Category Archives: Shiv Puran

शिवपुराण – १८६

shivpuran9215
श्रीपुराणपुरुषोत्तमाय नम :
ॐ श्री गणेशाय नम:
भवाब्धिमग्नं दिनं मां समुन्भ्दर भवार्णवात | कर्मग्राहगृहीतांग दासोऽहं तव् शंकर ||

श्री शिवपुराण – माहात्म्य

रूद्रसंहिता, पंचम ( युद्ध ) खंड

अध्याय – १८६

दुन्दुभिनिर्ह्लाद नामक दैत्य का व्याघ्ररूप से शिवभक्तपर आक्रमण करने का विचार और शिवद्वारा उसका वध

सनत्कुमारजी कहते है – व्यासजी ! अब मैं चन्द्रमौलिके उस चरित्र का वर्णन करूँगा, जिसमें शंकरजी ने दुन्दुभिनिर्ह्लाद नामक दैत्य को मारा था | तुम सावधान होकर श्रवण करो | दितिपुत्र महाबली हिरण्याक्ष के विष्णुद्वारा मारे जानेपर दिति को बहुत दुःख हुआ | तब देवशत्रु दुन्दुभिनिर्ह्लाद ने उसको आश्वासन देकर यह निश्चय किया कि ‘देवताओं के बल ब्राह्मण है | ब्राह्मण नष्ट हो जायँगे तो यज्ञ नहीं होंगे, यज्ञ न होनेपर देवता आहार न पाने से निर्बल हो जायेंगे | तब मैं उनपर सहज ही विजय पा लूँगा |’ यों विचारकर वह ब्राह्मणों को मारने लगा | ब्राह्मणों का प्रधान स्थान वाराणसी है, यह सोचकर वह काशी पहुँचा और वन में वनचर समिधा लेते हुए, जल में जलचर बनकर स्नान करते हुए और रात में व्याघ्र बनकर सोते हुए ब्राह्मणों को खाने लगा |

एक बार शिवरात्रि के अवसरपर एक भक्त अपनी पर्णशाला में देवाधिदेव शंकर का पूजन करके ध्यानस्थ बैठा था | बलाभिमानी दैत्यराज दुन्दुभिनिर्ह्लाद ने व्याघ्र का रूप धारण करके उसे खा जानेका विचार किया; परन्तु यह भक्त दृढ़चित्त से शिवदर्शन की लालसा लेकर ध्यान में तल्लीन हो रहा था, इसके लिये उसने पहले से ही मन्त्ररूपी अस्त्र का विन्यास कर लिया था | इस कारण वह दैत्य उसपर आक्रमण करने में समर्थ न हो सका | इधर सर्वव्यापी भगवान शम्भु को उस दुष्ट रूपवाले दैत्य के अभिप्राय का पता लग गया | तब शंकर ने उसे मार डालने का विचार किए | इतने में, ज्यों ही उस दैत्य ने व्याघ्ररूप से उस भक्त को अपना प्राप्त बनाना चाहा, त्यों ही जगत की रक्षा के लिये मणिस्वरूप तथा भक्तरक्षण में कुशल बुद्धिवाले त्रिलोचन भगवान शंकर वहाँ प्रकट हो गये और उसे बगल में दबोचकर उसके सिरपर वज्र से भी कठोर घूँसे से प्रहार किया | उस मुष्टि- प्रहार से तथा काँख में दबोचकर से वह व्याघ्र अत्यंत व्यथित हो गया और अपनी दहाड़ से पृथ्वी तथा आकाश को कँपाता हुआ मृत्यु का प्राप्त बन गया | उस भयंकर शब्द को सुनकर तपस्यियों का ह्रदय काँप उठा | वे रात में ही उस शब्द का अनुसरण करते हुए उस स्थानपर आ पहुँचे | वहाँ परमेश्वर शिव को बगल में उस पापीको दबाये हुए देखकर सब लोग उनके चरणों में पड़ गये और जब-जयकार करते हुए उनकी स्तुति करने लगे |

तदनन्तर महेश्वर ने कहाजो मनुष्य यहाँ आकर श्रद्धापूर्वक मेरे इस रूप का दर्शन करेगा, निस्संदेह मैं उसके सारे उपद्रवों को नष्ट कर दूँगा | जो मानव मेरे इस चरित्र को सुनकर और ह्रदय में मेरे इस लिंग का स्मरण करके संग्राम में प्रवेश करेगा, उसे अवश्य विजय की प्राप्ति होगी |

मुने ! जो मनुष्य व्याघ्रेश्वर के प्राकट्य से सम्बन्ध रखनेवाले इस परमोत्तम चरित्र को सुनेगा अथवा दूसरे को सुनायेगा,पढ़ेगा या पढ़ायेगा, वह अपनी समस्त मनोवांछित वस्तुओं को प्राप्त कर लेना और अंत में सम्पूर्ण दु:खों से रहित होकर मोक्ष का भागी होगा | शिवलीलासम्बन्धी अमृतमय अक्षरों से परिपूर्ण यह अनुपम आख्यान स्वर्ग, यश और आयुका देनेवाला तथा पुत्र-पौत्र की वृद्धी करनेवाला है |

– ॐ नम: शिवाय –

शिवपुराण – १८५

shivpuran9215श्रीपुराणपुरुषोत्तमाय नम :
ॐ श्री गणेशाय नम:
भवाब्धिमग्नं दिनं मां समुन्भ्दर भवार्णवात | कर्मग्राहगृहीतांग दासोऽहं तव् शंकर ||

श्री शिवपुराण – माहात्म्य

रूद्रसंहिता, पंचम ( युद्ध ) खंड

अध्याय – १८५

गजासुर की तपस्या, वर-प्राप्ति और उसका अत्याचार, शिवद्वारा उसका वध, कृत्तिवासा नामसे विख्यात होना तथा कृत्तिवासेश्वर – लिंग की स्थापना करना

सनत्कुमारजी कहते हैं – व्यासजी ! अब परम प्रेमपूर्वक शशिमौलि शिव के उस चरित्र को श्रवण करो, जिसमें उन्होंने त्रिशूलद्वारा दानवराज गजासुरका वध किया था | गजासुर महिवासुरका पुत्र था | जब उसने सुना कि देवताओं से प्रेरित होकर देवीने मेरे पिताको मार दिया था, तब उसका बदला लेने की भावना से उसने घोर तप किया | इसके तपकी ज्वाला से सब जलने लगे | देवताओं ने जाकर ब्रह्माजी से अपना दुःख कहा, तब ब्रह्माजी ने उसके सामने प्रकट होकर उसके प्रार्थनानुसार उसे वरदान दे दिया कि वह काम के वश होनेवाले किसी भी स्त्री या पुरुष से नहीं मरेगा, महाबली और सबसे अजेय होगा |

वर पाकर वह गर्व में भर गया | सब दिशाओं तथा सब लोकपालों के स्थानोंपर उसने अधिकार कर लिया | अंतमे भगवान शंकर की राजधानी आनंदवन काशी में जाकर वह सबको सताने लगा | देवताओं ने भगवान शंकर से प्रार्थना की | शंकर कामविजयी हैं ही | उन्होंने घोर युद्ध में उसे हराकर त्रिशूल में पिरों लिया | तब उसने भगवान शंकर का स्तवन किया | शंकर ने उसपर प्रसन्न होकर इच्छित वर माँगने को कहा |

तब गजासुर ने कहा – दिगम्बरस्वरूप महेशान ! यदि आप मुझपर प्रसन्न है तो अपने त्रिशूल की अग्नि से पवित्र हुए मेरे इस चर्म को आप सदा धारण किये रहे | विभो ! मैं पुण्य गंधों की निधि हूँ, इसलिये मेरा यह चर्म चिरकालतक उग्र तपरूपी अग्नि की ज्वाला में पड़कर भी दग्ध नहीं हुआ हैं | दिगम्बर ! यदि मेरा यह चर्म पुण्यवान न होता तो रणांगण में इसे आपके अंगों का संग कैसे प्राप्त होता | शंकर ! यदि आप तुष्ट हैं तो मुझे एक दूसरा वर और दीजिये | आजसे आपका नाम ‘कृत्तिवासा’ विख्यात हो जाय |

सनत्कुमारजी कहते है – मुने ! गजासुरकी बात सुनकर भक्तवत्सल शंकर ने परम प्रसन्नतापूर्वक महिषासुरनन्दन गज से कहा – ‘तथास्तु’ – अच्छा, ऐसा ही होगा | तदनन्तर प्रसन्नत्मा भक्तप्रिय महेशान उस दानवराज गजसे, जिसका मन भक्ति के कारण निर्मल हो गया था, पुन: बोले |

ईश्वर ने कहा – दानवराज ! तेरा वह पावन शरीर मेरे इस मुक्तिसाधक क्षेत्र काशी में मेरे लिंग के रूप में स्थित हो जाय | इसका नाम कृत्तिवासेश्वर होगा ! यह समस्त प्राणियों के लिये मुक्तिदाता, महान पातकों का विनाशक, सम्पूर्ण लिंगों में शिरोमणि और मोक्षप्रद होगा | यों कहकर देवेश्वर दिगम्बर शिवने गजासुर के उस विशाल चर्म को लेकर ओढ़ लिया |

मुनीश्वर ! उस दिन बहुत बड़ा उत्सव मनाया गया | काशीनिवासी सारी जनता तथा प्रमथगण हर्षमग्न हो गये | विष्णु और ब्रह्मा आदि देवताओं का मन हर्ष से परिपूर्ण हो गया | ये हाथ जोडकर महेश्वर को नमस्कार करके उनकी स्तुति करने लगे |

– ॐ नम: शिवाय –

शिवपुराण – १८३ से १८४

shivpuran9215
श्रीपुराणपुरुषोत्तमाय नम :
ॐ श्री गणेशाय नम:
भवाब्धिमग्नं दिनं मां समुन्भ्दर भवार्णवात | कर्मग्राहगृहीतांग दासोऽहं तव् शंकर ||

श्री शिवपुराण – माहात्म्य

रूद्रसंहिता, पंचम ( युद्ध ) खंड

अध्याय – १८३ से १८४

श्रीकृष्णद्वारा बाण की भुजाओं का काटा जाना, सिर काटने के लिये उद्यत हुए श्रीकृष्ण को शिवका रोकना, बाण को शिवद्वारा उसे अन्यान्य वरदानों के साथ महाकालत्व की प्राप्ति

सनत्कुमारजी कहते हैं – महाप्राज्ञ व्यासजी ! लोकलीला का अनुसरण करनेवाले श्रीकृष्ण और शंकर की उस परम अद्भुत कथा को श्रवण करो | तात ! जब भगवान रूद्र लीलावश पुत्रों तथा गणोंसहित सो गये, तब दैत्यराज बाण श्रीकृष्ण के साथ युद्ध करने के लिये प्रस्थित हुआ | उससमय कुम्भांड उसके अश्वों की बागडोर सँभाले हुए था और वह नाना प्रकार के शस्त्रास्त्रों से सज्जित था | फिर वह महाबली बलिपुत्र भीषण युद्ध करने लगा | इसप्रकार उन दोनों में चिरकालतक बड़ा घोर संग्राम होता रहा, क्योंकि विष्णु के अवतार श्रीकृष्ण शिवरूप ही थे और उधर बलवान बाणासुर उत्तम शिवभक्त था | मुनीश्वर ! तदनन्तर वीर्यवान श्रीकृष्ण, जिन्हें शिवकी आज्ञा से बल प्राप्त हो चूका था, चिरकालतक बाण के साथ यों युद्ध करके अत्यंत कुपित हो उठे | तब शत्रुवीरों का संहार करनेवाले भगवान श्रीकृष्ण ने शम्भू के आदेश से शीघ्र ही सुदर्शन चक्रद्वारा बाण की बहुत-सी भुजाओं को काट डाला | अंत में उसकी अत्यंत सुंदर चार भुजाएँ ही अवशेष रह गयी और शंकर की कृपासे शीघ्र ही उसकी व्यथा भी मिट गयी | जब बाण की स्मृति लुप्त हो गयी और वीरभाव को प्राप्त हुए श्रीकृष्ण उसका सिर काट लेनेके लिये उद्यत हुए, तब शंकरजी मोहनिद्रा को त्यागकर उठ खड़े हुए और बोले |

रूद्र ने कहा – देवकीनंदन ! आप तो सदासे मेरी आज्ञा का पालन करते आये हैं | भगवन ! मैंने पहले आपको जिस काम के लिये आज्ञा दी थी, वह तो आपने पूरा कर दिया | अब बाण का शिरच्छेदन मत कीजिये और सुदर्शन चक्र को लौटा लीजिये | मेरी आज्ञा से यह चक्र सदा मेरे भक्तोंपर अमोघ रहा है | गोविन्द ! मैंने पहले ही आपको युद्ध में अनिवार्य चक्र और जय प्रदान की थी, अब आप इस युद्ध से निवृत्त हो जाइये | लक्ष्मीश ! पूर्वकाल में भी तो अपने मेरी आज्ञा के बिना दधीच, वीरवर रावण और तारकाक्ष आदि के पुरोंपर चक्र का प्रयोग नहीं किया था | जनार्दन ! आप तो योगीश्वर, साक्षात परमात्मा और सम्पूर्ण प्राणियों के हितमें रत रहनेवाले हैं | आप स्वयं ही अपने मनसे विचार कीजिये | मैंने इसे वर दे रखा है कि तुझे मृत्युका भय नहीं होगा | मेरा वह वचन सदा सत्य होना चाहिये | मैं आपपर परम प्रसन्न हूँ | हरे ! बहुत दिन पूर्व यह गर्वसे भरकर उन्मत्त हो उठा और अपने-आपको भूल गया था | तब अपनी भुजाएँ खुजलाता हुआ यह मेरे पास पहुँचा और बोअल – ‘मेरे साथ युद्ध कीजिये |’ तब मैंने इसे शाप देते हुए कहा – ‘थोड़े ही समय में तेरी भुजाओं का छेदन करनेवाला आयेगा | तब तेरा सारा गर्व गल जायगा |’ मेरी ही आज्ञासे तेरी भुजाओं को काटनेवाले ये श्रीहरि आये हैं | ‘अब आप युद्ध बंद कर दीजिये और वर-वधूको साथ लें अपने घरको लौट जाइये ‘ यों कहकर महेश्वर ने उन दोनों में मित्रता करा दी और उनकी आज्ञा ले वे पुत्रों और गणों के साथ अपने निवासस्थान को चले गये |

