Category Archives: Vishnu Puran

विष्णुपुराण- पंचम अंश – ५

Beautiful golden sunrise
ॐ श्री मन्नारायणाय नम:
नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम | देवी सरस्वती व्याप्तं ततो जयमुदिरयेत ||

श्रीविष्णुपुराण

पंचम अंश

अध्याय – ५

पूतना – वध

श्रीपराशरजी बोले – बंदीगृह से छूटते ही वसुदेवजी नन्दजी के छकड़े के पास गये तो उन्हें इस समाचार से अत्यंत प्रसन्न देखा कि ‘मेरे पुत्रका जन्म हुआ है’ || १ || तब वसुदेवजी ने भी उनसे आदरपूर्वक कहा – अब वृद्धावस्था में भी आपने पुत्र का मुख देख लिया यह बड़े ही सौभाग्य की बात है || २ || आपलोग जिसलिये यहाँ आगे थे वह राजा का सारा वार्षिक कर दे ही चुके है | यहाँ धनवान पुरुषों को और अधिक न ठहरना चाहिये || ३ || आपलोग जिसलिये यहाँ आये थे वह कार्य पूरा हो चूका, अब और अधिक किसलिये ठहरे हुए हैं ? अत: हे नंदजी ! आपलोग शीघ्र ही अपने गोकुल को जाइये || ४ || वहाँपर रोहिणी से उत्पन्न हुआ जो मेरा पुत्र हैं उसकी भी आप उसी तरह रक्षा कीजियेगा जैसे अपने इस बालक की || ५ ||

वसुदेवजी के ऐसा कहनेपर नन्द आदि महाबलवान गोपगण छकड़ों में रखकर लाये हुए भाण्डोंसे कर चुकाकर पूतना ने रात्रि के समय सोये हुए कृष्ण को गोद में लेकर उसके मुख में अपना स्तन दे दिया || ७ || रात्रि के समय पूतना जिस-जिस बालक के मुख में अपना स्तन दे देती थी उसीका शरीर तत्काल नष्ट हो जाता था || ८ || कृष्णचन्द्र ने क्रोधपूर्वक उसके स्तन को अपने हाथों से खून दबाकर पकड़ लिया और उसे उसके प्राणों के सहित पीने लगे || ९ || तब स्नायु-बन्धनों के शिथिल हो जाने से पूतना घोर शब्द करती हुई मरते समय महाभयंकर रूप धारणकर पृथ्वीपर गिर पड़ी || १० || उसके घोर नाद को सुनकर भयभीत हुए व्रजवासीगण जाग उठे और देखा कि कृष्ण पूतनाकी गोद में हैं और वह मारी गयी हैं || ११ ||

हे द्विजोत्तम ! तब भयभीता यशोदाने कृष्ण को गोद में लेकर उन्हें गौकी पूँछ से झाडकर बालक का ग्रह-दोष निवारण किया || १२ || नन्दगोप ने भी आगे के वाक्य कहकर विधिपूर्वक रक्षा करते हुए कृष्ण के मस्तकपर गोबरका चूर्ण लगाया || १३ ||

नन्दगोप बोले – जिनकी नाभि से प्रकट हुए कमल से सम्पूर्ण जगत उत्पन्न हुआ है वे सम्पूर्ण भूतों के आदिस्थान श्रीहरि तेरी रक्षा करे || १४ || जिनकी दाढ़ों के अग्रभागपर स्थापित होकर भूमि सम्पूर्ण जगत को धारण करती है वे वराह-रूप-धारी श्रीकेशव तेरी रक्षा करें || १५ || जिन विभुने अपने नखाग्रों से शत्रु के वक्ष:स्थल को विदीर्ण कर दिया था वे नृसिंहरूपी जनार्दन तेरी सर्वत्र रक्षा करें || १६ || जिन्होंने क्षणमात्र से सशस्त्र त्रिविक्रमरूप धारण करके अपने तीन पगों से त्रिलोकी को नाप लिया था वे वामनभगवान तेरी सर्वदा रक्षा करें || १७ || गोविन्द तेरे सिरकी, केशव कण्ठ की, विष्णु गुह्यस्थान और जठर की तथा जनार्दन जंघा और चरणों की रक्षा करें || १८ || तेरे मुख, बाहू, प्रबाहू, मन और सम्पूर्ण इन्दिर्यों की अखंड-ऐश्वर्य से सम्पन्न अविनाशी श्रीनारायण रक्षा करें || १९ || तेरे अनिष्ट करनेवाले जो प्रेत, कुष्मांड और राक्षस हो वे शांगधनुष, चक्र और गदा धारण करनेवाले विष्णुभगवान की शंख-ध्वनि से नष्ट हो जायें || २० || भगवान वैकुण्ठ दिशाओं में, मधुसुदन विदिशाओ (कोणों) में, हृषिकेश आकाश में तथा पृथ्वी को धारण करनेवाले श्रीशेषजी पृथ्वीपर तेरी रक्षा करें || २१ ||

श्रीपराशरजी बोले – इसप्रकार स्वस्तिवाचन कर नन्दगोप ने बालक कृष्ण को छकड़े के नीचे एक खटोलेपर सुला दिया || २२ || मरी हुई पूतना के महान कलेवर को देखकर उन सभी गोपों को अत्यंत भय और विस्मय हुआ || २३ ||

इति श्रीविष्णुपुराणे पंचमेंऽशे पंचमोऽध्यायः

विष्णुपुराण – पंचम अंश – ४

Beautiful golden sunrise
ॐ श्री मन्नारायणाय नम:
नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम | देवी सरस्वती व्याप्तं ततो जयमुदिरयेत ||

श्रीविष्णुपुराण

पंचम अंश

अध्याय – ४

वसुदेव – देवकी का कारागार से मोक्ष

श्रीपराशरजी बोले – तब कंस ने खिन्न-चित्तसे प्रलम्ब और केशी आदि समस्त मुख्य-मुख्य असुरों को बुलाकर कहा || १ ||

कंस बोला – हे प्रलम्ब ! हे महाबाहो केशिन ! हे धेनुक ! हे पूतने ! तथा हे अरिष्ट आदि अन्य असुरगन ! मेरा वचन सुनो || २ || यह बात प्रसिद्ध हो रही है कि दुरात्मा देवताओं ने मेरे मारने के लिये कोई यत्न किया है; किन्तु मैं वीर पुरुष अपने वीर्य से सतावे हुए इन लोगों को कुछ भी नहीं गिनता हूँ || ३ || अल्पवीर्य इंद्र, अकेले घूमनेवाले महादेव अथवा छिन्द्र (असावधानी का समय) ढूंढ़कर दैत्यों का वध करनेवाले विष्णु से उनका क्या कार्य सिद्ध हो सकता हैं ? || ४ || मेरे बाहुबल से दलित आदित्यों, अल्पवीर्य वसुगणों, अग्नियों अथवा अन्य समस्त देवताओं से भी मेरा क्या अनिष्ट हो सकता हैं ? || ५ ||

आपलोगोंने क्या देखा नहीं था कि मेरे साथ युद्धभूमि में आकर देवराज इंद्र, वक्ष:स्थल में नहीं, अपनी पीठपर बाणों की बौछार सहता हुआ भाग गया था || ६ || जिस समय इंद्र ने मेरे राज्य में वर्षाका होना बंद कर दिया था उससमय क्या मेघों ने मेरे बाणों से विन्धकर ही यथेष्ट जल नहीं बरसाया ? || ७ || हमारे गुरु (श्वशूर ) जरासंध को छोडकर क्या पृथ्वी के और सभी नृपतिगण मेरे बाहुबल से भयभीत होकर मेरे सामने सिर नहीं झुकाते ? || ८ ||

हे दैत्यश्रेष्ठगण ! देवताओं के प्रति मेरे चित्त में अवज्ञा होती है और हे वीरगण ! उन्हें अपने वध का यत्न करते देखकर तो मुझे हँसी आती है || ९ || तथापि हे दैत्येन्द्रो ! उन दुष्ट और दुरात्माओं के अपकारके लिये मुझे और भी अधिक प्रयत्न करना चाहिये || १० || अत: पृथ्वी में जो कोई यशस्वी और यज्ञकर्ता हों उनका देवताओं के अपकार के लिये सर्वथा वध कर देना चाहिये || ११ ||

देवकी के गर्भ से उत्पन्न हुई बालिका ने यह भी कहा है कि, वह मेरा भूतपूर्व [प्रथम जन्मका] काल निश्चय ही उत्पन्न हो चूका है || १२ || अत” आजकल पृथ्वीपर उत्पन्न हुए बालकों के विषय में विशेष सावधानी रखनी चाहिये और जिस बालक में विशेष बल का उद्रेक हो उसे यत्नपूर्वक मार डालना चाहिये || १३ || असुरों को इस प्रकार आज्ञा दे कंस से कारागृह में जाकर तुरंत ही वसुदेव और देवकी को बंधन से मुक्त कर दिया || १४ ||

कंस बोला – मैंने अबतक आप दोनों के बालकों की ति वृथा ही हत्या की, मेरा नाश करने के लिये तो कोई और ही बालक उत्पन्न हो गया है || १५ || परन्तु आपलोग इसका कूचा दुःख न मानें क्योंकि उन बालकों की होनहार ऐसी ही थी | आपलोगों के प्रारब्ध-दोष से ही उन बालकों को अपने जीवन से हाथ धोना पड़ा हैं || १६ ||

श्रीपराशरजी बोले – हे द्विजश्रेष्ठ ! उन्हें इसप्रकार ढाँढस बंधा और बंधन से मुक्तकर कंस ने शंकित चित्तसे अपने अंत:पुरमें प्रवेश किया || १७ ||

इति श्रीविष्णुपुराणे पंचमेंऽशे चतुर्थोऽध्यायः

विष्णुपुराण-पंचम अंश-३

Beautiful golden sunrise
ॐ श्री मन्नारायणाय नम:
नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम | देवी सरस्वती व्याप्तं ततो जयमुदिरयेत ||

श्रीविष्णुपुराण

पंचम अंश

अध्याय – ३

भगवानका आविर्भाव तथा योगमायाद्वारा कंस की वंचना

श्रीपराशरजी बोले हे मैत्रेय ! देवताओं से इस प्रकार स्तुति की जाती हुई देवकीजी ने संसार की रक्षा के कारण भगवान पुण्डरीकाक्षको गर्भ में धारण किया || १ || तदनन्तर सम्पूर्ण संसाररूप कमल को विकसित करने के लिये देवकीरूप पूर्व संध्या में महात्मा अच्युतरूप सूर्यदेवका आविर्भाव हुआ || २ || चन्द्रमा की चाँदनी के समान भगवान् का जन्म-दिन सम्पूर्ण जगत को आल्हादित करनेवाला हुआ और उस दिन सभी दिशाएँ अत्यंत निर्मल हो गयी || ३ ||

श्रीजनार्दन के जन्म लेनेपर संतजनों को परम संतोष हुआ, प्रचंड वायु शांत हो गया तथा नदियाँ अत्यंत स्वच्छ हो गयी || ४ ||

समुद्रगण अपने घोष से मनोहर बाजे बजाने लगे, गन्धर्वराज गान करने लगे और अप्सराएँ नाचने लगी || ५ || श्रीजनार्दन के प्रकट होनेपर आकाशगामी देवगण पृथ्वीपर पुष्प बरसाने लगे तथा शांत हुए यज्ञाग्नि फिर प्रज्वलित हो गये || ६ || हे द्विज ! अर्धरात्रि के समय सर्वाधार भगवान जनार्दन के आविर्भूत होनेपर पुष्पवर्षा करते हुए मेघगण मंद-मंद गर्जना करने लगे || ७ ||

उन्हें खिले हुए कमलदलकी-सी आभावाले, चतुर्भुज और वक्ष:स्थल में श्रीवत्स चिन्हसहित उत्पन्न हुए देख आनकदुन्दुभि वसुदेवजी स्तुति करने लगे || ८ || हे द्विजोत्तम ! महामति वसुदेवजी ने प्रसादयुक्त वचनों से भगवान की स्तुति कर कंस से भयभीत रहने के कारण इस प्रकार निवेदन किया || ९ ||

वसुदेवजी बोले – हे देवदेवेश्वर ! यद्यपि आप [साक्षात परमेश्वर] प्रकट हुए है, तथापि हे देव ! मुझपर कृपा करके अब अपने इस शंख-चक्र-गदाधारी दिव्य रूपक उपसंहार कीजिये || १० || हे देव ! यह पता लगते ही कि आप मेरे इस गृह में अवतीर्ण हुए है, कंस इसी समय मेरा सर्वनाश कर देगा || ११ ||

देवकीजी बोली – जो अनन्तरूप और अखिल विश्वस्वरूप है, जो गर्भ में स्थित होकर भी अपने शरीर से सम्पूर्ण लोकों को धारण करते हैं तथा जिन्होंने अपनी मायासे ही बालरूप धारण किया है वे देवदेव हमपर प्रसन्न हों || १२ || हे सर्वात्मन ! आप अपने इस चतुर्भुज रूप का उपसंहार किजिये | भगवन ! यह राक्षस के अंश से उत्पन्न कंस आपके इस अवतार का वृतांत न जानने पावे || १३ || (द्रुमिलनामक राक्षसने राजा उग्रसेन का रूप धारण कर उनकी पत्नी से संसर्ग किया था | उसीसे कंस का जन्म हुआ | यह कथा हरिवंश में आयी है |)

श्रीभगवान बोलेहे देवि ! पूर्व-जन्म में तूने जो पुत्र की कामना से मुझसे [पुत्ररूपसे उत्पन्न होनेके लिये ] प्रार्थना की थी | आज मैंने तेरे गर्भ से जन्म लिया है – इससे तेरी वह कामना पूर्ण हो गयी || १४ ||

श्रीपराशरजी बोले – हे मुनिश्रेष्ठ ! ऐसा कहकर भगवान मौन हो गये तथा वसुदेवजी भी उन्हें उस रात्रि में ही लेकर बाहर निकले || १५ || वसुदेवजी के बाहर जाते समय कारागृहरक्षक और मथुरा के द्वारपाल योगनिद्रा के प्रभाव से अचेत हो गये || १६ || उस रात्रि के समय वर्षा करते हुए मेघों की जलराशि को अपने फणों से रोककर श्रीशेषजी आनकदुन्दुभि के पीछे-पीछे चले || १७ || भगवान विष्णु को ले जाते हुए वसुदेवजी नाना प्रकार के सैकड़ो भँवरों से भरी हुई अत्यंत गम्भीर यमुनाजी को घुटनोतक रखकर ही पार कर गये || १८ || उन्होंने वहाँ यमुनाजी के तटपर ही कंस को कर देनेके लिये आये हुए नन्द आदि वृद्ध गोंपों को भी देखा || १९ || हे मैत्रेय ! इसी समय योगनिद्रा के प्रभाव से सब मनुष्यों के मोहित हो जानेपर मोहित हुई यशोदाने भी उसी कन्या को जन्म दिया || २० ||

तब अतिशय कान्तिमान वसुदेवकी उस बालक को सुलाकर और कन्या को लेकर तुरंत यशोदा के शयन-गृह से चले आये || २१ || जब यशोदा ने जागनेपर देखा कि उसके एक नीलकमलदल के समान श्यामवर्ण पुत्र उत्पन्न हुआ है तो उसे अत्यंत प्रसन्नता हुई || २२ || इधर, वसुदेवजी ने कन्या को ले जाकर अपने महल में देवकी के शयन-गृह में सुला दिया और पूर्ववत स्थित हो गये || २३ ||

