ईश्वर की तडफ में अनुष्ठान – (बापूजी की लीला- १८)

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कुछ चाहिये तो गजारी है कम चाहियें तो खुदाई है | कुछ नहीं चाहिए तो शहनशाई है | ऐसा ईश्वर का ज्ञान गुरुने दिया तो साक्षात्कार, नहीं तो अपना मनमाना कल्पना करके बहुत बहुत झकमारी हमने | ये करते, वो करते अनुष्ठान करते | जवानी थी २२ साल की २३ साल के उमर में रात के १२ – १ बजे तक अनुष्ठान की माला पूरी करें | सोये तो पता ही चले वो जनावर तलवे के चाट के फेर रहे थे | चचुंदर मारमार के तलवे की चमड़ी निकाल देते थे तो पता ही नहीं चलता था | ऐसे ऐसे दिनों में ईश्वर के तडफे थे | बाद में पता चला की आरे .. ये तो नर्मदा किनारे क्या क्या किये, केदार गये क्या क्या किये रहे | एक बार ४० दिन कमरे में बंद हो गये थे हम | थोडा दूध लेते थे बस ! जप करें, ध्यान करें, जप करे दूध पीये तो आधा घंटा फिर ध्यान नहीं करना चाहियें | ये ध्यान करते है, शास्त्र पढ़ते है | ३७ वे दिन में क्या क्या आनंद, क्या क्या अनुभव हुये | मौन में रहकर, एकांत में रहकर सात्विक आहार से जब ध्यान करें तो हे आत्म.. ईश्वर तो है ही है, जहाँ बैठे वहाँ पानी है लेकिन कंकड़ –पत्थर हटाओ, कुआ खोदो बोअरिंग करो पानी ही पानी है | ऐसे आत्मीय अंतरात्मा में जाओ तो ईश्वर ही ईश्वर है |
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2 thoughts on “ईश्वर की तडफ में अनुष्ठान – (बापूजी की लीला- १८)

  1. eknath sinha

    जीवत्मा अगर परमात्मा से मिलने के लिए तैयार हो तो परमात्मा का मिलना भी असंभव नहीं। कुछ समय अवश्य लगेगा क्योंकि पुरानी आदतों से लड़ना पड़ता है, ऐहिक संसार के आकर्षणों से सावधानीपूर्वक बचना पड़ता है। तत्पश्चात् तो आपको रिद्धि-सिद्धि की प्राप्ति होगी, मनोकामनाएँ पूर्ण होने लगेगी, वाकसिद्धि होगी, पूर्वाभ्यास होने लगेंगे, अप्राप्य एवं दुर्लभ वस्तुएँ प्राप्य एवं सुलभ होने लगेंगी, धन-सम्पत्ति, सम्मान आदि मिलने लगेंगे।

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