सनत्कुमारजी कहते हैं – मुने ! शम्भुका कथन सुनकर अक्षत शरीरवाले श्रीकृष्ण ने सुदर्शन को लौटा और विजयश्री से सुशोभित हो वे बाणासुर के अंत:पुर में पधारे | वहाँ उन्होंने ऊषासहित अनिरुद्ध को आश्वासन दिया और बाणद्वारा दिये गये अनेक प्रकार के रत्नसमूहों को ग्रहण किया | ऊषा की सखी परम योगिनी चित्रलेखा को पाकर तो श्रीकृष्ण को महान हर्ष हुआ | इसप्रकार शिव के आदेशानुसार जब उनका सारा कार्य पूर्ण हो गया, तब वे श्रीहरि ह्रदय से शंकर को प्रणाम कर और बलिपुत्र बाणासुर की आज्ञा ले परिवारसमेत अपनी पूरी को लौट गये | द्वारका में पहुँचकर उन्होंने गरुड को विदा कर दिया | फिर हर्षपूर्वक मित्रों से मिले और स्वेच्छानुसार आचरण करने लगे |

इधर नन्दीश्वर ने बाणासुर को समझाकर यह कहा – ‘भक्तशार्दुल ! तुम बारंबार शिवजीका स्मरण करनेवाले हैं, अत: उन आदिगुरू शंकर में मन समाहित करके नित्य उनका महोत्सव करो |’ सब द्वेषरहित हुआ महामनस्वी बाण नंदी के कहने से धैर्य धारण करके तुंरत ही शिवस्थान को गया | वहाँ पहुँचकर उसने नाना प्रकार के स्तोत्रोंद्वारा शिवजी की स्तुति की और उन्हें प्रणाम किया | फिर वह पादों से ठुमकी लगाते हुए और हाथों को घुमाते हुए नाना प्रकार के आलीढ़ और प्रत्यालीढ़ आदि प्रमुख स्थानकोंद्वारा सुशोभित नृत्यों में प्रधान तांडवनृत्य करने लगा | उससमय वह हजारों प्रकार से मुखद्वारा बाजा बजा रहा था और बीच-बीच में भौहों को मटकाकर तथा सिरको कँपाकर सहस्त्रो प्रकार के भाव भी प्रकट करता जाता था | इसप्रकार नृत्य में मस्त हुए महाभक्त बाणासुर ने महान नृत्य करके नतमस्तक हो त्रिशूलधारी चन्द्रशेखर भगवान रूद्र को प्रसन्न कर लिया | तब नाच-गान के प्रेमी भक्तवत्सल भगवान हर हर्षित होकर बाण से बोले |

रूद्रने कहा – बलिपुत्र प्यारे बाण ! तेरे नृत्य से मैं संतुष्ट हो गया हूँ, अत: दैत्येन्द्र ! तेरे मन में जो अभिलाषा हो, उसके अनुरूप बर माँग ले |

सनत्कुमारजी कहते है – मुने ! शम्भु की बात सुनकर दैत्यराज बाण ने इस इसप्रकार वर माँगा – ‘मेरे घाव भर जायँ, बाहुयुद्ध की क्षमता बनी रहे, मुझे अक्षय गणनायकत्व प्राप्त हो, शोणितपुर में ऊषापुत्र अर्थात मेरे दौहित्रका राज्य हो, देवताओंसे तथा विशेष करके विष्णु से मेरा वैरभाव मिट जाय, मुझमें रजोगुण और तमोगुणसे युक्त दूषित दैत्यभाव का पुन: उदय न हो, मुझमें सदा निर्विकार शम्भु-भक्ति बनी रहे और शिव-भक्तोंपर मेरा स्नेह और समस्त प्राणियोंपर दयाभाव रहे |’ यों शम्भु से वरदान माँगकर बलिपुत्र महासुर बाण अंजलि बाँधे रूद्र की स्तुति करने लगा | उससमय उसके नेत्रों में प्रेमके आँसू छलक आये थे | तदनन्तर जिसके सारे अंग प्रेमसे प्रफुल्लित हो उठे थे, वह बलिनंदन बाणासुर महेश्वर को प्रणाम करके मौन हो गया | अपने भक्त बाणकी प्रार्थना सुनकर भगवान शंकर ‘तुझे सब कुछ प्राप्त हो जायगा’ यों कहकर वहीँ अन्तर्धान हो गये |

तब शम्भु की कृपा से महाकालत्व को प्राप्त हुआ रूद्र का अनुचर बाण परमानंद में निमग्न हो गया | व्यासजी ! इसप्रकार मैंने सम्पूर्ण भुवनों में नित्य क्रीडा करनेवाले समस्त गुरुजनों के भी सद्गुरु शूलपाणि भगवान शंकर का बाणविषयक चरित, जो परमोत्तम है, कर्णप्रिय मधुर वचनोंद्वारा तुमसे वर्णन कर दिया |

– ॐ नम: शिवाय –

शिवपुराण – १७९ से १८२

shivpuran9215
श्रीपुराणपुरुषोत्तमाय नम :
ॐ श्री गणेशाय नम:
भवाब्धिमग्नं दिनं मां समुन्भ्दर भवार्णवात | कर्मग्राहगृहीतांग दासोऽहं तव् शंकर ||

श्री शिवपुराण – माहात्म्य

रूद्रसंहिता, पंचम ( युद्ध ) खंड

अध्याय – १७९ से १८२

बाणासुर की तपस्या और उसे शिवद्वारा वर-प्राप्ति, शिव की आज्ञा से श्रीकृष्ण का उन्हें जृम्भणास्त्रसे मोहित करके बाण की सेना का संहार करना

व्यासजी बोले – सर्वज्ञ संत्कुमार्जी ! आपने अनुग्रह करके प्रेमपूर्वक ऐसी अद्भुत और सुंदर कथा सुनायी है, जो शंकर की कृपा से ओतप्रोत है | अब मुझे शशिमौलि के उस उत्तम चरित्र के श्रवण करने की इच्छा है, जिसमें उन्होंने प्रसन्न होकर बाणासुर को गणाध्यक्षपद प्रदान किया था |

सनत्कुमारजीने कहा – व्यासजी ! परमात्मा शम्भु की उस कथाको, जिसमें उन्होंने प्रसन्न होकर बाणासुर को गणनायक बनाया था, आदरपूर्वक श्रवण करो | इसी प्रसंग में महाप्रभु शंकर का वह सुंदर चरित्र भी आयेगा, जिसमें उन्होंने बाणासुरपर अनुग्रह करके श्रीकृष्ण के साथ संग्राम किया था | व्यासजी ! दक्षप्रजापति की तेरह कन्याएँ कश्यप मुनि की पत्नियाँ थी | वे सब – की – सब पतिव्रता तथा सुशीला थीं | उनमें दिति सबसे बड़ी थी, जिसके लडके दैत्य कहलाते हैं | अन्य पत्नियों से भी देवता तथा चराचरसहित समस्त प्राणी पुत्ररूप से उत्पन्न हुए थे | जेष्ठ पत्नी दिति के गर्भ से सर्वप्रथम दो महाबली पुत्र पैदा हुए, उनमें हिरण्यकशिपु जेष्ठ था और उसके छोटे भाईका नाम हिरण्याक्ष था | हिरण्यकशिपु के चार पुत्र हुए | उन दैत्यश्रेष्ठों का क्रमश: ह्लाद, अनुह्लाद, संह्लाद और प्रह्लाद नाम था | उनमें प्रह्लाद जितेन्द्रिय तथा महान विष्णुभक्त हुए | उनका नाश करने के लिये कोई भी दैत्य समर्थ न हो सका | प्रह्लादका पुत्र विरोचन हुआ, वह दानियों में सर्वश्रेष्ठ था | उसने विप्ररूप से याचना करनेवाले इंद्र को अपना सिर ही दे डाला था | उसका पुत्र बलि हुआ | यह महादानी और शिवभक्त था | इसने वामनरूपधारी विष्णु को सारी पृथ्वी दान कर दी थी | बलिका औरस पुत्र बाण हुआ | वह शिवभक्त, मानी, उदार, बुद्धिमान, सत्यप्रतिज्ञ और सहस्त्रों का दान करनेवाला था | उस असुरराज ने पूर्वकाल में त्रिलोकी को तथा त्रिलोकाधिपतियों को बलपूर्वक जीतकर शोणितपुर में अपनी राजधानी बनाया और वहीँ रहकर राज्य करने लगा | उस समय देवगण शंकर की कृपा से उस शिवभक्त बाणासुर के किंकर के समान हो गये थे | उसके राज्य में देवताओं के अतिरिक्त और कोई प्रजा दु:खी नहीं थी | शत्रुधर्म का बर्ताव करनेवाले देवता शत्रुतावश ही कष्ट झेल रहे थे | एक समय वह महासुर अपनी सहस्त्रों भुजाओं से ताली बजाता हुआ तांडवनृत्य करके महेश्वर शिवको प्रसन्न करने की चेष्टा करने लगा | उसके उस नृत्यसे भक्तवत्सल शंकर संतुष्ट हो गये | फिर उन्होंने परम प्रसन्न हो उसकी ओर कृपादृष्टि से देखा | भगवान शंकर तो सम्पूर्ण लोकों के स्वामी, शरणागतवत्सल और भक्तवांछाकल्पतरु ही ठहरे | उन्होंने बलिनंदन महासुर बाण को वर देने की इच्छा प्रकट की |

मुने ! बलिनंदन महादैत्य बाण शिवभक्तों में श्रेष्ठ और परम बुद्धिमान था | उसने परमेश्वर शंकर को प्रणाम करके उनकी स्तुति की और कहा |

बाणासुर बोला – प्रभो ! आप मेरे रक्षक हो जाइये और पुत्रों तथा गणोंसहित मेरे नगर के अध्यक्ष बनकर सर्वथा प्रितिका निर्वाह करते हुए मेरे पास ही निवास कीजिये |

सनत्कुमारजी कहते है – महर्षे ! वह बलिपुत्र बाण निश्चय ही शिवजी की माया से मोहमें पड़ गया था, इसीलिये उसने मुक्ति प्रदान करनेवाले दुराराध्य महेश्वर को पाकर भी ऐसा वर माँगा | तब ऐश्वर्यशाली भक्तवत्सल शम्भू उसे वह वर देकर पुत्रों और गणों के साथ प्रेमपूर्वक वहीँ निवास करने लगे | एक बार बाणासुर को बड़ा ही गर्व हो गया | उसने तांडवनृत्य करके शंकर को संतुष्ट किया | जब बाणासुरको यह ज्ञात हो गया कि पार्वतीवल्लभ शिव प्रसन्न हो गये हैं, तब वह हाथ जोडकर सिर झुकाये हुए बोला |

बाणासुरने कहा – देवाधिदेव महादेव ! आप समस्त देवताओं के शिरोमणि हैं | आपकी ही कृपासे मैं बली हुआ हूँ | अब आप मेरा उत्तम वचन सुनिये | देव ! आपने जो मुझे एक हजार भुजाएँ प्रदान की हैं, ये तो अब मुझे महान भारस्वरूप लग रही है; क्योंकि इस जोडका और कोई योद्धा ही नहीं मिला | इसलिये वृषध्वज ! युद्ध के बिना इन पर्वत-सरीखी सहस्त्रों भुजाओं को लेकर मैं क्या करूँ | मैं अपनी इन परिपुष्ट भुजाओं की खुजली मिटाने के लिये युद्ध की लालसा से नगरों तथा पर्वतों को चूर्ण करता हुआ दिग्गजों के पास गया; परन्तु वे भी भयभीत होकर भाग खड़े हुए | मैंने यम को योद्धा, अग्निको महान कार्य करनेवाला, वरुण को गौओं का पालनकर्ता गोपाल, कुबेर को गजाध्यक्ष, निऋत्ति को सैरन्ध्री और इंद्र को जीतकर सदा के लिये करद बना लिया है | महेश्वर ! अब मुझे किसी ऐसे युद्ध के प्राप्त होने की बात बताइये, जिसमें मेरी ये भुजाएँ या तो शत्रुओं के हाथों से छूटे हुए शस्त्रास्त्रों से जर्जर होकर गिर जायँ अथवा हजारों प्रकार से शत्रु की भुजाओं को ही गिरायें | यही मेरी अभिलाषा है, इसे पूर्ण करने की कृपा करें |

सनत्कुमारजी कहते हैं – मुनिश्रेष्ठ ! उसकी बात सुनकर भक्तबाधापहारी तथा महामन्युस्वरूप रूद्र को कुछ क्रोध आ गया | तब वे महान अद्भुत अट्टहास करके बोले |

रूद्रने कहा – अरे अभिमानी ! सम्पूर्ण दैत्यों के कुल में नीच ! तुझे सर्वथा धिक्कार है, धिक्कार है ! तू बलिका पुत्र और मेरा भक्त है | तेरे लिये ऐसी बात कहना उचित नहीं है | अब तेरा दर्प चूर्ण होगा | तुझे शीघ्र ही मेरे समान बलवान के साथ अकस्मात महान भीषण युद्ध प्राप्त होगा | उस संग्राम में तेरी ये पर्वत-सरीखी भुजाएँ जलौनी लकड़ी की तरह शस्त्रास्त्रों से छिन्न-भिन्न होकर भूमिपर गिरेगी | दुष्टात्मन ! तेरे आयुधागारपर स्थापित तेरा जो यह मनुष्य के सिरवाला मयूरध्वज फहरा रहा है, इसका जब वायु-भय के बिना ही पतन हो जायगा, तब तू अपने चित्त में समझ लेना कि वह महान भयानक युद्ध आ पहुँचा है | उस समय तू घोर संग्रामका निश्चय करके अपनी सारी सेनाके साथ यहाँ जाना | इस समय तू अपने महल को लौट जा; क्योंकि इसीमें तेरा कल्याण है | दुर्मते ! यहाँ तुझे प्रसिद्ध बड़े-बड़े उत्पात दिखायी देंगे | यों कहकर गर्वहारी भक्तवत्सल भगवान शंकर चुप हो गये |

सनत्कुमारजी कहते हैं – मुने ! यह सुनकर बाणासुरने दिव्य पुष्पों की कलियों से अंजलि भरकर रूद्र की अभ्यर्चना की और फिर उन महादेव को प्रणाम करके वह अपने घरको लौट गया | तदनन्तर किसी समय दैववश उसका वह ध्वज अपने-आप टूटकर गिर गया | यह देखकर बाणासुर हर्षित हो युद्ध के लिये हो गया | वह अपने ह्रदय में विचार करने लगा कि कौन-सा युद्धप्रेमी योद्धा किस देश से आयेगा, जो नाना प्रकार के शस्त्रास्त्रों का पारगामी विद्वान होगा और मेरी शस्त्रों भुजाओं को ईधन की तरह काट डालेगा तथा मैं भी अपने अत्यंत तीखे शस्त्रों से उसके सैकड़ों टुकड़े कर डालूँगा | इसी समय शंकर की प्रेरणा से वह काल आ गया | एक दिन बाणासुरकी कन्या ऊषा वैशाख मासमें माधव की पूजा करके मांगलिक श्रृंगारसे सुसज्जित हो रातके समय अपने गुप्त अंत:पुर में सो रही थी, उसीसमय वह स्त्रीभाव – (कामभाव) प्राप्त हो गयी | तब देवी पार्वती की शक्ति से ऊषा को स्वप्न में श्रीकृष्ण के पौत्र अनिरुद्ध का मिलन प्राप्त हुआ | जागनेपर वह व्याकुल हो गयी और उसने अपनी सखी चित्रलेखा से स्वप्न में मिले हुए उस पुरुष को ला देने के लिये कहा |

