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विष्णुपुराण – चतुर्थ अंश – १

Beautiful golden sunrise
ॐ श्री मन्नारायणाय नम:
नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम | देवी सरस्वती व्याप्तं ततो जयमुदिरयेत ||

श्रीविष्णुपुराण

चतुर्थ अंश

अध्याय – पहला

वैवस्वतमनु के वंश का विवरण

श्रीमैत्रेयजी बोले – हे भगवन ! सत्कर्म ने प्रवृत्त रहनेवाले पुरुषों को जो करने चाहिये उन सम्पूर्ण नित्य-नैमित्तिक कर्मों का आपने वर्णन कर दिया || १ || हे गुरो ! आपने वर्ण-धर्म और आश्रम-धर्मों की व्याख्या भी कर दी | अब मुझे राजवंशों का विवरण सुनने की इच्छा है, अत: उनका वर्णन कीजिये || २ ||

श्रीपराशरजी बोलेहे मैत्रेय ! अब तुम अनेकों यज्ञकर्ता, शूरवीर और धैर्यशाली भूपालों से सुशोभित इस मनुवंश का वर्णन सुनो जिसके आदिपुरुष श्रीब्रह्माजी है || ३ || हे मैत्रेय ! अपने वंश के सम्पूर्ण पापों को नष्ट करने के लिये इस वंश-परम्परा की कथाका क्रमश: श्रवण करो || ४ ||

उसका विवरण इसप्रकार है – सकल संसार के आदिकारण भगवान विष्णु हैं | वे अनादि तथा ऋक – साम – यजु: स्वरुप हैं | उन ब्रह्मस्वरूप भगवान विष्णु के मूर्त्तरूप ब्रह्माण्डमय हिरण्यगर्भ भगवान ब्रह्माजी सबसे पहले प्रकट हुए || ५ || ब्रह्माजी के दायें अँगूठे से दक्षप्रजापति हुए, दक्ष से अदिति हुई तथा अदिति से विवस्वान और विवस्वान से मनुका जन्म हुआ || ६ || मनु के इक्ष्वाकु, नृग, धृष्ट, शर्याति, नरिश्यंत, प्रांशु, नाभाग, दिष्ट, करूप, और पृषध्र दस पुत्र हुए || ७ ||

मनुने पुत्र की इच्छा से मित्रावरुण नामक दो देवताओं के यज्ञ का अनुष्ठान किया || ८ || किन्तु होता हे विपरीत संकल्प यज्ञ में विपर्यय हो जाने से उनके ‘इला’ नामकी कन्या हुई || ९ || हे मैत्रेय ! मित्रावरुण की कृपासे वह इला ही मनुका ‘सुद्युम्र’ नामक पुत्र हुई || १० || फिर महादेवजी के कोप (कोपप्रयुक्त शाप) से वह स्त्री होकर चन्द्रमा के पुत्र बुध के आश्रम के निकट घूमने लगी || ११ ||

बुध ने अनुरक्त होकर उस स्त्री से पुरुरवा नामक पुत्र उत्पन्न किया || १२ || पुरुरवा के जन्म के अनन्तर भी परमर्षिगण ने सुद्युम्र को पुरुषत्वलाभ की आकांक्षासे क्रतुमय ऋग्यजु:सामाथर्वमय, सर्ववेदमय, मनोमय, ज्ञानमय, अन्नमय और परमार्थतः अकिचिन्मय भगवान यज्ञपुरुष यथावत यजन किया | तब उनकी कृपासे इला फिर भी सुद्युम्र हो गयी || १३ || उस (सुद्युम्र) के भी उत्कल, गय और विनत नामक तीन पुत्र हुए || १४ || पहले स्त्री होने के कारण सुद्युम्र को राज्याधिकार प्राप्त नहीं हुआ || १५ || वसिष्ठजी के कहने से उनके पिताने उन्हें प्रतिष्ठान नामक नगर दे दिया था, वही उन्होंने पुरुरवा को दिया || १६ ||

पुरुरवा की सन्तान सम्पूर्ण दिशाओं में फैले हुए क्षत्रियगण हुए | मनुका पृषध्र नामक पुत्र गुरु की गौ का वध करने के कारण शुद्र हो गया || १७ || मनुका पुत्र करुष था | करुष से कारुष नामक महाबली और पराक्रमी क्षत्रियगण उत्पन्न हुए || १८ || दिष्ट का पुत्र नाभाग वैश्य हो गया था, उससे बलन्धन नामका पुत्र हुआ || १९ || बलन्धन से महान कीर्तिमान वत्सप्रीति, वत्सप्रीति से प्रांशु और प्रांशु से प्रजापति नामक इकलौता पुत्र हुआ || २० – २२ || प्रजापति से खनित्र, खनित्र से चाक्षुष तथा चाक्षुष से अति बल-पराक्रम- सम्पन्न विंश हुआ || २३ – २५ || विंश से विविंशक, विविंशक से खनिनेत्र, खनिनेत्र से अतिविभूति और अतिविभूतिसे अति बलवान और शूरवीर करन्धम नामक पुत्र हुआ || २६ – २९ || करन्धम से अविक्षित हुआ और अविक्षितके मरुत्त नामक अति बल-पराक्रमयुक्त पुत्र हुआ, जिसके विषय में आजकल भी ये दो श्लोक गाये जाते हैं || ३० – ३१ ||

‘मरुत्त का जैसा यज्ञ हुआ था वैसा इस पृथ्वीपर और किसका हुआ है, जिसकी सभी याज्ञिक वस्तुएँ सुवर्णमय और अति सुंदर थीं || ३२ || उस यज्ञ में इंद्र सोमरस से और ब्राह्मणगण दक्षिणा से परीतृत्प हो गये थे, तथा उसमें मरुद्रण परोसनेवाले और देवगण सदस्य थे’ || ३३||

उस चक्रवर्ती मरुत्त के नरिश्यंत नामक पुत्र हुआ तथा नरिश्यंत के दम और दम के राजवर्धन नामक पुत्र उत्पन्न हुआ || ३४ – ३६ || राजवर्धन से सुवृद्धि, सुवृद्धि से केवल और केवल से सुधृति का जन्म हुआ || ३७ – ३९ || सुधृति से नर, नर से चन्द्र और चन्द्र से केवल हुआ || ४० – ४२ || केवल से बन्धुमान, बन्धुमान से वेगवान, वेगवान से बुध, बुध से तृणबिंदु तथा तृणबिंदु से पहले तो इलविला नामकी एक कन्या हुई थी, किन्तु पीछे अलम्बुसा नामकी एक सुन्दरी अप्सरा उसपर अनुरक्त हो गयी | उससे तृणबिंदु के विशाल नामक पुत्र हुआ, जिसने विशाला नामक पूरी बसायी || ४३ – ४९ ||

विशाल का पुत्र हेमचन्द्र हुआ, हेमचन्द्र का चन्द्र, चन्द्रका धूम्राक्षका सृज्जय सहदेव और सहदेव का पुत्र कृशाश्व हुआ || ५० – ५५ || कृशाश्व के सोमदत्त नामक पुत्र हुआ, जिसने सौ अश्वमेध यज्ञ किये थे | उससे जनमेजय हुआ उअर जनमेजय से सुमति का जन्म हुआ | ये सब विशालवंशीय राजा हुए | इनके विषय में यह श्लोक प्रसिद्ध है || ५६ – ६० || तृणबिंदु के प्रसाद से विशालवंशीय समस्त राजालोग दीर्घायु, महात्मा, वीर्यवान और अति धर्मपरायण हुए || ६१ ||

मनुपुत्र शर्याति के सुकन्या नामवाली एक कन्या हुई, जिसका विवाह च्यवन ऋषि के साथ हुआ || ६२ || शर्याति के आनर्त्त नामक एक परम धार्मिक पुत्र हुआ | आनर्त्त के रेवत नामका पुत्र हुआ जिसने कुशस्थली नामकी पूरी में रहकर आनर्त्तदेश का राज्यभोग किया || ६३- ६४ ||

रेवत का भी रैवत ककुद्यी नामक एक अति धर्मात्मा पुत्र था, जो अपने सौ भाइयों में सबसे बड़ा था || ६५ || उसके रेवती नामकी एक कन्या हुई || ६६ || महाराज रैवत उसे अपने साथ लेकर ब्रह्माजी से यह पूछनेके लिये कि ‘यह कन्या किस वर के योग्य है’ ब्रह्मलोक को गये || ६७ || उस समय ब्रह्माजी के समीप हाहा और हूहू नामक दो गन्धर्व अतितान नामक दिव्य गान गा रहे थे || ६८ || वहाँ गान-सम्बन्धी चित्रा, दक्षिणा और धात्री नामक त्रिमार्ग के परिवर्तन के साथ उनका विलक्षण गान सुनते हुए अनेकों युगों के परिवर्तन-कालतक ठहरनेपर भी रैवतजी को केवल एक मुहूर्त ही बीता-सा मालुम हुआ || ६९ ||

गान समाप्त हो जानेपर रैवत ने भगवान कमलयोनि को प्रणाम कर उनसे अपनी कन्याके योग्य वर पूछा || ७० || भगवान ब्रह्माने कहा – “तुम्हे जो वर अभिमत हों उन्हें बताओं” || ७१ || तब उन्होंने भगवान ब्रह्माजी को पुन: प्रणाम कर अपने समस्त अभिमत वरों का वर्णन किया और पूछा कि ‘इनमें से आपको कौन वर पसन्द है जिसे मैं यह कन्या दूँ ?’ || ७२ ||

इसपर भगवान कमलयोनि कुछ सिर झुकाकर मुसकाते हुए बोले || ७३ || :तुमको जो-जो वर अभिमत हैं उनमें से तो अब पृथ्वीपर किसी के पुत्र-पौत्रादि की सन्तान भी नहीं हैं || ७४ || क्योंकि यहाँ गन्धर्वों का गान सुनते हुए तुम्हे कई चतुर्युग बीत चुके हैं || ७५ || इस समय पृथ्वीतलपर अट्ठाईस वे मनुका चतुर्युग प्राय: समाप्त हो चूका है || ७६ || तथा कलियुग का प्रारम्भ होनेवाला है || ७७ || अब तुम अकेले ही रह गये हो, अत: यह कन्या-रत्न किसी और योग्य वर को दो | इतने समय में तुम्हारे पुत्र, मित्र, कलत्र, मंत्रिवर्ग, भूत्यगण, बन्धुगण, सेना और कोशादिका भी सर्वथा अभाव हो चूका है” || ७८-७९ || तब तो राजा रैवत ने अत्यंत भयभीत हो भगवान ब्रह्माजी को पुन: प्रणाम कर पूछा || ८० || ‘भगवन ! ऐसी बात है, तो अब मैं इसे किसको दूँ ?’ || ८१ || तब सर्वलोकगुरु भगवान कमलयोनि कुछ सिर झुकाए हाथ जोडकर बोले || ८२ ||

श्रीब्रह्माजीने कहाजिस अजन्मा, सर्वमय, विधाता परमेश्वर का आदि, मध्य, अंत, स्वरूप, स्वभाव और सार हम नहीं जान पाते || ८३ || कलामुहुर्त्तादिमय काल भी जिसकी विभूति के परिणाम का कारण नहीं हो सकता, जिसका जन्म और मरण नहीं होता, जो सनातन और सर्वदा एकरूप हैं तथा नाम और रूपसे रहित है || ८४ || जिस अच्युत की कृपासे मैं प्रजाका उत्पत्तिकर्ता हूँ, जिसके क्रोध से उत्पन्न हुआ रूद्र सृष्टि का अंतकर्त्ता है तथा जिस परमात्मासे मध्य में जगत्स्थितिकारी विष्णुरूप पुरुष का प्रादुर्भाव हुआ है || ८५ || जो अजन्मा मेरा रूप धारणकर संसार की रचना करता हैं, स्थिति के समय जो पुरुषरूप हैं तथा जो रुद्ररूप से सम्पूर्ण विश्व का ग्रास कर जाता हैं एवं अनंतरूप से सम्पूर्ण जगत को धारण करता हैं || ८६ || जो अव्ययात्मा पाक के लिये अग्निरूप हो जाता हैं, पृथ्वीरूप से सम्पूर्ण लोकों को धारण करता हैं, इन्द्रादिरूप से विश्वका पालन करता हैं और सूर्य तथा चन्द्ररूप होकर सम्पूर्ण अन्धकार का नाश करता हैं || ८७ || जो श्वास-प्रश्वासरूप से जीवों में चेष्टा करता हैं, जल और अन्नरूप से लोक की तृप्ति करता है, तथा विश्वकी स्थिति में संलग्न रहकर जो आकाशरूप से सबको अवकाश देता है || ८८ || जो सृष्टिकर्ता होकर भी विश्वरूप से आप ही अपनी रचना करता है, जगत का पालन करनेवाला होकर भी आप ही पालित होता है तथा संहारकारी होकर भी स्वयं ही संहृत होता है और जो इन तीनों से पृथक इनका अविनाशी आत्मा है || ८९ || जिसमें यह जगत स्थित है, जो आदिपुरुष जगत-स्वरूप है और इस जगत के ही आश्रित तथा स्वयम्भू हैं, हे नृपते ! सम्पूर्ण भूतों का उद्भवस्थान वह विष्णु धरातल में अपने अंश से अवतीर्ण हुआ है || ९० ||

हे राजन ! पूर्वकाल में तुम्हारी जो अमरावती के समान कुशस्थली नामकी पुरी थी वह अब द्वारकापुरी हो गयी है | वहीँ वे बलदेव नामक भगवान विष्णु के अंश विराजमान हैं || ९१ || हे नरेन्द्र ! तुम यह कन्या उन मायामानव श्रीबलदेवजी को पत्नीरूप से दो | ये बलदेवजी संसार में अति प्रशंसनीय है और तुम्हारी कन्या भी स्त्रियों में रत्नस्वरूपा है, अत: इनका योग सर्वथा उपयुक्त है || ९२ ||

