गृहस्थ जीवन – (बापूजी की लीला- २१)

IMG-20140411-WA0003गृहस्थ जीवन

तुम्हारा असली स्वरुप, रसस्वरुप आत्मा से प्रगट हुआ | अब उसका पता नही है इसलिए हम आखों के द्वारा देखने का रस लो, नाक के द्वारा सुंगने का मजा लो, जिभ के द्वारा चखने का मजा लो, कान के द्वारा वाह-वाही का मजा लो | पति-पत्नी शरीर को नोच नोच के काम विकार का मजा लेते लेते अकालमृत्यु मरो, नुकसान होता है | जिसको भगवत रस मील गया वो पति-पत्नी होंगे लेकिन एक दुसरे को शरीर को ज्यादा नोचेंगे नहीं, चिकटेंगे नहीं |

मेरा बेटा नारायण है उसकी माँ से पूछ के देखो | कितने साल हो गये ५० साल शादी को हो गये | ५० घंटे भी साथ में रहे या फिर भी मुझे स्नेह करती है और हम भी उसको करता हूँ | प्यार करने का मतलब ऐसा नहीं की चिपक-चिपक अपना सत्यानाश करों | वो उपवास करती हैं ना चंद्रमा को अर्घ्य देनेवाला उपवास होता है तो मेरे को ही अर्घ्य दे देती | ये हमारे ये…. अब पति में इतने श्रद्धा है कैसे ? और वो बुढियां जब बीमार हो जाती और नाईलाज हो जाता तो मैं इंटरकॉम से सेवक को बोलता हूँ की बात करा दे | बोलता हूँ तो थक गई तो बोले ऐसा है, कुछ होता नहीं, फर्क नहीं रहा | लेकिन वो डॉक्टर नी दवा डी है थोडासा फायदा है बोले हाँ थोडासा फायदा है | मैं कहाँ मेरे को बहोत अच्छा लगता है बोल न फायदा है यहाँ फायदा है | मैंने कहाँ ख़ुशी से बोल दे आ… हां… बोले आहां.. मैं कहा मजा आता है बोलने को ऐ.. हया.. बुढ़िया बोलती है या.. ह्या… ह्या… फायदा हो गया या.. ह्या… ह्या… | मैंने कहाँ ऐसा किया कर और वो चाग्नि हो गयी |

२० साल मायके नहीं गयी अब तो मायके घुमने गई, हरिद्वार घुमने गई, ईधर घुमने गई उधर घुमने गई बुढ़िया पैर में पाय लागे दौड़ती घमने लगी | मेरे से कम ऊमर की है लेकिन खानपान माईयों का ये खा लिया कभी वो खा लिया | मैं भूख नहीं तबतक नहीं खाता और रात को भोजन नहीं करता | और नींबू का रस, तुलसी का रस (पचीस पत्तों का ) और एक ग्लास गुनगुना पानी कभी कभी पी लेता हूँ तो कोई भी शरीर में रोग छुपा हो तो अपनेआप भाग जाता है | और सूर्य के किरणों में प्राणायाम कर लेता हूँ | मैं तो ७३ साल का जवान और वो ६५ साल की बुढ़िया | समज गये |

फिर भी मुझे खुप स्नेह करती है कितने वर्ष हो बीत गये होंगे | एक बार मिले तो नारायण और दूसरी बार मिले तो भारती आयी | फिर कभी काला मुँह होगा तो नहीं | नहीं तो रोज रोज नीरस जीवन है ना .. उसको भी कभी ये वासना नहीं होती | लोग माताजी… माताजी… बोल देते है | मैंने तो पिताजी नहीं किया और ये कही जा रही मोफत में माताजी … पिताजी मेहनत करों चाहे माताजी करो | आनंदमयी माँ ने मेहनत की उनके पति भी पूजित है | हमने मेहनत की और माताजी पूजित है | कुटुंब का एक व्यक्ति भगवान के रास्ते रसमय होता है तो पूरा परिवार, पूरा समाज रसमय होता है |
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