Category Archives: Shiv Puran

रायपुर आश्रम में शिव रूद्रअभिषेक

रायपुर आश्रम में शिव रूद्रअभिषेक

पूज्य बापूजी की कृपा से 24 जुलाई 2017 को महिला उत्थान मण्डल के बहनों द्वारा भगवन शिवजी के पवित्र श्रावन माह में सावन सोमवारी के उपलक्ष्य पर संत श्री आशारामजी आश्रम रायपुर (छ.ग.) में शिव रूद्रअभिषेक का आयोजन किया गया |

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रायपुर में काँवरियो को प्रसादी वितरण

 रायपुर में काँवरियो को प्रसादी वितरण

        समाज की सेवा में तत्पर युवा सेवा संघ ने, संत श्री आशारामजी बापू की पावन प्रेरणा से,बोलबम की यात्रा करने वाले प्यारे कांवरियों की सेवा करने का आयोजन किया |महादेव घाट,रायपुर  के पास वाले चौराहे पर प्रातः से पंडाल लगाकर, आते जाते कांवरियों को बैठाकर पुलाव प्रसादी, शीतल जल, शरबत, तुलसी की आयुर्वेदिक गोलियों से तृप्त करने में, संघ के युवक लगे थे | साथ ही जिन कांवरियों के पैरों में छाले हो जाते हैं, उनके लिए मेडिकल उपचार का भी प्रबंध था | कांवरियों के साथ नर रुपी नारायणो के लिए भी प्रसादी की व्यवस्था की गयी थी जिसका अभी राहगीरों ने भरपूर आनंद उठाया |

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महाशिवरात्रि पर्व रायपुर

महाशिवरात्रि पर्व रायपुर 

7 मार्च को रायपुर आश्रम में महाशिवरात्रि पर्व पर भगवान सदा शिव का विशेष पूजन ,श्रृंगार , रूद्रअभिषेक ,जप – यज्ञ व जागरण किया गया |महाशिवरात्रि पर्व के उपलक्ष्य पर एक दिन पूर्व  6 मार्च को फुण्डहर ,रायपुर से साधको द्वारा भगवान शिव की झांकी के साथ संकीर्तन यात्रा निकाला गया |

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शिवपुराण – २२७ से २२८

shivpuran9215श्रीपुराणपुरुषोत्तमाय नम :
ॐ श्री गणेशाय नम:
भवाब्धिमग्नं दिनं मां समुन्भ्दर भवार्णवात | कर्मग्राहगृहीतांग दासोऽहं तव् शंकर ||

श्री शिवपुराण – माहात्म्य

कोटिरूद्रसंहिता

अध्याय – २२७ से २२८

मल्लिकार्जुन और महाकालनामक ज्योतिर्लिंगों के आविर्भाव की कथा तथा उनकी महिमा

सूतजी कहते हैंमहर्षियों ! अब मैं मल्लिकार्जुन के प्रादुर्भाव का प्रसंग सुनाता हूँ, जिसे सुनकर बुद्धिमान पुरुष सब पापों से मुक्त हो जाता हैं | जब महाबली तारकशत्रु शिवापुत्र कुमार कार्तिकेय सारी पृथ्वीकी परिक्रमा करके फिर कैलास पर्वतपर आये और गणेशके विवाह आदि की बात सुनकर क्रौंच पर्वतपर चले गये, पार्वती और शिवजी के वहाँ जाकर अनुरोध करनेपर भी नहीं लौटे तथा वहाँ से भी बारह कोस दूर चले गये, तब शिव और पार्वती ज्योतिर्मय स्वरूप धारण करके वहाँ प्रतिष्ठित हो गये | वे दोनों पुत्रस्नेह से आतुर हो पर्व के दिन अपने पुत्र कुमार को देखने के लिए उनके पास जाया करते हैं | अमावस्या के दिन भगवान शंकर स्वयं वहाँ जाते हैं और पौर्णमासी के दिन पार्वतीजी निश्चय ही वहाँ पदार्पण करती है | उसी दिनसे लेकर भगवान शिवका मल्लिकार्जुन नामक एक लिंग तीनों लोकों में प्रसिद्ध हुआ | (उसमें पार्वती और शिव दोनों की ज्योतियाँ प्रतिष्ठित हैं | ‘मल्लिका’ का अर्थ पार्वती है और ‘अर्जुन’ शब्द शिवका वाचक है |) उस लिंग का जो दर्शन करता हैं, वह समस्त पापों से मुक्त हो जाता है और सम्पूर्ण अभीष्टको प्राप्त कर लेता है | इसमें संशय नहीं है | इसप्रकार मल्लिकार्जुन नामक द्वितीय ज्योतिर्लिंग का वर्णन किया गया, जो दर्शनमात्र से लोगों के लिए सब प्रकार का सुख देनेवाला बताया गया है |

ऋषियों ने कहा – प्रभो ! अब आप विशेष कृपा करके तीसरे ज्योतिर्लिग का वर्णन कीजिये |

सूतजी ने कहा – ब्राह्मणों ! मैं धन्य हूँ, कृतकृत्य हूँ, जो आप श्रीमानोंका संग मुझे प्राप्त हुआ | साधू पुरुषों का संग निश्चय ही धन्य है | अत: मैं अपना सौभाग्य समझकर पापनाशिनी परम पावनी दिव्य कथाका वर्णन करता हूँ | तुमलोग आदरपूर्वक सुनो | अवन्ति नामसे प्रसिद्ध एक रमणीय नगरी है, जो समस्त देहधारियों को मोक्ष प्रदान करनेवाली हैं | वह भगवान शिवको बहुत ही प्रिय, परम पुण्यमयी और लोकपावनी है | उस पूरी में एक श्रेष्ठ ब्राह्मण रहते थे, जो शुभकर्मपरायण, वेदों के स्वाध्याय में संलग्न तथा वैदिक कर्मों के अनुष्ठान में सदा तत्पर रहनेवाले थे | वे घरमें अग्नि की स्थापना करके प्रतिदिन अग्निहोत्र करते और शिव की पूजा में सदा तत्पर रहते थे | वे ब्राह्मण देवता प्रतिदिन पार्थिव शिवलिंग बनाकर उसकी पूजा किया करते थे | वेदप्रिय नामक वे ब्राह्मण देवता सम्यक ज्ञानार्जन में लगे रहते थे; इसलिये उन्होंने सम्पूर्ण कर्मों का फल पाकर वह सदगति प्राप्त कर ली, जो संतों को ही सुलभ होती है | उसके शिवपूजापरायण चार तेजस्वी पुत्र थे, जो पिता-मातासे सद्गुणों में कम नहीं थे | उनके नाम थे – देवप्रिय, प्रियमेधा, सुकृत और सुव्रत | उनके सुखदायक गुण वहाँ सदा बढने लगे | उनके कारण अवन्ति नगरी ब्रह्मतेजसे परिपूर्ण हो गयी थी |

उसी समय रत्नमाल पर्वतपर दूषण नामक एक धर्मद्वेषी असुरने ब्रह्माजीसे वर पाकर वेद, धर्म तथा धर्मात्माओंपर आक्रमण किया | अंत में उसने सेना लेकर अवन्ति (उज्जैन) के ब्राह्मणोंपर भी चढाई कर दी | उसकी आज्ञा से चार भयानक दैत्य चारो दिशाओं में प्रलयाग्नि के समान प्रकट हो गये, परन्तु वे शिवविश्वासी ब्राह्मण-बन्धु उनमें डरे नहीं | जब नगर के ब्राह्मण बहुत घबरा गये, तब उन्होंने उनको आश्वासन देते हुए कहा- ‘आपलोग भक्तवत्सल भगवान शंकरपर भरोसा रखें |’ यों कह शिवलिंग का पूजन करके वे भगवान शिवका ध्यान करने लगे |

इतने में ही सेनासहित दूषण ने आकर उन ब्राह्मणों को देखा और कहा – ‘इन्हें मार डालो, बाँध लो |’ वेदप्रिय के पुत्र उन ब्राह्मणों ने उस समय उस दैत्य की कही हुई वह बात नहीं सुनी; क्योंकि वे भगवान शम्भु के ध्यान-मार्ग में स्थित थे | उस दुष्टात्मा दैत्य ने ज्यों ही उन ब्राह्मणों को मारने की इच्छा की, त्यों ही उनके द्वारा पूजित पार्थिव शिवलिंग के स्थान में बड़ी भारी आवाज के साथ एक गट्ठा प्रकट हो गया | उस गट्ठे से तत्काल विकटरूपधारी भगवान शिव प्रकट हो गये, जो महाकाल नामसे विख्यात हुए | ये दुष्टों के विनाशक तथा सत्पुरुषों के आश्रयदाता हैं | उन्होंने उन दैत्यों से कहा – ‘अरे खल ! मैं तुझ-जैसे दुष्टों के लिये महाकाल प्रकट हुआ हूँ | तुम इन ब्राह्मणों के निकट से दूर भाग जाओ |’

