चाइल्डहुड लीला हीरालाल शर्ट – (बापूजी की लीला- ११)

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हमारे पिता जरा धनि थे, जमीनदार थे, नगरशेठ थे | और गुरूजी ने कहाँ की ये तो संत बनेगा, लोकों का उद्धार करेंगा | वैसे श्रद्धालु थे वो मानते थे | तो मेरे को बुश शर्ट शिला दिया ३ साल का था हूँ शायद | बुशशर्ट शिला दिया उसमे हीरे-हीरे लगा दिये थे चमचमाते | तो रात्रि को हमने देखा असमान में तो तारे सोचा तू भी बड़े नगरशेठ का बेटा है | तेरी भी बुश शर्ट की कम मेरे भी नहीं है देख लें | तू भी बड़े शेठ का बेटा है आकाश को बोल दिया | देख मैं भी हूँ ना और वो बुद्धि देखो, और बुश शर्ट भी दे दी | उसको जाननेवाला गया क्या ? दो साल का था क्या पता उससमय का | अभी याद नहीं लेकिन ये जरुर पक्का बोला था | घर के बाहर चबूतरा होता हैं ना वहाँ एकेले में बुश शर्ट पहनकर ख़ुशी ख़ुशी में उसको ललकार दिया की मैं भी देख तुम नगरशेठ का बेटा लगता है मैं भी ईधर हूँ | और वो बुद्धि बदल गई आसुमल बबलू तो बदल गये, मन बदल गया | वो बुशशर्ट का तो ठिकाना नहीं | कहाँ चले गये वो भी नकली हीरे लेकिन उसको जाननेवाला जो अभी है | वो घट घट में बोल रहा है वही राम, वही मैं हूँ चैतन्य, मैं चिदानंद हूँ | मेरा टिक नहीं सकता और मैं मिट नहीं सकता निहार टिक नहीं सकता और मैं मिट नहीं सकता |

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