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गरुड़पुराण -धर्मकाण्ड – प्रेतकल्प -अध्याय- ७

garoodh puran

|| ॐ श्रीपरमात्मने नम: ||

गरुडपुराण

धर्मकाण्ड – प्रेतकल्प

अध्याय – ७

संतप्तक ब्राह्मण तथा पाँच प्रेतोंकी कथा, सत्संगति तथा भगवत्कृपासे पाँच प्रेतों तथा ब्राह्मणका उद्धार

गरुड़ने कहा – हे प्रभो ! आपने वृषोत्सर्ग नामक यज्ञसे प्राप्त होनेवाले फलसे सम्बन्धित जो आख्यान कहा, उसको मैंने सुन लिया है | अब आप पुन: किसी अन्य कथाका वर्णन करें, जिसमें आपकी अद्भुत महिमा निहित हो |

श्रीकृष्णने कहा – हे गरुड ! अब मैं संतप्तक नामक ब्राह्मण तथा पाँच प्रेतोंकी कथाको बताता हूँ |

हे पक्षिन ! पूर्वकालमें संतप्तक नामक एक ब्राह्मण था | जिसने तपस्याके बलपर अपनेको पापरहित कर लिया था | यह संसार असार है, ऐसा जानकर वह वनोंमें वैखानस मुनियोंके द्वारा आचरित वृत्तिका पालन करते हुए अरण्यमें ही विचरण करता था | किसी समय उस ब्राह्मणने तीर्थ-यात्राको लक्ष्य बनाकर अपनी यात्रा प्रारम्भ की | संसारके प्रति इन्द्रियाँ स्वत: आकृष्ट हो जाती हैं, इस कारणसे उसने अपनी बाह्य चित्तवृत्तियोंको भी रोक लिया था, किन्तु पूर्व संस्कारोंके प्रभावसे वह मार्ग भूल गया और चलते-चलते मध्यान्हकाल हो गया, स्नानके लिये जलकी अभिलाषासे वह चारों ओर देखने लगा | उसे उस समय सैकड़ों गुल्म-लता और बाँसके वृक्षोंसे घिरा हुआ, वृक्षोंकी शाखाओंसे व्याप्त, घनघोर एक वन दिखायी पड़ा | वहाँ ताल, तमाल, प्रियाल, कटहल, श्रीपर्णी, शाल, शाखोट ( सिहोरका वृक्ष), चन्दन, तिन्दुक, राल, अर्जुन, आमड़ा, लसोड़ा, बहेड़ा, नीम, इमली, बैर और कनैल तथा अन्य बहुत-से वृक्षोंकी सघनताके कारण पक्षियोंके लिये भी मार्ग नहीं देखता था | फिर मनुष्यके लिये उस वनमें कहाँ मार्ग मिल सकता था ? वह वन तो सिंह, व्याघ्र, तरक्षु (एक छोटी जातिका बाघ), नीलगाय, रीछ, महिष, हाथी, कृष्णमृग, नाग और बन्दर तथा अन्यान्य प्रकारके हिंसक जीव-जन्तु, राक्षस एवं पिशाचोंसे परिव्याप्त था |

संतप्तक उस प्रकारके घनघोर भयावह वनको देखकर भयाक्रांत हो उठा | भयभीत वह अब किस दिशामें जाय, इसका निर्णय नहीं कर सका | फिर जो होगा, देखा जायगा – यह सोचकर वह वहाँसे पुन: चल पड़ा | झींगरों की झंकार तथा उल्लुओंकी धूतकर ध्वनियोंपर कान लगाये वह पाँच ही डग चला था कि सामने बरगदके वृक्षमें बँधा एक शव लटका हुआ उसे दिखायी दिया, जिसे पाँच महाभयंकर प्रेत खा रहे थे | हे खगेश ! उन प्रेतोंके शरीरमें मात्र शिराओंसे युक्त हड्डी और चमड़ा ही शेष था | उनका पेट पीठमें धँसा हुआ था | नेत्ररूपी कुओंमें गिरनेके भयसे नासिकाने उनका साथ छोड़ दिया था | वसासे भरे हुए ताजे शवके मस्तिष्क-भागका स्वाद लेकर जो नित्य अपना महोत्सव मनाते थे और हड्डीकी गाँठोंको तोड़नेमें लगे हुए जिनके बड़े-बड़े दाँत किटकिटाते थे, ऐसी प्रेतोंको देखकर घबड़ाये हुए ह्रदयवाला वह ब्राह्मण वहीँ ठिठक गया | उस निर्जन वनमें आ रहे ब्राह्मणको उन प्रेतोंने देख लिया था | अत: ‘मैं उसके पास पहले जाऊँगा, मैं उसके पास पहले जाऊँगा’ – इस प्रकारकी प्रतिस्पर्धामें वे सभी प्रेत दौड़ पड़े | उनमेंसे दो प्रेतोंने इस ब्राह्मणके दोनों हाथ पकड़ लिये, दो प्रेतोंने दोनों पैर पकड़ लिये | एक प्रेत शेष बचा था, उसने इसका सिर पकड़ लिया | तदनन्तर वे सभी कहने लगे कि ‘मैं इसे डकारूँगा, मैं इसे खाऊँगा |’ ऐसा कहते हुए वे पाँचों प्रेत ब्राह्मणको खींचने लगे | फिर उसे साथ लेकर वे सहसा आकाशमें चले गये | किन्तु उस बरगदपर शवका अभी कितना मांस शेष हैं और कितना नहीं, इस बातको भी वे सोच रहे थे | उसी समय उन लोगोंने देखा कि दाँतोंके द्वारा नीचे जानेके कारण वह शव तो अभी फटी हुई आँतसे युक्त है | इसलिये वे आकाशसे नीचे उतर आये और शवको अपने पैरोंसे बाँधकर पुन: आकाशमें ही उड़ गये |

आकाशमें ले जाये जा रहे उस प्रेतरूपमें स्वयंको ही समझकर वह भयार्त ब्राह्मण पूर्ण मनसे मेरी शरणमें आ गया | देवाधिदेव, चिन्मय, सुदर्शनचक्रधारी मुझ हरिको प्रणाम कर वह इसप्रकार स्तुति करने लगा –

जिन भगवानने अपने चक्रके प्रहारसे ग्राहके मुखको विदीर्णकर उसके दुःखको नष्ट किया था, जो ग्राहके मुखमें फँसे हुए गजराजको मुक्त करानेवाले हैं, वे श्रीहरि मेरे कर्मपाशको काटकर मुझे मुक्त करें | मगधनरेश जरासंधने निर्दोष राजाओंको बंदी बनाकर कारागारमें डाल दिया था, जिन मुरारि श्रीकृष्णने राजसूययज्ञके लिये पांडूपुत्र भीमसेनके द्वारा उस दुष्टको मल्लयुद्धमें मरवाकर राजाओंको मुक्त किया था | वे इस समय मेरे कर्मपाशको काटकर मेरा दुःख दूर करें |

हे गरुड ! उस समय दत्तचित्त होकर जब वह मेरी स्तुतिमें लग गया तो उसे सुनते ही मैं भी उठ खड़ा हुआ और सहसा वहाँ जा पहुँचा, जहाँ प्रेत उसको लेकर जा रहे थे | उन लोगोंके द्वारा ले जाते हुए उस ब्राह्मणको देखकर मुझे आश्चर्य हुआ | कुछ कालतक बिना पूछे मैं भी उनके पीछे-पीछे चलने लगा | मेरी संनिधिमात्रसे उस ब्राह्मणको पालकीमें सोये हुए राजाके समान सुख प्राप्त हुआ | इसके बाद मैंने मार्गमें सुमेरु पर्वतपर जा रहे मणिभद्र नामक यक्षराजको देखा | मैंने नेत्रोंके संकेतसे उन्हें अपने पास बुलाया और कहा – हे यक्षराज ! तुम इस समय इन प्रेतोंको विनष्ट करनेके लिये प्रतिद्वन्दी योद्धा बन जाओ | युद्धमें इन्हें मारकर इस शवको अपने अधिकारमें करो |

ऐसा सुनते ही उस मणिभद्रने प्रेतोंको दुःख पहुँचनेवाले प्रेतरूपको धारण कर लिया | दोनों भुजाओंको फैलाकर ओठोंको जीभसे चाटते हुए और अपनी लम्बी-लम्बी नि:श्वासोंसे उन प्रेतोंको दहलाते हुए वह मणिभद्र उनके सम्मुख जाकर डट गया | उसने दोको अपनी दोनों भुजाओंसे, दोको दोनों पैरोंसे और एकको सिरसे पकड़ लिया | उसके बाद अपने शक्तिशाली मुक्केसे उन प्रेतोंपर ऐसा प्रहर किया कि वे सभी विवर्णमुख हो गये | वे उस ब्राह्मण तथा शवको एक हाथ और एक पैरसे पकड़कर युद्ध करने लगे | उन लोगोंने अपने नख-थप्पड़, लात एवं दाँतोंसे उसपर प्रहार किये, पर मणिभद्रने उनके प्रहारको विफल कर उनसे शवको ले लिया | उस यक्षके द्वारा शवकी छीन लिये जानेपर पारियात्र पर्वतपर उस ब्राह्मणको छोडकर वे सभी प्रेत अत्यंत उत्साहसे भरे हुए पुन: प्रेतरूप मणिभद्रकी ओर दौड़ पड़े | क्षणमात्रमें ही उन लोगोंने वायुके समान द्रुतगामी मणिभद्रको घेर लिया, किन्तु वह अदृश्य हो गया | ऐसी स्थिति देखकर हताश होकर वे प्रेत उस ब्राह्मणके पास जा पहुँचे | उस पर्वतपर पहुँचकर उन लोगोंने ब्राह्मणको ज्यों-ही मारना प्रारम्भ किया, त्यों- ही मेरी उपस्थिति और ब्राह्मणके प्रभावसे तत्काल उनमें पूर्वजन्मकी स्मृति जाग्रत हो उठी | इसके बाद ब्राह्मणकी प्रदक्षिणा करके उन प्रेतोंने ब्राह्मणश्रेष्ठसे कहा – हे विप्रदेव ! आप हमें क्षमा करें | उनके दीन वचनोंको सुनकर ब्राह्मणने पूछा – आप लोग कौन हैं ? यह क्या कोई माना है ? अथवा यह मैं स्वप्न देख रहा हूँ या यह मेरे चित्तका विभ्रम है |

प्रेतोंने कहा – हम सब प्रेत हैं और पूर्वजन्मके दुष्कर्मोंके प्रभावसे इस योनिको प्राप्त हुए हैं |

ब्राह्मणने कहा – हे प्रेतों ! तुम्हारे क्या नाम हैं ? तुम सब क्या करते हो ? तुम्हें कैसे इस द्शाकी प्राप्ति हुई ? पहले मेरे प्रति तुम लोगोंका व्यवहार कैसे अविनयी था और इस समय कैसे विनयी हो गया है |

प्रेतोंने कहा – हे द्विजराज ! आप यथाक्रम अपने प्रश्नोंका उत्तर सुनें | हे योगिराज ! हम आपके दर्शनसे निष्पाप हो गये हैं | हमारे नाम क्रमश: पर्युषित, सूचीमुख, शीघ्रग, रोधक और लेखक हैं |

ब्राह्मणने कहा – हे प्रेतों ! पूर्वकर्मसे उत्पन्न प्रेतोंका नाम कैसे निरर्थक हो सकता हैं ? तुम सब अपने इन विचित्र नामोंके विषयमें विस्तारसे मुझे बताओ |

श्रीकृष्णने कहा – ब्राह्मणके द्वारा ऐसा कहे जानेपर पृथक-पृथक रूपसे प्रेतोंने कहा –

पर्युषितने कहा – किसी समय मैंने श्राद्धके सुअवसरपर ब्राह्मणको निमंत्रित किया था, वह वृद्ध ब्राह्मण मेरे घर विलम्बसे पहुँचा | बिना श्राद्ध किये ही भूख के कारण मैंने उस पाकको खा लिया | कुछ पर्युषित (बासी) अन्न लाकर मैंने उस ब्राह्मणको दे दिया | मरनेपर मुझे उसी पापके कारण इस दुष्टयोनिकी प्राप्ति हुई | मैंने ब्राह्मणको जो बासी भोजन दिया था, उसीसे मेरा नाम पर्युषित हो गया |

सूचीमुखने कहा – किसी समय कोई ब्राह्मणी तीर्थस्नान के लिये भद्रवट तीर्थ में गयी | उसके साथ उसका पाँच वर्षीय पुत्र भी था, जिसके सहारे वह जीवित थी | मैं उस समय क्षत्रिय था | मैं उसके मार्गका अवरोधक बन गया और निर्जन वनमें मैंने राहजनी की | हे विप्र ! उस लडके के सिरपर मुष्टि-प्रहार कर मैंने दोनों के वस्त्र और राहमें खाने योग्य सामान छीन लिया | वह लड़का प्याससे व्याकुल हो उठा था | अत: वह माता के पास स्थित जल लेकर पीने लगा | उस पात्रमें उतना ही जल था | मैंने उसको डाँटकर जल पीनेसे रोक दिया और स्वयं उस पात्रका सारा जल पी गया | भयसंत्रस्त, प्याससे व्याकुल उस बालककी वहिंपर मृत्यु हो गयी | पुत्रशोकसे व्यथित उसकी माँने भी कुँएमें कूदकर अपना प्राण त्याग दिया | इसी पापसे मुझको यह प्रेतयोनि प्राप्त हुई है |

पर्वताकार शरीर होनेपर भी इस समय मैं सुईकी नौक के समान मुखवाल हूँ | यद्यपि खाने योग्य पदार्थ मैं प्राप्त कर लेता हूँ, फिर भी यह मेरा सुईके छिद्र के समान मुख उसको खानेमें असमर्थ है | मैं क्षुधाग्निसे जलते हुए ब्राह्मणी के बालकका मुँह बंद किया था, उसी पापसे मेरे मुँहका छिद्र भी सुईकी नोंक के समान हो गया है | इसी कारण मैं आज सूचीमुख नामसे प्रसिद्ध हूँ |

शीघ्रगने कहा – हे विप्रवर ! मैं पहले एक धनवान वैश्य था | उस जन्ममें अपने मित्रके साथ व्यापार करने के लिये मैं एक दूसरे देशमें जा पहुँचा | मेरे मित्रके पास बहुत धन था | अत: धनके प्रति मेरे मनमें लोभ आ गया | अदृष्टके विपरीत होनेसे वहाँ मेरा मूल धन समाप्त हो चूका था | हम दोनोंने वहाँ से निकलकर मार्गमें स्थित नदीको नावसे पार करना प्रारम्भ किया | उस समय आकाशमें सूर्य लाल हो गया था | राहकी थकानसे व्याकुल मेरावह मित्र मेरी गोदमें अपना सिर रखकर सो गया | उस समय लोभवश मेरी बुद्धि अत्यंत क्रूर हो उठी | अत: सूर्यास्त हो जानेपर गोदमें सोये हुए अपने मित्रको मैंने जल-प्रवाह में फेंक दिया | मेरे द्वारा नावमें किये गये उस कृत्यको अन्य लोग भी न जान सके | उस व्यक्ति के पास जो कुछ बहुमूल्य हीरे – जवाहरात, मोती तथा सोने की वस्तुएँ थी, वह सब लेकर मैं शीघ्र ही सू देशसे अपने घर लौट आया | घरमें वह सब सामान रखकर मैंने उस मित्रकी पत्नी के पास जाकर कहा कि मार्गमें डाकुओं ने मेरे उस मित्रको मारकर सब सामान छीन लिया और मैं भाग आया हूँ | मैंने उससे फिर कहा कि हे पुत्रवती नारी ! तुम रोना नहीं | शोकसे व्यथित उस स्त्रीने तत्काल घरके बन्धु-बांधवोंकी ममता का परित्याग कर अपने प्राणोंकी भेंट अग्निको यथाविधि चढ़ा दिया | उसके बाद निष्कंटक स्थिति देखकर मैं प्रसन्नचित्त अपने घर चला आया | घर आकर जबतक मेरा जीवन रहा, तबतक उस धनका मैंने उपभोग किया | मित्रको नदीके जल-प्रवाह में फेंककर मैं शीघ्र ही अपने घर लौट आया था, उसी पापके कारण मुझे प्रेतयोनि मिली और मेरा नाम शीघ्रग हो गया |

रोधकने कहा – हे मुनीश्वर ! मैं पूर्व-जन्ममें शुद्र जातिका था | राजभवनसे मुझे जीवन – यापन के लिये उपहार में बहुत बड़े-बड़े सौ गाँवोंका अधिकार प्राप्त था | मेरे परिवारमें बूढ़े माता-पिता थे और एक छोटा सगा भाई था | लोभवश मैंने शीघ्र ही अपने उस भाईको अलग कर दिया जिसके कारण अन्न-वस्त्रसे रहित उस भाईको अत्यधिक दुःख भोगना पड़ा | उसके दुःख को देखकर मेरे माता-पिता लुक-छिपकर कुछ-न-कुछ उसको दे देते थे | जब मैंने भाईको माता-पिताके द्वारा दी जा रही उस सहायताकी बात विश्वस्त पुरुषोंसे सुनी तो एक सुने घरमें माता-पिताको जंजीर से रूद्र कर दिया | कुछ दिनों के बाद दु:खी उन दोनों ने विष पीकर अपनी जीवन-लीला समाप्त कर ली | हे द्विज ! माता-पितासे रहित होकर मेरा भाई भी इधर-उधर भटकने लगा | ग्राम तथा नगरमें भटकता हुआ एक दिन वह भी भूखसे पीड़ित होकर मर गया | हे ब्राह्मण ! मरने के बाद उसी पापके कारण मुझे यह प्रेतयोनि मिली | माता – पिताको मैंने बंदी बनाया था, इसी कारण मेरा नाम रोधक पड़ा |

लेखकने कहा – हे विप्रदेव ! मैं पूर्वजन्ममें उज्जैन नगरका ब्राह्मण था | वहाँके राजाने मेरी नियुक्ति देवालयमें पुजारी के पदपर की थी | स्वर्णनिर्मित उन प्रतिमाओं के अंगों में बहुत-सा रत्न भी लगा हुआ था | उनकी पूजा करते हुए मेरी बुद्धि पापासक्त हो गयी | अत: मैंने एक तेज धारवाले लोहेसे उन मूर्तियोंके नेत्रादिसे रत्नों को निकाल लिया | क्षत – विक्षत और रत्नरहित नेत्रोंको देखकर राजा प्रज्वलित अग्निके समान क्रोधसे तमतमा उठा | उसके बाद राजाने यह प्रतिज्ञा की कि चोर चाहे श्रेष्ठ ब्राह्मण ही क्यों न हो यदि उसने मूर्तियों से रत्न और सोना चुराया होगा तो ज्ञात होनेपर निश्चित ही मेरे द्वारा मारा जायगा | वह सब सुनकर मैंने रात्रिमें तलवार उठायी और राजाके घरमें जाकर उसका पशुकी तरह वध कर दिया | तदनन्तर चुरायी गयी मणियों तथा सोनेको लेकर मैं रात्रिमें ही अन्यत्र जाने लगा, किन्तु मार्गमें स्थित घनघोर जंगलमें एक व्याघ्रने मुझे मार डाला | मैंने लोहेसे प्रतिमा-छेदन एवं काटनेका जो कार्य किया था, उस पापसे आज मैं लेखक नामका प्रेत हूँ | नरकभोग करने के पश्चात मुझे यही प्रेत-योनि प्राप्त हुई |

उन पाँचों के साथ वह ब्राह्मण विमानपर चढ़कर मेरे लोकको चला गया |

इति गरुड़ पुराण धर्मकाण्ड – प्रेतकल्प:  

नारायण नारायण

 

गरुड़पुराण -धर्मकाण्ड – प्रेतकल्प -अध्याय- ६

garoodh puran

|| ॐ श्रीपरमात्मने नम: ||

गरुडपुराण

धर्मकाण्ड – प्रेतकल्प

अध्याय – ६

वृषोत्सर्गकी महिमामें राजा वीरवाहनकी कथा, देवर्षि नारदके पूर्वजन्मके इतिहासवर्णनमें सत्संगति और भगवद्भक्तिका माहात्म्य, वृषोत्सर्गके प्रभावसे राजा वीरवाहनको पुण्यलोककी प्राप्ति

गरुड़ने कहा – हे प्रभो ! जो तीर्थ-सेवन और दानमें निरंतर लगा है तथा अन्य साधनोंसे भी सम्पन्न है, उसे भी वृषोत्सर्ग अवश्य करना चाहिये | ऐसा मैंने आपसे सुन लिया | इस वृषोत्सर्गका फल क्या है ? प्राचीन समयमें इस यज्ञको किसने किया ? इसमें किस प्रकारका वृष होना चाहिये ? विशेष रूपसे इस कार्यको किस समय करना चाहिये और इसको करनेकी कौन-सी विधि बतायी गयी है ? यह सब बतानेकी कृपा करें |

श्रीकृष्णने कहा – हे खगेश्वर ! मैं उस महापुण्यशाली इतिहासका वर्णन कर रहा हूँ, जिसका वर्णन ब्रह्माके पुत्र महर्षि वसिष्ठने राजा वीरवाहनसे किया था |

