ज्ञानवर्धक बचपन की लीला – (बापूजी की लीला- २४)

Guruji1ज्ञानवर्धक बचपन की लीला

नहीं बदलता वही तो है, बचपन बदल गया, बचपन की बेवकूफी बदल गयी | छोटी-छोटी सहेलियाँ थी गुड्डी-गुड्डीयाँ खेलते थे मित्र थे सब बदल गया | लेकिन मैंने गुड्डे-गुड्डी की बरात बनाई थी, बचपन में | और मेरे तरफ से तो गुड्डा था और विपक्ष के तरफ से गुड्डीयाँ थी | अब लोक गुड्डे-गुड्डी वाले हम बरात लेके गये | और फिर बैंड भी मैंने बजाई थी | पी…पी.. पी.. पी.. बच्चे थे | और गुड्डे-गुड्डी की शादी-बादी हो गई, जो कुछ खाना-पीना बनाया था वो भी प्लेट किया | फिर गुड्डी को लें आये हम | तो गुड्डी, गुड्डे के साथ ही रहेगी | मैं तो थोडा मुखियाँ रहेता था, छोटा-छोटा बच्चे थे, ५ – ७ साल के होंगे | तो गुड्डा और गुड्डी आखिर मेरे घर रहे | तो मेरा स्वभाव छान-बीन का था | तो जो गुड्डा बनके लाया था और जो गुड्डी जिन्होंने बनाई थी मैंने देखा की क्या है इसीमें, दिखने में तो साटिन था, क्रेप था लेकिन वो हटाया तो अंदर छी .. छी…. पुराणी लिठियाँ | बाहर की मख्खी अंदर बुरबुर द्ख्खी |

ऐसे ये संसार गुड्डे-गुड्डीयाँ है | बाहर से मेकअप किया फिर दुल्हन बन गयी, दूल्हा बन गया | लेकिन नाक उपर करके देखो तो मुँह से बदबू आती है, नाक से लीप निकलती है, आँखोंसे खुरेल निकलती है, रोमकूप से पसीना निकलता है गन्दा, स्वासोस्वास से गंदी हवा निकलती है, कान से कड़ी कड़ी पित्तजन्य चीज निकलती है | मच्छर आपके कान के पास आके गाना गाते है तो आपको काट रहे ऐसा नहीं आपके कान से जो मैल निकलता है वो पित्त और उसकी अपनी बू होती है तो उनको मजा आता है | वो सुंगधी लेने को तुम्हारे कान के आगे आते ऐसा नहीं की तुम्हारे को सुनाते है की मैं काटने आ रहा हूँ | ऐसा ज्ञान होता है सत्संग में नहीं तुमको पता भी नहीं, की मच्छर क्यँ आते है कान के आगे | कान में पित्त के गंदगी निकलती है तो मच्छरों को मजा आती है |

तो ये संसार सारा जो भी भोग वासना है वो ना समझी से सुख बुद्दी लगती है, हैं कुछ भी नहीं |
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