ऐसा कहकर महाकाल शंकर ने सेनासहित दूषण को अपने हुंकारमात्र से तत्काल भस्म कर दिया | कुछ सेना उनके द्वारा मारी गयी और कुछ भाग खड़ी हुई | परमात्मा शिवने दूषण का वध कर डाला | जैसे सूर्य को देखकर सम्पूर्ण अन्धकार नष्ट हो जाता हैं, उसीप्रकार भगवान शिवको देखकर उसकी सारी सेना अदृश्य हो गयी | देवताओं की दुन्दुभियाँ बज उठी और आकाश से फूलों की वर्षा होने लगी | उन ब्राह्मणों को आश्वासन दे सुप्रसन्न हुए स्वयं महाकाल महेश्वर शिवने उनसे कहा – ‘तुमलोग वर माँगो |’ उनकी यह बात सुनकर वे सब ब्राह्मण हाथ जोड़ भक्तिभाव से भलीभांति प्रणाम करके नतमस्तक हो बोले |

द्विजों ने कहा – महाकाल ! महादेव ! दुष्टों को दंड देनेवाले प्रभो ! शम्भो ! आप हमें संसारसागर से मोक्ष प्रदान करें | शिव ! आप जनसाधारण की रक्षा के लिये सदा यहीं रहें | प्रभो ! शम्भो ! अपना दर्शन करनेवाले मनुष्योंका आप सदा ही उद्धार करें |

सूतजी कहते हैं – महर्षियों ! उनके ऐसा कहनेपर उन्हें सदगति दे भगवान शिव अपने भक्तों की रक्षा के लिए उस परम सुंदर गड्डे में स्थित हो गये | वे ब्राह्मण मोक्ष पा गये और वहाँ चारों ओरकी एक-एक कोस भूमि लिंगरूपी भगवान शिवका स्थल बन गयी | वे शिव भूतलपर महाकालेश्वर के नामसे विख्यात हुए |

ब्राह्मणों ! उनका दर्शन करने से स्वप्न में भी कोई दुःख नहीं होता | जिस-जिस कामना को लेकर कोई इस लिंग की उपासना करता है, उसे वह अपना मनोरथ प्राप्त हो जाता है तथा परलोक में मोक्ष भी मिल जाता है |

– ॐ नम: शिवाय –

शिवपुराण – २२० से २२६

shivpuran9215श्रीपुराणपुरुषोत्तमाय नम :
ॐ श्री गणेशाय नम:
भवाब्धिमग्नं दिनं मां समुन्भ्दर भवार्णवात | कर्मग्राहगृहीतांग दासोऽहं तव् शंकर ||

श्री शिवपुराण – माहात्म्य

कोटिरूद्रसंहिता

अध्याय – २२० से २२६

प्रथम ज्योतिर्लिंग सोमनाथ के प्रादुर्भाव की कथा और उसकी महिमा

सूतजी बोले – ब्राह्मणों ! मैंने सद्गुरुसे जो कुछ सुना है, वह ज्योतिर्लिंगों का माहात्म्य तथा उनके प्राकट्यका प्रसंग अपनी बुद्धि के अनुसार संक्षेप से ही सुनाउँगा | तुम सब लोग सुनो | मुने ! ज्योतिर्लिंगों में सबसे पहले सोमनाथ का नाम आता है; अत: पहले उन्हों के माहात्म्य को सावधान होकर सुनो | मुनीश्वरो ! महामना प्रजापति दक्ष ने अपनी अश्विनी आदि सत्ताईस कन्याओं का विवाह चन्द्रमा के साथ किया था | चन्द्रमा को स्वामी के रूप में पाकर वे दक्षकन्याएँ विशेष शोभा पाने लगी तथा चन्दमा भी उन्हें पत्नी के रूप में पाकर निरंतर सुशोभित होने लगे | उन सब पत्नियों में भी जो रोहिणी नामकी पत्नी थी | एकमात्र वहीँ चन्द्रमा को जितनी प्रिय थी, उतनी दूसरी कोई पत्नी कदापि प्रिय नहीं हुई | इससे दूसरी स्त्रियों को बड़ा दुःख हुआ | वे सब अपने पिताकी शरण में गयीं | वहाँ जाकर उन्होंने जो भी दुःख था; उसे पिताको निवेदन किया | द्विजो ! वह सब सुनकर दक्ष भी दु:खी हो गये और चन्द्रमा के पास आकर शांतिपूर्वक बोले |

दक्षने कहा – कलानिधे ! तुम निर्मल कुल में उत्पन्न हुए हो | तुम्हारे आश्रय में रहनेवाली जितनी स्त्रियाँ हैं, उन सबके प्रति तुम्हारे मनमें न्यूनाधिकभाव क्यों है ? तुम किसीको अधिक और किसी को कम प्यार क्यों करते हो ? अबतक जो किया, सो किया, अब आगे फिर कभी ऐसा विषमतापूर्ण बर्ताव तुम्हे नहीं करना चाहिये; क्योंकि उसे नरक देनेवाला बताया गया है |

सूतजी कहते हैं – महर्षियों ! अपने दामाद चन्द्रमा से स्वयं ऐसी प्रार्थना करके प्रजापति दक्ष घर को चले गये | उन्हें पूर्ण निश्चय हो गया था कि अब फिर आगे ऐसा नही होगा | पर चन्द्रमा ने प्रबल भावों से विवश होकर उनकी बात नहीं मानी | वे रोहिणी में इतने आसक्त हो गये थे कि दूसरी किसी पत्नी का कभी आदर नहीं करते थे | इस बातको सुनकर दक्ष दु:खी हो फिर स्वयं आकर चन्द्रमा को उत्तम नित्त्तिसे समझाने तथा न्यायोचित बर्ताव के लिये प्रार्थना करने लगे |

दक्ष बोले – चन्द्रमा ! सुनो, मैं पहले अनेक बार तुमसे प्रार्थना कर चूका हूँ | फिर भी तुमने मेरी बात नहीं मानी | इसलिये आज शाप देता हैं कि तुम्हे क्षय का रोग हो जाय |

सूतजी कहते हैं – दक्ष के इतना कहते ही क्षणभर में चन्द्रमा क्षयरोग से ग्रस्त हो गये | उनके क्षीण होते ही उससमय सब ओर महान हाहाकार मच गया | सब देवता और ऋषि कहने लगे कि ‘हाय ! हाय ! अब क्या करना चाहिये, चन्द्रमा कैसे ठीक होंगे ?’ मुने ! इसप्रकार दुःख में पड़कर वे सब लोग विव्हल हो गये | चन्द्रमा ने इंद्र आदि सब देवताओं तथा ऋषियों को अपनी अवस्था सूचित की | तब इंद्र आदि देवता तथा वसिष्ठ आदि ऋषि ब्रह्माजी की शरण में गये |

उनकी बात सुनकर ब्रह्माजी ने कहा – देवताओं ! जो हुआ, सो हुआ | अब वह निश्चय ही पलट नहीं सकता | अत: उसके निवारण के लिये मैं तुम्हे एक उत्तम उपाय बताता हूँ | आदरपूर्वक सुनो | चन्द्रमा देवताओं के साथ प्रभास नामक शुभ क्षेत्र में जायँ और वहाँ मृत्युंजयमन्त्र का विधिपूर्वक अनुष्ठान करते हुए भगवान शिवकी आराधना करें | अपने सामने शिवलिंग की स्थापन करके वहाँ चन्द्रदेव नित्य तपस्या करें | इससे प्रसन्न होकर शिव उन्हें क्षयरहित कर देंगे |

तब देवताओं का तथा ऋषियों के कहने से ब्रह्माजी की आज्ञा के अनुसार चन्द्रमा ने वहाँ छ: महीने तक निरंतर तपस्या की, मृत्युंजयमन्त्र से भगवान वृषभध्वज का पूजन किया | दस करोड़ मन्त्र का जप और मृत्युंजयका ध्यान करते हुए चन्द्रमा वहाँ स्थिरचित होकर लगातार खड़े रहे | उन्हें तपस्या करते देख भक्तवत्सल भगवान शंकर प्रसन्न हो उनके सामने प्रकट हो गये और अपने भक्त चन्द्रमा से बोले |

शंकरजी ने कहा – चन्द्रदेव ! तुम्हारा कल्याण हो; तुम्हारे मनमें जो अभीष्ट हो, वह वर माँगों | मैं प्रसन्न हूँ | तुम्हें सम्पूर्ण उत्तम वर प्रदान करूँगा |

चन्द्रमा बोले – देवेश्वर ! यदि आप प्रसन्न हैं तो मेरे लिये क्या असाध्य हो सकता हैं; तथापि प्रभो ! शंकर ! आप मेरे शरीर के इस क्षयरोग का निवारण कीजिये | मुझसे जो अपराध बन गया हो, उसे क्षमा कीजिये |

