गंगाजल अमृततुल्य है

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गंगाजल अमृततुल्य है 

जैसे मंत्रो में ॐकार , स्रियों में गौरीदेवी, तत्त्वों में गुरुतत्त्व और विद्याओं में आत्मविद्या उत्तम है, उसी प्रकार संपूर्ण तीर्थों में गंगातिर्थ विशेष माना गया है | गंगाजी की वंदना करते हुए कहा गया है :

संसारविषनाशिन्यै जिवनायै नमोsस्तु ते | तापत्रितयसंह्न्त्र्यै प्राणेश्यै ते नमो नम:||

‘देवी गंगे ! आप संसाररूपी विष का नाश करनेवाली हैं | आप जीवनरूपा हैं, आप आध्यात्मिक, आधिभौतिक और आधिदैविक – तीनों प्रकार के तापों का संहार करनेवाली तथा प्राणों की स्वामिनी है, आपको बार-बार नमस्कार है |’ (स्कंद पूरण, काशी खं,पू. : २७.१६०)

भगवती माँ गंगा का परम पावन जल अमृततुल्य होता है | विश्व में केवल गंगाजल ही एकमात्र ऐसा जल है, जो अपने औषध -गुणों के कारण वर्षों तक रखे रहने पर भी विकृत नहीं होता | अन्य सभी सरिताओं का जल कुछ ही समय में ख़राब एवं दुर्गंधयुक्त हो जाता है | यही कारण है कि पावन गंगा को ‘सर्वस्य सर्वव्याधिनां भिषक्छ्रेष्ठयै नमोsस्तु ते |’ कहकर समस्त रोगों कि श्रेष्ट वैद्या बताया गया है | ‘ईष्ट इंडिया कंपनी’ के जहाज इंग्लैंड लौटते समय गंगाजल साथ में ले जाते थे क्योंकि तीन मास की लम्बी यात्रा में यह ताजा व मधुर रहता था | सम्राट अकबर गंगाजल को, ‘अमृतजल’ कहता था व यात्रा में सदैव साथ में रखता था |

हमारे धर्मग्रंथ जिस अमृततुल्य गंगाजल के प्रताप को हजारों-लाखों वर्षों से गाते रहे हैं, उसे २०वी सदी के विज्ञानने भी स्वीकार किया है | गंगाजल में ऐसा क्या है ? क्यों वर्षों तक रहने पर भी वह ख़राब नहीं होता और क्यों इसके सेवन तथा स्नान करने से रोगी ठीक हो जाते हैं ? इस पर स्वदेशी और पाश्चात्य देशों के वैज्ञानिक सैकड़ो वर्षों के शोध के बाद इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि गंगाजी को नमो भेषजमूर्तये |

‘औषधिरूपा ! आपको नमस्कार है’ – ऐसा कहनेवाले सूक्ष्म अन्वेषक दूरद्रष्टा हैं | हाइड्रोलोजी के प्रोफेसर डॉ. डी. एस. भार्गव के अनुसार ‘नदी के जल में जो ऑक्सिजन होती है उसे जैव पदार्थ ख़त्म कर देता है, बाद में वह सड़ने लगता है लेकिन गंगाजल में एक अज्ञात पदार्थ है जिसे ‘एक्स फैक्टर ‘ नाम दिया गया है, वह जैव पदार्थ व् जीवाणुओं को नष्ट कर देता है | गंगाजल के अपने-आपको शुद्ध करने के गुण के कारण विश्व कि अन्य नदियों के जल की तुलना में उसमें २५ गुना अधिक ऑक्सिजन बनी रहती है | बैंगलोर में मॉलिक्युअर बायोलाजिस्ट श्री रामचंद्रन के अनुसार गंगाजल की ऑक्सिजन को बनाये रखने की असाधारण क्षमता के कारण ही गंगा में लाखों लोगों के स्नान  करने पर भी उनके रोगों का नदी के द्वारा फैलाव नहीं होता |

फिल्म निर्माता जुलियन क्रेन्डेल हॉलिक ने गंगाजल के चमत्कारिक ‘एक्स फैक्टर’ की खोज के बारे में अपनी फिल्म में बताया है कि हिमालय में गंगा के उदगम-स्थान पर जंगली पौधे, रेडिओधर्मी शिलाएँ व अत्यंत शीतल जल के तेज झस्ने है,  जिनके कारण गंगाजल में विलक्षणता है |

विज्ञानियों द्वारा उजागर किये गए आश्चर्य-जंक तथ्यों में से एक अति महत्त्वपूर्ण तथ्य यह है कि गंगाजल में करोड़ों बैक्ट्रीरियोफेज पाए जाते हैं, जो रोगों के जीवाणुओं को खाते है | बैक्ट्रीरियोफेज एक ऐसा जीवनरक्षक है, जो दिखने में बहुत छोटा (१ से.मी. का १०,००० वाँ भाग) होता है तथा प्रोटीन के आवरण से ढँका रहता है | इसकी एक अनोखी विशेषता है कि यह गंगाजल में निरंतर उपस्थित रहता है और भूखा होने पर भी हजारो-लाखों वर्ष जीवित रह सकता है | जब भी जल में कोई बीमारी पैदा करनेवाला या जल को सडानेवाला जीवाणु आ जाता है तो ये बैक्ट्रीरियोफेज इकट्ठे होकर उस पर टूट पड़ते है अवम उसे समाप्त कर देते हैं | कोई भी रोगी यदि गंगाजल का सेवन करता है तो ये विशेष जीवन-रक्षक तत्त्व उसके शरीर में पहुँचकर रोगों के जीवाणुओं को नष्ट करते है, जिससे रोग शनै: – शनै: समाप्त होने लगता हैं | 

ये जीवाणुभोजी बैक्ट्रीरियोफेज कहाँ से आते है यह अभी तक विदित नहीं हो सका है परंतु भागीरथी गंगा के उदगम-स्थान से विलय-स्थान तक सर्वत्र ये विद्यमान रहते हैं | गंगाजल को उबालने से ये निष्क्रिय हो जाते हैं, अत: इस उबालना नहीं चाहिए |

भारतीय संस्कृति में तो पहले से ही गंगाजल को न उबालने की मान्यता प्रचलित है | गंगा मैया भारतवासियों के लिए वरदान स्वरूपा हैं | भगवान महादेवजी ने तो यहाँ तक कहा हैं :  ‘ जो दूर रहकर भी गंगाजी के महात्म्य को जानता हैं और भगवान गोविंद में भक्ति रखता हैं, वह अयोग्य हो तो भी माँ गंगा उस पर प्रसन्न होती हैं | अज्ञान, राग और लोभ आदि से मोहित चित्तवाले पुरुषों की धर्म और गंगा में विशेष श्रद्धा नहीं होती |’ गंगा मैया ब्रम्हरूपिणी, विष्णुरूपिणी तथा रूद्ररूपिणी हैं. इसलिए उन्हें कोटिश: प्रणाम !