Jagat Ka Anubhav Kisko ? {जगत का अनुभव किसको?}

jagat hai hi nahi
प्रश्न : जगत है ही नहीं इसका अनुभव आत्मा को होता है या अहंकार को होता है ?

पूज्य बापूजी : जगत है ही नहीं इसका अनुभव आत्मा को होता है या अहंकार को होता है ? जगत है ही नहीं ..जैसे स्वप्न दिख रहा है उस समय स्वप्न है ये जगत नहीं है ऐसा नहीं लगता , जब स्वप्ने से उठते हैं तब लगता है कि स्वप्ने का जगत नहीं है , ऐसे ही अपने आत्मदेव में ठीक से जगते हैं तो फिर जगत की सत्यता नहीं दिखती, तो बोले जगत नहीं है जगत नहीं हैं ऐसा बोलने से तो कोई धर्मं चिंता लगा के…

तो उसे समय तो दुःख होगा , लेकिन दुःख होता हैं तो जो जिसको दुःख होता हैं वो भी वास्तव में नहीं हैं सदा नहीं हैं तो जो सदा है उसमे स्थिति कर के समझाने के लिए बोला जाता है कि जगत नहीं है | तो वो एक होती है व्यवहारिक सत्ता दूसरी होती है प्रतिभासिक सत्ता और तीसरी होती है वास्तविक सत्ता जैसे आप हम अभी बैठे हैं ये है व्यवहारिक सत्ता, अब जगत नहीं तो बापूजी क्यों बोलते हो … सत्संग में क्या आ रहे हैं नहीं कैसे है ? तो व्यावहारिक सत्ता में जगत है …. दूसरा प्रतिभासित जैसे स्वप्ने में दिखा तो उस समय तो सच्चा लगा लेकिन आँख खुली तो नहीं और तीसरा है वास्तविक सत्ता इस समय भी वास्तविक सत्ता चैतन्य आत्मा की हैं ! स्वप्ने भी वास्तविक सत्ता चैतन्य आत्मा की हैं और ये दोनों नहीं है फिर भी जो वास्तविक सत्ता है उसमे टिक के बोलो तो जगत है नहीं, न स्वप्ना है न जागृत हैं न गहरी नींद है, तीनो आ आ के चले जाते है फिर भी जो रहता है वो सत्चिदानन्द है, जगत है ही नहीं तो अपनी अपनी नजरिया से वो नहीं है और अपनी अपनी नजरिया से हैं, ठीक है |