चार प्रकार के भक्त

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दुष्कृत्य कार्य करने वाला व्यक्ति, अभागा व्यक्ति भले ही दुनिया की सब सुविधाओं को पा लें, दुनिया के सब हीरे-जवाहरात, कंकर-पत्थर इकट्ठे कर लें फिर भी वह प्रभु को नहीं भज सकते हैं। भगवान कहते हैः

न मां दुष्कृतिनो मूढाः प्रपद्यन्ते नराधमाः। माययापहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिताः।।

 ‘माया के द्वारा हरे हुए ज्ञान वाले और आसुरी स्वभाव को धारण किये हुए तथा मनुष्यों में नीच और दूषित कर्म करने वाले लोग मुझे नही भजते हैं।’  (गीताः 7.15)

 भगवान शंकर कहते हैं-       सुनहु उमा ते लोग अभागी। हरि तजि होहिं विषय अनुरागी।।

‘हे पार्वती ! सुनो। वे लोग अभागे हैं जो भगवान को छोड़कर विषयों से अनुराग करते हैं।

(श्रीरामचरित अरण्य काण्डः32,2)

 हरि को छोड़कर अपने आत्मदेव को छोड़कर, अपनी आंतरिक शांति को छोड़कर, अपने भीतरी सुख को छोड़कर जो लोग दूसरी जगह सुख लेने को भटकते हैं वे बड़े अभागे हैं। ऐसे लोग फिर कभी कुत्ते के तो कभी गधे का शरीर में, कभी वृक्ष के तो कभी पक्षी के शरीर में जाते हैं। जिनकी बुद्धि मारी गयी है, जो प्रकृति के पंजे में फँसे हैं ऐसे लोग जीवनभर अपने अभाव को ढँकने के लिए मेहनत करते रहते हैं और अतं में मृत्यु के समय खाली ही रह जाते हैं।

जिसने अन्तर्यामी परमात्मा की शांति का आस्वाद नहीं लिया, जिसने अंतर्यामी, परमात्मा को प्यार नहीं किया उस दुष्कृत करने वाले व्यक्ति ने हजारो-हजारों जड़ वस्तुओं को प्यार किया फिर भी वे वस्तुएँ उसकी नहीं हुईं।

दुष्कृत करने वाले व्यक्ति का ज्ञान माया के द्वारा अपहृत हो जाता है, नष्ट हो जाता है इसीलिए वह भगवान का भजन नहीं कर सकता। भगवान को जो मानते तक नहीं वे लोग दुष्कृतिनः होते हैं। अहंकार से आक्रान्त चित्तवाले वे अपने से किसी को भी बड़ा नहीं मानते। मैं..मैं…मैं… करते हुए अहंकार को ही ठोस करते रहते हैं। ऐसे लोग दंभी होते हैं।

श्रीमद् आद्य शंकराचार्य ने कहा हैः ‘भीतर अगर भक्तिभाव न हो, योग्यता न हो और बाहर दिखाने का प्रयत्न किया जाये उसे दंभ कहते हैं।’

दंभ से दूसरे दोष भी आ जाते हैं। जैसे, दर्प। धन, पद-प्रतिष्ठा पाकर दर्प होने लगता है। दर्प से कठोरता आती है, भाषा कटु हो जाती है, अभिमान बढ़ जाता है और इन सबका मूल कारण होता है – अज्ञान। अपने स्वरूप को न जानना एवं जगत को सच्चा मानना यही अज्ञान है और ऐसे अज्ञान से आवृत्त पुरुष भगवान के वास्तविक स्वरूप को नहीं जान पाता।

किन्तु जो सुकृतिनः हैं, सत्कर्म करने वाले हैं वे पहले भले ही धन पाने की कामना से भजन करें, संकट मिटाने के लिए भगवान का भजन करें किन्तु अंत में भगवान की प्राप्ति के लिए भजन करने लग जाते हैं। दुष्कृति को धन मिलता है तो सोचता कि मैंने कमाया, किन्तु सुकृति को धन मिलता है तो सोचता है कि भगवान की कृपा से मिला। फिर सुकृति समय पाकर भगवान को ही समर्पित हो जाता है इसीलिए वह उदार हो जाता है। ऐसे चार प्रकार के सुकृति भक्तों का वर्णन करते हुए भगवान आगे कहते हैं-

चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन। आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ।।

तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते। प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः।।

उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम्। आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम्।।