प्राचीन समयकी बात है, विराधनगरमें वीरवाहन नामक एक धर्मात्मा, सत्यवादी, दानशील और विप्रोंको संतुष्ट करनेवाले राजा रहते थे | किसी समय वे शिकार खेलनेके लिये वनमें गये | कुछ पूछनेकी जिज्ञासासे वे वसिष्ठमुनिके आश्रममें जा पहुँचे | वहाँ आसन ग्रहण कर विनम्रतासे झुके हुए राजाने ऋषियोंकी संसद में मुनिको नमस्कार करके पूछा |

राजाने कहा – हे मुने ! मैंने यथाशक्ति प्रयत्नपूर्वक अनेक धार्मिक कृत्य किये हैं, फिर भी यमराजके कठोर शासनको सुनकर मैं ह्रदयमें बहुत ही भयभीत हूँ | हे कृपानिधान ! महाभोग ! ऋषिवर ! मुझे यम, यमदूत और देखनेमें अतिशय भयंकर लगनेवाले नरकलोकों को न देखना पड़े, ऐसा कोई उपाय बतानेकी कृपा करें |

वसिष्ठने कहा – हे राजन ! शास्त्रवेत्ता अनेक प्रकारके धर्मोंका वर्णन करते हैं, किन्तु कर्ममार्गसे विमोहित जन सूक्ष्मतया उनको नहीं जानते | दान, तीर्थ, तपस्या, यज्ञ, संन्यास तथा पितृक्रिया आदि सभी धर्म हैं, उन धर्मोंमें भी वृषोत्सर्गका विशेष महत्त्व हैं | मनुष्यको बहुत-से पुत्रोंकी अभिलाषा करनी चाहिये | यदि उनमेंसे एक भी पुत्र गयातीर्थ में जाय, अश्वमेधयज्ञ करे अथवा नील वृषभ यथाविधि छोड़े तो जाने-अनजाने किये गये ब्रह्महत्या आदि पाप भी विनष्ट हो जाते हैं | यह शुद्धि नील वर्णके वृषभका उत्सर्ग अथवा समुद्रमें स्नान करनेसे भी हो सकती है | हे राजेन्द्र ! जिसके एकादशाहमें वृषोत्सर्ग नहीं होता, उसका प्रेतत्व स्थिर ही रहता है | मात्र श्राद्ध करनेसे क्या लाभ होगा ? जिस-किसी भाँति नगर अथवा तीर्थमें वृषोत्सर्ग अवश्य करना चाहिये |

हे खगेश ! वृष-यज्ञके द्वारा प्रेतत्वसे मुक्ति प्राप्त होती है, अन्य साधनोंसे नहीं | जो वृषभ शुभ लक्षणोंसे समन्वित युवा तथा कृष्ण गल-कम्बलवाला हो और सदैव जो गायोंके झुण्डमें घूमनेवाला हो, उस वृषभको विधि-विधानसे चार अथवा दो या एक बछियाके साथ पहले उसका विवाह करना चाहिये | तदनन्तर मांगलिक द्रव्यों एवं मन्त्रोंके साथ उन सबका उत्सर्ग किया जाय | ‘ॐ इह रति: स्वाहा इदमग्नये | ॐ इह रमर्ध्व स्वाहा इदमग्नये | ॐ इह धृति: स्वाहा इदमग्नये | ॐ इह स्वधृति: स्वाहा इदमग्नये | ॐ उपसृजन धरूणं मात्रे धरुणों मातरं धवन स्वाहा इदमग्नये | ॐ रायस्पोषमरुमासु दीधरत स्वाहा इदमग्नये |   ’ इन छ: मंत्रोसे अग्निदेवको आहुति देनी चाहिये | कार्तिक, माघ और वैशाखकी पूर्णिमा, संक्रान्ति, अन्य पुण्यकाल, व्यतिपात तथा तीर्थमें और पिताकी क्षयतिथि वृषोत्सर्गके लिये विशेष रूपसे प्रशस्त मानी जाती है | ‘जो वृषभ लाल वर्णका हो और उसका मूँह-पूँछ पांडू ( श्वेत-पीतमिश्रित ) हो, खुर और सींगोंका वर्ण पीत हो, वह नीलवृषभ कहा जाता है |’

जो वृषभ श्वेत वर्णका होता है वह ब्राह्मण है, जो लोहित वर्णका है वह क्षत्रिय है, जो पीत वर्णका है वह वैश्य है और जो कृष्ण वर्णका है वह शुद्र है | अत: ब्राह्मण, क्षत्रिय एवं वैश्य वर्णको अपने वर्णके अनुसार वृषोत्सर्ग करना चाहिये अथवा रक्तवर्णका ही वृषभ सबके लिये कल्याणप्रद है |

पिता, पितामह तथा प्रपितामह पुत्रके उत्पन्न होनेपर यही आशा करते हैं कि यह मेरे लिये वृषोत्सर्ग करेगा | वृषोत्सर्ग के समय इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये –

धर्मस्त्वं वृषरूपेण जगदानन्ददायक: ||

अष्टमूर्तेरधिष्ठानमत: शान्तिं प्रयच्छ में |

गंगायमुनयो: पेयमन्तर्वेदि तृण चर ||

धर्मराजस्य पुरतो वाच्यं में सुकृतं वृष | ( ६/२३-२५ )

हे धर्म ! आप इस वृषभरूपमें संसारको आनंद प्रदान करनेवाले देव है | आप ही अष्टमूर्ति शिवके अधिष्ठान हैं | अत: मुझे शान्ति प्रदान करें | आप गंगा-यमुनाका जल पियें | अंतर्वेदीमें घास चरें और हे वृष ! धर्मराजके सामने मेरे पुण्यकर्मकी चर्चा करें |

इस प्रकारका निवेदन करते हुए संस्कर्ताको चाहिये कि वृषभके दाहिने कंधेपर त्रिशूल और बायें ऊरूभागमें चक्रका चिन्ह अंकित करके गंध, पुष्प तथा अक्षत आदिसे बछियाके सहित उस वृषभकी पूजा करके विधिवत बंधनमुक्त कर दे |

वसिष्ठजीने कहा – हे राजन ! आप भी विधिवत वृषोत्सर्ग करें, अन्यथा सभी साधनोंसे सम्पन्न होनेपर भी आपको सद्गति नहीं प्राप्त हो सकती है | राजन ! पहले त्रेतायुगमें विदेहननगरमें धर्मवत्स नामका एक ब्राहण था, जो अपने वर्णानुसार कर्ममें अहर्निश निरत, विद्वान, विष्णुभक्त, अत्यंत तेजस्वी और यथालाभसे संतुष्ट रहता था | एक बार पितृपर्वके आनेपर वह कुश लेनेके लिये वनमें गया | वहाँ इधर-उधर घूमता हुआ वह कुश और पलाशके पत्तोंको एकत्र आये और उस ब्राह्मणको पकड़कर आकाशमार्गसे लेकर चले गये | वे चारों पुरुष उस दीन, व्यथित ब्राह्मणको पकड़कर बहुत-से वृक्षोंवाले घनघोर वन, पर्वतोंके दुर्गोंको पार करते हुए एक वनसे दूसरे वनके मध्य ले गये | हे राजन ! वहाँपर उस ब्राह्मणने एक बहुत बड़ा नगर देखा | वह नगर मुख्यद्वारसे समन्वित तथा अनेक प्रासादोंसे सुशोभित हो रहा था | चबूतरा, बाजार, खरीदी-बेचीं जानेवाली वस्तुओं और नर-नारीसे युक्त उस नगरमें तुरहियोंकी ध्वनि हो रही थी | वीणा और नगाड़े बज रहे थे | वहाँ कुछ भूखसे पीड़ित, दीन-हीन, पुरुषार्थसे रहित लोगोंको भी उसने देखा | उसके बाद अत्यंत मैले-कुचैले, फटे-पुराने वस्त्रोंको पहने हुए लोग दिखायी पड़े | आगे हृष्ट-पुष्ट स्वर्णाभूषणसे अलंकृत सुंदर-सुंदर वस्त्र धारण किये हुए कुछ ऐसे लोग थे, जो देवताओंके समान शोभासम्पन्न थे; जिनको देखकर वह विस्मयाभिभूत ही उठा | वह सोचने लगा कि क्या मैं स्वप्न देख रहा हूँ ? वह ब्राह्मण इस प्रकारकी शंका कर ही रहा था कि वे चारों पुरुष उसको लेकर राजाके पास गये | स्वर्णजटित उस राजप्रासादके बीच स्थित राजाको वह ब्राह्मण एकटक देखता ही रह गया | वहाँपर एक महादिव्यसिंहासन था, जहाँ छत्र और चँवर डुलाये जा रहे थे | उसके ऊपर स्वर्णनिर्मित मुकुट धारण किया हुआ महान शोभा-सम्पन्न राजा बैठा हुआ था | वन्दीजन उसका गुणगान कर रहे थे |

राजा उस ब्राह्मणको देखकर खड़ा हो गया और उसने मधुपर्क तथा आसनादि प्रदान कर उनकी विधिवत पूजा की | तत्पश्चात अत्यंत प्रसन्नचित्त होकर वह राजा उन विप्रदेवसे इस प्रकार कहने लगा – हे प्रभो ! आज आप जैसे धर्मपरायण विष्णुभक्तका दर्शन हुआ है, इससे मेरा जन्म सफल हो गया | मेरा यह कुल भी पवित्र हो उठा | तदनन्तर राजाने उस ब्राह्मणको प्रणाम किया और बहुत प्रकारसे उनको संतुष्ट करके अपने दूतोंसे कहा – हे दूतो ! ये ब्राह्मणदेव जहाँसे आये हुए है, पुन: तुम सब इन्हें वहीँ ले जाकर पहुँचा आओ | ऐसा सुनकर उन ब्राह्मणश्रेष्ठने राजासे पूछा –

हे राजन ! यह कौन-सा देश हैं ? यहाँपर ये उत्तम, मध्यम और अधम चरित्रवाले लोग कहाँसे आये हुए हैं ? आप किस पुण्यके प्रभावसे यहाँ इन सबके बीच प्रधान पदपर विराजमान हैं ? मुझको यहाँ किसलिये लाया गया और फिर क्यों वापस भेजा जा रहा है ? यह सब स्वप्नके समान मुझे अनोखा दिखायी दे रहा है ?

इसपर राजाने कहा – हे विप्रदेव ! अपने धर्मका पालन करते हुए जो मनुष्य सदैव भगवान हरिकी भक्तिमें अनुरक्त और इन्द्रियोंके विषयसे परे रहता है, वह मेरे लिये निश्चित ही पूज्य है | नित्य जो प्राणी तीर्थोंकी यात्रा करनेमें ही लगा रहता हैं, जो वृषोत्सर्गके माहात्म्यको भलीभाँति जानता है और जो सत्य एवं दान-धर्मका पालक है, वह व्यक्ति देवताओंके लिये भी प्रणम्य है | हे परंतप ! हे पुजार्ह ! आपका दर्शन हम सभी प्राप्त कर सकें, इसलिये आपको यहाँ लगा गया था | हे देव ! आप मुझपर प्रसन्न हों और मुझे इस साहसके लिये क्षमा करें | मैं स्वयं अपने सम्पूर्ण चरित्रका वर्णन करनेमें समर्थ नहीं हूँ | इस वृतांतका वर्णन मेरा यह विपश्चित नामवाला मंत्री करेगा | राजाका वह मंत्री सब वेदोंको जाननेवाला विद्वान व्यक्ति था | अत: अपने स्वामीकी हार्दिक इच्छाको जानकर वह कहने लगा –

हे विप्र ! यह राजा पूर्वजन्ममें द्विज और देवताओंसे सुशोभित विराधनगरमें विश्वम्भर नामका एक वैश्य था | ऐसा मैंने सुना है | वैश्य-वृत्तिसे जीवनयापन करते हुए वह अपने परिवारका पालन करता था | नित्य गायोंकी सेवा तथा ब्राह्मणोंकी पूजा भी करता था | सत्प्रात्रको दान, अतिथिसेवा तथा अग्निहोत्र करना उसका नित्य धर्म था | सत्यमेधा नामकी पत्नीके साथ उसने विधिवत गृहस्थाश्रमका संचालन किया | उसने स्मार्त कर्मके अनुष्ठानसे सभी लोकों तथा श्रौत कर्मोंसे देवताओंको जीत लिया था |

किसी समय जब वह वैश्य अपने भाइयोंके साथ बहुत-से तीर्थोंकी यात्रा कर अपने घर लौट रहा था, तब मार्गमें ही उसे लोमश ऋषिका दर्शन हो गया | उसने महर्षिके चरणोंमें दंडवत प्रणाम किया | हाथ जोड़कर विनयावनत खड़े उस वैश्यसे करुणाके सागर महर्षि लोमशने पूछा –

हे भद्रपुरुष ! ब्राह्मणों और अपने भाई-बन्धुओंके साथ आप कहाँसे आ रहे हैं ? धर्मप्राण ! आपको देखकर मेरा मन आर्द्र हो उठा है |

इसपर विश्वम्बर वैश्यने उत्तर दिया – मुनिवर ! यह शरीर नश्वर है | मृत्यु प्राणीके सामने ही खड़ी रहती है – ऐसा जानकर अपनी धर्मपरायणा पत्नीके साथ मैं तीर्थयात्रामें गया था | तीर्थोंका विधिवत दर्शन एवं प्रचुर धन-दान कर मैं अपने घरकी ओर वापस जा रहा था कि सौभाग्यवश आपका दर्शन हो गया |

लोमशने कहा – इस भारतवर्षकी पावन भूमिमें बहुत-से तीर्थ हैं | आपने जिन तीर्थोंकी यात्रा की है, उनका वर्णन मुझसे करें |

वैश्यने कहा – हे ऋषिवर ! जहाँ गंगा, यमुना और सरस्वती नामक पवित्रतम नदियाँ एक साथ मिलकर प्रवाहित होती है, जहाँ ब्रह्मा तथा देवराज इंद्रने दशाश्वमेध-यज्ञ किया था, उस तीर्थराज प्रयाग; जहाँ करुणानिधान देवदेवेश्वर शिव प्राणियोंके कानमें ‘तारकमंत्र’ का उपदेश देते हैं उस मोक्षदायिनी काशी; पुलहाश्रम, फल्गुतीर्थ, गण्डकी, चक्रतीर्थ, नैमिषारण्य, शिवतीर्थ, अनन्तक, गोप्रतारक, नागेश्वर, विन्दुसरोवर, मोक्षदायक राजीवलोचन भगवान रामसे सुशोभित अयोध्या; अग्नितीर्थ, वायुतीर्थ, कुबेरतीर्थ, कुमारतीर्थ, सूकरक्षेत्र, भगवान कृष्णसे अलंकृत मथुरा; पुष्कर, सत्यतीर्थ, ज्वालातीर्थ, दिनेश्वरतीर्थ, इंद्रतीर्थ, पश्चिमवाहिनी सरस्वती तथा कुरुक्षेत्र जाकर मैंने दर्शन किया | उसके बाद मैं ताप्ती, पयोष्णी, निर्विन्ध्या, मलय, कृष्णवेणी, गोदावरी, दंडकवन, ताम्रचूड, सदोद्क और द्यावाभूमीश्वर तीर्थको देखकर पर्वतराज श्रीशैल पहुँचा | तदनन्तर महातेजस्वी भगवान हरि स्वयं जहाँ श्रीरंग नामसे निवास करते है, जहाँ महिषासुरमर्दिनी दुर्गा वेंकटी नामसे पुकारी जाती है, उस वेंकटाचलकी यात्रा मेरे द्वारा की गयी | तत्पश्चात चन्द्रतीर्थ, भद्रवट, कावेरी, कुटिलाचल, अवटोदा, ताम्रपर्णी, त्रिकुट, कोल्लकगिरि, वसिष्ठतीर्थ, ब्रह्मतीर्थ, ज्ञानतीर्थ, महोदधि, हृषिकेश, विराज, विशाल और नीलाद्री (जगन्नाथपूरी), भीमकूट, श्वेतगिरि, रूद्रतीर्थ तथा जहाँ तपस्या करके पार्वतीने भगवान शिवका पतिरूपमें वरण किया था, उस उमावन तीर्थकी मैंने यात्रा की | तत्पश्चात चन्द्रतीर्थ, भद्रवट, कावेरी, कुटिलाचल, अवटोदा, ताम्रवर्णी, त्रिकुट, कोल्लकगिरि, वसिष्ठतीर्थ, ब्रह्मतीर्थ, ज्ञानतीर्थ, महोदधि, हृषिकेश, विराज, विशाल और नीलाद्री (जगन्नाथपूरी), भीमकूट, श्वेतगिरि, रूद्रतीर्थ तथा जहाँ तपस्या करके पार्वतीने भगवान शिवका पतिरूपमें वरण किया था, उस उमावन तीर्थकी मैंने यात्रा की | साथ ही वरुणतीर्थ, सूर्यतीर्थ, हंसतीर्थ तथा महोदधि तीर्थकी यात्रा हुई, जहाँ स्नान करके काकोला ( पहाड़ी कौआ ) भी राजहंस बन जाता हैं, जहाँ स्नान मात्र करके एक राक्षसने देवत्व पद प्राप्त कर लिया था | उसके बाद विश्वरूप, वन्दितिर्थ रत्नेश तथा कुहकाचल तीर्थ गया जहाँ नरनारायणका दर्शन करके मनुष्य करोड़ों पापसे मुक्त हो जाता है | सरस्वती, दृशद्वती और नर्मदा नामक मनुष्योंके लिये कल्याणकारिणी नदियोंकी मैंने यात्रा की | भगवान नीलकंठ, महाकाल, अमरकंटक, चन्द्रभागा, वेत्रवती, वीरभद्र, गणेश्वर, गोकर्ण, बिल्वतीर्थ, कर्मकुण्ड और सतारक तीर्थोंमें जाकर आपकी कृपासे मैं अन्य तीर्थोंमें भी गया जहाँ मात्र स्नान करके मनुष्य कर्मबंधनसे मुक्त हो जाता है |

हे मुने ! साधुजनोंकी जो कृपा है, वह प्राणियोंमें कल्याणकारिणी बुद्धिको जन्म देती है | एक ओर तो सभी तीर्थ हैं और दूसरी ओर करुणापूर्ण साधुजन प्राणियोंके कल्याणका उनपर कृपा करनेका व्रत धारण कर वे इतस्तत: परिभ्रमण करते रहते हैं –

उत्पद्यते शुभा बुद्धि: साधूनां यदनुग्रह: |

एकत: सर्वतीर्थानि करुणा: साधवोऽन्यत: ||

अनुग्रहाय भूतानां चरन्ति चरितव्रता: | ( ६/७७-७८ )

हे प्रभो ! आप सभी वर्णोंके गुरु हैं तथा विद्या एवं वयमें श्रेष्ठ हैं | अत: मैं आपसे उस आधिभौतिक स्वरूपके विषयमें पूछ रहा हूँ, जो चिरन्तन कालसे चला आ रहा है | मैं क्या करूँ ? किससे पूछूँ ? मेरा मन अत्यंत चंचल हो उठा है | यह ब्रह्मके विषयमें तो निस्पृह रहता हैं, पर विषयोंमें अति लालायित है | यह रंचमात्र भी उस अज्ञानरूपी अन्धकारका विछोह सहन नहीं कर सकता है | हे विप्रदेव ! कर्मोंका जो श्रेष्ठतम क्षेत्र हैं, वह अनेक प्रकारके भावोंसे व्यामोहित है | ज्ञानसम्पन्न व्यक्तिके पास जिस प्रकारसे शान्ति आ जाती है, विवेकवां श्रेष्ठ मनुष्य जिस प्रकार अंतर्बाह्य दोनों स्थितियोंमें शुद्धताको प्राप्त कर लेता है वह सब मुझे बतानेकी कृपा करें |

ऋषिने कहा- हे वैश्यवर्य ! यह मन अत्यंत बलवान है | यह नित्य ही विकारयुक्त स्वभाववाला है | तथापि जैसे पीलवान मतवाले हाथीको भी वशमें कर लेता है वैसे ही सत्संगतिसे, आलस्यरहित होकर साधन करके, तीव्र भक्तियोगसे तथा सद्विचारके द्वारा अपने मनको वशमें कर लेना चाहिये | इस सम्बन्धमें तुम्हें विश्वास हो जाय, इसलिये मैं एक इतिहास बता रहा हूँ, जो नारदके पूर्वजन्मके जीवनवृत्तसे जुड़ा हुआ है, जिसको स्वयं उन्होंने ही मुझसे कहा था |

नारदजीने मुझसे कहा – हे मुने ! मैं प्राचीनकालमें किसी श्रेष्ठ ब्राह्मणका दासीपुत्र था | वहीपर मुझे महान पुण्यात्माओंकी सत्संगति प्राप्त करनेका सुअवसर भी मिला | एक बार वर्षाकालमें भाग्यवश मेरे घर साधुजन ठहरे हुए थे | मेरे द्वारा विनम्रतापूर्वक बराबर की गयी सेवासे अत्यंत संतुष्ट होकर उन लोगोंने मुझे उपदेश दिया था, जिसके प्रभावसे मेरी बुद्धि निर्मल और हितैषिणी बन गयी, जिससे अब मैं अपनेमें ही सबको विष्णुमय देखता हूँ |

