गिरनार के जोगी की दर्शन की आज्ञा -(बापूजी की लीला- २०)

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दर्शन करते है ना तो फिर सत्संग करते करते मेरे तरफ देखते | मेरे तरफ देखते और दूसरी तरफ सिर घुमाके फिर मेरे तरफ देखते | बड़ा हटपटा खेल करते थे, कृपा होती थी मुझे | एक बार सौराष्ट्र में उपलेटा है जूनागढ़ के पास में, जूनागढ़ में गिरनार पर्वत है | तो गिरनार पर्वत में ८४ सिद्ध, ६२ योगिन्या रहती जोगी आकड़ा कुछ वो गुप्त रहते थे | और उसके कई प्रमाण | मैं उपलेटा में गुरूजी का दर्शन करने गया डीसा में रहेता था | और गुरूजी आये किसी भक्त का खेत है उसने बना रखा था भोयरा और गुरूजी के लिए कुटियाँ | तो गुरूजी महिना, १५, १० दिन वहाँ रहते थे | मेरे जैसा नहीं भाग- भाग करते थे | वो तो २० दिनों आराम से शाम को थोडा सत्संग किया फिर एकांत में रहते थे | तो मैं २ – ५ दिन रहा फिर मैं तो बड़ा मर्यादा रखता था, मुँह नहीं लगता था | जो मेरा हरिक था वो गुरूजी का सेवक था | पर्सनल सेवा करता था, भोजन बनाना, झाड़ू लगाना वो बड़ा छंद था | गुरूजी मेरे पर थोड़े मेहरबान रहते तो उसको बड़ा तकलीफ होती थी | तो उसने एक लोबी रखी थी, मेरे खिलाफ मैं ऐसा है, वैसा है | वो जो पर्सनल सेवक बोले, दर्शन करनेवाले होते तो उसी मेंटल उसी मेंटालिटी हो जायेगी | तो कोई भी मेरेको उसके स्वभाव में आया तो मेरे को फिर निगेटिव नजर से देखते थे | देखो ना देखो क्या है | मैं तो अपने साधन भजन में मस्त रहेता था |
अब क्या हुआ गुरूजी मेरे को क्या करे वो अंगत सेवक था | मेरे को तो उसी भी खुशामत करनी पड़ी मेरे को | तो मैंने उसको हथाजोड़ी किया की मैं कल छुट्टी लेकर जानेवाला हूँ | तुम जरा गुरूजी से मेरे को आज्ञा लेके देना ! की मैं सीदा डीसा में जाके वो गिरनार देख रहा है ना | उधर बड़े बड़े सिद्ध लोक है जरा चक्कर मारते जाऊं | उसने गुरूजी को कैसा…बाबा ! वो तो अभी डीसा जायेगा लेकिन सीदा नहीं जायेगा, वो गिरनार के सिद्धों के पास जायेगा, बाद में डीसा जायेगा | ऐसा जो भी कुछ उसने कहा होगा मसाला डाल के | मैं गुरूजी … ईधर आना जरा दर्शन करो, बैठो | कितनी कृपा होती है गुरूजी ही जानते | गुरु भी नहीं जानते कितनी कृपा होती, उनको भी पता नहीं |
भगवान और गुरु माप तो नहीं जानते | भगवान और गुरु अन्दाधुन्दी है सरकार | तुलसी आपने राम को रिज भजो या खीज भूमि फेके उगे नहीं की उलटे सीधे बीज | रीजे धिजे रंक और खीजे धिजे परमपद | बिभीषण बीज है तो लंका परबिज और रावण को खीजे तो परमपद दिया | ये अन्धाधुन्दी सरकार है | मेरे गुरुदेव भी ऐसी सरकार उसने तो गुरुदेव को ऐसा मेरे लिए मिलाके कहा है अनुमान है | लेकिन गुरूजी ने क्या बरसाया सत्संग शुरू हुआ फिर गुरूजी ने सत्संग के दो वचन करके फिर व्याख्या थोड़ी करके जो कहना था उसी में परोस लेते थे | एक दिन सूरज दौड़ा दौड़ा जा रहा था | मेरे तरफ देखा की वो सुनता है की नहीं सुनता | भागा – भागा सूरज जा रहा था | किसीने पूछा सूरज देवता कहाँ जा रहे है | बोले उधर खैदुद है ना खैदुद रात को जो चमचम करते है | उसने जरा रोशनी लेना जाता हूँ | अभी ये सूरज है की बेवकूफ है | मतलब इतना मिला है की उधर गिरनार पर सिद्धों के पास जाता है | सूरज जाता है जुगुनू के पास तो सूरज है की मुर्ख है | मैं थो साईं के पास… फिर सत्संग चला | बोले एक बार राजकुमार को राजासाहब ने तिलक लगाके राजनीती पर बिठा दिया | वो तो हो गया राजकुमार | राजा बन गया ना ? फिर वो खेलने में लग गया रात को उसको पता ही नहीं की मेरे को ये गद्दी है | और उनसे कुछ लेना चाहता था | आरे मुर्ख तू खुद राजा है वो तेरे रहेम के भिकारी है | भिकारी शब्द नहीं था गुरूजी का कुछ और | अब तू उनसे क्या लेने जाता है ? वी कैसी मति है ? कुछ समज आया ? जी महाराज जी ! गुरूजी के साथ बीती हुई घड़ियाँ अगर याद आती है ना खुशयाल हो जाती है | मेरे को ३८ साल पुराणी याद भी ख़ुशी देती है | और तुम्हारे को क्या होता होगा तुम जानो |
हरि … हे गुरु… आनंददाता प्रभु कहीं बाहर नहीं है प्रभु तो निराकार ऐसा निराकार सही तो वही ब्रम्हवेत्ता वही साकारस्वरुप है प्रभु | चलते फिरते भगवान देखना है तो ब्रम्हज्ञानी | कृष्ण ब्रम्हज्ञानी थे, राम ब्रम्हज्ञानी थे |
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