श्रीपराशरजी बोले – भगवान ब्रह्माजी के ऐसा कहनेपर प्रजापति रैवत पृथ्वीतलपर आये तो देखा कि सभी मनुष्य छोटे – छोटे, कुरूप, अल्प-तेजोमय, अल्पवीर्य तथा विवेकहीन हो गये हैं || ९३ || अतुलबुद्धि महाराज रैवत ने अपनी कुशस्थली नामकी पुरी और ही प्रकार की देखी तथा स्फटिक पर्वत के समान जिनका वक्ष:स्थल है उन भगवान् हलायुधको अपनी कन्या दे दी || ९४ || भगवान बलदेवजी ने उसे बहुत ऊँची देखकर अपने हलके अग्रभाग से दबाकर नीची कर ली | तब रेवती भी तत्कालीन अन्य स्त्रियों के समान हो गयी || ९५ || तदनन्तर बलरामजी ने महाराज रैवत की कन्या रेवती से विधिपूर्वक विवाह किया तथा राजा भी कन्यादान करने के अनन्तर एकाग्रचित्त से तपस्या करने एक लिये हिमालयपर चले गये || ९६ ||

इति श्रीविष्णुपुराणे चतुर्थेऽशे प्रथमोऽध्यायः

विष्णुपुराण तृतीय अंश – 18

Beautiful golden sunrise
ॐ श्री मन्नारायणाय नम:
नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम | देवी सरस्वती व्याप्तं ततो जयमुदिरयेत ||

श्रीविष्णुपुराण

तृतीय अंश

अध्याय – अठराहवाँ

मायामोह और असुरों का संवाद तथा राजा शतधनु की कथा

श्रीपराशरजी बोले – हे मैत्रेय ! तदनन्तर मायामोह ने जाकर देखा कि असुरगण नर्मदा के तटपर तपस्या में लगे हुए है || १ || तब उस मयूरपिच्छधारी दिगम्बर और मुण्डितकेश मायामोह ने असुरों से अति मधुर वाणी में इसप्रकार कहा || २ ||

मायामोह बोला – हे दैत्यपतिगण ! कहिये, आपलोग किस उद्देश्यसे तपस्या कर रहे हैं, आपको किसी लौकिक फल की इच्छा है या पारलौकिक की ? || ३ ||

असुरगण बोले – हे महामते ! हमलोगों ने पारलौकिक फल की कामना से तपस्या आरम्भ की है | इस विषय में तुमको हमसे क्या कहना है ? || ४ ||

मायामोह बोलायदि आपलोगों को मुक्तिकी इच्छा है तो जैसा मैं कहता हूँ वैसा करो | आपलोग मुक्ति के खुले द्वारपर इस धर्म का आदर कीजिये || ५ || यह धर्म मुक्ति में परमोपयोगी है | इससे श्रेष्ठ अन्य कोई धर्म नही है | इसका अनुष्ठान करने से आपलोग स्वर्ग अथवा मुक्ति जिसकी कामना करेंगे प्राप्त कर लेंगे | आप सबलोग महाबलवान है, अत: इस धर्मका आदर कीजिये || ६ – ७ ||

श्रीपराशरजी बोले – इसप्रकार नाना प्रकार की युक्तियों से अतिरंजित वाक्योंद्वारा मायामोह ने दैत्यगण को वैदिक मार्ग से भ्रष्ट कर दिया || ८ || यह धर्मयुक्त हैं और यह धर्मविरुद्ध है, यह सत है और यह असत है, यह मुक्तिकारक है और इससे मुक्ति नहीं होती, यह आत्यन्तिक परमार्थ है और यह परमार्थ नहीं है और यह स्पष्ट ऐसा ही है, यह दिगम्बरों का धर्म है और यह साम्बरों का धर्म है – हे द्विज ! ऐसे अनेक प्रकार के अनंत वादों को दिखलाकर मायामोह ने उन दैत्यों को स्वधर्म से च्युत कर दिया || ९ – १२ || मायामोह ने दैत्यों से कहा था कि आपलोग इस महाधर्म को ‘अर्हत’ अर्थात इसका आदर कीजिये | अत: उस धर्म का अवलम्बन करने से वे ‘आर्हत’ कहलाये || १३ ||

मायामोह ने असुरगण क त्रयीधर्म से विमुक्त कर दिया वे मोहग्रस्त हो गये; तथा पीछे उन्होंने अन्य दैत्यों को भी इसी धर्म में प्रवृत्त किया || १४ || उन्होंने दूसरे दैत्यों को, दूसरोने तीसरों को, तीसरों ने चौथों को तथा उन्होंने औरों को इसी धर्म में प्रवृत्त किए | इसप्रकार थोड़े ही दिनों में दैत्यगण ने वेदत्रयी का प्राय: त्याग कर दिया || १५ ||

तदनन्तर जितेन्द्रिय मायामोह ने रक्तवस्त्र धारणकर अन्यान्य असुरों के पास जा उनसे मृदु, अल्प और मधुर शब्दों में कहा || १६ || ‘हे असुरगण ! यदि तुमलोगों को स्वर्ग अथवा मोक्ष की इच्छा है तो पशुहिसा आदि दुष्टकर्मों को त्यागकर बोध प्राप्त करो || १७ ||

यह सम्पूर्ण जगत विज्ञानमाय है – ऐसा जानो | मेरे वाक्योंपर पूर्णतया ध्यान दो | इस विषय में युधजनों का पदार्थों की प्रतीतिपर ही स्थिर है तथा रागादि दोषों से दूषित हैं | इस संसारसंकट में जीव अत्यंत भटकता रहा है || १८-१९ || इसप्रकार ‘बुध्यत (जानो), बुध्यर्ध्व (समझो), बुध्यत (जानो)’ आदि शब्दों से बुद्धधर्म का निर्देश कर मायामोहने दैत्यों से उनका निजधर्म छुड़ा दिया || २० || मायामोह ने ऐसे नाना प्रकार के युक्तियुक्त वाक्य कहे जिससे उन दैत्यगण ने त्रयीधर्म को त्याग दिया || २१ || उन दैत्यगण ने अन्य दैत्यों से तथा उन्होंने अन्यान्यसे ऐसे ही वाक्य कहे | हे मैत्रेय ! इसप्रकार उन्होंने श्रुतिस्मृतिविहित अपने परम धर्म को त्याग दिया || २२ || हे द्विज ! मोह्कारी मायामोह ने और भी अनेकानेक दैत्यों को भिन्न-भिन्न प्रकार के विविध पाषण्डों से मोहित कर दिया || २३ || इसप्रकार थोड़े ही समय में मायामोह के द्वारा मोहित होकर असुरगण ने वैदिक धर्म की बातचीत करना भी छोड़ दिया || २४ ||

हे द्विज ! उनमें से कोई वेदों की, कोई देवताओं की, कोई याज्ञिक कर्म – कलापों की तथा कोई ब्राह्मणों की निंदा करने लगे || २५ || हिंसा में भी धर्म होता है – यह बात किसी प्रकार युक्तिसंगत नहीं है | अग्नि में हवि जलाने से फल होगा – यह भी बच्चोंकी –सी बात है || २६ || अनेकों यज्ञों के द्वारा देवत्व लाभ करके यदि इंद्र को शमी आदि काष्ठका ही भोजन करना पड़ता है तो इससे तो पत्ते खानेवाला पशु ही अच्छा है || २७ || यदि यज्ञ में बलि किये गये पशुको स्वर्ग की प्राप्ति होती है तो यजमान अपने पिताको ही क्यों नहीं मार डालता ? || २८ || यदि किसी अन्य पुरुष के भोजन करने से भी किसी पुरुष की तृप्ति हो सकती है तो विदेशकी यात्रा के समय खाद्यपदार्थ ले जानेका परिश्रम करने की क्या आवश्यकता है; पुत्रगण घरपर ही श्राद्ध कर दिया करें || २९ || अत: यह समझकर कि ‘यह (श्राद्धादि कर्मकांड) लोगों की अंध-श्रद्धा ही है’ इसके प्रति उपेक्षा करनी चाहिये और अपने श्रेय:साधन के लिये जो कुछ मैंने कहा है उसमें रूचि करनी चाहिये || ३० || हे असुरगण ! श्रुति आदि आप्तवाक्य कुछ आकाश में नहीं गिरा करते | हम, तुम और अन्य सबको भी युक्तियुक्त वाक्यों को ग्रहण कर लेना चाहिये || ३१ ||

श्रीपराशरजी बोले – इसप्रकार अनेक युक्तियों से मायामोह ने दैत्यों को विचलित कर दिया जिससे उनमें से किसीकी भी वेदत्रयी में रूचि नहीं रही || ३२ || इसप्रकार दैत्यों के विपरीत मार्ग में प्रवृत्त हो जानेपर देवगण खूब तैयारी करके उनके पास युद्ध के लिये उपस्थित हुए || ३३ ||

हे द्विज ! तब देवता और असुरों में पुन: संग्राम छिड़ा | उसमें सन्मार्गविरोधी दैत्यगण देवताओंद्वारा मारे गये || ३४ || हे द्विज ! पहले दैत्यों के पास जो स्वधर्मरूप कवच था उसीसे उनकी रक्षा हुई थी | अबकी बार उसके नष्ट हो जानेसे वे भी नष्ट हो गये || ३५ || हे मैत्रेय ! इस समय से जो लोग मायामोहद्वारा प्रवर्तित मार्गका अवलम्बन करनेवाले हुए | वे ‘नग्न’ कहलाये क्योंकि उन्होंने वेदत्रयीरूप वस्त्र को त्याग दिया था ||३६ ||

ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यासी – ये चार ही आश्रमी हैं | इनके अतिरिक्त पाँचवाँ आश्रमी और कोई नहीं है || ३७ || हे मैत्रेय ! जो पुरुष गृहस्थाश्रम को छोड़ने के अनन्तर वानप्रस्थ या संन्यासी नहीं होता वह पापी भी नग्न ही है || ३८ ||

हे विप्र ! सामर्थ्य रहते हुए भी जो विहित कर्म नहीं करता वह उसी दिन पतित हो जाता है और उस एक दिन-रात में ही उसके सम्पूर्ण नित्यकर्मों का क्षय हो जाता है || ३९ || हे मैत्रेय ! आपत्तिकाल को छोडकर और किसी समय एक पक्षतक नित्यकर्म का त्याग करनेवाला पुरुष महान प्रायश्चित्तसे ही शुद्ध हो सकता है || ४० || जो पुरुष एक वर्षतक नित्य-क्रिया नहीं करता उसपर दृष्टि पड जानेसे साधू पुरुष को सदा सूर्यका दर्शन करना चाहिये || ४१ || हे महामते ! ऐसे पुरुष का स्पर्श होनेपर वस्रसहित स्नान करने से शुद्धि हो सकती है और उस पापात्मा की शुद्धि तो किसी भी प्रकार नहीं हो सकती || ४२ ||

जिस मनुष्य के घर से देवगण, ऋषिगण, पितृगण और भूतगण विना पूजित हुए नि:श्वास छोड़ते अन्यत्र चले जाते हैं, लोकमें उससे बढकर और कोई पापी नहीं हैं || ४३ || हे द्विज ! ऐसे पुरुष के साथ एक वर्षतक सम्भाषण, कुशलप्रश्न और उठने-बैठने से मनुष्य उसी के समान पापात्मा हो जाता हैं || ४४ || जिसका शरीर अथवा गृह देवता आदि के नि:श्वास से निहत हैं उसके साथ अपने गृह, आसन और वस्त्र आदिको न मिलावे || ४५ || जो पुरुष उसके घर में भोजन करता है, उसका आसन ग्रहण करता है अथवा उसके साथ एक ही शय्यापर शयन करता है वह शीघ्र ही उसीके समान हो जाता है || ४६ || जो मनुष्य देवता, पितर, भूतगण और अतिथियों का पूजन किये बिना स्वयं भोजन करता हैं वह पापमय भोजन करता हैं; उसकी शुभगति नहीं हो सकती || ४७ ||

जो ब्राह्मणादि वर्ण स्वधर्म को छोडकर परधर्मों में प्रवृत्त होते हैं अथवा हीनवृत्तिका अवलम्बन करते हैं वे ‘नग्न’ कहलाते है ||४८ |\| हे मैत्रेय ! जिस स्थान में चारों वर्णों का अत्यंत मिश्रण हो उसमें रहने से पुरुष की साधूवृत्तियों का क्षय हो जाता है || ४९ || जो पुरुष ऋषि, देव, पितृ, भूत और अतिथिगण का पूजन किये बिना भोजन करता है उससे सम्भाषण करने से भी लोग नरक में पड़ते हैं || ५० || अत: वेदत्रयी के त्याग से दूषित इन नग्नोंके साथ प्राज्ञपुरुष सर्वदा सम्भाषण और स्पर्श आदिका भी त्याग कर दे || ५१ || यदि इनकी दृष्टि पद जाय तो श्रद्धावान पुरुषों का यत्नपूर्वक किया हुआ श्राद्ध देवता अथवा पितृपितामहगण की तृप्ति नहीं करता || ५२ ||

राजा शतधनु की कथा

सुना जाता है, पूर्वकाल में पृथ्वीतलपर शतधनु नामसे विख्यात एक राजा था | उसकी पत्नी शैव्या अत्यंत धर्मपरायणा थी || ५३ || वह महाभाग पतिव्रता, सत्य, शौच और दया से युक्त तथा विनय और निति आदि सम्पूर्ण सुलक्षणों से सम्पन्न थी || ५४ || उस महारानी के साथ राजा शतधनु ने परम-समाधिद्वारा सर्वव्यापक, देवदेव श्रीजनार्दन की आराधना की ||५५ || वे प्रतिदिन तन्मय होकर अनन्यभाव से होम, जप, दान, उपवास और पूजन आदिद्वारा भगवान की भक्तिपूर्वक आराधना करने लगे ||५६ || हे द्विज ! एक दिन कार्तिकी पूर्णिमा को उपवास कर उन दोनों पति-पत्नियों ने श्रीगंगाजी से एक साथ ही स्नान करने के अनन्तर बाहर आनेपर एक पाषण्डी को सामने आता देखा ||५७|| यह ब्राह्मण उस महात्मा राजा के धनुर्वेदाचार्य का मित्र था; अत: आचार्य के गौरववश राजाने भी उससे मित्रवत व्यवहार किया || ५८ || किन्तु उसकी पतिव्रता पत्नीने उसका कुछ भी आदर नहीं किया; वह मौन रही और यह सोचकर कि मैं उपोषिता (उपवासयुक्त) हूँ उसे देखकर सूर्यका दर्शन किया ||५९ || हे द्विजोत्तम ! फिर उन स्त्री-पुरुषोंने यथारीति आकर भगवान् विष्णु के पूजा आदिक सम्पूर्ण कर्म विधिपूर्वक किये || ६० ||