शिवजी ने कहाचन्द्रदेव ! एक पक्ष में प्रतिदिन तुम्हारी कला क्षीण हो और दूसरे पक्ष में फिर वह निरंतर बढती रहे |

तदनन्तर चन्द्रमा ने भक्तिभावसे भगवान शंकर की स्तुति की | इससे पहले निराकार होते हुए भी वे भगवान शिव फिर साकार हो गये | देवताओंपर प्रसन्न हो उस क्षेत्र के माहात्म्य को बढाने तथा चन्द्रमा के यशका विस्तार करने के लिये भगवान शंकर उन्ही के नामपर वहाँ सोमेश्वर कहलाये और सोमनाथ के नामसे तीनों लोकों में विख्यात हुए | ब्राह्मणों ! सोमनाथ का पूजन करने से वे उपासक के क्षय तथा कोढ़ आदि रोगों का नाश कर देते हैं | वे चन्द्रमा धन्य हैं, कृतकृत्य हैं, जिनके नामसे तीनों लोकों के स्वामी साक्षात भगवान शंकर भूतल को पवित्र करते हुए प्रभासक्षेत्र में विद्यमान हैं | वही सम्पूर्ण देवताओं ने सोमकुंड की भी स्थापना की हैं, जिसमें शिव और ब्रह्माका सदा निवास माना जाता है |

चन्द्रकुंड इस भूतलपर पापनाशन तीर्थ के रूप में प्रसिद्ध है | जो मनुष्य उसमें स्नान करता हैं, वह सब पापों से मुक्त हो जाता हैं | क्षय आदि जो असाध्य रोग होते हैं, वे सब उस कुंड में छ: मासतक स्नान करनेमात्र से नष्ट हो जाते हैं | मनुष्य जिस फलके उद्देश्य से इस उत्तम तीर्थ का सेवन करता है, उस फलको सर्वथा प्राप्त कर लेता हैं – इसमें संशय नहीं हैं |

चन्द्रमा नीरोग होकर अपना पुराना कार्य सँभालने लगे | इसप्रकार मैंने सोमनाथ की उत्पत्ति का सारा प्रसंग सुना दिया | मुनीश्वरो ! इस तरह सोमेश्वरलिंग का प्रादुर्भाव हुआ है | जो मनुष्य सोमनाथ के प्रादुर्भाव की इस कथा को सुनता अथवा दूसरों को सुनाता हैं, वह सम्पूर्ण अभीष्ट को पाता और सब पापों से मुक्त हो जाता है |

– ॐ नम: शिवाय –

शिवपुराण – शिवजी के द्वादश ज्योतिर्लिंगावतार – २१९

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ॐ श्री गणेशाय नम:
भवाब्धिमग्नं दिनं मां समुन्भ्दर भवार्णवात | कर्मग्राहगृहीतांग दासोऽहं तव् शंकर ||

श्री शिवपुराण – माहात्म्य

शतरूद्रसंहिता

अध्याय – २१९

शिवजी के द्वादश ज्योतिर्लिंगावतारों का सविस्तर वर्णन

नन्दीश्वरजी कहते हैंमुने ! अब तुम सर्वव्यापी भगवान शंकर के बारह अन्य ज्योतिर्लिंगस्वरूपी अवतारों का वर्णन श्रवण करो, जो अनेक प्रकार के मंगल करनेवाले हैं | उनके नाम ये हैं – सौराष्ट्र में सोमनाथ, श्रीशैलपर मल्लिकार्जुन, उज्जयिनी में महाकाल, ओंकार में अमरेश्वर, हिमालयपर केदार, डाकिनी में भीमशंकर, काशी में विश्वनाथ, गौतमी के तटपर त्र्यम्बकेश्वर, चिताभूमि में वैद्यनाथ, दारुकवन में नागेश्वर, सेतुबंधपर रामेश्वर और शिवालय में घुश्मेश्वर | परमात्मा शम्भु के ये ही वे बारह अवतार हैं | ये दर्शन और स्पर्श करने से मनुष्यों को सब प्रकार का आनंद प्रदान करते हैं |

somnathमुने ! उनमें पहला अवतार सोमनाथ का है | यह चन्द्रमा के दुःख का विनाश करनेवाला है | इनका पूजन करने से क्षय और कुष्ठ आदि रोगों का नाश हो जाता हैं | यह सोमेश्वर नामक शिवावतार सौराष्ट्र नामक पावन प्रदेश में लिंगरूप से स्थित है | पूर्वकाल में चन्द्रमा ने इनकी पूजा की थी | वहीँ सम्पूर्ण पापोंका विनाश करनेवाला एक चन्द्रकुंड हैं , जिसमें स्नान करनेसे बुद्धिमान मनुष्य सम्पूर्ण रोगों से मुक्त हो जाता हैं | परमात्मा शिव के सोमेश्वर नामक महालिंग का दर्शन करने से मनुष्य पाप से छुट जाता है और उसे भोग और मोक्ष सुलभ हो जाते हैं |

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Mallikarjunतात ! शंकरजीका मल्लिकार्जुन नामक दूसरा अवतार श्रीशैलपर हुआ | वह भक्तों को अभीष्ट फल प्रदान करनेवाला है | मुने ! भगवान शिव परम प्रसन्नतापूर्वक अपने निवासभूत कैलासगिरी से लिंगरूप से श्रीशैलपर पधारे है | पुत्र – प्राप्ति के लिये इनकी स्तुति की जाती है | मुने ! यह जो दूसरा ज्योतिर्लिग हैं, वह दर्शन और पूजन करने से महा सुखकारक होता है और अंत में मुक्ति भी प्रदान कर देता है – इसमें तनिक भी संशय नहीं है |

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mahakaleshwarतात ! शंकरजी का महाकाल नामक तीसरा अवतार उज्जयिनी नगरी में हुआ | वह अपने भक्तों की रक्षा करनेवाला है | एक बार रतनमाल – निवासी दूषण नामक असुर, जो वैदिक धर्म का विनाशक, विप्रद्रोही तथा सब कुछ नष्ट करनेवाला था, उज्जयिनी में जा पहुँचा | तब वेद नामक ब्राह्मण के पुत्र ने शिवजी का ध्यान किया | फिर तो शंकरजी ने तुरंत ही प्रकट होकर हुंकारद्वारा उस असुर को भस्म कर दिया | तत्पश्चात अपने भक्तों का सर्वथा पालन करनेवाले शिव देवताओं के प्रार्थना करनेपर महाकाल नामक ज्योतिर्लिगस्वरुप से वहीँ प्रतिष्ठित हो गये | इन महाकाल नामक लिंग का प्रयत्नपूर्वक दर्शन और पूजन करने से मनुष्य की सारी कामनाएँ पूर्ण हो जाती है और अंत में उसे परम गति प्राप्त होती है |

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onkaareshwarपरम आत्मबल से सम्पन्न परमेश्वर शम्भु ने भक्तों को अभीष्ट फल प्रदान करनेवाला ओंकार नामक चौथा अवतार धारण किया | मुने ! विन्ध्यगिरी ने भक्तिपूर्वक विधि-विधानसे शिवजी का पार्थिवलिंग स्थापित किया | उसी लिंग से विन्ध्य का मनोरथ पूर्ण करनेवाले महादेव प्रकट हुए | तब देवताओं के प्रार्थना करनेपर भुक्ति-मुक्ति के प्रदाता भक्तवत्सल लिंगरूपी शंकर वहाँ दो रूपों में विभक्त हो गये | मुनीश्वर ! उनमे एक भाग ओंकार में ओंकारेश्वर नामक उत्तम लिंग के रूप में प्रतिष्ठित हुआ और दूसरा पार्थिवलिंग परमेश्वर नामसे प्रसिद्ध हुआ | मुने इन दोनों में जिस किसीका भी दर्शन-पूजन किया जाय, उसे भक्तों की अभिलाषा पूर्ण करनेवाला समझना चाहिये | महामुने ! इसप्रकार मैंने तुम्हें इन दोनों महादिव्य ज्योतिर्लिंगों का वर्णन सुना दिया |

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kedareshwarपरमात्मा शिव के पाँचवे अवतार का नाम है केदारेश | वह केदार में ज्योतिर्लिंगरूप से स्थित हैं | मुने ! वहाँ श्रीहरि के जो नर-नारायण नामक अवतार हैं, उनके प्रार्थना करनेपर शिवजी हिमगिरि के केदारशिखरपर स्थित हो गये | वे दोनों उस केदारेश्वर लिंग की नित्य पूजा करते हैं | वहाँ शम्भु दर्शन और पूजन करनेवाले भक्तों को अभीष्ट प्रदान करते हैं | तात ! सर्वेश्वर होते हुए भी शिव इस खंड के विशेषरूप से स्वामी है | शिवजी का यह अवतार सम्पूर्ण अभिष्टोंको प्रदान करनेवाला हैं |