मुनियोंने नारदजीसे कहा – हे वत्स ! तुम सुनो | हम सब तुम्हारे हितमें कह रहे हैं, जिसको स्वीकार कर तदनुसार जीवनयापन करनेवाला प्राणी इस लोक और परलोक देवता, पक्षी तथा मनुष्यादिकी योनियाँ हैं, जो कर्मपाशमें बँधी हुई है | वे सदैव पृथक-पृथक रूपसे कर्मफलोंका भोग करते हुए सत्त्वगुणसे देवत्व, रजोगुणसे मनुष्यत्व और तमोगुणसे तिर्यक योनि प्राप्त करते हैं | वासनामें आबद्ध बुद्धिहीन प्राणी माताके गर्भसे बार-बार जन्म लेकर मृत्युका वरण करता है | इस प्रकार उन असंख्य योनियोंमें जाकर वह कभी दैवयोगसे ही मनुष्यकी दुर्लभ योनिको प्राप्त कर, महात्माओंकी कृपासे भगवान हरिको जानकर तथा अपार भवसागरको रोगरुपी ग्राह और मोहरूपी पाशसे युक्त समझकर मुक्त हो जाता है | इस भवसागरको पार करनेके इच्छुक प्राणीके लिये राम-नाम-स्मरणके अतिरिक्त अन्य कोई साधन हमें दिखायी नहीं देता है | जैसे दहीका मंथन करनेसे नवनीत और काष्ठका मंथन करनेसे अग्नि प्राप्त होती है, वैसे ही आत्ममंथन कर उस परमात्माको जो प्राणी जान लेता है, वह सुखी हो जाता है |

यह आत्मा नित्य, अव्यय, सत्य, सर्वगामी, सभी प्राणियोंमें अवस्थित और महान है |  यह अप्रमेय है | यह स्वयंमें ज्योतिस्वरूप एवं मनसे भी अग्राह्य है | यह वह तत्त्व है, जो सच्चिदानन्दरूप है और सभी प्राणियोंके ह्रदयमें विराजमान रहता है | भावोंके विनष्ट हो जानेपर भी कभी विनष्ट नहीं होता है | जिस प्रकार आकाश सभी प्राणियोंमें, तेज जलमें तथा वायु सभी पार्थिव पदार्थोंमें स्थित है, उसी प्रकार आत्मा सर्वत्र व्याप्त और निर्लेप है | भक्तोंपर कृपादृष्टि रखनेवाले भगवान हरि साधुओंकी रक्षा करनेके लिये अवतरित होते हैं | यद्यपि वे निर्गुण हैं, फिर भी अज्ञानियोंको गुणवान प्रतीत होते हैं | जो व्यक्ति इस प्रकारकी ज्ञानवती बुद्धिसे अपने ह्रदयमें उस परमात्माका चिंतन करता है, उसके भक्तियोगसे संतुष्ट होकर वे अजन्मा पुरुष परमात्मा उसको अपना दर्शन देते हैं | तत्पश्चात वह भक्त कृतार्थ हो जाता है और सर्वदा सर्वत्र निष्कामभावसे बना रहता है | अत: बंधनयुक्त इस शरीरमें अहंकारका परित्याग करके स्वप्नप्राय संसारमें ममता और आसक्तिसे रहित होकर संचरण करे | स्वप्नमें धैर्य कहाँ स्थिर रहता है ? इंद्रजालमें कहा सत्यता होती है ?  शरत्कालके मेघमें कहाँ नित्यता रहती है ? वैसे ही शरीरमें सत्यता कहाँ रहती है ? यह दृश्यमान समस्त चराचर जगत अविद्या-कर्मजनित है | ऐसा जानकर तुम्हें आचारवान योगी बनना चाहिये | उससे तुम सिद्धि प्राप्त कर सकते हो |

इस प्रकारका उपदेश देकर वे सभी दीन-हीन प्राणियोंपर वात्सल्य-भाव रखनेवाले साधू वहाँसे चले गये | तदनन्तर मैं (नारद) उनके द्वारा बताये गये मार्गसे उसी प्रकारका आचरण प्रतिदिन करता रहा | कुछ ही समयके पश्चात मैंने अपने अंत:करणमें यह एक आश्चर्यजनक दृश्य देखा कि शरत्कालीन चन्द्रमाके समान निर्मल, प्रतिक्षण आनंद प्रदान करनेवाला अद्भुत प्रकाशपुंज प्रज्वलित हो रहा है | वह महातेज मुझे प्रचुर सुखसे सींचकर (अपने प्रति) अधिक स्पृहायुक्त बनाकर आकाशमें विद्युतकी भाँति अन्तर्हित हो गया | भक्तिपूर्वक मैं उस अनोखे ज्योतिपुंजका ध्यान करता हुआ समय आनेपर अपना शरीर छोडकर विष्णुलोक चला गया |

हे ब्रह्मन ! उन्हीं प्रभुकी इच्छासे पुन: मेरा जन्म ब्रह्मासे हुआ | उन भगवानकी कृपासे ही मैं आज अनासक्त रहकर तीनों लोकोंमें बार-बार वीणा बजाते और गीत गाते हुए घूमता रहता हूँ |

अपना ऐसा अनुभव बताकर मुनि नारद मेरे पाससे मनोनुकूल दिशामें चले गये | उनकी उस बातसे मुझको बड़ा ही आश्चर्य हुआ और बहुत संतोष भी मिला |

अत: सत्संगति तथा भगवद्भक्तिसे तुम्हारा विशुद्ध, निर्मल और शांत स्वभाववाला मन सुखी हो जायगा | हे धर्मज्ञ ! साधूसंगति होनेपर अनेक जन्मोंमें किया गया पाप शीघ्र ही उसी प्रकार विनष्ट हो जाता है, जैसे शरत्कालके आनेपर बरसात समाप्त हो जाती है –

अतस्ते साधूसंगत्या भक्त्या च परमात्मन: |

विशुद्धं निर्मलं शान्तं मनो निर्वृतिमेष्यति |

अनेकजन्मजनितं पातकं साधूसंगमें ||

क्षिप्रं नश्यति धर्मज्ञ जलानां शरदो यथा | ( ६/१११-११३)

वैश्यने कहा – हे ऋषिराज ! आपके इस वाक्यामृतरसपानसे मेरे अंत:करणको शान्ति मिल गयी | आज आपके इस दर्शनसे मेरी समस्त तीर्थयात्राका फल प्रकट हो उठा है |

यह सुनकर लोमशजीने कहा – हे राजेन्द्र ! धर्म, अर्थ और काम – इस त्रिवर्गके फलकी इच्छा करनेवाले तुम्हारे हितमें यह मानता हूँ कि वृषोत्सर्गके बिना जो बहुत-से सत्कर्म तुमने किये है, वे सब ओसकणोंके रूपमें पृथ्वीपर गिरे हुए जलके समान कुछ भी कल्याण करनेकी सामर्थ्य नहीं रखते हैं | इस पृथ्वीतलपर वृषोत्सर्गके करनेवाले लोग अनायास पुण्यात्माओंकी सद्गति प्राप्त कर लेते हैं | वृषोत्सर्ग-कर्म जिसने किया है वह व्यक्ति और जो अश्वमेधयज्ञका कर्ता है, मेरी दृष्टिमें दोनों समान हैं | वे दोनों दिव्य शरीर प्राप्त करके इंद्रदेवका सांनिध्य ग्रहण करते हैं | अत: तुम पुष्करतीर्थमें जाकर वृषोत्सर्ग-कर्मको सम्पन्न करो | हे साधू ! उसके बाद ही तुम अपने घर जाओ, जिससे की इस तीर्थ-यात्राका समस्त कृत्य भलीभाँति पूर्ण हो जाय |

विपश्चितने कहा – इसके बाद वह वैश्य यज्ञको पूर्ण करनेवाले वराहरूपी भगवान जहाँ विद्यमान है, उस श्रेष्ठ पुष्करतीर्थमें गया और उसने कार्तिक पूर्णिमाके दिन ऋषिश्रेष्ठने जैसा कहा था, उस वृषोत्सर्ग-कर्मको विधिवत सम्पन्न किया | इसके बाद लोमश ऋषिकी संगतिसे वह बहुत-से तीर्थोंमें गया | अधिक पुण्य नील ( वृष ) विवाहसे उसको प्राप्त हुआ था | श्रेष्ठ विमानपर चढ़कर दिव्य विषयोंको भोगनेके बाद उसका वीरसेनके राजकुलमें जन्म हुआ | इस जन्ममें उसको वीरपंचानन नामकी ख्याति प्राप्त हुई | वह धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष – इस पुरुषार्थ चतुष्टयका एक अद्वितीय साधक था | वृषोत्सर्ग करते समय वहाँ जो नौकर-चाकर उपस्थित थे, वे भी गायकी पूँछके तर्पणके छीटोंका स्पर्श करके दिव्य रूप हो गये | जो दूरसे ही इस कार्यको देख रहे थे, वे लोग ह्रष्ट-पुष्ट हो गये और उनका स्वरूप कान्तिसे चमक उठा | इसके अतिरिक्त जो लोग इस सत्कर्मके भू-भागसे बहुत दूर थे, वे मलिन दिखायी दे रहे थे | वृषोत्सर्ग न देखते हुए जो लोग उसकी निंदा करनेवाले थे, वे अभागे, दीन-हीन और व्यवहार आदिमें रुक्ष, कृश और वस्त्रविहीन हो गये | हे द्विज ! मैंने भगवान पराशरसे पूर्वजन्मसे सम्बद्ध इस राजाका अद्भुत और धार्मिक जो वृतांत सुना था, उसका वर्णन आपसे कर दिया | इसलिये आप मेरे ऊपर कृपा करके अब अपने घर लौट जायँ | मंत्रीके ऐसे वाक्योंको सुनकर वे ब्राह्मण अत्यधिक आश्चर्यचकित हो उठे | तदनन्तर राजसेवकोंके द्वारा उन्हें घरपर पहुँचा दिया गया |

वसिष्ठने कहा – हे राजन ! सभी कर्मोंमें वृषोत्सर्ग-कर्म श्रेष्ठतम है | अत: आप यदि यमराजसे भयभीत हैं तो यथाविधि वृषोत्सर्गके अतिरिक्त अन्य कोई भी ऐसा साधन नहीं है जो मनुष्यको स्वर्ग-प्राप्तिकी सिद्धि प्रदान कर सके |

आपको मैंने धर्मका रहस्य बता दिया है | यदि पति-पुत्रसे युक्त नारी पतिके आगे मर जाती है तो उसके निमित्त वृषोत्सर्ग नहीं करन चाहिये, अपितु दूध देनेवाली गायका दान देना चाहिये |

श्रीकृष्णने कहा – हे खगेश ! महर्षि वसिष्ठके उक्त वचनोंको सुनकर राजा वीरवाहनने मथुरामें जाकर विधिवत वृषोत्सर्गका अनुष्ठान किया | तदनन्तर अपने घर पहुँचकर उसने अपनेको कृतार्थ माना | समय आनेपर जब उसकी मृत्यु हुई तब यमराजके दूत उसको लेकर कालपुरीकी ओर चले, किन्तु उस नगरको पार करके मार्गमें जब वह अधिक दूर निकल गया तो उसने दूतोंसे पूछा की श्राद्धदेवका नगर कहाँ है ? तब दूतोंने उसको बताया कि जहाँ पापी लोग पापशुद्धिके लिये यमदूतोंके द्वारा नरकमें ढकेले जाते हैं, जहाँ धर्माधर्मकी विवेचना करनेवाले धर्मराज विराजमान रहते हैं, वहीँ वह श्राद्धदेवपर है | आप-जैसे पुण्यात्माओं के द्वारा वह नहीं देख जाता है | उसी समय देव-गन्धर्वोके सहित दिव्य रूपवाले धर्मराजने उस राजाके समक्ष अपनेको प्रकट किया | अपने सामने उपस्थित धर्मराजको देखकर राजाने बड़े ही आदरके साथ हाथ जोड़कर उन्हें प्रणाम किया और प्रसन्नचित्त होकर उसने अनेक प्रकारसे गुण-कीर्तन करते हुए उन्हें संतुष्ट किया | धर्मराजने भी राजाकी प्रशंसा करके यही कहा – हे दूतो ! तुम सब, इन्हें उस देवलोकमें ले जाओ, जहाँ प्रचुर भोगके साधन सुलभ हैं | राजा वीरवाहनने उस आदेशको सुनकर सामने ही स्थित धर्मराजसे पूछा- हे देव! मैं यह नहीं जानता हूँ कि आप मुझे किस पुण्यके प्रभावसे स्वर्गलोक ले जा रहे हैं |

धर्मराजने कहा – हे राजन ! तुमने दान-यज्ञादि अनेक पुण्यकार्योंको विधिवत सम्पन्न किया है | वसिष्ठकी आज्ञा मान करके तुमने मथुरामें वृषोत्सर्ग भी किया है |

हे नरेश ! यदि मनुष्य थोड़े भी धर्मका सम्यकरूपसे पालन करता है तो वह ब्राह्मण और देवताओंकी कृपासे अधिकाधिक हो जाता है –

धर्म: स्वप्लोऽपि नृपते यदि सम्यगुपासित: |

द्विजदेवप्रसादेन स याति बहुविस्तरम || ( ६/१४२ )

ऐसा कहकर यमुनाके भ्राता उसी क्षण अन्तर्धान हो गये | तत्पश्चात वीरवाहन स्वर्गमें जाकर देवताओंके साथ सुखपूर्वक रहने लगा |

श्रीकृष्णने कहा – हे पक्षिराज ! मैंने वृषोत्सर्ग नामक यज्ञका माहात्म्य विस्तारपूर्वक तुम्हें सुना दिया है | प्राणियोंके पापकर्मको समाप्त करनेवाले इस आख्यानको सुननेवाला व्यक्ति पापमुक्त हो जाता है |

नारायण नारायण

गरुड़पुराण -धर्मकाण्ड – प्रेतकल्प -अध्याय- ४ व ५

garoodh puran

|| ॐ श्रीपरमात्मने नम: ||

गरुडपुराण

धर्मकाण्ड – प्रेतकल्प

अध्याय – ४ व ५

आसन्नमृत्यु-व्यक्तिके निमित्त किये जानेवाले प्रायश्चित्त, दस दान आदि विविध कर्म, मृत्युके बाद किये जानेवाले कर्म, षटपिंडदान, दाह-संस्कारसे पूर्व किये जानेवाले कर्म

श्रीकृष्णने कहा – हे गरुड ! जानमें या अनजानमें मनुष्य जो भी पाप करते हैं, उन पापोंकी शुद्धिके लिये उन्हें प्रायश्चित्त करना चाहिये | जो विद्वान है वह पहले पवित्र करनेवाले भस्म आदि दस स्नान करे और पापोंके प्रायश्चित्तके रूपमें शास्त्रोक्त कृच्छादि व्रत अथवा तत्प्रतिनिधिभूत गोदानादि क्रिया करे | यदि मनुष्य उनमें अक्षमताके कारण सफल न हो रहा हो तो आधा ही सही, यदि आधा भी न हो तो उसका ही आधा सही और नहीं तो उस आधेका भी आधा उसे कुछ-न-कुछ प्रायश्चित्त अवश्य करना चाहिये | तत्पश्चात यथासामर्थ्य दस प्रकारके दान देनेका विधान है, उसको सुनो |

गो, भूमि, तिल, हिरण्य, घृत, वस्त्र, धान्य, गुड़, रजत और लवण – ये दस दान है –

गोभुमितिलहिरण्याज्यवासोधान्यगुडास्तथा |

रजतं लवणं चैव दानानि दश वै विदु: || ( ४/४ )

यमद्वारपर पहुँचनेके लिये जो मार्ग बताये गये हैं, वे अत्यंत दुर्गंधदायक मवादादि तथा रक्तादिसे परिव्याप्त हैं | अत: उस मार्गमें स्थित वैतरणी नदीको पार करनेके लिये वैतरणी गौका दान करना चाहिये | जो गौ सर्वांगमें काली हो, जिसके स्तन भी काले हों, उसे वैतरणी गौ माना गया है |

तिल, लोहा, स्वर्ण, कपास, लवण, सप्तधान्य, भूमि और गौ – ये पापसे शुद्धिके लिये पवित्रतामें एकसे बढकर एक हैं | इन आठ दानोंको महादान कहा जाता है | इनका दान उत्तम प्रकृतिवाले ब्राह्मणको ही देना चाहिये –

तिला लोहं हिरण्यं च कर्पासं लवणं तथा |

सप्तधान्य क्षितिर्गाव एकैक पावनं स्मृतम ||

एतान्यष्टौ महादानान्युत्तमाय द्विजातये | (४/७-८)

अब पददानका वर्णन सुनो | छत्र, जूता, वस्त्र, अंगूठी, कमण्डलु, आसन, पात्र और भोज्यपदार्थ – ये आठ प्रकारके पद हैं |

तिलपात्र, घृतपात्र, शय्या, उपस्कर तथा और भी जो कुछ अपनेको इष्ट हो, वह सब देना चाहिये | अश्व, रथ, भैंस, भोजन, वस्त्रका दान ब्राह्मणोंको करना चाहिये | अन्य दान भी अपनी शक्तिके अनुसार देना चाहिये |

हे पक्षिराज ! इस पृथ्वीपर जिसने पापका प्रायश्चित्त कर लिया है, वह दस प्रकारके दान भी दे चूका है, वैतरणी गौ एवं अष्टदान कर चूका है, तिलसे भरा पूर्ण पात्र, घीसे भरा हुआ पात्र, शय्यादान और विधिवत पददान करता है | तो वह नरकरूपी गर्भमें नहीं आता है अर्थात उसका पुनर्जन्म नहीं होता |

पण्डित लोग स्वतंत्र रूपसे भी लवण दान करनेकी इच्छा रखते हैं, क्योंकि यह लवण-रस विष्णुके शरीरसे उत्पन्न हुआ है, इस पृथ्वीपर मरणासन्न प्राणीके प्राण जब न निकल रहे हों तो उस समय लवण-रसका दान उसके हाथसे दिलवाना चाहिये; क्योंकि यह दान उसके लिये स्वर्गलोकके द्वार खोल देता है | मनुष्य स्वयं जो कुछ दान देता है, परलोकमें वह सब उसे प्राप्त होता है | यहाँ उसके आगे रखा हुआ मिलता है | हे पक्षिन ! जिसने यथाविधि अपने पापोंका प्रायश्चित्त कर लिये है, वही पुरुष है | वही अपने पापोंको भस्मसात करके स्वर्गलोकमें सुखपूर्वक निवास करता है |

हे खगराज ! गौका दूध अमृत है | इसलिये जो मनुष्य दूध देनेवाली गौका दान देता है, वह अमृतत्त्वको प्राप्त करता है | पहले कहे गये तिलादिक आठ प्रकारके दान देकर प्राणी गन्धर्वलोकमें निवास करता है | यमलोकका मार्ग अत्यधिक भीषण तापसे युक्त है, अत:छ्त्रदान करना चाहिये | छ्त्रदान करनेसे मार्गमें सुख प्रदान करनेवाली छाया प्राप्त होती है | जो मनुष्य इस जन्ममें पादुकाओंका दान देता है, वह ‘असिपत्रवन’ के मार्गको घोड़ेपर सवार होकर सुखपूर्वक पार करता है | भोजन और आसनका दान देनेसे प्राणीको परलोकगमनके मार्गमें सुखका उपभोग प्राप्त होता है | जलसे परिपूर्ण कमण्डलुका दान देनेवाला पुरुष सुखपूर्वक परलोकगमन करता है |

यमराजके दूत महाक्रोधी और महाभयंकर है | काले एवं पीले वर्णवाले उन दूतोंको देखनेमात्रसे भय लगने लगता है | उदारतापूर्वक वस्त्र-आभुषणादिका दान करनेसे वे यमदूत प्राणीको कष्ट नहीं देते हैं | तिलसे भरे हुए पात्रका जो दान ब्राह्मणको दिया जाता है, वह मनुष्यके मन, वाणी और शरीरके द्वारा किये गये त्रिविध पापोंका विनाश कर देता है | मनुष्य घृतपात्रका दान करनेसे रूद्रलोक प्राप्त करता है | ब्राह्मणको सभी साधनोंसे युक्त शय्याका दान करके मनुष्य स्वर्गलोकमें नाना प्रकारकी अप्सराओंसे युक्त विमानमें चढ़कर साथ हजार वर्षतक अमरावतीमें क्रीडा करके इन्द्रलोकके बाद गिरकर पुन: इस पृथ्वीलोकमें आकर राजाका पद प्राप्त करता है | जो मनुष्य काठी आयद उपकरणोंसे सजे-धजे, दोषरहित जवान घोडेका दान ब्राह्मणको देता है, उसको स्वर्गकी प्राप्ति होती है | हे खगेश ! दानमें दिये गये इस घोडेके शरीरमें जितने रोम होते है, उतने वर्ष ( कालतक) स्वर्गके लोकोंका भोग दानदाताको प्राप्त होता है | प्राणी ब्राह्मणको सभी उपकरणोंसे युक्त चार घोड़ोंवाले रथका दान देकरके राजसूय यज्ञका फल प्राप्त करता है | यदि कोई व्यक्ति सुपात्र ब्राह्मणको दुग्धवती, नवीन मेघके समान वर्णवाली, सुंदर जघन-प्रदेशसे युक्त और मनमोहक तिलकसे समन्वित भैंसका दान देता है तो वह परलोकमें जाकर अभ्युदयको प्राप्त करता है, इसमें कोई संदेह नहीं है |