तब चित्रलेखाने कहा – देवि ! तुमने स्वप्न में जिस पुरुष को देखा है, उसे भला, मैं कैसे ला सकती हूँ, जब कि मैं उसे जानती ही नहीं | उसके यों कहनेपर दैत्यकन्या ऊषा प्रेमांध होकर मरनेपर उतारू हो गयी, तब उस दिन उसकी उस सखीने उसे बचाया | मुनिश्रेष्ठ ! कुम्भांडकी पुत्री चित्रलेखा बड़ी बुद्धिमती थी, वह बाणतनया ऊषा से पुन: बोली |

चित्रलेखाने कहा – सखी ! जिस पुरुषने तुम्हारे मनका अपहरण किया है, उसे बताओ तो सही | वह यदि त्रिलोकी में कहीं भी होगा तो मैं उसे लाऊँगी और तुम्हारा कष्ट दूर करूँगी |

सनत्कुमारजी कहते हैं – महर्षे ! यों कहकर चित्रलेखाने वस्त्र के परदेपर देवताओं, दैत्यों, दानवों, गन्धर्वो, सिद्धो, नागों और यक्ष आदि के चित्र अंकित किये | फिर वह मनुष्यों का चित्र बनाने लगी | उनमें वृष्णिवंशियों का प्रकरण आरम्भ होनेपर उसने शुरू, वसुदेव, राम, कृष्ण और नरश्रेष्ठ प्रद्युम्न का चित्र बनाया | फिर जब उसने प्रद्युम्ननंदन अनिरुद्ध का चित्र खींचा, तब उसे देखकर ऊषा लज्जित हो गयी | उसका मुख अवनत हो गया और ह्रदय हर्ष से परिपूर्ण हो गया |

ऊषा कहा – सखी ! रात में जो मेरे पास आया था और जिसने शीघ्र ही मेरे चित्तरूपी रत्न को चुरा लिया है, वह चोर पुरुष यही है | तदनन्तर ऊषा के अनुरोध करनेपर चित्रलेखा जेष्ठ कृष्ण चतुर्दशी को तीसरे पहर द्वारकापुरी पहुँचकर क्षणमात्र में ही पलंगपर बैठे हुए अनिरुद्ध को महलमें से उठा लायी | वह दिव्य योगिनी थी | ऊषा अपने प्रियतम को पाकर प्रसन्न हो गयी | इधर अंत:पुर के द्वार की रक्षा करनेवाले बेतधारी पहरेदारों ने चेष्टाओं से तथा अनुमान से इस बातको लक्ष्य कर लिया | उन्होंने एक दिव्य शरीरधारी, दर्शनीय, साहसी तथा समरप्रिय नवयुवक को कन्या के साथ दु:शीलताका आचरण करते हुए देख भी लिया | उसे देखकर कन्या के अंत:पुर की रक्षा करनेवाले उन महाबली पुरुषों ने बलिपुत्र बाणासुर के पास जाकर सारी बातें निवेदन करते हुए कहा |

द्वारपाल बोले – देव ! पता नहीं, आपके अंत:पुर में बलपूर्वक प्रवेश करके कौन पुरुष छिपा हुआ है | वह इंद्र तो नहीं है, जो वेश बदलकर आपकी कन्या का उपभोग कर रहा है ? महाबाहू दानवराज ! उसे यहाँ देखिये, देखिये और जैसा उचित समझिये वैसा कीजिये | इसमें हमलोगों का कोई दोष नहीं है |

सनत्कुमारजी कहते हैं – मुनिश्रेष्ठ ! द्वारपालों का वह वचन तथा कन्या के दूषित होनेका कथन सुनकर महाबली दानवराज बाण आश्चर्यचकित हो गया | तदनन्तर वह कुपित होकर अंत:पुर में जा पहुँचा | वहाँ उसने प्रथम अवस्था में वर्तमान दिव्य शरीरधारी अनिरुद्ध को देखा | उसे महान आश्चर्य हुआ | फिर उसने उसका बल देखने के लिये दस हजार सैनिकों को भेजकर आज्ञा दी की इसे मार डालो | सेनाने अनिरुद्धपर आक्रमण किया | तब अनिरुद्ध ने बात-की-बात में दस हजार सैनिकों को काल के हवाले कर दिया | फिर तो असंख्य सेना-पर-सेना आने लगी और अनिरुद्ध उन्हें कालका ग्रास बनाने लगे |तदनन्तर उन्होंने बाणासुर का वध करने के लिये एक शक्ति हाथ में ली, जो कालाग्नि के समान भयंकर थी | फिर महावीर बलिपुत्र बाणासुर ने, जो महान बलसम्पन्न तथा शिवभक्त था, छलपूर्वक नागपाश से अनिरुद्ध को बाँध लिया | तत्पश्चात बाण कुपित होकर महाबली सूतपुत्र से बोला |

बाणासुरने कहा – सूतपुत्र ! घास-फूस से ढके हुए आगाध कुएँ में ढकेलकर इस पापी को मार डाल | अधिक क्या कहूँ, इसे सर्वथा मार ही डालना चाहिये |

सनत्कुमारजी कहते हैं – मुने ! उसकी यह बात सुनकर उत्तम मंत्रियों से श्रेष्ठ धर्मबुद्धि निशाचर कुम्भांडने बाणासुरसे कहा |

कुम्भांड बोला – देव ! थोडा विचार तो कीजिये | मेरी समझसे तो वह कर्म करना उचित नहीं प्रतीत होता; क्योंकि इसके मारे जानेपर अपना आत्मा ही आहत हो जायगा | पराक्रममें तो यह विष्णु के समान दीख रहा है | जान पड़ता हैं, आपपर कुपित होकर चंद्रचूड़ने अपने उत्तम तेजसे इसे बढा दिया है | साहस में यह शशिमौलि की समानता कर रहा है; क्योंकि इस अवस्थाको पहुँच जानेपर भी यह पुरुषार्थपर ही डटा हुआ है , तथापि यह हमलोगों को तृणवत ही समझ रहा है |

सनत्कुमारजी कहते हैं – व्यासजी ! दानव कुम्भांड राजनीति के ज्ञाताओं में श्रेष्ठ था | वह बाण से ऐसा कहकर फिर अनिरुद्ध से कहने लगा |

कुम्भांड ने कहा – नराधम ! अब तू वीरवर दैत्यराज की स्तुति कर और दीन वाणीसे ‘मैं हार गया’ यों बारंबार कहकर उन्हें हाथ जोडकर नमस्कार कर | ऐसा करनेपर ही तू मुक्त हो सकता हैं |

अनिरुद्धने कहा – दुराचारी निशाचर ! तुझे क्षत्रिय-धर्म का ज्ञान नहीं है | अरे ! शूरवीर के लिये दीनता दिखाना और युद्ध से मुख मोडकर भागना मरण से भी बढकर कष्टदायक होता है | विरमानी क्षत्रिय के लिये रणभूमि से सदा सम्मुख लड़ते हुए मरणा ही श्रेयस्कर है, भूमिपर पड़कर हाथ जोड़े हुए दीन की तरह मरणा कदापि नहीं |

सनत्कुमारजी कहते है – मुने ! उसी समय समस्त वीरों के, अनिरुद्ध के और मंत्री कुम्भांड के सुनते-सुनते बाणासुर के आश्वासनार्थ आकाशवाणी हुई |

आकाशवाणीने कहा – महाबली बाण ! तुम बलि के पुत्र हो, अत: थोडा विचार तो करो | परम बुद्धिमान शिवभक्त ! तुम्हारे लिये क्रोध करना उचित नहीं है | शिव समस्त प्राणियों के ईश्वर, कर्मो के साक्षी और परमेश्वर हैं | यह सारा चराचर जगत उन्हीं के अधीन है | वे ही सदा रजोगुण, सत्त्वगुण और तमोगुण का आश्रय लेकर ब्रह्मा, विष्णु और रुद्ररूप से लोकों की सृष्टि, भरण-पोषण और संहार करते हैं | वे सर्वान्तर्यामी, सर्वेश्वर, सबके प्रेरक, सर्वश्रेष्ठ, विकाररहित, अविनाशी, नित्य और मायाधीश होनेपर भी निर्गुण है | बलि के श्रेष्ठ पुत्र ! उनकी इच्छासे निर्बल को भी बलवान समझना चाहिये | महामते ! नाना प्रकारकी लीलाओं के रचने में निपुण भक्तवत्सल भगवान शंकर गर्व को मिटा देनेवाले हैं | वे इस समय तुम्हारे गर्वको चूर कर देंगे |

अनिरुद्धने कहा – शरणागतवत्सले ! आप यश प्रदान करनेवाली है, आपका रोष बड़ा उग्र होता है | देवि ! मैं नागपाश से बंधा हुआ हूँ और नागों की विषज्वालासे संतप्त हो रहा हूँ; अत: शीघ्र पधारिये और मेरी रक्षा कीजिये |

सनत्कुमारजी कहते हैं – मुनीश्वर ! जब अनिरुद्ध ने पिसे हुए काले कोयले के समान कृष्णवर्णवाली काली को इसप्रकार संतुष्ट किया, तब जेष्ठ कृष्ण चतुर्दशीकी महारात्रि में वहाँ प्रकट हुई | उन्होंने उन सर्परूपी भयानक बाणों को भस्मसात करके अपने बलिष्ठ मुक्कों के आघात से उस नाग-पंजरको विदीर्ण कर दिया | इसप्रकार दुर्गाने अनिरुद्ध को बंधनमुक्त करके उन्हें पुन: अंत:पुर में पहुँचा दिया और स्वयं यहीं अन्तर्धान हो गयी |इसप्रकार शिव की शक्तिस्वरूपा देवीकी कृपासे अनिरुद्ध कष्ट से छुट गये, उनकी सारी व्यथा मिट गयी और वे सुखी हो गये | इधर तो श्रीकृष्ण और श्रीशिव का बड़ा भयानक युद्ध हुआ | दोनों ओरसे ज्वर छोड़े गये | अंत में श्रीकृष्ण ने स्वयं श्रीरुद के पास आकर उनका स्तवन करके कहा – ‘सर्वव्यापी शंकर ! आप गुणों से निर्लिप्त होकर भी गुणों से ही गुणों को प्रकाशित करते हैं | गिरिशायी भूमन ! आप स्वप्रकाश हैं | जिनकी बुद्धि आपकी मायासे मोहित हो गयी है, वे स्त्री, पुत्र, गृह आदि विषयों में आसक्त होकर दुःखसागर में डूबता उतराते हैं | जो अजितेन्द्रिय पुरुष प्रारब्धवश इस मनुष्य-जन्म को पाकर भी आपके चरणों में प्रेम नहीं करता, वह शोचनीय तथा आत्मवंचक है | भगवन ! आप गर्वहारी हैं, आपने ही तो इस गर्वीले बाण को शाप दिया था; अत: आपकी ही आज्ञासे मैं बाणासुर की भुजाओं का छेदन करने के लिये यहाँ आया हूँ | महादेव ! आप इस युद्ध से निवृत्त हो जाइये | और आज्ञा प्रदान कीजिये की बाण की भुजाओं को काटने की, जिससे आपका शाप व्यर्थ न हो |’

महेश्वर ने कहा – तात ! आपने ठीक ही कहा है कि मैंने ही इस दैत्यराज को शाप दिया है और मेरी ही आज्ञासे आप बाणासुर की भुजाएँ काटने के लिये यहाँ पधारे हैं; किन्तु रमानाथ ! हरे ! क्या करूँ, मैं तो सदा भक्तों के ही अदीन रहता हूँ | ऐसी दशामें वीर ! मेरे देखते बाण की भुजाएँ कैसे काटी जा सकती हैं ? इसलिये मेरी आज्ञा से आप पहले जृम्भणास्त्रद्वारा मुझे जृम्भित कर दीजिये, तत्पश्चात अपना अभीष्ट कार्य सम्पन्न कीजिये |

सनत्कुमारजी कहते है – मुनीश्वर ! शंकरजी के यों कहनेपर शारंगपाणि श्रीहरि को महान विस्मय हुआ | वे अपने युद्ध-स्थानपर आकर परम आनंदित हुए | व्यासजी ! तदनन्तर नाना प्रकार के अस्त्रों के संचालन में निपुण श्रीहरि ने तुरंत ही अपने धनुषपर जृम्भणास्त्रद्वारा जृम्भित हुए शंकर को मोह में डालकर खड्ग, गदा और ऋष्टि आदिसे बाण की सेना का संहार करने लगे |

– ॐ नम: शिवाय –

शिवपुराण – १७८

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श्रीपुराणपुरुषोत्तमाय नम :
ॐ श्री गणेशाय नम:
भवाब्धिमग्नं दिनं मां समुन्भ्दर भवार्णवात | कर्मग्राहगृहीतांग दासोऽहं तव् शंकर ||

श्री शिवपुराण – माहात्म्य

रूद्रसंहिता, पंचम ( युद्ध ) खंड

अध्याय – १७८

शुक्राचार्य की घोर तपस्या और इनका शिवजी को चित्ररत्न अर्पण करना तथा अष्टमृर्त्यष्टक – स्तोत्रद्वारा उनका स्तवन करना, शिवजी का प्रसन्न होकर मृतसंजीवनी विद्या प्रदान करना