कालान्तर में वह शत्रुजित राजा मर गया | तब, देवी शैव्या ने भी चितारुढ महाराज का अनुगमन किया ||६१ ||

राजा शतधनु ने उपवास-अवस्थामें पाखण्डी से वार्तालाप किया था | अत: उस पाप के कारण उसने कुत्ते का जन्म लिया || ६२ || तथा वह शुभलक्षणा काशीनरेश की कन्या हुई, जो सब प्रकार के विज्ञान से युक्त, सर्वलक्षणसम्पन्ना और जातिस्मरा (पूर्वजन्म का वृतांत जाननेवाली ) थी ||६३|| राजाने उसे किसी वर को देने की इच्छा की, किन्तु उस सुन्दरी के ही रोक देनेपर वह उसके विवाहादि से उपरत हो गये ||६४ ||

तब उसने दिव्य दृष्टि से अपने पति को श्वान हुआ जान विदिशा नामक नगर में जाकर उसे वहाँ कुत्ते की अवस्था में देखा || ६५ || अपने महाभाग पतिको श्वानरूप में देखकर उस सुन्दरी ने उसे सत्कारपूर्वक अति उत्तम भोजन कराया || ६६ || उसके दिये हुए उस अति मधुर और इच्छित अन्नको खाकर वह अपनी जाति के अनुकूल नाना प्रकार की चाटुता प्रदर्शित करने लगा ||६७ || उसके चाटुता करने से अत्यंत संकुचित हो उस बालिकाने कुत्सित योनि में उत्पन्न हुए उस अपने प्रियतम को प्रणाम कर उससे इस प्रकार कहा || ६८ || “महाराज ! आप अपनी उस उदारताका स्मरण कीजिये जिसके कारण आज आप श्वान-योनि को प्राप्त होकर मेरे चाटुकार हुए हैं || ६९ || हे प्रभो ! क्या आपको यह स्मरण नहीं हैं कि तीर्थस्नान के अनन्तर पाखण्डी से वार्तालाप करने के कारण ही आपको यह कुत्सित योनि मिली है ?” || ७० ||

श्रीपराशरजी बोले – काशिराजसुताद्वारा इस प्रकार स्मरण कराये जानेपर उसने बहुत देरतक अपने पूर्वजन्म का चिन्तन किया | तब उसे अति दुर्लभ निर्वेद प्राप्त हुआ || ७१ || उसने अति उदास चित्तसे नगर के बाहर आकर प्राण त्याग दिये और फिर श्रुंगाल – योनि में जन्म लिया || ७२ || तब, काशिराज कन्या दिव्य दृष्टि से उसे दूसरे जन्म में श्रुंगाल हुआ जान उसे देखने के लिये कोलाहल-पर्वतपर गयी || ७३ || वहाँ भी अपने पतिको श्रुंगाल-योनि में उत्पन्न हुआ देख वह सुन्दरी राजकन्य उससे बोली || ७४ || “हे राजेन्द्र ! श्वान-योनि में जन्म लेनेपर मैंने आपसे जो पाखण्ड से वार्तालापविषयक पूर्वजन्म का वृतांत कहा था क्या वह आपको स्मरण हैं ?” || ७५ || तब सत्यनिष्ठों में श्रेष्ठ राजा शतधनु ने उसके इस प्रकार कहनेपर सारा सत्य वृतांत जानकर निराहार रह वन में अपना शरीर छोड़ दिया || ७६ ||

फिर वह एक भेड़िया हुआ; उस समय भी अनिंदिता राजकन्या ने उस निर्जन वन में जाकर अपने पतिको उसके पूर्वजन्म का वृतांत स्मरण कराया || ७७ || “हे महाभाग ! तुम भेड़िया नहीं हो, तुम राजा शतधनु हो | तुम अपने पूर्वजन्मों में क्रमश: कुकुर और श्रुंगाल होकर अब भेड़िया हुए हो” || ७८ || इस प्रकार उसके स्मरण करानेपर राजाने जब भेड़िये के शरीर को छोड़ा तो गृध्र – योनि में जन्म लिया | उससमय भी उसकी निष्पाप भार्याने उसे फिर बोध कराया || ७९ || “हे नरेन्द्र ! तुम अपने स्वरूप का स्मरण करो; इन गृध्र-चेष्टाओं को छोडो | पाखण्ड के साथ वार्तालाप करने के दोष से ही तुम गृध्र हुए हो” || ८०||

फिर दूसरे जन्म में काक-योनि को प्राप्त होनेपर भी अपने पतिकी योगबल से पाकर उस सुन्दरी ने कहा || ८१ || “हे प्रभो ! जिनके वशीभूत होकर सम्पूर्ण सामंतगण नाना प्रकार की वस्तुएँ भेंट करते थे वही आप आज काक-योनि को प्राप्त होकर बलिभोजी हुए हैं” ||८२|| इसी प्रकार काक-योनि में भी पूर्वजन्म का स्मरण कराये जानेपर राजाने अपने प्राण छोड़ दिये और फिर मयूर-योनि में जन्म लिया || ८३ ||

मयूरावस्था में भी काशिराज की कन्या उसे क्षण-क्षण में अति सुंदर मयुरोचित आहार देती हुई उसकी टहल करने लगी || ८४ || उससमय राजा जनक ने अश्वमेध नामक महायज्ञ का अनुष्ठान किया; उस यज्ञ में अवभृथ –स्नान के समय उस मयूर को स्नान कराया || ८५ || तब उस सुन्दरी ने स्वयं भी स्नान कर राजाको यह स्मरण कराया कि किस प्रकार उसने श्वान और श्रुंगाल आदि योनियाँ ग्रहण की थीं || ८६ || अपनी जन्म – परम्परा का स्मरण होनेपर उसने अपना शरीर त्याग दिया और फिर महात्मा जनकजी के यहाँ ही पुत्ररूप से जन्म लिया || ८७ ||

तब उस सुन्दरी ने अपने पिताको विवाह के लिये प्रेरित किया | उसकी प्रेरणा से राजाने उसके स्वयंवर का आयोजन किया || ८८ || स्वयंवर होनेपर उस राजकन्या ने स्वयंवर में आये हुए अपने उस पतिको फिर पतिभाव से वरण कर लिया || ८९ || उस राजकुमार ने काशिराजसुता के साथ नाना प्रकार के भोग भोगे और फिर पिता के परलोकवासी होनेपर विदेहनगर का राज्य किया || ९० || उसने बहुत-से यज्ञ किये, याचकों को नाना प्रकार से दान दिये, बहुत-से पुत्र उत्पन्न किये और शत्रुओं के साथ अनेकों युद्ध किये || ९१ || इसप्रकार उस राजाने पृथ्वी का न्यायानुकुल पालन करते हुए राज्यभोग किया और अंत में अपन प्रिय प्राणों को धर्मयुद्ध में छोड़ा || ९२ || तब उस सुलोचना ने पहले के समान फिर अपने चितारुढ पतिका विधिपूर्वक प्रसन्न-मन से अनुगमन किया || ९३ || इससे वह राजा उस राजकन्या के सहित इन्द्रलोक से भी उत्कृष्ट अक्षय लोकों को प्राप्त हुआ || ९४ ||

हे द्विजश्रेष्ठ ! इस प्रकार शुद्ध हो जानेपर उसने अतुलनीय अक्षय स्वर्ग, अति दुर्लभ दाम्पत्य और अपने पुर्वार्चित सम्पूर्ण पुण्य का फल प्राप्त कर लिया || ९५ ||

हे द्विज ! इसप्रकार मैंने तुमसे पाखण्डी से सम्भाषण करने का दोष और अश्वमेध-यज्ञ में स्नान करने का माहात्म्य वर्णन कर दिया || ९६ || इसलिये पाखण्डी और पापाचारियों से कभी वार्तालाप और स्पर्श न करे; विशेषत: नित्य- नैमित्तिक कर्मों के समय और जो यज्ञादि क्रियाओं के लिये दीक्षित हो उसे तो उनका संसर्ग त्यागना अत्यंत आवश्यक है || ९७ || जिसके घर में एक मासतक नित्यकर्मों का अनुष्ठान न हुआ हो उसको देख लेनेपर बुद्धिमान मनुष्य सूर्यका दर्शन करे || ९८ || फिर जिन्होंने वेदत्रयी का सर्वथा त्याग कर दिया है तथा जो पाखण्डीयों का अन्न खाते और वैदिक मत का विरोध करते हैं उन पापात्माओं के दर्शनादि करनेपर तो कहना ही क्या है ? || ९९ || इन दुराचारी पाखण्डियों के साथ वार्तालाप करने, सम्पर्क रखें और उठने – बैठने में महान पाप होता है; इसलिये इन सब बातों का त्याग करे || १०० || पाखण्डी, विकर्मी, विडाल-व्रतवाले [अर्थात छिपे – छिपे पाप करना वैडाल नामक व्रत है | जो वैसा करते हैं ‘वे विडाल-व्रतवाले’ कहलाते है | ], दुष्ट, स्वार्थी और बगुला – भक्त लोगों का वाणी से भी आदर न करे || १०१ || इन पाखण्डी, दुराचारी और अति पापियों का संसर्ग दूरी से त्यागने योग्य है | इसलिये इनका सर्वदा त्याग करे || १०२ ||

इसप्रकार मैंने तुमसे नग्नों की व्याख्या की, जिनके दर्शनमात्र से श्राद्ध नष्ट हो जाता है और जिनके साथ सम्भाषण करने से मनुष्य का एक दिन का पुण्य क्षीण हो जाता है || १०३ || वे पाखण्डी बड़े पापी होते हैं, बुद्धिमान पुरुष इनसे कभी सम्भाषण न करे | इनके साथ सम्भाषण करने से उस दिनका पुण्य नष्ट हो जाता हैं || १०४ || जो बिना कारण ही जटा धारण करते अथवा मूँड मुड़ाते है, देवता, अतिथि आदिको भोजन कराये बिना स्वयं ही भोजन कर लेते हैं, सब प्रकार से शौचहीन हैं तथा जल-दान और पितृ-पिण्ड आदिसे भी बहिष्कृत हैं, उन लोगों से वार्तालाप करने से भी लोग नरक में जाते हैं || १०५ ||

इति श्रीविष्णुपुराणे तृतीयेऽशे अष्टोदशोऽध्यायः

|| इति श्रीपराशरमुनिविरचिते श्रीविष्णुपरत्वनिर्णायके श्रीमति विष्णुमहापुराणे तृतीयोंऽश: समाप्त: ||

विष्णुपुराण – तृतीय अंश – १३ से १७

Beautiful golden sunrise
ॐ श्री मन्नारायणाय नम:
नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम | देवी सरस्वती व्याप्तं ततो जयमुदिरयेत ||

श्रीविष्णुपुराण

तृतीय अंश

अध्याय – १३ से १७

नग्नविषयक प्रश्न, देवताओं का पराजय, उनका भगवान की शरण में जाना और भगवान का मायामोह को प्रकट करना

श्रीपराशरजी बोले – हे मैत्रेय ! पूर्वकाल में महात्मा सगर से उनके पुछ्नेपर भगवान और्व ने इस प्रकार गृहस्थ के सदाचार का निरूपण किया था || १ || हे द्विज ! मैंने भी तुमसे उसका पूर्णतया वर्णन कर दिया | कोई भी पुरुष सदाचार का उल्लंघन करके सद्गति नहीं पा सकता || २ ||

श्रीमैत्रेयजी बोले – भगवन ! नपुंसक, अपविद्ध और रजस्वला आदि को तो मैं अच्छी तरह जानता हूँ [ किन्तु यह नहीं जानता कि ‘नग्न’ किसको कहते हैं ] | अत: इस समय मैं नग्न के विषय में जानना चाहता हूँ || ३ || नग्न कौन है ? और किस प्रकार के आचरणवाला पुरुष नग्न-संज्ञा प्राप्त करता हैं ? हे धर्मात्माओं में श्रेष्ठ ! मैं आपके द्वारा नग्न के स्वरूप का यथावत वर्णन सुनना चाहता हूँ; क्योंकि आपको कोई भी बात अविदित नहीं है || ४ ||

श्रीपराशरजी बोले – हे द्विज ! ऋक, साम और यजु: यह वेदत्रयी वर्णों का आवरणस्वरूप है | जो पुरुष मोहसे इसका त्याग कर देता है वह पापी ‘नग्न’ कहलाता हैं || ५ || हे ब्रह्मन ! समस्त वर्णों का संवरण (ढँकनेवाला वस्त्र) वेदत्रयी ही है; इसलिये उसका त्याग कर देनेपर पुरुष ‘नग्न’ हो जाता है, इसमें कोई संदेह नहीं || ६ || हमारे पितामह धर्मज्ञ वसिष्ठजी ने इस विषय में महात्मा भीष्मजीसे जो कुछ कहा था वह श्रवण करो || ७ || हे मैत्रेय ! तुमने जो मुझसे नग्न के विषय में पूछा है इस सम्बन्ध में भीष्म के प्रति वर्णन करते समय मैंने भी महात्मा वसिष्ठजी का कथन सुना था || ८ ||