तालपत्रसे बने हुए पंखेका दान करनेसे मनुष्यको परलोकगमनके मार्गमें वायुका सुख प्राप्त होता है | वस्त्र-दान करनेसे व्यक्ति परलोकमें शोभासम्पन्न शरीर और उस लोकके वैभवसे सम्पन्न हो जाता है | जो प्राणी ब्राह्मणको रस, अन्न तथा अन्य सामग्रियोंसे युक्त घरका दान देता है, उसके वंशका कभी विनाश नहीं होता है और वह स्वयं स्वर्गका सुख प्राप्त करता है | हे खगेन्द्र !इन बताये गये सभी प्रकारके दानोंमें प्राणीकी श्रद्धा तथा अश्रद्धासे आयी हुई दानकी अधिकता और कमीके कारण उसके फलमें श्रेष्ठता और लघुता आती है |

इस लोकमें जिस व्यक्तीने जल एवं रसका दान किया है, वह आपदकालमें आह्लादका अनुभव करता है | जिस मनुष्यने श्रद्धापूर्वक इस संसारमें अन्न-दान दिया है, वह परलोकमें अन्न-भक्षणके बिना भी वही तृप्ति प्राप्त करता है, जो उत्तमोत्तम अन्नके भक्षणसे प्राप्त होती है | मृत्युके संनिकट आ जानेपर यदि मनुष्य यथाविधि संन्यासाश्रमको ग्रहण कर लेता है, तो वह पुन: इस संसारमें नहीं आता, अपितु उसको मोक्ष प्राप्त हो जाता है |

यदि मृत्युके समीप पहुँचे हुए मनुष्यको लोग किसी पवित्र तीर्थमें ले जाते हैं और उसकी मृत्यु उसी तीर्थमें हो जाती हैं तो उसकी मुक्ति प्राप्त होती है तथा यदि प्राणी मार्गके बीच ही मर जाता है तो भी मुक्ति प्राप्त करता ही है, साथ ही उसको तीर्थतक ले जानेवाले लोग पग-पगपर यज्ञ करनेके समान फल प्राप्त करते हैं |

हे द्विज ! मृत्युके निकट आ जानेपर जो मनुष्य विधिवत उपवास करता है, वह भी मृत्युके पश्चात पुन: इस संसारमें नहीं लौटता है |

हे खगेश ! मृत्युके संनिकट होनेपर कौन-सा दान करना चाहिये | इस प्रश्नका उत्तर मैंने बता दिया है | मृत्यु और दाहके बीच मनुष्यके क्या कर्तव्य हैं ? इस प्रश्नका उत्तर अब तुम सुनो |

व्यक्तिको मरा हुआ जानकर उसके पुत्रादिक परिजनोंको चाहिये कि वे सभी शवको शुद्ध जलसे स्नान कराकर नवीन वस्त्रसे आच्छादित करें | तदनन्तर उसके शरीरमें चन्दन आदि सुगन्धित पदार्थोंका अनुलेप भी करें | उसके बाद जहाँ मृत्यु हुई है, उसी स्थानपर एकाद्दिष्ट ( एक पिंड दान करना ) श्राद्ध करना चाहिये | दाहकर्मके पूर्व शवको दाहके योग्य बनानेके लिये ऊपर बताये गये कर्म अनिवार्य है | इस एकोद्दिष्ट श्राद्धमें आसन तथा प्रोक्षण क्रिया होनी चाहिये, किन्तु आवाहन, अर्चन, पात्रालम्भन और अवगाहन- ये चार क्रियाएँ नहीं करनी चाहिये | उस समय पिंडदान अनिवार्य है, अन्नदानका संकल्प भी हो सकता है | रेखाकरण, प्रत्यवनेजन नहीं होता और दिये गये पदार्थके अक्षय्यकी कामना करनी चाहिये | अक्षय्योदक दान देना चाहिये | स्वधावाचन, आशीर्वाद और तिलक – ये तीन नहीं होने चाहिये | उड़दसे परिपूर्ण घट और लोहेकी दक्षिणा ब्राह्मणको प्रदान करनेका विधान है | तत्पश्चात पिंड हिलाना चाहिये | किन्तु उस समय आच्छादन, विसर्जन तथा स्वस्तिवाचन – ये तीन वर्जित है | हे खगेश ! मरणस्थान, द्वार, चत्वर, विश्रामस्थान, काष्ठ-चयन और अस्थि-संचयन- ये छ: पिंडदानके स्थान हैं |

प्राणीकी मृत्यु जिस स्थानपर होती है, वहाँपर दिये जानेवाले पिंडका नाम ‘शव’ है, उससे भुमिदेवताकी तुष्टि होती है | द्वारपर जो पिंड दिया जाता है उसे ‘पान्थ’ नामक पिंड कहते हैं | इस कर्मको करनेसे वास्तुदेवताको प्रसन्नता होती है | चत्वर अर्थात चौराहेपर ‘खेचर’ नामक पिंडका दान करनेपर भूतादिक, गगनचारी देवतागण प्रसन्न होते हैं | शवके विश्राम भूमिमें ‘भूत–संज्ञक’ पिंडका दान करनेसे दसों दिशाओंको संतुष्टि प्राप्त होती है | चितामें ‘साधक’ नामका और अस्थि-संचयनमें ‘प्रेत-संज्ञक’ पिंड दिया जाता है |

शवयात्राके समय पुत्रादिक परिजन तिल, कुश, घृत और ईंधन लेकर ‘यमगाथा’ अथवा वेदके ‘यमसूक्त’ का पाठ करते हुए श्मशानभूमिकी ओर जाते हैं | प्रतिदिन गौ, अश्व, पुरुष और बैल आदि चराचर प्राणियोंको अपनी ओर खींचते हुए यम संतुष्ट नहीं होते हैं, जिस प्रकार कि मद्य पीनेवाला संतुष्ट नहीं होता |

‘ॐ अपेतेति’ इस यमसूक्त का अथवा ‘यमगाथा’ का पाठ शवयात्राके मार्गमें करना चाहिये |

अहरर्नीयमानो गामश्वं पुरुषं वृषम | वैवस्वतो न तृप्येत सुरया त्विव दुर्मति : || (४/५३)

इसीका नाम यमगाथा है | सभी बन्धु-बाँधवोंको दक्षिण दिशामें स्थित श्मशानकी वनभूमिमें शवको ले जाना चाहिये | हे पक्षिन ! पूर्वोक्त विधिसे मार्गमें दो श्राद्ध करना चाहिये | उसके बाद श्मशानभूमिमें पहुँचकर धीरेसे शवको पृथ्वीपर उतारते हुए दक्षिण दिशाकी ओर सिर स्थापित कर चिताभूमिमें पूर्वोक्त विधिके अनुसार श्राद्ध करना चाहिये | शव-दाहकी क्रियाके लिये पुत्रादिक परिजनोंको स्वयं तृण, काष्ठ, तिल और घृत आदि ले जाना चाहिये | शुदोंके द्वारा श्मशानमें पहुँचायी गयी वस्तुओंसे वहाँ किया गया सम्पूर्ण कर्म निष्फल हो जाता है | वहाँपर सभी कर्म अपसव्य और दक्षिणाभिमुख होकर करना चाहिये | हे पक्षिराज ! शास्त्रसम्मत विधिके अनुसार एक वेदिका निर्माण करना चाहिये | तदनन्तर प्रेतवस्त्र अर्थात कफनको दो भागोंमें फाड़ कर उसके आधे भागसे उस शवको ढक दे और दूसरे भागको श्मशानमें निवास करनेवाले प्राणीके लिये भूमिपर ही छोड़ दे | उसके बाद पूर्वोक्त विधिके अनुसार मरे हुए व्यक्तिके हाथमें पिंडदान करे | तदनन्तर शवके सम्पूर्ण शरीरमें घृतका लेप करना चाहिये |

नारायण नारायण

गरुड़पुराण -धर्मकाण्ड – प्रेतकल्प -अध्याय- ३

garoodh puran

|| ॐ श्रीपरमात्मने नम: ||

गरुडपुराण

धर्मकाण्ड – प्रेतकल्प

अध्याय – ३

नरकोंका स्वरूप, नरकोंमें प्राप्त होनेवाली विविध यातनाएँ तथा नरकमें गिरानेवाले कर्म एवं जीवकी शुभाशुभ गति

श्रीसूतजीने कहा – पूछे गये अपने प्रश्नोंका सम्यक उत्तर सुनकर पक्षिराज गरुड अतिशय आल्हादित हो भगवान विष्णुसे नरकोंके स्वरूपको जाननेकी इच्छा प्रकट की |

गरुडने कहा – हे उपेन्द्र ! आप मुझे उन नरकोंका स्वरूप और भेद बतायें, जिनमें जाकर पापीजन अत्यधिक दुःख भोगते हैं |

श्रीभगवानने कहा – हे अरुणके छोटे भाई गरुड ! नरक तो हजारोंकी संख्यामें हैं | सभीको विस्तृत रूपमें बताना संभव नहीं हैं | अत: मैं मुख्य-मुख्य नरकोंको बता रहा हूँ |

हे पक्षिराज ! तुम मुझसे यह जान लो कि ‘रौरव’ नामक नरक अन्य सभीकी अपेक्षा प्रधान है | झूठी गवाही देनेवाला और झूठ बोलनेवाला व्यक्ति रौरव नरकमें जाता है | इसका विस्तार दो हजार योजन है | जाँघभरकी गहराईमें वहाँ दुस्तर गड्डा है | दहकते हुए अंगारोंसे भरा हुआ वह गड्डा पृथ्वीके समान बराबर (समतल भूमि-जैसा) दीखता है | तीव्र अग्निसे वहाँकी भूमि भी तप्तांगार जैसी है | उसमें यमके दूत पापियोंको डाल देते हैं | उस जलती हुई अग्निसे संतप्त होकर पापी उसीमें इधर-उधर भागता है | उसके पैरमें छाले पड़ जाते हैं, जो फुटकर बहने लगते हैं | रात – दिन वह पापी वहाँ पैर उठा-उठाकर चलता है | इस प्रकार वह जब हजार योजन उस नरकका विस्तार पार कर लेता है, तब उसे पापकी शुद्धिके लिये उसी प्रकारके दूसरे नरकमें भेजा जाता है |

हे पक्षिन ! इस प्रकार मैंने तुम्हें रौरव नामक प्रथम नरककी बात बता दी | अब तुम ‘महारौरव’ नामक नरककी बात सुनो | यह नरक पाँच हजार योजनमें फैला हुआ है | वहाँकी भूमि ताँबेके समान वर्णवाली है | उसके नीचे अग्नि जलती रहती है | वह भूमि विद्युत्-प्रभाके समान कान्तिमान है | देखनेमें वह पापीजनोंको महाभयंकर प्रतीत होती है | यमदूत पापी व्यक्तिके हाथ-पैर बाँधकर उसे उसीमें लुढ़का देते है और वह लुढ़कता हुआ उसमें चलता है | मार्गमें कौआ, बगुला, भेड़िया, उलूक, मच्छर और बिच्छू आदि जीव-जन्तु क्रोधातुर होकर उसे खानेके लिये तत्पर रहते हैं | वह उस जलती हुई भूमि एवं भयंकर जीव-जन्तुओंके आक्रमणसे इतना संतप्त हो जाता है कि उसकी बुद्धि ही भ्रष्ट हो जाती है | वह घबडाकर चिल्लाने लगता है तथा बार-बार उस कष्टसे बेचैन हो उठता है | उसको वहाँ कहींपर भी शान्ति नहीं प्राप्त होती है | इस प्रकार उस नरकलोकके कष्टको भोगते हुए पापीके जब हजारों वर्ष बीत जाते हैं, तब कहीं जाकर मुक्ति प्राप्त होती है |

इसके बाद जो नरक है उसका नाम ‘अतिशीत’ है | वह स्वभावत: अत्यंत शीतल है | महारौरव नरकके समान ही उसका भी विस्तार बहुत लंबा है | वह गहन अन्धकारसे व्याप्त रहता है | असह्य कष्ट देनेवाले यमदूतोंके द्वारा पापीजन लाकर यहाँ बाँध दिये जाते हैं | अत: वे एक दूसरेका आलिंगन करके वहाँकी भयंकर ठंडकसे बचनेका प्रयास करते हैं | उनके दाँतोमें कटकटाहट होने लगती है | हे पक्षिराज ! उनका शरीर वहाँकी उस ठंडकसे काँपने लगता है | वहाँ भूख-प्यास बहुत अधिक लगती है | इसके अतिरिक्त भी अनेक कष्टोंका सामना उन्हें वहाँ करना पड़ता है | वहाँ हिमखंडका वहन करनेवाली वायु चलती है, जो शरीरकी हड्डियोंको तोड़ देती है | वहाँके प्राणी भूखसे त्रस्त होकर मज्जा, रक्त और गल रही हड्डियोंको खाते हैं | परस्पर भेंट होनेपर वे सभी पापी एक-दूसरे का आलिंगन कर भ्रमण करते रहते हैं | इस प्रकार उस तमसावृत्त नरकमें मनुष्यको बहुत-से कष्ट झेलने पड़ते हैं |

हे पक्षिश्रेष्ठ ! जो व्यक्ति अन्यान्य असंख्य पाप करता है, वह इस नरकके अतिरिक्त ‘निकृन्तन’ नामसे प्रसिद्ध दूसरे नरकमें जाता है | हे खगेन्द्र ! वहाँ अनवरत कुम्भकारके चक्रके समान चक्र चलते रहते है, जिनके ऊपर पापीजनोंको खड़ा करके यमके अनुचरोंके द्वारा अँगुलिमें स्थित कालसूत्रसे उनके शरीरको पैरसे लेकर शिरोभागतक छेदा जाता है | फिर भी उनका प्राणांत नहीं होता | इसमें शरीरके सैकड़ों भाग टूट-टूट कर छिन्न-भिन्न हो जाते हैं और पुन: इकट्टे हो जाते हैं | इस प्रकार यमदूत पापकर्मियोंको वहाँ हजारों वर्षतक चक्कर लगवाते रहते हैं | जब सभी पापोंका विनाश हो जाता है, तब कहीं जाकर उन्हें उस नरकसे मुक्ति प्राप्त होती है |

‘अप्रतिष्ठ’ नामका एक अन्य नरक है | वहाँ जानेवाले प्राणी असह्य दुःखका भोग भोगते हैं | वहाँ पापकर्मियोंके दुःखके हेतुभूत चक्र और रहट लगे रहते हैं | जबतक हजारों वर्ष पुरे नहीं हो जाते, तबतक वह रुकता नहीं | जो लोग उस चक्रपर बाँधे जाते हैं, वे जलके घटकी भाँति उसपर घूमते रहते हैं | पुन: रक्तका वमन करते हुए उनकी आँते मुखकी ओरसे बाहर आ जाती हैं और नेत्र आँतोंमें घुस जाते हैं | प्राणियोंको वहाँ जो दुःख प्राप्त होते हैं, वे बड़े ही कष्टकारी है |

हे गरुड ! अब ‘असिपत्रवन’ नामक दूसरे नरकके विषयमें सुनो ! यह नरक एक हजार योजनमें फैला हुआ है | इसकी सम्पूर्ण भूमि अग्निसे व्याप्त होनेके कारण अहर्निश जलती रहती है | इस भयंकर नरकमें सात-सात सूर्य अपनी सहस्त्र-सहस्त्र रश्मियोंके साथ सदैव तपते रहते हैं, जिनके संतापसे वहाँके पापी हर क्षण जलते ही रहते हैं | इसी नरकके मध्य एक चौथाई भागमें ‘शीतस्निग्धपत्र’ नामक वन है | हे पक्षिश्रेष्ठ ! उसमें वृक्षोंसे टूटकर गिरे फल और पत्तोंके ढेर लगे रहते हैं | मांसाहारी बलवान कुत्ते उसमें विचरण करते रहते हैं | वे बड़े-बड़े मुखवाले, बड़े-बड़े दाँतोवाले तथा व्याघ्रकी तरह महाबलवान हैं | अत्यंत शीत एवं छायासे व्याप्त उस नरकको देखकर भूख-प्याससे पीड़ित प्राणी दु:खी होकर करुण क्रन्दन करते हुए वहाँ जाते हैं | तापसे तपती हुई पृथ्वीकी अग्निसे पापियोंके दोनों पैर जल जाते हैं, अत्यंत शीतल वायु बहने लगती है, जिसके कारण उन पापियोंके ऊपर तलवारके समान तीक्ष्ण धारवाले पत्ते गिरते हैं | जलते हुए अग्नि-समूहसे युक्त भूमिमें पापीजन छिन्न-छिन्न होकर गिरते हैं | उसी समय वहाँके रहनेवाले कुत्तोंका आक्रमण भी उन पापियोंपर होने लगता है | शीघ्र ही वे कुत्ते रोते हुए उन पापियोंके शरीरके मांसको खण्ड-खण्ड करके खा जाते हैं |

हे तात ! असिपत्रवन नामक नरकके विषयको मैंने बता दिया | अब तुम महाभयानक ‘तप्तकुम्भ’ नामवाले नरकका वर्णन मुझसे सुनो-इस नरकमें चारों ओर फैले हुए अत्यंत गरम-गरम घड़े हैं | उनके चारों ओर अग्नि प्रज्वलित रहती है, वे उबलते हुए तेल और लौहके चूर्णसे भरे रहते हैं | पापियोंको ले जाकर उन्हींमें आँधे मुख डाल दिया जाता है | गलती हुई मज्जारूपी जलसे युक्त उसीमें फूटते हुए अंगोंवाले पापी काढ़ाके समान बना दिये जाते है | तदनन्तर भयंकर यमदूत नुकीले हाथियारोंसे उन पापियोंकी खोपड़ी, आँखों तथा हड्डियोंको छेद-छेदकर नष्ट करते हैं | गिद्ध बड़ी तेजीसे वहाँ आकर उनपर झपट्टा मारते हैं | उन उबलते हुए पापियोंको अपनी चोंचसे खींचते हैं और फिर उसीमें छोड़ देते हैं | उसके बाद यमदूत उन पापियोंके सिर, स्नायु, द्रवीभूत मांस, त्वचा आदिको जल्दी-जल्दी करछुलसे उसी तेलमें घूमाते हुए उन महापापियोंको काढ़ा बना डालते हैं |

हे पक्षिन ! यह तप्तकुम्भ-जैसा है, उस बातको विस्तारपूर्वक मैंने तुम्हें बता दिया | सबसे पहले नरकको रौरव और दूसरे उसके बादवालेको महारौरव नरक कहा जाता है | तीसरे नरकका नाम अतिशीत एवं चौथेका नाम निकृन्तण है | पाँचवाँ नरक अप्रतिष्ठ, छठा असिपत्रवन एवं सातवाँ तप्तकुम्भ है | इस प्रकार ये सात प्रधान नरक है | अन्य भी बहुत-से नरक सुने जाते हैं, जिनमें पापी अपने कर्मोंके अनुसार जाते हैं | यथा – रोध, सूकर, ताल, तप्तकुम्भ, महाज्वाल, शबल, विमोहन, कृमि, कृमिभक्ष, लालाभक्ष, विषजन, अध्:शिर, पूयवह, रूधिरांध, विडभुज, वैतरणी, असिपत्रवन, अग्निज्वाल, महाघोर, संदंश, अभोजन, तमस, कालसूत्र, लौहतापी, अभिद, अप्रतिष्ठ तथा अवीचि आदि | – ये सभी नरक यमके राज्यमें स्थित है | पापीजन पृथक-पृथक रूपसे उनमें जाकर गिरते हैं | रौरव आदि सभी नरकोंकी अवस्थिति इस पृथ्वीलोकसे नीचे मानी गयी है | जो मनुष्य गौकी हत्या, भ्रूणहत्या और आग लगानेका दुष्कर्म करता है, वह ‘रोध’ नामक नरकमें गिरता है | जो ब्रह्मघाती, मद्यपी तथा सोनेकी चोरी करता है, वह ‘सूकर’ नामके नरकमें गिरता है | क्षत्रिय और वैश्यकी हत्या करनेवाला ‘ताल’ नामक नरकमें जाता है |

जो मनुष्य ब्रह्महत्या एवं गुरुपत्नी तथा बहनके साथ सहवास करनेकी दुश्चेष्टा करता है, वह ‘तप्तकुम्भ’ नामक नरकमें जाता है | जो असत्य-सम्भाषण करनेवाले राजपुरुष है, उनको भी उक्त नरककी ही प्राप्ति होती है | जो प्राणी निषिद्ध पदार्थोका विक्रेता, मदिराका व्यापारी है तथा स्वामिभक्त सेवकका परित्याग करता है, वह ‘तप्तलौह’ नामक नरकको प्राप्त करता है | जो व्यक्ति कन्या या पुत्रवधूके साथ सहवास करनेवाला है, जो वेद-विक्रेता और वेदनिन्दक है, वह अन्तमें ‘महाज्वाल’ नामक नरकका वासी होता है | जो गुरुका अपमान करता है, शब्दबाणसे उनपर प्रहार करता है तथा अगम्या स्त्रीके साथ मैथुन करता हैं, वह ‘शबल’ नामक नरकमें जाता है |