सनत्कुमारजी कहते है – व्यासजी ! मुनिवर शुक्राचार्य को शिव से मृत्यंजय नामक मृत्युका प्रशमन करनेवाली परा विद्या किस प्रकार प्राप्त हुई थी, अब उसका वर्णन करता हूँ; सुनो |
पूर्वकाल की बात है, इन भृगुनन्दन ने वाराणसीपूरी में जाकर प्रभावशाली विश्वनाथ का ध्यान करते हुए बहुत कालतक घोर तप किया था | वेदव्यासजी ! उस समय उन्होंने वहीँ एक शिवलिंग की स्थापना की और उसके सामने ही एक परम रमणीय कूप तैयार कराया | फिर प्रयत्नपूर्वक उन देवेश्वर को एक लाख बार द्रोणभर पंचामृत से तथा बहुत-से सुगन्धित द्रव्यों से स्नान कराया | फिर एक हजार बार परम प्रीतिपूर्वक चन्दन, वक्षकर्दम [ एक प्रकार का अंग-लेप, जो कपूर, अगुरु, कस्तुरी को मिलाकर बनाया जाता है ] और सुगन्धित उबटन का उस लिंगपर अनुलेप किया | तत्पश्चात सावधानी के साथ परम प्रेमपूर्वक राजचम्पक (अमलतास), धतुर, कनेर, कमल, मालती, कर्णिकार, कदम्ब, मौलसिरी, उत्पल, मल्लिका (चमेली), शतपत्री, सिंधुवार, ढाक, बन्धुकपुष्प (गुलदुपहरी), पुंनाग, नागकेशर, केसर, नवमल्लिक (बेलमोगरा), चिबिलिक (रक्तदला), कुंद (माघपुष्प), मुचुकुन्द (मोतिया), मन्दार, बिल्वपत्र, गूमा, मरुवृक (मरुआ), वृक (धुप), गँठिवन, दौना, अत्यंत सुंदर आमके पल्लव, तुलसी, देवजवासा, बृहत्पत्री, कुशांकू, नंदावर्त (नांदरुख), अगस्त्य, साल, देवदारु, कचनार, कुरबक (गुलखेरा ), दुर्वांकुर, कुरंटक (करसैला) – इनमें से प्रत्येक के पुष्पों और अन्य पल्लवों से तथा नाना प्रकार के रमणीय पत्रों और सुंदर कमलों से शंकरजी की विधिवत अर्चना की | उन्हें बहुत-से उपहार समर्पित किये | तथा शिवलिंग के आगे नाचते हुए शिवसहस्त्रनाम एवं अन्यान्य स्तोत्रों का गान करके शंकरजी का स्तवन किया | इस प्रकार शुक्राचार्य पाँच हजार वर्षोतक नाना प्रकार के विधि-विधान से महेश्वर का पूजन करते रहे; परन्तु जब उन्हें थोडा-सा भी वर देने के लिये उद्यत होते नहीं देखा, तब उन्होंने एक-दूसरे अत्यंत दुस्सह एवं घोर नियमका आश्रय लिया | उससमय शुक्र ने इन्दिर्योंसहित मन के अत्यंत चंचलतारूपी महान दोष को बारंबार भावनारूपी जल से प्रक्षालित किया | इस प्रकार चित्तरत्न को निर्मल करके उसे पिनाकधारी शिव के अर्पण कर दिया और स्वयं घूमकण का पान करते हुए तप करने लगे | इसप्रकार उनके एक सहस्त्र वर्ष और बीत गये | तब भृगुनन्दन शुक्र को यों दृढ़चित्त से घोर तप करते देखकर महेश्वर उनपर प्रसन्न हो गये | फिर तो दक्षकन्या पार्वती के स्वामी साक्षात् विरूपाक्ष शंकर, जिनके शरीर की कान्ति सहस्त्रों सूर्यों से भी बढकर थी, उस लिंग से निकलकर शुक्र से बोले |

महेश्वर ने कहा – महाभाग भृगुनन्दन ! तुम तो तपस्या की निधि हो | महामुने ! मैं तुम्हारे इस अविच्छिन्न तप से विशेष प्रसन्न हूँ | भार्गव ! तुम अपना सारा मनोवांछित वर माँग लो | मैं प्रीतिपूर्वक तुम्हारा सारा मनोरथ पूर्ण कर दूँगा | अब मेरे पास तुम्हारे मनोरथ पूर्ण कर दूँगा | अब मेरे पास तुम्हारे लिये कोई वस्तु अदेय नहीं रह गयी है |

सनत्कुमारजी कहते हैं– मुने ! शम्भु के इस परम सुखदायक एवं उत्कृष्ट वचन को सुनकर शुक्र प्रसन्न हो आनंद समुद्र में निमग्न हो गये | उन कमलनयन द्विजवर शुक्र का शरीर परमानन्द जनित रोमांचके कारण पुलकायमान हो गया | तब उन्होंने हर्षपूर्वक शम्भु के चरणों में प्रणाम किया | उस समय उनके नेत्र हर्ष से खिल उठे थे | फिर वे मस्तकपर अंजलि रखकर जय-जयकार करते हुए अष्टमूर्तिधारी [ पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, यजमान, चन्द्रमा और सूर्य – इन आठों में अधिष्ठित शर्व, भव, रूद्र, उग्र, भीम, पशुपति, महादेव और ईशान – ये अष्टमूर्तियों के नाम है | ] वरदायक शिवकी स्तुति करने लगे |

अष्टमुर्त्यष्टका स्त्रोत्र –

भार्गव ने कहासूर्यस्वरूप भगवन ! आप त्रिलोकी का हित करनेके लिये आकाश में प्रकाशित होते है और अपनी इन किरणों से समस्त अंधकार को अभिभूत करके रातमें विचरनेवाले असुरों का मनोरथ नष्ट कर देते हैं | जगदीश्वर ! आपको नमस्कार है | घोर अन्धकार के लिये चन्द्रस्वरूप शंकर ! आप अमृत के प्रवाह से परिपूर्ण तथा जगत के सभी प्राणियों के नेत्र है | आप अपनी अमर्याद तेजोमय किरणों से आकाश में और भूतलपर अपार प्रकाश फैलाते हैं, जिससे सारा अन्धकार दूर हो जाता हैं; आपको प्रणाम है | सर्वव्यापिन ! आप पावन पथ – योगमार्ग का आश्रय लेनेवालों की सदा गति तथा उपास्यदेव हैं | भुवन-जीवन ! आपके बिना भला, इस लोकमें कौन जीवित रह सकता हैं | सर्पकुल के संतोषदाता ! आप निश्चल वायुरूप से सम्पूर्ण प्राणियों की वृद्धि करनेवाले है, आपको अभिवादन है | विश्व के एकमात्र पावनकर्ता ! आप शरणागतरक्षक और अग्नि की एकमात्र शक्ति है | पावक आपका ही स्वरूप है | आपके बिना मृतकों का वास्तविक दिव्य कार्य दाह आदि नहीं हो सकता | जगत के अंतरात्मा ! आप प्राण –शक्ति के दाता, जगत्स्वरूप और पद-पदपर शान्ति प्रदान करनेवाले है; आपके चरणों में मैं सिर झुकाता हूँ | जलस्वरूप परमेश्वर ! आप निश्चय ही जगत के पवित्रकर्ता और चित्रविचित्र सुंदर चरित्र करनेवाले हैं | विश्वनाथ ! जलमें अवगाहन करने से आप विश्वको निर्मल एवं पवित्र बना देते हैं, इसलिये आपको नमस्कार है | आकाशरूप ईश्वर ! आपसे अवकाश प्राप्त करने के कारण यह विश्व बाहर और भीतर विकसित होकर सदा स्वभाववश श्वास लेता है अर्थात इसकी परम्परा चलती रहती है तथा आपके द्वारा यह संकुचित भी होता है अर्थात नष्ट हो जाता है, इसलिये दयालु भगवन ! मैं आपके आगे नतमस्तक होताहूँ | विश्वम्भरात्मक ! आप ही इस विश्वका भरण-पोषण करते हैं | सर्वव्यापिन ! आपके अतिरिक्त दूसरा कौन अज्ञानान्धकार को दूर करनेमें समर्थ हो सकता है | अत: विश्वनाथ ! आप मेरे अज्ञानरूपी तमका विनाश कर दीजिये | नागभूषण ! आप स्तवनीय पुरुषों में सबसे श्रेष्ठ हैं | इसलिये आप परात्पर प्रभु को मैं बारंबार प्रणाम करता हूँ | आत्मस्वरूप शंकर ! आप समस्त प्राणियों के अंतरात्मा में निवास करनेवाले, प्रत्येक रूप म व्याप्त है और मैं आप परमात्माका जन हूँ | अष्टमूर्ते ! आपकी इन रूप-परम्पराओं से यह चराचर विश्व विस्तार को प्राप्त हुआ है, मुक्तपुरुषों के बन्धो ! आप विश्व के समस्त प्राणियों के स्वरूप, प्रणतजनों के सम्पूर्ण योगक्षेम का निर्वाह करनेवाले और परमार्थ-स्वरूप है | आप अपनी इन अष्टमूर्तियों से युक्त होकर इस फैले हुए विश्वको भलिभाँति विस्तृत करते अहिं, अत: आपको मेरा अभिवादन है |

सनत्कुमारजी कहते हैं – मुनिवर ! भृगुनन्दन शुक्र ने इसप्रकार अष्टमुर्त्यष्टक –स्तोत्रद्वारा शिवजी का स्तवन करके भूमिपर मस्तक रखकर उन्हें बारंबार प्रणाम किया | जब अमित तेजस्वी भार्गवने महादेव की इस प्रकार स्तुति की, तब शिवजी ने चरणों में पड़े हुए उन द्विजवर को अपनी दोनों भुजाओं से पकडकर उठा लिया और परम प्रेमपूर्वक मेघगर्जन की-सी गम्भीर एवं मधुर वाणी में कहा | उससमय शंकरजी के दाँतो की चमक से सारी दिशाएँ प्रकाशित हो उठी थी |

महादेवजी बोले – विप्रवर कवे ! तुम मेरे पावन भक्त हो | तात ! तुम्हारे इस उग्र तपसे, उत्तम आचरणसे, लिंगस्थापनजन्य पुण्यसे, लिंग की आराधना करने से, चित्तका उपहार प्रदान करनेसे, पवित्र अटल भावसे, अविमुक्त महाक्षेत्र काशी में पावन आचरण करने से मैं तुम्हें पुत्ररूप से देखता हूँ; अत: तुम्हारे लिये मुझे कुछ भी अदेय नहीं हैं | तुम अपने इसी शरीरसे मेरी उदरदरी में प्रवेश करोगे और मेरे श्रेष्ठ इन्द्रियमार्ग से निकलकर पुत्ररूप में जन्म ग्रहण करोगे | महाशुछे ! मेरे पास जो मृतसंजीवनी नामकी निर्मल विद्या है, जिसका मैंने ही अपने महान तपोबल से निर्माण किया है, उस महामंत्ररूपा विद्याको आज मैं तुम्हे प्रदान करूँगा; क्योंकि तुम पवित्र तपकी निधि हो, अत: तुममें उस विद्याको धारण करनेकी योग्यता वर्तमान है | तुम नियमपूर्वक जिस-जिसके उद्देश्यसे विद्येश्वर की इस श्रेष्ठ विद्याका प्रयोग करोगे, वह निश्चय ही जीवित हो जायगा – यह सर्वथा सत्य है | तुम आकाश में अत्यंत दीप्तिमान तारारूप से स्थित होओगे | तुम्हारा तेज सूर्य और अग्नि के तेजका भी अतिक्रमण कर जायगा | तुम ग्रहों में प्रधान माने जाओगे | जो स्त्री अथवा पुरुष तुम्हारे सम्मुख रहनेपर यात्रा करेंगे, उनका सारा कार्य तुम्हारी दृष्टि पड़ने से नष्ट हो जायगा | सुव्रत ! तुम्हारे उदय होनेपर जगत में मनुष्यों के विवाह आदि समस्त धर्मकार्य सफल होंगे | सभी नंदा (प्रतिपदा, षष्ठी और एकादशी ) तिथियाँ तुम्हारे संयोग से शुभ हो जायँगी और तुम्हारे भक्त वीर्यसम्पन्न तथा बहुत-सी सन्तानवाले होंगे | तुम्हारे द्वारा स्थापित किया हुआ यह शिवलिंग ‘शुक्रेश’ के नामसे विख्यात होगा | जो मनुष्य इस लिंग की अर्चना करेंगे, उन्हें सिद्धि प्राप्त हो जायगी | जो लोग वर्षपर्यन्त नक्तव्रतपरायण होकर शुक्रवार के दिन शुक्रकूप के जलसे सारी क्रियाएँ सम्पन्न केक शुक्रेश की अर्चना करेंगे, उन्हें जिस फलकी प्राप्ति होगी, वह मुझसे श्रवण करो |

उन मनुष्यों में वीर्य की अधिकता होगी, उनका वीर्य कभी निष्फल नहीं होगा, वे पुत्रवान तथा पुरुषत्व के सौभाग्यसे सम्पन्न होंगे | इसमें तनिक भी संदेह नहीं है | वे सभी मनुष्य बहुत-सी विद्याओं के ज्ञाता और सुख के भागी होंगे | यों वरदान देकर महादेव उसी लिंग में समा गये | तब भृगुनन्दन शुक्र भी प्रसन्नमन से अपने धामको चले गये | व्यासजी ! यों शुक्राचार्य को जिसप्रकार अपने तपोबल से मृत्युंजय नामक विद्या की प्राप्ति हुई थी, वह वृतांत मैंने तुमसे वर्णन कर दिया |

– ॐ नम: शिवाय –

शिवपुराण – १७१ से १७७ [भाग -२ ]

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श्रीपुराणपुरुषोत्तमाय नम :
ॐ श्री गणेशाय नम:
भवाब्धिमग्नं दिनं मां समुन्भ्दर भवार्णवात | कर्मग्राहगृहीतांग दासोऽहं तव् शंकर ||

श्री शिवपुराण – माहात्म्य

रूद्रसंहिता, पंचम ( युद्ध ) खंड

अध्याय – १७१ से १७७ [ भाग – २ ]

शुक्रद्वारा जपे गये मृत्यंजय-मन्त्र और शिवाष्टोत्तरशतनाम स्त्रोत्र का वर्णन

अब शम्भु के उदर में शुक्र ने जिस मन्त्रका जप किया था, उसका वर्णन सुनो | महर्षे ! वह मन्त्र इसप्रकार है –

‘ॐ नमस्ते देवेशाय सुरासुर नमस्कृताय भूतभव्यमहादेवाय हरितपिंगललोचनाय | बलाय बुद्धिरुपिणे वैयाघ्नवसनच्छदायारणेयाय त्रिलोक्यप्रभवे | ईश्वराय हराय हरिनेत्राय युगांतकरणायानलाय गणेशाय लोकपालाय | महाभुजाय महाहस्ताय शूलिने महादंष्ट्रींणे कालाय महेश्वराय अव्ययाय कालरुपिणे | नीलग्रीवाय महोदराय गणाध्यक्षाय सर्वात्मने सर्वभावनाय सर्वगाय मृत्यहन्ते पारियात्रसुव्रताय | ब्रह्मचारिणे वेदान्तगाय तपोन्तगाय पशुपतये व्यंगाय शूलपाणये वृषकेतवे हरये जटिने | शिखण्डिने लकुटिने महायश से भूतेश्वराय गुहावासिने वीणापतवतालयते अमराय दर्शनीयाय | बालसूर्यनिभाय श्मशानवासिने भगवते उमापतये अरिन्दमाय भगस्पाक्षिपातिने पूष्णो दशननाशनाय | क्रूरकर्तकाय पाशहस्ताय प्रलयकालाय उल्कामुखायाग्निकेतवे गुनये दीप्ताय विशाम्पतये | उन्नयते जनकाय चतुर्थकाय लोकसत्तमाय वामदेवाय वागदाक्षिण्याय वामतो | भिक्षवे भिक्षुरुपिणे जटिने स्वयं जटिलाय शक्रहस्तप्रतिस्तम्भकाय वसूनां स्तम्भकाय क्रतने | क्रतुकराय कालाय मेधाविने मधुकराय चलाय वानस्पत्याय वाजसनेतिसमाश्रमपूजिताय | जगद्धात्रे जगत्कर्त्रे पुरुषाय शाश्वताय ध्रुवाय धर्माध्यक्षाय त्रिवर्त्मने भूतभावनाय | त्रिनेत्राय बहुरूपाय सुर्यायुतसमप्रभाय देवाय सर्वतुर्योनिनादिने सर्वबाधाविमोचनाय | बन्धनाय सर्वधारिणे धर्मोत्तमाय पुष्पदन्तायविभागाय मुखाय सर्वहराय | हिरण्यश्रवसे द्वारिणे भीमाय भीमपराक्रमाय ॐ नमो नम: |