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bhimashankarमहाप्रभु शम्भु के छठे अवतार का नाम भीमशंकर हैं | इस अवतार में उन्होंने बड़ी-बड़ी लीलाएँ की है और भीमासुरका विनाश किया है | कामरूप देश के अधिपति राजा सुदक्षिण शिवजी के भक्त थे | भीमासुर उन्हें पीड़ित कर रहा था | तब शंकरजी ने अपने भक्त को दुःख देनेवाले उस अद्भुत असुर का वध करके उनकी रक्षा की | फिर राजा सुदक्षिण के प्रार्थना करनेपर स्वयं शंकरजी डाकिनी में भीमशंकर नामक ज्योतिर्लिंगस्वरूप से स्थित हो गये |

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vishwamathमुने ! जो समस्त ब्रह्माण्डस्वरुप तथा भोग- मोक्ष का प्रदाता है, वह विश्वेश्वर नामक सातवाँ अवतार काशी में हुआ | मुक्तिदाता सिद्धस्वरूप स्वयं भगवान शंकर अपनी पूरी काशी में ज्योतिर्लिंगरूप में स्थित हैं | विष्णु आदि सभी देवता, कैलासपति शिव और भैरव नित्य उनकी पूजा करते हैं | जो काशी-विश्वनाथ के भक्त हैं और नित्य उनके नामों का जप करते रहते हैं, वे कर्मों से निर्लिप्त होकर कैवल्य-पद के भागी होते हैं |

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tryambakचन्द्रशेखर शिवका जो त्र्यम्बक नामक आठवाँ अवतार हैं, वह गौतम ऋषि के प्रार्थना करनेपर गौतमी नदी के तटपर प्रकट हुआ था | गौतमकी प्रार्थना से उन मुनि को प्रसन्न करने के लिये शंकरजी प्रेमपूर्वक ज्योतिर्लिंगस्वरूप से वहाँ अचल होकर स्थित हो गये | अहो ! उन महेश्वर का दर्शन और स्पर्श करने से सारी कामनाएँ सिद्ध हो जाती हैं | तत्पश्चात मुक्ति भी मिल जाती है | शिवजी के अनुग्रह से शंकरप्रिया परम पावनी गंगा गौतम के स्नेहवश वहाँ गौतमी नामसे प्रवाहित हुई |

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baidyanathaउनमें नवाँ अवतार वैद्यनाथ नामसे प्रसिद्ध हैं | इस अवतार में बहुत-सी विचित्र लीलाएँ करनेवाले भगवान शंकर रावण के लिये आविर्भूत हुए थे | उस समय रावणद्वारा अपने लाये जानेको ही कारण मानकर महेश्वर ज्योतिर्लिंगस्वरूप से चिता-भूमि में प्रतिष्ठित हो गये | उस समयसे वे त्रिलोकी में वैद्यनाथेश्वर नामसे विख्यात हुए | वे भक्तिपूर्वक दर्शन और पूजन करनेवाले को भोग-मोक्ष के प्रदाता हैं | मुने ! जो लोग इन वैद्यनाथेश्वर शिव के माहात्म्य को पढ़ते अथवा सुनते हैं, उन्हें यह भुक्ति-मुक्तिका भागी बना देता है |

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nageshwarदसवाँ नागेश्वरावतार कहलाता हैं | यह अपने भक्तों की रक्षा के लिये प्रादुर्भूत हुआ था | यह सदा दुष्टों को दंड देता रहता हैं | इस अवतार में शिवजी ने दारुक नामक राक्षस को, जो धर्मघाती था, मारकर वैश्यों के स्वामी अपने सुप्रिय नामक भक्तकी रक्षा की थी | तत्पश्चात बहुत-सी लीलाएँ करनेवाले वे परात्पर प्रभु शम्भु लोकोंका उपकार करने के लिये अम्बिकासहित ज्योतिर्लिंगस्वरूप से स्थित हो गये | मुने ! नागेश्वर नामक इस शिवलिंग का दर्शन तथा अर्चन करने से राशि-के-राशि महान पातक तुरंत विनष्ट हो जाते हैं |

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raneshwarमुने ! शिवजीका ग्यारहवाँ अवतार रामेश्वरावतार कहलाता हैं | वह श्रीरामचन्द्रका प्रिय करनेवाला है | उसे श्रीराम ने ही स्थापित किया था | जिन भक्तवत्सल शंकर ने परम प्रसन्न होकर श्रीराम को प्रेमपूर्वक विजय का वरदान दिया, वे ही लिंगरूप में आविर्भूत हुए | मुने ! तब श्रीराम के अत्यंत प्रार्थना करनेपर वे सेतुबंधपर ज्योतिर्लिंगरूप से स्थित हो गये ! उस समय श्रीराम ने उनकी भलिभाँति सेवा-पूजा की | रामेश्वर की अद्भुत महिमा की भूतलपर किसी से तुलना नहीं की जा सकती | यह सर्वदा भुक्ति-मुक्ति की प्रदायिनी तथा भक्तों की कामना पूर्ण करनेवाली है | जो मनुष्य सद्भक्तिपूर्वक रामेश्वर लिंग को गंगाजल से स्नान कराएगा, वह जीवन्मुक्त ही है | वह इस लोक में जो देवताओं के लिये भी दुर्लभ हैं, ऐसे सम्पूर्ण भोगों को भोगने के पश्चात परम ज्ञान को प्राप्त होगा | फिर उस कैवल्य मोक्ष मिल जायगा |

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ghushmeshwarघुश्मेश्वरावतार शंकरजी का बारहवाँ अवतार हैं | वह नाना प्रकार की लीलाओं का कर्ता, भक्तवत्सल तथा घुश्मा को आनंद देनेवाला हैं | मुने ! घुश्माका प्रिय करने के लिये भगवान शंकर दक्षिण दिशामें स्थित देवशैल के निकटवर्ती एक सरोवर में प्रकट हुए | मुने ! घुश्मा के पुत्रको सुदेह्यने मार डाला था | उसे जीवित करने के लिये घुश्माने शिवजी की आराधना की | तब उनकी भक्ति से संतुष्ट होकर भक्तवत्सल शम्भुने उनके पुत्र को बचा लिया | तदनंतर कामनाओं के पूरक शम्भु घुश्मा की प्रार्थना से उस तड़ाग में ज्योतिर्लिंगस्वरूप से स्थित हो गये ! उससमय उनका नाम घुश्मेश्वर हुआ | जो मनुष्य उस शिवलिंग का भक्तिपूर्वक दर्शन तथा पूजन करता हैं, वह इस लोक में सम्पूर्ण सुखों को भोगकर अंत में मुक्ति-लाभ करता है |

सनत्कुमारजी ! इस प्रकार मैंने तुमसे इस बारह दिव्य ज्योतिर्लिंगों का वर्णन किया | य सभी भोग और मोक्ष के प्रदाता हैं | जो मनुष्य ज्योतिर्लिंगों की इस कथा को पढ़ता अथवा सुनता है, वह सम्पूर्ण पापों से मुक्त हो जाता हैं तथा भोग-मोक्ष को प्राप्त करता हैं |

– ॐ नम: शिवाय –

शिवपुराण – २१८

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श्रीपुराणपुरुषोत्तमाय नम :
ॐ श्री गणेशाय नम:
भवाब्धिमग्नं दिनं मां समुन्भ्दर भवार्णवात | कर्मग्राहगृहीतांग दासोऽहं तव् शंकर ||

श्री शिवपुराण – माहात्म्य

शतरूद्रसंहिता

अध्याय – २१८

भगवान शिव के अवधूतेश्वरावतार की कथा और उसकी महिमा का वर्णन

नन्दीश्वर कहते हैंसनत्कुमार ! अब तुम परमेश्वर शिवके अवधूतेश्वर नामक अवतार का वर्णन सुनो, जिसने इंद्र के घमंड को चूर-चूर कर दिया था | पहले की बात हैं, इंद्र सम्पूर्ण देवताओं तथा ब्रुह्स्पतिजी को साथ लेकर भगवान शिव का दर्शन करने के लिये कैलास पर्वतपर गये | उससमय बबृहस्पति और इंद्र के शुभागमन की बात जानकर भगवान शंकर उन दोनों की परीक्षा लेने के लिये अवधूत बन गये | उनके शरीरपर कोई वस्त्र नहीं था | वे प्रज्वलित अग्नि के समान तेजस्वी होने के कारण महाभयंकर जान पड़ते थे | उनकी आकृति बड़ी सुंदर दिखायी देती थी | वे राह रोककर खड़े थे | बृहस्पति और इंद्र ने शिव के समीप जाते समय देखा, एक अद्भुत शरीरधारी पुरुष रास्ते के बीच में खड़ा है | इंद्र को अपने अधिकारपर बड़ा गर्व था | इसलिये वे यह न जान सके कि ये साक्षात भगवान शंकर है | उन्होंने मार्ग में खड़े हुए पुरुष से पूछा – ‘तुम कौन हो ? इस नग्न अवधूतवेश में कहाँ से आये हो ? तुम्हारा नाम क्या है ? सब बातें ठीक-ठीक बताओ | देर न करो | भगवान शिव अपने स्थानपर हैं या इस समय कहीं अन्यत्र गये है ? मैं देवताओं तथा गुरूजी के साथ उन्हीं के दर्शन के लिये जा रहा हूँ |’

