मृत्यु से डरना क्यों ?

I Don't Fear to Die

I Don’t Fear to Die

वेदव्यासजी के नाना निषादराज को मृत्यु का बहुत भय लगता था। एक दिन उन्हें देवर्षि नारद मिल गये। उनका अर्घ्य-पाद्य से पूजन किया। संत-महापुरूषों का आदर-सत्कार करने से बल, आयु, विद्या और बुद्धि बढ़ती है। जब श्रेष्ठ पुरूष पधारे तब खड़े होकर आदर देने से अपनी योग्यताएँ बढ़ती हैं। उनको तो कोई फर्क नहीं पड़ता।
निषादराज उम्र में तो बड़े थे लेकिन भगवद् भजन में नारद जी बड़े थे। देवर्षि नारद पधारे तो वे खड़े हुए, अर्घ्य पाद्य देकर उनका पूजन किया। फिर विनती की किः “भगवन् ! मुझे मृत्यु का भय बहुत सताता है। आप कुछ भी करो, मुझे मृत्यु के भय से बचा दो। आप संत हैं। वैकुण्ठ तक जाने की योग्यता रखते हो। यमराज से कुछ लागवाग लगाओ और उनके लिस्ट में मेरे नाम पर चौकड़ी करवा दो। इतनी कृपा करो। यमराज की डायरी से मेरा नाम निकलवा दो। मैं आपका बड़ा कृतज्ञ रहूँगा।”
नारद जी ने कहाः “देखो ! हम भजन की विधि बता सकते हैं, जप और ध्यान की विधि बता सकते हैं, साधना का मार्ग बता सकते हैं। यमराज की डायरी में गड़बड़ करना हमारे हाथ की बात नहीं है। उस काम के लिए जिसकी पहुँच हो ऐसे व्यक्ति से आपको मिलना चाहिए। उनका नाम मैं बता देता हूँ।”
“हाँ बता दो।”
“वे आपके दोहित्र हैं, वेदव्यासजी। आप जिनके नाना लगते हैं वे वेदव्यासजी कारक पुरूष हैं। भगवान वेदव्यासजी संकल्पबल से यमराज के पास जायें और उनसे कहें तो आपका काम हो जायेगा। युक्ति मैं बताता हूँ, उपयोग आपको करना पड़ेगा।
पहले अर्घ्य पाद्य से पूजन करके प्रसन्न कर लेना। खुश हो जायें तब उनको वचनबद्ध कर देना कि मैं जो कहूँगा वह आप जरूर पूरा करेंगे। दूसरी बातः जब वे हाँ कह दें तब भी रूक नहीं जाना। हाँ बोलने के बाद वे करेंगे तो सही लेकिन पता नहीं कब करें। बड़े आदमी ठहरे। वे यमराज के पास पहुँचे उससे पहले वहाँ से यमदूत वारंट लेकर रवाना हो जाये ! वे छः महीने मे के बाद जायें और तुम्हारी मृत्यु तीन महीने के अन्दर हो जाय तो काम नहीं बनेगा। इसलिए तुम उनको साथ लेकर यमराज के पास जाना। अपनी नजरों के सामने यमराज की डायरी में अपना नाम केन्सल करवाना।
निषादराज को पक्का हो गया कि बात सही है। यह बहुत महत्त्वपूर्ण कार्य है। अपनी उपस्थिति में ही यह काम हो जाना चाहिए।
समय बीता। वेदव्यासजी आये। नारदजी के कहे अनुसार आदर-सत्कार किया, अर्घ्य-पाद्य देकर पूजन करके कहाः
“देखो, मैं उम्र में बड़ा हूँ। तुम्हारा नाना भी लगता हूँ। आज तक तुमसे कुछ नहीं माँगा।”
वेदव्यासजी बोल उठेः “नाना जी ! माँग लो।”
“मैं जो माँगूगा वह आप टालेंगे नहीं।”
“हाँ, हाँ नहीं टालूँगा।”
“वचन दे दो।”
“वचन है नाना जी ! आपको मेरा वचन है।”
“मुझे मृत्यु का भय लगता है। आप यमराज को बोल दो कि अपनी डायरी में से मेरा नाम निकाल दें।”