इस मन्त्र का अर्थ –
[ ॐ जो देवताओं के स्वामी, सुर-असुरद्वारा वन्दित, भूत और भविष्य के महान देवता, हरे और पीले नेत्रोंसे युक्त, महाबली, बुद्धिस्वरुप, वाघ्रम्बर धारण करनेवाले, अग्निस्वरूप, त्रिलोकी के उत्पत्तिस्थान, ईश्वर, हर, हरिनेत्र, प्रलयकारी, अग्निस्वरूप, गणेश, लोकपाल, महाभुज, महाहस्त, त्रिशूल धारण करनेवाले, बड़ी-बड़ी दाढ़ोंवाले, कालस्वरुप, महेश्वर, अविनाशी, कालरूपी, नीलकंठ, महोदर, गणाध्यक्ष, सर्वात्मा, सबको उत्पन्न करनेवाले, सर्वव्यापी, मृत्युको हटानेवाले, पारियात्र पर्वतपर उत्तम व्रत धारण करनेवाले, ब्रह्मचारी, वेदान्तप्रतिपाद्य, तपकी अंतिम सीमातक पहुँचनेवाले, पशुपति, विशिष्ट अंगोंवाले, शूलपाणि, वृषध्वज, पापापहारी, जटाधारी, शिखन्ड, धारण करनेवाले, दंडधारी, महायशस्वी, भूतेश्वर, गुहामें निवास करनेवाले, वीणा और पणवपर ताल लगानेवाले, अमर, दर्शनीय, बालसूर्य –सरीखे रूपवाले, श्मशानवासी, ऐश्वर्यशाली, उमापति, शत्रुदमन, भग के नेत्रोकों नष्ट कर देनेवाले, पूषाके दाँतो के विनाशक, क्रूरतापूर्वक संहार करनेवाले, पाशधारी, प्रलयकालरूप, उल्कामुख, अग्निकेतु, मननशील, प्रकाशमान, प्रजापति, ऊपर उत्प्रनेवाले, जीवों को उत्पन्न करनेवाले, तुरीयतत्त्वरूप, लोकों में सर्वश्रेष्ठ, वामदेव, वाणी की चतुरतारूप, वाममार्ग में भिक्षुरूप, भिक्षुक, जटाधारी, जटिल – दुराराध्य, इंद्र के हाथ को स्तम्भित करनेवाले, वसुओं को विजड़ित कर देनेवाले, यज्ञस्वरूप, यज्ञकर्ता, काल, मेधावी, मधुकर, चलने-फिरनेवाले, वनस्पतिका आश्रय लेनेवाले, बाजसन नामसे सम्पूर्ण आश्रमोंद्वारा पूजित, जगदधाता, जगत्कर्ता, सर्वान्तर्षामी, सनातन, ध्रुव, धर्माध्यक्ष, भू:-भुव: स्व: – इन तीनों लोकों में विचरनेवाले, भूतभावन, त्रिनेत्र, बहुरूप, दस हजार सूर्यों के समान प्रभाशाली, महादेव, सब तरह के बाजे बजानेवाले, सम्पूर्ण त्राधाओं से विमुक्त करनेवाले, बंधनस्वरूप, सबको धारण करनेवाले, उत्तम धर्मरूप, पुष्पदंत, विभागरहित, मुख्यरूप, सबका हरण करनेवाले, सुवर्णके समान दीप्त किर्तिवाले, मुक्ति के द्वारस्वरूप, भीम तथा भीमपराक्रमी है, उन्हें नमस्कार है, नमस्कार है | ]

इसी श्रेष्ठ मन्त्र का जप करके शुक्र शम्भु के जठर-पंजर से लिंग के रास्ते उत्कट वीर्य की तरह निकले थे | उस समय गौरी ने उन्हें पुत्ररूप से अपनाया आयर जगदीश्वर शिव ने अजर-अमर बना दिया | तब वे दूसरे शंकर के सदृश शोभा पाने लगे | तीन हजार वर्ष व्यतीत होने के पश्चात वे ही वेद्निधि मुनिवर शुक्र पुन: इस भूतलपर महेश्वर से उत्पन्न हुए | उस समय उन्होंने धैर्यशाली एवं तपस्वी दानवराज अंधक को देखा | उसका शरीर सूख गया था और वह त्रिशूलपर लटका हुआ परमेश्वर शिवका ध्यान कर रहा था | वह शिवजी के १०८ नामों का इसप्रकार स्मरण कर रहा था –

शिवजी के १०८ नाम व उसका अर्थ –

महादेव – देवताओं में महान, विरूपाक्ष – विकराल नेत्रोवाले, चन्द्रार्थकृतशेखर – मस्तकपर अर्धचन्द्र धारण करनेवाले, अमृत – अमृतस्वरूप, शाश्वत – सनातन, स्थाणु – समाधिस्थ होनेपर ठूँठ के समान स्थिर, नीलकंठ – गले में नील चिन्ह धारण करनेवाले, पिनाकी – पिनाक नामक धनुष धारण करनेवाले, वृषभाक्ष – वृषभ के नेत्र-सरीखे विशाल नेत्रोंवाले, महाज्ञेय – ‘महान’ रूप से जाननेयोग्य, पुरुष – अन्तर्यामी, सर्वकामद – सम्पूर्ण कामनाओं को पूर्ण करनेवाले, कामारि – कामदेव के शत्रु, कामदहन – कामदेव को दग्ध कर देनेवाले, कामरूप – इच्छानुसार रूपधारण करनेवाले, कपर्दी – विशाल जटाओंवाले, विरूप – विकराल रूपधारी, गिरीश – गिरिवर कैलासपर शयन करनेवाले, भीम – भयंकर रूपवाले, सूक्की – बड़े-बड़े जबड़ोंवाले, रक्तवासा – लाल वस्त्रधारी, योगी – योगके ज्ञाता, कालदहन – काल को भस्म कर देनेवाले, त्रिपुरघ्र – त्रिपुरों के संहारकर्ता, कपाली – कपाल धारण करनेवाले, गूढ़व्रत – जिनका व्रत प्रकट नहीं होता, गुप्तमन्त्र – गोपनीय मन्त्रोबाले, गम्भीर – गम्भीर स्वभाववाले, भावगोचर – भक्तों की भावना के अनुसार प्रकट होनेवाले, अणिमादिगुणाधार – अणिमा आदि सिद्धियों के अधिष्ठान, त्रिलोकैश्वर्यदायक – त्रिलोकी का ऐश्चर्य प्रदान करनेवाले, वीर – बलशाली, वीरहन्ता – शत्रुवीरों को मारनेवाले, घोर – दुष्टों के लिये भयंकर, विरूप – विकट रूपधारण करनेवाले, मांसल – मोटे–ताजे शरीरवाले, पटु – निपुण, महामांसाद – श्रेष्ठ फलका गूदा खानेवाले, उन्मत्त – मतवाले, भैरव – कालभैरवस्वरूप, महेश्वर – देवेश्वरों में भी श्रेष्ठ, त्रैलोक्यद्रावण – त्रिलोकीका विनाश करनेवाले, लुब्ध – स्वजनों के लोभी, लुब्धक – महाव्याघ्रस्वरूप, यज्ञसूदन – दक्ष-यज्ञ के विनाशक, कृत्तिकासूतयुक्त – कृत्त्तिकाओं के पुत्र (स्वामिकार्तिक ) से युक्त, उन्मत – उन्मत्तका–सा वेष धारण करनेवाले, कृत्तिवासा – गजासुर के चमड़े को ही वस्त्ररूप में धारण करनेवाले, गजकृत्तिपरिधान – हाथीका चर्म लपेटनेवाले, क्षुब्ध – भक्तों का कष्ट देखकर क्षुब्ध हो जानेवाले, भुजगभूषण – सर्पों को भूषणरूपमें धारण करनेवाले, दत्तालम्ब – भक्तों के अवलम्बदाता, वेताल – वेतालस्वरूप, घोर–घोर , शाकिनीपूजित – शाकिनियोंद्वारा स्माराधित, अघोर – अघोर–पथके प्रवर्तक, घोरदैत्यघ्र –भयंकर दैत्यों के संहारक, घोरघोष – भीषण शब्द करनेवाले, वनस्पति – वनस्पतिस्वरूप, भस्मांग – शरीर में भस्म रमानेवाले, जटिल – जटाधारी, शुद्ध – परम पावन, भेरुंडशतसेवित – सैकड़ो भेरुंडनामक पक्षियोंद्वारा सेवित, भूतेश्वर – भूतों के अधिपति, भूतनाथ – भूतगणों के स्वामी, पंचभुताश्रित – पंचभूतों को आश्रय देनेवाले, खग – गगन-विहारी, क्रोधित – क्रोधयुक्त, निष्ठुर– दुष्टोंपर कठोर व्यवहार करनेवाले, चंड – प्रचंड पराक्रमी, चंडीश – चंडी के प्राणनाथ, चंडीकाप्रिय – चण्डिका के प्रियतम, चंडतुंड – अत्यंत कुपित मुखवाले, गरुत्मान – गरुड़स्वरूप , निर्स्त्रिश – खड्गस्वरूप, शवभोजन – शवका भोग लगानेवाले, लेलिदान – क्रुद्ध होनेपर जीभ लपलपानेवाले, महारौद्र – अत्यंत भयंकर, मृत्यु – मृत्युस्वरूप, मृत्योरगोचर – मृत्यु की भी पहुँचसे परे, मृत्योर्म्रुत्यु – मृत्यु के भी काल, महासेन – विशाल सेनावाले कार्तिकेय-स्वरूप, श्मशानारण्यवासी – श्मशान एवं अरण्यमें विचरनेवाले, राग – प्रेमस्वरूप, विराग – आसक्तिरहित, रागांध – प्रेम में मस्त रहनेवाले, वीतराग – वैरागी, शतार्थी – तेज की असंख्य चिनगारियोंसे युक्त, सत्त्व – सत्त्वगुणरूप, रज: – रजोगुणरूप, तम: – तमोगुणरूप, धर्म – धर्मस्वरूप, अधर्म – अधर्मरूप, वारवानुज – इंद्र के छोटे भाई उपेन्द्रस्वरूप, सत्य – सत्यरूप, असत्य- सत्यसे भी परे, सद्रूप – उत्तम रूपवाले, असद्रूप -बीभत्स रूपधारी, अहेतुक – हेतुरहित, अर्धनारीश्वर – आधा पुरुष और आधा स्त्रीका रूप धारण करनेवाले, भानु – सूर्यस्वरूप, भानुकोटिशतप्रभ – कोटिशत सूर्यों के समान प्रभावशाली, यज्ञ – यज्ञस्वरूप, यज्ञपति – यज्ञेश्वर, रूद्र – संहारकर्ता, ईशान – ईश्वर, वरद – वरदाता, शिव – कल्याणस्वरूप |

परमात्मा शिव की इन १०८ मूर्तियों का ध्यान करने से वह दानव उस महान भय से मुक्त हो गया | उस समय प्रसन्न हुए जटाधारी शंकर ने उसे मुक्त करके उस त्रिशूल के अग्रभाग से उतार लिया और दिव्य अमृतकी वर्षा से अभिषिक्त कर दिया | तत्पश्चात महात्मा महेश्वर उसने जो कुछ किया था, उस सबका सांत्वनापूर्वक वर्णन करते हुए उस महादैत्य अंधक से बोले |

ईश्वर ने कहा – हे दैत्यन्द्र ! मैं तेरे इन्द्रिय-निग्रह, नियम, शौर्य और धैर्य से प्रसन्न हो गया हूँ; अत: सुव्रत ! अब तू कोई वर माँग ले | दैत्यों के राजाधिराज ! तूने निरंतर मेरी आराधना की है, इससे तेरा सारा कल्मष धुल गया और अब तू वर पाने के योग्य हो गया है | इसीलिये मैं तुझे वर देने के लिये आया हूँ; क्योंकि तीन हजार वर्षोतक बिना खाये-पीये प्राण धारणा किये रहने से तूने जो पुण्य कमाया है, उसके फलस्वरूप तुम्हे सुख की प्राप्ति होनी चाहिये |

सनत्कुमारजी कहते है – मुने ! यह सुनकर अंधक ने भूमिपर अपने घुटने टेक दिये और फिर वह हाथ जोडकर काँपता हुआ भगवान उमापति से बोला |

अंधक ने कहा – भगवन ! आपकी महिमा जाने बिना मैंने पहले रणांगण में हर्षगदगद वाणीसे आपको जो दीन, हीन तथा नीच-से-नीच कहा है और मुर्खतावश लोक में जो – जो निन्दित कर्म किया है, प्रभो ! उस सबको आप अपने मन में स्थान न दें अर्थात उसे भूल जायें | महादेव ! मैं अत्यंत ओछा और दु:खी हूँ | मैंने कामदोषवश पार्वती के विषय में भी जो दूषित भावना कर ली थी, उसे आप क्षमा कर दें | आपको तो अपने कृपण, दु:खी एवं दीन भक्तपर सदा ही विशेष दया करनी चाहिये | मैं उसी तरह का एक दीन भक्त हूँ और आपकी शरण में आया हूँ | देखिये, मैंने आपके सामने अंजलि बाँध रखी है | अब आपको मेरी रक्षा करनी चाहिये | ये जगज्जननी पार्वतीदेवी भी मुझपर प्रसन्न हो जायँ और सारे क्रोध को त्यागकर मुझे कृपादृष्टि से देखे | चन्द्रशेखर ! कहाँ तो इनका भयंकर क्रोध और कहाँ मैं तुच्छ दैत्य ? चन्द्रमौलि ! मैं किसी प्रकार उसको सहन नहीं कर सकता | शम्भो ! कहाँ तो परम उदार आप और कहाँ बुढापा, मृत्यु तथा काम-क्रोध आदि दोषों के वशीभूत मैं महेश्वर ! आपके ये युद्धकला-निपुण महाबली वीर पुत्र मेरी कृपणतापर विचार करके अब क्रोध के वशीभूत मत हों | तुषार, हार, चन्द्रकिरण, शंख, कुन्द्पुष्प और चन्द्रमा के से वर्णवाले शिव ! मैं इन पार्वती को गुरुता के गौरववश नित्य मातृ-दृष्टि से देखूँ | मैं नित्य आप दोनों का भक्त बना रहूँ | देवताओं के साथ होनेवाला मेरा वैर दूर हो जाय तथा मैं शांतवित्त हो योग-चिन्तन करता हुआ गणों के साथ निवास करूँ | महेशान ! आपकी कृपा से मैं उत्पन्न हुए इस विरोधी दानवभाव का पुन: कभी स्मरण न करूँ, वही उत्तम वर मुझे प्रदान कीजिये |