इंद्र के बारंबार पूछनेपर भी महान कौतुक करनेवाले अहंकारहारी महायोगी त्रिलोकीनाथ शिव कुछ न बोले | चुप ही रहे | तब अपने ऐश्वर्य का घमंड रखनेवाले देवराज इंद्र ने रोष में आकर उस जटाधारी पुरुष को फटकारा और इस प्रकार कहा |

इंद्र बोले – अरे मूढ़ ! दुर्मते ! तू बार-बार पूछनेपर भी उत्तर नही देता ? अत: तुझे वज्र से मारता हूँ | देखूँ कौन तेरी रक्षा करता है |

ऐसा कह उस दिगम्बर पुरुष की ओर क्रोधपूर्वक देखते हुए इंद्र ने उसे मार डालने के लिये वज्र उठाया | यह देख भगवान शंकर ने शीघ्र ही उस वज्र का स्तम्भन कर दिया | उनकी बाँह अकड गयी | इसलिये वे वज्र का प्रहार न कर सके | तदनन्तर वह पुरुष तत्काल ही क्रोध के कारण तेजसे प्रज्वलित हो उठा, मानो इंद्र को जलाये देता हो | भुजाओं के स्तम्भित हो जानेके कारण शचीवल्लभ इंद्र क्रोध से उस सर्प की भान्ति जलने लगे, जिसका पराक्रम मन्त्र के बलसे अवरुद्ध हो गया हो | बृहस्पति ने उस पुरुष को अपने तेजसे प्रज्वलित होता देख तत्काल ही यह समझ लिया कि ये साक्षात भगवान हर हैं | फिर तो वे हाथ जोड़ प्रणाम करके उनकी स्तुति करने लगे | स्तुति के पश्चात उन्होंने इंद्र को उनके चरणों में गिरा दिया और कहा – ‘दीनानाथ महादेव ! यह इंद्र आपके चरणों में पड़ा है | आप इसका और मेरा उद्धार करें | हम दोनोंपर क्रोध नहीं, प्रेम करें | महादेव ! शरणागत इंद्र की रक्षा कीजिये | आपके ललाट से प्रकट हुई यह आग इन्हें जलाने के लिये आ रही है |’

बृहस्पतिकी यह बात सुनकर अवधूतवेषधारी करुणासिन्धु शिवने हँसते हुए कहा – ‘अपने नेत्र से रोषवश बाहर निकली हुई अग्नि को मैं पुन: कैसे धारण कर सकता हूँ | क्या सर्प अपनी छोड़ी हुई केंचुल को फिर ग्रहण करता हैं ?’

बृहस्पति बोले – देव ! भगवन ! भक्त सदा ही कृपा के पात्र होते हैं | आप अपने भक्तवत्सल नामको चरितार्थ कीजिये और इस भयंकर तेजको कहीं अन्यत्र हाल दीजिये |

रूद्र ने कहा – देवगुरो ! मैं तुमपर प्रसन्न हूँ | इसलिये उत्तम वर देता हूँ | इंद्र को जीवनदान देने के कारण आजसे तुम्हारा एक नाम जीव भी होगा | मेरे ललाटवर्ती नेत्र से जो यह आग प्रकट हुई हैं, इसे देवता नहीं सह सकते | अत: इसको मैं बहुत दूर छोड़ूंगा, जिससे यह इंद्र को पीड़ा न दे सके |

ऐसा कहकर अपने तेज:स्वरूप उस अद्भुत अग्नि को हाथ में लेकर भगवान शिवने क्षार समुद्र में फेंक दिया | वहाँ फेंके जाते ही भगवान शिवका वह तेज तत्काल एक बालक के रूप में परिणत हो गया, जो सिन्धुपुत्र जलंधर नामसे विख्यात हुआ | फिर देवताओं की प्रार्थना से भगवान शिवने ही असुरों के स्वामी जलंधर का वध किया था | अवधूतरूप से ऐसी सुंदर लीला करके लोककल्याणकारी शंकर वहाँ से अन्तर्धान हो गये | फिर सब देवता अत्यंत निर्भय एवं सुखी हुए | इंद्र और बृहस्पति भी उस भयसे मुक्त हो उत्तम सुख के भागी हुए | जिसके लिये उनक आना हुआ था, वह भगवान शिवका दर्शन पाकर कृतार्थ हुए | इंद्र और बृहस्पति प्रसन्नतापूर्वक अपने स्थान को चले गये | सनत्कुमार ! इस प्रकार मैंने तुमसे परमेश्वर शिव के अवधूतेश्वर नामक अवतार का वर्णन किया है |

जो दुष्टों को दंड एवं भक्तों को परम आनंद प्रदान करनेवाला है | यह दिव्य आख्यान पापका निवारण करके यश, स्वर्ग, भोग, मोक्ष तथा सम्पूर्ण मनोवांछित फल की प्राप्ति करानेवाला है | जो प्रतिदिन एकाग्रचित्त हो इसे सुनता या सुनाता हैं, वह इह लोक में सम्पूर्ण सुखों का उपभोग करके अंत में शिवकी गति प्राप्त कर लेता है |

– ॐ नम: शिवाय –

शिवपुराण – २१७

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श्रीपुराणपुरुषोत्तमाय नम :
ॐ श्री गणेशाय नम:
भवाब्धिमग्नं दिनं मां समुन्भ्दर भवार्णवात | कर्मग्राहगृहीतांग दासोऽहं तव् शंकर ||

श्री शिवपुराण – माहात्म्य

शतरूद्रसंहिता

अध्याय – २१७

भगवान शिव के कृष्णदर्शन नामक अवतार की कथा

नन्दीश्वर कहते हैंसनत्कुमारजी ! भगवान शम्भु के एक उत्तम अवतार का नाम कृष्णदर्शन हैं, जिसने राजा नभग को ज्ञान प्रदान किया था | उसका वर्णन करता हूँ, सुनो |

श्राद्धदेव नामक मनु के जो इक्ष्वाकु आदि पुत्र थे, उनमें नवम का नाम नभग था, जिनका पुत्र नाभाग नामसे प्रसिद्ध हुआ | नाभाग के ही पुत्र अम्बरीष हुए, जो भगवान विष्णु के भक्त थे तथा जिनकी ब्राह्मणभक्ति देखकर उनके ऊपर महर्षि दुर्वासा प्रसन्न हुए थे | मुने ! अम्बरीष के पितामह जो नभग कहे गये हैं, उनके चरित्रका वर्णन सुनो |

उन्हीं को भगवान शिवने ज्ञान प्रदान किया था | मनुपुत्र नभग बड़े बुद्धिमान थे | उन्होंने विद्याध्ययन के लिये दीर्घकालतक इन्द्रियसंयमपूर्वक गुरुकुल में निवास किया | इसी बीच में इक्ष्वाकु आदि भाइयों ने नभग के लिये कोई भाग न देकर पिताकी सम्पत्ति आपसमें बाँट ली और अपना-अपना भाग लेकर वे उत्तम रीतिसे राज्य का पालन करने लगे | उन सबने पिताकी आज्ञासे ही धन का बँटवारा किया था | कुछ कालके पश्चात ब्रह्मचारी नभग गुरुकुल से सांगोपांग वेदों का अध्ययन करके वहाँ आये | उन्होंने देखा सब भाई सारी सम्पत्ति का बँटवारा करके अपना-अपना भाग ले चुके हैं | तब उन्होंने भी बड़े स्नेह से दायभाग पानेकी इच्छा रखकर अपने इक्ष्वाकु आदि बन्धुओं से कहा – ‘भाइयों ! मेरे लिये भाग दिये बिना ही आपलोगोने आपस में सारी सम्पत्ति का बँटवारा कर लिया | अत: अब प्रसन्नतापूर्वक मुझे भी हिस्सा दीजिये | मैं अपना दायभाग लेने के लिये ही यहाँ आया हूँ |’

भाई बोले – जब सम्पत्तिका बँटवारा हो रहा था, उससमय हम तुम्हारे लिये भाग देना भूल गये थे | अब इससमय पिताजी को ही तुम्हारे हिस्से में देते हैं | तुम उन्हीं को ले लो, इसमें संशय नहीं है |

