवाले हैं | समस्त प्राणियों को शरण देनेवाले और दीनों के पालक हैं | शास्त्रों के ज्ञाता और ऐश्वर्यसम्पन्न हैं | शरण में आये हुए मनुष्यों के उपकारी और शत्रुओं को भय देनेवाले हैं | नीतिज्ञ, नितिसंपन्न, ब्रह्मवादी, जितेन्द्रिय और उत्कृष्ट बुद्धि से युक्त है |

वे देवताओं के अभ्युदय के लिये महात्मा मनुके वंश में अवतार लेंगे | उस अवतार में वे ब्राह्मणों का सत्कार करनेवाले, ब्रह्मस्वरूप और ब्राम्हणों के प्रेमी होंगे | यदुकुल में अवतीर्ण भगवान श्रीकृष्ण राजगृह में जरासंध को जीतकर उसकी कैद में पड़े हुए राजाओं को छुडायेंगे | पृथ्वी के समस्त रत्न उनके पास संचित होंगे | वे अत्यंत पराक्रमी होंगे | भूतलपर दूसरा कोई वीर उन्हें पराक्रमद्वारा परास्त न कर सकेगा | वे विक्रम से सम्पन्न समस्त राजाओं के भी राजा और वीरमूर्ति होंगे | भगवान वासुदेव द्वारका में रहते हुए दुर्बुद्धि दैत्यों को पराजित करके इस पृथ्वी का पालन करेंगे | आप सब लोग ब्राह्मणों तथा श्रेष्ठ पूजन-सामग्रियों के साथ भगवान की सेवा में उपस्थित हो सनातन ब्रह्माजी की भांति उनका यथायोग्य पूजन करें | जो मेरा तथा पितामह ब्रह्मा का दर्शन करना चाहता हो, उसे परम प्रतापी भगवान वासुदेव का दर्शन अवश्य करना चाहिये | उनका दर्शन होने से ही मेरा भी दर्शन हो जाता हैं – इससे कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये | तपोधनो ! भगवान वासुदेव ही ब्रह्मा हैं, ऐसा जानो | जिनपर कमलनयन भगवान विष्णु प्रसन्न होंगे, उनपर ब्रह्मासहित सम्पूर्ण देवता भी प्रसन्न हो जायेंगे | संसार में जो मानव भगवान केशव की शरण लेगा, उसे कीर्ति, यश और स्वर्गकी प्राप्ति होगी | इतना ही नहीं, वह धर्मात्मा होने के साथ ही धर्म का उपदेश करनेवाला आचार्य होगा |

महातेजस्वी भगवान विष्णु ने प्रजावर्ग का हित करने की इच्छा से धर्मानुष्ठान के लिये कोटि-कोटि ऋषियों को उत्पन्न किया | वे सनत्कुमार आदि ऋषि गंधमादन पर्वतपर विधिपूर्वक तपस्या में संलग्न हैं | इसलिए धर्मज्ञ एवं प्रवचन कुशल भगवान विष्णु सबके लिये नमस्कार करनेयोग्य हैं | वे वन्दित होनेपर स्वयं वन्दना करते हैं और सम्मानित होनेपर स्वयं भी सम्मान देते हैं | जो प्रतिदिन उनका दर्शन करता हैं, उसपर वे भी सदा कृपादृष्टि रखते हैं | जो उनकी शरण में जाता हैं, उसकी ओर वे भी बढ़ आते हैं | जो अर्चना करता हैं, उसकी वे भी सदा अर्चना करते हैं | इसप्रकार आदिदेव भगवान विष्णु अनिन्द्य हैं | साधू पुरुषों ने उनकी आराधना के लिये बड़ी भारी तपस्या की हैं | देवताओं ने भी सनातन देव श्रीहरि का सदा ही पूजन किया हैं | भगवान के अनुरूप निर्भयता से युक्त हो उनकी शरण में जाकर उनकी आराधना में मन लगाया हैं | सम्पूर्ण द्विजों को चाहिये कि वे मन, वाणी और क्रियाद्वारा भगवान देवकी-नंदन की सेवामे उपस्थित हो यत्नपूर्वक उनका दर्शन और नमस्कार करे | मुनिवरों ! मैंने इसी मार्ग का अनुष्ठान किया है | उन सर्वदेवेश्वर भगवानका दर्शन कर लेनेपर सम्पूर्ण देवताओं का दर्शन हो जाता हैं | उन महावराहरूपधारी सर्वलोकपितामह जगत्पति भगवान विष्णु को मैं नित्यप्रति प्रणाम करता हूँ | उन्हीं श्रीकृष्ण के बड़े भाई हलधर बलरामजी होंगे, जिनका श्वेतगिरि के समान गौर वर्ण होगा | इस पृथ्वी को धारण करनेवाले शेषनाग ही उनके रूप में अवतीर्ण होंगे | वे भगवान शेष बड़ी प्रसन्नता के साथ सर्वत्र विचरण करते हैं | वे अपने फणसे पृथ्वी को लपेट करके स्थित हैं | ये जो भगवान विष्णु कहलाते हैं, वे ही इस पृथ्वीको धारण करनेवाले भगवान अनंत हैं | जो बलराम हैं, वही समस्त इन्द्रियों के स्वामी धरणीधर अच्युत हैं | वे दोनों पुरुषसिंह दिव्य रूप एवं दिव्य पराक्रमी हैं | उन दोनों का दर्शन और आदर करना चाहिये | वे क्रमश: चक्र और हल धारण करनेवाले हैं | तपोधनो ! मैंने तुमलोगों से भगवान के अनुग्रह का यह उपाय बताया है, अत: तुम सब लोग प्रयत्नपूर्वक यदुश्रेष्ठ भगवान वासुदेव का पूजन करो |