शौर्य-प्रदर्शनमें जो वीर मर्यादाका परित्याग करता है, वह ‘विमोहन’ नामक नरकमें गिरता है | जो दूसरेका अनिष्ट करता है, उसे ‘कृमिभक्ष’ नामक नरककी प्राप्ति होती है | देवता और ब्राह्मणसे द्वेष रखनेवाला प्राणी ‘लालाभक्ष’ नरकमें जाता है | जो परायी धरोहरका अपहर्ता है तथा जो बाग़-बगीचों में आग लगाता है, उसे ‘विषजन’ नामक नरककी प्राप्ति होती है | जो मनुष्य असत-पात्रसे दान लेता है तथा असत प्रतिग्रह लेनेवाला, अयाज्ययाजक और जो नक्षत्रसे जिविकोपार्जन करता है, वह मनुष्य ‘अध्:शिर’ नरकमें जाता है | जो मदिरा, मांस आदि पदार्थोंका विक्रेता है, वह ‘पूयवह’ नामक घोर नरकमें गिरता है | जो कुक्कुट, बिल्ली, सूअर, पक्षी, मृग, भेंडको बाँधता हैं, वह भी उसी प्रकारके नरकमें जाता है | जो गृहदाही है, जो विषदाता है, जो कुण्डाशी है, जो सोमविक्रेता है, जो मद्यपी है, जो मांसभोजी है तथा जो पशुहन्ता है, वह व्यक्ति ‘रूधिरांध’ नामक नरकमें जाता है, ऐसा विद्वानोंका अभिमत है | एक ही पंक्तिमें बैठे हुए किसी प्राणीको धोखा देकर जो लोग विष खिला देते है, उन सभीको ‘विडभुज’ नामक घोर नरक प्राप्त होता है | मधु निकालनेवाला मनुष्य ‘वैतरणी’ और क्रोधी ‘मूत्रसंज्ञक’ नामक नरकमें जाता है | अपवित्र और क्रोधी व्यक्ति ‘असिपत्रवन’ नामक नरकमें जाता है | मृगोंका शिकार करनेवाला व्याध ‘अग्निज्वाल’ नामक नरकमें जाता है, जहाँ उसके शरीरको नोच-नोचकर कौवे खाते है |

यज्ञकर्ममें दीक्षित होनेपर जो व्रतका पालन नहीं करता, उसे उस पापसे ‘संदंश’ नरकमें जाना पड़ता है | यदि स्वप्नमें भी संन्यासी या ब्रह्मचारी स्खलित हो जाते हैं तो वे ‘अभोजन’ नामक नरकमें जाते हैं | जो लोग क्रोध और हर्षसे भरकर वर्णाश्रम-धर्मके विरुद्ध कर्म करते हैं, उन सबको नरकलोककी प्राप्ति होती है |

सबसे ऊपर भयंकर गर्मीसे संतप्त रौरव नामक नरक है | उसके नीचे अत्यंत दुःखदायी महारौरव है | उस नरकसे नीचे शीतल और उस नरकके बाद नीचे’तामस’ नरक माना गया है | इसी प्रकार बताये गये क्रमसे अन्य नरक भी नीचे ही है |

इन नरकलोकों के अतिरिक्त भी सैकड़ों नरक हैं, जिनमें पहुँचकर पापी प्रतिदिन पकता है, जलता है, गलत है, विदीर्ण होता है, चूर्ण किया जाता है, गीला होता है, क्वाथ बनाया जाता है, जलाया जाता है और कहीं वायुसे प्रताड़ित किया जाता है – ऐसे नरकोंमें एक दिन सौ वर्षके समान होता है | सभी नरकोंसे भोग भोगनेके बाद पापी तिर्यक-योनिमें जाता है | तपश्चात उसको कृमि, कीट, पतंग स्थावर तथा एक खुरवाले गधेकी योनि प्राप्त होती है | तदनन्तर मनुष्य जंगली हाथी आदिकी योनियोंमें जाकर गौकी योनिमें पहुँचता है | हे गरुड ! गधा, घोडा, खच्चर, गौर मृग, शरभ और चमरी – ये छ: योनियाँ एक खुरवाली होती हैं | इनके अतिरिक्त बहुत-सी पापाचार-योनियाँ भी हैं, जिनमें जीवात्माको कष्ट भोगना पड़ता है | उन सभी योनियोंको पाकर प्राणी मनुष्य-योनिमें आता है और कुबड़ा, कुत्सित, वामन, चाण्डाल और पुल्कश आदि नर-योनियोंमें जाता है | अवशिष्ट पाप-पुण्यसे समन्वित जीव बार-बार गर्भमें जाते हैं और मृत्युको प्राप्त होता है | उन सभी पापोंके समाप्त हो जानेके बाद प्राणीको शुद्र, वैश्य तथा क्षत्रिय आदिको आरोहिणी-योनि प्राप्त होती है | कभी-कभी वह सत्कर्मसे ब्राह्मण, देव और इन्द्रत्वके पदपर भी पहुँच जाता है |

हे गरुड ! यमद्वार निर्दिष्ट योनिमें पुण्यगति प्राप्त करनेमें जो प्राणी सफल हो जाते हैं, वे सुंदर-सुंदर गीत गाते, वाद्य बजाते और नृत्यादि करते हुए प्रसन्नचित्त गन्धर्वोके साथ, अच्छे-से-अच्छे हार, नूपुर आदि नाना प्रकारके आभूषणोंसे युक्त, चन्दन आदिकी दिव्य सुगंध और पुष्पोंके हारसे सुवासित एवं अलंकृत चमचमाते हुए विमानमें स्वर्गलोकको जाते हैं | पुण्य-समाप्तिके पश्चात जब वे वहाँसे पुन: पृथ्वीपर आते हैं तो राजा अथवा महात्माओंके घरमें जन्म लेकर सदाचारका पालन करते हैं | समस्त भोगोंको प्राप्त करके पुन: स्वर्गको प्राप्त करते हैं अन्यथा पहलेके समान आरोहिणी-योनिमें जन्म लेकर दुःख भोगते हैं |

मृत्युलोकमें जन्म लेनेवाले प्राणीका मरना तो निश्चित है | पापियोंका जीव अधोमार्गसे निकलता है | तदनन्तर पृथ्वीतत्त्वमें पृथ्वी, जलतत्वमें जल, तेजतत्त्वमें तेज, वायुतत्त्वमें वायु, आकाशतत्त्वमें आकाश तथा सर्वव्यापी मन चन्द्र्में जाकर विलीन हो जाता है | हे गरुड ! शरीरमें काम, क्रोध एवं पंचेन्द्रियाँ है | इन सभीको शरीरमें रहनेवाले चोरकी संज्ञा दी गयी है | काम, क्रोध और अहंकार नामक विकार भी उसीमें रहनेवाले चोर हैं | उन सभीका नायक मन है | इस शरीरका संहार करनेवाला काल है, जो पाप और पुण्यसे जुड़ा रहता है | जिस प्रकार घरके जल जानेपर व्यक्ति अन्य घरकी शरण लेता है, उसी प्रकार पंचेन्द्रियोंसे युक्त जीव इन्द्रियाधिष्ठातृ देवताओं के साथ शरीरका परित्याग कर नये शरीरमें प्रविष्ट हो जाता है | शरीरमें रक्त-मज्जादि सात धातुओंसे युक्त यह षाटकौशिक शरीर है | सभी प्राण, अपान आदि पंच वायु, मल-मूत्र, व्याधियाँ, पित्त, श्लेष्म, मज्जा, मांस, मेदा, अस्थि, शुक्र और स्नायु – ये सभी शरीरके साथ ही अग्निमें जलकर भस्म हो जाते हैं |

हे तार्क्ष्य ! प्राणियोंके विनाशको मैंने तुम्हें बता दिया | अब उनके इस शरीरका जन्म पुन: कैसे होता है, उसको मैं तुम्हें बता रहा हूँ |

यह शरीर नसोंसे आबद्ध, श्रोत्रादिक इन्द्रियोंसे युक्त और नवद्वारोंसे समन्वित है | यह सांसारिक विषय-वासनाओंके प्रभावसे व्याप्त, काम-क्रोधादि विकारसे समन्वित, राग-द्वेषसे परिपूर्ण तथा तृष्णा नामक भयंकर चोरसे युक्त है | यह लोभरुपी जालमें फँसा हुआ और मोहरूपी वस्त्रसे ढका हुआ है | यह मायासे भलीभाँति आबद्ध एवं लोभसे अधिष्ठित पुरके समान है | सभी प्राणियोंका शरीर इनसे व्याप्त है | जो लोग अपनी आत्माको नहीं जानते हैं, वे पशुओंके समान है |

हे गरुड ! चौरासी लाख योनियाँ है और उद्भिज्ज (पृथ्वीमें अंकुरित होनेवाली वनस्पतियाँ), स्वेदज ( पसीनेसे जन्म लेनेवाले जुएँ और लीख आदि कीट), अण्डज ( पक्षी) तथा जरायुज ( मनुष्य) में यह सम्पूर्ण सृष्टि विभक्त है |

नारायण नारायण

गरुड़पुराण -धर्मकाण्ड – प्रेतकल्प -अध्याय – २

garoodh puran

|| ॐ श्रीपरमात्मने नम: ||

गरुडपुराण

धर्मकाण्ड – प्रेतकल्प

अध्याय – २

मरणासन्न व्यक्तिके कल्याणके लिये किये जानेवाले कर्म, मृत्युसे पूर्वकी स्थिति तथा कर्मविपाकका वर्णन

श्रीकृष्णने कहा – हे भद्र ! आपने मनुष्योंके हितमें बहुत ही अच्छी बात पूछी है | सावधान होकर इस समस्त और्ध्वदैहिक क्रियाको भलीभाँति सुनें |

हे गरुड ! जो सम्यक रूपसे भेदरहित है, जिसका वर्णन श्रुतियों और स्मृतियोंमें हुआ है, जिसको इन्द्रादि देवता, योगीजन और योगमार्गका चिंतन करनेवाले विद्वान नहीं देख सके हैं, जो गुह्यातिगुह्य है, ऐसे उस प्रधान तत्त्वको जिसे मैंने अभीतक किसी अन्यसे नहीं कहा है, तुम मेरे भक्त हो, इसलिये मैं तुम्हें बता रहा हूँ |

हे वैनतेय ! इस संसारमें पुत्रहीन व्यक्तिकी गति नहीं है, उसको स्वर्ग प्राप्त नहीं होता है | अत: शास्त्रानुसार यथायोग्य उपायसे पुत्र उत्पन्न करना ही चाहिये | यदि मनुष्यको मोक्ष नहीं मिलता है तो पुत्र नरकसे उसका उद्धार कर देता है | पुत्र और पौत्रको मरे हुए प्राणीको कंधा देना चाहिये तथा उसक यथाविधान अग्निदाह करना चाहिये | शवके नीचे पृथ्वीपर तिलके सहित कुश बिछानेसे शवकी आधारभूत भूमि उस ऋतूमती नारीके समान हो जाती है, जो प्रसवकी योग्यता रखती है | मृतकके मुखमें पंचरत्न डालना बीजवपनके समान है, जिससे आगे जीवकी शुभगतिका निश्चय होता है | जैसे पुष्प ( ऋतूकालमें स्त्रियोंका रजोदर्शन ) न होनेपर गर्भधारण सम्भव नहीं है, वैसे ही शवभूमि भी तिल-कुश आदिके बिना जीवकी शुभ योनिमें कारण नहीं बन पाती | इसीलिये श्रद्धापूर्वक तिल, कुश, पंचरत्न आदिका यथाविधान विनियोग आवश्यक है |

गोबरसे भूमिको सबसे पहले लीपना चाहिये, तदनन्तर उसके ऊपर तिल और कुश बिछाना चाहिये | उसके बाद आतुर व्यक्तिको भूमिपर कुशासनके ऊपर सुला देना चाहिये | ऐसा करनेसे वह प्राणी अपने समस्त पापोंको जला कर पापमुक्त हो जाता है | शवके नीचे बिछाये गये कुशसमूह निश्चित ही मृत्युग्रस्त प्राणीको स्वर्ग ले जाते हैं, इसमें संशय नहीं है | जहाँ पृथ्वीपर मल-मुत्रादिका लेप नहीं है वहाँ वह सदा पवित्र है और जहाँ मल-मुत्रादिका लेप है, वहाँ गोमयसे लेप करनेपर वह शुद्ध होती है | गोबरसे बिना लिपि हुई भूमिपर सुलाये गये मरणासन्न व्यक्तिमें यक्ष, पिशाच एवं राक्षस-कोटिके क्रूरकर्मी दुष्ट लोग प्रविष्ट हो जाते हैं | मरणासन्नकी मुक्तिके लिये उसे जलसे बनाये गये मंडलवाली भूमिपर ही सुलाना चाहिये, क्योंकि नित्य-होम, श्राद्ध, पादप्रक्षालन, ब्राह्मणोंकी अर्चा एवं भूमिका मंडलीकरण मुक्तिके हेतु माने गये हैं | बिना लिपि-पुती मंडलहीन भूमिपर मरणासन्न व्यक्तिको नहीं सुलाना चाहिये | भूमिपर बनाये गये ऐसे मंडलमें ब्रह्मा, विष्णु, रूद्र, लक्ष्मी तथा अग्नि आदि देवता विराजमान हो जाते हैं, अत: मंडलका निर्माण अवश्य करना चाहिये | मंडलविहीन भूमिपर प्राण-त्याग करनेपर वह चाहे बालक हो, चाहे वृद्ध हो और चाहे जवान हो, उसको अन्य योनि नहीं प्राप्त होती है | हे तार्क्ष्य ! उसकी जीवात्मा वायुके साथ भटकती रहती है | उस प्रकारकी वायुभूत जीवात्माके लिये न तो श्राद्धका विधान है और न तो जलतर्पणकी क्रिया ही बतायी गयी है |

हे गरुड ! तिल मेरे पसीनेसे उत्पन्न हुए है | अत: तिल बहुत ही पवित्र हैं | तिलका प्रयोग करनेपर असुर, दानव और दैत्य भाग जाते हैं | तिल श्वेत, कृष्ण और गोमूत्रवर्ण के समान होते हैं | ‘वे मेरे शरीरके द्वारा किये गये समस्त पापोंको नष्ट करें |’ ऐसी भावना करनी चाहिये | एक ही तिलका दान स्वर्णके बत्तीस सेर तिलके दानके समान है | तर्पण, दान एवं होममें दिया गया तिलका दान अक्षय होता है | कुश मेरे शरीरके रोमोंसे उत्पन्न हुए हैं और तिलकी उत्पत्ति मेरे पसीनेसे हुई है | इसीलिये देवताओंकी तृप्तिके लिये मुख्यरूपसे कुशकी और पितरोंकी तृप्तिके लिये तिलकी आवश्यकता होती है | देवताओं और पितरोंकी तृप्ति विश्वके लिये उपजीव्य होनेके कारण विश्वकी तृप्तिमें हेतु हैं | अत: अपसव्य आदि श्राद्धकी जो विधियाँ बतायी गयी हैं, उन्हीं विधियोंके अनुसार मनुष्यको ब्रह्मा, देवदेवेश्वर तथा पितृजनोंको संतृप्त करना चाहिये | अपसव्य आदि होकर ब्रह्मा, पितर और देवेश्वर तृप्त होते हैं | अपसव्य होकर कर्म करनेसे पितरोंको संतृप्ति होती हैं |

कुशके मूलभागमें ब्रह्मा, मध्यभागमें विष्णु तथा अग्रभागमें शिवको जानना चाहिये; ये तीनो देव कुशमें प्रतिष्ठित माने गये हैं | हे पक्षिराज ! ब्राह्मण, मंत्र, कुश, अग्नि और तुलसी – ये बार-बार समर्पित होनेपर भी पर्युषित नहीं माने जाते, कभी निर्माल्य अर्थात बासी नहीं होते | इनका पूजामें बारम्बार प्रयोग किया जा सकता है | हे खगेन्द्र ! तुलसी, ब्राह्मण, गौ, विष्णु तथा एकादशीव्रत – ये पाँचो संसारसागरमें डूबते हुए लोगोंकी नौकाके समान पार कराते हैं | हे पक्षिश्रेष्ठ ! विष्णु, एकादशीव्रत, गीता, तुलसी, ब्राह्मण और गौ – ये छ: इस असार-संसारमें लोगोंको मुक्ति प्रदान करनेके साधन हैं, यह षट्पदी कहलाती है –

दर्भमूले स्थितो ब्रह्मा मध्ये देवो जनार्दन: ||

दर्भाग्रे शंकरं विद्यात त्रयो देवा: कुशे स्मृता: |

विप्रा मंत्रा: कुशा वह्रिस्तुलसी च खगेश्वर ||

नैते निर्माल्यतां यान्ति क्रियमाणा: पुन: पुन: |

तुलसी ब्राह्मणा गावो विष्णरेकादशी खग ||

पंच प्रवहणान्येव भवाब्धौ मज्जतां नृणाम |

विष्णुरेकादशी गीता तुलसी विप्रधेनव: ||

असारे दुर्गसंसारे षट्पदी मुक्तिदायिनी | ( २/११-२५ )

जैसे तिलकी पवित्रता अतुलनीय होती है, उसी प्रकार कुश और तुलसी भी अत्यंत पवित्र होती हैं | ये तीनों पदार्थ मरणासन्न व्यक्तिको दुर्गतिसे उबार लेते हैं | दोनों हाथोंसे कुश उखाड़ना चाहिये और उसे पृथ्वीपर रखकर जलसे प्रोक्षित करना चाहिये | जिसके हाथोंमें कुशाएँ हैं और जो कुशसे परिवेष्टित कर दिया जाता है, वह मन्त्रहीन होनेपर भी विष्णुलोकको प्राप्त करता है | इस असार संसारसागरमें भूमिको गोबरसे लीपकर उसपर मृत मनुष्यको सुलानेसे और कुशासनपर स्थित करनेसे तथा विशुद्ध अग्निमें दाह करनेसे उसके समस्त पापोंका नाश हो जाता है |

लवण और उसका रस दिव्य है, वह प्राणियोंकी समस्त कामनाओंकी सिद्ध करनेवाला है | लवणके बिना अन्न-रस उत्कट अर्थात न अभिव्यक्त होते हैं और न सुस्वादु होते हैं | इसीलिये लवण-रस पितरोंको प्रिय होता है और स्वर्गको प्रदान करनेवाला है | यह लवण-रस भगवान विष्णुके शरीरसे उत्पन्न हुआ है | इस बातको जाननेवाले योगीजन, लवणके साथ दान करनेको कहते हैं | इस पृथ्वीपर यदि ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, स्त्री तथा शुद्र वर्णके आतुर व्यक्तिके प्राण न निकलते हों तो उसके लिये स्वर्गका द्वार खोलनेके लिये लवणका दान देना चाहिये |

हे पक्षिन्द्र ! अब मृत्युके स्वरूपको विस्तारपूर्वक सुनें | मृत्यु ही काल है, उसका समय आ जानेपर जीवात्मासे प्राण और देहका वियोग हो जाता है | मृत्यु अपने समयपर आती है | मृत्युकष्टके प्रभावसे प्राणी अपने किये कर्मोंको एकदम भूल जाता है | हे गरुड ! जिस प्रकार वायु मेघमंडलोंको इधर-उधर खींचता है, उसीप्रकार प्राणी कालके वशमें रहता है | सात्त्विक, राजस और तामस – ये सभी भाव कालके वशमें हैं | प्राणियों में वे कालके अनुसार अपने-अपने प्रभावका विस्तार करते हैं | हे सर्पहन्ता गरुड ! सूर्य, चन्द्र, शिव, वायु, इंद्र, अग्नि, आकाश, पृथ्वी, मित्र, औषधि, आठों वसु, नदी, सागर और भाव-अभाव – ये सभी कालके अनुसार यथासमय उद्भूत होते हैं, बढ़ते हैं, घटते हैं और मृत्युके उपस्थित होनेपर कालके प्रभावसे विनष्ट हो जाते हैं |

हे पक्षिन ! जब मृत्यु आ जाती है तो उसके कुछ समय पूर्व दैवयोगसे कोई रोग प्राणीके शरीरमें उत्पन्न हो जाता है | इन्द्रियाँ विकल हो जाती हैं और बल, ओज तथा वेग शिथिल हो जाता है | हे खग ! प्राणियोंको करोड़ों बिच्छुओं के एक साथ काटनेका जो अनुभव होता है, उससे मृत्युजनित पीड़ाका अनुमान करना चाहिये | उसके बाद ही चेतनता समाप्त हो जाती है, जड़ता आ जाती है | तदनन्तर यमदूत उसके समीप आकर खड़े हो जाते है और उसके प्राणोंको बलात अपनी ओर खींचना शुरू कर देते हैं | उस समय प्राण कंठमें आ जाते हैं | मृत्युके पूर्व मृतकका रूप बीभत्स हो उठता है | वह फेन उगलने लगता है | उसका मूँह लारसे भर जाता है | उसके बाद शरीरके भीतर विद्यमान रहनेवाला वह अंगुष्ठ-परिमाणका पुरुष हाहाकार करता हुआ तथा अपने घरको देखता हुआ यमदूतोंके द्वारा यमलोक ले जाया जाता है |