भाइयों का यह वचन सुनकर नभग को बड़ा विस्मय हुआ | वे पिताके पास जाकर बोले – ‘तात ! मैं विद्याध्ययन के लिये गुरुकुल में गया था और वहाँ अबतक ब्रह्मचारी रहा हूँ | इसी बीच में भाइयों ने मुझे छोडकर आपसमें धन का बँटवारा कर लिया | वहाँ से लौटकर जब मैंने अपने हिस्से के बारेमें उनसे पूछा, तब उन्होंने आपको मेरा हिस्सा बता दिया | अत: उसके लिये मैं आपकी सेवा में आया हूँ |’ नभग की वह बात सुनकर पिता को बड़ा विस्मय हुआ | श्राद्धदेव ने पुत्र को आश्वासन देते हुए कहा – बेटा ! भाइयों की उस बातपर विश्वास न करो | वह उन्होंने तुम्हे ठगने के लिये कही है | मैं तुम्हारे लिये भोगसाधक उत्तम दाय नहीं बन सकता, तथापि उन वंचकों ने यदि मुझे ही दाय के रूप में तुम्हे दिया है तो मैं तुम्हारी जीविका का एक उपाय बताता हूँ, सुनो | इन दिनों उत्तम बुद्धिवाले आंगिरसगोत्रीय ब्राह्मण एक बहुत बड़ा यज्ञ कर रहे हैं, उस कर्म में प्रत्येक छठे दिनका कार्य वे ठीक-ठीक नहीं समझ पाते – इसमें उनसे भूल हो जाती हैं | तुम वहाँ जाओ और उन ब्राह्मणों को विश्वेदेवसम्बन्धी दो सूक्त बतला दिया करो | इससे वह शुद्धरूप से सम्पादित होगा | वह यज्ञ समाप्त होनेपर वे ब्राह्मण जब स्वर्ग को जाने लगेंगे, उससमय संतुष्ट होकर अपने यज्ञ से बचा हुआ सारा धन तुम्हें दे देंगे |’

पिताकी यह बात सुनकर सत्यवादी नभग बड़ी प्रसन्नता के साथ उस उत्तम यज्ञ में गये | मुने ! वहाँ छठे दिन के कर्म में बुद्धिमान मनुपुत्र ने वैश्वदेवसम्बन्धी दोनों सूक्तों का स्पष्टरूप से उच्चारण किया | यज्ञकर्म समाप्त होनेपर वे आंगिरस ब्राह्मण यज्ञ से बचा हुआ अपना-अपना धन नभग को देकर स्वर्गलोक को चले गये | उस यज्ञशिष्ट धन को जब ये ग्रहण करने लगे, उससमय सुंदर लीला करनेवाले भगवान शिव तत्काल वहाँ प्रकट हो गये | उनके सारे अंग बड़े सुंदर थे, परन्तु नेत्र काले थे | उन्होंने नभग से पूछा – ‘तुम कौन हो ? जो इस धन को ले रहे हो | यह तो मेरी सम्पत्ति हैं | तुम्हे किसने यहाँ भेजा है | सब बातें ठीक-ठीक बताओ |’

नभग ने कहा – यह तो यज्ञ से बचा हुआ धन है, जिसे ऋषियों ने मुझे दिया है | अब यह मेरी ही सम्पत्ति है | इसको लेने से तुम मुझे कैसे रोक रहे हो ?

कृष्णदर्शन ने कहा – ‘तात ! हम दोनों के इस झगड़े में तुम्हारे पिता ही पंच रहेंगे | जाकर उनसे पूछो और वे जो निर्णय दें, उसे ठीक-ठीक यहाँ आकर बताओं |’ उनकी बात सुनकर नभग ने पिता के पास जाकर उक्त प्रश्न को उनके सामने रखा | श्राद्धदेव को कोई पुरानी बात याद आ गयी और उन्होंने भगवान शिवके चरण-कमलों का चिन्तन करते हुए कहा |

मनु बोले – ‘तात ! वे पुरुष जो तुम्हे वह धन लेने से रोक रहे हैं, साक्षात भगवान शिव हैं | यों तो संसार की सारी वस्तु ही उन्हीं की हैं | परन्तु यज्ञ से प्राप्त हुए धनपर उनका विशेष अधिकार है | यज्ञ करने से जो धन बच जाता है, उसे भगवान रूद्र का भाग निश्चित किया गया है | अत: यज्ञावशिष्ट सारी वस्तु ग्रहण करने के अधिकारी सर्वेश्वर महादेवजी ही है | उनकी इच्छा से ही दूसरे लोग उस वस्तु को ले सकते हैं | भगवान शिव तुमपर कृपा करने के लिये ही वहाँ वैसा रूप धारण करके आये हैं | तुम वहीँ जाओ और उन्हें प्रसन्न करो | अपने अपराध के लिये क्षमा माँगो और प्रणामपूर्वक उनकी स्तुति करो |’ नभग पिता की आज्ञा से वहाँ गये और भगवान को प्रणाम करके हाथ जोडकर बोले – ‘महेश्वर ! यह सारी त्रिलोकी ही आपकी है | फिर यज्ञ से बचे हुए धन के लिये तो कहना ही क्या हैं | निश्चय ही इसपर आपका अधिकार है, यही मेरे पिताने निर्णय दिया है | नाथ ! मैंने यथार्थ बात न जानने के कारण भ्रमवश जो कहा है मेरे उस अपराध को क्षमा कीजिये | मैं आपके चरणों में मस्तक रखकर यह प्रार्थना करता हूँ कि आप मुझपर प्रसन्न हो |’

ऐसा कहकर नभग ने अत्यंत दीनतापूर्ण ह्रदय से दोनों हाथ जोड़ महेश्वर कृष्णदर्शन का स्तवन किया | उधर श्राद्धदेव ने भी अपने अपराध के लिये क्षमा माँगते हुए भगवान शिवकी स्तुति की | तदनन्तर भगवान रूद्र ने मन-ही-मन प्रसन्न हो नभग को कृपादृष्टि से देखा और मुस्कारते हुए कहा |

कृष्णदर्शन बोले – ‘नभग ! तुम्हारे पिताने जो धर्मानुकुल बात कही हैं, वह थी ही है | तुमने भी साधू-स्वभाव के कारण सत्य ही कहा है | इसलिये मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ और कृपापूर्वक तुम्हे सनातन ब्रह्मतत्त्व का ज्ञान प्रदान करता हूँ | इससमय यह सारा धन मैंने तुम्हें दे दिया | अब तुम इसे ग्रहण करो | इस लोक में निर्विकार रहकर सुख भोगो | अंत में मेरी कृपासे तुम्हें सद्गति प्राप्त होगी |’ ऐसा कहकर भगवान रूद्र सबके देखते-देखते वहीँ अन्तर्धान हो गये | साथ ही श्राद्धदेव भी अपने पुत्र नभग के साथ अपने स्थान को लौट आये |

इस लोकमें विपुल भोगों का उपभोग करके अंत में वे भगवान शिवके धाम में चले गये | ब्रह्मन ! इसप्रकार तुमसे मैंने भगवान शिवके कृष्णदर्शन नामक अवतार का वर्णन किया | जो इस आख्यान को पढ़ता और सुनता है, उसे सम्पूर्ण मनोवांछित फल प्राप्त हो जाते हैं |

– ॐ नम: शिवाय –

शिवपुराण – २१६

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श्रीपुराणपुरुषोत्तमाय नम :
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भवाब्धिमग्नं दिनं मां समुन्भ्दर भवार्णवात | कर्मग्राहगृहीतांग दासोऽहं तव् शंकर ||

श्री शिवपुराण – माहात्म्य

शतरूद्रसंहिता

अध्याय – २१६

भगवान शिव का यतिनाथ एवं हंस नामक अवतार

नन्दीश्वर कहते हैं – मुने ! अब मैं परमात्मा शिव के यतिनाथ नामक अवतार का वर्णन करता हूँ | मुनीश्वर ! अर्बुदाचल नामक पर्वत के समीप एक भील रहता था, जिसका नाम था आहुक | उसकी पत्नी को लोग आहुका कहते थे | वह उत्तम व्रतका पालन करनेवाली थी | वे दोनों पति-पत्नी महान शिवभक्त थे और शिवकी आराधना – पूजा में लगे रहते थे | एक दिन वह शिवभक्त भील अपनी पत्नी के लिये आहार की खोज करने के निमित्त जंगल में बहुत दूर चला गया | इसी समय संध्याकाल में भील की परीक्षा लेने के लिये भगवान शंकर संन्यासी का रूप धारण करके घर आये | इतने में ही उस घरका मालिक भील भी चला गया और उसने बड़े प्रेम से उन यतिराज का पूजन किया | उसके मनोभाव की परीक्षा के लिये उन यतीश्वरने दीनवाणी में कहा – ‘भील ! आज रात में यहाँ रहने के लिये मुझे स्थान दे दो | सबेरा होते ही चला जाऊँगा, तुम्हारा सदा कल्याण हो |’

भील बोला – स्वामीजी ! आप ठीक कहते हैं, तथापि मेरी बात सुनिये | मेरे घरमे स्थान तो बहुत थोडा है | फिर उसमें आपका रहना कैसे हो सकता है ?

