राम भक्त हनुमान – लालजी महाराज की कथा

हनुमान भक्त लाल जी महाराज के पिता के देवलोक जाने के बाद पिता की सम्पत्ति और चौधरी पटेल जाति में गाँव की परम्परागत मुखियागिरी का पद लाल जी महाराज को मिला। उनके किसी रिश्तेदार ने लाल जी महाराज पर मूठ मारने की मैली विद्या का प्रयोग करवाया ताकि उसे सम्पत्ति भी मिल जाय और मुखिया भी बनने को मिले।

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इससे लाल जी महाराज के शरीर में असह्य पीड़ा शुरु हो गयी। शरीर में मानो आग, आग, आग… भयानक जलन होने लगी। कहते हैं, जिसके लिए मूठ मारी जाती है वह कहीं का नहीं रहता है। कोई हकीम, डॉक्टर अथवा झाड़-फूँक करने वाला उसे ठीक नहीं कर सकता। लेकिन लाल जी महाराज हनुमान के प्रेमी भक्त थे। इसलिए वे हनुमान जी का मंत्रजप करने लगे। थोड़ी देर बाद उन्हें एक नन्हा सा, अत्यंत आकर्षक बालक सामने से आता हुआ दिखा। वास्तव में हनुमान जी ही एक नन्हें-मुन्ने बालक का रूप लेकर उनके पास आये थे। उन्होंने लाल जी महाराज से कहाः “मेरे साथ आओ।”

“निंदा, अपमान, बदनामी की ऐसी तैसी” -प. पू. संत श्री आशारामजी बापू

उन दोनों के स्थूल शरीर तो वहीं रहे, सूक्ष्म शरीर से बालक उड़ता चला गया और लाल जी महाराज को भी साथ लेता गया। वे उड़ते-उड़ते इस पृथ्वीलोक से परे किसी दिव्य वन में जा पहुँचे। नीचे उतरकर बेर के पेड़ के नीचे एक कुटिया में विराजमान ऋषि से उस नन्हें-से बालक के रूप में आये हनुमान जी ने प्रार्थना कीः “यह मेरा भक्त है। इसको ठीक कर दीजिये।”

उन ऋषि ने किसी वनस्पति की पतली डाली से उतारा करके फेंका तो वह डाली जल गयी। फिर उन ऋषि ने लाल जी महाराज जी से कहाः “वत्स ! तुम्हारे इष्ट हनुमान  जी तुम्हारे रक्षक हैं इसीलिए तुम्हारी मृत्यु टल गयी। तुम्हारा मंगल होगा।”

यह भगवद्भजन की महिमा ! बाद में उन्होंने श्री राम जी और माँ गायत्री के भी दर्शन किये थे। लाल जी महाराज ने भगवत्प्राप्ति अर्थ अज्ञातवास व मौन-व्रत का पालन करते हुए नर्मदा किनारे 12-12 वर्ष के दो अनुष्ठान भी किये थे। तत्पश्चात उनके सदगुरु श्री स्वामी माधवतीर्थ जी की प्रेरणा से गुरुमंत्र के 18 करोड़ जप का अनुष्ठान भी किया। इस कलियुग में इतने सच्चे, भजनानंदी संत मिलने मुश्किल हैं।