– नारायण नारायण –

ब्रह्मपुराण अध्याय – ६६

brmhapuran|| ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ||

ब्रह्मपुराण

अध्याय – ६६

धर्म की महिमा एवं अधर्म की गति का निरूपण तथा अन्नदान का माहात्म्य

मुनियों ने कहा – भगवन ! आप सम्पूर्ण धर्मों के ज्ञाता तथा सब शास्त्रों के ज्ञान में निपुण हैं | कृपया बताइये पिता, माता, गुरु, पुत्र, जातिवाले, सम्बन्धी और मित्रवर्ग – इनमें से कौन मरनेवाले प्राणी का विशेष सहायक होता है ? लोग तो मृतक के शरीर को काठ और मिटटी के ढेले की भांति छोडकर चल देते हैं, फिर परलोक में कौन उसके साथ जाता हैं ?

व्यासजी बोलेविप्रवरो ! प्राणी अकेल ही जन्म लेता, अकेला ही मरता, अकेला ही दुर्गम संकटों को पार करता और अकेला ही दुर्गति में पड़ता हैं | पिता, माता, भ्राता, पुत्र, गुरु, जातिवाले, सम्बन्धी तथा मित्रवर्ग – इनमे से कोई भी मरनेवाले का साथ नहीं देता | घर के लोग मृत व्यक्ति के शरीर को काठ और मिटटी के ढेले की भांति त्याग देते और दो घड़ी रोकर उससे मुँह मोडकर चले जाते हैं | वे सब लोग तो त्याग देते हैं, किन्तु धर्म उसका त्याग नही करता | वह अकेला ही जीव के साथ जाता हैं, अत: धर्म ही सच्चा सहायक है | इसलिये मनुष्यों को सदा धर्म का सेवन करना चाहिये | धर्मयुक्त प्राणी उत्तम स्वर्गगति को प्राप्त होता हैं, इसीप्रकार अधर्मयुक्त मानव नरक में पड़ता हैं; अत: विद्वान पुरुष पाप से प्राप्त होनेवाले धन में अनुराग न रखे | एकमात्र धर्म ही मनुष्यों का सहायक बताया गया हैं | बहुत-से शास्त्रों का ज्ञाता मनुष्य भी लोभ, मोह, घृणा अथवा भय से मोहित होकर दूसरे के लिये न करने योग्य कार्य भी कर डालता है | धर्म, अर्थ और काम – तीनों ही इस जीवन के फल है | अधर्म-त्यागपूर्वक इन तीनों की प्राप्ति करनी चाहिये |

मुनियों ने कहा – भगवन ! आपका यह धर्मयुक्त वचन, जो परम कल्याण का साधन हैं, हमने सुना | अब हम यह जानना चाहते हैं कि यह शरीर किन तत्त्वों का समूह हैं | मनुष्यों का मर हुआ शरीर तो स्थूल से सूक्ष्म – अव्यक्तभाव को प्राप्त हो जाता हैं, वह नेत्रों का विषय नही रह जाता, फिर धर्म कैसे उनके साथ जाता है ?

व्यासजी बोलेपृथ्वी, वायु, आकाश, जल, तेज, मन, बुद्धि और आत्मा – ये सदा साथ रहकर धर्मपर दृष्टी रखते हैं | ये समस्त प्राणियों के शुभाशुभ कर्मों के निरंतर साक्षी रहते हैं | इनके साथ धर्म जीव का अनुसरण करता हैं | जब शरीर से प्राण निकल जाता है, तब त्वचा, हड्डी, मांस, वीर्य और रक्त भी उस शरीर को छोड़ देते हैं | उससमय जीव धर्म से युक्त होनेपर ही इस लोक और परलोक में सुख एवं अभ्युदय को प्राप्त होता हैं |

मुनियों ने पूछा – भगवन ! आपने यह भलीभांति समझा दिया कि धर्म किस प्रकार जीवका अनुसरण करता हैं | अब हम यह जानना चाहते हैं कि (शरीर के कारणभूत) वीर्य की उत्पत्ति कैसे होती है |