भील की यह बात सुनकर स्वामीजी वहाँ से चले जाने को उद्यत हो गये |

तब भीलनी ने कहा – प्राणनाथ ! आप स्वामीजी को स्थान दे दीजिये | घर आये हुए अतिथि को निराश न लौटाइये | अन्यथा हमारे गृहस्थ – धर्म के पालन में बाधा पहुंचेगी | आप स्वामीजी के साथ सुखपूर्वक घर के भीतर रहिये और मैं बड़े – बड़े अस्त्र-शस्त्र लेकर बाहर खड़ी रहूँगी |

पत्नी की यह बात सुनकर भील ने सोचा – स्त्री को घर से बाहर निकालकर मैं भीतर कैसे रह सकता हूँ ? संन्यासीजी का अन्यत्र जाना भी मेरे लिये अधर्मकारक ही होगा | ये दोनों ही कार्य एक गृहस्थ के लिये सर्वथा अनुचित हैं | अत: मुझे ही घर के बाहर रहना चाहिये | हो होनहार होगी, वह तो होकर ही रहेगी |ऐसा सोच आग्रह करके उसने स्त्री को और संन्यासीजी को तो सानन्द घर के भीतर रख दिया और स्वयं वह भील अपने आयुध पास रखकर घर से बाहर खड़ा हो गया | रात में जंगली क्रूर एवं हिंसक पशु उसे पीड़ा देने लगे | उसने भी यथाशक्ति उनसे बचने के लिये महान यत्न किया | इस तरह यत्न करता हुआ वह भील बलवान होकर भी प्रारब्धप्रेरित हिंसक पशुओंद्वारा बलपूर्वक खा लिया गया | प्रात:काल उठकर जब यति ने देखा कि हिंसक पशुओं ने वनवासी भील को खा डाला हैं, तब उन्हें बड़ा दुःख हुआ | संन्यासी को दु:खी देख भीलनी दुःख से व्याकुल होनेपर भी धैर्यपूर्वक उस दुःख को दबाकर यों बोली – ‘स्वामीजी ! आप दु:खी किसलिये हो रहे हैं ? इन भीलराज का तो इससमय कल्याण ही हुआ | ये धन्य और कृतार्थ हो गये, जो इन्हें ऐसी मृत्यु प्राप्त हुई | मैं चिता की आगमें जलकर इनका अनुसरण करूँगी | आप प्रसन्नतापूर्वक मेरे लिये एक चिता तैयार कर दें; क्योंकि स्वामी का अनुसरण करना स्त्रियों के लिये सनातन धर्म है |’ उसकी बात सुनकर संन्यासीजी ने स्वयं चिता तैयार की और भीलनी ने अपने धर्म के अनुसार उसमें प्रवेश किया | इसी समय भगवान शंकर अपने साक्षात स्वरूप से उसके सामने प्रकट हो गये और उसकी प्रशंसा करते हुए बोले – ‘तुम धन्य हो, धन्य हो | मैं तुमपर प्रसन्न हूँ | तुम इच्छानुसार वर माँगो | तुम्हारे लिये मुझे कुछ भी अदेय नहीं हैं |’

भगवान शंकर का यह परमानन्ददायक वचन सुनकर भीलनी को बड़ा सुख मिला | वह ऐसी विभोर हो गयी कि इसे किसी भी बात की सुघ नहीं रही | उसकी इस अवस्था को लक्ष्य करके भगवान शंकर और भी प्रसन्न हुए और उसके न माँगनेपर भी उसे वर देते हुए बोले – ‘मेरा जो यतिरूप हैं, यह भावी जन्म में हंसरूप से प्रकट होगा और प्रसन्नतापूर्वक तुम दोनों का परस्पर संयोग करायेगा | यह भील निषधदेश की उत्तम राजधानी में राजा वीरसेन का श्रेष्ठ पुत्र होगा | उससमय नल के नामसे इसकी ख्याति होगी और तुम विदर्भ नगर मे भीमराज की पुत्री दमयन्ती होओगी | तुम दोनों मिलकर राजभोग भोगने के पश्चात वह मोक्ष प्राप्त करोगे, जो बड़े-बड़े योगीश्वरों के लिये भी दुर्लभ है |’

नन्दीश्वर कहते हैं – मुने ! ऐसा कहकर भगवान शिव उस समय लिंगरूप में स्थित हो गये | वह भील अपने धर्म से विचलित नहीं हुआ था, अत: उसी के नामपर उस लिंग को ‘अचलेश’ संज्ञा दी गयी | दूसरे जन्म में वह आहुक नामक भील नैषध नगर में वीरसेन का पुत्र हो महाराज नल के नामसे विख्यात हुआ और आहुका नामक की भीलनी हुई और वे यतिनाथ शिव वहाँ हंसरूप में प्रकट हुए | उन्होंने दमयन्ती का नल के साथ विवाह कराया | पूर्वजन्म के सत्कारजनित पुण्य से प्रसन्न हो भगवान शिव ने हंसका रूप धारणकर उन दोनों को सुख दिया | हंसावतारधारी शिव भान्ति-भान्ति की बातें करने और संदेश पहुँचाने में कुशल थे | वे नल और दमयन्ती दोनों के लिये परमानन्ददायक हुए |

– ॐ नम: शिवाय –

शिवपुराण – २१४ से २१५

shivpuran9215श्रीपुराणपुरुषोत्तमाय नम :
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भवाब्धिमग्नं दिनं मां समुन्भ्दर भवार्णवात | कर्मग्राहगृहीतांग दासोऽहं तव् शंकर ||

श्री शिवपुराण – माहात्म्य

रूद्रसंहिता, पंचम ( युद्ध ) खंड

अध्याय – २१४ से २१५

भगवान शिव के द्विजेश्वरावतार की कथा – राजा भद्रायु तथा रानी कीर्तिमालिनी की धार्मिक द्रढ़ता की परीक्षा

तदनन्तर वैश्यनाथ अवतार का वर्णन करके नन्दीश्वर ने द्विजेश्वरावतार का प्रंसग चलाया | वे बोले – तात ! पहले जिन नृपश्रेष्ठ भद्रायु का परिचय दिया गया था और जिनपर भगवान शिवने ऋषभरूप से अनुग्रह किया था, उन्ही नरेश के धर्म की परीक्षा लेने के लिये वे भगवान फिर द्विजेश्वररूप से प्रकट हुए थे | ऋषभ के प्रभाव से रणभूमि में शत्रुओंपर विजय पाकर शक्तिशाली राजकुमार भद्रायु जब राज्य सिंहासनपर आरूढ़ हुए, तब राजा च्न्द्रांगद तथा रानी सीमन्तिनी की बेटी सती-साध्वी कीर्तिमालिनी के साथ उनका विवाह हुआ | किसी समय राजा भद्रायु ने अपनी धर्मपत्नी के साथ वसंत ऋतू में वन-विहार करने के लिये के गहन वन में प्रवेश किया | उनकी पत्नी शरणागतजनों का पालन करनेवाली थी | राजा का भी ऐसा ही  नीयम था | उन राजदम्पति की धर्म में कितनी दृढ़ता है, इसकी परीक्षा के लिये पार्वतीसहित भगवान शिवने एक लीला रची | शिवा और शिव उस वन में ब्राह्मणी और ब्राह्मण के रूप में प्रकट हुए | उन दोनोने लीलापूर्वक एक मायामाय व्याघ्र का निर्माण किया | वे दोनों भय से विव्हल हो व्याघ्र से थोड़ी ही दूर आगे रोते-चिल्लाने भागने लगे और व्याघ्र उनका पीछा करने लगा | राजाने उन्हें इस अवस्था में देखा | वे ब्राह्मण दम्पति भी भय से विव्हल हो महाराज की शरण में गये और इस प्रकार बोले |

ब्राह्मण दम्पति ने कहा – महाराज ! हमारी रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये | वह व्याघ्र हम दोनों को खा जाने के लिये आ रहा है | समस्त प्राणियों को काल के समान भय देनेवाल ग्रह हिंसक प्राणी हमें अपना आहार बनाये, इसके पूर्व ही आप हम दोनों को बचा लीजिये |