पूर्वकालमें किसी समय सौ दिव्यवर्षतक देवता और असुरों का परस्पर युद्ध हुआ | उसमें ह्लाद प्रभुति दैत्योंद्वारा देवगण पराजित हुए || ९ || अत: देवगणने क्षीरसागर के उत्तरीय तटपर जाकर तपस्या की और भगवान विष्णु की आराधना के लिये उस समय इस स्तवका गान किया || १० ||

देवगण बोले – हमलोग लोकनाथ भगवान विष्णु की आराधना के लिये जिस वाणी का उच्चारण करते हैं उससे वे आद्य-पुरुष श्रीविष्णुभगवान प्रसन्न हों || ११ || जिन परमात्मा से सम्पूर्ण भूत उत्पन्न हुए हैं और जिनमें वे सब अंत में लीन हो जायँगे, संसार में उनकी स्तुति करने में कौन समर्थ हैं ? || १२ || हे प्रभो ! यद्यपि आपका यथार्थ स्वरूप वाणीका विषय नहीं है तो भी शत्रुओं के हाथ से विध्वस्त होकर पराक्रमहीन जाने के कारण हम अभयप्राप्ति के लिये आपकी स्तुति करते हैं || १३ || पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, अंत:करण, मूल-प्रकृति और प्रकृति से परे पुरुष – ये सब आप ही है || १४ || हे सर्वभूतात्मन ! ब्रह्मा से लेकर स्तम्बपर्यन्त स्थान और कालादि भेद्युक्त यह मुर्त्तामूर्त्त – पदार्थमय सम्पूर्ण प्रपंच आपही का शरीर है || १५ || आपके नाभि-कमल से विश्व उपकारार्थ प्रकट हुआ जो आपका प्रथम रूप है, हे ईश्वर ! उस ब्रह्मस्वरूप को नमस्कार है || १६ || इंद्र, सूर्य, रूद्र, वसु, अश्विनीकुमार, मरुद्रण और सोम आदि भेद्युक्त हमलोग भी आपही का एक रुप है; अत: आपके उस देवरूप को नमस्कार है || १७ || हे गोविन्द ! जो दम्भमयी, अज्ञानमयी तथा तितिक्षा और दम्भ से शून्य है आपकी उस दैत्य-मूर्ति को नमस्कार है || १८ || जिस मंदसत्त्व स्वरूप में ह्रदय की नाड़ियाँ अत्यंत ज्ञानवाहिनी नहीं होती तथा जो शब्दादि विषयों का लोभी होता हैं आपके उस यक्षरूप को नमस्कार है || १९ || हे पुरुषोत्तम ! आपका जो क्रूरता और मायासे युक्त घोर तमोमय रूप है उस राक्षसस्वरूप को नमस्कार है || २० || हे जनार्दन ! जो स्वर्ग में रहनेवाले धार्मिक जनों के यागादि सद्धर्मोंके फल की प्राप्ति करनेवाला आपका धर्म नामक रूप है उसे नमस्कार हैं || २१ || जो जल-अग्नि आदि गमनीय स्थानों में जाकर भी सर्वदा निर्लिप्त और प्रसन्न्तामय रहता है वह सिद्ध नामक रूप आपही का है; ऐसे सिद्धस्वरूप आपको नमस्कार है || २२ || हे हरे ! जो अक्षमा का आश्रय अत्यंत क्रूर और कामोपभोग में समर्थ आपका द्विजिह्व (दो जीभवाला) रूप है, उन नागस्वरूप आपको नमस्कार है || २३ || हे विष्णो ! जो ज्ञानमय, शांत, दोषरहित और कल्मषहीन है उस आपके मुनिमय स्वरूप को नमस्कार है || २४ || जो कल्पान्तमें अनिवार्यरूप से समस्त भूतोंका भक्षण कर जाता है, हे पुण्डरीकाक्ष ! आपके उस कालस्वरूप को नमस्कार है || २५ ||

जो प्रलयकाल में देवता आदि समस्त प्राणियों को सामान्य भावसे भक्षण करके नृत्य करता है आपके उस रूद्र-स्वरूप को नमस्कार है || २६ || रजोगुण की प्रवृत्ति के कारण जो कर्मों का करणरूप है, हे जनार्दन ! आपके उस मनुष्यात्मक स्वरूप को नमस्कार है || २७ || हे सर्वात्मन ! जो अट्ठाईस ‘वध-युक्त’ तमोमय और उन्मार्गगामी है आपके उस पशुरूप को नमस्कार है || २८ || जो जगत की स्थिति का साधन और यज्ञ का अंगभूत है तथा वृक्ष, लता, गुल्म, वीरूध, तृण और गिरि – इन छ: भेड़ों से युक्त हैं उन मुख्य रूप आपको नमस्कार है || २९ || तिर्यक मनुष्य तथा देवता आदि प्राणी, आकाशादि पंचभूत और शब्दादि उनके गुण – ये सब, सबके आदिभूत आपही के रूप है; अत: आप सर्वात्मा को नमस्कार है || ३० ||

हे परमात्मन ! प्रधान और मह्त्तत्त्वादिरूप इस सम्पूर्ण जगत से जो परे हैं, सबका आदि कारण है तथा जिसके समान कोई अन्य रूप नहीं है, आपके उस प्रकृति आदि करणों के भी कारण रुपको नमस्कार है || ३१ || हे भगवन ! जो शुक्लादि रूपसे, दीर्घता आदि परिमाण से ततः घंटा आदि गुणोंसे रहित है, इसप्रकार जो समस्त विशेषणों का अविषय है तथा परमर्षियों का दर्शनीय एवं शुद्धातिशुद्ध है आपके उस स्वरूप को हम नमस्कार करते है || ३२ || जो हमारे शरीरों में, अन्य प्राणियों के शरीरों में तथा समस्त वस्तुओं में वर्तमान है, अजन्मा और अविनाशी है तथा जिससे अतिरिक्त और कोई भी नहीं है, उस ब्रह्मस्वरूप को हम नमस्कार करते हैं || ३३ || परमपद ब्रह्म ही जिसका आत्मा है ऐसे जिस सनातन और अजन्मा भगवान का यह सकल प्रपंच रूप है, उस सबके बीजभूत, अविनाशी और निर्मल प्रभु वासुदेव को हम नमस्कार करते अहिं || ३४ ||

श्रीपराशरजी बोले – हे मैत्रेय ! स्त्रोत्र के समाप्त हो जानेपर देवताओं ने परमात्मा श्रीहरि को हाथ में शंख, चक्र और गदा लिये तथा गरुडपर आरूढ़ हुए अपने सम्मुख विराजमान देखा || ३५ || उन्हें देखकर समस्त देवताओं ने प्रणाम करने के अनन्तर उनसे कहा – हे नाथ ! प्रसन्न होइये और हम शरणागतों की दैत्यों से रक्षा कीजिये || ३६ || हे परमेश्वर ! ह्लाद प्रभुति दैत्यगण ने ब्रह्माजी की आज्ञा का भी उल्लंघन कर हमारे और त्रिलोकी के यज्ञभागों का अपहरण कर लिया है || ३७ || यद्यपि हम और वे सर्वभूत आपही के अंशज है तथापि अविद्यावश हम जगत को परस्पर भिन्न-भिन्न देखते हैं || ३८ || हमारे शत्रुगण अपने वर्णधर्मका पालन करनेवाले, वेदमार्गावलम्बी और तपोनिष्ठ हैं, अत: वे हमसे नहीं मारे जा सकते || ३९ || अत: हे सर्वात्मन ! जिससे हम उन असुरोंका वध करने में समर्थ हो ऐसा कोई उपाय आप हमें बतलाइये || ४० ||

श्रीपराशरजी बोले – उनके ऐसा कहनेपर भगवान विष्णु ने अपने शरीर से मायामोह को उत्पन्न किया और उसे देवताओं को देकर कहा || ४१ || यह मायामोह उन सम्पूर्ण दैत्यगण को मोहित कर देगा, तब वे वेदमार्ग का उल्लंघन करने से तुमलोगों से मारे जा सकेंगे || ४२ || हे देवगण ! जो कोई देवता अथवा दैत्य ब्रह्माजी के कार्य में बाधा डालते हैं वे सृष्टि की रक्षा में तत्पर मेरे बध्य होते है || ४३ || अत: हे देवगण ! अब तुम जाओ | डरो मत | यह मायामोह आगेसे जाकर तुम्हारा उपकार करेगा || ४४ ||

श्रीपराशरजी बोले – भगवान की ऐसी आज्ञा होनेपर देवगण उन्हें प्रणाम कर जहाँ से आये थे वहाँ चले गये तथा उनके साथ मायामोह भी जहाँ असुरगण थे वहाँ गया || ४५ ||

इति श्रीविष्णुपुराणे तृतीयेऽशे त्रयोदशोऽध्यायः से सप्तदशोऽध्यायः

विष्णुपुराण – तृतीय अंश – ११ से १२

Beautiful golden sunrise
ॐ श्री मन्नारायणाय नम:
नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम | देवी सरस्वती व्याप्तं ततो जयमुदिरयेत ||

श्रीविष्णुपुराण

तृतीय अंश

अध्याय – ग्यारहवाँ – बारहवाँ

ग्रहस्थसम्बन्धी सदाचार का वर्णन

और्व बोले – गृहस्थ पुरुष को नित्यप्रति देवता, गौ, ब्राह्मण, सिद्धगण, वयोवृद्ध तथा आचार्य की पूजा करनी चाहिये और दोनों समय संध्यावन्दन तथा अग्निहोत्रादि कर्म करने चाहिये || १ || गृहस्थ पुरुष सदा ही संयमपूर्वक रहकर बिना कहींसे कटे हुए दो वस्त्र, उत्तम औषधियाँ और गारुड (मरकत आदि विष नष्ट करनेवाले) रत्न धारण करे || २ || वह केशों को स्वच्छ और चिकना रखे तथा सर्वदा सुगंधयुक्त सुंदर वेष और मनोहर श्वेतपुष्प धारण करें || ३ || किसीका थोडा-सा भी धन हरण न करें और थोडा-सा भी अप्रिय भाषण न करे | जो मिथ्या हो ऐसा प्रिय वचन भी कभी न बोले और न कभी दूसरों के दोषों को ही कहे || ४ || हे पुरुषश्रेष्ठ ! दूसरों की स्त्री अथवा दूसरों के साथ वैर करने में कभी रूचि न करे, निन्दित सवारी में कभी न चढ़े और नदीतीर की छाया का कभी आश्रय न ले || ५ || बुद्धिमान पुरुष लोकविदिष्ट, पतित, उन्मत्त और जिसके बहुत-से शत्रु हों ऐसे परपीडक पुरुषों के साथ तथा कुलटा, कुलटा के स्वामी, क्षुद्र, मिथ्यावादी अति व्ययशील, निंदापरायण और दुष्ट पुरुषों के साथ कभी मित्रता न करे और न कभी मार्ग में अकेला चले || ६ – ७ || हे नरेश्वर ! जलप्रवाह के वेग में सामने पड़कर स्नान न करे, जलते हुए घरमे प्रवेश न करे और वृक्ष की चोटीपर न चढ़े || ८ || दाँतो को परस्पर न घिसे, नाक को न कुरेदे तथा मुख को बंद लिये हुए जमुहाई न ले और न बंद मुखसे खाँसे या श्वास करते हुए अधोवायु न छोड़े; तथा नखों को न चबावे, तिनका न तोड़ें और पृथ्वीपर भी न लिखे || १० ||

हे प्रभो ! विचक्षण पुरुष मूँछ-दाढ़ी के बालों को न चबावे, दो ढेलों को परस्पर न रगड़े और अपवित्र एवं निन्दित नक्षत्रों को न देखे || ११ || नग्न परस्त्री को और उदय अथवा अस्त होते हुए सूर्य को न देखे तथा शव और शव – गंध से घृणा न करे, क्योंकि शव – गंध सोम का अंश है || १२ || चौराहा, चैत्यवृक्ष, श्मशान, उपवन और दुष्टा स्त्री की समीपता – इन सबका रात्रि के समय सर्वदा त्याग करे || १३ || बुद्धिमान पुरुष अपने पूजनीय देवता, ब्राह्मण और तेजोमय पदार्थों की छाया को कभी न लाँघे तथा शून्य वनखंडी और शून्य घरमें कभी अकेला न रहे || १४ || प्राज्ञ पुरुष को चाहिये कि अनार्य व्यक्ति का संग न करे, कुटिल पुरुष में आसक्त न हो, सर्प के पास न जाय और जग पड़नेपर अधिक देरतक लेटा न रहे || १३ || हे नरेश्वर ! बुद्धिमान पुरुष जागने, सोने, स्नान करने, बैठने, शय्यासेवन करने और व्यायाम करने में अधिक समय न लगावे || १७ || हे राजेन्द्र ! प्राज्ञ पुरुष दाँत और सींगवाले पशुओं को, ओस को तथा सामनेकी वायु और धूप को सर्वदा परित्याग करे ||१८ || नग्न होकर स्नान, शयन और आचमन न करे तथा केश खोलकर आचमन और देव-पूजन न करे || १९ || होम तथा देवार्चन आदि क्रियाओं में, आचमन में , पुण्याहवाचन में और जप में एक वस्त्र धारण करके प्रवृत्त न हो || २० || संशयशील व्यक्तियों के साथ कभी न रहे | सदाचारी पुरुषों का तो आधे क्षण का संग भी अति प्रशंसनीय होता है || २१ || बुद्धिमान पुरुष उत्तम अथवा अधम व्यक्तियों से विरोध न करे | हे राजन ! विवाह और विवाद सदा समान व्यक्तियों से ही होना चाहिये || २२ || प्राज्ञ पुरुष कलह न बढ़ावे तथा व्यर्थ वैर का भी त्याग करे | थोड़ी-सी हानि सह ले, किन्तु वैर से कुछ लाभ होता हो तो उसे भी छोड़ दे || २३ || स्नान करने के अनन्तर स्नान से भीगी हुई धोती अथवा हाथों से शरीर को न पोछे तथा खड़े-खड़े केशों को न झाडे और आचमन भी न करे || २४ || पैर के ऊपर पैर न रखे, गुरुजनों के सामने पैर न फैलावे और धृष्टतापूर्वक उनके सामने कभी उच्चासनपर न बैठे || २५ ||