व्यासजी ने कहा – द्विजवरो ! शरीर में स्थित जो पृथ्वी, वायु, आकाश, जल, तेज और मनके अधिष्ठाता देवता है, वे जब अन्न ग्रहण करते हैं और उससे मनसहित पृथ्वी आदि पाँचो भुत तृप्त होते है, तब उस अन्न से शुद्ध वीर्य बनता हैं | उस वीर्य में कर्मप्रेरित जीव आकर निवास करता हैं | फिर स्त्रियों के रज में मिलकर वह समयानुसार जन्म ग्रहण करता हैं | पुण्यात्मा प्राणी इस लोक में जन्म लेनेपर जन्मकाल से ही पुण्यकर्म का उपभोग करता हैं | वह धर्म के फल का आश्रय लेता हैं | मनुष्य यदि जन्म से ही धर्मका सेवन करता हैं तो सदा सुख का भागी होता है | यदि बीच-बीचमें कभी धर्म और कभी अधर्म का सेवन करता हैं तो वह सुख के बाद दुःख भी पाटा हैं | पापयुक्त मनुष्य यमलोग में जाकर महान कष्ट उठाने के बाद पुन: तिर्यग्योनि में जन्म लेता हैं |

मोहयुक्त जीव जिस-जिस कर्म से जिस-जिस योनि में जन्म लेता हैं, उसे बतलाता हूँ; सुनो !

#  परायी स्त्री के साथ सम्भोग करने से मनुष्य पहले तो भेड़िया होता है; फिर क्रमश: कुत्ता, सियार, गीध, साँप, कौआ और बगुला होता हैं |

# जो पापात्मा कामसे मोहित होकर अपनी भौजाई के साथ बलात्कार करता हैं, वह एक वर्षतक नर-कोकिल होता हैं |

# मित्र, गुरु तथा राजा की पत्नी के साथ समागम करने से कामात्मा पुरुष मरने के बाद सूअर होता हैं | पाँच वर्षोतक सूअर रहकर मरने के बाद दस वर्षोतक बगुला, तीन महीनोंतक चीटी और एक मासतक किट की योनि में पड़ा रहता हैं | इन सब योनियों में जन्म लेने के बाद वह पुन: कृमियोनि में उत्पन्न होता और चौदह महीनोंतक जीवित रहता हैं | इस प्रकार अपने पूर्वपापों का क्षय करने के बाद वह फिर मनुष्ययोनि जन्म लेता हैं |

# जो पहले एक को कन्या देने की प्रतिज्ञा करके फिर दूसरे को देना चाहता है, वह भी मरनेपर कीड़े की योनि में जन्म पाता है | उस योनि में वह तेरह वर्षोतक जीवित रहता हैं | फिर अधर्म का क्षय होनेपर वह मनुष्य होता है |

# जो देवकार्य अथवा पितृकाय न करके देवताओं और पितरों को संतुष्ट किये बिना ही मर जाता है, वह कौआ होता है | सौ वर्षोतक कौएकी योनि में रहने के बाद वह मुर्गा होता हैं | तत्पश्चात एक मासतक सर्प की योनि में निवास करता हैं | उसके बाद वह मनुष्य होता हैं |

# जो पिता के समान बड़े भाईका अपमान करता है, वह मृत्यु के बाद क्रौंच – योनि में जन्म लेता हैं और दस वर्षोतक जीवन धारण करता हैं | तत्पश्चात मरनेपर वह मनुष्य होता है | शूद्रजातीय पुरुष ब्राह्मणी के साथ समागम करनेपर कीड़े की योनि में जन्म लेता हैं | उससे मृत्यु होनेपर वह सूअर होता हैं | सूअर की योनि में जन्म लेते ही रोग से उनकी मृत्यु हो जाती है | तदनंतर वह मुर्ख पूर्वोक्त पाप के ही फलस्वरूप कुत्ते की योनि में उत्पन्न होता है | उसके बाद उसे मानव-शरीर की प्राप्ति होती है | मानवयोनि में सन्तान उत्पन्न करके वह मर जाता हैं और चूहे का जन्म पाता है |

# कृतघ्न मनुष्य मृत्यु के बाद जब यमराज के लोक में जाता है, उससमय क्रूर यमदूत उसे बाँधकर भयंकर दंड देते है | उस दंड से उसको बड़ी वेदना होती है | दंड, मुद्रर, शूल. भयंकर अग्निदंड, असिपत्रवन, तप्तवालुका तथा कूटशाल्मलि आदि अन्य बहुत-सी घोर यातनाओं का अनुभव करके वह संसारचक्र में आता और कीड़े की योनि में जन्म लेता है; पन्द्रह वर्षोतक कीड़ा रहने के बाद मानव-गर्भ में आकार वहाँ जन्म लेने के पहले ही मर जाता हैं |

# इसप्रकार सैकड़ो बार गर्भ में मृत्युका कष्ट भोगकर अनेक बार संसार-बंधन में पड़ता हैं | तत्पश्चात वह पशु-पक्षियों की योनि में जन्म लेता हैं | उसमें बहुत वर्षोतक कष्ट उठाकर अंत में वह कछुआ होता है |

