वासना

इच्छा

वासना

 

वासना” या “विवेक” – निर्णय आपका ?

 

ॐ मानें अंतरात्मा, अनंत ब्रह्मांड में व्याप्त सभी का हितैषी परमेश्वर, सबका जहां से ‘मैं’ ‘मैं’ स्फुरित होता है, उस अंतरात्मा प्रभू का नाम ॐ है। यह भगवान विष्णु ने नही बनाया, भगवान ब्रह्मा ने नही बनाया, शिवजी ने नही बनाया, सृष्टी ब्रह्माजी ने बनाई उसके पहले से ही था। एक होता है निर्माण, दूसरा होता है खोज, निर्माण उसका होता है जो पहले नही है और खोज उसकी होती है जो पहले था। भगवान नारायणजी ने ब्रह्माजी का निर्माण किया, लेकिन ॐ कार मन्त्र पहले से ही था, भगवान नारायण ने ॐ कार मन्त्र की खोज की। जो मन्त्र की शक्तिया और मन्त्र का मूल खोजता है, उसको ऋषि बोलते हैं। ऋषि तू मन्त्र दृष्टार : । इसलिए ॐ कार मन्त्र के ऋषि भगवान नारायण माने जाते हैं। जब भी मन्त्र-जाप करते हैं तो प्रतिज्ञा करनी पड़ती है कि हम ये मन्त्र जपेंगे और इस मन्त्र की छंद ये है, उनके ऋषि ये हैं, और इस मन्त्र को जपने का हमारा उद्देश्य ये है। मन्त्र जपने के पहले ये संकल्प होता है, जैसे अथ गायत्री मन्त्र, विश्वामित्र ऋषि, सूर्यदेवता, गायत्री छंद, मुक्ति-प्राप्त्यर्थे, सत्मती प्राप्त्यार्थे, आरोग्य-प्राप्त्यार्थे, पुत्र-प्राप्त्यार्थे अर्थात जिसको जो चाहिये, उसका संकल्प उसको करना होता है। ये गायत्री मन्त्र के लिए है| ऐसे ही ॐ कार मन्त्र का….अथ ॐ कार मन्त्र, गायत्री छंद, जो भी भगवान-विषयक मन्त्र होता है उसकी छंद गायत्री बन जाती है, इसलिए ॐ कार मन्त्र  की छंद भी गायत्री और गायत्री मन्त्र की छंद भी गायत्री है, ॐ कार मन्त्र के ऋषि हैं भगवान नारायण और गायत्री मन्त्र की खोज की है विश्वामित्र ने, तो ऋषि हो गए विश्वामित्र…ऐसे ही ॐ नमो शिवाय: मन्त्र, शिवजी देवता, गायत्री छंद, वशिष्ठ ऋषि –इसी प्रकार मन्त्र का छंद ,मन्त्र का देवता, मन्त्र के ऋषि अलग अलग होते हैं। भगवद-परक जो भी मन्त्र होता है उसकी छंद गायत्री होती है।

 

ॐ कार मन्त्र में बहुत सारी शक्तीयां हैं। बोधायन ऋषि ने ॐ कार मन्त्र की महिमा पर एक ग्रन्थ लिखा, उसके आधार पर एक संत ने २२००० श्लोक रच दिए। विदेश में एक व्यक्ति डाक्टर जे० मार्गन हो गए, वो लिखता है “Indian omkar mantra is very powerful. It solves liver problem, mental problem and other problems” लेकिन उसकी ये खोज बहुत छोटी है। लीवर और दिमागी समस्याओं को दूर करता है, ये तो एक श्लोक में आ गया, २२००० श्लोक हैं। ॐ कार मन्त्र की १२० माला जप करे ५० दिन में, सात जन्मों की दरिद्रता चली जायेगी, सात पीढीयों में कंगालियत नहीं आयेगी। ॐ कार मन्त्र की १२० माला एक साल तक करने से जैसा भी जिस रूप में भगवान चाहे, प्रकट हो जायेंगे – कृष्ण वाले को कृष्ण, राम वाले को राम, शिव वाले को शिव, गणपति वाले को गणपति, जिस भी भगवान को मानते हैं, वैसे ही रूप में… लेकिन वो भगवान जिसमे से प्रकट होते हैं, उसका मूल है अंतरात्मा ॐ कार… अगर मनपसंद भगवान नही, जैसा भगवान है, वैसा भगवान चाहते हो तो फिर अंतर-प्रेरणा होगी कि सत्संग में जाओ। वह भगवान तुम्हारा अपना अंतरात्मा है। जैसा भगवान चाहोगे, वैसा भगवान प्रकट हो जायेगा, फिर उसी में लीन हो जाओ। जिसमे से प्रकट होता है वो है वासुदेव… वासुदेव माने जो सब में बसा है। मुसलमान सपना देखेगा देखेगा कि हज करने जा रहा हूँ और हिन्दू सपना देखेगा तो देखेगा कि मैं तीर्थ में जा रहा हूँ, ईसाई सपना देखेगा तो देखेगा कि जीसस क्रोस पर चढ़ गए, ऐसा हो गया, ऐसा हो गया.. जैसी जैसी कल्पना होगी। अपनी कल्पना का भगवान देखना, अपनी कल्पना का स्वप्न देखना अलग बात है, लेकिन कल्पना हो हो के मिट जाती है, फिर भी जो नही मिटता वो एक सनातन सत्य है।

