दादागुरु और राम प्रसाद का प्रसंग – (बापूजी की लीला- १२)

dadaguru1दादागुरु और राम प्रसाद का प्रसंग

मेरे गुरूजी की लोकहितेषी और संकल्पशक्ति ऐसी गजब की थी कि नीम के पेड़ को आज्ञा दी और नीम का पेड़ चला पड़ा तो मुसलमान भाई भी उनके भगत हो गये | आप लीलाराम नहीं लीलाशाह हो | तब से मेरे गुरुदेव का नाम पड़ा लीलाशाहजी |
रामअवतार शुक्ला उन्होंने गीता पर बहुत सुंदर प्रवचन दिये थे | तो गुरुजीने सुना उसकी प्रशंशा | तो गुरूजी चल दिये रामप्रसाद का रामअवतार शुक्ला | देखा तो बिस्तर पर पड़े है डॉक्टरों ने हाथ खड़े कर दिये की वो ख़ास डॉक्टर थे वो चल दीजिये | बोले वो जानेवाला है | बाकी वो डॉक्टर वो उनके नजिक था पेशंट है तबतक रहो | वो डॉक्टर के सामने मेरे गुरूजी ने कहाँ की रामअवतार हम तो आये है आपका गीता का सत्संग सुनने को और डॉक्टर बोलते है की ये तो गये | आप कैसे जावोगे | घरवालों को बोला भाई ले आओ एक ग्लास ले आओ एक नीबू निचोड़ दो और शहद ले आओ थोड़ी और करमंडल से बाबा ने पानी डाला | डॉक्टर बोलते है की कुछ देर तक जायेंगे बाबा इनको जल्दी भेजना है क्या ? इनको नीबू पानी मत दीजियेगा | बाबा ने कहाँ देखो तो सही क्या होता है | बोले नहीं नहीं नीबू पानी इनको और डिस्टर्ब करेगा और जल्दी चले जायेंगे | बोले जल्दी क्या जायेंगे, आप तो बोलते है जानेवाले है ये तो परसों आके मेरे को सत्संग सुनानेवाले है तुम देख लो | घरवाले बापू के पक्ष पर हो गये लीलाशाहजी पर और नीबू, पानी, शहद मिला के दे दिया | और रामअवतार का कहाँ की देखो फलानी जगह पर हूँ मैं आप मेरे को सत्संग सुनाने को आओगे ना जरुर आना | वो तो गटक गटक नीबू पानी शहद क्या पीता वो तो लीलाशाहजी की कृपा पी जा | आरे बोले बाबा ! मैं तो आया आप के पास और कई दिन तक असा रहा उस कई साक्षी और मैं इस ग्रन्थ के आधार पर सुना रहूँ |
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