हे द्विज ! तदनन्तर बालक के रोने का शब्द सुनकर कारागृह-रक्षक सहसा उठ खड़े हुए और देवकी के सन्तान उत्पन्न होनेका वृतांत कंस को सुना दिया || २४ || यह सुनते ही कंस ने तुरंत जाकर देवकी के रुंधे हुए कंठ से ‘छोड़, छोड़’ – ऐसा कहकर रोकनेपर भी उस बालिकाको पकड़ लिया और उसे एक शिलापर पटक दिया | उसने पटकते ही वह आकाश में स्थित हो गयी और उसने शस्त्रयुक्त एक महान अष्टभुजरूप धारण कर लिया || २५ – २६ ||

तब उसने ऊँचे स्वर से अट्टहास किया और कंस से रोषपूर्वक कहा – ‘अरे कंस ! मुझे पटकने से तेरा क्या प्रयोजन सिद्ध हुआ ? जो तेरा वध करेगा उसने तो जन्म ले लिया है; देवताओं के सर्वस्व वे हरि ही तुहारे पूर्वजन्म में भी काल थे | अत: ऐसा जानकर तू शीघ्र ही अपने हितका उपाय कर’ || २७ – २८ || ऐसा कह, वह दिव्य माला और चन्दनादि से विभूषित तथा सिद्धगणद्वारा स्तुति की जाती हुई देवि भोजराज कंस के देखते-देखते आकाशमार्ग से चली गयी || २९ ||

इति श्रीविष्णुपुराणे पंचमेंऽशे तृतीयोऽध्यायः

विष्णुपुराण – पंचम अंश -२

Beautiful golden sunrise
ॐ श्री मन्नारायणाय नम:
नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम | देवी सरस्वती व्याप्तं ततो जयमुदिरयेत ||

श्रीविष्णुपुराण

पंचम अंश

अध्याय – २

भगवान का गर्भ – प्रवेश तथा देवगणद्वारा देवकी की स्तुति

श्रीपराशरजी बोले – हे मैत्रेय ! देवेदेव श्रीविष्णुभगवान ने जैसा कहा था उसके अनुसार जगद्धात्री योगमाया ने छ: गर्भो को देवकी के उदर में स्थित किया और सातवें को उसमें से निकाल लिया || १ || इसप्रकार सातवें गर्भ के रोहिणी के उदर में पहुँच जानेपर श्रीहरि ने तीनों लोकों का उद्धार करने की इच्छा से देवकी के गर्भ में प्रवेश किया || २ || भगवान परमेश्वर के आज्ञानुसार योगमाया भी उसी दिन यशोदा के गर्भ में स्थित हुई || ३ || हे द्विज ! विष्णु-अंश के पृथ्वी में पधारनेपर आकाश में ग्रहगण ठीक-ठीक गति से चलने लगे और ऋतूगण भी मंगलमय होकर शोभा पाने लगे || ४ || उससमय अत्यंत तेजसे देदीप्यमान देवकीजी को कोई भी देख न सकता था | उन्हें देखकर चित्त थकित हो जाते थे || ५ || तब देवतागण अन्य पुरुष तथा स्त्रियों को दिखायी न देते हुए, अपने शरीर में [ गर्भरूपसे ] भगवान विष्णु को धारण करनेवाली देवकीजी की अहर्निश स्तुति करने लगे || ६ ||

देवता बोलेहे शोभने ! तू पहले ब्रह्म-प्रतिबिम्बधारिणी मूलप्रकृति हुई थी और फिर जगद्विधाता की वेदगर्भा वाणी हुई || ७ || हे सनातने ! तू ही सृज्य पदार्थों को उत्पन्न करनेवाली और तू ही सृष्टिरूपा हैं; तू ही सबकी बीज-स्वरूपा यज्ञमयी वेदत्रयी हुई है || ८ || तू ही फलमयी यज्ञक्रिया और अग्निमयी अरणि है तथा तू ही देवमाता अदिति और दैत्यप्रसू दिति है || ९ || तू ही दिनकरी प्रभा और ज्ञानगर्भा गुरुशुश्रूषा है तथा तू ही न्यायमयी परमनिति और विनयसम्पन्ना लज्जा है || १० || तू ही काममयी इच्छा, संतोषमयी तुष्टि, बोधगर्भा प्रज्ञा और धैर्यधारिणी धृति है || ११ || ग्रह, नक्षत्र और तारागण को धारण करनेवाला तथा कारणस्वरूप आकाश तू ही है | हे जगद्धात्री ! हे देवि ! ये सब तथा और भी सहस्त्रों और असंख्य विभूतियाँ इस समय तेरे उदर में स्थित है || १२ ||

हे शुभे ! समुद्र, पर्वत, नदी, द्वीप, वन और नगरों से सुशोभित तथा ग्राम, खर्वट और खेटादि से सम्पन्न समस्त पृथ्वी, सम्पूर्ण अग्नि और जल तथा समस्त वायु, ग्रह, नक्षत्र एवं तारागणों से चित्रित तथा सैकड़ों विमानों से पूर्ण सबको अवकाश देनेवाला आकाश, भूर्लोक, भुवलोक, स्वर्लोक तथा मह, जन, तप और ब्रह्मलोकपर्यन्त सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड तथा उसके अन्तर्वर्ती देव, असुर, गन्धर्व, चारण, नाग, यक्ष, राक्षस, प्रेत, गुह्यक, मनुष्य, पशु और जो अन्यान्य जीव है, हे यशस्विनी ! वे सभी अपने अंतर्गत होने के करण जो श्रीअनंत सर्वगामी और सर्वभावन है तथा जिनके रूप, कर्म, स्वभाव तथा समस्त परिमाण परिच्छेद के विषय नहीं हो सकते वे ही श्रीविष्णु भगवान तेरे गर्भ में स्थित हैं || १३ – १९ || तू ही स्वाहा, स्वधा, विद्या, सुधा और आकाशस्थिता ज्योति हैं | सम्पूर्ण लोकों की रक्षा के लिये ही तूने पृथ्वी में अवतार लिया है || २० || हे देवि ! तू प्रसन्न हो | हे शुभे ! तू सम्पूर्ण जगत का कल्याण कर | जिसने इस सम्पूर्ण जगत को धारण किया है उस प्रभु को तू प्रीतिपूर्वक अपने गर्भ में धारण कर || २१ ||

इति श्रीविष्णुपुराणे पंचमेंऽशे द्वितीयोऽध्यायः

विष्णुपुराण -पंचम अंश – १

Beautiful golden sunrise
ॐ श्री मन्नारायणाय नम:
नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम | देवी सरस्वती व्याप्तं ततो जयमुदिरयेत ||

श्रीविष्णुपुराण

पंचम अंश

अध्याय – १

वसुदेव – देवकी का विवाह, भारपीडिता पृथ्वी का देवताओं के सहित क्षीरसमुद्रपर जाना और भगवान का प्रकट होकर उसे धैर्य बंधना, कृष्णावतार का उपक्रम

श्रीमैत्रेयजी बोले – भगवन ! आपने राजाओं के सम्पूर्ण वंशों का विस्तार तथा उनके चरित्रों का क्रमशः यथावत वर्णन किया || १ || अब, हे ब्रह्मर्षे ! यदुकुल में जो भगवान विष्णु का अंशावतार हुआ था, उसे मैं तत्त्वत: और विस्तारपूर्वक सुनना चाहता हूँ || २ || हे मुने ! भगवान पुरुषोत्तम ने अपने अंशांस से पृथ्वीपर अवतीर्ण होकर जो – जो कर्म किये थे उन सबका आप मुझसे वर्णन कीजिये || ३ ||

श्रीपराशरजी बोले – हे मैत्रेय ! तुमने मुझसे जो पूछा है वह संसार में परम मंगलकारी भगवान विष्णु के अंशावतारका चरित्र सुनो || ४ || हे महामुने ! पूर्वकाल में देवक की महाभाग्यशालिनी पुत्री देवीस्वरूपा देवकी के साथ वसुदेवजी ने विवाह किया || ५ || वसुदेव और देवकी के वैवाहिक सम्बन्ध होने के अनन्तर भोजनंदन कंस सारथि बनकर उन दोनों का मांगलिक रथ हाँकने लगा || ६ || उसी समय मेघ के समान गंभीर घोष करती हुई आकाशवाणी कंस को ऊँचे स्वर से सम्बोधन करके यों बोली || ७ || ‘अरे मूढ़ ! पति के साथ रथपर बैठी हुई जिस देवकी को तू लिये जा रहा है इसका आठवाँ गर्भ तेरे प्राण हर लेगा’ ||८ ||

श्रीपराशरजी बोले – यह सुनते ही महाबली कंस खंग निकालकर देवकी को मारने के लिये उद्यत हुआ | तब वसुदेवजी यों कहने लगे || ९ ||

‘हे महाभाग ! हे अनघ ! आप देवकी का वध न करें, मैं इसके गर्भ से उत्पन्न हुए सभी बालक आपको सौंप दूँगा’ || १० ||

श्रीपराशरजी बोले – हे द्विजोत्तम ! तब सत्य के गौरवसे कंस ने वसुदेवजी से ‘बहुत अच्छा’ कह देवकी का वध नही किया || ११ || इसी समय अत्यंत भारसे पीड़ित होकर पृथ्वी गौ का रूप धारणकर सुमेरुपर्वतपर देवताओं के दल में गयी || १२ || वहाँ उसने ब्रह्माजी के सहित समस्त देवताओं को प्रणामकर खेदपूर्वक करुणस्वर से बोलती हुई अपना सारा वृतांत कहा || १३ ||

पृथ्वी बोली – जिसप्रकार अग्नि सुवर्ण का तथा सूर्य गो समूहका परमगुरु हैं उसी प्रकार सम्पूर्ण लोकों के गुरु श्रीनारायण मेरे गुरु हैं || १४ || वे प्रजापतियों के पति और पूर्वजों के पूर्वज ब्रह्माजी हैं तथा वे ही कला-काष्ठा-निमेष स्वरूप अव्यक्त मूर्तिमान काल है | हे देवश्रेष्ठगण ! आप सब लोगों का समूह भी उन्हीं का अंशस्वरूप हैं || १५ – १६ || आदित्य, मरुदगण, साध्यगण, रूद्र, वसु, अग्नि, पितृगण और अत्रि आदि प्रजापतिगण – ये सब अप्रमेय महात्मा विष्णु के ही रूप हैं || १७ – १८ || यक्ष, राक्षस, दैत्य, पिशाच, सर्प, दानव, गन्धर्व और अप्सरा आदि भी महात्मा विष्णु के ही रूप है || १९ || ग्रह, नक्षत्र तथा तारागणों से चित्रित आकाश, अग्नि, जल, वायु, मैं और इन्द्रियों के सम्पूर्ण विषय – यह सारा जगत विष्णुमय ही है || २० || तथापि उन अनेक रूपधारी विष्णु के ये रूप समुद्र की तरंगों के समान रात-दिन एक-दूसरे के बाध्य-बाधक होते रहते हैं || २१ ||

इससमय कालनेमि आदि दैत्यगण मर्त्यलोकपर अधिकार जमाकर अहर्निश जनताको क्लेशित कर रहे हैं || २२ || जिस कालनेमिको सामर्थ्यवान भगवान विष्णु ने मारा था, इससमय वही उग्रसेन के पुत्र महान असुर कंस के रूप में उत्पन्न हुआ हैं || २३ || अरिष्ट, धेनुक, केशी, प्रलम्ब, नरक, सुन्द, बलिका पुत्र अति भयंकर बाणासुर तथा और भी जो महाबलवान दुरात्मा राक्षस राजाओं के घर में उत्पन्न हो गये हैं उनकी मैं गणना नहीं कर सकती || २४ – २५ ||

हे दिव्यमुर्तिधारी देवगण ! इस समय मेरे ऊपर महाबलवान और गर्वीले दैत्यराजों की अनेक अक्षौहिणी सेनाएँ है || २६ || हे अमरेश्वरो ! मैं आपलोगों को यह बतलाये देती हूँ कि अब मैं उनके अत्यंत भारसे पीड़ित होकर अपने को धारण करने में सर्वथा असमर्थ हूँ || २७ || अत: हे महाभागगण ! आपलोग मेरे भार उतारने का अब कोई ऐसा उपाय कीजिये जिससे मैं अत्यंत व्याकुल होकर रसातल को न चली जाऊँ || २८ ||

पृथ्वी के इन वाक्यों को सुनकर उसके भार उतारने के विषय में समस्त देवताओं की प्रेरणासे भगवान ब्रह्माजी ने कहना आरम्भ किया || २९ ||

ब्रह्माजी बोलेहे देवगण ! पृथ्वी ने जो कुछ कहा है वह सर्वथा सत्य ही है, वास्तव में मैं, शंकर और आप सब लोग नारायणस्वरूप ही है || ३० || उनकी जो – जो विभूतियाँ हैं, उनकी परस्पर न्युनता और अधिकता ही बाध्य तथा बाधकरूपसे रहा करती है || ३१ || इसलिये आओ, अब हमलोग क्षीरसागर के पवित्र तटपर चले, वहाँ श्रीहरि की आराधना कर वह सम्पूर्ण वृतांत उनसे निवेदन कर दें || ३२ || वे विश्वरूप सर्वात्मा सर्वथा संसार के हित के लिये ही अपने शुद्ध सत्त्वांश से अवतीर्ण होकर पृथ्वी में धर्म की स्थापना करते हैं || ३३ ||

श्रीपराशरजी बोले – ऐसा कहकर देवताओं के सहित पितामह ब्रह्माजी वहाँ गये और एकाग्रचित्त से श्रीगरुडध्वज भगवान की इसप्रकार स्तुति करने लगे || ३४ ||

ब्रह्माजी बोलेहे वेदवाणी के अगोचर प्रभो ! परा और अपरा – ये दोनों विद्याएँ आप ही है | हे नाथ ! वे दोनों आपही के मूर्त और अमूर्त रूप है || ३५ | हे अत्यंत सूक्ष्म ! हे विराटस्वरूप ! हे सर्व ! हे सर्वज्ञ ! शब्दब्रह्म और परब्रह्म – ये दोनों आप ब्रह्ममय के ही रूप है || ३६ || आप ही ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद हैं तथा आप ही शिक्षा, कल्प, निरुक्त, छंद और ज्योतिष-शास्त्र हैं || ३७ || हे प्रभो ! हे अधोक्षज ! इतिहास, पुराण, व्याकरण, मीमांसा, न्याय और धर्मशास्त्र – ये सब भी आप ही है || ३८ ||

हे आद्यपते ! जीवात्मा, परमात्मा, स्थूल-सूक्ष्म-देह तथा उनका कारण अव्यक्त – इन सबके विचार से युक्त जो अंतरात्मा और परमात्मा के स्वरूप का बोधक [ तत्त्वमसि ] वाक्य है , वह भी आपसे भिन्न नही हैं || ३९ ||

