दैवी सम्पदा

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अपनी वासना मिटेगी तो दैवी सम्पदा बढ़ेगी।

अंतःकरण की अशुद्धि दो कारणों से होती हैः एक कारण है सुख की लालसा और दूसरा कारण है दुःख का भय। सुख की लालसा और दुःख का भय हमारा अंतःकरण मलिन कर देता है। अंतःकरण मलिन होने से हम तत्त्वतः देव से निकट होते हुए भी अपने को देव से दूर महसूस करते हैं। संसार की उलझनों में उलझ जाते हैं। अतः अंतःकरण में जो सुख की लालच है उसको मिटाने के लिए सुख देना सीख ले, दूसरे के काम आना सीख ले। अपने दुःख में रोने वाले ! तू मुस्कुराना सीख ले।

जो अपने दुःख को पकड़कर रोते रहते हैं उनको मुस्कुराकर अपने दुःख को पचा लेना चाहिए और सुख बाँटना चाहिए। इससे अंतःकरण की मलिनता दूर हो जायगी। अंतःकरण की मलिनता दूर होते ही वह तेज आने लगेगा।

खा-पीकर पुष्ट होकर अथवा ठण्डे प्रदेश में रहकर चमड़ी का रंग बदलकर तेजस्वी होना यह उल्लू के पट्ठों का काम है, ब्रह्मवेत्ताओं का काम कुछ निराला होता है।

‘मैं बड़ा तेजस्वी बनकर आया, क्योंकि इंग्लैण्ड मे रहा था, अमेरिका मे रहा था।’

अरे भैया ! इंग्लैण्ड में अगर तेजस्वी हो जाते हो, अमेरिका में तेजस्वी हो जाते हो, हिमालय में रहकर तेजस्वी हो जाते हो तो यह तेज की विशेषता चमड़ी की विशेषता है, तुम्हारे उस प्रिय पूर्ण पुरुषोत्तम परमात्मा की विशेषता का तुम्हें ज्ञान नहीं है। अष्टावक्र महाराज कहाँ गये थे इंग्लैण्ड और अमेरिका में चमड़ा बदलने को? उनका शरीर तो आठ वक्रताओं से अभिभूत था। ऐसे अष्टावक्र का तेज विशाल राज्य, विशाल बाहु, विशाल विद्या, विशाल धनराशि के स्वामी राजा जनक को आकर्षित करता है, आत्मशांति प्रदान करता है। अष्टावक्र के अंग टेढ़े, टाँगे टेढ़ी, चाल टेढ़ी, लेकिन उनकी वाणी में ब्रह्मतेज था, चित्त में आत्मतेज था उसको देखकर राजा जनक उनके चरणों में बैठे। मीरा का तेज ऐसा था कि उसकी निन्दा और विरोध करने वाले लोग उसकी हत्या करने के लिए तैयार होकर मीरा के पास आये तो उनका चित्त बदल गया।

भगवान के भक्तों का और ब्रह्मवेत्ताओं का तेज दूसरों के दुःख-दर्द को निवारनेवाला होता है। साधक को यह तेज अपने में लाना चाहिए।

कई महापुरुष ऐसे होते हैं कि जिनमें ये दैवी सम्पदा के गुण जन्मजात होते हैं। जैसे नामदेव, ज्ञानेश्वर महाराज, शुकदेवजी महाराज, मीरा, सुलभा आदि में ये गुण स्वभाव से ही थे। उनका क्षमा, धैर्य, ब्रह्मचर्य के तरफ झुकाव अपने आप था। साधक को साधन-भजन, नियम-व्रत का सहारा लेकर ये गुण अपने में लाने होते हैं। जिनमें ये गुण जन्मजात हैं उन्होंने कभी न कभी ये गुण साधे होंगे। हम लोग अभी साध सकते हैं। जिनके कुछ गुण साधे हुए हैं वे ज्यादा साधकर देव में स्थित हो सकते हैं।

दैवी सम्पदा के गुणों में से जितने अधिक गुण अपने जीवन में होंगे उतना जीवन ‘टेन्शन’ रहित, चिंतारहित, भयरहित, शोकरहित, दुःखरहित, उद्वेगरहित होगा। दैवी सम्पदा के गुण जितने गहरे होंगे उतना आदमी उदार होगा, सहनशील होगा, क्षमावान होगा, शूरवीर होगा, धैर्यवान होगा, तेजस्वी होगा। ये सारे गुण उसके लिए और उसके सम्पर्क में आने वालों के लिए सुखद हो जाते हैं।

महापुरुषों की उस शक्ति का नाम ‘तेज’ है कि जिसके प्रभाव से उनके सामने विषयासक्त और नीच प्रवृत्तिवाले मनुष्य भी प्रायः अन्यायचरण और दुराचार से रुककर उनके कथनानुसार श्रेष्ठ कर्मों में प्रवृत्त हो जाते हैं।

महापुरुषों में दूसरा गुण है क्षमा।

क्षमा मोहवश भी की जाती है, भयवश भी की जाती है लेकिन दैवी सम्पदा की क्षमा कुछ विलक्षण है। पुत्र ने, पत्नी ने, कुटुम्ब ने कुछ अपराध किया, उनमें मोह है तो चलो, घूँट पी लिया, सह लिया। यह मोहवश की गई क्षमा है।

इन्कमटैक्स का इन्सपैक्टर आ गया। ऐसा-वैसा बोलता है, कुछ कड़वी-मीठी सुना रहा है। दिल में होता है कि ‘यह न बोले तो अच्छा है, यहाँ से टले तो अच्छा है। फिर भी क्या करें? चलो जाने दो।’ यह भयवश की गई क्षमा है। अगर कुछ बोलेंगे तो वह कागजों से कड़क व्यवहार करेगा, धन की हानि हो जायेगी।

नौकर गलती करता है। डाँटेंगे तो चला जायेगा। दूसरा आदमी अभी मिलता नहीं, चलो इसको क्षमा कर दो। जब अच्छा नौकर मिल जायेगा तो इसे निकाल देंगे।

मोह से, भय से, स्वार्थ से या और किसी कारण से जो क्षमा की जाती है वह दैवी सम्पदा का गुण नहीं है। दैवी सम्पदावाले की क्षमा की कुछ निराली होती है। जैसे, भगवान नारायण क्षीर सागर में शेषशैय्या पर लेटे हैं। भृगु ऋषि ने उनकी छाती में लात मार दी। नारायण अपने नारायण तत्त्व में इतने आनन्दित और प्रसन्न हैं, तृप्त हैं कि बाहर से विक्षेप आने पर भी अपना आनन्द-स्वभाव प्रकटाने में उन्हें कोई प्रयास नहीं करना पड़ता।

‘मुनीश्वर ! आपके पैर में कोई चोट तो नहीं लगी? दैत्य-दानवों के साथ युद्ध करके हमारा हृदय जरा कठोर हो गया है। इस कठोर हृदय पर आपका कोमल चरण लगा है तो आपके चरण को कोई ठेस तो नहीं पहुँची?’