दादागुरु की लीला – (बापूजी की लीला- १४)

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राजस्थान है वहाँ खेलफल है मुखी मेंवाराम | अभी उसने बनाई हुई कुटियाँ है | मेरे गुरूजी का चेला था | किसी पुलिस ऑफिसर ने उनको डांटा | मेंवाराम तुम क्या समजते हो अपने को ? मेवाराम ने कहाँ तुम दो पैसे के नौकर इतना रुबाब मारते हो ? ये शटाप ! दो पैसे के नौकर बोलते है | मेवाराम ने थप्पड़ ठोकी | अब पोलिस ऑफिसर को थप्पड़ ठोक दे तो चुप कैसे रहेगा ? अब वो मुख था तो उसको पकडकर मारपीट भी नहीं करते | उसने मुकादमा कर दिया | मुक़दमा कर दिया और गुरूजी को चिट्टी लिख दिई की मेवाराम ने पोलिस ऑफिसर को थप्पड़ तो मार दिया | उसने मेरे पर केस कर दिया है | अब बापूजी आके मेरे को बचो | बापूजी ने उसको खत लिखा जब भी जाये हूँ …जज्ज जब जजमेंट लिखे तो बोले मुखी मेवाराम ये कौनसी ताकद है जो मैं तुम्हे छे महीने की सजा और ५ हजार दंड लिखना चाहता हूँ मगर मुझे दूसरा कोई रोखता है | जावो दूसरी पेशी, तीसरी पेशी, चौथी पेशी आखिर बोला तुम्हारी ऊपर किसी की है ! जावो ये केस बरी कर दिया | जजमेंट नहीं लिखने दिया ऊँ … ऊँ …. और तुम्हारे पर केस लगे ऐसा काय को ? यमदूत भी कुछ नहीं कर सकते मेरी नानी मरने के बाद भी जिन्दी हो गई थी | अब जिन्दी होये न होये लेकिन नरक नहीं होता है जो ॐ जपता है | वो पशु नहीं होता, उसको नरक नहीं मिलता |

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