गुरुदेव की खोज में – (बापूजी की लीला- २३)

IMG-20140124-WA0004गुरुदेव की खोज में

मैं तपस्या का रास्ता नहीं बता रहा हूँ तुम्हारे को, शरीर ही बचा, मच्छर ही नोच रहा हैं खून, गरीबी खून नोच रही है, महेंगाई खून नोच रही है | अब मैं तपस्या क्यूँ बताऊंगा मैं तो तैयार हूँ | मेरे साधक तो निहाल हो जायेंगे, तप करों, ये करो, फलाना करों | मैं घर छोड़ के निकला ना तो ईश्वर के बहोत तडफ रहा था | तो एक साधू, दूसरा साधू किस-किस साधू से मिले, पता चला की अयोध्या में ५ हजार साधू थे, कभी कभी २५ हजार हो जाते | मेरा कहा की जहाँ कुलचल नहीं वहाँ जावो | फिर ५ हजार साधू से मिले तो ५ हजार दिन जायेंगे | उनसे में सबसे ऊँचे- ऊँचे में जाच किया | तो चार साधू पकडे ऊँचे कोटि के, ऐसे ऊँचे की कोई धुप में रहेता है, कोई मौन में रहेता है, कोई घास-फूस के कुटियाँ में रहते है | मैंने कहाँ की उन चारों में से जो विशेष तो विशेष का नाम बताया | वो ९० साल के है के दूध पर रहेते मुंज के कुटियाँ पर रहेते है | सरजू के किनारे अयोध्याजी का नाम तो जानते है आप | तो उस साधू के पास गया | कुर्ता और लहेंगा पहेनता था | फिर वो हटाकर ऐसी धोती पहेन लेता था | साधू की खोज खोज में उसने बताया मैंने कहाँ की और कुछ नहीं चाहिए ईश्वरप्राप्ति का मार्ग बताओ महाराज ! बस और कुछ नहीं चाहिए | बड़े खुश उसने बताया की १२ साल नाभि पे जप करों, १२ साल मूलाधार पे करो, १२ साल स्वधिस्थान केंद्र, मनिपुर केंद्र, १२ साल फिर विशुदा के फिर १२ साल यहाँ ४८ साल का कोर्स बताया | मैंने प्रणाम किया और मैं तो खिशक गया | परिषत को ७ दिन में मील सकता है | खटरंग राजा को एक मुहूर्त में मील सकता है | राजा जनक को प्रसाद में पैर डालते-डालते मील सकता है | तो मैं ४८ साल इंतजार करके मर जाऊँगा | नहीं मैं तो खिसक गया |
पूर्ण गुरु कृपा मिली पूर्ण गुरु का ज्ञान | आसुमल से हो गये साईं आसाराम ||

फिर मैं अयोध्या गया | टूरिस्ट बसवालों कोई जगाह थी खाली बस जा रही थी | मैं गया और वो अयोध्या पहुँचे | उसी साधू के पास गया | वो तो बड़ा आदर करने लगे तू तो आसाराम महाराज है मैं तो बहोत मदद कर सकते हो | लहेंगेवाला आसुमल तुम्हारे तलरेजा लिखवाया था लेकिन सद्गुरु मिले तो मैं निहाल हो गया तो खुशहाल हो गया इतनी देर इतनी लम्बी सफर थोडा होता है | उन्होंने अपने तरफ से जो बताया उनकी अपनी मान्यता थी धारणा थी | लेकिन मैं वहाँ रखता तो मैं ये हाल तो वैसे ही होते | मैं जब गया आसाराम बन के तो मेरा सत्कार करने लगे थे | बैलगाड़ी से आप ४८ साल घुमो तब भी विश्व की यात्रा संभव नहीं है | लेकिन जहाँ से तुम ४८ दिन भी घुमो तो विश्व की यात्रा हो जायेगी | तो अब हम तुम्हारे को ईश्वरप्राप्ति को विसंगमार्ग (जहाज) की यात्रा अच्छी लगती है |

मैंने जो भगवान से पंगा लिया वो भगवान को भी पसंद है, मुझे भी पसंद है | और आप बहोत फायदे में है | हमको इतनी मेहनत के बाद मिला वो आपको हसते-खेलते मील रहा है इस बात की मुझे बहुत ख़ुशी है , बहुत प्रसन्नता है |

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