देवालय, चौराहा, मांगलिक द्रव्य और पूज्य व्यक्ति – इन सबको बायीं ओर रखकर न निकले तथा इनके विपरीत वस्तुओं को दायीं ओर रखकर न जाय || २६ || चन्द्रमा, सूर्य, अग्नि, जल, वायु और पूज्य व्यक्तियों के सम्मुख पंडित पुरुष मल – मूत्र – त्याग न करे और न थूके ही || २७ || खड़े- खड़े अथवा मार्ग में मूत्र-त्याग न करे तथा श्लेष्मा (थूक), विष्ठा, मूत्र और रक्त को कभी न लाँघे || २८ || भोजन, देव-पूजा, मांगलिक कार्य और जप-होमादि के समय तथा महापुरुषों के सामने थूकना और छींकना उचित नहीं है || २९ || बुद्धिमान पुरुष स्त्रियों का अपमान न करे, उनका विश्वास भी न करे तथा उनसे ईर्ष्या और उनका तिरस्कार भी कभी न करे || ३० || सदाचार – परायण प्राज्ञ व्यक्तियों का अभिवादन किये बिना कभी अपने घरसे न निकले || ३१ || चौराहों को नमस्कार करे, यथासमय अग्निहोत्र करे, दीन-दु:खियों का उद्धार करे और बहुश्रुत साधू पुरुषों का सत्संग करे || ३२ ||

जो पुरुष देवता और ऋषियों की पूजा करता है, पितृगण को पिंडोदक देता है और अतिथि का सत्कार करता है वह पुण्यलोकों को जाता है || ३३ || जो व्यक्ति जितेन्द्रिय होकर समयानुसार हित, मित और प्रिय भाषण करता है, हे राजन ! वह आनंद के हेतुभूत अक्षय लोकों को प्राप्त होता है || ३४ || बुद्धिमान, लज्जावान, क्षमाशील, आस्तिक और विनयी पुरुष विद्वान और कुलीन पुरुषों के योग्य उत्तम लोकों में जाता है || ३५ || अकाल मेघगर्जना के समय, पर्व-दिनोंपर, अशौच काल में तथा चन्द्र और सूर्यग्रहण के समय बुद्धिमान पुरुष अध्ययन न करे || ३६ || जो व्यक्ति क्रोधित को शांत करता है, सबका बन्धु है, मत्सरशून्य है, भयभीत को सांत्वना देनेवाला है और साधू स्वभाव है उसके लिये स्वर्ग तो बहुत थोडा फल है || ३७ || जिसे शरीर-रक्षा की इच्छा हो वह पुरुष वर्षा और धुप में छाता लेकर निकले, रात्रि के समय और वन में दंड लेकर जाय तथा जहाँ कहीं जाना हो सर्वदा जूते पहनकर जाय || ३८ || बुद्धिमान पुरुष को कमर की ओर, इधर-उधर अथवा दूर के पदार्थों को देखते हुए नहीं चलना चाहिये, केवल युगमात्र (चार हाथ) पृथ्वी को देखता हुआ चले || ३९ ||

जो जितेन्द्रिय दोषके समस्त हेतुओं को त्याग देता है उसके धर्म, अर्थ और कामकी थोड़ी-सी भी हानि नहीं होती || ४० || जो विद्या-विनय-सम्पन्न, सदाचारी प्राज्ञ पुरुष पापी के प्रति पापमय व्यवहार नहीं करता, कुटिल पुरुषों से प्रिय भाषण करता हैं तथा जिसका अंत:करण मैत्री से द्रवीभूत रहता हैं, मुक्ति उसकी मुट्ठी में रहती है || ४१ || जो वीतरागमहापुरुष कभी काम, क्रोध और लोभादिके वशीभूत नहीं होते तथा सर्वदा सदाचार में स्थित रहते हैं उनके प्रभाव से ही पृथ्वी टिकी हुई है || ४२ || अत: प्राज्ञ पुरुष को वही सत्य कहना चाहिये जो दूसरों की प्रसन्नता का कारण हो | यदि किसी सत्य वाक्य के कहने से दूसरों को दुःख होता जाने तो मौन रहे || ४३ || यदि प्रिय वाक्य को भी अहितकर समझे तो उसे न कहे; उस अवस्था में तो हितकर वाक्य ही कहना अच्छा है, भले ही वह अत्यंत अप्रिय क्यों न हो || ४४ || जो कार्य इहलोक और परलोक में प्राणियों के हितका साधक हो मतिमान पुरुष मन, वचन और कर्म से उसीका आचरण करें || ४५  ||

इति श्रीविष्णुपुराणे तृतीयेऽशे एकादशोऽध्यायः और द्वादशोऽध्यायः

विष्णुपुराण – तृतीय अंश – १०

Beautiful golden sunrise
ॐ श्री मन्नारायणाय नम:
नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम | देवी सरस्वती व्याप्तं ततो जयमुदिरयेत ||

श्रीविष्णुपुराण

तृतीय अंश

अध्याय – दसवाँ

जातकर्म, नामकरण और विवाह-संस्कार की विधि

सगर बोले – हे द्विजश्रेष्ठ ! अपने चारों आश्रम और चारों वर्णों के कर्मों का वर्णन किया | अब मैं आपके द्वारा मनुष्यों के कर्मों को सुनना चाहता हूँ || १ || हे भृगुश्रेष्ठ ! मेरा विचार हैं कि आप सर्वज्ञ है | अतएव आप मनुष्यों के नित्य-नैमित्तिक और काम्य आदि सब प्रकार के कर्मों का निरूपण कीजिये || २ ||

और्य बोले – हे राजन ! आपने जो नित्य-नैमित्तिक आदि क्रियाकलाप के विषय में पूछा सो मैं सबका वर्णन करता हूँ, एकाग्रचित्त होकर सुनो || ३ ||

पुत्र के उत्पन्न होनेपर पिताको चाहिये कि उसके जातकर्म आदि सकल क्रियाकांड और आभ्युदयिक श्राद्ध करे || ४ || हे नरेश्वर ! पूर्वाभिमुख बिठाकर युग्म ब्राह्मणों को भोजन करावे तथा द्विजातियों के व्यवहार के अनुसार देव और पितृपक्ष की तृप्ति के लिये श्राद्ध करे || ५ || और हे राजन ! प्रसन्नतापूर्वक देवतीर्थ (अँगुलियों के अग्रभाग) द्वारा नांदीमुख पितृगण को दही, जौ और बदरीफल मिलाकर बनाये हुए पिण्ड दे || ६ || अथवा प्राजापत्यतीर्थ (कनिष्ठिका के मूल) द्वारा सम्पूर्ण उपचारद्रव्यों का दान करें | इसी प्रकार [ कन्या अथवा पुत्रों के विवाह आदि ] समस्त वृद्धिकालों में भी करे || ७ ||

तदनन्तर, पुत्रोत्पत्तिके दसवे दिन पिता नामकरण-संस्कार करे | पुरुष का नाम पुरुषवाचक होना चाहिये | उसके पूर्व में देववाचक शब्द हो तथा पीछे शर्मा, वर्मा आदि होने चाहिये || ८ || ब्राह्मण के नाम के अंतमे शर्मा, क्षत्रिय के अंत में वर्मा तथा वैश्य और शूद्रों के नामांत में क्रमश: गुप्त और दास शब्दों का प्रयोग करना चाहिये || ९ || नाम अर्थहीन, अविहित, अपशब्दयुक्त, अमांगलिक और निंदनीय न होना चाहिये तथा उसके अक्षर समान होने चाहिये || १० || अति दीर्घ, अति लघु अथवा कठिन अक्षरों से युक्त नाम न रखे | जो सुखपूर्वक उच्चारण किया जा सके और जिसके पीछे के वर्ण लघु हों ऐसे नामका व्यवहार करे || ११ ||

तदनन्तर उपनयन-संस्कार हो जानेपर गुरुगृह में रहकर विधिपूर्वक विद्याध्ययन करे || १२ || हे भूपाल ! फिर विद्याध्ययन कर चुकनेपर गुरु को दक्षिणा देकर यदि गृहस्थाश्रम में प्रवेश करनेकी इच्छा हो तो विवाह कर ले || १३ || यह दृढ़ संकल्पपूर्वक नैष्ठिक ब्रह्मचर्य ग्रहणकर गुरु अथवा गुरुपुत्रों की सेवा-शुश्रूषा करता रहे || १४ || अथवा अपनी इच्छानुसार वानप्रस्थ या संन्यास ग्रहण कर ले | हे राजन ! पहले जैसा संकल्प किया हो वैसा ही करे || १५ ||

यदि विवाह करना हो तो अपनेसे तृतीयांश अवस्थावाली कन्या से विवाह करे तथा अधिक या अल्प केशवाली अथवा अति साँवली या पांडूवर्णा (भूरे रंगकी) स्त्री से सम्बन्ध न करे || १६ || जिसके जन्म से ही अधिक या न्यून अंग हो, जो अपवित्र, रोमयुक्त, अकुलीना अथवा रोगिणी हो उस स्त्री से पाणिग्रहण न करे || १७ || बुद्धिमान पुरुषको उचित है कि जो दुष्ट स्वभाववाली हो, कटुभाषिणी हो, माता अथवा पिता के अनुसार अंगहीना हो, जिसके श्मश्रु (मूँछों के ) चिन्ह हो, जो पुरुष के से आकारवाली हो अथवा घर्घर शब्द करनेवाले अतिमन्द या गोल नेत्रोवाली हो उस स्त्री से विवाह न करे || १८ – १९ || जिसकी जंघाओंपर रोम हो, जिसके गल्फ ऊँचे हों तथा हँसते समय जिसके कपोलों में गड्डे पड़ते हों उस कन्यासे विवाह न करे || २० || जिसकी कान्ति अत्यंत उदासीन न हो, नख पांडूवर्ण हों, नेत्र लाल हों तथा हाथ-पैर कुछ भारी हो, बुद्धिमान पुरुष उस कन्यासे सम्बन्ध न करे || २१ || जो अति वामन अथवा अति दीर्घ हो, जिसकी भृकुटियाँ जुडी हुई हो, जिसके दाँतों में अधिक अंतर हो तथा जो दन्तुर (अंगों को दाँत निकले हुए) मुखवाली हो उस स्त्रीसे कभी विवाह न करे || २२|| हे राजन ! मातृपक्ष से पाँचवी पीढ़ीतक और पितृपक्ष से सातवीं पीढ़ीतक जिस कन्याका सम्बन्ध न हो, गृहस्थ पुरुष को नियमानुसार उसीसे विवाह करना चाहिये || २३ || ब्राह्य, दैव, आर्ष, प्राजापत्य, आसुर, गान्धर्व, राक्षस और पैशाच – ये आठ प्रकार के विवाह है || २४ || इनमें से जिस विवाह को जिस वर्ण के लिये महर्षियों ने धर्मानुकुल कहा है उसी के द्वारा दार-परिग्रह करे, अन्य विधियों को छोड़ दे || २५ || इसप्रकार सहधर्मिणी को प्राप्तकर उसके साथ गार्हस्थ्यधर्म का पालन करे, क्योंकि उसका पालन करनेपर वह महान फल देनेवाला होता है || २६ ||

इति श्रीविष्णुपुराणे तृतीयेऽशे दशमोऽध्यायः

विष्णुपुराण – तृतीय अंश – ९

Beautiful golden sunrise
ॐ श्री मन्नारायणाय नम:
नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम | देवी सरस्वती व्याप्तं ततो जयमुदिरयेत ||

श्रीविष्णुपुराण

तृतीय अंश

अध्याय – नवाँ

ब्रह्मचर्य आदि आश्रमों का वर्णन

और्व बोलेहे भूपते ! बालक को चाहिये कि उपनयन-संस्कार के अनन्तर वेदाध्ययन में तत्पर होकर ब्रह्मचर्य का अवलम्बन कर सावधानतापूर्वक गुरुगृह में निवास करे || १ || वहाँ रहकर उसे शौच और आचार-व्रतका पालन करते हुए गुरु की सेवा-शुश्रूषा करनी चाहिये तथा व्रतादिका आचरण करते हुए स्थिर-बुद्धिसे वेदाध्यायन करना चाहिये || २ || हे राजन ! दोनों संध्याओं में एकाग्र होकर सूर्य और अग्निकी उपासना करे तथा गुरुका अभिवादन करें || ३ || गुरु के खड़े होनेपर खड़ा हो जाय, चलनेपर पीछे-पीछे चलने लगे तथा बैठ जानेपर नीचे बैठ जाय | हे नृपश्रेष्ठ ! इस प्रकार कभी गुरु के विरुद्ध कोई आचरण न करे || ४ || गुरूजी के कहनेपर ही उनके सामने बैठकर एकाग्रचित्त से वेदाध्ययन करें और उनकी आज्ञा होनेपर ही भिक्षान्न भोजन करे || ५ || जल में प्रथम आचार्य के स्नान कर चुकनेपर फिर स्वयं स्नान करे तथा प्रतिदिन प्रात:काल गुरूजी के लिये समिधा, जल, कुश और पुष्पादि लाकर जुटा दे || ६ ||

इसप्रकार अपना अभिमत वेदपाठ समाप्त कर चुकनेपर बुद्धिमान शिष्य गुरूजी की आज्ञा से उन्हें गुरुदक्षिणा देकर गृहस्थाश्रम में प्रवेश करे || ७ || हे राजन ! फिर विधिपूर्वक पाणिग्रहण कर अपनी वर्णानुकूल वृत्ति से द्रव्योंपार्जन करता हुआ सामर्थ्यानुसार समस्त गृहकार्य करता रहे || ८ || पिण्ड-दानादि से पितृगणकी, यज्ञादि से देवताओं की, अन्नदान से अतिथियों की, स्वाध्याय से ऋषियों की, पुत्रोत्पत्तिसे प्रजापति की, बलियों (अन्नभाग) से भूतगण की तथा वात्सल्यभावसे सम्पूर्ण जगतकी पूजा करते हुए पपुरुष अपने कर्मोद्वारा मिले हुए उत्तमोत्तम लोकों को प्राप्त कर लेता है || ९ – १० ||