आप अव्यक्त, अनिर्वाच्य, नामवर्ग से रहित, हाथ-पाँव तथा रूपसे हीन, शुद्ध, सनातन और परसे भी पर हैं || ४० || आप कर्णहीन होकर भी सुनते हैं, नेत्रहीन होकर भी देखते हैं, एक होकर भी अनेक रूपों में प्रकट होते हैं, हस्तपादादि से रहित होकर भी बड़े वेगशाली और ग्रहण करनेवाले हैं तथा सबके अवेद्य होकर भी सबको जाननेवाले है || ४१ || हे परात्मन ! जिस धीर पुरुष की बुद्धि आपके श्रेष्ठतं रूपसे पृथक और कुछ भी नहीं देखती, आपके अणुसे भी अणु और दृश्य-स्वरूप को देखनेवाले उस पुरुष की आत्यन्तिक अज्ञाननिवृत्ति हो जाती है || ४२ || आप विश्व के केंद्र और त्रिभुवन के रक्षक हैं; सम्पूर्ण भूत आपही में स्थित हैं तथा जो कुछ भूत, भविष्यत और अणु से भी अणु है वह सब आप प्रकृति से परे एकमात्र परमपुरुष ही है || ४३ || आप ही चार प्रकार का अग्नि होकर संसार को तेज और विभूति दान करते अहिं | हे अनंतमूर्ते ! आपके नेत्र सब ओर हैं | हे धात: ! आप ही तीनों लोक में अपने तीन पग रखते हैं || ४४ || हे ईश ! जिसप्रकार एक ही अविकारी अग्नि विकृत होकर नाना प्रकार से प्रज्वलित होता है उसी प्रकार सर्वगतरूप एक आप ही अनंत रूप धारण कर लेते हैं || ४५ || एकमात्र जो श्रेष्ठ परमपद हैं; वह आप ही हैं, ज्ञानी पुरुष ज्ञानदृष्टि से देखे जाने योग्य आपको ही देखा करते हैं | हे परात्मन ! भूत और भविष्यत जो कुल स्वरूप है वह आपसे अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है || ४६ || आप व्यक्त और अव्यक्तस्वरूप है , समष्टि और व्यक्तिरूप हैं तथा आप ही सर्वज्ञ, सर्वसाक्षी, सर्वशक्तिमान एवं सम्पूर्ण ज्ञान, बल और ऐश्वर्य से युक्त हैं || ४७ || आप ह्रास और वृद्धि से रहित, स्वाधीन, अनादि और जितेन्द्रिय हैं तथा आपके अंदर श्रम, तन्द्रा, भय, क्रोध और काम आदि नहीं है || ४८ || आप अनिन्ध, अप्राप्य, निराधार और अव्याहत गति है, आप सबके स्वामी, अन्य ब्रह्मादि के आश्रय तथा सूर्यादि तेजों के तेज एवं अविनाशी है || ४९ ||

आप समस्त आवरणशून्य, असहायों के पालक और सम्पूर्ण महाविभुतियों के आधार है, हे पुरुषोत्तम ! आपको नमस्कार है || ५० || आप किसी कारण, अकारण अथवा कारणाकारण से शरीर-ग्रहण नहीं करते, बल्कि केवल धर्म-रक्षा के लिये ही करते है || ५१ ||

श्रीपराशरजी बोले – इसप्रकार स्तुति सुनकर भगवान अज अपना विश्वरूप प्रकट करते हुए ब्रह्माजी से प्रसन्नचित्त से कहने लगे || ५२ ||

श्रीभगवान बोले – हे ब्रह्मन ! देवताओं के सहित तुमको मुझसे जिस वस्तु की इच्छा हो वह सब कहो और उसे सिद्ध हुआ ही समझो || ५३ ||

श्रीपराशरजी बोले – हे सहस्त्रबाहों ! हे अनंतमुख एवं चरणवाले ! आपको हजारों बार नमस्कार हो | हे जगतकी उत्पत्ति, स्थिति और विनाश करनेवाले ! हे अप्रमेय आपको बारम्बार नमस्कार हो || ५५ || हे भगवन ! आप सूक्ष्मसे भी सूक्ष्म, गुरुसे भी गुरु और अति बृहत प्रमाण है, तथा प्रधान (प्रकृति) महत्तत्त्व और अहंकारादि में प्रधानभूत मूल पुरुष से भी परे हैं; हे भगवन ! आप हमपर प्रसन्न होइये || ५६ || हे देव ! इस पृथ्वी के पर्वतरूपी मूलबन्ध इसपर उत्पन्न हुए महान असुरों के उत्पातसे शिथिल हो गये हैं | अत: हे अपरिमितवीर्य ! यह संसार का भार उतारने के लिये आपकी शरण में आयी है || ५७ || हे सुरनाथ ! हम और यह इंद्र, अश्विनीकुमार तथा वरुण, ये रूद्रगण, वसुगण, सूर्य, वायु और अग्नि आदि अन्य समस्त देवगण यहाँ उपस्थित हैं, इन्हें अथवा मुझे जो कुछ करना उचित हो उन सब बातों के लिये आज्ञा कीजिये | हे ईश ! आपही की आज्ञा का पालन करते हुए हम सम्पूर्ण दोषोंसे मुक्त हो सकेंगे || ५८ – ५९ ||

श्रीपराशरजी बोले – हे महामुने ! इसप्रकार स्तुति किये जानेपर भगवान परमेश्वर ने अपने श्याम और श्वेत दो केश उखाड़े || ६० || और देवताओं से बोले – मेरे ये दोनों केश पृथ्वीपर अवतार लेकर पृथ्वी के भाररूप कष्ट को दूर करेंगे || ६१ || सब देवगण अपने-अपने अंशों से पृथ्वीपर अवतार लेकर अपने से पूर्व उत्पन्न हुए उन्मत दैत्यों के साथ युद्ध करें || ६२ || तब नि:संदेह पृथ्वीतलपर सम्पूर्ण दैत्यगण मेरे दृष्टिपात से दलित होकर क्षीण हो जायेंगे || ६३ || वसुदेवजी की जो देवी के समान देवकी नामकी भार्या है उसके आठवें गर्भ से मेरा यह [ श्याम] केश अवतार लेगा || ६४ || और इसप्रकार यहाँ अवतार लेकर यह कालनेगि के अवतार कंस का वध करेगा | ऐसा कहकर श्रीहरि अन्तर्धान हो गये || ६५ || हे महामुने ! भगवान के अदृश्य हो जानेपर उन्हें प्रणाम करके देवगण सुमेरुपर्वतपर चले गये और फिर पृथ्वीपर अवतीर्ण हुए || ६६ ||

इसी समय भगवान नारदजीने कंस से आकर कहा कि देवकी के आठवें गर्भ में भगवान धरनीधर जन्म लेंगे || ६७ || नारदजी से यह समाचार पाकर कंस ने कुपित होकर वसुदेव और देवकी को कारागृह में बंद कर दिया || ६८ || हे द्विज ! वसुदेवजी भी, जैसा कि उन्होंने पहले कह दिया था, अपने प्रत्येक पुत्र को कंस को सौंपते रहे || ६९ || ऐसा सुना जाता है कि पहले छ: गर्भ हिरण्यकशिपु के पुत्र थे | भगवान विष्णु की प्रेरणासे योगनिद्रा उन्हें क्रमश: गर्भ में स्थित करती रही || ७० || [ ये बालक पूर्वजन्म में हिरण्यकशिपु के भाई कालनेमि के पुत्र थे, इसीसे इन्हें उसका पुत्र कहा गया है | इन राक्षसकुमारों ने हिरण्यकशिपु का अनादर कर भगवान की भक्ति की थी; अत: उसने कुपित होकर इन्हें शाप दिया कि तुमलोग अपने पिटा के हाथ से ही मारे जाओंगे | यह प्रसंग हरिवंश में आया है | ] जिस अविद्या-रूपिणी से सम्पूर्ण जगत मोहित हो रहा है, वह योगनिद्रा भगवान विष्णु की महामाया है उससे भगवान श्रीहरि ने कहा || ७१ ||

श्रीभगवान बोले – हे निद्रे ! जा, मेरी आज्ञा से तू पाताल में स्थित छ: गर्भो को एक-एक करके देवकी की कुक्षि में स्थापित कर दे || ७२ || कंसद्वारा उन सबके मारे जानेपर शेष नामक मेरा अंश अपने अंशांशसे देवकी के वसुदेवजी की जो रोहिणी नामकी दूसरी भार्या रहती है उसके उदर में उस सातवें गर्भ को ले जाकर तू इसप्रकार स्थापित कर देना जिससे वह उसीके जठरसे उत्पन्न हुए के समान जान पड़े || ७४ || उसके विषय में संसार यही कहेगा कि कारागार में बंद होने के कारण भोजराज कंस के भयसे देवकी का सातवाँ गर्भ गिर गया || ७५ || वह श्वेत शैलशिखर के समान वीर पुरुष गर्भ से आकर्षण किये जाने के कारण संसार में ‘संकर्षण’ नामसे प्रसिद्ध होगा || ७६ ||

तदनन्तर, हे शुभे ! देवकी के आठवे गर्भ में मैं स्थित होऊँगा | उससमय तू भी तुरंत ही यशोदा के गर्भ में चली जाना || ७७ || वर्षाऋतू में भाद्रपद कृष्ण अष्टमी को रात्रि के समय मैं जन्म लूँगा और तू नवमी को उत्पन्न होगी || ७८ || हे अनिन्दिते ! उससमय मेरी शक्ति में अपनी मति फिर जानेके करण वसुदेवजी मुझे तो यशोदा के और तुझे देवकी के शयनगृह से ले जायँगे || ७९ || तब हे देवि ! कंस तुझे पकडकर पर्वत – शिलापर पटक देगा; उसके पटकते ही तू आकाश में स्थित हो जायगी || ८० ||

उससमय मेरे गौरव से शहस्त्रनयन इंद्र सिर झुकाकर प्रणाम करने के अनन्तर तुझे भगिनीरूप से स्वीकार करेगा || ८१ || तू भी शुम्भ, निशुम्भ आदि सहस्त्रों दैत्यों को मारकर अपने अनेक स्थानों से समस्त पृथ्वी को सुशोभित करेगी || ८२ || तू ही भूति, सन्नति, क्षान्ति और कान्ति है, तू ही आकाश, पृथ्वी, धृति, लज्जा, पुष्टि और उषा है; इनके अतिरिक्त संसार में और भी जो कोई शक्ति है वह सब तू ही है || ८३ ||

जो लोग प्रात:काल और सायंकाल में अत्यंत नम्रतापूर्वक तुझे आर्या, दुर्गा, वेदगर्भा, अम्बिका, भद्रा, भद्रकाली, क्षेमदा और भाग्यदा आदि कहकर तेरी स्तुति करेंगे, उनकी समस्त कामनाएँ मेरी कृपा से पूर्ण हो जायँगी || ८४ – ८५ || मदिरा और मांस की भेंट चढाने से तथा भक्ष्य और भोज्य पदार्थोंद्वारा पूजा करने से प्रसन्न होकर तू मनुष्यों की सम्पूर्ण कामनाओं को पूर्ण कर देगी || ८६ || तेरे द्वारा दी हुई वे समस्त कामनाएँ मेरी कृपासे निस्संदेह पूर्ण होगी | हे देवि ! अब तू मेरे बतलाये हए स्थान को जा || ८७ ||

इति श्रीविष्णुपुराणे पंचमेंऽशे प्रथमोऽध्यायः

विष्णुपुराण – चतुर्थ अंश – १९ से २४

Beautiful golden sunrise
ॐ श्री मन्नारायणाय नम:
नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम | देवी सरस्वती व्याप्तं ततो जयमुदिरयेत ||

श्रीविष्णुपुराण

चतुर्थ अंश

अध्याय – १९ से २४

कलियुगी राजाओं और कलिधर्मो का वर्णन तथा राजवंश – वर्णन का उपसंहार

श्रीपराशयजी बोले – बृहद्र्थवंश का रिपुज्जय नामक जो अंतिम राजा होगा उसका सुनिक नामक एक मंत्री होगा | वह अपने स्वामी रिपुज्जय को मारकर अपने पुत्र प्रद्योत का राज्याभिषेक करेगा | उसका पुत्र बलाक होगा, बलाक का विशाखयूम, विशाखयूप का जनक, जनक का नंदीवर्द्धन तथा नंदीवर्द्धन का पुत्र नंदी होगा | ये पाँच प्रद्योतवंशीय नृपतिगण एक सौ अड़तीस वर्ष पृथ्वीका पालन करेंगे || १ – ८ ||

नंदी का पुत्र शिशुनाभ होगा, शिशुनाभ का काकवर्ण, काकवर्ण का क्षेमधर्मा, क्षेमधर्मा का क्षतौजा, क्षतौजा का विधिसार, विधिसारका अजातशत्रु, अजातशत्रु का अर्भक, अर्भक का उदयन, उदयन का नंदीवर्द्धन और नंदीवर्द्धन का पुत्र महानंदी होगा | ये शिशुनाभवंशीय नृपतिगण तीन सौ बासष्ठ वर्ष पृथ्वीका शासन करेंगे || ९ – १९ ||

महानंदी के शूद्रा के गर्भ से उत्पन्न महापद्म नामक नन्द दूसरे परशुराम के समान सम्पूर्ण क्षत्रियों का नाश करनेवाला होगा | तबसे शूद्रजातीय राजा राज्य करेंगे | राजा माहापद्म सम्पूर्ण पृथ्वी का एकछत्र और अनुल्लन्गित राज्यशासन करेगा | उसके सुमाली आदि आठ पुत्र होंगे जो महापद्म के पीछे पृथ्वीका राज्य भोगेंगे || २० – २४ || महापद्म और उसके पुत्र सौ वर्षतक पृथ्वीका शासन करेंगे | तदनन्तर इस नवों नन्दों को कौटिल्यनामक एक ब्राह्मण नष्ट करेगा, उनका अंत होनेपर मौर्य नृपतिगण पृथ्वी को भोगेंगे | कौटिल्य ही मुरा नामकी दासीसे नन्दद्वारा उत्पन्न हुए चन्द्रगुप्त को राज्याभिषित करेंगा || २५- २८ ||

चन्द्रगुप्त का पुत्र बिन्दुसार, बिन्दुसार का अशोकवर्द्धन, अशोकवर्द्धन का सुयशा, सुयशा का दशरथ, दशरथ का संयुत, संयुत का शालिशूक, शालिशूकका सोमशर्मा, सोमशर्मा का शतधन्वा तथा शतधन्वा का पुत्र बृहद्र्थ होगा | इसप्रकार एक सौ तिहत्तर वर्षतक ये दस मौर्यवंशी राजा राज्य करेंगे || २९ – ३२ || इनके अनन्तर पृथ्वी में दस शुद्रवंशीय राजागण होंगे || ३३ || उनमे पहला पुष्यमित्र नामक सेनापति अपने स्वामी को मारकर स्वयं राज्य करेगा, उसका पुत्र अग्निमित्र होगा || ३४ || अग्निमित्र का पुत्र सुज्येष्ठ, सुज्येष्ठ का वसुमित्र, वसुमित्र का उदंक, उदंक का पुलिन्दक, पुलिन्दक का घोषवसु, घोषवसु का वज्रमित्र, वज्रमित्र का भागवत और भागवत का पुत्र देवभूत होगा || ३५ – ३६ || ये शुंगनरेश एक सौ बारह वर्ष पृथ्वी का भोग करेंगे || ३७ ||

इसके अनन्तर यह पृथ्वी कण्व भूपालों के अधिकार में चली जायगी || ३८ || शुंगवंशीय अति व्यसनशील राजा देवभूति को कण्ववंशीय वसुदेव नामक उसका मंत्री मारकर स्वयं राज्य भोगेगा || ३९ || उसका पुत्र भूमित्र, भूमित्र का नारायण तथा नारायण का पुत्र सुशर्मा होगा || ४० – ४१ || ये चार काण्व भूपतिगण पैंतालिस वर्ष पृथ्वी के अधिपति रहेंगे || ४२ ||