# दही की चोरी करने से मनुष्य बगुला और मेढक होता हैं |

# फल, मूल अथवा पुआ चुराने से वह चीटी होता हैं | जल की चोरी करने से कौआ और काँसा चुराने से हारित (हरियल) पक्षी होता है |

# चांदी का वर्तन चुरानेवाला कबूतर और सुवर्णमय पात्र का अपहरण करने से कृमियोंनि में जन्म लेता पड़ता हैं |

# रेशम का कीड़ा चुराने से मनुष्य वानर होता है | वस्त्र की चोरी करने से तोते की योनि में जन्म होता है | साडी चुरानेवाला मनुष्य मरने के बाद हंस होता हैं | रुई का वस्त्र हडप लेनेवाला मानव मृत्यु के पश्चात क्रौंच होता हैं | सनका वस्त्र, ऊनी वस्त्र तथा रेशमी वस्त्र चुरानेवाला मनुष्य खरगोश होता हैं |

# चूर्ण की चोरी करने से मनुष्य दूसरे जन्म में मोर होता हैं | अंगराग और सुगंध की चोरी करनेवाला लोभी मनुष्य छछूंदर होता है | उस योनि में पन्द्रह वर्षोतक जीवित रहने के बाद जब पापका क्षय हो जाता हैं, तब वह मनुष्य-योनि में जन्म ग्रहण करता हैं |

# जो स्त्री दूध की चोरी करती है, वह बगुली होती है |

# जो नीच पुरुष स्वयं सशस्त्र होकर वैर से अथवा धन के लिये किसी शस्त्रहीन पुरुष की हत्या करता हैं, वह मरनेपर गदहा होता है | गदहे की योनि में दो वर्षोतक जीवित रहने के बाद वह शस्त्रद्वारा मारा जाता है, फिर मृग की योनि में जन्म लेकर सदा उद्गिग्न बना रहता हैं | मृगयोनि में एक वर्ष बीतनेपर वह बाण का निशाना बन जाता हैं, फिर मछली की योनि में जन्म ले वह जाल में फँसा लिया जाता हैं | चार महीने बीतनेपर वह शिकारी कुत्ते के रूप में जन्म लेता हैं | दस वर्षोतक कुत्ता रहकर पाँच वर्षोतक व्याघ्र की योनि में रहता हैं | फिर कालक्रम से पापों का क्षय होनेपर मनुष्य-योनि में जन्म ग्रहण करता हैं |

# जो मनुष्य खलीमिश्रित अन्न का अपहरण करता है, वह भयंकर चूहा होता है | उसका रंग नेवले- जैसा भूरा होता हैं | वह पापात्मा प्रतिदिन मनुष्यों को डंसता रहता हैं |

# घी की चोरी करनेवाला दुर्बुद्धि मानव कौआ और बगुला होता है | नमक चुराने से चिरिकाक नामक पक्षी होना पड़ता हैं |

# जो मनुष्य विश्वासपूर्वक रखी हुई धरोहर को हडप लेता हैं, वह मृत्यु के बाद मछली की योनि में जन्म लेता हैं | उसके पश्चात मृत्यु होनेपर फिर मनुष्य होता हैं | मानव-योनि में भी उसकी आयु बहुत ही थोड़ी होती है |

ब्राह्मणों ! मनुष्य पाप करके तिर्यग्योनिमें जाता हैं, जहाँ उसे धर्म का कुछ भी ज्ञान नही रहता | जो मनुष्य पाप करके व्रतोंद्वारा उसका प्रायश्चित करते है, वे सुख और दुःख दोनों से युक्त होते हैं | लोभ-मोह से युक्त पापाचारी मनुष्य निश्चय ही म्लेच्छयोनि में जन्म लेते थाई | जो लोग जन्म से ही पापका परित्याग करते हैं, वे नीरोग रूपवान और धनी होते हैं | स्त्रियाँ भी ऊपर बताये अनुसार कर्म करने से पाप की भागिनी होती हैं और पापयोनि में पड़े हुए पूर्वोक्त पापियों की ही पत्नी बनती हैं | द्विजवरो ! चोरी के प्राय: सभी दोष बता दिये गये | यहाँ जो कुछ कहा गया हैं, वह बहुत संक्षिप्त हैं; फिर कभी कथा-वार्ता का अवसर आनेपर तुमलोग इस विषय को विस्तारपूर्वक सुन सकते हो | पूर्वकाल में देवर्षियों की सभा में उनके प्रश्नानुसार ब्रह्माजी ने जो कुछ कहा था, वह सब मैंने तुमलोगों को बतलाया हैं | ये सब बाते सुनकर तुम धर्म के अनुष्ठान में मन लगाओ |

मुनि बोले – ब्रह्मन ! आपने अधर्म की गतिका निरूपण किया, अब हम धर्म की गति सुनना चाहते हैं | किस कर्म के अनुष्ठान से मनुष्य की सदगति होती है ?