जो केवल भिक्षावृत्तिसे ही रहनेवाले परिव्राजक और ब्रह्मचारी आदि हैं उनका आश्रय भी गृहस्थाश्रम ही हैं, अत: यह सर्वश्रेष्ठ हैं || ११ || हे राजन ! विप्रगण वेदाध्ययन, तीर्थस्नान और देश दर्शन के लिये पृथ्वी-पर्यटन किया करते हैं || १२ || उनमे से जिनका कोई निश्चित गृह अथवा भोजन-प्रबंध नहीं होता और जो जहाँ सायंकाल हो जाता है वहीँ ठहर जाते हैं, उन सबका आधार और मूल गृहस्थाश्रम ही है || १३ || हे राजन ! ऐसे लोग जब घर आवें तो उनका कुशल-प्रश्न और मधुर वचनों से स्वागत करें तथा शय्या, आसन और भोजन के द्वारा उनका यथाशक्ति सत्कार करे || १४ || जिसके घरसे अतिथि निराश होकर लौट जाता हैं उसे अपने समस्त दुष्कर्म देकर वह अतिथि उसके पुण्यकर्मों को स्वयं ले जाता हाँ || १५ || ग्रहस्थ के लिये अतिथि के प्रति अपमान, अंहकार और दम्भ का आचरण करना, उसे देकर पछताना, उसपर प्रहार करना अथवा उससे कटुभाषण करना उचित नहीं है || १६ || इसप्रकार जो गृहस्थ अपने परम धर्मका पूर्णतया पालन करता है वह समस्त बन्धनों से मुक्त होकर अत्युत्तम लोकों को प्राप्त कर लेता हैं || १७ ||

हे राजन ! इसप्रकार गृह्स्थोचित कार्य करते-करते जिसकी अवस्था ढल गयी हो उस गृहस्थ को उचित है कि स्त्री को पुत्रों के प्रति सौंपकर अथवा अपने साथ लेकर वनको चला जाय || १८ || वहाँ पत्र, मूल, फल आदिका आहार करता हुआ, लोभ, श्मश्रु (दाढ़ी-मूँछ) और जटाओं को धारण कर पृथ्वीपर शयन करें और मुनिवृत्ति का अवलम्बन कर सब प्रकार अतिथि की सेवा करें || १९ || उसे चर्म, काश और कुशाओं से अपना बिछौना तथा ओढने का वस्त्र बनाना चाहिये | हे नरेश्वर ! उस मुनि के लिये त्रिकाल-स्नान का विधान है || २० || इसीप्रकार देवपूजन, होम, सब अतिथियों का सत्कार, भिक्षा और बलिवैश्वदेव, भी उसके विहित कर्म है || २१ || हे राजेन्द्र ! वन्य तैलादि को शरीर में मलना और शीतोष्णका सहन करते हुए तपस्या में लगे रहना उसके प्रशस्त कर्म है || २२ || जो वानप्रस्थ मुनि इन नियत कर्मों का आचरण करता है वह अपने समस्त दोषोंको अग्नि के समान भस्म कर देता हैं और नित्य-लोकों को प्राप्त कर लेता हैं || २३ ||

हे नृप ! पंडितगण जिस चतुर्थ आश्रम को भिक्षु आश्रम कहते हैं अब मैं उसके स्वरूप का वर्णन करता हूँ, सावधान होकर सुनो || २४ || हे नरेन्द्र ! तृतीय आश्रम के अनन्तर पुत्र, द्रव्य और स्त्री आदि के स्नेह को सर्वथा त्यागकर तथा मात्सर्य को छोडकर चतुर्थ आश्रम में प्रवेश करे || २५ || हे पृथ्वीपते ! भिक्षुको उचित हैं कि अर्थ, धर्म और कामरूप त्रिवर्गसम्बन्धी समस्त कर्मों को छोड़ दें, शत्रु-मित्रादि में समान भाव रखें और सभी जीवों का सुह्रद हो || २६ || निरंतर समाहित रहकर जरायुज, अंडज और स्व्देज आदि समस्त जीवों से मन, वाणी अथवा कर्मद्वारा कभी द्रोह न करें तथा सब प्रकार की आसक्तियों को त्याग दे || २७ || ग्राम में एक रात और पुर में पाँच रात्रितक रहें तथा इतने दिन भी तो इसप्रकार रहे जिससे किसीसे प्रेम अथवा द्वेष न हो || २८ || जिस समय घरों में अग्नि शांत हो जाय और लोग भोजन कर चुके उस समय प्राणरक्षा के लिये उत्तम वर्णों में भिक्षा के लिये जाय || २९ || परिव्राजक को चाहिये कि काम, क्रोध तथा दर्प, लोभ और मोह आदि समस्त दुर्गुणों को छोडकर ममताशून्य होकर रहे || ३० || जो मुनि समस्त प्राणियों को अभयदान देकर विचरता है उसको भी किसीसे कबी कोई भय नहीं होता || ३१ || जो ब्राह्मण चतुर्थ आश्रम में अपने शरीर में स्थित प्राणादिसहित जठराग्नि के उद्देश्य से अपने मुख में भिक्षान्नरूप हविसे हवन करता है, वह ऐसा अग्निहोत्र करके अग्निहोत्रियों के लोकों को प्राप्त हो जाता हैं || ३२ || जो ब्राह्मण [ ब्रह्म से भिन्न सभी मिथ्या है, सम्पूर्ण जगत भगवान का ही संकल्प है ] बुद्धियोगी से युक्त होकर, यथाविधि आचरण करता हुआ उस मोक्शाश्रम का पवित्रता और सुखपूर्वक आचरण करता है, वह निरीबंधन अग्नि के समान शांत होता है और अंत में ब्रह्मलोक प्राप्त करता है || ३३ ||

इति श्रीविष्णुपुराणे तृतीयेऽशे नवमोऽध्यायः

विष्णुपुराण- तृतीय अंश- ८

Beautiful golden sunrise
ॐ श्री मन्नारायणाय नम:
नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम | देवी सरस्वती व्याप्तं ततो जयमुदिरयेत ||

श्रीविष्णुपुराण

तृतीय अंश

अध्याय – आठवाँ

विष्णुभगवान की आराधना और चातुर्वर्ण्य – धर्म का वर्णन

श्रीमैत्रेयजी बोले – हे भगवन ! जो लोग संसार को जीतना चाहते हैं वे जिस प्रकार जगत्पति भगवान विष्णु की उपासना करते हैं, वह वर्णन कीजिये || १ || और हे महामुने ! उन गोविन्द की आराधना करनेपर आराधन-परायण पुरुषों को जो फल मिलता है, वह भी मैं सुनना चाहता हूँ || २ ||

श्रीपराशरजी बोले – हे मैत्रेय ! तुम जो कुछ पूछते हो यही बात महात्मा सगर ने और्वसे पूछी थी | उसके उत्तर में उन्होंने जो कुछ कहा वह मैं तुमको सुनाता हूँ, श्रवण करो || ३ || हे मुनिश्रेष्ठ ! सगरने भृगुवंशी महात्मा और्व को प्रणाम करके उनसे भगवान विष्णु की आराधना के उपाय और विष्णुकी उपासना करने से मनुष्य को जो फल मिलता है उसके विषयमें पूछा था | उनके पूछनेपर और्व ने यत्नपूर्वक जो कुछ कहा था वह सब सुनो || ४ – ५ ||

और्व बोले – भगवान विष्णु की आराधना करने से मनुष्य भूमंडल – सम्बन्धी समस्त मनोरथ, स्वर्ग, स्वर्गसे भी श्रेष्ठ ब्रह्मपद और परम निर्वाण – पद भी प्राप्त कर लेता है || ६ || हे राजेद्र ! वह जिस-जिस फल की जितनी-जितनी इच्छा करता है, अल्प हो या अधिक, श्रीअच्युत की आराधना से निश्चय ही यह सब प्राप्त कर लेता है || ७ || और हे भूपाल ! तुमने जो पूछा कि श्रीहरि की आराधना किस प्रकार की जाय, सो सब मैं तुमसे कहता हूँ, सावधान होकर सुनो || ८ || जो पुरुष वर्णाश्रम-धर्म का पालन करनेवाला है वही परमपुरुष विष्णु की आराधना कर सकता है; उनको संतुष्ट करने का और कोई मार्ग नहीं है || ९ || हे नृप ! यज्ञों का यजन करनेवाला पुरुष यन (विष्णु) ही का यजन करता है, जप करनेवाला उन्हीं का जप करता हैं और दूसरों की हिंसा करनेवाला उन्हीं की हिंसा करता है; क्योंकि भगवान हरि सर्वभूतमय है || १० ||

अत: सदाचारयुक्त पुरुष अपने वर्ण के लिये विहित धर्म का आचरण करते हुए श्रीजनार्दन ही की उपासना करता हैं || ११ || हे पृथ्वीपते ! ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शुद्र अपने-अपने धर्म का पालन करते हुए ही विष्णुकी आराधना करते हैं अन्य प्रकार से नहीं || १२ ||

जो पुरुष दूसरों की निंदा, चुगली अथवा मिथ्याभाषण नहीं करता तथा ऐसा वचन भी नहीं बोलता जिससे दूसरों को खेद हो, उससे निश्चय ही भगवान केशव प्रसन्न रहते हैं || १३ || हे राजन ! जो पुरुष दूसरों की स्त्री, धन और हिंसा में रूचि नही करता उससे सर्वदा ही भगवान केशव संतुष्ट रहते हैं || १४ || हे नरेंद्र ! जो मनुष्य ! किसी प्राणी अथवा [ वृक्षादि ] अन्य देहधारियों को पीड़ित अथवा नष्ट नहीं करता उससे श्रीकेशव संतुष्ट रहते हैं || १५ || जो पुरुष देवता, ब्राह्मण और गुरुजनों की सेवामें सदा तत्पर रहता हिं, हे नरेश्वर ! उससे गोविन्द सदा प्रसन्न रहते हैं || १६ |\ जो व्यक्ति स्वयं अपने और अपने पुत्रों के समान ही समस्त प्राणियों का भी हित-चिंतक होता है वह सुगमता से ही श्रीहरि को प्रसन्न कर लेता है || १७ || हे नृप ! जिसका चित्त रागादि दोषों से दूषित नहीं है उस विशुद्ध-चित्त पुरुष से भगवान विष्णु सदा संतुष्ट रहते हैं || १८ || हे नृपश्रेष्ठ ! शास्त्रों में जो – जो वर्णाश्रम-धर्म कहे हैं उन-उनका ही आचरण करके पुरुष विष्णु की आराधना कर सकता हैं और किसी प्रकार नहीं || १९ ||

सगर बोले – हे द्विजश्रेष्ठ ! अब मैं सम्पूर्ण वर्णधर्म और आश्रमधर्मों को सुनना चाहता हूँ, कृपा करके वर्णन कीजिये || २० ||

और्व बोले – जिनका मैं वर्णन करता हूँ, उन ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रों के धर्मों का तुम एकाग्रचित्त होकर क्रमश: श्रवण करो || २१ || ब्राह्मण का कर्तव्य है कि दान दे, यज्ञोंद्वारा देवताओं का यजन करें, स्वाध्यायशील हो, नित्य स्नान-तर्पण करें और अग्न्याधान आदि कर्म करता रहे || २२ || ब्राह्मण को उचित है कि वृत्ति के लिये दूसरों से यज्ञ करावे, औरोंको पढावे और न्यायोंपार्जित शुद्ध धनमें से न्यायानुकुल द्रव्य-संग्रह करे || २३ || ब्राह्मण को कभी किसीका अहित नहीं करना चाहिये और सर्वदा समस्त प्राणियों के हितमें तत्पर रहना चाहिये | सम्पूर्ण प्राणियों में मैत्री रखना ही ब्राह्मण क परम धन है || २४ || पत्थर में और पराये रत्न में ब्राह्मण को समान-बुद्धि रखनी चाहिये | हे राजन ! पत्नी के विषय में ऋतूगामी होना ही ब्राह्मण के लिये प्रशंसनीय कर्म है || २५ ||

क्षत्रिय को उचित है कि ब्राह्मणों को यथेच्छ दान दे, विविध यज्ञों का अनुष्ठान करे और अध्ययन करे || २६ || शस्त्र धारण करना और पृथ्वी की रक्षा करना ही क्षत्रिय की उत्तम आजीविका है; इनमें भी पृथ्वी-पालन ही उत्कृष्टतर है || २७ || पृथ्वी-पालन से ही राजालोग कृतकृत्य हो जाते हैं, क्योंकि पृथ्वी में होनेवाले यज्ञादि कर्मों का अंश राजाको मिलता है || २८ || जो राजा अपने वर्णधर्म को स्थिर रखता है वह दुष्टों को दंड देने और साधुजनों का पालन करने से अपने अभीष्ट लोकों को प्राप्त कर लेता है || २९ ||

हे नरनाथ ! लोकपितामह ब्रह्माजी ने वैश्यों को पशु-पालन, वाणिज्य और कृषि – ये जीविकारूप से दिये हैं || ३० || अध्ययन, यज्ञ, दान और नित्य-नैमित्तिकादि कर्मों का अनुष्ठान – ये कर्म उसके लिये भी विहित है || ३१ ||

