कबीरजी की मंत्रदीक्षा

kabirji3कबीरजी की मंत्रदीक्षा 

कबीरजी रामानंद स्वामी के शिष्य होना चाहते थे | उन दिनों में काशी में रामानंद स्वामी अपने राम को सर्वत्र देखनेवाले महापुरुष के रूप में विख्यात थे |

सियाराम माय सब जग जानी |
करहुं प्रणाम जोरि जुग पानि ||

ऐसा ज्ञान उन महापुरुष का था | ऐसे महापुरुष का शिष्य होना बड़े सौभाग्य की बात है | जिसे आत्मा-परमात्मा के एकत्व का ज्ञान है ऐसे सदगुरु की प्राप्ति सहज संभव नहीं है | कबीरजी ऐसे महापुरुष का शिष्य होने का सौभाग्य प्राप्त करना चाहते थे | परंतु उन दिनों जात-पात छूआ -छूत का प्रभाव अधिक था | कबीरजी ने सोचा कि नीरू जुलाहा के यहाँ पला होने के कारण मैं आसानी से तो रामानंदजी के श्रीचरणों तक नहीं पहुँच सकता हूँ | पर दीक्षा तो मुझे इन्ही महापुरुष से लेनी है |

कबीरजी ने युक्ति सोची | जिस घाट पर रामानंद स्वामी प्रात: स्नान के लिए जाते थे, उस घाट पर कबीरजी ने एक रात को घास – फूस की दीवार खड़ी कर दी और आने-जाने के लिए थोडा दरवाजे जैसा स्थान छोड़ दिया | रात में उसी स्थान से सटकर घाट की सीढ़ी पर कबीरजी लेट गये | ब्रम्हमुहूर्त के समय रामानंद स्वामी लकड़े की खडाऊ पहने घाट की सीढियाँ उतरते हुए स्नान के लिए आने लगे | ज्यों ही उन्होंने दरवाजा पार किया, सीढ़ी पर लेटे हुए कबीरजी की छाती पर चरण जा पड़ा और रामानंदजी चौंक कर …, ‘राम ….राम ‘ बोल उठे |

कबीरजी को तो चरण-स्पर्श भी हो गया और राम-नाम की दीक्षा भी मिल गई | कबीरजी जुट गये राम-राम जपने में | मंत्र-जाप से उनकी सुषुप्त शक्तियाँ जागृत हुई और कबीरजी की वाणी माधुर्ययुक्त प्रभावशाली होकर ज्ञान से प्रकाशित हो गई | होनी भी थी क्योंकि सिद्ध पुरुष द्वारा प्रदत्त मंत्र का जप कबीरजी ने लोभ व विकार छोडकर किया था |

कबीरजी की वाणी सुनकर कई लोग आकर्षित हुये | एक दिन काशी के पंडितों ने उन्हें घेर ही लिया की : “तू निगुरा है | उपदेश करने लायक नहीं है, फिर सत्संग क्यों करता है ? हमारे पास कोई नहीं आता और तेरे पास भीड़ बनी रहती है | हमने चार-चार वेद रटे, ४८ वर्ष हो गये रटते -रटते, कौन-सा मंत्र, मंडल, ब्राम्हण व ऋषि का उल्लेख किस पेज पर है तथा कौन-सी ऋचा कहाँ की है यह सब हम बता सकते है, लेकिन हमारे पास कोई श्रोता बैठता ही नहीं है | हमारी तो यह हालत हो रही है की ग्यारह आदमी बोलनेवाले और बारह श्रोता होते है | तू सफ़द कपड़ोवाला, ताना-बुनी करनेवाला, बेटा-बेटीवाला गृहस्थ आदमी और तेरे पास इतने लोग सत्संग सुनने आते है | तू निगुरा आदमी ! कथा बंद कर ताकि हमारी ग्राहकी चले |”

कबीरजी कहते है : “मैं निगुरा नहीं, सगुरा हूँ | मेरे गुरुदेव है | गुरुदेव की कृपा बिना ज्ञान भला कैसे मिल सकता है ?”

पंडितों ने पूछा : “कौन है तेरे गुरु ?”

“प्रात: स्मरणीय पूज्यपाद रामानंद भगवान मेरे गुरुदेव है |”

“झूठ बोलते हो ! रामानंद स्वामी तो वैष्णव संप्रदाय के संत है और तेरा तो पता भी नहीं कि तू हिन्दू की औलाद है कि मुसलमान की | तू जुलाहे को कहीं से मिला था | फिर रामानंद स्वामी तुझे कैसे दीक्षा दे सकते है ?”