सनत्कुमारजी कहते हैं – मुनिसत्तम ! इतनी बात कहकर वह दैत्यराज माता पार्वती की ओर देखकर त्रिनयन शंकर का ध्यान करता हुआ मौन हो गया | तब रूद्र ने उसकी ओर कृपादृष्टि से देखा | उनकी दृष्टि पड़ते ही उसे अपने पूर्ववृतांत तथा अद्भुत जन्मका स्मरण हो आया | उस घटना का स्मरण होते ही उसका मनोरथ पूर्ण हो गया | फिर तो माता-पिता (उमा-महेश्वर) को प्रणाम करके वह कृतकृत्य हो गया | उस समय पार्वती तथा बुद्धिमान शंकर ने उसका मस्तक सूँघकर प्यार किया | इस प्रकार अंधक ने प्रसन्न हुए चन्द्रशेखर से अपना सारा मनोरथ प्राप्त कर लिया | मुने ! महादेवजी की कृपा से अंधक को जिस प्रकार परम  सुखद गणाध्यक्ष – पद प्राप्त हुआ था, वह सारा – का – सारा पुरातन वृतांत मैंने सुना दिया और मृत्युंजय – मन्त्रका भी वर्णन कर दिया | यह मन्त्र मृत्यु का विनाशक और सम्पूर्ण कामनाओं का फल प्रदान करनेवाला हैं | इसे प्रयत्नपूर्वक जपना चाहिये |

– ॐ नम: शिवाय –

शिवपुराण – १७१ से १७७ [ भाग – १ ]

shivpuran9215श्रीपुराणपुरुषोत्तमाय नम :
ॐ श्री गणेशाय नम:
भवाब्धिमग्नं दिनं मां समुन्भ्दर भवार्णवात | कर्मग्राहगृहीतांग दासोऽहं तव् शंकर ||

श्री शिवपुराण – माहात्म्य

रूद्रसंहिता, पंचम ( युद्ध ) खंड

अध्याय – १७१ से १७७ [ भाग – १ ]

नन्दीश्वरद्वारा शुक्राचार्य का अपहरण और शिवद्वारा उनका ‘शुक्र’ नाम रखा जाना, शुक्रद्वारा जपे गये मृत्यंजय-मन्त्र और शिवाष्टोत्तरशतनाम स्त्रोत्र का वर्णन

व्यासजी ने पूछा – महाबुद्धिमान सनत्कुमारजी ! जब वह महान भयंकर एवं रोमांचकारी संग्राम चल रहा था, उस समय त्रिपुरारि शंकर ने दैत्यगुरु विद्वान शुक्राचार्य को निगल लिया था – यह घटना मैंने संक्षेप में ही सुनी थी | अब आप उसे विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये | पिनाकधारी शिव के उदर में जाकर उन महायोगी शुक्राचार्य ने क्या किया था ? सम्भु की जठराग्नि ने उन्हें जलाया क्यों नहीं ? भृगुनन्दन बुद्धिमान शुक्र भी तो कल्पांतकालीन अग्नि के समान उग्र तेजस्वी थे | वे शम्भु के जठर-पत्थर से कैसे निकले ? उन्होंने कैसे और कितने कालतक आराधना की थी ? तात ! उन्हें जो मृत्युका शमन करनेवाली पराविद्या प्राप्त हुई थी, वह विद्या कौन सी है , जिससे मृत्यु का निवारण हो जाता है ? मुने ! लीलाविहारी देवाधिदेव भगवान शंकर के त्रिशूलसे छूटे हुए अंधक को गणाध्यक्षता की प्राप्ति कैसे हुई ? तात ! मुझे शिवलीलामृत श्रवण करने की विशेष लालसा है, अत: आप मुझपर कृपा करके वह सारा वृतांत पूर्णरूपसे वर्णन कीजिये |

ब्रह्माजी कहते है – अमिततेजस्वी व्यासजी के इन वचनों को सुनकर सनत्कुमार शिवजी के चरणकमलों का स्मरण करके कहने लगे |

सनत्कुमारजी ने कहा – मुनिवर ! भगवान शंकर के प्रमथों की जब अत्यंत विजय होने लगी, तब अंधक घबराकर शुक्राचार्यजी की शरण में गया और उसने गिडगिडाकर मृतसंजीवनी विद्या के द्वारा मरे हुए असुरों को जीविन करने की प्रार्थना की | इसपर शुक्राचार्य ने शरणागतधर्म की रक्षा करना उचित समझा | फिर तो वे युद्धस्थल में गये और आदरपूर्वक विद्या के स्वामी शंकर का स्मरण करके एक-एक दैत्यपर मृतसंजीवनी विद्याका प्रयोग करने लगे | शुक्राचार्य के संजीवनी-प्रयोग से जब बड़े-बड़े दानव जीवित होकर प्रमथो को बुरी तरह मारने लगे, तब प्रमथों ने जाकर प्रमथेश्वरेश शिवको यह समाचार सुनाया | तब शिवजी ने कहा – ‘नन्दिन ! तुम अभी तुरंत ही जाओ और दैत्यों के बीच से द्विजश्रेष्ठ शुक्राचार्य को उसी प्रकार उठा लाओ जैसे बाज लवा को उठा ले जाता हैं |’

सनत्कुमारजी कहते हैं – महर्षे ! वृषभध्वज के यों कहनेपर नंदी साँड के समान बड़े जोर से गरजे और तुरंत ही सेना को लाँघकर उस स्थानपर जा पहुँचे जहाँ भृगुवंश के दीपक शुक्राचार्य विराजमान थे | वहाँ समस्त दैत्य हाथों में पाश, खड्ग, वृक्ष, पत्थर और पर्वतखंड लिये हुए उनकी रक्षा कर रहे थे | यह देखकर बलशाली नंदी ने उन दैत्यों को विक्षुब्ध करके शुक्राचार्य का उसी प्रकार अपहरण कर लिया, जैसे शरभ हाथी को उठा ले जाता हैं | महाबली नंदीद्वारा पकड़े जानेपर शुक्राचार्य के वस्त्र खिसक गये | उनके आभूषण गिरने लगे और केश खुल गये | तब देवशत्रु दानव उन्हें छुडाने के लिये सिंहनाद करते हुए नंदी के पीछे दौड़े और जैसे मेघ जल की वर्षा करते हैं, उसी तरह नंदीश्वर के ऊपर वज्र, त्रिशूल, तलवार, फरसा, बरेठी और गोफन आदि अस्त्रों की उग्र वृष्टि करने लगे | तब उस देवासुर-संग्राम के विकराल रूप धारण करनेपर गणाधिराज नंदी ने अपने मुख की आगसे सैकड़ों शस्त्रों को भस्म कर दिया और उन भृगुनन्दन को दबोचकर शत्रुदल को व्यथित करते हुए वे शिवजी के समीप आ पहुँचे तथा शीघ्र ही उन्हें निवेदित करते हुए बोले – ‘भगवन ! ये शुक्राचार्य उपस्थित हैं |’ तब भूतनाथ देवाधिदेव शंकर ने पवित्र पुरुषद्वारा प्रदान किये हुए उपहार की भान्ति शुक्राचार्य को पकड़ लिया और बिना कूचा कहे उन्हें फल की तरह मुझ में डाल लिया | उस समय समस्त असुर उच्चस्वर से हाहाकार करने लगे |

व्यासजी ! जब गिरिजेश्वर ने शुक्राचार्य को निगल लिया, तब दैत्यों की विजय की आशा जाती रही | उस समय उनकी दशा सूडरहित गजराज, सींगहीन साँड, मस्तकविहीन देह, अध्ययनरहित ब्राह्मण, उद्यमहीन प्राणी, भाग्यहीन के उद्यम, पतिरहित स्त्री, फलवर्जित वाण, पुण्यहीनों की आयु, व्रतरहित वेदाध्ययन, एकमात्र वैभवशक्ति के बिना निष्फल हुए कर्मसमूह, शूरताहीन क्षत्रिय और सत्य के बिना धर्मसमुदाय की भान्ति शोचनीय हो गयी | दैत्यों का सारा उत्साह जाता रहा | तब अंधक ने महान दुःख प्रकट करते हुए अपने शूरवीरों को बहुत उत्साहित किया और कहा – ‘वीरों ! जो रणांगण छोडकर भाग जाते हैं, उनकी ख्याति अपयशरूपी कालिमा से मलिन हो जाती है और उन्हें इस लोकमें तथा परलोक में – कहीं भी सुख नहीं मिलता | तब अत्यंत घमासान युद्ध हुआ | इसी बीच विनायक, स्कन्द, नंदी, सोमनंदी, वीर नैगमेय और महाबली वैशाख आदि उग्र गणों ने त्रिशूल, शक्ति और बाणसमूहों की धारावाहिक वर्षा करके अंधक को अँधा बना दिया | फिर तो प्रमथों तथा असुरों की सेनाओं में महान कोलाहल मच गया | उस घोर शब्दको सुनकर शम्भु के उदर में स्थित शुक्राचार्य आश्रयरहित वायु की भान्ति निकलने का मार्ग ढूंडते हुए चक्कर काटने लगे | उससमय उन्हें रूद्र के उदर में पातालसहित सातों लोक, ब्रह्मा, नारायण, इंद्र, आदित्य और अप्सराओं के विचित्र भुवन तथा वह प्रमथासुर-संग्राम भी दीख पड़ा | इस प्रकार वे सौ वर्षोतक शिवजी की कुक्षि में चारों ओर भ्रमण करते रहे; परन्तु उन्हें उसी प्रकार कोई छिद्र नहीं दीख पड़ा, जैसे दुष्ट की दृष्टि सदाचारी के छिद्र को नहीं देख पाती | तब भृगुनन्दन ने शैवयोग का आश्रय ले एक मन्त्र का जप किया | उस मन्त्र के प्रभाव से वे शम्भु के जठरपंजर से शुक्ररूप से लिंगमार्ग से बाहर निकले | तब उन्होंने शिवजी को प्रणाम किया | गौरीने उन्हें पुत्ररूप में स्वीकार कर लिया और विघ्नरहित बना दिया | तदनन्तर करुणासागर महेश्वर भृगुनन्दन शुक्राचार्य को वीर्य के रास्ते निकला हुआ देखकर मुसकराते हुए बोले |

महेश्वर ने कहा – भृगुनन्दन ! चूँकि तुम मेरे लिंगमार्ग से शुक्र की तरह निकले हो, इसलिये अब तुम शुक्र कहालाओंगे | जाओ, अब तुम मेरे पुत्र हो गये |

सनत्कुमारजी कहते हैं – मुनिवर ! देवेश्वर शंकर के यों कहनेपर सूर्य के सदृश कान्तिमान शुक्र ने पुन: शिवजी को प्रणाम किया और वे हाथ जोडकर स्तुति करने लगे |

शुक्रने कहा – भगवन ! आपके पैर, सिर, नेत्र, हाथ और भुजाएँ अनंत हैं | आपकी मूर्तियों की भी गणना नहीं हो सकती | ऐसी दशा में मैं आज स्तुत्य की सिर झुकाकर किस प्रकार स्तुति करूँ | आपकी आठ मूर्तियाँ बतायी जाती है और आप अनंतमूर्ति भी है | आप सम्पूर्ण सुरों और असुरों की कामना पूर्ण करनेवाले हैं तथा अनिष्ट-दृष्टी से देखनेपर आप संहार भी कर डालते हैं | ऐसे स्तवन के योग्य आपकी मैं किसप्रकार स्तुति करूँ |

सनत्कुमारजी कहते हैं – मुने ! इस प्रकार शुक्रने शिवजी की स्तुति करके उन्हें नमस्कार किया और उनकी आज्ञा से वे पुन: दानवों की सेना में प्रविष्ट हुए, ठीक उसी तरह जैसे चन्द्रमा मेघों की घटा में प्रवेश करते हैं | व्यासजी ! इसप्रकार रणभूमि में शंकर ने जिस तरह शुक्रको निगल लिया था, वह वृतांत तो तुम्हे सुना दिया |

क्रमशः

शिवपुराण – १७०

shivpuran9215
श्रीपुराणपुरुषोत्तमाय नम :
ॐ श्री गणेशाय नम:
भवाब्धिमग्नं दिनं मां समुन्भ्दर भवार्णवात | कर्मग्राहगृहीतांग दासोऽहं तव् शंकर ||

श्री शिवपुराण – माहात्म्य

रूद्रसंहिता, पंचम ( युद्ध ) खंड

अध्याय – १७० 

उमाद्वारा शम्भू के नेत्र मूँद लिये जानेपर अन्धकार में शम्भु के पसीनेसे अंधकासुर की उत्पत्ति, हिरण्याक्ष की पुत्रार्थ तपस्या और शिवका उसे पुत्ररूप में अंधक को देना, वराहरूपधारी विष्णुद्वारा उसका वध

सनत्कुमारजी कहते हैं – व्यासजी ! अब जिस प्रकार अंधकासुर ने परमात्मा शम्भु के गणाध्यक्ष-पदको प्राप्त किया था, महेश्वर के उस मंगलमय चरित को श्रवण करो | मुनीश्वर ! अंधकासुर ने पहले शिवजी के साथ बड़ा घोर संग्राम किया था, परन्तु पीछे बारंबार सात्त्विक भाव के उद्रेक से उसने शम्भु को प्रसन्न कर लिया; क्योंकि नाना प्रकार की लीलाएँ करनेवाले शम्भु शरणागतरक्षक तथा परम भक्तवत्सल हैं | उनका माहात्म्य परम अद्भुत ही |

व्यासजी ने पूछा – ऐश्वर्यशाली मुनिवर ! वह अंधक कौन था और भूतलपर किस वीर्यवान के कुल में उत्पन्न हुआ था ? दैत्यों में प्रधान तथा महामनस्वी उस बलवान अंधक का स्वरूप कैसा था और वह किसका पुत्र था ? उसने परम तेजस्वी शम्भुकी गणाध्यक्षता को कैसे प्राप्त किया ? यदि अंधक गणेश्वर हो गया तब तो वह परम धन्यवादका पात्र है |