मृत्युके समय शरीरमें प्रवाहित वायु प्रकुपित होकर तीव्र गतिको प्राप्त करता है और उसीकी शक्तिसे अग्नितत्त्व भी प्रकुपित हो उठता है | बिना ईंधन के प्रदीप्त ऊष्मा प्राणीके मर्मस्थानोंका भेदन करने लगती है, जिसके कारण प्राणीको अत्यंत कष्टकी अनुभूति होती है | परन्तु भक्तजनों एवं भोग्में अनासक्त जनोंकी अधोगतिका निरोध करनेवाला उदान नामक वायु ऊर्ध्वगतिवाला हो जाता है |

जो लोग झूठ नही बोलते, जो प्रीतिका भेदन नहीं करते, आस्तिक और श्रद्धावान हैं, उन्हें सुखपूर्वक मृत्यु प्राप्त होती हैं | जो काम, ईर्ष्या और द्वेषके कारण स्वधर्मका परित्याग न करे, सदाचारी और सौम्य हो, वे सब निश्चित ही सुखपूर्वक मरते हैं |

जो लोग मोह और अज्ञानका उपदेश देते हैं, वे मृत्युके समय महान्धकारमें फँस जाते हैं | जो झूठी गवाही देनेवाले, असत्यभाषी, विश्वासघाती और वेदनिन्दक हैं, वे मूर्च्छारूपी मृत्युको प्राप्त करते हैं | उनको ले जानेके लिये लाठी एवं मुद्ररसे युक्त दुर्गंधसे भरपूर एवं भयभीत करनेवाले दुरात्मा यमदूत आते हैं | ऐसी भयंकर परिस्थिति देखकर प्राणीके शरीरमें भयवश कम्पन होने लगता है | उस समय वह अपनी रक्षा के लिये अनवरत माता-पिता और पुत्रको यादकर करुण-क्रन्दन करता है | उस क्षण प्रयास करनेपर भी ऐसे जीवके कंठसे एक शब्द भी स्पष्ट नहीं निकालता | भयवश प्राणीकी आँखे नाचने लगती हैं | स्की साँस बढ़ जाती है और मूँह सूखने लगता है | उसके बाद वेद्नासे आविष्ट होकर वह अपने शरीरका परित्याग करता है और उसके बाद ही वह सबके लिये अस्पृश्य एवं घृणायोग्य हो जाता है |

हे गरुड ! इस प्रकार मैंने यथाप्रसंग मृत्युका स्वरूप सुना दिया | अब आपके उस दूसरे प्रश्नका उत्तर जो बड़ा ही विचित्र है, उसे सुना रहा हूँ | हे पक्षिराज ! पूर्वजन्ममें किये गये भाँन्ति- भाँन्तिके भोगोंको भोगता हुआ प्राणी यहाँ भ्रमण करता रहता है | देव, असुर और यक्ष आदि योनियाँ भी प्राणीके लिये सुखप्रदायिनी हैं | मनुष्य, पशु-पक्षी आदि योनियाँ अत्यंत दुःखदायिनी हैं | हे खगेश्वर ! प्राणीको कर्मका फल तारतम्यसे इन योनियों में प्राप्त होता है | अब मैं इसी प्रसंगमें आपसे कर्मविपाकका वर्णन भी करूँगा |

हे गरुड ! प्राणी अपने सत्कर्म एवं दुष्कर्मके फलोंकी विविधताका अनुभव करनेके लिये इस संसारमें जन्म लेता है | जो महापातकी ब्रह्महत्यादि महापातकजन्य अत्यंत कष्टकारी रौरवादि नरकलोकोंका भोग भोगकर कर्मक्षयके बाद पुन: इस पृथ्वीपर जिन लक्षणोंसे युक्त होकर जन्म लेते हैं, उन लक्षणोंको  आप मुझसे सुनें |

हे खगेन्द्र ! ब्राह्मणकी हत्या करनेवाले महापातकीको मृग, अश्व, सूकर और ऊँटकी योनि प्राप्त होती है | स्वर्णकी चोरी करनेवाला कृमि, कीट और पतंग योनिमें जाता है, गुरुपत्नीके साथ सहवास करनेवालेका जन्म क्रमशः तृण, लता और गुल्म योनिमें होता है | ब्रह्मघाती क्षयरोगका रोगी, मद्यपी विकृतदंत, स्वर्णचोर कुनखी और गुरुपत्नीगामी चर्मरोगी होता है | जो मनुष्य जिस प्रकारके महापातकियोंका साथ कराता है, उसे भी उसी प्रकारका रोग होता है | प्राणी एक वर्षपर्यन्त पतित व्यक्तिका साथ करनेसे स्वयं पतित हो जाता है | परस्पर वार्तालाप करने तथा स्पर्श, नि:श्वास, सहयान, सहभोज, सहआसन, याजन, अध्यापन तथा योनि – सम्बन्धसे मनुष्यों के शरीरमें पाप संक्रमित हो जाते हैं | दूसरेकी स्त्री के साथ सहवास करने और ब्राह्मणका धन चुरानेसे मनुष्यको दूसरे जन्ममें अरण्य तथा निर्जन देशमें रहनेवाले ब्रह्मराक्षसकी योनि प्राप्त होती हैं | रत्नकी चोरी करनेवाला निकृष्ट योनिमें जन्म लेता हैं, उसे छछूंदरकी योनिमें जाना पड़ता है | धान्यकी चोरी करनेवाला चूहा, यान चुरानेवाला ऊँट तथा फलकी चोरी करनेवाला बन्दरकी योनिमें जाता है | बिना मंत्रोच्चारके भोजन करनेपर कौआ, घरका सामान चुरानेवाला गिद्ध, मधुकी चोरी करनेपर मधुमक्खी, फलकी चोरी करनेपर गिद्ध, गायकी चोरी करनेपर गोह और अग्निकी चोरी करनेपर बगुलेकी योनि प्राप्त होती है | स्त्रियोंका वस्त्र चुरानेपर श्वेत कुष्ठ और रसका अपहरण करनेपर भोजन आदिमें अरुचि हो जाती है | काँसेकी चोरी करनेवाला हंस, दूसरेके धनका हरण करनेवाला अपस्मार रोगसे ग्रस्त होता है तथा गुरुहन्ता क्रूरकर्मा बौना और धर्मपत्नीका परित्याग करनेवाला शब्दवेधी होता है | देवता और ब्राह्मणके धनका अपहरण करनेवाला, दूसरेका मांस खानेवाला पांडूरोगी होता है | भक्ष्य और अभक्ष्यका विचार न रखनेवाला अगले जन्ममें गंडमाला नामक महारोगसे पीड़ित होता है | जो दूसरेकी धरोहरका अपहरण करता है, वह काना होता हैं | जो स्त्रीके बलपर इस संसारमें जीवन-यापन करता है, वह दूसरे जन्ममें लंगड़ा होता है | जो मनुष्य पतिपरायणा अपनी पत्नीका परित्याग करता है, वह दूसरे जन्ममें दुर्भाग्यशाली होता है | अकेला मिष्टान्न खानेवाला वातगुल्मका रोगी होता है | कोई व्यक्ति यदि किसी ब्राह्मणपत्नीके साथ सहवास करे तो श्रुगाल, शय्याका हरण करनेवाला दरिद्र, वस्त्रका हरण करनेवाला पतंग होता है | मात्सर्य-दोषसे युक्त होनेपर प्राणी जन्मांध, दीपक चुरानेवाला कपाली होता है | मित्रकी हत्या करनेवाला उल्लू होता है | पिता आदि श्रेष्ठ जनोंकी निंदा करनेसे प्राणी क्षयका रोगी होता है | असत्यवादी हकला कर बोलनेवाला और झूठी गवाही देनेवाला जलोदर-रोगसे पीड़ित रहता है |

विवाहमें विघ्न पैदा करनेवाला पापी मच्छरकी योनिमें जाता है | यदि कदाचित उसे पुन: मनुष्यकी योनि प्राप्त भी होती है तो उसका ओठ कटा होता है | जो मनुष्य चतुष्पथपर मल-मुत्रका परित्याग करता है, वह वृषल ( अपशुद्र ) होता है | कन्याको दूषित करनेवाले प्राणीको मूत्रकृच्छ और नपुंसकताका विकार होता है | जो वेद बेचनेका अधर्म करता है, वह व्याघ्र होता है | अयाज्यका यज्ञ करानेवालेको सूअरकी योनि प्राप्त होती है | अभक्ष्य भक्षण करनेवाला व्यक्ति बिलौटा और वनोंको जलानेवाला खद्योत होता है | बासी एवं निषिद्ध भोजन करनेवालेको कृमि तथा मात्सर्य-दोषसे युक्त प्राणीको भ्रमरकी योनि मिलती है | घर आदिमें आग लगानेवाला कोढ़ी और अद्त्तका आदान करनेसे मनुष्य बैल होता है | गायोंकी चोरी करनेपर सर्प तथा अन्नकी चोरी करनेपर प्राणीको अजीर्ण रोग होता है | जलकी चोरी करनेपर मछली, दूधकी चोरी करनेसे बलाकिका और ब्राह्मणको दानमें बासी भोजन देनेसे कुबड़ेकी योनि प्राप्त होती है | हे पक्षिन ! जो मनुष्य फल चुराता है, उसकी सन्तति मर जाती है | बिना किसीको दिये अकेले भोजन करनेवाला व्यक्ति दूसरे जन्ममें सन्तानहीन होता है | संन्यासाश्रमका परित्याग करनेवाला पिशाच होता है | जलकी चोरी करनेसे चातक और पुस्तककी चोरी करनेसे प्राणी जन्मांध होता है | ब्राह्मणों को देनेकी प्रतिज्ञा करके जो नहीं देते हैं, उन्हें सियारकी योनि प्राप्त होती है | झूठी निंदा करनेवाले लोगोंको कछुएकी योनिमें जाना पड़ता है | फल बेचनेवाला दूसरे जन्ममें भाग्यहीन होता है | जो ब्राह्मण शुद्रकन्यासे विवाह कर लेता है, वह भेडियेकी योनि प्राप्त करता है | अग्निको पैरसे स्पर्श करनेपर प्राणी बिलौटा और जीवोंका मांस खानेपर रोगी होता है | जो मनुष्य जलके स्त्रोतको विनष्ट करते हैं, वे मछली होते हैं | जो लोग भगवान हरिकी कथा और साधुजनोंकी प्रशस्ति नहीं सुनते, उन मनुष्योंको कर्णमूल रोग होता है | जो व्यक्ति परायेके मूँहमें स्थित अन्नका अपहरण करता है, वह मंदबुद्धि होता है |

जो देवपूजनमें प्रयुक्त होनेवाले पात्रादिक उपकरणोंका अपहारक है, उसे गंडमाला-रोग होता है | दम्भके वशीभूत होकर जो प्राणी धर्माचरण करता है, उसको गजचर्मका रोग होता है | विश्वासघाती मनुष्यके शरीरमें शिरोऽर्ति-रोग होता है | शिवके धन और निर्माल्यका सेवन करनेवाला व्यक्ति शिश्नपीड़ासे ग्रसित रहता है | स्त्रियाँ पापकी भागिनी होती है और उन्हें इन्ही जन्तुओंकी भार्या होना पड़ता है | उक्त कर्मोंके कुफलसे प्राप्त नरकक भोग करनेके बाद मनुष्य इन्ही सब योनियोंमें प्रविष्ट होता है, ऐसा निश्चय समझना चाहिये |

हे खगपते ! जिस प्रकार इस संसारमें नाना भाँतिके द्रव्य विद्यमान हैं, उसी प्रकार प्राणियोंकी विभिन्न जातियाँ भी हैं | वे सभी अपने-अपने विभिन्न कर्मोंके प्रतिफल-रूपमें सुख-दुःख एवं नाना योनियोंका भोग करते हैं | तात्पर्य यही है कि प्राणीको शुभ कर्म करनेसे शुभ फलकी प्राप्ति और अशुभ कर्म करनेसे अशुभ फलकी प्राप्ति होती है |

नारायण नारायण

 

गरुड़पुराण -धर्मकाण्ड – प्रेतकल्प -अध्याय- १

garoodh puran

|| ॐ श्रीपरमात्मने नम: ||

गरुडपुराण

धर्मकाण्ड – प्रेतकल्प

अध्याय – १

वैकुण्ठलोकका वर्णन, मरणकालमें और मरणके अनन्तर जीवके कल्याणके लिये विहित विभिन्न कर्तव्यों के बारेमें गरुडजीके द्वारा किये गये प्रश्न, प्रेतकल्पका उपक्रम

श्रीगणेशजीको नमस्कार है | ‘ॐ’कारसे युक्त भगवान वासुदेव हरिको प्रणाम है | वासुदेव हरिको प्रणाम है |

नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम |

देवीं सरस्वतीं चैव ततो जयमुदीरयेत ||

भगवान श्रीनारायण, नरोत्तम नर एवं भगवती श्रीसरस्वती देवीको नमस्कार करके पुराणका वाचन करना चाहिये | जिन भगवानका धर्म की मूल हैं, वेद जिनका स्कन्ध है, पुराणरूपी शाखासे जो समृद्ध हैं, यज्ञ जिनके पुष्प हैं, मोक्ष जिनका फल है – ऐसे भगवान मधुसुदनरूपी कल्पवृक्षकी जय हो |

देवक्षेत्र नैमिषारण्यमें शौनकादिक श्रेष्ठ मुनियोंने सुखपूर्वक विराजमान श्रीसूतजी महाराजसे कहा –

हे श्रीसूतजी ! आप श्रीवेदव्यासजी की कृपासे सब कुछ जानते हैं | अत: आप हम सभीके संदेहका निवारण करें | कुछ लोगोंका कहना है कि जिस प्रकार कोई र्जोक तिनकेसे तिनकेका सहारा लेकर आगे बढ़ती है, उसी प्रकार शरीरधारी जीव एक शरीरके बाद दूसरे शरीरका आश्रय ग्रहण करता है | दूसरे विद्वानोंका कहना है कि प्राणी मृत्युके पश्चात यमराजकी यातनाओंका भोग करता हैं, तदनन्तर उसको दूसरे शरीरकी प्राप्ति होती है – इन दोनोंमें क्या सत्य हैं ? यह हमें बतानेकी कृपा करें |

सूतजीने कहा – हे महाभाग ! आप लोगोंने अच्छा प्रश्न किया है | आप लोगोंको संदेह हो यह असम्भव हैं | आप लोगोंने तो लोकहितसे प्रेरित होकर ही ऐसा प्रश्न किया है | हे विप्रगणों ! मैं आप सबके ह्रदयमें अवस्थित उस संदेहको भगवान श्रीकृष्ण और गरुडके बीच हुए संवादके द्वारा दूर करूँगा | सर्वप्रथम मैं उन भगवान श्रीकृष्णको नमस्कार करता हूँ, जिनका आश्रय लेकर मनुष्य इस भवसागरको एक क्षुद्र नदीकी भाँति अनायास ही पार कर जाते हैं |

हे मुनियों ! एक बार विनतापुत्र गरुडके ह्रदयमें इस ब्रह्माण्डके सभी लोकोंको देखनेकी इच्छा हुई | अत: हरिनामका उच्चारण करते हुए उन्होंने सभी लोकोंका भ्रमण किया | पाताल, पृथ्वीलोक तथा स्वर्गलोकका भ्रमण करते हुए वे पृथ्वीलोक के दुःखसे अत्यंत दु:खित एवं अशांतचित्त होकर पुन: वैकुण्ठ लोक वापस आ गये |

वैकुण्ठ लोकमें न रजोगुणकी प्रवृत्ति है, न तमोगुणकी ही प्रवृत्ति है, रजोगुण तथा तमोगुणसे मिश्रित सत्त्वगुणकी भी प्रवृत्ति वहाँ नहीं है | वहाँ केवल शुद्ध सत्त्वगुण ही अवस्थित रहता है | वहाँ माया भी नहीं है, वहाँ किसीका विनाश नहीं होता | वहाँ राग-द्वेष आदि षड्विकार भी नहीं हैं | वहाँ देव और असुर-वर्गद्वारा पूजित श्यामवर्णकी सुंदर कान्तिसे सुशोभित राजीवलोचन भगवान विष्णुके पार्षद विराजमान रहते हैं, जिनके शरीर पीतवसन और मनोहारी आभुषणोंसे विभूषित हैं और मणियुक्त स्वर्णके अलंकारणोंसे सुशोभित हैं | भगवानके वे सभी पार्षद चार-चार भुजाओंसे युक्त हैं | उनके कानोंमें कुण्डल और सिरपर मुकुट है | उनका वक्ष:स्थल सुंदर पुष्पोंकी मालासे सुशोभित है | मनको मोहित करनेवाली अप्सराओंसे युक्त, महात्माओंके चमकते हुए विमानोंकी पंक्तिकी कान्तिसे वे सभी सदा भास्वरित होते रहते हैं | वहाँ नाना प्रकारके वैभवोंसे समन्वित लक्ष्मी प्रसन्नतापूर्वक भगवान श्रीहरिके चरणोंकी पूजा करती रहती हैं |

गरुडजीने वहाँ देखा कि श्रीहरि झुलेपर विराजमान हैं | सखियोंद्वारा स्तुत्य लक्ष्मीजी झुलेमें स्थित भगवानकी स्तुति कर रही हैं | अपने लाल-लाल बड़े-बड़े नेत्रोंसे युक्त प्रसन्नमुख देवोंके अधिपति, श्रीपति, जगत्पति और यज्ञपति भगवान श्रीहरि अपने नन्द, सुनन्द आदि प्रदान पार्षदोंको देख रहे थे | उनके सिरपर मुकुट, कानोंमें कुण्डल और वक्ष:स्थल श्रीसे सुशोभित था | वे पीताम्बरसे विभूषित थे | उनकी चार भुजाएँ थीं | प्रसन्नमुद्रामें हँसता हुआ उनका मुख था | बहुमूल्य आसनपर विराजमान वे हरि उस समय अपनी अन्यान्य शक्तियोंसे आवृत थे | प्रकृति, पुरुष, महत, अहंकार, पंचकर्मेंद्रिय. पंचज्ञानेंद्रिय, मन, पंचमहाभूत तथा पंचतन्मात्राओंसे निर्मित शरीरवाले अपने ही स्वरूपमें रमण करते हुए उन भगवान हरिका दर्शन करनेसे विनतासुत गरुडका अंत:करण आनन्दविभोर हो उठा | उनका शरीर रोमांचित हो गया | उनके नेत्रोंसे प्रेमाश्रओंकी धारा बहने लगी | आनन्दमग्न होकर उन्होंने प्रभुको प्रणाम किया | प्रणाम करते हुए अपने वाहन गरुडको देखकर भगवान विष्णुने कहा – हे पक्षिन ! आपने इतने दिनों में इस जगतकी किस भूमिका परिभ्रमण किया है ?