 ‘हे भरतवंशियों में श्रेष्ठ अर्जुन ! उत्तम कर्मवाले अर्थार्थी, आर्त, जिज्ञासु और ज्ञानी – ऐसे चार प्रकार के भक्तजन मुझे भजते हैं।

उनमें भी नित्य मुझमें एकीभाव से स्थित हुआ, अनन्य प्रेम-भक्तिवाला ज्ञानी भक्त अति उत्तम है क्योंकि मुझे तत्त्व से जानने वाले ज्ञानी को मैं अत्यन्त प्रिय हूँ और वह ज्ञानी मुझे अत्यन्त प्रिय है।

ये सभी उदार हैं अर्थात् श्रद्धासहित मेरे भजन के लिए समय लगाने वाले होने से उत्तम हैं परन्तु ज्ञानी तो साक्षात मेरा स्वरूप ही है ऐसा मेरा मत है। क्योंकि वह मदगत मन-बुद्धिवाला ज्ञानी भक्त अति उत्तम गतिस्वरूप मुझमें ही अच्छी प्रकार स्थित है।’

(गीताः 7.16,17,18)

 तुलसीदास जी ने भी श्रीरामचरितमानस में इसी बात को अपनी भाषा में कहा हैः

राम भगत जग चारि प्रकारा। सुकृति चारिउ अनघ उदारा।।

चहू चतुर कहूँ नाम अधारा। ग्यानी प्रभुहि बिसेषि पिआरा।।

 ‘जगत में चार प्रकार के (आर्त, अर्थार्थी, जिज्ञासु और ज्ञानी) रामभक्त है और चारों ही पुण्यात्मा, पापरहित और उदार हैं। चारों ही चतुर भक्तों को नाम ही आधार है। इनमें ज्ञानी भक्त प्रभु को विशेष रूप से प्रिय हैं।’

(श्रीरामचरित. बालकाण्डः 21.3-4)

 जो तन-मन से रोगी है, धन-सत्ता होने पर भी जो मानसिक रूप से अशांत है ऐसा शारीरिक, मानसिक या बौद्धिक रूप से रोगी अगर अपने रोग, संकट या कोई कष्ट मिटाने के लिए भगवान की शरण लेता है तो उसे आर्त कहते हैं।

जो बुद्धि रूपी धन, सत्तारूपी धन या रुपये-पैसेरूपी धन को अर्जित करने के लिए भगवान की शरण लोता है वह अर्थार्थी भक्त है। जो भगवान के तत्त्व को समझना चाहता है वह जिज्ञासु भक्त है।

जिसको न धन की जरूरत है, न सत्ता की जरूरत है, न भगवद् तत्त्व समझना जरूरी है ऐसा जो आप्ताकाम, पूर्णकाम है, अपने आप में संतुष्ट है ऐसा भक्त ज्ञानी भक्त कहा जाता है। ऐसा ज्ञानी भक्त भगवान को निष्काम भाव से भजता हुआ भगवदाकार वृत्ति, ब्रह्माकार वृत्ति बनाये रखता है। जो अपने स्वरूप में मस्त रहते हैं, जो ज्ञान की खुमारी से नीचे नहीं आते, जिनका स्वभाव है परमात्मशाँति में ही रहना, ऐसे जो ज्ञानी महापुरुष हैं उन्होंने अपने और ईश्वर के बीच की दूरी को समाप्त कर लिया है।

भगवान कहते हैं कि उपरोक्त चारों ही प्रकार के भक्त मुझे प्रिय हैं। ये चारों ही उदार हैं, सुकृति हैं क्योंकि ये चाहते तो हैं संकट मिटाना, रोग मिटाना, चाहते तो हैं अर्थ यानी धन, लेकिन मेरी शरण द्वारा चाहते हैं। कोई चोरी की शरण लेकर धनवान होना चाहता है, कोई धोखेबाजी की शरण लेकर धनवान होना चाहता है, कोई छल-कपट करके सत्तावान होना चाहता है लेकिन जो सुकृति है वह मेरी शरण लेकर कुछ पाना चाहता है इसीलिए वह सुकृति है।

चार प्रकार के भक्तों में आर्त भक्त वह है जो पीड़ा के समय प्रभु को भजता है। जैसे द्रौपदी चीरहरण के समय बड़े संकट में थी। उसने चारों ओर निहारा किन्तु कोई रक्षक न दिखा। तब उसने संकटहारी श्रीहरि को पुकारा।

गजराज का पैर जब ग्राह ने पकड़ लिया, उसे भी जीवनरक्षा का कोई मार्ग न दिखा तब उसने भी जीवनदाता प्रभु की शरण ली। इस प्रकार दोनों आर्त भक्त कहे जाते हैं।