कबीर :”कैसे भी हो, मैं तो उनसे दीक्षा प्राप्त कर चूका हूँ और वे ही मेरे गुरुदेव है |”

पंडित लोग ‘ऐसा नहीं हो सकता’ कहकर रामानंद स्वामी के पास पहुँचे और कहने लगे : ‘गुरु महाराज ! आपने तो धर्म का नाश कर दिया | एक यवन को, कबीर जैसे फालतू आदमी को मंत्रदीक्षा दे आये !’

रामानन्दजी को तो पता भी नहीं था | वह तो अकस्मात घटना घट गई थी | रामानन्दजी बोले : “भाई ! कौन कबीर और कैसी दीक्षा ? मैंने तो उसे दीक्षा नहीं दी ?”
अब तो पुरे काशी नगर में ढिंढोरा पिट गया कि गुरु सच्चा कि चेला सच्चा ?

रामानन्दजी ने कहा : “बुलाओ कबीर को | मेरे सामने लाओ |”

तिथि तय हुई | न्यायालय में जैसी व्यवस्था होती है, उसी प्रकार एक कटघरा रखा गया, एक ऊँचा सिंहासन बनाया गया | काशी के मर्धुन्य विद्वान पंडित तथा तमाशाबीन लोग वहाँ एकत्रित हुए | न जाने कितनी आँखे यह देखने को उत्सुक थी कि गुरु सच्चा है या चेला |

कबीरजी को कठघरे में खड़ा कर दिया गया | मर्धुन्य पंडितों ने कहा : “यह जलील आदमी, जो मुसलमान है कि कौन है यह भी पता नहीं | इसका कहना है कि मेरे गुरु रामानंद स्वामी है और रामानन्दजी कहते है कि मैंने इसे दीक्षा दी ही नहीं है | अब गुरु शिष्य आपस में ही अपने सत्य की व्याख्या करें |”

कबीरजी से पूछा गया : “तुम्हारे गुरु कौन है ?”

कबीरजी ने कहा : “सामने जो सिंहासन पर विराजमान हैं, प्रात:स्मरणीय पूज्यपाद रामानंद भगवान, ये ही मेरे गुरुदेव हैं |

रामानंदजी पूछते हैं : “क्यों रे ! मैंने तुझे दीक्षा दी है ?”
कबीर : “जी हाँ, गुरुदेव ! “

रामानंदजी कुछ रुष्ट होकर बोले : “अच्छा ! इधर तो आ तनिक |”

मैंने सुना है कि कबीरजी नजदीक आये तो रामानंदजी ने खडाऊ उठाकर उनके सर पर तीन बार मृदुस्पर्श करा दी और कहने लगे : “राम …राम…..राम… मुझे झूठा बनाता है ? कब दी मैंने तुझे दीक्षा ? राम…राम… राम…” (रामानंदी संतों का स्वभाव होता है बात – बात में राम-राम कहने का |)

कबीरजी रामानंदजी के चरणों में बैठ गए और बोले : “गुरुदेव ! अनजाने में गंगा किनारे की दीक्षा कच्ची थी, अब यह तो पक्की ? अब तो हाथ से सर पर खडाऊ पड़ रही है और राम…राम… वचन भी मिल रहा है | वह दीक्षा कच्ची थी अब यह तो पक्की हुई ?”

रामानंदजी बड़े प्रसन्न हुए | उन्होंने कहा : “पंडितों ! तुम मुझे चाहे कैसा भी मानों लेकिन कबीर मेरा ही शिष्य है और मैं ही उसका गुरु हूँ | तुम चाहे मेरे पास आओ, चाहे न आओ |”

सुपात्र मिला तो कुपात्र को दान दिया न दिया |
सुशिष्य मिला तो कुशिष्य को ज्ञान दिया न दिया |
सूरज उदय हुआ तो और दिया किया न किया ||
कहे कवि गंग सुन शाह अकबर !
पूर्ण गुरु मिला तो और को नमस्कार किया न किया ||

“अब मेरा और कबीर का पक्का नाता हो गया है |” कबीरजी पंडितों की ओर देखकर मुस्कुराये | मार खाकर भी सिद्ध पुरुषों की मंत्र-दीक्षा मिले तब भी बेडा पार हो जाए ऐसा मैंने सुना है | कबीरजी की यह कथा कहीं-कहीं पाठ भेद से भी आती है किंतु दोनों कथाओं का सारांश सम रहता है |