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गरुड़पुराण – अध्याय – १०१

garoodh puran

| ॐ श्रीपरमात्मने नम: | ॐ श्री गणेशाय नम: | ॐ नमो भगवते वासुदेवाय |

गरुडपुराण

आचारकाण्ड

अध्याय – १०१

ग्रहशान्ति – निरूपण

याज्ञवल्क्यजी ने कहा – हे मुनियों ! लक्ष्मी एवं सुख-शान्ति के इच्छुक तथा ग्रहों की दृष्टी से दु:खित जनों को ग्रहशान्ति के लिये तत्सम्बन्धित यज्ञ करना चाहिये | विद्वानों के द्वारा सूर्य, सोम, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहू और केतु – ये नौ ग्रह बताये गये हैं | इनकी अर्चा के लिये इनकी मूर्ति क्रमश: इन द्रव्यों से बनानी चाहिये – ताम्र, स्फटिक, रक्तचन्दन, स्वर्ण, सुवर्ण, रजत, अयस ( लोहा ), सीसा तथा कांस्य | अर्थात सूर्यग्रह के लिये ताम्र धातु, चन्द्र के लिये स्फटिक, मंगल के लिये रक्तचन्दन, बुध एवं बृहस्पति के लिये स्वर्ण, शुक्र के लिये रजत, शनि के लिये लोहा, राहू के लिये सीसा तथा केतु के लिये कांस्य धातु प्रशस्त है |

सूर्यका वर्ण लाल, चन्द्रमा का सफेद, मंगल का लाल, बुध तथा बृहस्पति का पीला, शुक्र का श्वेत, शनि, राहू और केतुका काला वर्ण होता है | इसी वर्ण के इनके द्रव्य भी होते है | एक पाटेपर वस्त्र बिछाकर ग्रहवर्णों के अनुसार निर्दिष्ट द्रव्यों के द्वारा विधिपूर्वक उनकी स्थापना तथा पूजा- होम करें | उन्हें सुवर्ण, वस्त्र तथा पुष्प समर्पित करे | उनके लिये गंध, बलि, धूप, गुग्गुल भी देना चाहिये | तत्पश्चात मन्त्रों के द्वारा प्रत्येक ग्रह – देवता के निमित्त चरु पदार्थ अर्पित करना चाहिये |

उसके बाद यथाक्रम ‘ॐ आकृष्णेन रजसा’ इस मन्त्र के द्वारा सूर्य, ‘ ॐ इमं देवा’ मन्त्रसे चन्द्र, ‘ॐ अग्निर्मूर्धादिव: ककुत ‘ मन्त्र के द्वारा मंगल, ‘ ॐ उद्बुध्यस्व’ मन्त्र से बुध, ‘ॐ बृहस्पते’ मन्त्र से बृहस्पति, ‘ॐ अत्रात्परिस्त्रूतम’ मन्त्रसे शुक्र, ‘ॐ शं नो देवी’ मन्त्र के द्वारा शनि, ‘ॐ कयानश्चि’ मन्त्र से राहू तथा ‘ॐ केतुं कृण्वन’ मन्त्र के द्वारा केतु ग्रह के लिये आहुति देनी चाहिये |

इन ग्रहों के लिये क्रमसे मन्दार, पलाश, खैर, अपामार्ग ( चिचड़ा ), पिप्पल, गूलर, शमी, दूर्वा और कुश की समिधाएँ विहित है | इन समिधाओं को घृत, दधि तथा मधुसे मिश्रितकर हवन करना चाहिये | तदनन्तर क्रमानुसार उपर्युक्त मन्त्रों के द्वारा पदार्थों की आहुति प्रदान करें | यथा – सूर्यके लिये गुड़, चन्द्र के लिये भात, मंगल के लिये पायस, बुध के लिये साठी चावल की खीर, बृहस्पति के लिये दही – भात, शुक्र के लिये घृत, शनि के लिये अनेक वर्ण के पकाये हुए धान्य की आहुति देनी चाहिये |

द्विज को चाहिये कि इसी क्रमसे प्रत्येक ग्रह के लिये अन्न भी दानरूप में दें | तदनन्तर प्रत्येक ग्रह के निमित्त यथाक्रम – धेनु, शंख, बैल, सुवर्ण, वस्त्र, अश्व, कृष्णा गौ, अयस  तथा छाग की दक्षिणा देनी चाहिये | इस प्रकार ग्रहों की सदैव पूजा करने से मनुष्य को राज्यादि फल प्राप्त होते हैं |

नारायण नारायण