व्यासजी ने कहाब्राह्मणों ! जो मोहवश अधर्म का अनुष्ठान कर लेनेपर उसके लिये पुन: सच्चे ह्रदय से पश्चाताप करता और मन को एकाग्र रखता हैं, वह पापका सेवन नहीं करता | ज्यों-ज्यों मनुष्य का मन पाप-कर्म की निंदा करता हैं, त्यों-त्यों उसका शरीर उस अधर्म से दूर होता जाता हैं | यदि धर्मवादी ब्राह्मणों के सामने अपना पाप कह दिया जाय तो वह उस पापजनित अपराध से शीघ्र मुक्त हो जाता हैं | मनुष्य जैसे-जैसे अपने अधर्म की बात बारंबार प्रकट करता हैं, वैसे-ही-वैसे वह एकाग्रचित्त होकर अधर्म को छोड़ता जाता है | जैसे साँप केचुल छोड़ता है, उसी प्रकार वह पहले के अनुभव किये हुए पापों का त्याग करता हैं | एकाग्रचित्त होकर ब्राह्मण को नाना प्रकार के दान दें | जो मन को ध्यान में लगाता हैं, वह उत्तम गति को प्राप्त करता हैं |

बाह्मणों को सरलतापूर्वक सब प्रकार के अन्नों का दान करे | अन्न ही मनुष्यों का जीवन है | उसीसे जीव-जन्तुओं की उत्पत्ति होती हैं | अन्न में ही सम्पूर्ण लोक प्रतिष्ठित हैं, अत: अन्न को श्रेष्ठ बताया जाता है न| देवता, ऋषि, पितर और मनुष्य अन्न की ही प्रशंसा करते हैं, क्योंकि अन्नदान से मनुष्य स्वर्गलोक को प्राप्त होता है | स्वाध्यायशील ब्राह्मणों को प्रसन्नचित्त से अन्नदान को दस ब्राह्मण भोजन कर लेते हैं, वह कभी पशु-पक्षी आदि की योनि में नहीं पड़ता | सदा पापों में संलग्न रहनेवाला मनुष्य भी यदि दस हाज ब्राह्मणों को भोजन करा दे तो वह अधर्म से मुक्त हो जाता हैं | वेदों का अध्ययन करनेवाला ब्राह्मण भिक्षा से अन्न ले आकर यदि किसी स्वाध्यायशील ब्राह्मण को दान कर दे तो वह संसार में सुख और समृद्धि का भागी होता हैं | जो क्षत्रिय ब्राह्मण के धन को हानि न पहुँचाकर न्यायत: प्रजा का पालन करते हुए अन्न का उपार्जन करता हैं और उसे एकाग्रचित्त होकर श्रोत्रिय ब्राह्मणों को दान देता है, वह धर्मात्मा हैं और उस पुण्य के जल से अपने पापपंख को धो डालता हैं | अपने द्वारा उपार्जित खेती के अन्न में से छठा भाग राजा को देने के बाद जो शेष शुद्ध भाग बच जाता है, वह अन्न यदि वैश्य ब्राह्मण को दान करे तो वह सब पापों से मुक्त हो जाता हैं | जो शुद्र प्राणों को संशय में डालकर और नाना प्रकारकी कठिनाइयों को सहकर भी अपने द्वारा उपार्जित शुद्ध अन्न को ब्राह्मणों के निमित्त दान करता हैं, वह भी पापों से छुटकारा पा जाता है |जो मनुष्य वेदवेत्ता ब्राह्मण को हर्षपूर्वक अन्नका दान करता हैं उसका पाप छुट जाता है | सत्पुरुषों के मार्गपर चलने से सब पाप दूर हो जाते हैं | दानवेत्ता पुरुषों ने जो मार्ग बताया है और जिसपर मनीषी पुरुष चलते हैं, वही अन्नदाताओं का भी मार्ग हैं | उन्हीं से सनातन धर्म है | अन्नदान से मनुष्य गति और परमगति को प्राप्त होता हैं | इस लोक में उसकी समस्त कामनाएँ पूर्ण होती है और मृत्यु के बाद भी वह सुख का भागी होता है |

इसप्रकार पुण्यवान मनुष्य पापों से मुक्त होता हैं | अत: अन्यायरहित अन्न का दान करना चाहिये | जो ग्रहस्थ सदा प्राणाग्निहोत्रपूर्वक अन्न-भोजन करता हैं, वह अन्नदान से प्रत्येक दिन को सफल बनाता हैं | जो मनुष्य वेद, न्याय, धर्म और इतिहास के ज्ञाता सौ विद्वानों को प्रतिदिन भोजन कराता हैं, वह घोर नरक में नही पड़ता और संसार बंधन में भी नहीं बँधता, अपितु सम्पूर्ण कामनाओं से तृप्त हो मृत्यु के बाद सुख का भागी होता है | इसप्रकार पुण्यकर्म से युक्त मनुष्य निश्चित होकर आनंद का भागी होता है | उसे रूप, कीर्ति और धन की प्राप्ति होती है | ब्राह्मणों ! इसप्रकार मैंने तुम्हें अन्नदान का महान फल बतलाया | यह सभी धर्मों और दानों का मूल है |

– नारायण नारायण –

ब्रह्मपुराण अध्याय – ६५

brmhapuran|| ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ||

ब्रह्मपुराण

अध्याय – ६५

धर्म से यमलोक में सुखपूर्वक गति तथा भगवदभक्ति के प्रभाव का वर्णन

मुनियों ने कहा – अहो ! यमलोक के मार्ग में तो बड़ा भयंकर दुःख होता है | सधुश्रेष्ठ ! आपने उन दु:खों के साथ ही घोर नरकों तथा दक्षिणद्वार का भी वर्णन किया | ब्रह्मन ! उस भयानक मार्ग में कष्टों से बचने का कोई उपाय हैं या नही ? यदि है तो बताइये, किस उपाय से मनुष्य यमलोक में सुखपूर्वक जा सकते हैं ?