कण्ववंशीय सुशर्मा को उसका बलिपुच्छक नामवाला आंध्रजातीय सेवक मारकर स्वयं पृथ्वी का भोग करेगा || ४३ || उसके पीछे उसका भाई कृष्ण पृथ्वी का स्वामी होगा || ४४ || उसका पुत्र शांतकर्णि होगा | शांतकर्णिका पुत्र पूर्णोत्संग, पूर्णोत्संग का शातकर्णि, शातकर्णिका लम्बोदर, लम्बोदर का पिलक, पिलक का मेघस्वाति, मेघस्वाति का पटुमान, पटुमान का अरिष्टकर्मा, अरिष्टकर्मा का हालाहल, हालाहल पललक, पललक का पुलिंदसेन, पुलिंदसेन का सुंदर, सुंदर का शातकर्णि( दूसरा) शातकर्णिका शिवस्वाति, शिवस्वाति का गोमतिपुत्र, गोमतिपुत्र का अलिमान, अलिमान का शांतकर्णि (दूसरा) शांतकर्णिका शिवश्रित, शिवश्रित का शिवस्कन्ध, शिवस्कन्ध का यज्ञश्री, यज्ञश्री का द्वियज्ञ, द्वियज्ञ का चन्द्रश्री तथा चन्द्रश्री का पुत्र पुलोमाचि होगा || ४५ – ४९ || इसप्रकार ये तीस आंध्रभृत्य राजागण चार सौ छप्पन वर्ष पृथ्वी को भोगेंगे || ५० || इनके पीछे सात आभीर और दस गर्दभिल राजा होंगे || ५१ || फिर सोलह शक राजा होंगे || ५२ || उनके पीछे आठ यवन, चौदह तुर्क, तेरह मुंड और ग्यारह मौनवातीय राजालोग एक हजार नब्बे वर्ष पृथ्वी का शासन करेंगे || ५३ ||

इनमें से भी ग्यारह मौन राजा पृथ्वी को तीन सौ वर्षतक भोगेंगे || ५४ || इनके उच्छिन्न होनेपर कैंकिल नामक यवनजातीय अभिषेकरहित राजा होंगे || ५५ || उनका वंशधर विन्ध्यशक्ति होगा | विन्ध्यशक्ति का पुत्र पुरंजय होगा | पुरंजय का रामचन्द्र, रामचन्द्र का धर्मवर्मा, धर्मवर्मा का बंग, बंगका नंदन तथा नंदन का पुत्र सुनन्दी होगा | सुनन्दी के नंदीयशा, शुक्र और प्रवीर ये तीन भाई होंगे | ये सब एक सौ छ: वर्ष राज्य करेंगे || ५६ || इसके पीछे तेरह इनके वंश के और तीन बाह्यिक राजा होगे || ५७ || उनके बाद तेरह पुष्पमित्र और पटुमित्र आदि तथा सात आंध्र मांगलिक भूपतिगण होंगे || ५८ || तथा नौ राजा क्रमश: कोसलदेश में राज्य करेंगे || ५९ || निषधदेश के स्वामी भी ये ही होंगे || ६० ||

मगधदेश में विश्वस्फटिक नामक राजा अन्य वर्णों को प्रवृत्त करेगा || ६१ || वह कैवर्त्त, वटु, पुलिंद और ब्राह्मणों को राज्य में नियुक्त करेगा || ६२ || सम्पूर्ण क्षत्रिय-जाति को उच्छिन्न कर पद्मावतीपूरी में नागगण तथा गंगा के निकटवर्ती प्रयाग और गया में मागध और गुप्त राजालोग राज्य भोग करेंगे || ६३ || कोसल, आंध्र, पुंड्र, ताम्रलिप्त और समुद्रतटवर्तिनी पूरी की देवरक्षित नामक एक राजा रक्षा करेगा || ६४ || कलिंग, माहिष, महेंद्र और भौम आदि देशों को गुह नरेश भोगेंगे || ६५ || नैषध, नैमिषक और कालकोशक आदि जनपदों को मणिधान्यक-वंशीय राजा भोगेगे || ६६ || त्रैराज्य और मूषिक देशोंपर कनक नामक आभीर तथा नर्मदा-तटवर्ती मरुभूमिपर व्रात्य द्विज, आभीर और शुद्र आदिका आधिपत्य होगा || ६८ || समुद्रतट, दाविकोर्वी, चन्द्रभागा और काश्मीर आदि देशों का व्रात्य, म्लेच्छ और शुद्र आदि राजागण भोग करेंगे || ६९ ||

ये सम्पूर्ण राजालोग पृथ्वी में एक ही समय में होंगे || ७० || ये थोड़ी प्रसन्नतावाले, अत्यंत क्रोधी, सर्वदा अधर्म और मिथ्या भाषण में रूचि रखनेवाले, स्त्री-बालक और गौओं की हत्या करनेवाले, पर-धन-हरण में रूचि रखनेवाले, अल्पशक्ति, तम:प्रधान उत्थान के साथ ही पतनशील, अल्पायु, महती कामनावाले, अल्पपुण्य और अत्यंत लोभी होंगे || ७१ || ये सम्पूर्ण देशों को परस्पर मिला देंगे तथा उन राजाओं के आश्रय से ही बलवान और उन्हीं के स्वभाव का अनुकरण करनेवाले म्लेच्छ तथा आर्यविपरीत आचरण करते हुए सारी प्रजाको नष्ट- भ्रष्ट कर देंगे || ७२ ||

तब दिन – दिन धर्म और अर्थ का थोडा – थोडा ह्रास तथा क्षय होने के कारण संसार का क्षय हो जायगा || ७३ || उससमय अर्थ ही कुलीनता का हेतु होगा; बल ही सम्पूर्ण धर्म का हेतु होगा; पारस्परिक रूचि ही दाम्पत्य-सम्बन्ध की हेतु होगी, स्त्रीत्व ही उपभोग का हेतु होगा; मिथ्या भाषण ही व्यवहार में सफलता प्राप्त करने का हेतु होगा; जल की सुलभता और सुगमता ही पृथ्वी की स्वीकृति का हेतु होगा ; यज्ञोपवीत ही ब्राह्मणत्व का हेतु होगा; रत्नादि धारण करना ही प्रशंसाका हेतु होगा; बाह्य चिन्ह ही आश्रमों के हेतु होंगे; अन्याय ही आजीविका का हेतु होगा; दुर्बलता ही बेकारी का हेतु होगा; निर्भयतापूर्वक धृष्टता के साथ बोलना ही पांडित्य का हेतु होगा, निर्धनता ही साधुत्व का हेतु होगी; स्नान ही साधनका हेतु होगा, दान ही धर्म का हेतु होगा, स्वीकार कर लेना ही विवाह का हेतु होगा; भली प्रकार बन-ठनकर रहनेवाला ही सुपात्र समझा जायगा; दूरदेश का जल ही तीर्थोदकत्वका हेतु होगा तथा छद्मवेश धारण ही गौरव का कारण होगा || ७४ – ९२ || इसप्रकार पृथ्वीमंडल में विविध दोषों के फ़ैल जाने से सभी वर्णों में जो – जो बलवान होगा वही- वही राजा बन बैठेगा || ९३ ||

इसप्रकार अतिलोलुप राजाओं के कर-भार को सहन न कर सकने के कारण प्रजा पर्वत-कन्दराओं का आश्रय लेगी तथा मधु, शाक, मूल, फल, पत्र और पुष्प आदि खाकर दिन काटेगी || ९४ – ९५ || वृक्षों के पत्र और वल्कल ही उनके पहनने तथा ओढने के कपड़े होंगे | अधिक संताने होगी | सब लोक शीत, वायु, घाम और वर्षा आदि के कष्ट सहेंगे || ९६ || कोई भी तेईस वर्षतक जीवित न रह सकेगा | इसप्रकार कलियुग में यह सम्पूर्ण जनसमुदाय निरंतर क्षीण होता रहेगा || ९७ || इसप्रकार श्रौत और स्मार्तधर्म का अत्यंत ह्रास हो जाने तथा कलियुग के प्राय: बीत जानेपर शम्बल ग्रामनिवासी ब्राह्मणश्रेष्ठ विष्णुयशा के घर सम्पूर्ण संसार के रचयिता, चराचर गुरु, आदि मध्यांतशून्य, ब्रह्ममय, आत्मस्वरूप भगवान वासुदेव अपने अंश से अष्टैश्वर्ययुक्त कल्किरूप से संसार में अवतार लेकर असीम शक्ति और माहात्म्य से सम्पन्न हो सकल म्लेच्छ, दस्यु, दुष्टाचारी तथा दुष्ट चित्तों का क्षय करेंगे और समस्त प्रजाको अपने – अपने धर्म में नियुक्त करेंगे || ९८ || इसके पश्चात समस्त कलियुग के समाप्त हो जानेपर रात्रि के अंत में जागे हुओंके समान तत्कालीन लोगों की बुद्धि स्वच्छ, स्फटिकमणि के समान निर्मल हो जायगी || ९९ || उन बीजभुत समस्त मनुष्योंसे उनकी अधिक अवरधा होनेपर भी उस समय सन्तान उत्पन्न हो सकेगी || १०० || उनकी वे संताने सत्ययुग के ही धमों का अनुसरण करनेवाली होंगी || १०१ ||

इस विषय में ऐसा कहा जाता है कि – जिस समय चन्द्रमा, सूर्य और बृहस्पति पुष्यनक्षत्र में स्थित होकर एक राशिपर एक साथ आवेंगे उसी समय सत्ययुग का आरम्भ हो जायगा || १०२ || हे मुनिश्रेष्ठ ! तुमसे मैंने यह समस्त वंशों के भूत, भविष्यत और वर्तमान सम्पूर्ण राजाओं का वर्णन कर दिया || १०३ || परीक्षित के जन्म से नन्द के अभिषेकतक एक हजार पचास वर्ष का समय जानना चाहिये || १०४ || सप्तर्षियों में से जो [ पुलस्त्य और क्रतु ] दो नक्षत्र आकाश में पहले दिखायी देते है, उनके बीच में रात्रि के समय जो [ दक्षिणोत्तर रेखापर ] समदेश में स्थित [ अश्विनी आदि] नक्षत्र है, उनमें से प्रत्येक नक्षत्रपर सप्तर्षिगण एक – एक सौ वर्ष रहते हैं | हे द्विजोत्तम ! परीक्षित के समय में वे सप्तर्षिगण मघानक्षत्रपर थे | उसीसमय बारह सौ वर्ष प्रमाणवाला कलियुग आरम्भ हुआ था || १०५ – १०७ || हे द्विज ! जिस समय भगवान विष्णु के अंशावतार भगवान वासुदेव निजधाम को पधारे थे उसी समय पृथ्वीपर कलियुग का आगमन हुआ था || १०८ ||

जबतक भगवान अपने चरणकमलों से इस पृथ्वी का स्पर्श करते रहे तबतक पृथ्वी से संसर्ग करने की कलियुग की हिम्मत न पड़ी || १०९ ||

सनातन पुरुष भगवान विष्णु के अंशावतार श्रीकृष्णचन्द्र के स्वर्गलोग पधारनेपर भाइयों के सहित धर्मपुत्र महाराज युधिष्ठिर अपने राज्य को छोड़ दिया || ११० || कृष्णचन्द्र के अन्तर्धान हो जानेपर विपरीत लक्षणों को देखकर पांडवों ने परीक्षित को राज्यपदपर अभिषिक्त कर दिया || १११ || जिस समय ये सप्तर्षिगण पूर्वाषाढ़ानक्षत्रपर जायँगे उसी समय राजा नन्द के समय से कलियुग का प्रभाव बढ़ेगा || ११२ || जिस दिन भगवान कृष्णचन्द्र परमधाम को गये थे उसी दिन कलियुग उपस्थित हो गया था | अब तुम कलियुग की वर्ष-संख्या सुनो || ११३ ||

हे द्विज ! मानवी वर्षगणना के अनुसार कलियुग तीन लाख साथ हजार वर्ष रहेगा || ११४ || इसके पश्चात बारह सौ दिव्य वर्षपर्यन्त कृतयुग रहेगा || ११५ || हे द्विजश्रेष्ठ ! प्रत्येक युग में हजारों ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शुद्र माहात्मागण हो गये है || ११६ || उनके बहुत अधिक संख्या में होने से तथा समानता होने के कारण कुलों में पुनरुक्ति हो जानेके भय से मैंने उन सबके नाम नहीं बतलाये हैं || ११७ ||

पुरुवंशीय राजा देवापि तथा इक्ष्वाकुकुलोत्पन्न राजा पुरु – ये दोनों अत्यंत योगबलसम्पन्न हैं और कलापग्राम में रहते हैं || ११८ || सत्ययुग का आरम्भ होनेपर ये पुन: मर्त्यलोक में आकर क्षत्रिय कुल के प्रवर्तक होंगे | वे आगामी मनुवंश के बीजरूप है || ११९ || सत्ययुग, त्रेता और द्वापर इन तीनों युगों में इसी क्रमसे मनुपुत्र पृथ्वी का भोग करते हैं || १२० || फिर कलियुग में उन्हीं में से कोई-कोई आगामी मनुसन्तान के बीजरूप से स्थित रहते हैं जिस प्रकार कि आजकल देवापि और पुरु हैं || १२१ ||

इसप्रकार मैंने तुमसे सम्पूर्ण राजवंशों का यह संक्षिप्त वर्णन कर दिया है, इनका पूर्णतया वर्णन तो सौ वर्ष में भी नहीं किया जा सकता || १२२ || इस हेय शरीर के मोह से अंधे हुए ये तथा और भी ऐसे अनेक भूपतिगण हो गये हैं जिन्होंने इस पृथ्वीमंडल को अपना-अपना माना हैं || १२३|| यह पृथ्वी किस प्रकार अचलभावसे मेरी, मेरे पुत्र की अथवा मेरे वंश की होगी ? इसी चिंता में व्याकुल हुए इन सभी राजाओं का अंत हो गया || १२४ || इसी चिंता में डूबे रहकर इन सम्पूर्ण राजाओ के पूर्व-पूर्वतरवर्ती राजालोग चले गये और इसी में मग्न रहकर आगामी भूपतिगण भी मृत्यु-मुख में चले जायँगे || १२५ || इसप्रकार अपने को जीतने के लिये राजाओं को अथक उद्योग करते देखकर वसुंधरा शरत्कालीन पुष्पों के रूप में मानो हँस रही है || १२६ ||

हे मैत्रेय ! अब तुम पृथ्वी के कहे हुए कुछ श्लोकों को सुनो | पूर्वकाल में इन्हें असित मुनिने धर्मध्वजी राजा जनक को सुनाया था || १२७ ||