शुद्र का कर्तव्य यही हैं कि द्विजातियों की प्रयोजन-सिद्धि के लिये कर्म करें और उसीसे अपना पालन-पोषण करें, अथवा वस्तुओं के लेने-बेचने अथवा कारीगरी के कामों से निर्वाह करे || ३२ || अति नम्रता, शौच, निष्कपट स्वामि-सेवा, मन्त्रहीन यज्ञ, अस्तेय, सत्संग और ब्राह्मण की रक्षा करना – ये शुद्र के प्रधान कर्म है || ३३ || हे राजन ! शुद्र को भी उचित हैं कि दान दे, बलिवैश्वदेव अथवा नमस्कार आदि अल्प यज्ञों का अनुष्ठान करे, पितृश्राद्ध आदि कर्म करे, अपने आश्रित कुटुम्बियों के भरण-पोषण के लिये सकल वर्णों से द्रव्य-संग्रह करे और ऋतूकाल में अपनी ही स्त्री से प्रसंग करे || ३४ – ३५ || हे नरेश्वर ! इनके अतिरिक्त समस्त प्राणियोंपर दया, सहनशीलता, अमानिता, सत्य, शौच, अधिक परिश्रम न करना, मंगलाचरण, प्रियवादिता, मैत्री, निष्कामता, अकृपणता और किसी के दोष न देखना – ये समस्त वर्णों के सामन्य गुण हैं || ३६ – ३७ ||

सब वर्णों के सामान्य लक्षण इसी प्रकार हैं | अब इन ब्राह्मणादि चारों वर्णों के आपधर्म और गुणों का श्रवण करो || ३८ || आपत्ति के समय ब्राह्मण को क्षत्रिय और वैश्य-वर्णों की वृत्तिका अवलम्बन करना चाहिये तथा क्षत्रिय को केवल वैश्ववृत्तिका ही आश्रय लेना चाहिये | ये दोनों शुद्र का कर्म (सेवा आदि) कभी न करें | ३९ ||

हे राजन ! इन उपरोक्त वृत्तियों को भी सामर्थ्य होनेपर त्याग दे; केवल आपत्काल में ही इनका आश्रय ले, कर्म-संकरता (कर्मों का मेल) न करें || ४० || हे राजन ! इसप्रकार वर्णधमों का वर्णन तो मैं तुमसे कर दिया; अब आश्रम-धर्मों का निरूपण और करता हूँ, सावधान होकर सुनो || ४१ ||

इति श्रीविष्णुपुराणे तृतीयेऽशे अष्टमोऽध्यायः

विष्णु पुराण – तृतीय अंश – ७

Beautiful golden sunrise
ॐ श्री मन्नारायणाय नम:
नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम | देवी सरस्वती व्याप्तं ततो जयमुदिरयेत ||

श्रीविष्णुपुराण

तृतीय अंश

अध्याय – सातवाँ

यमगीता

श्रीमैत्रेयजी बोले – हे गुरो ! मैंने जो कुछ पूछा था वह सब आपने यथावत वर्णन किया | अब मैं एक बात और सुनना चाहता हूँ, वह आप मुझसे कहिये || १ || हे महामुने ! सातों द्वीप, सातों पाताल और सातों लोक – ये सभी स्थान जो इस ब्रह्मांड के अंतर्गत हैं, स्थूल, सूक्ष्म, सूक्ष्मतर, सूक्ष्मातिसूक्ष्म तथा स्थूल और स्थूलतर जीवों से भरे हुए हैं || २ -३ || हे मुनिसत्तम ! एक अंगुल का आठवाँ भाग भी कोई ऐसा स्थान नहीं हैं जहाँ कर्म-बंधन से बँधे हुए जीव न रहते हो || ४ || किन्तु हे भगवन ! आयु के समाप्त होनेपर ये सभी यमराज के वशीभूत हो जाते हैं और उन्हीं के आदेशानुसार नरक आदि नाना प्रकार की यातनाएँ भोगते हैं || ५ || तदनन्तर पाप-भोग के समाप्त होनेपर वे देवादि योनियों में घूमते रहते हैं – सकल शास्त्रों का ऐसा ही मत है || ६ || अत: आप मुझे वह कर्म बताइये जिसे करने से मनुष्य यमराज के वशीभूत नहीं होता; मैं आपसे यही सुनना चाहता हूँ || ७ ||

श्रीपराशरजी बोले – हे मुने ! यशी प्रश्न महात्मा नकुलने पितामह भीष्म से पूछा था | उसके उत्तर में उन्होंने जो कुछ कहा था वह सुनो || ८ ||

भीष्मजी ने कहा – हे वत्स ! पूर्वकाल में मेरे पास एक कलिंगदेशीय ब्राह्मण मित्र आया और मुझसे बोला – ‘मी पुछ्नेपर एक जातिस्मर मुनिने बतलाया था कि ये सब बातें अमुक – अमुक प्रकार ही होगी |’ हे वत्स ! उस बुद्धिमान ने जो – जो बातें जिस-जिस प्रकार होने को कही थीं वे सब ज्यों – कीं – त्यों हुई || ९ – १० || इसप्रकार उसमें श्रद्धा हो जाने से मैंने उससे फिर कुछ और भी प्रश्न किये और उनके उत्तर में उस द्विजश्रेष्ठ ने जो- जो बातें बतलायीं उनके विपरीत मैंने कभी कुछ नहीं देखा || ११ || एक दिन, जो बात तुम मुझसे पूछते हो वही मैंने उस कालिंग ब्राह्मण से पूछी | उस समय उसने उस मुनि के वचनों को याद करके कहा कि उस जातिस्मर ब्राह्मण ने, यम और उनके दूतों के बीचमें जो संवाद हुआ था, वह अति गूढ़ रहस्य मुझे सुनाया था | वही मैं तुमसे कहता हूँ || १२ – १३ ||

कालिंग बोला – अपने अनुचर को हाथमें पाश लिये देखकर यमराज ने उसके कानमें कहा – ‘भगवान मधुसुदन के शरणागत व्यक्तियों को छोड़ देना, क्योंकि मैं वैष्णवों से अतिरिक्त और सब मनुष्यों का ही स्वामी हूँ || १४ || देव-पूज्य विधाताने मुझे ‘यम’ नामसे लोकों के पाप-पुण्य का विचार करने के लिये नियुक्त किया है | मैं अपने गुरु श्रीहरि के वशीभूत हूँ, स्वतंत्र नहीं हूँ | भगवान विष्णु मेरा भी नियन्त्रण करने में समर्थ हैं || १५ || जिस प्रकार सुवर्ण भेदरहित और एक होकर भी कटक, मुकुट तथा कर्णिका आदि के भेद से नानारूप प्रतीत होता है उसी प्रकार एक ही हरिका देवता, मनुष्य और पशु आदि नाना-विध कल्पनाओं से निर्देश किया जाता हैं || १६ ||

जिसप्रकार वायु के शांत होनेपर उसमें उड़ते हुए परमाणु पृथ्वी से मिलकर एक हो जाते हैं उसी प्रकार गुण-क्षोम से उत्पन्न हुए समस्त देवता, मनुष्य और पशु आदि उस सनातन परमात्मा से लीन हो जाते हैं || १७ || जो भगवान के सुरवरवन्दित चरण-कमलों की परमार्थ-बुद्धिसे वन्दना करता है, घृताहुति से प्रज्वलित अग्नि के समान-समस्त पाप-बंधन से मुक्त हुए उस पुरुष को तुम दुरहीसे छोडकर निकल जाना || १८ ||

यमराज के ऐसे वचन सुनकर पाशहस्त यमदूत ने उनसे पूछा – ‘प्रभो ! सबके विधाता भगवान हरिका भक्त कैसा होता है, यह आप मुझसे कहिये || १९ ||

यमराज बोलेजो पुरुष अपने वर्ण-धर्म से विचलित नहीं होता, अपने सुह्रद और विपक्षियों के प्रति समान भाव रखता हैं, किसीका द्रव्य हरण नहीं करता तथा किसी जीव की हिंसा नहीं करता उस अत्यंत रागादि-शून्य और निर्मलचित व्यक्ति को भगवान विष्णुका भक्त जानो || २० || जिस निर्मलमतिका चित्त कलि-कल्मषरूप मलसे मलिन नहीं हुआ और जिसने अपने ह्रदय में श्रीजनार्दन को बसाया हुआ है उस मनुष्यको भगवान का अतीव भक्त समझो || २१ ||

जो एकांत में पड़े हुए दूसरे के सोने को देखकर भी उसे अपनी बुद्धिद्वारा तृण के समान समझता हैं और निरंतर भगवान का अनन्यभाव से चिन्तन करता है उस नरश्रेष्ठ को विष्णुका भक्त जानो || २२ || कहाँ तो स्फटिकागिरीशिला के समान अति निर्मल भगवान विष्णु और कहाँ मनुष्यों के चित्त में रहनेवाले राग-द्वेषादि दोष ? हिमकर (चन्द्रमा) के किरण जालमें अग्नि-तेज की उष्णता कभी नहीं रह सकती है || २३ || जो व्यक्ति निर्मल-चित्त, मात्सर्यरहित, प्रशांत, शुद्ध-चरित्र, समस्त जीवों का सुह्रद, प्रिय और हितवादी तथा अभिमान एवं मायासे रहित होता है उसके ह्रदय में भगवान वासुदेव सर्वदा विराजमान रहते हैं || २४ || उन सनातन भगवान के ह्रदय में विराजमान होनेपर पुरुष इस जगत में सौम्यमूर्ति हो जाता हैं, जिसप्रकार नवीन शाल वृक्ष अपने सौन्दर्य से ही भीतर भरे हुए अति सुंदर पार्थिव रस को बतला देता हैं || २५ ||

हे दूत ! यम और नियम के द्वारा जिनकी पापराशि दूर हो गयी हैं, जिनका ह्रदय निरंतर श्रीअच्युत में ही आसक्त रहता हैं, तथा जिनमें गर्व, अभिमान और मात्सर्य का लेश भी नहीं रहा हैं उन मनुष्यों को तुम दुरही से त्याग देना || २६ || यदि खड्ग, शंख और गदाधारी अव्ययात्मा भगवान हरि ह्रदय में विराजमान हैं तो उन पापनाशक भगवान के द्वारा उसके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं | सूर्य के रहते हुए भला अन्धकार कैसे ठहर सकता हैं ? || २७ || जो पुरुष दूसरों का धन हरण करता हैं, जीवों की हिंसा करता हैं तथा मिथ्या और कटुभाषण करता हैं उस अशुभ कर्मोंन्मत दुष्टबुद्धि के ह्रदय में भगवान अनंत नहीं टिक सकते || २८ || जो कुमति दूसरों के वैभव को नहीं देख सकता, जो दूसरों की निंदा करता है, साधुजनों का अपकार करता है तथा न तो श्रीविष्णुभगवान् की पूजा ही करता हैं और न दान ही देता हैं उस अधम के ह्रदय में श्रीजनार्दन का निवास कभी नहीं हो सकता || २९ ||

जो दुष्टबुद्धि अपने परम सुह्रद, बंधू-बान्धव, स्त्री, पुत्र, कन्या, पिता तथा भृत्यवर्ग के प्रति अर्थतृष्णा प्रकट करता हैं उस पापाचारी को भगवान का भक्त मत समझो || ३० || जो दुर्बुद्धि पुरुष असत्कर्मों में लगा रहता हैं, नीच पुरुषों के आचार और उन्हीं के संग में उन्मत्त रहता हैं तथा नित्यप्रति पापमय कर्मबंधन से ही बँधता जाता है वह मनुष्यरूप पशु ही है; वह भगवान वासुदेवका भक्त नहीं हो सकता || ३१ || यह सकल प्रपंच और मैं एक परमपुरुष परमेश्वर वासुदेव ही है, ह्रदय में भगवान अनंतके स्थित होने से जिनकी ऐसी स्थिर बुद्धि हो गयी हो, उन्हें तुम दुरही से छोडकर चले जाना || ३२ || ‘ हे कमलनयन ! हे वासदेव ! हे विष्णो ! हे धरणिधर ! हे अच्युत ! हे शंख – चक्र – पाणे ! आप हमें शरण दीजिये – जो लोग इस प्रकार पुकारते हों उन निष्पाप व्यक्तियों को तुम दूरसे ही त्याग देना || ३३ ||

जिस पुरुषश्रेष्ठ के अंत:करण में वे अव्ययात्मा भगवान विराजते हैं उसका जहाँतक दृष्टिपात होता हैं वहाँ तक भगवान के चक्र के प्रभाव से अपने बल-वीर्य नष्ट हो जानेके कारण तुम्हारी अथवा मेरी गति नहीं हो सकती | वह (महापुरुष) तो अन्य (वैकुंठादि ) लोकों का पात्र है || ३४ ||

कालिंग बोला – हे कुरुवर ! अपने दूत को शिक्षा देने के लिये सुर्यपुत्र धर्मराज ने उससे इस प्रकार कहा | मुझसे यह प्रसंग उस जातिस्मर मुनिने कहा था और मैंने यह सम्पूर्ण कथा तुमको सुना दी है || ३५ ||

श्रीभीष्मजी बोले – हे नकुल ! पूर्वकाल में कलिंगदेश में आये हुए उस महात्मा ब्राह्मण ने प्रसन्न होकर मुझे यह सब विषय सुनाया था || ३६ || हे वत्स ! वही सम्पूर्ण वृतांत, जिस प्रकार कि इस संसार-सागर में एक विष्णुभगवान को छोडकर जीव का और कोई भी रक्षक नहीं हैं, मैंने ज्यों – का – त्यों तुम्हे सुना दिया || ३७ || जिसका ह्रदय निरंतर भगवत्परायण रहता हैं उसका यम, यमदूत, यमपाश, यमदंड अथवा यम-यातना कुछ भी नहीं बिगाड़ सकते || ३८ ||

इति श्रीविष्णुपुराणे तृतीयेऽशे सप्तमोऽध्यायः

विष्णु पुराण – तृतीय अंश – ६

Beautiful golden sunrise
ॐ श्री मन्नारायणाय नम:
नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम | देवी सरस्वती व्याप्तं ततो जयमुदिरयेत ||