व्यासजी ने कहामुनिवरो ! जो लोग इस लोकमें धर्मपरायण हो अहिंसा का पालन करते, गुरुजनों की सेवा में संलग्न रहते और देवता तथा ब्राह्मणों की पूजा करते हैं, वे स्त्री और पुत्रोंसहित जिस प्रकार उस मार्ग से यात्रा करते हैं, वह बतलाता हूँ | उपर्युक्त पुण्यात्मा पुरुष सुवर्णमय ध्वजाओं से सुशोभित भांति-भांति के दिव्य विमानोंपर आरूढ़ हो धर्मराज के नगर में जाते हैं | जो ब्राह्मणों को भक्तिपूर्वक नाना पराक्र की वस्तुएँ दान में देते हैं, वे उस महान पथपर सुख से यात्रा करते हैं | जो ब्राह्मणों को, बाह्मणों में भी विशेषत: श्रीत्रियों को अत्यंत भक्तिपूर्वक उत्तम रीति से तैयार किया हुआ अन्न देते हैं , वे सुसज्जित विमानोंद्वारा धर्मराज के नगर में जाते हैं | जो सदा सत्य बोलते और बाहर-भीतर से शुद्ध रहते हैं, वे भी देवताओं के समान कान्तिमान शरीर धारणकर विमानोंद्वारा यमराज के भवन में जाते हैं | जो धर्मज्ञ पुरुष जीविकारहित दिन-दुर्बल साधुओं को भगवान विष्णु के उद्देश्य से पवित्र गोदान करते हैं, वे मणिजटित दिव्य विमानोंद्वारा धर्मराज के लोक में जाते हैं | जो जूता, छाता, शय्या, आसन, वस्त्र और आभूषण दान करते हैं, वे दिव्य आभूषणों स अलंकृत हो हाथी, रथ और घोड़ों की सवारी से वहाँ की यात्रा करते हैं | उनके ऊपर सोने-चांदी का छत्र लगा रहता हैं | जो श्रेष्ठ ब्राह्मणों को विशुद्ध ह्रदय से भक्तिपूर्वक गुड़का रस और भात देते हैं, वे सुवर्णमय वाहनोंद्वारा यमलोक में जाते हैं | जो ब्राह्मणों को यत्नपूर्वक शुद्ध एवं सुसंस्कृत दूध, दही, घी और गुड दान करते हैं, वे चक्रवाक पक्षियों से जुड़े हुए सुवर्णमय विमानोंद्वारा यात्रा करते हैं | उससमय गन्धर्वगण वाद्योंद्वारा उनकी सेवा करते हिन् | जो सुगन्धित पुष्प दान करते हैं, वे हंसयुक्त विमानों से धर्मराज के नगर को जाते हैं | जो क्षोत्रिय ब्राह्मणों को श्रद्धापूर्वक तिल, तिलमयी धेनु अथवा घृतमयी धेनु दान करते हैं, वे चंद मंडल के समान उज्ज्वल विमानोंद्वारा यमराज के भवन में प्रवेश करते हैं | उससमय गंधर्वगण उनका सुयश गाते रहते हैं | इस लोक में जिनके बनवाये हुए कुएँ, बावडी, तालाब, सरोवर, दीर्घिका, पुष्करिणी तथा शीतल जलाशय शोभा पाते हैं, वे दिव्य घंटानाद से मुखरित, सुवर्ण और चन्द्रमा के समान कान्तिमान विमानोद्वारा यात्रा करते हैं | मार्ग में उन्हें सुख देने के लिये दिव्य पंखे डुलाये जाते हैं | जो लोग समस्त प्राणियों के जीवनभुत जलका दान करते हैं, वे पिपासा से रहित हो दिव्य विमानोंपर बैठकर सुखपूर्वक उस महान पथ की यात्रा करते हैं | जिन्होंने ब्राह्मणों को लकड़ी की बनी खडाऊं, सवारी, पीढ़ा और आसन दान किये हैं, वे उस मार्ग में सुख से जाते हैं | वे विमानोंपर बैठकर सोने और मणियों के बने हुए उत्तम पिढोपर पैर रखकर यात्रा करते हैं |