पृथ्वी कहती है – अहो ! बुद्धिमान होते हुए भी इन राजाओं को यह कैसा मोह हो रहा है जिसके कारण ये बुलबुले के समान क्षणस्थायी होते हुए भी अपनी स्थिरता में इतना विश्वास रखते हैं || १२८ || ये लोग प्रथम अपने को जीतते हैं और फिर अपने मंत्रियों को तथा इसके अनन्तर ये क्रमश: अपने भृत्य, पुरवासी एवं शत्रुओं को जीतना चाहते हैं || १२९ || ‘इसी क्रमसे हम समुद्रपर्यन्त इस सम्पूर्ण पृथ्वी को जीत लेंगे’ ऐसी बुद्धि से मोहित हुए ये लोग अपनी निकटवर्तिनी मृत्यु को नहीं देखते ||१३० || यदि समुद्र से घिरा हुआ यह सम्पूर्ण भूमंडल अपने वश में हो ही जाय तो भी मनोजय की अपेक्षा इसका मूल्य ही क्या है ? तो मनोजय से ही प्राप्त होता है || १३१ || जिसे छोडकर इनके पूर्वज चले गये तथा जिसे अपने साथ लेकर पिता भी नहीं गये उसी मुझको अत्यंत मुर्खता के कारण ये राजालोग जीतना चाहते हैं || १३२ || जिनका चित्त ममतामय है उन पिता-पुत्र और भाइयों में अत्यंत मोह के कारण मेरे ही लिये परस्पर कलह होता है || १३३ || जो – जो राजालोग यहाँ हो चुके हैं उन सभी को ऐसी कुबुद्धि रही है कि यह सम्पूर्ण पृथ्वी मेरी ही है और मेरे पीछे यह सदा मेरी सन्तान की ही रहेगी || १३४ || इसप्रकार मेरे में ममता करनेवाले एक राजाको मुझे छोडकर मृत्यु के मुख में जाते हुए देखकर भी न जाने कैसे उसका उत्तराधिकारी अपने ह्रदय में मेरे लिये ममता को स्थान देता हैं ? || १३५ || जो राजालोग दूतों के द्वारा अपने शत्रुओं से इसप्रकार कहलाते हैं कि ‘यह पृथ्वी मेरी है तुमलोग इसे तुरंत छोडकर चले जाओ’ उनपर मुझे बड़ी हँसी आती है और फिर उन मूढोपर मुझे दया भी आ जाती है || १३६ ||

श्रीपराशयजी बोले – हे मैत्रेय ! पृथ्वीके कहे हुए इन श्लोकों को जो पुरुष सुनेगा उसकी ममता इसीप्रकार लीन हो जायगी जैसे सूर्य के तपसे समय बर्फ पिघल जाता है || १३७ || इसप्रकार मैंने तुमसे भली प्रकार मनु के वंश का वर्णन कर दिया जिस वंश के राजागण स्थितिकारक भगवान विष्णु के अंश – के – अंश थे || १३८ || जो पुरुष इस मनुवंश का क्रमश: श्रवण करता है उस शुद्धात्माके सम्पूर्ण पाप नष्ट ही जाते है || १३९ ||

जो मनुष्य जितेन्द्रिय होकर सूर्य और चन्द्रमा के इन प्रशंसनीय वंशों का सम्पूर्ण वर्णन सुनता है, वह अतुलित धन-धान्य और सम्पत्ति प्राप्त करता है || १४० || महाबलवान, महावीर्यशाली, अनंत धन संचय करनेवाले तथा परम निष्ठावान इक्ष्वाकु, जह्रु, मान्धाता, सगर, अविक्षित, रघुवंशीय राजागण तथा नहुष और ययाति आदि के चरित्रों को सुनकर, जिन्हें कि कालने आज कथामात्र ही शेष रखा है, प्रज्ञावान मनुष्य पुत्र, स्त्री, गृह, क्षेत्र और धन आदि में ममता न करेगा || १४१ – १४३ ||

जिन पुरुषश्रेष्ठों ने ऊर्ध्वबाहू होकर अनेक वर्षपर्यन्त कठिन तपस्या की थी तथा विविध प्रकार के यज्ञों का अनुष्ठान किया था, आज उन अति बलवान और वीर्यशाली राजाओं की कालने केवल कथामात्र ही छोड़ दी हैं || १४४ || जी पृथु अपने शत्रुसमूह को जीतकर स्वच्छंद-गति से समस्त लोकों में विचरता था आज वही काल-वायु की प्रेरणा से अग्नि में फेंके हुए सेमर की रुई के ढेर के समान नष्ट – भ्रष्ट हो गया है || १४५ || जो कार्तवीर्य अपने शत्रु-मंडल का संहारकर समस्त द्वीपों को वशीभूतकर उन्हें भोगता था वही आज कथा-प्रसंग से वर्णन करते समय उलटा संकल्प-विकल्पका हेतु होता है || १४६ || समस्त दिशाओं को देदीप्यमान करनेवाले रावण, अविक्षित और रामचन्द्र आदि के ऐश्वर्य को धिक्कार है | अन्यथा काल के क्षणिक कटाक्षपात के कारण आज उसका भस्ममात्र भी क्यों नहीं बच सका ? || १४७ || जो मान्धाता सम्पूर्ण भूमंडल का चक्रवर्ती सम्राट था आज उसका केवल कथा में ही पता चलता है | ऐसा कौन मंदबुद्धि होगा जो यह सुनकर अपने शरीर में भी ममता करेगा ? || १४८ || भगीरथ, सगर, ककुत्स्थ, रावण, रामचन्द्र, लक्ष्मण और युधिष्ठिर आदि पहले हो गये है यह बात सर्वथा सत्य है, किसी प्रकार भी मिथ्या नहीं है; किन्तु अब वे कहाँ है इसका हमें पता नहीं || १४९ ||

हे विप्रवर ! वर्तमान और भविष्यत्कालीन जिन-जिन महावीर्यशाली राजाओं का मैंने वर्णन किया है ये तथा अन्य लोग भी पूर्वोक्त राजाओं की भान्ति कथामात्र शेष रहेंगे || १५० ||

ऐसा जानकर पुत्र, पुत्री और क्षेत्र आदि तथा अन्य प्राणी तो अलग रहें, बुद्धिमान मनुष्य को अपने शरीर में भी ममता नहीं करनी चाहिये || १५१ ||

इति श्रीविष्णुपुराणे चतुर्थेऽशे एकोनविंशोऽध्याय: से चतुर्विशोऽध्याय:

|| इति श्रीपराशरमुनिविरचिते श्रीविष्णुपरत्वनिर्णायके श्रीमति विष्णुमहापुराणे चतुर्थोऽश: समाप्त: ||

विष्णुपुराण – चतुर्थ अंश-

Beautiful golden sunrise
ॐ श्री मन्नारायणाय नम:
नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम | देवी सरस्वती व्याप्तं ततो जयमुदिरयेत ||

श्रीविष्णुपुराण

चतुर्थ अंश

अध्याय – १६ से १८

तुर्वसु के वंश का वर्णन, द्रुह्रू – वंश और अनुवंश

श्रीपराशयजी बोले – इसप्रकार मैंने तुमसे संक्षेप से यदु के वंश का वर्णन किया || १ || अब तुर्वसु के वंशका वर्णन सुनो || २ || तुर्वसु का पुत्र वह्री था, वह्री का भार्ग, भार्ग का भानु, भानुका त्रयीसानु, त्रयीसानु का करंदम और करंदम का पुत्र मरुत्त था || ३ || मरुत्त निस्संतान था || ४ || इसलिये उसने पुरुवंशीय दुष्यंत को पुत्ररूप से स्वीकार कर लिया || ५ || इसप्रकार ययाति के शाप से तुर्वसु के वंश ने पुरुवंश का ही आश्रय लिया || ६ ||

द्रुह्यू वंश

श्रीपराशरजी बोले – द्रुह्यू का पुत्र बभ्रु था, बभ्रु का सेतु, सेतुका आरब्ध, आरब्धका गांधार, गांधार का धर्म, धर्म का घृत, घृत का दुर्दम, दुर्दम का प्रचेता तथा प्रचेता का पुत्र शतधर्म था | इसने उत्तरवर्ती बहुत-से म्लेच्छों का आधिपत्य लिया || ७ – ११ ||

अनुवंश

श्रीपराशयजी बोले – ययाति के चौथे पुत्र अनुके सभानल, चक्षु और परमेषु नामक तीन पुत्र थे | सभानल का पुत्र कालानल हुआ तथा कालानल के सृज्जय, सृज्जय के पुरुज्जय, पुरुज्जय क जनमेजय, जनमेजय के महाशाल, महाशाल के महामना और महामना के उशीनर तथा तितिक्षु नामक दो पुत्र हुए || १२- १९ ||

उशीनर के शिबि, मृग, नर, कृमि और वर्म नामक पाँच पुत्र हुए || २० || उनमें से शिबि के पृषदर्भ, सुवीर,केकय और मद्रक – ये चार पुत्र थे || २१ || तितीक्ष का पुत्र रुशद्र्थ हुआ | उसके हेम, हेम के सुतपा तथा सुतपा के बलि नामक पुत्र हुआ || २२ – २३ || इस बलि के क्षेत्र में दीर्घतमा नामक मुनिने अंग, वंग, कलिंग, सुहा और पौण्ड्र नामक पाँच वालेय क्षत्रिय उत्पन्न किये || २४ || इन बलिपुत्रों की सन्तति के नामानुसार पाँच देशों के भी ये ही नाम पड़े || २५ || इनमे से अंग से अनपान, अनपान से दिविरथ, दिविरथ से धर्मरथ और धर्मरथ से चित्ररथ का जन्म हुआ जिसका दूसरा नाम रोमपाद था | इस रोमपाद के मित्र दशरथ थे, अज के पुत्र दशरथजी ने रोमपाद को सन्तानहीन देखकर उन्हें पुत्रीरूप से अपनी शांता नामकी कन्या गोद दे दी थी || २६ – २९ ||

रोमपाद का पुत्र चतुरंग था | चतुरंग के पृथुलाक्ष तथा पृथुलाक्ष के चम्प नामक पुत्र हुआ जिसने चम्पा नामकी पुरी बसायी थी || ३० – ३१ || चम्प के हर्यंग नामक पुत्र हुआ, हर्यंग से भद्र्र्थ, भद्र्र्थ से बृहद्र्थ, बृहद्र्थ से बृहत्कर्मा, बृहत्कर्मासे बृहभ्दानु, बृहभ्दानु से बृहन्मना, बृहन्मना से जयद्रथ का जन्म हुआ || ३२ – ३३ || जयद्रथ की ब्राह्मण और क्षत्रिय के संसर्ग से उत्पन्न हुई पत्नी के गर्भ से विजय नामक पुत्र का जन्म हुआ || ३४ || विजय के धृति नामक पुत्र हुआ, धृति के धृतव्रत, धृतव्रत के सत्यकर्मा और सत्यकर्मा के अतिरथका जन्म हुआ जिसने कि गंगाजी में स्नान के लिये जानेपर पिटारी में रखकर पृथाद्वारा बहाये हुए कर्ण को पुत्ररूप से पाया था | इस कर्ण का पुत्र वृषसेन था | बस, अंगवंश इतना ही हैं || ३५ – ४० ||

इति श्रीविष्णुपुराणे चतुर्थेऽशे षोडशोऽध्यायः से अष्टादशोऽध्याय:

विष्णुपुराण-चतुर्थ अंश – १५

Beautiful golden sunrise
ॐ श्री मन्नारायणाय नम:
नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम | देवी सरस्वती व्याप्तं ततो जयमुदिरयेत ||

श्रीविष्णुपुराण

चतुर्थ अंश

अध्याय – १५

शिशुपाल के पूर्व-जन्मान्तरों का तथा वसुदेवजी की सन्तति का वर्णन

श्रीमैत्रेयजी बोले – भगवन ! पूर्वजन्मों में हिरण्यकशिपु और रावण होनेपर इस शिशुपाल ने भगवान विष्णु के द्वारा मारे जानेसे देव-दुर्लभ भोगों को तो प्राप्त किया, किन्तु यह उनमें लीन नहीं हुआ; फिर इस जन्म में ही उनके द्वारा मारे जानेपर इसने सनातन पुरुष श्रीहरि में सायुज्य मोक्ष कैसे प्राप्त किया ? || १ – २ || हे समस्त धर्मात्माओं में श्रेष्ठ मुनिवर ! यह बात सुनने की मुझे बड़ी ही इच्छा हैं | मैंने अत्यंत कुतुहलवश होकर आपसे यह प्रश्न किया है, कृपया इसका निरूपण कीजिये || ३ ||

श्रीपराशयजी बोले – प्रथम जन्म में दैत्यराज हिरण्यकशिपु का वध करने के लिये सम्पूर्ण लोकों की उत्पत्ति, स्थिति और नाश करनेवाले भगवान ने शरीर ग्रहण करते समय नृसिंहरूप प्रकट किया था || ४ || उससमय हिरण्यकशिपु के चित्त में यह भाव नहीं हुआ था कि वे विष्णुभगवान् हैं || ५ || केवल इतना ही विचार हुआ कि यह कोई निरतिशय पुण्य-समूह से उत्पन्न हुआ प्राणी है || ६ || रजोगुण के उत्कर्षसे प्रेरित हो उसकी मति दृढ़ हो गयी | अत: उसके भीतर ईश्वरीय भावनाका योग न होनेसे भगवान के द्वारा मारे जानेके कारण ही रावण का जन्म लेनेपर उसने सम्पूर्ण त्रिलोकी में सर्वाधिक भोग-सम्पत्ति प्राप्त की || ७ || उन अनादि – निधन, परब्रह्मस्वरूप, निराधार भगवान में चित्त न लगाने के कारण वह उन्हीं में लीन नहीं हुआ || ८ ||

इसीप्रकार रावण होनेपर भी कामवश जानकीजी में चित्त लग जानेसे भगवान् दशरथनन्दन राम के द्वारा मारे जानेपर केवल उनके रूपका ही दर्शन हुआ था; ‘ये अच्युत है’ ऐसी आसक्ति नहीं हुई, बल्कि मरते समय इसके अंत:करण में केवल मनुष्यबुद्धि ही रही || ९ ||

फिर श्रीअच्युत के द्वारा मारे जानेके फलस्वरूप इसने सम्पूर्ण भूमंडल में प्रशंसित चेदिराज के कुल में शिशुपालरूप से जन्म लेकर भी अक्षय ऐश्वर्य प्राप्त किया || १० || उस जन्म में वह भगवान के प्रत्येक नामों में तुच्छता की भावना करने लगा || ११ || उसका ह्रदय अनेक जन्म के द्वेशानुबंधसे युक्त था, अत: वह उनकी निंदा और तिरस्कार आदि करते हुए भगवान के सम्पूर्ण समयानुसार लीलाकृत नामों का निरंतर उच्चारण करता था || १२ || खिले हुए कमलदल के समान जिसकी निर्मल आँखे हैं, जो उज्ज्वल पीताम्बर तथा निर्मल किरीट, केयूर, हार और कटकादि धारण किये हुए है तथा जिसकी लम्बी-लम्बी चार भुजाएँ हैं और जो शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण किये हुए है, भगवान का वह दिव्य रूप अत्यंत वैरानुबंध के कारण भ्रमण, भोजन, स्नान, आसन और शबन आदि सम्पूर्ण अवस्थाओं में कभी उसके चित्त से दूर न होता था || १३ || फिर गाली देते समय उन्हीं का नामोच्चारण करते हुए और हद्रय में भी उन्हीं का ध्यान धरते हुए जिस समय वह अपने वध के लिये हाथ में धारण किये चक्र के उज्ज्वल किरणजाल से सुशोभित, अक्षय तेजस्वरूप द्वेषादि सम्पूर्ण दोषोसे रहित ब्रह्मभूत भगवान को देख रहा था || १४ || उसी समय तुरंत भगवचक्र से मारा गया; भगवत्स्मरण के कारण सम्पूर्ण पापराशि के दग्ध हो जानेसे भगवान के द्वारा उसका अंत हुआ और वह उन्हीं में लीन हो गया || १५ || इसप्रकार इस सम्पूर्ण रह्स्यका मैंने तुमसे वर्णन किया || १६ || अहो ! वे भगवान तो द्वेशानुबंध के कारण भी कीर्तन और स्मरण करने से सम्पूर्ण देवता और असुरों को दुर्लभ परमफल देते हैं, फिर सम्यक भक्तिसम्पन्न पुरुषों की तो बात ही क्या है ? || १७ ||