गरुडने कहा – भगवन ! आपकी कृपासे मैंने समस्त त्रिलोकीका परिभ्रमण किया है | उनमें स्थित जगतके सभी स्थावर और जंगम प्राणियोंको भी देखा | हे प्रभो ! यमलोकको छोडकर पृथ्वीलोकसे सत्यलोकतक सब कुछ मेरे द्वारा देखा जा चूका है | सभी योनियोंमें मानवयोनि ही भोग और मोक्षका शुभ आश्रय हैं | अत: सुकृतियोंके लिये ऐसा लोक न तो अभीतक बना है और ण भविष्यमें बनेगा | देवता लोग भी इस लोककी प्रशंसामें गीत गाते हुए कहते हैं – ‘जो लोग पवित्र भारतकी भूमिमें जन्म लेकर निवास करते हैं, वे धन्य हैं | देवता लोग भी स्वर्ग एवं अपवर्गरूप फलकी प्राप्तिके लिये पुन: भारतभूमिमें मनुष्यरूपमें जन्म लेते हैं’ –

गायन्ति देवा: किल गीतकानि धन्यास्तु ये भारतभूमिभागे |

स्वर्गापवर्गास्य फलार्जनाय भवन्ति भूय: पुरुषा: सुरत्वात || ( १/२७)

हे प्रभो ! आप यह बतानेकी कृपा करें कि मृत्युको प्राप्त हुआ प्रेत किस कारण पृथ्वीपर दाल दिया जाता है ? उसके मुखमें पंचरत्न (सोना, चाँदी,मोती, लाजावर्त तथा मूँगा – ये पाँच पंचरत्न कहलाते हैं |) क्यों डाला जाता हैं ? मरे हुए प्राणीके नीचे लोग कुश किसलिये बिछा देते हैं ? उसके दोनों पैर दक्षिण दिशाकी ओर क्यों कर दिये जाते हैं ? मरनेके समय मनुष्यके आगे पुत्र-पौत्रादि क्यों खड़े रहते हैं ? हे केशव ! मृत्युके समय विविध वस्तुओंका दान एवं गोदान किसलिये दिया जाता हैं ? बन्धु-बान्धव, मित्र और शत्रु आदि सभी मिलकर क्यों क्षमा-याचना करते हैं ? किससे प्रेरित होकर लोग मृत्युकालमें तिल, लोहा, स्वर्ण, कपास, नमक, सप्तधान्य ( जौ, धान, तिल, कंगनी, मूँग, चना तथा सौवा), भूमि और गौका दान देते हैं ?  प्राणी कैसे मरता है और मरनेके बाद कहाँ जाता हैं ? उस समय वह आतिवाहिक शरीर (निराधार-रूपमें आत्माको वहन करनेवाले शरीर ) को कैसे प्राप्त करता हैं ? अग्नि देनेवाले पुत्र और पौत्र इसे कंधेपर क्यों ले जाते हैं ? शवमें घृतका लेप क्यों किया जाता हैं ? उस समय एक आहुति देनेकी परम्परा कहाँसे चली हैं ? शवको भूमिस्पर्श किसलिये करवाया जाता है ? स्त्रियाँ उस मरे हुए व्यक्तिके लिये क्यों विलाप करती हैं ? शवके उत्तर दिशामें ‘यमसूक्त’ का पाठ क्यों किया जाता हैं ? मरे हुए व्यक्तिको पीनेके लिये जल एक ही वस्त्र धारण करके क्यों दिया जाता है ? उस समय सुर्यबिम्ब-निरिक्षण, पत्थरपर स्थापित यव, सरसों, दुर्वा और नीमकी पत्तियोंका स्पर्श करनेका विधान क्यों है ? उस समय स्त्री एवं पुरुष दोनों नीचे – ऊपर एक ही वस्त्र क्यों धारण करते हैं ? शवका दाह-संस्कार करनेके पश्चात उस व्यक्तिको अपने परिजनोंके साथ बैठकर भोजनादि क्यों नहीं करना चाहिये ? मरे हुए व्यक्तिके पुत्र दस दिनके पूर्व किसलिये पिंडोंका दान देते हैं ? चबूतरे ( वेदी ) पर पके हुए मिट्टीके पात्रमें दूध क्यों रखा जाता है ? रस्सीसे बँधे हुए तीन काष्ठ ( तिगोडिया ) के ऊपर रात्रिमें गाँवके चौराहेपर एकांतमें वर्षपर्यन्त प्रतिदिन दीपक क्यों दिया जाता हैं ? शवका दाह-संस्कार तथा अन्य लोगोंके साथ जल-तर्पणकी क्रिया क्यों की जाती है ? हे भगवन ! मृत्युके बाद प्राणी आतिवाहिक शरीरमें चला जाता है, उसके लिये नौ पिंड देने चाहिये, इसका क्या प्रयोजन है ? किस विधानसे पितरोंको पिंड प्रदान करना चाहिये और उस पिंडको स्वीकार करनेके लिये उनका आवाहन कैसे किया जाय ?

हे देव ! यदि ये सभी कार्य मरनेके तुरंत बाद सम्पन्न हो जाते हैं तो फिर बादमें पिंडदान क्यों किया जाता है ? पूर्व किये गये पिंडदानके बाद पुन: पिंडदान या अन्य क्रियाओंको करनेकी क्या आवश्यकता है ? दाह-संस्कारके बाद अस्थि-संचयन और घट फोड़नेका विधान क्यों है ? दूसरे दिन और चौथे दिन साग्निक द्विजके स्नान का विधान क्यों है ? दसवें दिन सभी परिजनोंके साथ शुद्धिके लिये स्नान क्यों किया जाता हैं ? दसवें दिन तेल एवं उबटनका प्रयोग क्यों किया जाता है | उस तेल और उबटनका प्रयोग भी एक विशाल जलाशयके तटपर होना अपेक्षित है, इसका क्या कारण है ? दसवें दिन पिंडदान क्यों करना चाहिये ? एकादशाहके दिन वृषोत्सर्ग आदिके सहित पिंडदान करनेका क्या प्रयोजन है ? पात्र, पादुका, छत्र, वस्त्र तथा अंगूठी आदि वस्तुओंका दान क्यों दिया जाता है ? तेरहवें दिन पददान क्यों दिया जाता है | वर्षपर्यंत सोलह श्राद्ध क्यों किये जाते हैं तथा तीन सौ साठ सान्नोद्क घट क्यों दिये जाते हैं | प्रेततृप्तिके लिये प्रतिदिन अन्नसे भरे हुए एक घटका दान क्यों करना चाहिये |

हे प्रभो ! मनुष्य अनित्य है और समय आनेपर ही वह मरता है, किन्तु मैं उस छिद्रको नहीं देख पाता हूँ, जिससे जीव निकल जाता है ? प्राणीके शरीरमें स्थित किस छिद्रसे पृथ्वी, जल, मन, तेज, वायु और आकाश निकल जाते हैं ? हे जनार्दन ! इसी शरीरमें स्थित जो पाँच कर्मेंद्रियाँ और पाँच ज्ञानेंद्रियाँ तथा पाँच वायु हैं, वे कहाँसे निकल जाते हैं | लोभ, मोह, तृष्णा, काम और अहंकाररूपी जो पाँच चोर शरीरमें छिपे रहते हैं, वे कहाँसे निकल जाते हैं |

हे माधव ! प्राणी अपने जीवनकालमें पुण्य अथवा पाप जो कुछ भी कर्म करता है, नाना प्रकारके दान देता हैं, वे सब शरीरके नष्ट हो जानेपर उसके साथ कैसे चले जाते हैं | वर्षके समाप्त हो जानेपर भी मरे हुए प्राणीके लिये सपिण्डीकरण क्यों होता है ? उस प्रेतकृत्यमें ( सपिण्डन ) प्रेतपिंडका मिलन किसके साथ किस विधिसे होना चाहिये, इसे आप बतानेकी कृपा करें |

हे हरे ! मुर्च्छासे अथवा पतनसे जिनकी मृत्यु होती है, उनके लिये क्या होना चाहिये | जो पतित मनुष्य जलाये गये अथवा नहीं जलाये गये तथा इस पृथ्वीपर जो अन्य प्राणी हैं, उनके मरनेपर अन्तमें क्या होना चाहिये | जो मनुष्य पापी, दुराचारी अथवा हतबुद्धि हैं, मरनेके बाद वे किस स्थितिको प्राप्त करते हैं ? जो पुरुष आत्मघाती, ब्रह्महत्यारा, स्वर्णादिकी चोरी करनेवाला, मित्रादिके साथ विश्वासघात करनेवाला है, उस महापातकीका क्या होता है ? हे माधव ! जो शुद्र कपिला गौका दूध पीता है अथवा प्रणव महामंत्रका जप करता है या ब्रह्मपुत्र अर्थात यज्ञोपवीतको धारण करता है तो मृत्युके बाद उसकी क्या गति होती है ? हे संसारके स्वामी ! जब कोई शुद्र किसी ब्राह्मणीको पत्नी बना लेता है तो उस पापीसे मैं भी डरता हूँ | आप बतायें कि उस पापीकी क्या दशा होती है ? साथ ही उस पापकर्मके फलको बतानेकी भी कृपा करें |

हे विश्वात्मन ! आप मेरी दूसरी बातपर भी ध्यान दें | मैं कौतुहलवश वेगपूर्वक लोकोंको देखता हुआ सम्पूर्ण जगतमें जा चूका हूँ, उसमें रहनेवाले लोगोंको मैंने देखा है कि वे सभी दु:खमें ही डूबे रहे हैं | उनके अत्यंत कष्टोंको देखकर मेरा अंत:करण पीड़ासे भर गया है | स्वर्गमें दैत्योंकी शत्रुतासे भय हैं | पृथ्वीलोक में मृत्यु और रोगादिसे तथा अभीष्ट वस्तुओंके वियोगसे लोग दु:खित हैं | पाताललोकमें रहनेवाले प्राणियोंको मेरे भयसे दुःख बना रहता है | हे ईश्वर ! आपके इस वैष्णव पद ( वैकुण्ठ ) के अतिरिक्त अन्यत्र किसी भी लोकमं ऐसी निर्भयता नहीं दिखायी देती | कालके वशीभूत इस जगतकी स्थिति स्वप्नकी माया के समान असत्य है | उसमें भी इस भारतवर्षमें रहनेवाले लोग बहुत-से दु:खोंको भोग रहे हैं | मैंने वहाँ देखा है कि उस देशके मनुष्य राग-द्वेष तथा मोह आदिमें आकण्ठ डूबे हुए हैं | उस देशमें कुछ लोग अंधे हैं, कुछ टेढ़ी दृष्टिवाले, दुष्ट वाणीवाले, लूले, लँगड़े, काने, बहरे, गूँगे, कोढ़ी, लोमश ( अधिक रोमवाले) है, कुछ नाना रोगसे घिरे हैं और कुछ आकाश-कुसुमकी तरह नितांत मिथ्या अभिमानसे चूर है | उनके विचित्र दोषोंको देखकर तथा उनकी मृत्युको देखकर मेरे मनमें जिज्ञासा उत्पन्न हो गयी है कि यह मृत्यु क्या है ? इस भारतवर्षमें यह कैसी विचित्रता है ? ऋषियोंसे मैंने पहले ही इस विषयमें सामान्यत: यह सुन रखा है कि जिसकी विधिपूर्वक वार्षिक क्रियाएँ नहीं होती हैं, उसकी दुर्गति होती है | फिर भी हे प्रभो ! इसकी विशेष जानकारी के लिये मैं आपसे पूछ रहा हूँ |

हे उपेन्द्र ! मनुष्यकी मृत्युके समय उसके कल्याणके लिये क्या करना चाहिये ? कैसा दान देना चाहिये | मृत्यु और श्मशान-भूमितक पहुँचनेके बीच कौन-सी विधि अपेक्षित है | चितामें शवको जलानेकी क्या विधि है ? तत्काल अथवा विलम्बसे उस जीवको कैसे दूसरी देह प्राप्त होती है, यमलोक को जानेवाले के लिये वर्षपर्यंत कौन-सी क्रियाएँ करनी चाहिये | दुर्बुद्धि अर्थात दुराचारी व्यक्तिकी मृत्यु होनेपर उसका प्रायश्चित्त क्या है ? पंचक आदिमें मृत्यु होनेपर पंचकशान्ति के लिये क्या करना चाहिये | हे देव ! आप मेरे ऊपर प्रसन्न हों | आप मेरे इस सम्पूर्ण भ्रमको विनष्ट करनेमें समर्थ हैं | मैंने आपसे यह सब लोकमंगलकी कामनासे पूछा है, मुझे बतानेकी कृपा करें |

नारायण नारायण

गरुड़पुराण – अध्याय – २४१

garoodh puran

| ॐ श्रीपरमात्मने नम: | ॐ श्री गणेशाय नम: | ॐ नमो भगवते वासुदेवाय |

गरुड़पुराण

आचारकाण्ड

अध्याय – २४१

गरुडपुराण का माहात्म्य

भगवान हरिने कहा – हे रूद्र ! मैंने ‘गरुडपुराण’ का वह सारभाग आपको सुना दिया, जो भोग एवं मोक्ष प्रदान करनेवाला हैं | यह विद्या, यश, सौन्दर्य, लक्ष्मी, विजय और आरोग्यदिका कारक है | जो मनुष्य इसका पाठ करता है या सुनता है, वह सब कुछ जान जाता है और अंतमें उसको स्वर्गकी प्राप्ति होती है |

ब्रह्माजीने कहा – हे व्यास ! मैंने मुक्तिप्रदायक ऐसे महापुराणको भगवान विष्णुसे सुना था |

व्यासजीने कहा – सूतजी ! भगवान विष्णुसे इस महापुण्यदायक गरुडपुराणको सुनकर ब्रह्माजीने दक्षप्रजापति, नारद तथा हम सभीको सुनाया और स्वयं उस परात्पर ब्रह्मका ध्यान करते हुए वे वैष्णव पदको प्राप्त हुए | मैंने भी तुम्हें और तुमने शौनकादिको इस सर्वश्रेष्ठ पुराणको सुनाया, जिसे सुनकर सर्वज्ञ बना व्यक्ति अपने अभीष्टको प्राप्त करके अन्तमें ब्रह्मपदका लाभ लेता है | भगवान विष्णुने गरुडको सारतमभाग सुनाया था, इसलिये यह गरुडके लिये कथित सारतत्त्व ‘गरुडमहापुराण’ के नामसे प्रसिद्ध हो गया | यह महासारतत्त्व है | यह प्राणीको धर्म, काम, धन और मोक्षादि सभी फलोंको देनेवाला है |

सूतजीने कहा – हे शौनक ! आपको मैंने उस श्रेष्ठतम गरुडमहापुराणको सुना दिया है, जिस शुभ पुराण को भगवान व्यासने ब्रम्हासे सुनकर बहुत समय पहले मुझको सुनाया था | व्यासरूप भगवान श्रीहरिने प्रारम्भमें जो मात्र एक वेद था, उसे चार भागोंमें विभाजित किया और अष्टादश महापुराणोंकी रचना की | उन पुराणोंको महाराज शुकदेवजीने मुझे सुनाया | हे शौनक ! आपके पूछनेपर इस श्रेष्ठ गरुडपुराण को मैंने मुनियों के सहित आपको सुनाया |

जो मनुष्य एकाग्रचित्त होकर इस महापुराणका पाठ करता है, सुनता है अथवा सुनाता है, इसको लिखता है, लिखाता है, ग्रन्थके ही रूपमें इसे अपने पास रखता है तो वह यदि धर्मार्थी है तो उसे धर्मकी प्राप्ति होती है, यदि वह अर्थका अभिलाषी है तो अर्थ प्राप्त करता है | यदि वह कामी है तो उसकी कामनाएँ पूर्ण होती हैं और यदि वह मोक्ष प्राप्त करनेका इच्छुक है तो उसे मोक्ष प्राप्त होता है | मनुष्य जिस-जिस वस्तुकी कामना करता है, वह सब इस गरुडपुराणको सुननेसे प्राप्त हो जाता है |

जो मनुष्य इस महापुराणका पाठ करता है, वह अपने समस्त अभीष्टको सिद्ध करके अन्तमें मोक्ष प्राप्त कर लेता है | इस पुराणके एक श्लोकका एक चरण भी पढकर मनुष्य पापरहित हो जाता है | जिस व्यक्तिके घरमें यह महापुराण रहता है, उसको इसी जन्ममें सब कुछ प्राप्त हो जाता है | जिस मनुष्यके हाथमें यह गरुडमहापुराण विद्यमान है, उसके हाथमें ही नीतियोंका कोष है | जो प्राणी इस पुराणका पाठ करता है या इसको सुनता है वह भोग और मोक्ष दोनोंको प्राप्त कर लेता है |

इस महापुराणको पढने एवं सुननेसे मनुष्यके धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष – इन चारों पुरुषार्थोंकी सिद्धि हो जाती है | इस महापुराणका पाठ करके या इसे सुन करके पुत्रार्थी पुत्र, कामार्थी काम, विद्यार्थी विद्या, विजीगीयु विजय प्राप्त कर लेता है तथा ब्रह्महत्यादिसे युक्त पापीका पाप नष्ट हो जाता है, वन्ध्या स्त्री पुत्र, कन्या सज्जन पति, क्षेमार्थी क्षेम तथा भोग चाहनेवाला भोग प्राप्त कर लेता है | इसी प्रकार मंगलकी कामनासे प्रेरित व्यक्ति अपना मंगल, गुणोंका इच्छुक व्यक्ति उत्तम गुण, काव्य करनेका अभिलाषी मनुष्य कवित्वशक्ति, सारतत्त्व चाहनेवाला सार, ज्ञानार्थी ज्ञान प्राप्त करता हैं |

पक्षिश्रेष्ठ गरुड़के द्वारा कहा गया यह गरुडमहापुराण धन्य है | यह सबका कल्याण करनेवाला है | जो मनुष्य इस महापुराण के एक भी श्लोकका पाठ करता है, उसकी अकालमृत्यु नहीं होती | इसके मात्र आधे श्लोकका पाठ करने से निश्चित ही दुष्ट शत्रुका क्षय होता है | नैमिषारण्यमें ऋषियों के द्वारा आयोजित यज्ञमें सूतजी महाराजसे इस महापुराणको सुन करके स्वयं शौनक मुनिने उन्हीं गरुडध्वज भगवान विष्णुकी कृपासे मुक्तिका लाभ प्राप्त किया था |

इति गरुडापुराणान्तर्गत आचारकांड

नारायण नारायण

गरुड़पुराण -अध्याय – २३९ से २४०

garoodh puran

| ॐ श्रीपरमात्मने नम: | ॐ श्री गणेशाय नम: | ॐ नमो भगवते वासुदेवाय |

गरुड़पुराण

आचारकाण्ड

अध्याय – २३९ से २४०

ब्रह्मगीतासार

ब्रह्माजीने कहा – हे नारद ! अब मैं ब्रह्मगीतासारका वर्णन करूँगा, जिसे जानकर संसारसे मुक्ति हो जाती है |

‘मैं ब्रह्म हूँ’ इस वाक्यार्थका ज्ञान होनेसे मनुष्योंको मोक्षकी प्राप्ति होती है | मैं और ब्रह्म – इन दो पदोंके अर्थका ज्ञान होनेपर वाक्यका ज्ञान होता है | विद्वानोंने इन पदोंके अर्थको वाच्य तथा लक्ष्य-रूपमें दो प्रकारका स्वीकार किया है | वाच्यार्थ और लक्ष्यार्थसे मिला-जुला वाक्यार्थ ही शुद्ध वाक्यार्थ है | वेदोंके द्वारा अहं शब्दसे एक प्राणपिंडात्मक और दूसरा प्रत्यग-रूप आत्मा गृहीत होता है | अव्ययानन्द चैतन्य परोक्षज्ञान के सहित है और प्राण-पिंडात्मक चैतन्य उसका दूसरा पक्ष है | अहं पदकी लक्षणासे आत्माका अल्पज्ञत्वादि दोषरहित शुद्ध आत्मा अर्थ होता है |

जो प्राणपिंडात्मक अर्थ है वह उसका दूसरा भाग है | इसमें परोक्ष अर्थात लक्ष्यार्थको देखनेके पश्चात जैसे उस अर्थकी स्थिति आती है, वैसे ही लक्ष्यार्थको देखनेके पश्चात उस अर्थकी स्थिति आती है | वैसे ही ब्रह्म पदसे प्राणपिंडात्मक अर्थकी प्रतीति होती है | निष्ठा तथा परोक्षता आदि अर्थ-प्रतीतिके जो गुण हैं, उनका परित्याग करके ऐसा अर्थ किया जाता है | अद्वयानन्द चैतन्य इस अर्थकी प्राप्ति तो लक्ष्यार्थ ब्रह्मपदसे ही हो जाती है | अद्वयानन्द चैतन्यको लक्ष्यार्थ रूपमें देखकर ‘मैं ब्रह्म हूँ’ – इन दोनों पदार्थोंकी सिद्धि ‘ब्रह्म मैं हूँ’ और ‘मैं ब्रह्म हूँ’ – इन दो स्थितियों में होती है | ‘मैं ब्रह्म हूँ’ इस वाक्यसे स्वानुभुतिका फलार्थ प्राणीको प्राप्त होता है | ऐक्यज्ञान तो निश्चित ही वेदान्तसे होता है | उससे यह अर्थ परे है | ज्ञानसे अज्ञानकी जो निवृत्ति होती है, उस निवृत्तिके बाद प्राणीके चित्तकी लक्ष्यसे जो ऐक्यकी स्थिति उत्पन्न होती है, वही मुक्ति है |

श्रीभगवानने कहा – हे पाण्डव ! यह सिद्ध है कि परमात्मा है | उसी परमात्मासे आकाश, आकाशसे वायु, वायुसे अग्नि, अग्निसे जल तथा जलसे पृथ्वीकी उत्पत्ति हुई है, जो इस जगत-प्रपंचकी जन्मदात्री है | तदनन्तर सत्रह तत्त्व उत्पन्न हुए | वाक्, हाथ, पैर, पायु और उपस्थ – ये पाँच कर्मेंद्रियाँ हैं | कान, त्वचा, नेत्र, जिव्हा तथा नासिका – ये पाँच ज्ञानेंद्रियाँ हैं | प्राण, अपान, समान, व्यान और उदान नामक पाँच प्रकारकी वायु हैं | मन और बुद्धिरूप अंत:करण है | मन संदेही होता है और बुद्धि निश्चयात्मिका होती है | इसका स्वरूप सूक्ष्म होता है | आत्माके रूपमें भगवान हिरण्यगर्भ अंत:करणमें विद्यमान रहते हैं, वही जीवात्मा है | इस प्रकार प्रपंचसे परे उस महाप्राण परमात्माके द्वारा पंचमहाभूतों से बने शरीरकी उत्पत्ति होती है | उन्हीं पंचीकृत पंचमहाभूतों से ब्रह्मांड अर्थात इस जगतकी सृष्टि हुई थी |

