होली पर्व का संदेश (होलीकोत्सव दिनांक – २३ मार्च २०१६)

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संत श्री आशारामजी बापू के सत्संग-प्रवचन से

होली हुई तब जानिये, संसार जलती आग हो |

सारे विषय फीके लगें, नहीं लेश उनमें राह हो |

हो शांति कैसे प्राप्त निश दिन, एक यह ही ध्यान हो |

संसार दुःख कैसे मिटे, किस भांति से कल्याण हो ||

प्रहलाद इस बात को जानते थे तभी अनेक विघ्न-बाधाओं से जूझते रहने पर भी ईश्वर में उनकी श्रद्धा नहीं डिगी | पर्वतों से उन्हें धकेला गया… सागर में डुबोया गया, हाथियों से कुचलवाने का प्रयत्न किया आया ….और भी न जाने कितने-कितने प्रयास किये गये उनको मरवाने के, किंतु उन्होंने परमेश्वर का स्मरण न छोड़ा | अनेक विघ्न-बाधाओं एवं पीडाओ के बीच भी वे मुस्कराते रहे |

प्रहलाद को गोद में लेकर अग्नि में बैठ गयी होलिका लेकिन वाह स्वयम जल मरी जबकि प्रहलाद का बाल बाँका न हुआ |

नीच वृत्तिवालों के पास यदि आग में न जलने का सामर्थ्य हो तो भी वे जलते रहेते है और प्रहलाद जैसे भक्त उस अग्निपरीक्षा से भी पार हो जाते है |

अनेक कष्टों-मुसीबतों के बीच भी मुस्कराकर जीने की कला जिनके पास है , उनका नाम है प्रहलाद |

होली का उत्सव हमे यही संदेश देता है कि हम भी अपने जीवन में आनेवाली विघ्न-बाधाओं का धैर्यपूर्वक सामना करें एवं कैसी भी बिकट परिस्थितियाँ आये किंतु प्रहलाद की तरह हो ईश्वर में अपनी श्रद्धा को अडिग बनाये रखे |

आज कल इस पवित्र उत्सव में नशा करना, विभत्स गालियाँ देना व रासायनिक रंगो से प्रयोग की कुप्रथाएँ प्रचलित हो गई हैं |

प्यालियाँ ही अगर पीना हो, तो प्रभु की प्यालियाँ पीजिए | होली ही अगर खेलना हो, तो संत सम्मत खेलिए ||

हमारे स्वास्थ्य पर रंगों का अदभुत प्रभाव पड़ता है | जिस प्रकार शरीर को स्वस्थ रखने के लिए विभिन्न तत्त्वों की आवश्यकता होती है , उसी प्रकार रंगो की भी आवश्यकता होती है | होली के अवसर पर प्रयुक्त प्राकृतिक रंग शरीर की रंग संबंधी न्यूनता को पूर्ण करते है , किन्तु सावधान ! यहाँ रंगों का आशय जहरीले या रासायनिक रंगो से नहीं है |

शास्त्रकारों ने पलाश (टेशू या ढाक ) के फूलों के रंग का ही विधान किया है | यदि इस रंग में रंगा हुआ कपड़ा भिगोकर शरीर पर डाल लिया जाय तो वाह रंग शरीर के रोमकूपों द्वारा आंतरिक स्नायुमंडल पर अपना प्रभाव डालता है तथा संक्रामक रोगों से रक्षा करता है |

एतत्पुष्पं कफं पित्तं, कुष्ठं दाहं तृषामपि |
वातं स्वेदं रक्तदोषं, मूत्रकृच्छं च नाशयेत् ||

ढ़ाक के पुष्पों का रंग कफ,पित्त, कुष्ठ, दाह, मूत्रकृच्छ, वायु तथा रक्तदोष का नाश करता है | शीत ऋतू के बाद ग्रीष्म ऋतू का आगमन होता है | ग्रीष्मकाल में सूर्य की किरणें हमारी त्वचा पर सीधी पड़ने के कारण हमारे शरीर में गर्मी बढती है | अधिक ताप के कारण त्वचा के रोग होने की संभावनाएँ बढ़ जाती है |

शरीर में गर्मी बढ़ने से स्वभाव में खिन्नता आ सकती है, गुस्सा बढ़ सकता है | इन मानसिक रोगों से बचाव करने में इन रंगो की महत्वपूर्ण भूमिका है |

होलिकात्सव में प्रयुक्त पलाश के फूलों का प्राकृतिक नारंगी रंग रक्तसंचार की वृद्धि करता है, मांसपेशियों को स्वस्थ रखने के साथ-साथ मानसिक शक्ति व इच्छाशक्ति को बढाता है |

नारंगी रंग की बोतल में सूर्य-किरणों में रखा हुआ पानी खाँसी, बुखार, न्यूमोनिया, श्व्स्नरोग, गैस बनना, ह्रदयरोग, अजीर्ण आदि रोगों में लाभदायक है | इससे रक्त के कणों की कमी की पूर्ति होती है | इसका सेवन माँ के स्तनों में दूध की वृद्धि करता है | ये प्राकृतिक रंग त्वचा की सुरक्षा करते है तथा उष्मीय ताप कम करते है | इससे शरीर की गरमी सहन करने की क्षमता बढ़ जाती है  और सूर्य के तीक्ष्ण किरणों के विकृत प्रभाव से रक्षा होती है |

भारतीय संस्कृति का यह हर्षोल्लास से युक्त त्यौहार मं को प्रसन्न व शरीर को तन्दुरुस्त रखता है | इस पावन पर्व पर जहरीले रासायनिक रंगो से अपने स्वास्थ्य पर कुठाराघात न करें बल्कि उक्त प्राकृतिक रंगो से रंगे – रंगाये |

केमिकल के जहरीले रंगो से अपने आँखों को त्वचा को, मुँह को बचाये व पलाश के पुष्पों के रंग से अपनी त्वचा को थोडा रंगे ताकि शरीर के सप्तधातु व सप्तरंगो का संतुलन सुंदर बना रहे, ग्रीष्म ऋतू की गर्मी झेलने की आपकी क्षमता बढे व बनी रहे | इन दिनों नींद व आलस्य की अधिकता होती है इसलिये ऋषियों ने कूदने-फांदने और हल्ला-गुल्ला करने का यह होलिकात्सव बनाया ताकि सर्दी में एकत्रित नादियों का कफ गर्मी से पिघल जाये और जठरा में आ जाये | आलस्य से नींद बढती है, पाचनतंत्र मंद होता है |

कूदना-फाँदना व कफनाशक चना,धानी आदि का प्रयोग करना हितावह है | बस, पाँच-सात दिन सावधानी रही तो पुरे चार मास के लिये स्वास्थ्य की सुरक्षा | प्रत्येक ऋतू-परिवर्तन में आरम्भ के पाँच-सात दिन संभल जाये तो स्वास्थ्य सुंदर बना रहता है | खाँसी, दमा, सर्दी, कफजनित तमाम बिमारियों की जड़े उखाडकर फेंक दो | इस प्रकार के आहार विहार से और थोड़े- से पलाश (केसुड़े के पुष्प) के रंग से अपने सप्तधातु व सप्तरंगों को संतुलित कर दो |

सुरत आश्रम में उसी रंग से साधको को रंगा जाता है | होली के शिबिर में आनेवाले साधक को नि:शुल्क थोडा रंग घर ले जाने के लिए दिया जायेगा ताकि उनके कुटुम्बी व पड़ोसी भी स्वस्थ और सुखी रहे |

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