जो मनुष्य दूसरों के उपकार के लिये फल और पुष्पों से सुशोभित विचित्र उद्यान लगाते हैं, वे वृक्षोंकी रमणीय एवं शीतल छाया में सुखपूर्वक यात्रा करते हैं | जो लोग सोना, चाँदी, मूँगा तथा मोती दान करते हैं, वे सुवर्णनिर्मित उज्ज्वल विमानोंपर बैठकर यमलोक में जाते हैं | भूमिदान करनेवाले पुरुष सम्पूर्ण मनोवांछित वस्तुओं से तृप्त हो उदयकालीन सूर्य के समान तेजस्वी विमानोंपर बैठकर देदीप्यमान शरीर से धर्मराज के नगर को जाते हैं | जो बाह्मणों के लिये भक्तिपूर्वक उत्तम गंध, अगर, कपूर, पुष्प और धूप का दान करते हैं, वे मनोहर गंध, सुंदर वेष, उत्तम कान्ति और श्रेष्ठ आभूषणों से विभूषित हो विचित्र विमानोंद्वारा धर्मनगर की यात्रा करते हैं | दीप-दान करनेवाले मनुष्य अग्नि के तुल्य प्रकाशमान होकर सूर्य के समान तेजस्वी विमानोंद्वारा दसों दिशाओं को प्रकाशित करते हुए चलते हैं | जो गृह अथवा रहने के लिये स्थान देते हैं, वे अरुणोदयकी-सी कान्तिवाले सुवर्णमंडित गुर्हों के साथ धर्मराज के नगर में जाते हैं |

जो ‘पापहरे !’ इत्यादि का उच्चारण करके गौ को मस्तक झुकाते हैं, वह सुख से यमलोक के मार्गपर आगे बढ़ता हैं | जो शठता और दम्भ का परित्याग करके एक समय भोजन करते हैं, वे हंसयुक्त विमानोंद्वारा सुखपूर्वक यमलोक की यात्रा करते हैं | जो जितेन्द्रिय पुरुष एक दिन उपवास करके दूसरे दिन एक समय भोजन करते हैं, वे मोरों से जुड़े हुए विमानोंद्वारा धर्मराज के नगर में जाते हैं | जो नियमपूर्वक व्रत का पालन करते हुए तीसरे दिन एक समय भोजन करते हैं, वे हाथियों से जुड़े हुए दिव्य रथोंपर आसीन हो यमराज के लोक में जाते अं | जो नित्य पवित्र रहकर इन्द्रियों को वश में रखते हुए छठे दिन आहार ग्रहण करते हैं, वे साक्षात शचीपति इंद्र के समान ऐरावत की पीठपर बैठकर यात्रा करते हैं | जो एक पक्षतक उपवास करके अन्न ग्रहण करते हैं, वे बाघों से जुड़े हुए विमानोंद्वारा धर्मराज के नगर में जाते हैं | उससमय देवता और असुर उनकी सेवा में उपस्थित रहते हैं | जो जितेन्द्रिय रहकर एक मासतक उपवास करते हैं, वे सूर्य के समान देदीप्यमान रथोपर बैठकर यमलोक की यात्रा करते हैं | जो स्त्री अथवा गौ की रक्षा के लिये युद्ध प्राणत्याग करता हैं, वह सूर्य के समान कान्तिमान शरीर धारण करके देवकन्याओंद्वारा सेवित हो धर्मनगर की यात्रा करता है |

जो भगवान विष्णु में भक्ति रखते हुए जितेन्द्रियभाव से तीर्थों की यात्रा करते हैं, वे सुखदायक विमानों से सुशोभित हो उस भयंकर पथ की यात्रा करते हैं | जो श्रेष्ठ द्विज प्रचुर दक्षिणावाले यज्ञोंद्वारा भगवान का यजन करते हैं, वे तपाये हुए सुवर्णसदृश विमानोंद्वारा सुखपूर्वक यमलोक में जाते हैं | जो दूसरों को पीड़ा नहीं देते और भृत्यों का भरण-पोषण करते हैं, वे सुवर्णनिर्मित उज्ज्वल विमानोंपर बैठकर सुखसे यात्रा करते है | जो समस्त प्राणियों के प्रति क्षमाभाव रखते, सबको अभय देते, क्रोध, मोह और मद से मुक्त रहते तथा इन्द्रियों को वश में रखते हैं, वे महान तेजसे सम्पन्न हो पूर्ण चन्द्रमा के समान प्रकाशमान विमानपर बैठकर यमराज की पूरी में जाते हैं | उससमय देवता और गन्धर्व उनकी सेवामे खड़े रहते हैं | जो सत्य और पवित्रता से युक्त रहकर कभी भी मांसाहार नही करते, वे बी धर्मराज के नगर में सुखसे ही यात्रा करते हैं | जो एक हजार गौओं का दान करता है और जो कभी मांस भक्षण नही करता, वे दोंनो समान हैं – यह बात पूर्वकाल में वेदवेत्ताओं में श्रेष्ठ साक्षात ब्रह्माजी ने कही थी | ब्राह्मणों ! सम्पूर्ण तीर्थों में स्नान करने से जो पुण्य होता हैं और समस्त यज्ञों के अनुष्ठान से जिस फल की प्राप्ति होती हैं, वही या उसके समान फल मांस न खाने से भी प्राप्त होता हैं | इसप्रकार दान और व्रत में तत्पर रहनेवाले धर्मात्मा पुरुष विमानोंद्वारा सुखपूर्वक यमलोक में जाते हैं, जहाँ सूर्यनंदन यम विराजमान रहते हैं | धार्मिक पुरुषों को देखकर यमराज स्वयं ही स्वागतपूर्वक उन्हें आसन देते और पाद्य, अर्घ्य तथा प्रिय वचनोंद्वारा उनका सम्मान करते हैं | वे कहते हैं – पुण्यात्मा पुरुषो ! आपलोग धन्य हैं | आप अपने आत्माका कल्याण करनेवाले महात्मा हैं, क्योंकि आपने दिव्य सुख के लिये शुभकर्मों का अनुष्ठान किया है | अब इस विमानपर बैठकर उस अनुपम स्वर्गलोक को जाइये, जहाँ समस्त कामनाएँ पूर्ण होती हैं | वहाँ महान भोगो माँ उपभोग करके अंत में पुण्य क्षीण होनेपर जो थोडा अशुभ कर्म शेष रहेगा, उसका फल यहाँ आकर भोगियेगा |