सनत्कुमारजी ने कहा – मुने ! पूर्वकाल की बात है, एक समय भक्तोंपर कृपा करनेवाले तथा देवताओं के चक्रवर्ती सम्राट भगवान शंकर को विहार करने की इच्छा हुई | तब वे पार्वती और गणों को साथ ले अपने निवासभूत कैलास पर्वत से चलकर काशीपुरी में आये | वहाँ उन्होंने उस पुरीको अपनी राजधानी बनाया और भैरव नामक वीर को उसका रक्षक नियुक्त किया | फिर पार्वतीजी के साथ रहते हुए ये भक्तजनों को सुख देनेवाली अनेक प्रकार की लीलाएँ करने लगे | एक समय वे उसके वरदान के प्रभाववश अनेकों विराग्रगण्य गणेश्वरों और शिवाके साथ मन्दराचलपर गये और वहाँ भी तरह-तरहकी क्रीड़ाएँ करने लगे | एक दिन जब प्रचंड पराक्रमी कपर्दी शिव मन्दराचलकी पूर्व दिशामें बैठे थे, उसी समय गिरिजाने नर्मक्रीडावश उनके नेत्र बंद कर दिये | इस प्रकार जब पार्वती ने मूँगे, सुरवरं और कमल की प्रभावाले अपने करकमलों से हरके नेत्र बंद कर दिये, तब उनके नेत्रों के मूँद जाने के कारण वहाँ क्षणभर में ही घोर अन्धकार फैला गया | पार्वती के हाथों का महेश्वर के शरीर से स्पर्श होने के कारण शम्भु के ललाट में स्थित अग्निसे संतप्त होकर मद-जल प्रकट हो गया और जल की बहुत-सी बूँदे टपक पड़ी | तदनन्तर उन बूबूँदों ने एक गर्भ का रूप धारण कर लिया | उससे एक ऐसा जीव प्रकट हुआ, जिसका मुख विकराल था | वह अत्यंत भयंकर, क्रोधी, कृतघ्न, अँधा, कुरूप, जटाधारी, काले रंग का, मनुष्य से भिन्न, बेडौल और सुंदर बालोंवाला था | उसके कंठ से घोर घर-घर शब्द निकल रहा था | वह कभी गाता, कभी हँसता और कभी रोने लगता था तथा जबड़ों को चाटते हुए नाच रहा था | उस अद्भुत दृश्यवाले जीव के प्रकट होनेपर शिवजी मुसकराकर पार्वतीजी से बोले |

श्रीमहेश्वरने कहा – ‘प्रिये ! मेरे नेत्रों को मूँदकर तुमने ही तो यह कर्म किया है, फिर तुम उससे भय क्यों कर रही हो ?’ शंकरजी के उस वचन को सुनकर गौरी हँस पड़ी और उनके नेत्रोपर से उन्होंने अपने हाथ हटा लिये | फिर तो वहाँ प्रकाश छा गया, परन्तु उस प्राणिका रूप भयंकर ही बना रहा और अन्धकार से उत्पन्न होने के कारण उसके नेत्र भी अंधे थे | तब वैसे प्राणी को प्रकट हुआ देखकर गौरी ने महेश्वर से पूछा |

गौरी ने कहा – भगवन ! मुझे सच-सच बताइये कि हमलोगों के सामने प्रकट हुआ यह बेडौल प्राणी कौन है | यह तो अत्यंत भयंकर है | किस निमित्तको लेकर किसने इसकी दृष्टि की है और यह किसका पुत्र है ?

सनत्कुमारजी कहते हैं – महर्षे ! जब लीला रचनेवाली तथा तीनों लोकों की जननी गौरी ने सृष्टिकर्ताकी उस अंधीसृष्टि के विषय में यों प्रश्न किया, तब लीला-विहारी भगवान शंकर अपनी प्रिया के उस वचन को सुनकर कुछ मुसकराये और इसप्रकार बोले |

महेश्वर ने कहाअद्भुत चरित्र रचनेवाली अम्बिके ! सुनो ! जब तुमने मेर नेत्र मूँद लिये थे, उसी समय यह अद्भुत एवं प्रचंड पराक्रमी प्राणी मेरे पसीनेसे प्रकट हुआ | इसका नाम अंधक है | तुम्हीं इसको उत्पन्न करनेवाली हो, अत: सखियोंसहित तुम्हे करुणापूर्वक इसकी गणों से यथायोग्य रक्षा करते रहना चाहिये | आयें इस प्रकार बुद्धिवर्धक विचार करके ही तुम्हे सब कार्यं करना चाहिये |

सनत्कुमारजी कहते हैं – मुने ! अपने स्वामी के ऐसे वचन सुनकर गौरीका ह्रदय करुणार्द्र हो गया | वे अपनी सखियोंसहित अंधक की अपने पुत्र की भान्ति नाना प्रकार के उपायोंद्वारा रक्षा करने लगी | तदनन्तर शिशिर-ऋतू आनेपर दैत्य हिरण्याक्ष पुत्र की कामना से उसी वन में आया; क्योंकि उसकी पत्नी ने उसके ज्येष्ठ बंधू की सन्तान-परम्परा को देखकर उसे संतानार्थ तपश्चर्या के लिये प्रेरित किया था | वहाँ व कश्यपनन्दन हिरण्याक्ष बनकर आश्रय ले पुत्र-प्राप्ति के लिये घोर तप करने लगा | उसके मन में महेश्वर के दर्शन की इच्छा थी, अत: वह क्रोध आदि दोषों को अपने काबू में करके ठैठ की भान्ति निश्चल होकर समाधिस्थ हो गया | द्विजेन्द्र ! तब जिसकी ध्वजा में वृष का चिन्ह वर्तमान हैं तथा जो पिनाक धारण करनेवाले है, वे महेश उसकी तपस्या से पूर्णतया प्रसन्न होकर उसे वर प्रदान करने के लिये चले और उस स्थानपर पहुँचकर दैत्यप्रवर हिरण्याक्ष से बोले |

महेश ने कहा – दैत्यनाथ ! अब तू अपनी इन्द्रियों का विनाश मत कर | किसलिये तूने इस व्रत का आश्रय लिया है ? तू अपना मनोरथ तो प्रकट कर | मैं वरदाता शंकर हूँ, अत: तेरी जो अभिलाषा होगी, वह सब मैं तुझे प्रदान करूँगा |

सनत्कुमारजी कहते हैं – महर्षे ! महेश्वर के उस सरस वचन को सुनकर दैत्यराज हिरण्याक्ष परम प्रसन्न हुआ | उसने गिरीश के चरणों में नमस्कार करके अनेक प्रकार से उनकी स्तुति की; फिर वह अंजलि बाँधे सिर झुकाकर कहने लगा |

हिरण्याक्षने कहा – चन्द्रभाल ! मेरे उत्तम पराक्रमसम्पन्न तथा दैत्यकुल के अनुरूप कोई पुत्र नहीं है, इसीलिये मैंने इस व्रतका अनुष्ठान किया है | देवेश ! मुझे परम बलशाली पुत्र दीजिये |

सनत्कुमारजी कहते हैं – मुने ! दैत्यराज के उस वचन को सुनकर कृपालु शंकर प्रसन्न हो गये और उससे बोले – ‘दैत्याधिप ! तेरे भाग्य में तेरे वीर्यसे उत्पन्न होनेवाला पुत्र तो नहीं लिखा है, किन्तु मैं तझे एक पुत्र देता हूँ | मेरा एक पुत्र है, जिसका नाम अंधक है | वह तेरे ही समान पराक्रमी और अजेय है | तू सम्पूर्ण दु:खोंको त्यागकर उसी को पुत्ररूप से वरण कर ले और इस प्रकार पुत्र प्राप्त कर ले |’

सनत्कुमारजी कहते हैं – महर्षे ! उससे यों कहकर गौरी के साथ विराजमान उन महात्मा भूतनाथ त्रिपुरारि शंकरने प्रसन्न होकर हिरण्याक्ष को वह पुत्र दे दिया | इस प्रकार शिवजी से पुत्र प्राप्त करके वह महामनस्वी दैत्य परम प्रसन्न हुआ | उसने अनेकों स्तोत्रोंद्वारा रूद्र की पूजा करके प्रदक्षिणा की और फिर वह अपने राज्य को चला गया | गिरीश से पुत्र प्राप्त कर लेने के बाद वह प्रचंड पराक्रमी दैत्य सम्पूर्ण देवताओं को जीतकर इस पृथ्वी को अपने देश रसातल में उठा ले गया | तब देवताओं, मुनियों और सिद्धों ने अनंत पराक्रमी विष्णु की आराधना की | फिर तो भगवान विष्णु सर्वात्मक यज्ञमय विकराल वाराह शरीर धारणकर थूथुन के अनेकों प्रहारों से पृथ्वी को विदीर्ण करके पाताल-लोक में जा घुसे | वहाँ उन्होंने कभी न टूटनेवाले अपनी अगली दाढ़ों से तथा थूथुन से सैकड़ों दैत्यों का कचूमर निकालकर अपने वज्र सदृश कठोर पाद-प्रहारों से निशाचरों की सेना को मथ डाला | तत्पश्चात अद्भुत एवं प्रचंड तेजस्वी विष्णु ने करोड़ों सूर्यों के समान प्रकाशमान सुदर्शन-चक्र से हिरण्याक्ष के प्रज्वलित सिर को काट लिया और दुष्ट दैत्यों को जलाकर भस्म कर दिया | यह देखकर देवराज इंद्र को बड़ी प्रसन्नता हुई | उन्होंने उस असुर – राज्यपर अंधक को अभिषिक्त कर दिया | फिर माहात्मा इंद्र विष्णु को अपनी दाढोद्वारा पाताललोक से पृथ्वीको लाते हुए देखकर परम प्रसन्न हुए और अपने स्थानपर आकर पूर्ववत स्वर्ग और भूतल की रक्षा करने लगे | इधर वाराहरूप धारण करके उत्तम कार्य करनेवाले उग्ररूपधारी श्रीहरि प्रसन्नचित्त हुए समस्त देवों, मुनियों और पद्मयोनि ब्र्ह्माद्वारा प्रशंसित होकर अपने लोक को चले गये | इसप्रकार वाराहरूपधारी विष्णुद्वारा असुरराज हिरण्याक्ष के मारे जानेपर समस्त देव, मुनि तथा अन्यान्य सभी जीव सुखी हो गये |

– ॐ नम: शिवाय –

शिवपुराण – १६९

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श्रीपुराणपुरुषोत्तमाय नम :
ॐ श्री गणेशाय नम:
भवाब्धिमग्नं दिनं मां समुन्भ्दर भवार्णवात | कर्मग्राहगृहीतांग दासोऽहं तव् शंकर ||

श्री शिवपुराण – माहात्म्य

रूद्रसंहिता, पंचम ( युद्ध ) खंड

अध्याय – १६९

विष्णुद्वारा तुलसी के शील-हरणका वर्णन, कुपित हुई तुलसीद्वारा विष्णु को शाप, शम्भुद्वारा तुलसी और शालग्राम – शिला के माहात्म्य का वर्णन

व्यासजी के पूछ्नेपर सनत्कुमारजी ने कहा – महर्षे ! रणभूमिमें आकाशवाणी को सुनकर जब देवेश्वर शम्भु ने श्रीहरि को प्रेरित किया, तब वे तुरंत ही अपनी माया से ब्राह्मण का वेष धारण करके शंखचूड के पास जा पहुँचे और उन्होंने उससे परमोत्कृष्ट कवच माँग लिया | फिर शंखचूड का रूप बनाकर वे तुलसी के घर की ओर चले | वहाँ पहुँचकर उन्होंने तुलसी के महल के द्वार के निकट नगारा बजाया और जय – जयकार से सुन्दरी तुलसी को अपने आगमन की सूचना दी | उसे सुनकर सती-साध्वी तुलसी ने बड़े आदर के साथ झरोखे के रास्ते राजमार्ग की ओर झाँका और अपने पति को आया हुआ जानकर वह परमानंद में निमग्न हो गयी | उसने तत्काल ही ब्राह्मणों को धन-दान करके उनसे मंगलाचार कराया और फिर अपना श्रुंगार किया | इधर देवताओं का कार्य सिद्ध करने के लिये माया से शंखचूड का स्वरूप धारण करनेवाले भगवान विष्णु रथ से उतरकर देवी तुलसी के भवन में गये | तुलसी ने पतिरूप में आये हुए भगवान का पूजन किया, बहुत-सी बातें की, तदनन्तर उनके साथ रमण किया | तब उस साध्वी ने सुख, सामर्थ्य और आकर्षण में व्यतिरूप देखकर सबपर विचार किया और वह ‘तू कौन है ?’ यों डाँटती हुई बोली |

तुलसी ने कहा – दुष्ट ! मुझे शीघ्र बतला कि मायाद्वारा मेरा उपभोग करनेवाला तू कौन हैं ? तूने मेरा सतीत्व नष्ट कर दिया है, अत: मैं अभी तुझे शाप देती हूँ |

सनत्कुमारजी कहते हैं – ब्रह्मन ! तुलसी का वचन सुनकर श्रीहरि ने लीलापूर्वक अपनी परम मनोहर मूर्ति धारण कर ली | तब उस रूप को देखकर तुलसी ने लक्षणों से पहचान लिया कि ये साक्षात विष्णु हैं | परन्तु उसका पातिव्रत्य नष्ट हो चूका था, इसलिये वह कुपित होकर विष्णु से कहने लगी |

तुलसी ने कहा – हे विष्णो ! तुम्हारा मन पत्थर के सदृश कठोर है | तुम में दया का लेशमात्र भी नहीं है | मेरे पतिधर्म के भंग हो जाने से निश्चय ही मेरे स्वामी मारे गये | चूँकि तुम पाषाण – सदृश कठोर, दयारहित और दुष्ट हो, इसलिये अब तुम मेरे शाप से पाषाण-स्वरूप ही हो जाओ |

सनत्कुमारजी कहते है – मुने ! यों कहकर शंखचूड की वह सती-साध्वी पत्नी तुलसी फूट-फूटकर रोने लगी और शोकार्त होकर बहुत तरह से विलाप करने लगी | इतने में वहाँ भक्तवत्सल भगवान शंकर प्रकट हो गये और उन्होंने समझाकर कहा – ‘देवि ! अब तुम दुःख को दूर करनेवाली मेरी बात सुनो और श्रीहरि भी स्वस्थ मनसे उसे श्रवण करें; क्योंकि तुम दोनों के लिये जो सुखकारक होगा, वही मैं कहूँगा | भद्रे ! तुमने (जिस मनोरथ को लेकर ) तप किया था, यह उसी तपस्या का फल है | भला, वह अन्यथा कैसे हो सकता है ? इसीलिये तुम्हे उसके अनुरूप ही फल हुआ है | अब तुम इस शरिरको त्यागकर दिव्य देह धारण कर लो और लक्ष्मी के समान होकर नित्य श्रीहरि के साथ ( वैकुण्ठ में ) विहार करती रहो | तुम्हारा यह शरीर, जिसे तुम छोड़ दोगी, नदी के रूप में परिवर्तित हो जायगा | वह नदी भारतवर्ष में पुण्यरूपा गण्डकी के नामसे प्रसिद्ध होगी |

