डीसा आश्रम की यादें – (बापूजी की लीला- १७)

bhajanडीसा आश्रम की यादें
गुरूजी दूर है कहीं सत्संग करें हम डीसा थे | लेकिन कहीं हमको ऐसा नहीं लगा की गुरूजी ने हमको यहाँ आज्ञा दिया हम दूर हो गये | गुरु की आज्ञा है तो गुरूजी साथ में | उत्तम लाभ हमको हो गया | गुरुसे वार्ता करते हैं, भोजन करते है गुरुसे बात करते है | तो शरीर से हम गुरु से दूर थे आज्ञा दी रही बस ! उनकी आज्ञा मान रहे थे हम वही रहते थे | असुविधामेओं में भी ज्यादा पीड़ा नहीं होती | ऐसी जगाह रहती थी की बहुत असुविधा रहती थी | हमारी स्वभाव नहीं था की ऐसी जगाह हम रह पायें | चारों तरफ झोपड़पट्टीवाले लोटा लेके आसपास सोच के जाये | वो माव्हल ऐसा गंधा था की १ – २ बार गुरूजी को चिट्ठी भी लिखी | गुरूजी ने कहाँ कोई बात नहीं उधर ही रहो | दिन भर भील के छोरे और ईधर-ऊधर झोपडपट्टीवाले के बीच में एक रूम है | रूम भी किसी नेता ने बनाई थी गंदी बाते | दुसरे नेताओ ने उसका नाम कर दिया लीलाशाह बापू का आश्रम | बापू को बोला आप के नाम का आश्रम है | दुसरे कोई साधक जो सिनिअर थे वो जूनियर को वहाँ भिजवा दिया | जो गुरूजी के निकट रहते थे वो ये साधक है ना उसीको भेज दो | तो गुरूजी ने आज्ञा किया वही रहेने दो | तो ७ साल हम वहाँ डीसा रहे | अहमदाबाद – डीसा दो- ढाई घंटे का रास्ता है | ७ मिनट हम घरमें नहीं रहे | गुरु को प्रार्थना करते की घर जाने को तो तुरंत बोलते जाओ | अथवा मैं घर जा के आऊ तो ना नहीं बोलते |
लेकिन एक बार गुरुके द्वारपर आ गये | एक बार संसार की गमन कर दी फिर क्यूँ जाये | अहमदाबाद से मुझे नर्मदा किनारे जाने की लालजी महाराज मेरे मित्र थे तो रूचि करती थोड़ी तो गुरूजी से आज्ञा माँगवाता | अहमदाबाद से मुझे आश्रम जाना तो डीसा से अहमदाबाद जाना होता तो हो के जाना पड़ता था | फिर गाडी टाईम पे मालखेड मिलती थी | उस ज़माने में सुविधा भी नहीं थी | तो कभी रहेना का होता तो जो मेरा मित्र था हरगोबिन्द पंजाबी | जब मेरे को रहेना का होता था २ – ४ दिन एक रात गुजराना अहमदाबाद में तो मैं उसके यहाँ ठहरता जब मेरे को ठहरने को आता तो एक दिन पहिला किरायादार चला जाता | ऊपर का पूरा ३ – ४ रूम का जो था मैं वहाँ रह लेता | नारायण की माँ जिन्दी है उसको कसम डाल के पूस सकते हो | कभी भी २ मिनट के लिए भी गुरूजी के पास जाने के बाद २ मिनट के भी घर पर नहीं गये या हम एक – दुसरे को ऊँगली भी नहीं लगायी | तो ये गुरु की कृपा रही अथवा तत्परता रही | गुरुमूर्ति, गुरु का ज्ञान, ईश्वर प्राप्ति का महत्त्व |
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One thought on “डीसा आश्रम की यादें – (बापूजी की लीला- १७)

  1. Eknath Sinha (@eknathsinha)

    हे विद्यार्थियो ! तुम्हारे जीवन में यदि परहित की भावना होगी, निष्काम कर्मयोग की भावना होगी तो तुम अवश्य अपना, अपने माता-पिता का एवं राष्ट्र का गौरव बढ़ा सकोगे।

    http://www.parentsworshipday.com

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