दादागुरुदेव की सत्संग महिमा – (बापूजी की लीला- १५)

imagesदादागुरुदेव की सत्संग महिमा

मेरे गुरुदेव साल में दो महिना एकांत के रखते थे | नैनीताल में बिराजते थे फिर ईधर आ जाते हरिद्वार में | और मुझे पक्का याद है की हरिद्वार में कहीं भी ठहरते तो नीलधारा के तरफ शाम को घुमने जाते | मैं भी श्रीचरणों में जाता | जब घूमके आते तो लौट के समय सुबह घुमने जाते तो त्रिवेनिपुरी महाराज का सन्यास आश्रम में नीलधारा के नजिक था वहाँ सत्संग चलता रहेता था | तो मेरे गुरूजी चुपके से श्रोताओं के बीच लाइन में बैठ जाते थे | जीस समय मेरे गुरूजी ८८ साल के थे | अब गुरूजी बैठेगे तो चला क्या सत्संग से भागेगा क्या ? मैं भी पास में बैठ जाता | फिर त्रिवेनिपुरी महाराज की नजर पड़े आरे ये लीलाशाह बापूजी है | महाराजजी… महाराजजी आ जाईये अपने साथ बिठाते थे | क्योंकि त्रिवेनिपुरी महाराज को पता है की ये लीलाशाह प्रभु का शिष्य है मनोहरदस वेदांत का इतना बढियाँ सत्संग करते थे | और वेदांत संमेलन करते | ये निरंजनदेव तीर्थ जोशी मठ के शंकराचार्य भी उनका सत्संग सुनने की बात करते थे | मेरे गुरूजी के शिष्य का सत्संग जगद्गुरु निरंजनदेव की सुनने की ख्याईस रखें तो ऐसे गुरूजी श्रोताओं बैठे तो त्रिवेनिपुरी महाराज उठकर उनको अपने पास बिठा देते |
तो सत्संग का इतना महत्त्व है | मेरे गुरूजी तो सत्संग जानते थे, करते थे, आत्म-परमात्मा का अभेद ज्ञान हो गया था | उनके लिए श्रदुर नहीं था , दुर्लभ नहीं था, परे नहीं था, पराया नहीं था | नीम के पेड़ को आदेश दिया योगशक्ति से तो नीम का पेड़ खिसक गया तो मुसलमान भाइयों ने चरण पकडे ४२ साल से हमारा झंजट था नीम का पेड़ सीमा पे चला गया | आज से आप लीलाराम नहीं लीलाशाह प्रभु हो | तो फिर हमारी राम परम्परा है केशवराम, दाताराम, लीलाराम, आशाराम लेकिन लीलारामजी लीलाशाहजी हो गये | मुसलमानो ने उनको नवाजा नीम के पेड़ को चलाने की शक्ति | ऐसे महापुरुष भी सत्संग होता है तो त्रिवेनिपुरी महाराज का श्रीचरणों में बैठकर का सत्संग सुना |
Listen Audio:
Download Audio