आनकदुन्दुभि वसुदेवजी के पौरवी, रोहिणी, मदिरा, भद्रा और देवकी आदि बहुत-सी स्रियाँ थीं || १८ || उनमें रोहिणी से वसुदेवजी ने बलभद्र, शठ, सारण और दुर्मद आदि कई पुत्र उत्पन्न किये || १९ || तथा बलभद्रजी के रेवती से विशठ और उल्मुक नामक दो पुत्र हुए || २० || सार्ष्टि, मार्ष्टि, सत्य और धृति आदि सारण के पुत्र थे || २१ || इनके अतिरिक्त भद्राश्व, भद्रबाहू, दुर्दम और भूत आदि भी रोहिणीही की सन्तान में थे || २२ || नन्द, उपनन्द और कृतक आदि मदिरा के तथा उपनिधि और गद आदि भद्रा के पुत्र थे || २३ – २४ || वैशाली के गर्भ से कौशिक नामक केवल एक ही पुत्र हुआ || २५ ||

आनकदुन्दुभि के देवकी से कीर्तिमान, सुषेण, उदायु, भद्रसेन, ऋजुदास तथा भद्रदेव नामक छ: पुत्र हुए || २६ || इन सबको कंस ने मार डाला था || २७ || पीछे भगवान की प्रेरणा से योगमायाने देवकी के सातवे गर्भ को आधी रात के समय खींचकर रोहिणी की कुक्षि में स्थापित कर दिया || २८ || आकर्षण करने से इस गर्भ का नाम संकर्षण हुआ || २९ || तदनंतर सम्पूर्ण संसाररूप महावृक्ष के मूलस्वरूप भूत, भविष्यत और वर्तमानकालीन सम्पूर्ण देव, असुर और मुनिजन की बुद्धि के अगम्य तथा ब्रह्मा और अग्नि आदि देवताओंद्वारा प्रणाम करके भूभारहरण के लिये प्रसन्न किये गये आदि मध्य और अंतहीन भगवान वासुदेव ने देवकी के गर्भ से अवतार लिया तथा उन्हीं की कृपा से बढ़ी हुई महिमावाली योगनिष्ठा भी नन्दगोप की पत्नी यशोदा के गर्भ में स्थित हुई || ३० – ३१ || उन कमलनयन भगवान के प्रकट होनेपर यह सम्पूर्ण जगत प्रसन्न हुए सूर्य, चन्द्र आदि ग्रहों से सम्पन्न सर्पादिके भय से शून्य, अधर्मादिसे रहित तथा स्वस्थचित्त हो गया || ३२ || उन्होंने प्रकट होकर इस सम्पूर्ण संसार को सन्मार्गावलम्बी कर दिया || ३३ ||

इस मर्त्यलोक में अवतीर्ण हुए भगवान की सोलह हजार एक सौ एक रानियाँ थीं || ३४ || उनमे रुक्मिणी, सत्यभामा, जाम्बवती और चारुहासिनी आदि आठ मुख्य थी || ३५ || अनादि भगवान अखिलमुर्तिने उनसे एक लाख अस्सी हजार पुत्र उत्पन्न किये || ३६ || उनमें से प्रद्युम्न, चारुदेष्ण और साम्ब आदि तेरह पुत्र प्रधान थे || ३७ || प्रद्युम्न ने भी रुक्मीकी पुत्री रुक्मवती से विवाह किया था || ३८ || उससे अनिरुद्ध का जन्म हुआ || ३९ || अनिरुद्ध ने भी रुक्मीकी पौत्री सुभद्रा से विवाह किया था || ४० || उससे वज्र उत्पन्न हुआ || ४१ || वज्र का पुत्र प्रतिबाहू तथा प्रतिबाहू का सुचारू था || ४२ || इसप्रकार सैकड़ों हजार पुरुषों की संख्यावाले यदुकुल की संतानों की गणना सौ वर्ष में भी नहीं की जा सकती || ४३ || क्योंकि इस विषय में ये दो श्लोक चरितार्थ हैं || ४४ ||

तिस्त्र: कोट्यस्सहस्त्राणामष्टाशीतिशतानि च |
कुमाराणां गृहाचार्याश्वाप्योगेषु ये रताः ||
संख्यानं यादवानां क: करिष्यति महात्मनाम |
यत्रायुतानामयुतलक्षेणास्ते सदाहुक: ||

अर्थात : जो गृहाचार्य यादवकुमारों को धनुर्विद्या की शिक्षा देने में तत्पर रहते थे उनकी संख्या तीन करोड़ अठ्ठासी लाख थी, फिर उन महात्मा यादवों की गणना तो कर ही कौन सकता है ? जहाँ हजारों और लाखों की संख्या में सर्वदा यदुराज उग्रसेन रहते थे || ४५ – ४६ ||

देवासुर-संग्राम में जो महाबली दैत्यगण मारे गये थे वे मनुष्यलोक में उपद्रव करनेवाले राजालोग होकर उत्पन्न हुए || ४७ || उनका नाश करने के लिये देवताओं ने यदुवंश में जन्म लिया जिसमें कि एक सौ एक कुल थे || ४८ || उनका नियन्त्रण और स्वामित्व भगवान विष्णु ने ही किया | वे समस्त यादवगण उनकी आज्ञानुसार ही वृद्धि को प्राप्त हुए || ४९ ||

इसप्रकार जो पुरुष इस वृष्णिवंश की उत्पत्ति के विवरण को सुनता है वह सम्पूर्ण पापों से मुक्त होकर विष्णुलोक को प्राप्त कर लेता हैं || ५० ||

इति श्रीविष्णुपुराणे चतुर्थेऽशे पंचदशोऽध्यायः

विष्णुपुराण- चतुर्थ अंश – १४

Beautiful golden sunrise
ॐ श्री मन्नारायणाय नम:
नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम | देवी सरस्वती व्याप्तं ततो जयमुदिरयेत ||

श्रीविष्णुपुराण

चतुर्थ अंश

अध्याय – १४

अनमित्र और अंधक के वंश का वर्णन

श्रीपराशरजी बोले – अनमित्र के शिनि नामक पुत्र हुआ; शिनि के सत्यक और सत्यक से सात्यकि का जन्म हुआ जिसका दूसरा नाम युयुधान था || १ – २ || तदनंतर सात्यकि के संजय, संजय के कुणि और कुणि से युगंधर का जन्म हुआ | वे सब शैनेय नामसे विख्यात हुए || ३ – ४ ||

अनमित्र के वंश में ही पृश्रिका जन्म हुआ और पृश्रिसे श्वफल्क की उत्पत्ति हुई जिसका प्रभाव पहले वर्णन कर चुके हैं | श्वफल्क का चित्रक नामक एक छोटा भाई और था || ५ – ६ || श्वफल्क के गान्दिनी से अक्रूर का जन्म हुआ || ७ || तथा उपमद्रू, मृदामृद, विश्वारि, मेजय, गिरिक्षत्र, उपक्षत्र, शतघ्न, अरिमर्दन, धर्मदृक, दृष्टधर्म, गंधमोज, वाह और प्रतिवाह नामक पुत्र तथा सुतारानाम्री कन्याका जन्म हुआ || ८ – ९ || देववाण और उपदेव ये दो अक्रूर के पुत्र थे || १० || तथा चित्रक के पृथु, विपृथु आदि अनेक पुत्र थे || ११ ||

कुकुर, भजमान, शुचिकम्बल और बर्हिष ये चार अंधक के पुत्र हुए || १२ || इनमें से कुकुर से धृष्ट, धृष्ट से कपोतरोमा, कपोतरोमासे विलोमा तथा विलोमा से तुम्बुरु के मित्र अनुका जन्म हुआ || १३ || अनुसे आनकदुन्दुभि, उससे अभिजित, अभिजित से पुनर्वसु और पुनर्वसु से आहुक नामक पुत्र और आहुकीनाम्री कन्या का जन्म हुआ || १४ – १५ || आहुक के देवक और उग्रसेन नामक दो पुत्र हुए || १६ || उनमें से देवक के देववान उपदेव, सहदेव और देवरक्षित नामक चार पुत्र हुए || १७ || इन चारों की वृकदेवा, उपदेवा, देवरक्षिता, श्रीदेवा, शान्तिदेवा, सहदेवा और देवकी ये सात भगिनियों थीं || १८ || ये सब वसुदेवजी को विवाही गयी थी || १९ || उग्रसेन के भी कंस, न्ययोध, सुनाम, आनकाह्र, शंकु, सुभूमि, राष्ट्रपाल, युद्धतुष्टि और सुतुष्टिमान नामक पुत्र तथा कंसा, कंसवती, सुतनु और राष्ट्रपालिका नामकी कन्याएँ हुई || २० – २१ ||

भजमान का पुत्र विदूरथ हुआ; विदूरथ के शूर, शूर के शमी, शमी के प्रतिक्षत्र, प्रतिक्षत्र के स्वयंभोज, स्वयंभोज के ह्र्दिक तथा ह्र्दिक के कृतवर्मा, शतधन्वा, देवार्ह और देवगर्भ आदि पुत्र हुए | देवगर्भ के पुत्र शूरसेन थे || २२ – २५ || शूरसेन की मारिषा नामकी पत्नी थी | उससे उन्होंने वसुदेव आदि दस पुत्र उत्पन्न किये || २६ – २७ || वसुदेव के जन्म लेते ही देवताओं ने अपनी अव्याहत दृष्टि से यह देखकर कि इनके घर में भगवान अंशावतार लेंगे, आनक और दुन्दुभि आदि बाजे बजाये थे || २८ || इसीलिये इनका नाम आनकदुन्दुभि भी हुआ || २९ || इनके देवभाग, देवश्रवा, अष्टक, कुकुचंक, वत्सधारक, सृजय, श्याम, शमिक और गंडूष नामक नौ भाई थे || ३० || तथा इन वसुदेव आदि दस भाइयों की पृथा, श्रुतदेवा, श्रुतकीर्ति, श्रुतश्रवा और राजाधिदेवी ये पाँच बहिने थी || ३१ ||

शूरसेन के कुन्ति नामक एक मित्र थे || ३२ || वे नि:सन्तान थे, अत: शूरसेन से दत्तक-विधिसे उन्हें अपनी पृथा नामकी कन्या दे दी थी || ३३ || उसका राजा पांडू के साथ विवाह हुआ || ३४ || उसके धर्म, वायु और इंद्र के द्वारा क्रमशल युधिष्ठिर, भीमसेन और अर्जुन नामक तीन पुत्र हुए || ३५ || इनके पहले इसके अविवाहितावस्था में ही भगवान् सूर्य के द्वारा कर्ण नामक एक कानीन पुत्र [ अविवाहिता कन्या के गर्भ से हुए पुत्र को कानीन कहते हैं |] और हुआ था || ३६ || इसकी माद्री नामकी एक सपत्नी थी || ३७ || उसके अश्विनीकुमारोंद्वारा नकुल और सहदेव नामक पांडू के दो पुत्र हुए || ३८ ||

शूरसेन की दूसरी कन्या श्रुतदेवा का कारुश – नरेश वृद्धधर्मा से विवाह हुआ था || ३९ || उससे दन्तवक्र नामक महादैत्य उप्तन्न हुआ || ४० || श्रुतकीर्ति को केकयराज ने विवाहा था || ४१ || उससे केकय – नरेश के संतर्दंन आदि पाँच पुत्र हुए || ४२ || राजाधिदेवी से अवन्तिदेशीय विन्द और अनुविन्द का जन्म हुआ || ४३ || श्रुतश्रवा का भी चेदिराज दमघोष ने पानिग्रहण किया || ४४ || उससे शिशुपाल का जन्म हुआ || ४५ || पूर्वजन्म में यह अतिशय पराक्रमी हिरण्यकशिपु नामक दैत्यों का मूल पुरुष हुआ था जिसे सकल लोकगुरु भगवान नृसिंह ने मारा था || ४६ – ४७ || तदनन्तर यह अक्षय, वीर्य, शौर्य, सम्पत्ति और पराक्रम आदि गुणों से सम्पन्न तथा समस्त त्रिभुवन के स्वामी इंद्र के भी प्रभाव को द्वानेवाला दशानन हुआ || ४८ || स्वयं भगवान के हाथसे ही मारे जाने के पुण्य से प्राप्त हुए नाना भोगों को वह बहुत समयतक भोगते हुए अंत में राघवरूपधारी भगवान के ही द्वारा मारा गया || ४९ || उसके पीछे यह चेदिराज दमघोष का पुत्र शिशुपाल हुआ || ५० || शिशुपाल होनेपर भी वह भू-भार-हरण के लिये अवतीर्ण हुए भगवदंशस्वरुप भगवान पुण्डरीकाक्ष में अत्यंत द्वेषबुद्धि करने लगा || ५१ || अंत में भगवान के हाथ से ही मारे जानेपर उन परमात्मा में ही मन लगे रहने के कारण सायुज्य – मोक्ष प्राप्त किया || भगवान यदि प्रसन्न होते है तब जिसप्रकार यथेच्छ फल देते है, उसी प्रकार अप्रसन्न होकर मारनेपर भी वे अनुपम दिव्यलोक की प्राप्ति कराते हैं || ५३ ||

इति श्रीविष्णुपुराणे चतुर्थेऽशे चतुर्दशोऽध्यायः

विष्णुपुराण – चतुर्थ अंश – ९ से १३

Beautiful golden sunrise
ॐ श्री मन्नारायणाय नम:
नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम | देवी सरस्वती व्याप्तं ततो जयमुदिरयेत ||

श्रीविष्णुपुराण

चतुर्थ अंश

अध्याय – ९ से १३

सत्वतकी सन्तति का वर्णन और स्यमन्तकमणि की कथा

श्रीपराशरजी बोले – सत्वत के भजन, भजमान, दिव्य, अंधक, देवावृध महाभोज और वृष्णि नामक पुत्र हुए || १ || भजमान के निमि, कृकण और वृष्णि तथा इनके तीन सौतेले भाई शतजित, सहस्त्रजित और अयुतजित – ये छ: पुत्र हुए || २ || देवावृध के बभ्रु नामक पुत्र हुआ || ३ || इन दोनों (पिता-पुत्रों ) के विषय में यह श्लोक प्रसिद्ध है || ४ ||

जैसा हमने दूरसे सुना था वैसा ही पास जाकर भी देखा; वास्तव में बभ्रु और देवावृध से क्रमश: छ: हजार चौहत्तर मनुष्यों ने अमरपद प्राप्त किया था || ६ ||

महाभोज बड़ा धर्मात्मा था, उसकी सन्तान में भोजवंशी तथा मृत्तिकावरपुर निवासी मार्तिकावर नृपतिगण हुए || ७ || वृष्णि के दो पुत्र सुमित्र और युधाजित हुए, उनमें से सुमित्र के अनमित्र, अनमित्र के निघ्र तथा निघ्रसे प्रसेन और सत्राजित का जन्म हुआ || ८ – १० ||

स्यमन्तकमणि की कथा

उस सत्राजित के मित्र भगवान आदित्य हुए || ११ || एक दिन समुद्र – तटपर बैठे हुए सत्राजित ने सूर्यभगवान् की स्तुति की | उसके तन्मय होकर स्तुति करने से भगवान भास्कर उसके सम्मुख प्रकट हुए || १२ || उस समय उनको अस्पष्ट मूर्ति धारण किये हुए देखकर सत्राजित ने सूर्य से कहा || १३ || आकाश में अग्निपिण्ड के समान आपको जैसे मैंने देखा है वैसा ही सम्मुख आनेपर भी देख रहा हूँ | यहाँ आपकी प्रसादस्वरूप कुछ विशेषता मुझे नहीं दीखती | सत्राजित ने ऐसा कहनेपर भगवान सूर्य ने अपने गले से स्यमन्तक नामकी उत्तम महामणि उतारकर अलग रख दी || १४ ||