उन दोनों का यह करुणकंदन सुनकर महावीर राजाने ज्यों ही धनुष उठाया, त्यों ही वह व्याघ्र उनके निकट आ पहुँचा | उसने ब्राह्मणी को पकड़ लिया | वह बेचारी ‘हा नाथ ! हा नाथ ! हा प्राणवल्लभ ! हा शम्भो ! हा जगद्गुरो !’ इत्यादि कहकर रोने और विलाप करने लगी | व्याघ्र बड़ा भयानक था | उसने ज्यों ही ब्राह्मणी को अपना ग्रास बनाने की चेष्टा की, त्यों ही भद्रायु ने तीखे बाणों से उसके मर्म में आघात क्या; परन्तु उन बाणों से उस महाबली व्याघ्र को तनिक भी व्यथा नहीं हुई | वह ब्राह्मणी को बलपूर्वक घसीटता हुआ तत्काल दूर निकल गया | अपनी पत्नी को बाघ के पंजे में पड़ी देख ब्राह्मण को बड़ा दुःख हुआ और वह बारंबार रोने लगा | देरतक रोकर उसने राजा भद्रायु से कहा – ‘राजन तुम्हारे वे बड़े-बड़े अस्त्र कहाँ हैं ? दु:खियों की रक्षा करनेवाला तुम्हारा विशाल धनुष कहाँ है ? सुना था तुम में बारह हजार बड़े-बड़े हाथियों का बल है | यह क्या हुआ ? तुम्हारे शंख, खड्ग तथा म्न्त्रास्त्र-विद्यासे क्या लाभ हुआ ? दूसरों को क्षीण होने से बचाना क्षत्रिय का परम धर्म हैं | धर्मज्ञ राजा अपना धन और प्राण देकर भी शरण में आये हुए दीन-दु:खियों की रक्षा करते हैं | जो पीड़ितों की प्राणरक्षा नहीं कर सकते, ऐसे लोगों के लिये तो जीनेकी अपेक्षा मर जाना ही अच्छा है |

इस प्रकार ब्राह्मण का विलाप और उसके मुख से अपने पराक्रमकी निंदा सुनकर राजाने शोक से मन-ही-मन इस प्रकार विचार किया – ‘अहो ! आज भाग्य के उलट-फेर से मेरा पराक्रम नष्ट हो गया | मेरे धर्म का भी नाश हो गया | अत: अब मेरी सम्पदा, राज्य और आयुका भी निश्चय ही नाश हो जायगा | यों विचारकर राजा भद्रायु ब्राह्मण के चरणों में गिर पड़े और उसे धीरज बँधाते हुए बोले – ‘ब्रह्मन ! मेरा पराक्रम नष्ट हो गया है | महामते ! मुझ क्षत्रियाधमपर कृपा करके शोक छोड़ दीजिये | मैं आपको मनोवांछित पदार्थ दूँगा | यह राज्य, यह रानी और मेरा यह शरीर सब कूचा आपके अधीन हैं | बोलिये, आप क्या चाहते हैं ?’

ब्राह्मण बोले – राजन ! अंधे को दर्पण से क्या काम ? जो भिक्षा माँगकर जीवन-निर्वाह करता ही, वह बहुत-से घर लेकर क्या करेंगा | जो मूर्ख है, उसे पुस्तक से क्या काम तथा जिसके पास स्त्री नहीं है, वह धन लेकर क्या करेगा ? मेरी पत्नी चली गयी, मैंने कभी कामो-सुख का उपभोग नहीं किया | अत: कामभोग के लिये आप अपनी इस बड़ी रानी को मुझे दे दीजिये |

राजाने कहा – ब्रह्मन ! क्या यही तुम्हारा धर्म है ? क्या तुम्हें गुरु ने यही उपदेश किया है ? क्या तुम नही जानते कि परायी स्त्री का स्पर्श स्वर्ग एवं सुयश की हानि करनेवाला है ? परस्त्री के उपभोग से जो पाप कमाया जाता है, उसे सैकड़ों प्रायश्चित्तोंद्वारा भी धोया नहीं जा सकता |

ब्राह्मण बोले – राजन ! मैं अपनी तपस्या से भयंकर ब्रह्महत्या और मदिरापान जैसे पापका भी नाश कर डालूँगा | फिर परस्त्री-संगम किस गिनती में हैं | अत: आप अपनी इस भार्या को मुझे अवश्य दे दीजिये अन्यथा आप निश्चय ही नरक में पड़ेंगे |

ब्राह्मण की इस बातपर राजाने मन-ही-मन विचार किया कि ब्राह्मण के प्राणों की रक्षा न करने से महापाप होगा, अत: इससे बचने के लिये पत्नी को दे डालना ही श्रेष्ठ हैं | इस श्रेष्ठ ब्राह्मण को अपनी पत्नी देकर मैं पापसे मुक्त हो शीघ्र ही अग्नि में प्रवेश कर जाऊँगा | मन-ही-मन ऐसा निश्चय करके राजाने आग जलायी और ब्राह्मण को बुलाकर उसे अपनी पत्नी को दे दिया | तत्पश्चात स्नान करके पवित्र हो देवताओं को प्रणाम करके उन्होंने अग्नि की दो बार परिक्रमा की और एकाग्रचित्त होकर भगवान शिवका ध्यान किया | इसप्रकार राजा को अग्नि में गिरने के लिये उद्यत देख जगतपति भगवान विश्वनाथ सहसा वहाँ प्रकट हो गये | उनके पाँच मुख थे | मस्तकपर चन्द्रकला आभूषण का काम दे रही थी | कुछ-कुछ पीले रंग की जटा लटकी हुई थी | वे कोटि-कोटि सूर्यों के समान तेजस्वी थे | हाथों में त्रिशूल, खट्वांग, कुठार, ढाल, मृग, अभय, वरद और पिनाक धारण किये, बैल की पीठपर बैठे हुए भगवान् नीलकंठ को राजाने अपने सामने प्रत्यक्ष देखा | उनके दर्शनजनित आनंद से युक्त हो राजा भद्रायु ने हाथ जोडकर स्तवन किया |

राजा के स्तुति करनेपर पार्वती के साथ प्रसन्न हुए महेश्वर ने कहा – राजन ! तुमने किसी अन्यका चिन्तन न करके जो सदा सर्वदा मेरा पूजन किया है, तुम्हारी इस भक्ति के कारण और तुम्हारे द्वारा की हुई इस पवित्र स्तुति को सुनकर मैं बहुत प्रसन्न हुआ हूँ | तुम्हारे भक्तिभाव की परीक्षा के लिये मैं स्वयं ब्राह्मण बनकर आया था | जिसे व्याघ्र ने ग्रस लिया था, वह ब्राह्मणी और कोई नहीं, ये गिरिराजनन्दिनी उमादेवी ही थीं | तुम्हारे बाण मारने से भी जिसेक शरीर को चोट नहीं पहुँची, वह व्याघ्र मायानिर्मित था | तुम्हारे धैर्य को देखने के लिये ही मैंने तुम्हारी पत्नी को माँगा था, इस कीर्तिमालिनी की और तुम्हारी भक्ति से मैं संतुष्ट हूँ | तुम कोई दुर्लभ वर माँगों, मैं उसे दूँगा |

राजा बोले – देव ! आप साक्षात परमेश्वर हैं | आपने सांसारिक ताप से घिरे हुए मुझ अधम को तो प्रत्यक्ष दर्शन दिया है, यही मेरे लिये महान वर है | देव ! आप वरदाताओं में श्रेष्ठ हैं | आपसे मैं दूसरा कोई वर नहीं माँगता | मेरी यही इच्छा है, कि मैं, मेरी रानी, मेरे माता-पिता, पद्माकर वैश्य और उसके पुत्र सुनय – इन सबको आप अपना पार्श्ववर्ती सेवक बना लीजिये |

तत्पश्चात रानी कीर्तिमालिनी ने प्रणाम करके अपनी भक्ति से भगवान शंकर को प्रसन्न किया और यह उत्तम वर माँगा – ‘महादेव ! मेरे पिता चन्द्रांगद और माता सीमन्तिनी इन दोनों को भी आपके समीप निवास प्राप्त हो |’ भक्तवत्सल भगवान गौरीपति ने प्रसन्न होकर ;एवमस्तु’ कहा और उन दोनों पति-पत्नी को इच्छानुसार वर देकर वे क्षणभर में अन्तर्धान हो गये | इधर राजाने भगवान शंकर का प्रसाद प्राप्त करके रानी कीर्तिमालिनी के साथ प्रिय विषयों का उपभोग किया और दस हजार वर्षोतक राज्य करने के पश्चात अपने पुत्रों को राज्य देकर उन्होंने शिवजी के परमपद को प्राप्त किया |

राजा और रानी दोनों ही भक्तिपूर्वक महादेवजी की पूजा करके भगवान शिव के धाम को प्राप्त हुए | यह परम पवित्र, पापनाशक एवं अत्यंत गोपनीय भगवान शिवका विचित्र गुणानुवाद जो विद्वानों को सुनाता है अथवा स्वयं भी शुद्धचित्त होकर पढ़ता है, वह इस लोक में भोग-ऐश्वर्य को प्राप्तकर अंत में भगवान शिवको प्राप्त होता है |

– ॐ नम: शिवाय –