“अच्छा मैं कोशिश करूँगा।”
“नहीं, आप मेरे साथ चलो। मैं अपनी आँखों से देखूँ और यमराज की डायरी में से मेरा नाम कटे। आप वचन दे चुके हैं।”
कथा कहती है कि निषादराज और वेदव्यासजी पहुँचे यमपुरी में। यमराज ने आदर-सत्कार किया और वेदव्यासजी से बोलेः
“आप जैसे कारक पुरूष ब्रह्मवेत्ता इधर कैसे पधारे ? क्या सेवा करूँ ?”
“सेवा तो यह है कि ये मेरे नाना जी हैं, मैं उन्हें वचन दे चुका हूँ। अगर हो सके तो मृत्यु की डायरी में से मेरे नानाजी का नाम निकाल देना, यमदूत को भेजना मत।”
“मृत्यु की डायरी में हम इधर नाम नहीं रखते हैं। हमको काल के वहाँ से निर्देश होता है। यहाँ से केवल दूतों को उस निर्देश के मुताबिक रवाना करते हैं। अब आप जैसे महापुरूष आये हो तो चलो काल के पास। उधर ही मिल लेते हैं।”
तीनों पहुँच गये काल के पास। काल ने कहाः
“मेरी डायरी में नाम तब आता है जब विधाता का आदेश होता है। चलो, हम उन्हीं के पास जायें।”
चारों मिलकर विधाता के पास गये। वेदव्यासजी बोलेः
“आप तो जानते ही हैं, वेदव्यास मेरा नाम है। मैं यमराज के पास आया था। यमराज काल के पास ले गये और काल के वहाँ से सब यहाँ पहुँचे हैं।
ये निषादराज मेरे नाना जी हैं। इन्हें मृत्यु का बहुत भय लगता है। आप अपनी खाताबही में जरा रियाअत कर दीजिए। मृत्यु की लिस्ट में से इनका नाम कम कर दीजिए।”
विधाता बोलेः “मुझे पता है कि ये आपके नाना हैं। मृत्यु का इनको बड़ा भय है। इसीलिए मैंने ऐसी व्यवस्था की कि इनकी मृत्यु से जल्दी से होवे ही नहीं। उनकी मृत्यु की शर्तों में ऐसी आँटी-घूँटी रख दी के वे शर्तें पूरी होवे ही नहीं और इनको मरना पड़े ही नहीं। लाओ बही, मैं दिखाता हूँ।”
बही लायी गयी। उसमें लिखा था कि निषादराज स्वयं जब वेदव्यासजी को, यमराज को और काल को लेकर ही विधाता के पास जाएंगे तभी मृत्यु होगी, उसके पहले नहीं।
निषादराज को तो यह सुनना ही था कि मृत्यु ने अपना काम कर लिया।
मौत से बचने की इतनी सारी व्यवस्था करने के बाद बी मौत का ग्रास होना पड़ता है। जब मरना इतना अवश्यं भावि है तो मरने से डरना क्यों ? डरने से मौत नहीं मिटती। दूसरी बार मौत न हो इसका यत्न करना चाहिए।
अनेक बार मौत क्यों होती है ? वासना से मौत होती है। वासना क्यों होती है ? वासना सुख के लिए होती है। अगर आत्मा-परमात्मा का सुख मिल गया तो वासना आत्मा-परमात्मा में लीन हो जायेगी। परमात्मा अमर है। वासना अगर परमात्म-सुख से तृप्त नहीं हुई तो देखने की वासना खाने की वासना, सूँघने की वासना, सुनने की वासना और स्पर्श की वासना बनी रहेगी। पाँच ही तो विषय हैं और जिनको पाँच विषय का सुख दिलाते हो उनको तो जला देना है।
योगी इस बात को जानते हैं इसलिए वे अंतर आराम, अंतर सुख, अंतर ज्योत की ओर जाते हैं। भोगी इस बात को नहीं जानता, नहीं मानता इसलिए बाहर भटकता है। भगवान कहते हैं-

संतुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढ़निश्चयः।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद् भक्तः स मे प्रियः।।

‘जो योगी निरंतर संतुष्ट हैं, मन-इन्द्रियों सहित शरीर को वश में किये हुए हैं और मुझ में दृढ़ निश्चयवाला है, वह मुझमें दृढ़ निश्चय वाला है, वह मुझमें अर्पण किये हुए मन-बुद्धिवाला मेरा भक्त मुझको प्रिय है।’

(भगवद् गीताः 12.14)
एक बार केवल तीन मिनट के लिए अगर आत्म बोध हो जाय तो सदा सदा के लिए मुक्ति हो जाये।

अनुक्रम
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हांडी रे हांडी ऽऽऽ…….!
एक राजा की प्रिय रानी का स्वर्गवास हो गया। राजा रानी में इतना मोह था कि वह भी रानी की अर्थों के साथ ‘हाय रे हाय मेरी रानी ऽऽऽ….’ करते हुए चिता में जलने के लिए जाने लगा।
गोरखनाथ को पता चला सोचाः ‘अरेरे ! राजा इतना बुद्धिमान होते हुए भी रानी के पीछे कैसा नादान हो रहा है ! विकारों का सुख आदमी को कैसा मंदबुद्धि कर देता है ! कितना गिरा देता है ! राजा को सावधान करना चाहिए।’
राजा विह्वल होकर स्मशान की ओर जा रहा था। गोरखनाथ वहाँ आये। उनके हाथ में मिट्टी की हांडी थी। राजा के सामने आते ही हांडी को नीचे पटककर रोने लग गयेः
“हांडी रे हांडी ऽऽऽ…..! तेरे बिना भी क्या जीना ? तुझ ही में भिक्षा मांग कर खाता था, रात्री को तेरा ही सिरहाना बनाकर सोता था। तेरे बिना खाऊँगा कैसे ? तेरे बिना सोऊँगा कैसे ? तेरे में ही पानी भरके पीता था, धूप लगती थी तो टोपी की तरह पहन लेता था। बारिश में तू ही छाता बन जाती थी। हांडी रे हांडी ऽऽऽ….!”
राजा ऐहिक जगत में तो बुद्धिमान था जबकि गोरखनाथ संतुष्टः सततं योगी के जगत पहुँचे हुए थे। गोरखनाथ की बुद्धि राजा से कुछ ऊँची थी। ऐसे गोरखनाथ हांडी के लिए विलाप करने लगे। राजा देखता है कि, “मैं तो रो रहा हूँ, ये बाबाजी क्यों रोते होंगे ?” पास जाकर पूछाः
“महाराज ! क्यों रोते हो ?”
“क्या करूँ ? मेरा सर्वनाश हो गया। मेरी हांडी टूट गई। हांडी रे हांडी ऽऽऽ….!”
“महाराज ! हांडी टूटी इसमें क्या रोते हो ? ये तो मिट्टी के बर्तन हैं। कभी बनते हैं कभी टूटते हैं। साधूबाबा होकर इसकी क्या चिन्ता करते हो ?”
“अरे तुम मुझे समझाते हो ? मैं तो रोकर काम चला रहा हूँ और तुम मरने को तैयार हुए हो।”
राजा को समझ आ गई कि अरे !…..

मोहनिशा सब सोवनहारा।
देखहिं सपने अनेक प्रकारा।।

जिससे सम्बन्ध हो गया है वह आदमी जाता है तब दुःख तो होता है पर दुःखी होने से जाने वाला आदमी लौट आता हो तो खूब दुःख करो। दुःख करने से तो वह लौटता नहीं। उसकी अंतिम-क्रिया करो, विधि-विधान के मुताबिक सब करो, उसका कल्याण हो ऐसा करो लेकिन वह जीवात्मा भटकता-भटकता तुम्हारे वातावरण में आकर दुःख सहे ऐसा नहीं करना चाहिए।