तब सत्राजित ने भगवान सूर्य को देखा – उनका शरीर किंचित ताम्रवर्ण, अति उज्ज्वल और लघु था तथा उनके नेत्र कुछ पिंगलवर्ण थे || १५ || तदनन्तर सत्राजित ने प्रणाम तथा स्तुति आदि कर चुकनेपर सह्स्त्रांशु भगवान आदित्य ने उससे कहा – तुम अपना अभीष्ट वर माँगो || १६ || सत्राजित ने उस स्यमन्तकमणि को ही माँगा || १७ || तब भगवान सूर्य उसे वह मणि देकर अन्तरिक्ष में अपने स्थान को चले गये || १८ ||

फिर सत्राजित ने उस निर्मल मणिरत्न से अपना कंठ सुशोभित होने के कारण तेजसे सूर्य के समान समस्त दिशाओं को प्रकाशित करते हुए द्वारका में प्रवेश किया || १९ || द्वारकावासी लोगोंने उसे आते देख, पृथ्वीका भार उतारने के लिये अंशरूप से अवतीर्ण हुए मनुष्यरूपधारी आदिपुरुष भगवान पुरुषोत्तम से प्रणाम करके कहा || २० || ‘भगवन ! आपके दर्शनों के लिये निश्चय ही ये भगवान सूर्यदेव आ रहे हैं “ उनके ऐसा कहनेपर भगवान ने उनसे कहा || २१ || “ ये भगवान सूर्य नहीं हैं, सत्राजित है | यह सूर्यभगवान से प्राप्त हुई स्यमन्तक नामकी महामणि को धारणकर यहाँ आ रहा है || २२ || तुमलोग अब विश्वस्त होकर इसे देखो |” भगवान के ऐसा कहनेपर द्वारकावासी उसे उसी प्रकार देखने लगे || २३ ||

सत्राजित ने वह स्यमन्तकमणि अपने घर में रख दी || २४ || वह मणि प्रतिदिन आठ भार सोना देती थी || २५ || उसके प्रभाव से सम्पूर्ण राष्ट्र में रोग, अनावृष्टि तथा सर्प, अग्नि, चोर या दुर्भिक्ष आदि का भय नहीं रहता था || २६ || भगवान अच्युत को भी ऐसी इच्छा हुई कि यह दिव्य रत्न तो राजा उग्रसेन के योग्य है || २७ || किन्तु जातीय विद्रोह के भय से समर्थ होते हुए भी उन्होंने उसे छीना नहीं || २८ ||

सत्राजित को जब यह मालुम हुआ कि भगवान मुझसे यह रत्न माँगनेवाले हैं तो उसने लोभवश उसे अपने भाई प्रसेन को दे दिया || २९ || किन्तु इस बात को न जानते हुए कि पवित्रापूर्वक धारण करने से तो यह मणि सुवर्ण – दान आदि अनेक गुण प्रकट करती है और अशुद्धावस्था में धारण करने से घातक हो जाती है, प्रसेन उसे अपने गले में बाँधे हुए घोडेपर चढकर मृगया के लिये वन को चला गया || ३० || वहाँ उसे एक सिंह ने मार डाला || ३१ || जब वह सिंह घोड़े के सहित उसे मारकर उस निर्मल मणि को अपने मुँह में लेकर चलने को तैयार हुआ तो उसी समय ऋक्षराज जाम्बवान ने उसे देखकर मार डाला || ३२ || तदनन्तर उस निर्मल मणिरत्न को लेकर जाम्बवान अपनी गुफा में आया || ३३ || और उसे सुकुमार नामक अपने बालक के लिये खिलौना बना लिया || ३४ ||

प्रसेन के न लौटनेपर सब यादवों में आपस में यह कानाफूंसी होने लगी कि “कृष्ण इस मनिरत्न को लेना चाहते थे, अवश्य ही इन्हींने उसे ले लिया है – निश्चय यह इन्हीं का काम है” || ३५ ||

इस लोकापवाद का पता लगनेपर सम्पूर्ण यादवसेना के सहित भगवान ने प्रसेन के घोड़े के चरण चिन्हों का अनुसरण किया और आगे जाकर देखा कि प्रसेन को घोड़ेसहित सिंह ने मार डाला है || ३६ – ३७ || फिर सब लोगों ने बीच सिंह के चरण-चिन्ह देख लिये जाने से अपनी सफाई हो जानेपर भी भगवान ने उन चिन्हों का अनुसरण किया और थोड़ी ही दूरीपर ऋक्षराजद्वारा मारे हुए सिंह को देखा; किन्तु उस रत्न के महत्त्व के कारण उन्होंने जाम्बुवान के पद-चिन्हों का भी अनुसरण किया || ३८ – ३९ || और सम्पूर्ण यादव सेना को पर्वत के तटपर छोडकर ऋक्षराज के चरणों का अनुसरण करते हुए स्वयं उनकी गुफा में घुस गये || ४० ||

भीतर जानेपर भगवान ने सुकुमार को बहलाती हुई धात्री की यह वाणी सुनी || ४१ || सिंहने प्रसेन को मारा और सिंह को जाम्बवान ने; हे सुकुमार ! तू रो मत यह स्यमन्तकमणि तेरी ही है || ४२ ||

यह सुननेसे स्यमन्तकका पता लगनेपर भगवान ने भीतर जाकर देखा कि सुकुमार के लिये खिलौना बनी हुई स्यमन्तकमणि धात्री के हाथपर अपने तेजसे देदीप्यमान हो रही है || ४३ || स्यमन्तकमणि की ओर अभिलाषापूर्ण दृष्टि से देखते हुए एक विलक्षण पुरुष को वहाँ आया देख धात्री ‘त्राहि – त्राहि’ करके चिल्लाने लगी || ४४ ||

उसकी आर्त-वाणी को सुनकर जाम्बवान क्रोधपूर्ण ह्रदयसे वहाँ आया | फिर परस्पर रोष बढ़ जानेसे उन दोनों का इक्कीस दिनतक घोर युद्ध हुआ || ४६ || पर्वत के पास भगवान की प्रतीक्षा करनेवाले यादव-सैनिक सात-आठ दिनतक उनके गुफासे बाहर आनेकी बाट देखते रहे || ४७ || किन्तु जब इतने दिनोंतक वे उसमें से न निकले तो उन्होंने समझा कि ‘अवश्य ही श्रीमधुसूदन इस गुफामें मारे गये नहीं तो जीवित रहनेपर शत्रुके जीतने में उन्हें इतने दिन क्यों लगते ?’ ऐसा निश्चय कर वे द्वारका में चले आये और वहाँ कह दिया कि श्रीकृष्ण मारे गये || ४८ || उनके बन्धुओं ने यह सुनकर समयोचित सम्पूर्ण और्ध्वदैहिक कर्म कर दिये || ४९ ||

इधर, अति श्रद्धापूर्वक दिये हुए विशिष्ट पात्रोंसहित इनके अन्न और जलसे युद्ध करते समय श्रीकृष्णचन्द्र के बल और प्राण की पुष्टि हो गयी || ५० || तथा अति महान पुरुष के द्वारा मर्दित होते हुए उनके अत्यंत निष्ठुर प्रहरों के आघात से पीड़ित शरीरवाले जाम्बवान का बल निराहार रहने से क्षीण हो गया || ५१ || अंत में भगवान से पराजित होकर जाम्बवान ने उन्हें प्रणाम करके कहा || ५२ || “भगवन ! आपको तो देवता, असुर, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस आदि कोई भी नहीं जीत सकते, फिर पृथ्वीतलपर रहनेवाले अल्पवीर्य मनुष्य अथवा मनुष्यों के अवयवभूत हम-जैसे तिर्यक-योनिगत जीवों की तो बात ही क्या है ? अवश्य ही आप हमारे प्रभु श्रीरामचन्द्रजी के समान सकल लोक-प्रतिपालक भगवान नारायण के ही अंश से प्रकट हुए है |” जाम्बवान के ऐसा कहनेपर भगवान ने पृथ्वीका भार उतारने के लिये अपने अवतार लेने का सम्पूर्ण वृतांत उससे कह दिया और उसे प्रीतिपूर्वक अपने हाथसे छूकर युद्ध के श्रम से रहित कर दिया || ५३- ५४ ||

तदनन्तर जाम्बवान ने पुन: प्रणाम करके उन्हें प्रसन्न किया और घरपर आये हुए भगवान के लिये अर्घ्यस्वरूप अपनी जाम्बवती नामकी कन्या दे दी तथा उन्हें प्रणाम करके मणिरत्न स्यमन्तक भी दे दिया || ५५- ५६ || भगवान अच्युत ने भी उस अति विनीतसे लेने योग्य न होनेपर भी अपने कलंक-शोधन के लिये वह मणिरत्न ले लिया और जाम्बवती के सहित द्वारका में आये || ५७ – ५८ ||

उससमय भगवान कृष्णचन्द्र के आगमन से जिनके हर्ष का वेग अत्यंत बढ़ गया है उन द्वाकवासियों में से बहुत ढली हुई अवस्थावालों में भी उनके दर्शन के प्रभाव से तत्काल ही मानो नवयौवन का संचार हो गया || ५९ || तथा सम्पूर्ण यादवगण और उनकी स्त्रियाँ ‘अहोभाग्य ! अहोभाग्य !!’ ऐसा कहकर उनका अभिवादन करने लगी || ६० || भगवान ने भी जो – जो बात जैसे – जैसे हुई थी वह ज्यों – की – त्यों यादव समाज में सूना दी और सत्राजित को स्यमन्तकमणि देकर मिथ्या कलंक से छुटकारा पा लिया | फिर जाम्बवती को अपने अंत:पुर में पहुँचा दिया || ६१ – ६३ ||

सत्राजित ने भी यह सोचकर कि मैंने ही कृष्णचन्द्र को मिथ्या कलंक लगाया था, डरते – डरते उन्हें पत्नीरूप से अपनी कन्या सत्यभामा विवाह दी || ६४ || उस कन्या को अक्रूर, कृतवर्मा और शतधन्वा आदि यादवों ने पहले वरण किया था || ६५ || अत: श्रीकृष्णचन्द्र के साथ उसे विवाह देने से उन्होंने अपना अपमान समझकर सत्राजित से वैर बाँध लिया || ६६ ||

तदनन्तर अक्रूर और कृतवर्मा आदिने शतधन्वा से कहा || ६७ || ‘यह सत्राजित बड़ा ही दुष्ट है, देखो, इसने हमारे और आपके माँगनेपर भी हमलोगों को कुछ भी न समझकर अपनी कन्या कृष्णचन्द्र को दे दी || ६८ || अत: अब इसके जीवन का प्रयोजन ही क्या है; इसको मारकर अआप स्यमन्तक महामणि क्यों नहीं ले लेते हैं ? पीछे, यदि अच्युत आपसे किसी प्रकार का विरोध करेंगे तो हमलोग भी आपका साथ देंगे |’ उनके ऐसा कहनेपर शतधन्वा ने कहा – ‘बहुत अच्छा, ऐसा ही करेंगे’ || ६९ ||

इसी समय पांडवों के लाक्षागृह में जलनेपर, यथार्थ बात को जानते हुए भी भगवान कृष्णचन्द्र दुर्योधन के प्रयन्त को शिथिल करने के उद्देश्य से कुलोचित कर्म करने के लिये वारणावत नगर को गये || ७० ||

उनके चले जानेपर शतधन्वा ने सोते हुए सत्राजित को मारकर वह मणिरत्न ले लिया || ७१ || पिता के वध से क्रोधित हुई सत्यभामा तुरंत ही रथपर चढकर वारणावत नगर में पहुँची और भगवान कृष्ण से बोली, “भगवन ! पिताजी ने मुझे आपके करकमलों में सौंप दिया – इस बात को सहन न कर सकने के कारण शतधन्वा ने मेरे पिताजी को मार दिया है और उस स्यमन्तक नामक मणिरत्न को ले लिया है जिसके प्रकाश से सम्पूर्ण त्रिलोकी भी अन्धकारशून्य हो जायगी || ७२ || इसमें आपही की हँसी हैं इसलिये सब बातों का विचार करके जैसा उचित समझें, करें” || ७३ ||

सत्यभामा के ऐसा कहनेपर भगवान श्रीकृष्ण ने मन-ही-मन प्रसन्न होनेपर भी उनसे क्रोध से आँखें लाल करके कहा || ७४ || सत्ये ! अवश्य इसमें मेरी ही हँसी हैं, उस दुरात्मा के इस कुकर्म को मैं सहन नहीं कर सकता, क्योंकि यदि ऊँचे वृक्ष का उल्लंघन न किया जा सके तो उसपर घोंसला बनाकर रहनेवाले पक्षियों को नहीं मार दिया जाता [ अर्थात बड़े आदमियों से पार न पानेप्र उनके आश्रितों को नहीं दबाना चाहिये | ] इसलिये अब तुम्हे हमारे सामने इन शोक-प्रेरित वाक्यों के कहने की और आवश्यकता नहीं है | सत्यभामा से इसप्रकार कह भगवान् वासुदेव ने द्वारका में आकर श्रीबलदेवजी से एकांत में कहा || ७५ – ७६ || ‘वन में आखेटके लिये गये हुए प्रसेन को तो सिंह ने मार दिया था || ७७ || अब शतधन्वा ने सत्राजित को भी मार दिया है || ७८ || इसप्रकार उन दोनों के मारे जानेपर मणिरत्न स्यमन्तकपर हम दोनों का समान अधिकार होगा || ७९ || इसलिये उठिये और रथपर चढकर शतधन्वा के मारने का प्रयत्न कीजिये | कृष्णचन्द्र के ऐसा कहनेपर बलदेवजी ने भी ‘बहुत अच्छा’ कह उसे स्वीकार किया || ८० ||

कृष्ण और बलदेव को उद्यत जान शतधन्वा ने कृतवर्मा के पास जाकर सहायता के लिये प्रार्थना की || ८१ || तब कृतवर्मा ने इससे कहा || ८२ || मैं बलदेव और वासुदेव से विरोध करने में समर्थ नहीं हूँ | उसके ऐसा कहनेपर शतधन्वा ने अक्रूर से सहायता माँगी, तो अक्रूर ने भी कहा – || ८३ – ८४ || जो अपने पाद – प्रहर से त्रिलोकी को कम्पायमान कर देते हैं, देवशत्रु असुरगण की स्त्रियों को वैधव्यदान देते हैं तथा अति प्रबल शत्रु – सेनासे भी जिनका चक्र अप्रतिहत रहता है उन चक्रधारी भगवान वासुदेव से तथा जो अपने मदोन्मटत नयनों की चितवन से सबका दमन करनेवाले और भयंकर शत्रुसमूहरूप हाथियों को खींचने के लिये अखंड महिमाशाली प्रचंड हल धारण करनेवाले हैं उन श्रीहलधर से युद्ध करने में तो निखिल – लोक – वन्दनीय देवगण में भी कोई समर्थ नहीं हैं फिर मेरी तो बात ही क्या हैं ? || ८५ || इसलिये तुम दूसरे की शरण लो, अक्रूर के ऐसा कहनेपर शतधन्वा ने कहा || ८६ || ‘अच्छा, यदि मेरी रक्षा करने में आप अपने को सर्वथा असमर्थ समझते हैं तो मैं आपको यह मणि देता हूँ इसे लेकर इसीकी रक्षा कीजिये || ८७ || इसपर अक्रूर ने कहा || ८८ || ‘मैं इसे तभी ले सकता हूँ जब कि अन्तकाल उपस्थित होनेपर भी तुम किसीसे भी यह बात न कहो’ || ८९ || शतधन्वा ने कहा – ऐसा ही होगा | इसपर अक्रूर ने वह मणिरत्न अपने पास रख लिया || ९० ||