धर्मात्मा पुरुष अपने पुण्यों के प्रभाव से धर्मराज को कोमल ह्रदयवाले अपने पिता के तुल्य देखते हैं, इसलिये धर्म का सदा सेवन करना चाहिये | धर्म मोक्षरूप फल को देनेवाला हैं | धर्म से ही अर्थ, काम और मोक्ष की सिद्धि बतायी गयी हैं | धर्म ही माता-पिता और भ्राता हैं, धर्म ही अपना रक्षक और सुह्रद हैं | स्वामी, सखा, पालक तथा धारण-पोषण करनेवाला धर्म ही हैं | धर्मसे अर्थ, अर्थ से काम और कामसे भोग एवं सुख उपलब्ध होते है | धर्म से ही ऐश्वर्य, एकाग्रता और उत्तम स्वर्गीय गति प्राप्त होती हैं | विप्रवरो ! धर्म का यदि सेवन किया जाय तो वह मनुष्य की महान भय से रक्षा करता हैं | इसमें तनिक भी संदेह नहीं कि धर्म से देवत्त्व और ब्राह्मणत्त्व भी प्राप्त हो सकते हैं | जब मनुष्यों के पूर्वसंचित पाप नष्ट हो जाते हैं, तब उनकी बुद्धि इस लोक में धर्म की ओर लगती है |हजारों जन्मों के पश्चात दुर्लभ मनुष्य जीवन को पाकर जो धर्म का आचरण नहीं करता, वह निश्चय ही सौभाग्य से वंचित है | जो लोग कुत्सित, दरिद्र, कुरूप, रोगी, दूसरों के सेवक और मुर्ख है, उन्होंने पूर्वजन्म में धर्म नहीं किया हैं – ऐसा जानना चाहिये | जो दीर्घायु, शूरवीर, पंडित, भोगसाधन से सम्पन्न, धनवान, नीरोग तथा रूपवान हैं, उन्होंने पूर्वजन्म में अवश्य ही धर्म का अनुष्ठान किया है | ब्राह्मणों ! इसप्रकार धर्मपरायण मनुष्य उत्तम गति को प्राप्त होते हैं और अधर्म का सेवन करनेवाले लोग पशु-पक्षियों की योनि में जाते हैं |

जो मनुष्य नरकासुर का विनाश करनेवाले भगवान वासुदेव के भक्त है, वे स्वप्न में भी यमराज अथवा नरकों को नहीं देखते | जो दैत्यों और दानवों का संहार करनेवाले आदि-अंतरहित भगवान नारायण को प्रतिदिन नमस्कार करते हैं, वे भी यमराज को नहीं देखते | जो मन, वाणी और क्रिया के द्वारा भगवान अच्युत की शरण में चले गये हैं, उनपर यमराज का वश नही चलता | वे मोक्षरूप फल के भागी होते हैं | ब्राह्मणों ! जो मनुष्य प्रतिदिन जगन्नाथ श्रीनारायण को नमस्कार करते है, वे वैकुण्ठधाम के सिवा अन्यत्र नही जाते | श्रीविष्णु को नमस्कार करके मनुष्य यमदूतों को, यमलोक के मार्ग को, यमपुरी को तथा वहाँ के नरकों को किसीप्रकार नहीं देख पाते | मोह में पडकर अनेकों बार पाप कर लेनेपर भी यदि मानव सर्वपापहारी श्रीहरि को नमस्कार करते हैं तो वे नरक में नही पड़ते | जो लोग शठतासे भी सदा भगवान जनार्दन का स्मरण करते हैं, वे भी देहत्याग के पश्चात रोग-शोक से रहित श्रीविष्णुधाम को प्राप्त होते हैं | अत्यंत क्रोध में आसक्त होकर भी जो कभी श्रीहरि के नामों का कीर्तन करता हैं, वह भी चेदिराज शिशुपाल की भांति सम्पूर्ण दोषों का क्षय हो जानेसे मोक्ष को प्राप्त करता हैं |

– नारायण नारायण –