गंगा गौरव गान

gangadashhara

भारतीय संस्कृति में कलिमलनाशिनी गंगा की अपार महिमा है । प्राचीन मनीषियों ने इससे प्रभावित होकर अपनी भाव-पुष्पांजलियाँ विभिन्न स्वरूपों में अर्पित कर स्वयं को कृतकृत्य किया है । ‘श्रीमदभागवत महापुराण’ में गंगाजी राजा भगीरथ से प्रश्न करती है : 

किं चाहं न भुवं यास्ये नरा मय्यामृज्न्त्यघम  |
मृजामि तदघं कुत्र राजंस्तत्र विचिन्त्यताम ||

‘इस कारण से भी मैं पृथ्वी पर नहीं जाऊँगी कि लोग मुझमें अपने पाप धोयेंगे | फिर मैं उस पाप को कहाँ धोऊँगी ? भागीरथ ! इस विषय में तुम स्वयं विचार कर लो |’

जैसा महत्त्वपूर्ण प्रश्न था, वैसा ही महाराज भगीरथ ने गूढ़ प्रत्युत्तर भी दिया :

साधवो न्यासिन: शान्ता ब्रम्हनिष्ठा लोकपावना: |
हरन्त्यघं तेsसंगात  तेष्वास्ते ह्राघभिद्धरि: ||     

‘माता ! जिन्होंने लोक-परलोक, धन-संपत्ति और स्री-पुत्र की कामना का संन्यास कर दिया है, जो संसार  से उपरत होकर अपने-आप में शांत है, जो ब्रम्हनिष्ठ और लोकों को पवित्र करनेवाले परोपकारी सज्जन हैं,वे अपने अंगस्पर्श से तुम्हारे पापों को नष्ट कर देंगे क्योंकि उनके ह्रदय में अघरूप अघासुर को मारनेवाले भगवान् सर्वदा निवास करते हैं |’ (९.९.५ – ६ )

तमसा के तीर पर निवास करनेवाले महर्षि वाल्मीकिजी की ‘गंगाष्टक – स्वरलहरी’ गंग – तरंग की भाँती मन-वाणी को भी पुनीत भावनाओं से झंकृत कर देती हैं | महाकवि कालिदासकृत ‘गंगाष्टकम’ का पाठ करने से ऐसा लगता है, मानो गंगा का अमृततुल्य जल तन-मन को पवित्र कर रहा है | श्रीमद आद्य शंकराचार्यजी कल्मषनाशिनी भगवती श्रीभागीरथी के भूतल पर अवतीर्ण होने को मानव-जीवन को सार्थक बनाने हेतु सर्वोत्तम उपलब्धि के रूप में स्वीकार करते हैं | ‘गंगाजललवकणिका पीता’ पद इसी सिद्धांत की पुष्टि करता है | तुलसीदासजी तो जीवन से मुक्त होने की भी कामना न करते हुए बार-बार श्री रघुनाथजी का दस होकर गंगा-किनारे रहने को ही जीवन-साफल्य मानते हैं | भगवती गंगा के प्रति अपने भावों का भव्यतम समर्पण करते हुए उन्होंने ‘श्रीरामचरितमानस’ में कहा है :

गंग सकल मुद मंगल मुला |
सब सुख करनि हरनि सब सुला ||

‘गंगाजी समस्त आनंद-मंगलों की मूल हैं | वे सब सुखों को करनेवाली और सब पीडाओं को हरनेवाली हैं | (अयो. कां. :८६.२ ) 

‘व्यंग्यकला प्रवीन युवराज अंगद के मुख से संत तुलसीदासजी ने गंगा के विषय में कहलवाया :

राम मनुज कस रे सठ बंगा |
धन्वी कामु नदी पुनि गंगा ||       

‘क्यों रे मुर्ख -उदण्ड! श्रीरामचंद्रजी क्या मनुष्य हैं ? कामदेव क्या धनुर्धारी हैं ? और गंगाजी क्या नदी हैं ?’ (लंका कां. : २५.३) – यह तो देश में व्याप्त रावण जैसे जन्मति लोगों के मुख पर करारा तमाचा हैं, जो भगवान श्रीराम को मनुष्य, गंगा को मात्र नदी मानते हैं | 

धन्य देस सो जहँ सुरसरी |

यह भारत देश इसलिए धन्यवाद का पात्र है कि यहाँ गंगा जैसी पावन देवसरिताका निवास है | (उत्तर कां.:१२६.३)

रुड़की विश्वविद्यालय में गंगाजल पर कुछ प्रयोग हुए थे, जिनका निष्कर्ष था कि गंगाजल में जीवाणुओं को मारने कि शक्ति अन्य नदियों के जल से अधिक है | हमारे वैद्यक शास्त्र इस सुधातुल्य गंगाजल में लिख चुके हैं :

स्वादु पाकरसं शीतं द्विदोषशमनं तथा |
पवित्रमपि पथ्यं च गंगावारि मनोहरम ||

‘मनोहर गंगाजल स्वादिष्ट, पाकरसयुक्त, शीतल, द्विदोष का शामक, पवित्र तथा पथ्यरूप हैं |

जिस गंगा के विषय में भगवान श्रीकृष्ण ने स्त्रोतसामस्मि जाह्नवी – ‘स्त्रोतों में मैं गंगा हूँ ‘ – कहकर यशोगान किया है, उस महिमामयी माँ गंगा के विषय में भला क्या कहा जा सकता हैं ?