महादेवि ! कुछ काल के पश्चात मेरे वर के प्रभाव से देवपूजन – सामग्री में तुलसी का प्रधान स्थान हो जायगा | सुन्दरी ! तुम स्वर्गलोक में, मृत्युलोक में तथा पाताल में सदा श्रीहरि के निकट ही निवास करोगी और पुष्पों में श्रेष्ठ तुलसी का वृक्ष हो जाओगी |

तुम वैकुण्ठ में दिव्यरूपधारिणी वृक्षाधिष्ठात्री देवी बनकर सदा एकांत में श्रीहरि के साथ क्रीडा करोगी | उधर भारतवर्ष में जो नदियों की अधिष्ठात्री देवी होगी, वह परम पुण्य प्रदान करनेवाली होगी और श्रीहरि के अंशभूत लवणसागर की पत्नी बनेगी | तथा श्रीहरि भी तुम्हारे शापवश पत्थर का रूप धारण करके भारत में गण्डकी नदी के जल के निकट निवास करेंगे | वहाँ तीखी दाढ़ोंवाले करोड़ों भयंकर कीड़े उस पत्थर को काटकर उसके मध्य में चक्र का आकर बनायेंगे | उसके भेद से वह अत्यंत पुण्य प्रदान करनेवाली शालग्रामशिला कहलायेगी और चक्र के भेद से उसका लक्ष्मीनारायण आदि भी नाम होगा |

विष्णु की शालग्रामशिला और वृक्षस्वरूपिणी तुलसी का समागम सदा अनुकूल तथा बहुत प्रकार के पुण्यों की वृद्धि करनेवाला होगा | भद्रे ! जो शालग्रामशिला के ऊपरसे तुलसीपत्र को दूर करेगा, उसे जन्मान्तर में स्त्रीवियोग की प्राप्ति होगी तथा जो शंख को दूर करके तुलसीपत्र को हटायेगा, यह भी भार्याहीन होगा और  सात जन्मोंतक रोगी बना रहेगा | जो महाज्ञानी पुरुष शालग्रामशिला, तुलसी और शंख को एकत्र रखकर उनकी रक्षा करता है, वह श्रीहरि का प्यारा होता है |

सनत्कुमारजी कहते है – व्यासजी ! इस प्रकार कहकर शंकरजी ने उस समय शालग्रामशिला और तुलसी के परम पुण्यदायक माहात्म्यका वर्णन किया | तत्पश्चात वे श्रीहरि को तथा तुलसी को आनंदित करके अन्तर्धान हो गये | इस प्रकार सदा सत्पुरुषों का कल्याण करनेवाले शम्भु अपने स्थान को चले गये | इधर शम्भुका कथन सुनकर तुलसी को बड़ी प्रसन्नता हुई | उसने अपने उस शरीरका परित्याग करके दिव्य रूप धारण कर लिया | तब कमलापति विष्णु उसे साथ लेकर वैकुण्ठ को चले गये | उसके छोड़े हुए शरीर से गण्डकी नदी प्रकट हो गयी और भगवान अच्युत भी उसके तटपर मनुष्यों को पुण्यप्रदान करनेवाली शिला के रूप में परिणत हो गये | मुने ! उसमें कीड़े अनेक प्रकार के छिद्र बनाते रहते हैं | उनमें जो शिलाएँ गण्डकी के जल में गिरती है, वे परम पुण्यप्रद होती हैं और जो स्थलपर ही रह जाती है, उन्हें पिंगला कहा जाता है और वे प्राणियों के लिये संतापकारक होती है | व्यासजी ! इस प्रकार तुम्हारे प्रश्न के अनुसार मैंने शम्भु का सारा चरित, जो पुण्यप्रदान तथा मनुष्यों की सारी कामनाओं को पूर्ण करनेवाला है, तुम्हे सुना दिया | यह पुण्य आख्यान, जो विष्णु के माहात्म्य से संयुक्त तथा भोग और मोक्ष का प्रदाता है |

– ॐ नम: शिवाय –

शिवपुराण – १६७ से १६८

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श्रीपुराणपुरुषोत्तमाय नम :
ॐ श्री गणेशाय नम:
भवाब्धिमग्नं दिनं मां समुन्भ्दर भवार्णवात | कर्मग्राहगृहीतांग दासोऽहं तव् शंकर ||

श्री शिवपुराण – माहात्म्य

रूद्रसंहिता, पंचम ( युद्ध ) खंड

अध्याय – १६७ से १६८

शंखचूड का असुरराज्यपर अभिषेक और उसके द्वारा देवों का अधिकार छीना जाना, देवोंका ब्रह्मा की शरण में जाना

सनत्कुमारजी कहते हैं – महर्षे ! जब शंखचूड ने तप करके वर प्राप्त कर लिया और वह विवाहित होकर अपने घर लौट आया, तब दानवों और दैत्यों को बड़ी प्रसन्नता हुई | वे सभी असुर तुरंत ही अपने लोकसे निकलकर अपने गुरु शुक्राचार्य को साथ ले दल बनाकर उसके निकट आये और विनयपूर्वक उसे प्रणाम करके अनेकों प्रकार से आदर प्रदर्शित करते हुए उसका स्तवन करने लगे | फिर उसे अपना तेजस्वी स्वामी मानकर अत्यंत प्रेमभाव से उसके पास ही खड़े हो गये | उधर दम्भकुमार शंखचूड ने भी अपने कुलगुरु शुक्राचार्य को आया हुआ देखकर बड़े आदर और भक्ति के साथ उन्हें साष्टांग प्रणाम किया | तदनन्तर गुरु शुक्राचार्य ने समस्त असुरों के साथ सलाह करके उनकी सम्मतिसे शंखचूड को दानवों तथा असुरों का अधिपति बना दिया | दम्भपुत्र शंखचूड प्रतापी एवं वीर तो था ही, उस समय असुर-राज्यपर अभिषिक्त होने के कारण वह असुरराज विशेषरुपसे शोभा पाने लगा | तब उसने सहसा देवताओंपर आक्रमण करके वेगपूर्वक उनका संहार करना आरम्भ किया | सम्पूर्ण देवता मिलकर भी उसके उत्कृष्ट तेजको सहन न कर सके, अत: वे समरभूमि से भाग चले और दीन होकर यत्र-तत्र पर्वतों की खोहो में जा छिपे | उनकी स्वतंत्रता जाती रही | वे शंखचूड के यशवर्ती होने के कारण प्रभाहीन हो गये | इधर शूरवीर प्रतापी दम्भकुमार दानवराज शंखचूड ने भी सम्पूर्ण लोकों को जीतकर देवताओं का सारा अधिकार छीन लिया | वह त्रिलोकी को अपने अधीन करके सम्पूर्ण लोकोंपर शासन करने लगा और स्वयं इंद्र बनकर सारे यज्ञभागों को भी हडपने लगा तथा अपनी शक्ति से कुबेर, सोम, सूर्य, अग्नि, यम और वायु आदि के अधिकारों का भी पालन कराने लगा | उस समय महान बल-पराक्रम से सम्पन्न महावीर शंखचूड़ समस्त देवताओं, असुरों, दानवों, राक्षसों, गन्धर्वो, नागों, किन्नरों, मनुष्यों तथा त्रिलोकी के अन्यान्य प्राणियों का एकछत्र सम्राट था | इस प्रकार महान राजराजेश्वर शंखचूड़ बहुत वर्षोतक सम्पूर्ण भुवनों के राज्य का उपभोग करता रहा | उसके राज्य में न अकाल पड़ता था, न महामारी और न अशुभ ग्रहों का ही प्रकोप होता था; आभि-व्याधियाँ भी अपना प्रभाव नहीं डाल पाती थीं | पृथ्वी बिना जोते ही अनेक प्रकार के धान्य उत्पन्न करती थी | नाना प्रकार की ओषधियाँ उत्तम-उत्तम फलों और रसों से युक्त थी | उत्तम-उत्तम मणियों की खदाने थी | समुद्र अपने तटोंपर निरंतर ढेर-के ढेर रत्न विखेरते रहते थे | वृक्षों में सदा पुष्प-फल लगे रहते थे | सरिताओं में सुस्वादु नीर बहता रहता था | देवताओं के अतिरिक्त सभी जीव सुखी थे | उनमें किसी प्रकार का विकार नही उत्पन्न होता था | चारों वर्णों और आश्रमों के सभी लोग अपने-अपने धर्म में स्थित रहते थे | इस प्रकार जब वह त्रिलोकी का शासन कर रहा था, उस समय कोई भी दु:खी नहीं था; केवल देवता भ्रातृ-द्रोहवश दुःख उठा रहे थे | मुने ! महाबली शंखचूड़ गोलोकनिवासी श्रीकृष्ण का परम मित्र था | साधुस्वभाववाला वह सदा श्रीकृष्णकी भक्ति में निरत रहता था | पूर्वशापवश उसे दानव की योनिमें जन्म लेना पड़ा था, परन्तु दानव होनेपर भी उसकी बुद्धि दानव की सी नही थी |

प्रिय व्यासजी ! तदनन्तर जो पराजित होकर राज्यसे हाथ धो बैठे थे, वे सभी सुरगण तथा ऋषि परस्पर मंत्रणा करके ब्रह्माजी की सभा को चले | वहाँ पहुँचकर उन्होंने ब्रह्माजीका दर्शन किया और उनके चरणों में अभिवादन करके विशेषरूप से उनकी स्तुति की | फिर आकुलतापूर्वक अपना सारा वृतांत उन्हें कह सुनाया | तब ब्रह्मा इन सभी देवताओं तथा मुनियों को ढाढस बंधाकर उन्हें साथ ले सत्पुरुषों को सुख प्रदान करनेवाले वैकुण्ठ-लोक को चल पड़े | वहाँ पहुँचकर देवगणोंसहित ब्रह्माने रमापति का दर्शन किया |

देवता बोले – सामर्थ्यशाली वैकुंठाधिपते ! आप देवों के भी देव और लोकों के स्वामी है | आप त्रिलोकी के गुरु हैं | श्रीहरे ! हम सब आपके शरणापन्न हुए हैं, आप हमारी रक्षा कीजिये | अपनी महिमासे कभी च्युत न होनेवाले ऐश्वर्यशाली त्रिलोकेश ! आप ही लोकों के पालक हैं | गोविन्द ! लक्ष्मी आप में ही निवास करती है और आप अपने भक्तों के प्राणस्वरूप है, आपको हमारा नमस्कार है | इस प्रकार स्तुति करके सभी देवता श्रीहरि के आगे रो पड़े | उनकी बात सुनकर भगवान विष्णु ने ब्रह्मा से कहा |

विष्णु बोले – ब्रह्मन ! यह वैकुण्ठ योगियों के लिये भी दुर्लभ है | तुम यहाँ किस लिये आये हो ? तुमपर कौन सा कष्ट आ पड़ा है ? वह यथार्थरूप से मेरे सामने वर्णन करो |

सनत्कुमारजी कहते हैं – मुने ! श्रीहरि का वचन सुनकर ब्रह्माजी ने विनम्रभाव से सिर झुकाकर उन्हें बारंबार प्रणाम किया और अंजलि बाँधकर परमात्मा विष्णु के समक्ष स्थित हो देवताओं के कष्ट से भरी हुई शंखचूड़ की सारी करतूत कह सुनायी | तब समस्त प्राणियों के भावों के ज्ञाता भगवान श्रीहरि उस बात को सुनकर हँस पड़े और ब्रह्मा से उस रहस्यका उद्घाटन करते हुए बोले |

श्रीभगवानने कहा – कमलयोनि ! मैं शंखचूड़ का सारा वृतांत जानता हूँ | पूर्वजन्म को वह महातेजस्वी गोप था, जो मेरा भक्त था | मैं उसके वृतांत से सम्बन्ध रखनेवाले इस पुरातन इतिहास का वर्णन करता हूँ, सुनो | इसमें किसी प्रकार का संदेह नहीं करना चाहिये |

भगवान् शंकर सब कल्याण करेंगे | गोलोक में मेरे ही रूप श्रीकृष्ण रहते हैं | उनकी स्त्री श्रीराधा नामसे विख्यात है | वह जगज्जननी तथा प्रकृति की परमोत्कृष्ट पाँचवी मूर्ति है | वही वहाँ सुंदररूप से विहार करनेवाली है | उनके अंगसे उद्भूत बहुत-से गोप और गोपियाँ भी वहाँ निवास करती है | वे नित्य राधा-कृष्ण का अनुवर्तन करते हुए उत्तम-उत्तम क्रीडाओं में तत्पर रहते है | वही गोप इस समय शम्भु की इस लीला से मोहित होकर शापवश अपने को दुःख देनेवाली दानवी योनि को प्राप्त हो गया है | श्रीकृष्णने पहले से ही रूद्र के त्रिशूल से उसकी मृत्यु निर्धारित कर दी है | इस प्रकार वह दानव – देह का परित्याग करके पुन: कृष्ण-पार्षद हो जायगा | देवेश ! ऐसा जानकर तुम्हे भय नहीं करना चाहिये | चलो, हम दोनों शंकर की शरण में चले; ये शीघ्र ही कल्याण का विधान करेंगे | अब हमें, तुम्हें तथा समस्त देवों को निर्भय हो जाना चाहिये |

सनत्कुमारजी कहते है – मुने ! यों कहकर ब्रह्मासहित विष्णु शिवलोक को चले | मार्ग में वे मन-ही-मन भक्तवत्सल सर्वेश्वर शम्भु का स्मरण करते जा रहे थे | व्यासजी ! इस प्रकार वे रमापति विष्णु ब्रह्मा के साथ उसी समय उस शिवलोक में जा पहुँचे, जो महान दिव्य, निराधार तथा भौतिकता से रहित है | वहाँ पहुँचकर उन्होंने शिवजीकी सभा का दर्शन किया | वह ऊँची एवं उत्कृष्ट प्रभावशाली सभा प्रकाशयुक्त शरीरोंवाले शिव-पार्षदों से घिरी होनेके कारण विशेषरूप से शोभित हो रही थी |

‘भगवन ! आप दीनों और अनाथों के सहायक, दीनों के प्रतिपालक, दीनबन्धु, त्रिलोकी के अधीश्वर और शरणागतवत्सल हैं | गौरीश ! हमारा उद्धार कीजिये | परमेश्वर ! हमपर कृपा कीजिये | नाथ ! आप आपके ही अधीन है; अब आपकी जैसी इच्छा हो, वैसा करें |’

– ॐ नम: शिवाय –