अर्थार्थी भक्तों में सुग्रीव, ध्रुव आदि आते हैं। उत्तानपाद की दो रानियाँ थीं, सुरुचि एवं सुनीति। सुनीति का पुत्र जब ध्रुव जब पिता की गोद में बैठने गया तो सुरुचि ने फटकारते हुए कहाः

“अगर पिता की गोद में बैठना है तो मेरी कोख से जन्म लेना पड़ेगा।”

ध्रुव को चोट लग गयी। ‘मैं पिता की गोद का अधिकारी कैसे बनूँ?’ यह सोचता हुआ वह माँ के पास गया एवं माँ से उपाय पूछा। तब माँ ने भगवान की शरण लेने को कहा।

ध्रुव निकल पड़ा तप करने के लिए। नारदजी ने उसे घर लौटाने के काफी प्रयास किये किन्तु ध्रुव सुकृति था। अतः वह अपने निश्चय पर अटल रहा। तप करके पिता की गोद तो क्या राज्य भी पा लिया, अटल पदवी पा ली और अन्त में प्रभु की गोद भी पा ली।

जिज्ञासु भक्त भगवान को चाहता है। ‘मैं कौन हूँ… कहाँ से आया हूँ…. जन्म मरण से छुटकारा कैसे मिलता है… ब्रह्म क्या है…सृष्टि कैसे हुई… मौत के बाद जीव कहाँ जाता है…. जन्म – मरण से छुटकारा कैसे मिलता है…जीव क्या है… आत्मा-परमात्मा का ज्ञान कैसे हो…’ इस प्रकार के विचार करके जो तत्त्वज्ञान की ओर चल पड़ता है वह है जिज्ञासु भक्त।

चौथे प्रकार का भक्त है ज्ञानी। वह भगवान को तत्त्व से जानकर निष्काम भाव से भजता है। ये तीनों प्रकार के भक्त-आर्त, अर्थार्थी और जिज्ञासु भक्त तो बहुत देखने को मिलेंगे लेकिन चौथे प्रकार का ज्ञानी भक्त कभी-कभी, कहीं कहीं देखने को मिलता है।

ऐसे ज्ञानी के तो भगवान भी भक्त होते हैं और ज्ञानी भगवान का भक्त होता है। जो भगवान का पक्का भक्त होता है वह भगवान को छोड़कर दूसरे की शरण नहीं लेता है।

एक पक्का भक्त ध्यान कर रहा था। उसके ध्यान में इन्द्रदेव आये और बोलेः “वर माँग ले।”

भक्तः “आप इन्द्रदेव ! मैं आपसे वर क्या माँगूँ? मैं तो वर अपने इष्ट से ही लूँगा। अगर आप मुझे इन्द्रपद भी दे दें तो इन्कार है किन्तु मेरे इष्ट भोलानाथ मुझे कीट भी बना दें तो स्वीकार है।”

यह है अनन्य भक्ति। भगवान के प्रति यदि अनन्य भक्ति है तो फिर दुःख मिलने पर भी दुःख नहीं होगा क्योंकि देनेवाले हाथ सुन्दर हैं। भक्त को यदि दुःख भी मिलते हैं तो सोचता है कि भगवान ने मेरे पाप मिटाने के लिए ही दुःख दिये हैं। जैसे गोपियाँ, भीष्म, सुदामा आदि।

अगर किसी सुकृति भक्त ने भगवान का भजनादि किया और उसे प्रमोशन या संसार की कोई सुख-सुविधा मिल गयी तो उसे भी वह भगवान का प्रसाद ही मानता है। भगवान कहते हैं- उदाराः सर्व एवैते। वे सब उदार हैं जो मुझसे जरा-सा पा लेते हैं तो अपने सहित सब कुछ मेरा मान लेते हैं। सुकृति भक्त संसार की वस्तुएँ माँगते-माँगते भी बाद में वास्तव में भगवान का भक्त बन जाता है। आगे भगवान कहते हैं कि ये सब उदार हैं सुकृति हैं, अच्छे हैं किन्तु ज्ञानी तो साक्षात मेरा स्वरूप ही है।

ज्ञानी त्वात्मैव मतम्।

 ऐसे ज्ञानी उत्तम गति को पाते हैं। अनुत्तम व्यवहार में होते हुए भी, अनुत्तम शरीर में होते हुए भी परम उत्तम तत्त्व का साक्षात्कार किये हुए होते हैं।