पैर आदिसे युक्त शरीर स्थूल शरीर है, यह तो संसारमें प्रसिद्ध ही है | उसके बाद उनमें पंचभूत तत्त्व और उनके कार्योंकी जो स्थिति है, वह स्थूल शरीरसे पूर्वका शरीर हैं | किन्तु उसके शरीरसे जो कुछ उत्पन्न होता है, उसको स्थूल ही कहा जाता है | विद्वान इस प्रकार परमात्मासे स्थित शरीरको तीन प्रकार मानते हैं | स्वतत्त्वके भेदको बतानेवाले भेद्वाक्य ‘अहं ब्रह्मास्मि’ के अनुसार उन दोनों पुर्वस्थूल और स्थूल शरीरमें वह ब्रह्म ही उसमें प्राणादि इन शारीरिक तत्त्वोंको धारण करता है | जाग्रत, स्वप्न तथा सुषुप्तिकी अवस्थामें किये जानेवाले कार्योंका जो साक्षी है, वही जीव माना गया है |

जाग्रत, स्वप्न तथा सुषुप्तिकी अवस्थाओं से परे वह ब्रह्म अपने निर्गुण स्वभावमें ही रहता है | उस क्रियाशील शरीरके साथ रहने एवं ण रहनेकी स्थितिमें भी वह नित्य शुद्ध स्वभाववाला ही है | उसमें कोई विकृति नहीं आती |

नारायण नारायण

गरुड़पुराण -अध्याय – २३७ से २३८

garoodh puran

| ॐ श्रीपरमात्मने नम: | ॐ श्री गणेशाय नम: | ॐ नमो भगवते वासुदेवाय |

गरुड़पुराण

आचारकाण्ड

अध्याय – २३७ से २३८

गीतासार

श्रीभगवानने कहा – हे नारद ! अब मैं गीताका सारतत्त्व कहूँगा, जिसे मैंने पूर्वमें अर्जुनको सुनाया था |

अष्टांगयोगयुक्त और वेदान्तपारंगत मनुष्योंके लिये आत्म-कल्याण सम्भव है | आत्म-कल्याण ही परम कल्याण है, उस आत्मज्ञानसे उत्कृष्ट और कुछ भी लाभ नहीं है | आत्मा देहरहित, रूप आदिसे हीन, इन्द्रियोंसे अतीत है | मैं आत्मा हूँ, संसारादि सम्बन्धके कारण मुझे किसी प्रकारका दुःख नहीं है | धूमरहित प्रज्वलित अग्निशिखा जैसे प्रकाश प्राप्त करती है, वैसे ही आत्मा स्वयं प्रदीप्त रहता है | जैसे आकाशमें विद्युत्-अग्निका प्रकाश होता है, वैसे ही ह्रदयमें आत्माके द्वारा आत्मा प्रकाशित होता है | श्रोत्र आदि इन्द्रियोंको किसी प्रकारका ज्ञान नहीं है | वे स्वयंको भी नहीं जान सकती हैं, परन्तु सर्वज्ञ, सर्वदर्शी, क्षेत्रज्ञ आत्मा ही इन्द्रियोंका दर्शन करता है | जब आत्मा उज्ज्वल प्रदीपके समान ह्रदयपटलपर प्रकाशित होता है, तब पुरुषोंका पापकर्म नष्ट हो जाता है और ज्ञान उत्पन्न हो जाता है |

जैसे दर्पणमें दृष्टि डालनेपर अपने द्वारा अपनेको देख सकते हैं, वैसे ही आत्मामें दृष्टि करनेपर इन्द्रियोंको, इन्द्रियोंके विषयोंको तथा पंचमहाभूतोंका दर्शन किया जा सकता है | मन, बुद्धि, अहंकार और अव्यक्त पुरुष – इन सभीके ज्ञानके द्वारा संसार-बंधनसे मुक्त हो जाना चाहिये | सभी इन्द्रियोंका मनमें अभिनिवेश कर उस मनको अहंकारमें स्थापित करना चाहिये | उस अहंकारको बुद्धिमें, बुद्धिको प्रकृतिमें, प्रकृतिको पुरुषमें एवं पुरुषको परब्रह्ममें विलीन करना चाहिये | इस प्रकार करनेसे हु ‘मैं ब्रह्म हूँ’ इस प्रकारकी ज्ञान-ज्योतिका प्रकाश होता है | इससे वह पुरुष मुक्त हो जाता है | नौ द्वारोंसे युक्त, तीनों गुणोंके आश्रय तथा आकाश आदि पंचभूतात्मक और आत्मासे अधिष्ठित इस शरीरको जो ज्ञानी व्यक्ति जान लेता है, वही श्रेष्ठ है और वही क्रांतदर्शी है | सौ अश्वमेध या हजारों वाजपेय यज्ञ इस ज्ञानयज्ञ के सोलहवें अंशके फलको भी प्रदान नहीं कर सकते |

श्रीभगवानने पुन: कहा – हे अर्जुन ! यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, ध्यान, धारणा तथा समाधि – यह अष्टांगयोग मुक्तिके लिये कहा गया है | शरीर, मन और वाणीको सदा सभी प्राणियोंकी हिंसासे निवृत्त रखना चाहिये; क्योंकि अहिंसा ही परम धर्म है और उसीसे परम सुख मिलता है –

कर्मणा मनसा वाचा सर्वभूतेषु सर्वदा ||

हिंसाविरामको धर्मों ह्यहिंसा परमं सुखम | ( २३८/२-३ )

सदा सत्य और प्रिय वचन बोलना चाहिये | कभी भी अप्रिय सत्य नहीं बोलना चाहिये, प्रिय-मिथ्या वचन भी नहीं बोलना चाहिये, यही सनातनधर्म है –

सत्यं ब्रूयात प्रियं ब्रूयात्र ब्रूयात सत्यमप्रियम् |

प्रियं च नानृतं ब्रूयादेप धर्म: सनातन: || ( २३८/४)

चोरीसे या बलपूर्वक दूसरेके द्रव्यका अपहरण करना स्तेय है | इसके विपरीत आचरण करना अर्थात कभी भी चोरी न करना अस्तेय है | स्तेय-कार्य (चोरी) कभी भी नहीं करना चाहिये, क्योंकि अस्तेय (चोरी न करना ) ही धर्मका साधन है –

यच्य द्र्व्यापहरणं चौर्याद्वाथ बलेन वा |

स्तेयं तस्यानाचरणमस्तेयं धर्मसाधनम || ( २३८/५ )

सदा और सभी अवस्थामें कर्म, मन और वाणीके द्वारा मैथुनका परित्याग करना चाहिये | इसीको ब्रह्मचर्य कहा जाता है | आपत्तिकालमें भी इच्छापूर्वक द्रव्यका ग्रहण न करना ही अपरिग्रह है | प्रयत्नपूर्वक परिग्रहका परित्याग करना चाहिये | शौच दो प्रकारके हैं – बाह्य और आभ्यन्तर | मृत्तिका और जल आदिके द्वारा बाह्य एवं भाव-शुद्धिके द्वारा आभ्यंतर शौच होता है | यदृच्छालाभ अर्थात अनायास-प्राप्तिसे संतुष्ट होना ही संतोष है | यह संतोष ही सभी प्रकारके सुखका साधन है | मन और इन्दिर्योंकी जो एकाग्रता है, वही परम तप है | कृच्छ और चान्द्रायण आदि व्रतोंके द्वारा देहका शोषण भी तपस्या है | पुरुषोंकी सत्त्वशुद्धिके लिये जो वेदान्त, शतरुद्रियका पाठ और ‘ॐ’कार आदिका जप है, पंडितजन उसे स्वाध्याय कहते हैं |

कर्म, मन और वाणीसे हरिकी स्तुति, नाम-स्मरण, पुजादि कार्य और हरिके प्रति अनिश्चला भक्तिको ही ईश्वरका चिंतन कहा जाता है | स्वस्तिकासन पद्मासन और अर्धासन आदि आसन कहे गये है | अपने शरीरगत वायुका नाम प्राण है | उस वायुके निरोधको प्राणायाम कहा जाता है | हे पाण्डव ! इन्द्रियाँ असदविषयों में विचरण करती हैं | उनको विषयोंसे निवारित करना चाहिये | साधुगण इस प्रकारके इन्द्रिय-निरोधको प्रत्याहार कहते हैं | मूर्त और अमूर्त ब्रह्म-चिंतनको ध्यान कहा जाता है | योगारम्भके समय मूर्तिमान और अमूर्तरूप में हरिका ध्यान करना चाहिये |

तेजोमंडलके मध्यमें शंख चक्र, गदा तथा पद्मधारी चतुर्भुज – कौस्तुभचिन्हसे विभूषित, वनमाली, वायुस्वरूप जो ब्रह्म अधिष्ठित है ‘मैं वही  हूँ’ | इस प्रकार मनको लय करके श्रीहरिको धारण करना ही धारणा है | ‘मैं ही ब्रह्म हूँ’ और ‘ब्रह्म ही मैं हूँ’ इस प्रकार देशालम्बन-रहित अहं और ब्रह्म पदार्थका तादाम्य रूप ही समाधि है |

नारायण नारायण

गरुड़पुराण -अध्याय – २३६

garoodh puran

| ॐ श्रीपरमात्मने नम: | ॐ श्री गणेशाय नम: | ॐ नमो भगवते वासुदेवाय |

गरुड़पुराण

आचारकाण्ड

अध्याय – २३६

आत्मज्ञाननिरूपण

श्रीभगवान बोले – हे नारद ! अब मैं आत्मज्ञानका तात्त्विक वर्णन करूँगा, सुनिये |

अद्वैत तत्त्व ही सांख्य है और उसमें एकचित्तता ही योग है | जो अद्वैत तत्त्व-योगसे सम्पन्न हैं, वे भवबन्धनसे मुक्त हो जाते हैं | अद्वैत तत्त्वका ज्ञान होनेपर अतीत, वर्तमान और भविष्यके सभी कर्म नष्ट हो जाते हैं | ज्ञानी व्यक्ति सदविचाररूपी कुल्हाड़ी के द्वारा संसाररूपी वृक्षको काटकर ज्ञान-वैराग्यरूपी तीर्थके द्वारा वैष्णव पद प्राप्त करता है | जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति – यह तीन प्रकारकी अवस्था ही माया है जो संसारका मूल है | यह माया जबतक रहती है, तबतक संसार ही सत्यमें अवगत होता ही सत्यमे अवगत होता है | वास्तवमें शाश्वत अद्वैत तत्त्वमें ही सब कुछ प्रविष्ट है | अद्वैत तत्व ही परब्रह्म है | यह परब्रह्म नाम-रूप तथा क्रियासे रहित है | यह ब्रह्म ही इस जगतकी सृष्टि कर स्वयं उसीमें प्रविष्ट हो जाता है |

‘मैं मायातीत चित्पुरुषको जानता हूँ और मैं भी आत्मस्वरूप हूँ |’ इस प्रकारका ज्ञान ही मुक्तिका मार्ग हैं | मोक्ष-लाभके लिये इससे अतिरिक्त अन्य कोई भी उपाय नहीं हैं |

वेदाहमेत पुरुषं चिद्रूपं तमस: परम |

सोऽहमस्मिति मोक्षाय नान्य: पन्था विमुक्तये || ( २३६/६)

श्रवण, मनन और ध्यान – ये सभी ज्ञानके साधन हैं | यज्ञ, दान, तपस्या, वेदाध्ययन और तीर्थसेवामात्रसे मुक्तिकी प्राप्ति नहीं होती हैं | मुक्ति किसी मतसे दान-ध्यानसे तथा किसीके मतसे पुजादि कर्मोंसे होती है | ‘कर्म करो’ और ‘कर्मका त्याग करो’ – ये दोनों वचन वेदमें मिलते हैं | निष्कामभावसे यज्ञादि कर्म मुक्तिके लिये होते है, क्योंकि निष्कामभावसे अनुष्ठित यज्ञादि अंत:करणकी शुद्धिके साधन हैं | ज्ञान प्राप्त होनेपर एक ही जन्ममें मुक्ति प्राप्त हो जाती है | द्वैत (भेद) भाव रखनेपर तो मुक्ति सम्भव नहीं है | कुयोगी भी मुक्ति प्राप्त नहीं कर सकते | किसी कारण योगभ्रष्ट होनेपर योगियों के कुलमें उत्पत्ति हो सकती है | ऐसी स्थितिमें मुक्ति सम्भव है |

कर्मोंसे भवबन्धन और ज्ञान होनेसे जीवकी संसारसे मुक्ति हो जाती है, इसलिये आत्मज्ञानका आश्रय करना चाहिये | जो आत्मज्ञानसे भिन्न ज्ञान है, उनको भी अज्ञान कहा जाता है | जब ह्रदयमें स्थित सभी कामनाएँ समाप्त हो जाती है, तब जीव जीवनकालमें ही अमरत्वकी प्राप्ति कर लेता है, इसमें संशय नहीं है –

यदा सर्वे विमुच्यन्ते कामा येऽस्य ह्रदि स्थिताः |

तदाऽमृतत्त्वमाप्नोति जीवत्रेव न संशय: || (२३६/१२)

व्यापक होनेसे ब्रह्म कैसे जाता है, कौन जाता है और कहाँ जाता है ? ऐसे प्रश्नों के लिये कोई अवसर ही नहीं है | अनंत होनेके कारण उसका कोई देश नहीं है; अत: किसी भी रूपमें उसकी गति नहीं हो सकती | परब्रह्म अद्वय है, अत: उससे भिन्न कुछ भी नहीं हैं | वह ज्ञानस्वरूप है, अत: उसमें जड़ता कैसे हो सकती है ? वस्तुत: ब्रह्म आकाशके समान है, इसलिये उसकी गति, अगति और स्थिति आदिका विचार कैसे हो सकता है ? जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति आदि अवस्था मायाके द्वारा कल्पित हैं अर्थात मिथ्या है |

वस्तुमात्रका सार ब्रह्म ही है | तेजोरूप ब्रह्मको एक अखंड परम पुण्यरूप समझना चाहिये | जैसे अपनी आत्मा सबको प्रिय है, वैसे ही ब्रह्म सबको प्रिय है क्योंकि आत्मा ही ब्रह्म है | हे महामुने ! सभी तत्त्वज्ञ ज्ञानको सर्वोच्च मानते हैं, इसलिये चित्तका आलम्बन बोधस्वरूप आत्मा ही है | यह आत्मविज्ञान है | यह पूर्ण है | शाश्वत है | जागते, सोते तथा सुषुप्तावस्थामें प्राप्त होनेवाला सुख पूर्ण सुखरूप ब्रह्मका ही एक क्षुद्र अंश समझना चाहिये | जैसे एक मृण्मय वस्तुका ( ज्ञान होनेपर ) समस्त मृण्मय पदार्थ जान लिया जाता है |

सर्वत्र व्याप्त शाश्वत तत्त्व ज्ञानस्वरूप ब्रह्म यदि सदा सर्वत्र सभीके ह्रदयमें विद्यमान नहीं है तो विस्मृत अर्थका स्मरण नहीं होना चाहिये पर होता है | ऐसी स्थितिमें यह स्मरण किसको होता है, निश्चित ही चेतन तत्त्वको ही होता है | इसे ही आत्मा, ब्रह्म, परमात्मा आदिके रूपमें स्वीकार किया गया है | चेतनतत्वकी सत्ता – अणु, अशरीरी अथवा परम व्यापक तत्त्व – किसी भी रूपमें स्वीकार किया जाय, पर स्वीकार करना ही है, अन्यथा प्राणीको सुख-दुःखका साक्षीरूपसे सदा विद्यमान है, इसीलिये यह उसकी प्रत्येक चेष्टाको जानता रहता है और इस जानकारीका फल यह है कि प्राणीके शुभाशुभ कर्मका फल यथासमय मिलता रहता है | यह ब्रह्मतत्त्व सत्य, ज्ञान एवं आनन्दरूप है तथा अनंत है | सत्य ज्ञानसे पृथक नहीं होता, अनंततासे पृथक आनंद नहीं है | वास्तवमें प्रत्येक जीव सत्य, आनंद एवं ज्ञानस्वरूप ब्रह्म ही है | स्वयंको ब्रह्मरूपमें जानकर जीव अपने वास्तविक स्वरूप सर्वज्ञताको प्राप्त कर लेता है | जैसे एक हेममणि ( पारस ) से अनंत लौहराशि हेममय हो जाती है, उसी प्रकार ईश ( ब्रह्म ) का ज्ञान होनेपर ज्ञानी के द्वारा सकल विश्व जान लिया जाता है, जैसे अन्धकारदोष के कारण रस्सी अपने सत्यस्वरूपमें नहीं दिखायी देती, वैसे ही व्यामोहसे  ग्रस्त जीवको आत्माका दर्शन नहीं होता | जिस प्रकार प्रत्यक्ष होनेपर भी द्रव्य दृष्टि – दोषके कारण सही नहीं दिखायी देता है, अपितु वह कुरूप प्रतीत होता है | उसी प्रकार आकाशकी सरूपताके कारण वह आत्मतत्त्व असत्य एवं पृथक प्रतीत होता है | जैसे रज्जुमें सर्पका और सीपमें रजतका आभास होता है और मृगमरीचिका में जलका आभास होता है, उसी प्रकार विष्णुमें जगतकी प्रतीति होती है |

जैसे कोई द्विज ग्रहाविष्ट होनेके कारण ‘मैं शुद्र हूँ’ ऐसा मानता है और ग्रह-बाधा नष्ट होनेके पश्चात वही व्यक्ति पुन: ध्यान करता हुआ अपनेको ब्राह्मण मानता है, वैसे ही मायासे आच्छन्न जीव यह ‘मैं ही हूँ’ ऐसा स्वीकार करता है | मायारूपी अज्ञान के समाप्त जो जानेपर पुन: वह अपने स्वरूपमें ‘मैं ही ब्रह्म हूँ’ ऐसा मान लेता है | जैसे ग्रहके रूपमें देखता है, वैसे ही अपने स्वरूपका दर्शन होनेपर मायाके अभावमें उसकी मायिक पदार्थोंसे विरक्ति हो जाती है |

जैसे संसार-चक्र अनादि है, वैसे ही उसके मूल भगवानकी माया भी अनादि है | इस मायाके सत और असत दो रूप हैं | व्यवहार-कालमें वह सत और परमार्थत: असत है | मायाके कारण ही अज परमात्मा भी अपनी मायाके आवेशमें जगत के रूपमें परिणत होता है | मायाकी इच्छासे ही पति-पत्नी आदिके रूपमें यह सम्पूर्ण जगत कल्पित है | अट्ठाईस तत्त्वों का यह त्रिगुणात्मक जगत और चौरासी लाख योनियों के नर और नारियोंकी आकृति मायाके द्वारा ही रचित है | त्रिगुणात्मक अट्ठाईस तत्त्वों के रूपमें मायाके द्वारा ही खण्डश: विश्वकी सृष्टि होती है | वस्तुत: नाम, रूप और क्रिया आदि जगतकी सत्ता मध्यमें ही है आदि और अन्तमें नहीं | इसलिये व्यवहार-कालमें सत्य प्रतीत होनेपर भी परमार्थतः यह मिथ्या है | जिस प्रकार स्वप्नावस्थामें रथ आदिकी सत्ता प्रतीत होती है, किन्तु वहाँ उनका अस्तित्व रहता नहीं है | उसी प्रकार जाग्रत अवस्थामें भी वे समृद्धियाँ उस प्राणीके पास नहीं रहतीं | परमार्थतः जैसे जाग्रत-अवस्था और स्वप्न-अवस्था के पदार्थोंका भावाभाव प्रतीत होता है, वैसे ही मायिक पदार्थ भी व्यवहार और परमार्थमें सत-असत हैं | स्वप्न तथा जागृतिकी स्थितिमें ऐसा ही इस परम ब्रह्मका अस्तित्व है, किन्तु सुषुप्तावस्थामें प्राणीका चित्त निश्चल होता है | सभी ज्ञानेंद्रियों एवं कर्मेंद्रियोंके साथ मन उस आत्माके साथ एकाकारकी स्थितिमें रहता है | अत: उस समय सत-असतका कुछ भी ज्ञान प्राणीको नहीं होता | इसी निश्वेष्ट्ताको अचल और अद्वैत पद कहते हैं | ऐसा ही उस ब्रह्मका स्वरूप है |

मायाका अस्तित्व अविचारके कारण ही सिद्ध होता है | किन्तु विचार करनेपर वह अस्तित्वहीन है | यह ब्रह्मके समान निरंतर विद्यमान रहती है, ऐसा नहीं है | यह तो मात्र कल्पना है | इस प्रकार उस असत मायाका आत्मसम्बन्धके कारण सत्यत्व सिद्ध होता है | जो सत्य होता है उसीका अस्तित्व माना जाता है और अस्तित्व के कारण की पदार्थकी सत्यता स्वीकार की जाती है |

हे नारद ! मैं अनंत हूँ | मेरा ज्ञान भी अनंत है | मैं अपनेमें पूर्ण हूँ | आत्माके द्वारा अनुभूत अंत:सुख मैं ही हूँ | सात्त्विक, राजस और तामस गुणसे सम्बन्धित भावोंसे मैं नित्य परे रहता हूँ | मेरी उत्पत्ति अशुद्धतासे नहीं हुई है | मैं शुद्ध हूँ | मैं तो अमृतस्वरूप हूँ | मैं ही ब्रह्म हूँ | मैं प्राणियोंके ह्रदयमें प्रज्वलित वह ज्योति हूँ, जो दीपकके समान उनके अज्ञानरुपी अन्धकारको विनष्ट करती रहती है | यह आत्मज्ञानकी स्थिति है |

नारायण नारायण