श्रीविष्णुपुराण

तृतीय अंश

अध्याय – छठा

सामवेद की शाखा, अठारह पुराण और चौदह विद्याओं के विभाग का वर्णन

श्रीपराशरजी बोले – हे मैत्रेय ! जिस क्रमसे व्यासजी के शिष्य जैमिनि ने सामवेद की शाखाओं का विभाग किया था, वह मूझसे सुनो || १ || जैमिनिका पुत्र सुमन्तु था और उसका पुत्र सुकर्मा हुआ | उन दोनों महामति पुत्र-पौत्रों ने सामवेद की एक-एक शाखाका अध्ययन किया || २ || तदनन्तर सुमन्तु के पुत्र सुकर्मा ने अपनी सामवेदसंहिता के एक सहस्त्र शाखाभेद किये और हे द्विजोत्तम ! उन्हें उसके कौसल्य हिरण्यनाभ तथा पौष्पिंची नामक दो महाव्रती शिष्यों ने ग्रहण किया | हिरण्यनाभ के पाँच सौ शिष्य थे जो उदीच्य सामग कहलाये || ३ – ४ ||

इसी प्रकार जिन अन्य द्विजोत्तमों ने इतनी ही संहिताएँ हिरण्यनाभ से और ग्रहण की उन्हें पंडितजन प्राच्य सामग कहते है || ५ || पौष्पिंचि के शिष्य लोकाक्षि, नौधमि, कक्षीवान और लांगलि थे | उनके शिष्य-प्रशिष्यों ने अपनी-अपनी संहिताओं के विभाग करके उन्हें बहुत बढ़ा दिया || ६ || महामुनि कृति नामक हिरण्यनाभ के एक और शिष्य ने अपने शिष्यों को सामवेद की चौबीस संहिताएँ पढायी || ७ || फिर उन्होंने भी इस सामवेदका शाखाओंद्वारा खूब विस्तार किया | अब मैं अर्थववेद की संहिताओं के समुच्चय का वर्णन करता हूँ || ८ ||

अथर्ववेद को सर्वप्रथम अमिततेजोमय सुमन्तु मुनि ने अपने शिष्य कबंध को पढाया था फिर कबंध ने उसके दो भाग कर उन्हें देवदर्श और पथ्य नामक अपने शिष्यों को दिया || ९ || हे द्विजसत्तम ! देवदर्श के शिष्य मेध, ब्रह्मबलि, शौल्कायनि और पिप्पल थे || १० || हे द्विज ! पथ्य के भी जाबालि, कुमुदादि और शौनक नामक तीन शिष्य थे, जिन्होंने संहिताओं का विभाग किया || ११ || शौनक ने भी अपनी संहिता के दो विभाग करके उनमें से एक वभ्रुको तथा दूसरी सैन्धव नामक अपने शिष्य को दी || १२ || सैन्धव से पढकर मुच्चिकेश ने अपनी संहिता के पहले दो और फिर तीन विभाग किये | नक्षत्रकल्प, वेद्कल्प, संहिताकल्प, आंगिरसकल्प और शान्तिकल्प – उनके रचे हुए ये पाँच विकल्प अथर्ववेद संहिताओं में सर्वश्रेष्ठ हैं || १३- १४ ||

तदनन्तर, पुराणार्थविशारद व्यासजी ने आख्यान, उपाख्यान, गाथा और कल्पशुद्धि के सहित पुराण संहिता की रचना की || १५ || रोमहर्षण सूत व्यासजी के प्रसिद्ध शिष्य थे | महामति व्यासजी ने उन्हें पुराण-संहिता का अध्ययन कराया || १६ || उन सूतजी के सुमति, अग्निवर्चा, मित्रायु, शांसपायन, अकृतव्रण और सावर्णि – ये छ: शिष्य थे || १७ || काश्यप-गोत्रीय अकृतव्रण, सावर्णि और शांसपायन – ये तीनों संहिताकर्ता हैं | उन तीनों संहिताओं की आधार एक रोमहर्षणजी की संहिता है | हे मुने ! इन चारों संहिताओं की सारभूत मैंने यह विष्णुपुराणसंहिता बनायी है || १८- १९ || पुराणज्ञ पुरुष कुल अठारह पुराण बतलाते हैं; उन सबमें प्राचीनतम ब्रह्मपुराण है || २० ||

प्रथम पुराण ब्राह्म है, दूसरा पाद्य, तीसरा वैष्णव, चौथा शैव, पाँचवाँ भागवत, छटा नारदीय और सातवाँ मार्कण्डेय हैं || २१ || इसी प्रकार आठवाँ आग्नेय, नवाँ भविष्यत, दसवाँ ब्रह्मवैवर्त्त और ग्यारहवाँ पुराण लैंग कहा जाता है || २२ || तथा बारहवाँ वाराह, तेरहवाँ स्कांद, चौदहवाँ वामन, पन्द्रहवाँ कौर्म तथा इनके पश्चात मात्स्य, गारुड और ब्रह्माण्डपुराण हैं | हे महामुने ! ये ही अठारह महापुराण हैं || २३ – २४ || इनके अतिरिक्त मुनिजनों ने और भी अनेक उपपुराण बतलाये हैं | इन सभी में सृष्टि, प्रलय, देवता आदिकों के वंश, मन्वन्तर और भिन्न-भिन्न राजवंशों के चरित्रोंका वर्णन किया गया है || २५ ||

हे मैत्रेय ! जिस पुराण को मैं तुम्हें सुना रहा हूँ वह पाद्मपुराण के अनन्तर कहा हुआ वैष्णव नामक महापुराण है || २६ || हे साधुश्रेष्ठ ! इसमें सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश और मन्वन्तरादिका वर्णन करते हुए सर्वत्र केवल विष्णुभगवान् का ही वर्णन किया गया है || २७ ||

छ: वेदांग, चार वेद, मीमांसा, न्याय, पुराण और धर्मशास्त्र – ये ही चौदह विद्याएँ हैं || २८ || इन्हीमें आयुर्वेद, धनुर्वेद और गान्धर्व इन तीनों को तथा चौथे अर्थशास्त्र को मिला लेने से कुल अठारह विद्या हो जाती है | ऋषियों के तीन भेद हैं – प्रथम ब्रह्मर्षि, द्वितीय देवर्षि और फिर राजर्षि || २९ – ३० || इसप्रकार मैंने तुमसे वेदों की शाखा, शाखाओं के भेद, उनके रचयिता तथा शाखा-भेद के कारणों का भी वर्णन कर दिया || ३१ || इसी प्रकार समस्त मन्वन्तरों में एक-से शाखाभेद रहते हैं; हे द्विज ! प्रजापति ब्रह्माजी से प्रकट होनेवाली श्रुति तो नित्य है, ये तो उसके विकल्पमात्र हैं || ३२ ||

इति श्रीविष्णुपुराणे तृतीयेऽशे षष्ठोऽध्यायः

विष्णुपुराण – तृतीय अंश – ५

Beautiful golden sunrise
ॐ श्री मन्नारायणाय नम:
नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम | देवी सरस्वती व्याप्तं ततो जयमुदिरयेत ||

श्रीविष्णुपुराण

तृतीय अंश

अध्याय – पाँचवाँ

शुक्लयजुर्वेद तथा तैत्तिरीय यजु:शाखाओं का वर्णन

श्रीपराशरजी बोले – हे महामुने ! व्यासजी के शिष्य वैशम्पायन ने यजुर्वेदरूपी वृक्ष की सत्ताईस शाखाओं की रचना की; और उन्हें अपने शिष्यों को पढ़या तथा शिष्यों ने भी क्रमशः ग्रहण किया || १ – २ || हे द्विज ! उनका एक परम धार्मिक और सदैव गुरुसेवा में तत्पर रहनेवाला शिष्य ब्रह्मरात का पुत्र याज्ञवल्क्य था || ३ || जो कोई महामेरुपर स्थित हमारे उस समाज में सम्मिलित न होगा उसको सात रात्रियों के भीतर भी ब्रह्महत्या लगेगी || ४ || हे द्विज ! इसप्रकार मुनियों ने पहले जिस समय को नियत किया था उसका केवल एक वैशम्पायन ने ही अतिक्रमण कर दिया || ५ || इसके पश्चात उन्होंने प्रसादवश पैर से छुए हुए अपने भानजे की हत्या कर डाली; तब उन्होंने अपने शिष्यों से कहा – ‘हे शिष्यगण ! तुम सब लोग किसी प्रकार का विचार न करके मेरे लिये ब्रह्महत्या को दूर करनेवाला व्रत करो’ || ६ – ७ ||

तब याज्ञवल्क्य बोले – ‘भगवन ! ये सब ब्राह्मण अत्यंत निस्तेज हैं, इन्हें कष्ट देने की क्या आवश्यकता हैं ? मैं अकेला ही इस व्रत का अनुष्ठान करूँगा ‘ || ८ || इससे गुरु वैशम्पायनजी ने क्रोधित होकर महामुनि याज्ञवल्क्य से कहा – ‘अरे ब्राह्मणों का अपमान करनेवाले | तूने मुझसे जो कुछ पढ़ा है, वह सब त्याग दे || ९ || तू इन समस्त द्विजश्रेष्ठों को निस्तेज बताता हैं, मुझे तुझ-जैसे आज्ञा – भंगकारी शिष्य से कोई प्रयोजन नहीं हैं’ || १०|| याज्ञवल्क्यने कहा – ‘हे द्विज ! मैंने तो भक्तिवश आपसे ऐसा कहा था, मुझे भी आपसे कोई प्रयोजन नहीं है, लीजिये, मैंने आपसे जो कुछ पढ़ा है वह यह मौजूद है ‘ || ११ ||

श्रीपराशरजी बोले – ऐसा कह महामुनि याज्ञवल्क्यजी ने रुधिर से भरा हुआ मूर्तिमान यजुर्वेद वाम करके उन्हें दे दिया; और स्वेच्छानुसार चले गये || १२ || हे द्विज ! याज्ञवल्क्यद्वारा वमन की हुई उन यजु:श्रुतियों को अन्य शिष्यों ने तित्तिर (तीतर) होकर ग्रहण कर लिया, इसलिये वे सब तैत्तिरीय कहलाये || १३ || हे मुनिसत्तम ! जिन विप्रगण ने गुरु की प्रेरणासे ब्रह्महत्या-विनाशक व्रत का अनुष्ठान किया था, वे सब व्रताचरण के कारण यजु:शाखाध्यायी चरकाध्वर्यु हुए || १४ || तदनन्तर, याज्ञवल्क्य ने भी यजुर्वेद की प्राप्ति की इच्छा से प्राणों का संयम कर संयतचित्त से सूर्यभगवान की स्तुति की || १५ ||

याज्ञवल्क्यजी बोले – अतुलित तेजस्वी, मुक्ति के द्वारस्वरूप तथा वेदत्रयरूप तेजसे सम्पन्न एवं ऋक, यजु: तथा सामस्वरूप सवितादेव को नमस्कार है || १६ || जो अग्नि और चन्दमारूप, जगत के कारण और सुषुम्र नामक परमतेज को धारण करनेवाले हैं, उन भगवान भास्कर को नमस्कार है || १७ || कला, काष्ठा, निमेष आदि कालज्ञान के कारण तथा ध्यान करनेयोग्य परब्रह्मस्वरूप विष्णुमय श्रीसूर्यदेव को नमस्कार है || १८ || जो अपनी किरणों से चन्द्रमा को पोषित करते हुए देवताओं को तथा स्वधारूप अमृत से पितृगण को तृप्त करते है, उन तृप्तिरूप सूर्यदेव को नमस्कार है || १९ || जो हिम, जल और उष्णता के कर्ता [ अर्थात शीत, वर्षा और ग्रीष्म आदि ऋतुओं के कारण ] है और जगतका पोषण करनेवाले हैं, उन त्रिकालमूर्ति विधाता भगवान सूर्य को नमस्कार है || २० || जो जगत्पति इस सम्पूर्ण जगत के अन्धकार को दूर करते हैं, उन सत्त्वमुर्तिधारी-विवस्वान को नमस्कार है || २१ || जिनके उदित हुए विना मनुष्य सत्कर्म में प्रवृत्त नहीं हो सकते और जल शुद्धि का कारण नहीं हो सकता, उन भास्वान्देव को नमस्कार हैं || २२ ||

जिनके किरण-समूह का स्पर्श होनेपर लोक कर्मानुष्ठान के योग्य होता है, उन पवित्रता के कारण, शुद्धस्वरूप सूर्यदेव को नमस्कार है || २३ || भगवान सविता, सूर्य, भास्कर और विवस्थान को नमस्कार है, देवता आदि समस्त भूतों के आदिभूत आदित्यदेव को बारंबार नमस्कार है || २४ || जिनका तेजोमय रथ है, [ प्रज्ञारूप ] ध्वजाएँ हैं, जिन्हें [ छ्न्दोमय] अमर अश्वगण वहन करते है तथा जो त्रिभुवन को प्रकाशित करनेवाले नेत्ररूप है, उन सूर्यदेव को मैं नमस्कार करता हूँ || २५ ||

श्रीपराशरजी बोले – उनके इसप्रकार स्तुति करनेपर भगवान सूर्य अश्वरूप से प्रकट होकर बोले – ‘तुम अपना अभीष्ट वर माँगो’ || २६ || तब याज्ञवल्क्यजी ने उन्हें प्रणाम करके कहा – आप मुझे उन यजु:श्रुतियों का उपदेश कीजिये जिन्हें मेरे गुरूजी भी न जानते हों || २७ || उनके ऐसा कहनेपर भगवान सूर्य ने उन्हें अयातयाम नामक यजु:श्रुतियों का उपदेश दिया जिन्हें उनके गुरु वैशम्पायनजी भी नही जानते थे || २८ || हे द्विजोत्तम ! उन श्रुतियों को जिन ब्राह्मणों ने पढ़ा था वे वाजी-नामसे विख्यात हुए क्योंकि उनका उपदेश करते समय सूर्य भी अश्वरूप हो गये थे || २९ || हे महाभाग ! उन वाजिश्रुतियों की कान्व आदि पन्द्रह शाखाएँ हैं; वे सब शाखाएँ महर्षि याज्ञवल्क्यकी प्रवुत्त की हुई कही जाती हैं || ३० ||

इति श्रीविष्णुपुराणे तृतीयेऽशे पंचमोऽध्यायः