तदनन्तर शतधन्वा सौ योजनतक जानेवाली एक अत्यंत वेगवती घोड़ीपर चढकर भागा || ९१ || और शैव्य, सुग्रीव, मेघपुष्प तथा बलाहक नामक चार घोड़ोंवाले रथपर चढकर बलदेव और वासुदेव ने भी उसका पीछा किया || ९२ || सौ योजन मार्ग पर कर जानेपर पुन: आगे ले जाने से उस घोड़ी ने मिथिला देश के वन में प्राण छोड़ दिये || ९३ || तब शतधन्वा उसे छोडकर पैदल ही भागा || ९४ || उससमय श्रीकृष्णचन्द्र ने बलभद्रजी से कहा || ९५ || आप अभी रथ में ही रहिये मैं इस पैदल दौड़ते हुए दुराचारी को पैदल जाकर ही मारे डालता हूँ | यहाँ दोषों को देखने से घोड़े भयभीत हो रहे हैं, इसलिये आप इन्हें और आगे न बढाइयेगा || ९६ || तब बलदेवजी ‘अच्छा’ ऐसा कहकर रथ में ही बैठे रहे || ९७ ||

श्रीकृष्णचन्द्र ने केवल दो ही कोसतक पीछाकर अपना चक्र फेंक दूर होनेपर भी शतधन्वा का सिर काट डाला || ९८ || किन्तु उसके शरीर और वस्त्र आदि में बहुत कुछ ढूँढनेपर भी जब स्यमन्तकमणि को न पाया तो बलभद्राजी के पास जाकर उनसे कहा || ९९ || हमने शतधन्वा को व्यर्थ ही मारा, क्योंकि उसके पास सम्पूर्ण संसार की सारभूत स्यमन्तकमणि तो मिली ही नहीं | यह सुनकर बलदेवजी ने [यह समझकर कि श्रीकृष्णचन्द्र उस मणि को छिपाने के लिये ही ऐसी बातें बना रहे हैं ] क्रोधपूर्वक भगवान वासुदेव से कहा || १०० || “तुमको धिक्कार हैं, तुम बड़े ही अर्थलोलुप हो; भाई होने के कारण ही मैं तुम्हे क्षमा किये देता हूँ | तुम्हारा मार्ग खुला हुआ है, तुम ख़ुशी से जा सकते हो | अब मुझे तो द्वारका से, तुमसे अथवा और सब सगे – सम्बन्धियों से कोई काम नहीं है | बस, मेरे आगे इन थोथी शपथों का अब कोई प्रयोजन नहीं |” इसप्रकार उनकी बातको काटकर बहुत कुछ मनानेपर भी वे वहाँ न रुके और विदेहनगर को चले गये || १०१ – १०२ ||

विदेहनगर में पहुँचनेपर राजा जनक उन्हें अर्घ्य देकर अपने घर ले आये और वे वहीँ रहने लगे || १०३ – १०४ || इधर, भगवान वासुदेव द्वारका में चले आये || १०५ || जितने दिनोंतक बलदेवजी राजा जनक के यहाँ रहे उतने दिनतक घृतराष्ट्र का पुत्र दुर्योधन उनसे गदायुद्ध सीखता रहा || १०६ || अनन्तर, बभ्रु और उग्रसेन आदि यादवों के, जिन्हें यह ठीक मालुम था कि ‘कृष्ण एन स्यमन्तकमणि नहीं ली है’, विदेहनगर में जाकर शपथपूर्वक विश्वास दिलानेपर बलदेवजी तीन वर्ष पश्चात द्वारका में चले आये || १०७ ||

अक्रूरजी भी भगवद्धयान – परायण रहते हुए उस मणिरत्न से प्राप्त सुवर्ण के द्वारा निरंतर यज्ञानुष्ठान करने लगे || १०८ || यज्ञ-दीक्षित क्षत्रिय और वैश्यों के मारने से ब्रह्महत्या होती है, इसलिये अक्रूरजी सदा यज्ञदीक्षारूप कवच धारण ही किये रहते थे || १०९ || उस मणि के प्रभाव से बासष्ठ वर्षतक द्वारकामें रोग, दुर्भिक्ष, महामारी या मृत्यु आदि नहीं हुए || ११० || फिर अक्रूर-पक्षीय भोज-वंशियोद्वारा सात्वतके प्रपौत्र शत्रुघ्न के मारे जानेपर भोजों के साथ अक्रूर भी द्वारका को छोडकर चले गये || १११ || उनके जाते ही, उसी दिनसे द्वारका में रोग, दुर्भिक्ष, सर्प, अनावृष्टि और मरी आदि उपद्रव होने लगे || ११२ ||

तब गरुडध्वज भगवान कृष्ण बलभद्र और उग्रसेन आदि यदुवंशियोंके साथ मिलकर सलाह करने लगे || ११३ || इसका क्या कारण हैं जो एक साथ ही इतने उपद्रवों का आगमन हुआ, इसपर विचार करना चाहिये | उनके ऐसा कहनेपर अंधक नामक एक वृद्ध यादव ने कहा || ११४ || ‘अक्रूर के पिता श्वफल्क जहाँ – जहाँ रहते थे वहाँ – वहाँ दुर्भिक्ष, महामारी और अनावृष्टि आदि उपद्रव कभी नहीं होते थे || ११५ || एक बार काशिराज के देशमें अनावृष्टि हुई थी | तब श्वफल्क को वहाँ ले जाते ही तत्काल वर्षा होने लगी || ११६ ||

उससमय काशिराज की रानी के गर्भ में एक कन्यारत्न थी || ११७ || वह कन्या प्रसूतिकाल के समाप्त होनेपर भी गर्भ से बाहर न आयी || ११८ || इसप्रकार उस गर्भ को प्रसव हुए बिना बारह वर्ष व्यतीत हो गये || ११९ || तब काशिराज ने अपनी उस गर्भस्थिता पुत्रीसे कहा || १२० || बेटी ! तू उत्पन्न क्यों नहीं होती ? बाहर आ, मैं तेरा मुख देखना चाहता हूँ || १२१ || अपनी इस माता को तू इतने दिनों से क्यों कष्ट दे रही है ? राजा के ऐसा कहनेपर उसने गर्भ से रहते हुए ही कहा – ‘पिताजी ! यदि आप प्रतिदिन एक गौ ब्राह्मण को दान देंगे तो अगले तीन वर्ष बीतनेपर मैं अवश्य गर्भ से बाहर आ जाऊँगी |’ इस बातको सुनकर राजा प्रतिदिन ब्राह्मण को एक गौ देने लगे || १२२ || तब उतने समय (तीन वर्ष) बीतनेपर वह उत्पन्न हुई || १२३ ||

पिताने उसका नाम गान्दिनी रखा || १२४ || और उसे अपने उपकारक श्वफल्क को, घर आनेपर अर्घ्यरूप से दे दिया || १२५ || उसीसे श्वफल्क के द्वारा इन अक्रूरजी का जन्म हुआ है || १२६ || इनकी ऐसी गुणवान माता-पितासे उत्पत्ति हैं तो फिर उनके चले जानेसे यहाँ दुर्भिक्ष और महामारी आदि उपद्रव क्यों न होंगे ? || १२७ – १२८ || अत: उनको यहाँ ले आना चाहिये, अति गुणवान के अपराध की अधिक जाँच – परताल करना ठीक नहीं है | यादववृद्ध अन्धकार के ऐसे वचन सुनकर कृष्ण, उग्रसेन और बलभद्र आदि यादव श्वफल्कपुत्र अक्रूर के अपराध को भुलाकर उन्हें अभयदान देकर अपने नगर में ले आये || १२९ || उनके वहाँ आते ही स्यमन्तकमणि के प्रभाव से अनावृष्टि, महामारी, दुर्भिक्ष और सर्पभय आदि सभी उपद्रव शांत हो गये || १३० ||

तब श्रीकृष्णचन्द्र ने विचार किया || १३१ || अक्रूर का जन्म गान्दिनी से श्वफल्क के द्वारा हुआ है यह तो बहुत सामान्य कारण है || १३२ || किन्तु अनावृष्टि, दुर्भिक्ष, महामारी आदि उपद्रवों को शांत कर देनेवाला इसका प्रभाव तो अति महान है || १३३ || अवश्य ही इसके पास वह स्यमन्तक नामक महामणि हैं || १३४ || उसीका ऐसा प्रभाव सुना जाता है || १३५ || इसे भी हम देखते हैं कि एक यज्ञ के पीछे दूसरा और दूसरे के पीछे तीसरा इस प्रकार निरंतर अखंड यज्ञानुष्ठान करता रहता हैं || १३६ || और इसके पास यज्ञ के साधन [ धन आदि] भी बहुत कम हैं; इसलिये इसमें संदेह नहीं कि इसके पास स्यमन्तकमणि अवश्य है | ऐसा निश्चयकर किसी और प्रयोजन के उद्देश्यसे उन्होंने सम्पूर्ण यादवों को अपने महल में एकत्रित किया || १३७ ||

समस्त यदुवंशियों के वहाँ आकर बैठ जाने के बाद प्रथम प्रयोजन बताकर उसका उपसंहार होनेपर प्रसंगान्तर से अक्रूर के साथ परिहास करते हुए भगवान कृष्ण ने उनसे कहा || १३८ || हे दानपते ! जिस प्रकार शतधन्वा ने तुम्हे सम्पूर्ण संसार की सारभूत वह स्यमन्तक नामकी महामणि सौंपी थी वह हमें सब मालुम है | वह सम्पूर्ण राष्ट्र का उपकार करती हुई तुम्हारे पास हैं तो रहे, उसके प्रभाव का फल तो हम सभी भोगते हैं, किन्तु ये बलभद्रजी हमारे ऊपर संदेह करते थे, इसलिये हमारी प्रसन्नता के लिये आप एक बार उसे दिखला दीजिये | भगवान वासुदेव के ऐसा कहकर चुप हो जानेपर रत्न साथ ही लिये रहने के कारण अक्रूरजी सोचने लगे || १३९ || अब मुझे क्या करना चाहिये, यदि और किसी प्रकार कहता हूँ तो केवल वस्त्रों के ओटमे टटोलनेपर ये उसे देख ही लेंगे और इनसे अत्यंत विरोध करनेमें हमारा कुशल नहीं है | ऐसा सोचकर निखिल संसार के कारणस्वरूप श्रीनारायणसे अक्रूरजी बोले || १४० || ‘भगवन ! शतधन्वाने मुझे वह मणि सौंप दी थी | उसके मर जानेपर मैंने यह सोचते हए बड़ी ही कठिनता से इसे इतने दिन अपने पास रखा है कि भगवान आज, कल या परसों इसे माँगेगे || १४१ || इसकी चौकसी के क्लेश से सम्पूर्ण भोगों में अनासक्तचित्त होनेके कारण मुझे सुख का लेशमात्र भी नहीं मिला || १४२ || भगवान ये विचार करते कि, यह सम्पूर्ण राष्ट्र के उपकारक इतने-से भार को भी नहीं उठा सकता, इसलिये स्वयं मैंने आपसे कहा नहीं || १४३ || अब, लीजिये आपकी वह स्यमन्तकमणि यह रही, आपकी जिसे इच्छा हो उसे ही इसे दे दीजिये || १४४ ||

तब अक्रूरजी ने अपने कटि – वस्त्र में छिपाई हुई एक छोटी-सी सोने की पिटारी में स्थित वह स्यमन्तकमणि प्रकट की और उस पिटारी से निकालकर यादवसमाज में रख दि || १४५ – १४६ || उसके रखते ही वह सम्पूर्ण स्थान उसकी तीव्र कान्ति से देदीप्यमान होने लगा || १४७ || तब अक्रूरजी ने कहा, ‘मुझे यह मणि शतधन्वाने दी थी, यह जिसकी हो वह ले ले || १४८ ||

उसको देखनेपर सभी यादवों का विस्मयपूर्वक ‘साधु , साधु’ यह वचन सुना गया || १४९ || उसे देखकर बलभद्रजी ने ‘अच्युत के ही समान इसपर मेरा भी अधिकार हैं’ इसप्रकार अपनी अधिक स्पृहा दिखलाई || १५० || तथा ‘यह मेरी ही पैतृक सम्पत्ति है’ इस तरह सत्यभामा ने भी उसके लिये अपनी उत्कट की || १५१ || बलभद्र और सत्यभामा को देखकर कृष्णचन्द्र ने अपने को बैल और पहिये के बीच में पड़े हुए जीवके समान दोनों ओरसे संकटग्रस्त देखा || १५२ || और समस्त यादवों के सामने वे अक्रूरजी से बोले || १५३ || ‘इस मणिरत्न को मैंने अपनी सफाई देने के लिये ही इन यादवों को दिखवाया था | इस मणिपर मेरा और बलभद्रजी का तो समान अधिकार हैं और सत्यभामा की यह पैतृक सम्पत्ति हैं; और किसीका इसपर कोई अधिकार नहीं हैं || १५४ || वह मणि सदा शुद्ध और ब्रह्मचर्य आदि गुणयुक्त रहकर धारण करनेसे सम्पूर्ण राष्ट्र का हित करती है और अशुद्धावस्था में धारण करने से अपने आश्रयदाता को भी मार डालती है || १५५ || मेरे सोलह हजार स्रियाँ हैं, इसलिये मैं इसके धारण करने एम् समर्थ नहीं हूँ, इसीलिये सत्यभामा भी इसको कैसे धारण कर सकती है ? || १५६ || आर्य बलभद्रको भी इसके कारण से मदिरापान आदि सम्पूर्ण भोगों को त्यागना पड़ेगा || १५७ || इसलिये हे दानपते ! ये यादवगण, बलभद्रजी, मैं और सत्यभामा सब मिलकर आपसे प्रार्थना करते हैं कि इसे धारण करने में आप ही समर्थ हैं || १५८ – १५९ || आपके धारण करने से यह सम्पूर्ण राष्ट्रका हित करेगी, इसलिये सम्पूर्ण राष्ट्र के मगंल के लिये आप ही इसे पूर्ववत धारण कीजिये; इस विषय में आप और कुछ भी न कहें | भगवान के ऐसा कहनेपर दानपति अक्रूरने ‘जो आज्ञा’ कह वह महारत्न ले लिया | तबसे अक्रूरजी सबके सामने उस अति देदीप्यमान मणि को अपने गले में धारणकर सूर्य के समान किरण – जाल से युक्त होकर विचरने लगे || १६० – १६१ ||

भगवान के मिथ्या – कलंक – शोधनरूप इस प्रसंग का जो कोई स्मरण करेगा उसे कभी थोडा-सा भी मिथ्या कलंक न लगेगा, उसकी समस्त इन्द्रियाँ समर्थ रहेगी तथा वह समस्त पापों से मुक्त हो जायगा || १६२ ||

इति श्रीविष्णुपुराणे चतुर्थेऽशे नवमोऽध्यायः से त्रयोदशोऽध्यायः