बचपन की कई कल्पनाये थी, कई मान्यताये थी, कई खिलौनें अच्छे लगते थे, कई खिलौने प्यारे लगते थे, कई खिलौने फिर छोड़ दिए… वो सब मिट गया लेकिन उसको जानने वाला मिटा क्या ? वो है वास्तविक आत्मदेव भगवान, चैतन्य भगवान। भगवान… भ’ जिससे भरण-पोषण होता है, ग’ – गमनागमन अर्थात जिससे आना जाना होता है, व’ जिससे वाणी उत्पन्न होती है और न’ जो कभी साथ नही छोड़ता, वो वास्तविक भगवान है। शरीर मर जाता है फिर भी जो साथ नही छोड़ता वो वास्तविक भगवान तुम्हारा अपना अंतरात्मा है। उसी का नाम है ॐ कार…. बच्चा पैदा होता है तो उआं…. उआं…. उआं…. उआं…. उआं…. कुत्ते के छोटे बच्चे होते हैं तो ऊंह …… ऊंह…. ऊंह….. ऊंह…. ऊंह….. ये चैतन्य भगवान की बोली है, इसलिए कोई भी मन्त्र हो, शैव मन्त्र हो तो ॐ नमः शिवाय:, वैष्णव मन्त्र हो तो ॐ नमः भगवते वासुदेवाय: अथवा हरि ॐ, गायत्री मन्त्र हो तो ॐ भू: भूर्भुव: स्व:.. इस्लामी मन्त्र है तो अल्लाह हो…ओ…ओ…ओ अर्थात ॐ कार आ गया, सिख धर्म का हो तो इक ॐ कार…., बच्चा जब पैदा हुआ कही भी तो उआं….उआं….उआं .., ऐसा नही है कि बंगलादेश में पैदा हुआ तो अलग टोन में बोलो, हैदराबाद में पैदा हुआ तो अलग टोन करो सभी बच्चों का एक ही टोन होता है चाहे अमेरिका में पैदा हो, चाहे किसी मजहब, किसी देश, किसी समय में, किसी सम्प्रदाय में पैदा हो। सभी बच्चे पैदा होते ही उआं उआं ही बोलते हैं और तो और बूढ़े हो गए, डाक्टर इलाज करता है, आराम नही मिल रहा तो ऊंह….ऊंह…ऊंह… हर कोई बोलता है क्योंकि इससे आराम महसूस होता है, इससे चेतना आती है, चाहे वह बीमार व्यक्ति अमेरिका का हो, चाहे पाकिस्तान का, चाहे हैदराबाद का हो, चाहे नूर मोहम्मद का हो, सबकी गहराई में वही एक चैतन्य ज्यों का त्यों है।

अगर यह ॐ कार मन्त्र गुरुदीक्षा के द्वारा मिल जाता है, तो उसमे बहुत शक्ति, बहुत चेतना आ जाती है, और यह अपने आत्मा-परमात्मा का साक्षात्कार करा देता है। स्वामी रामतीर्थ ॐ कार मन्त्र जपते थे। एक बार हिमालय के जंगल में सात रीछ उनके सामने आ गए। रामतीर्थ ने जोर से उच्चारण किया, ‘ॐ….ॐ …ॐ…ॐ….ॐ..’…….. सारे रीछ डर कर भाग गये। रीछ तो एक ही बहुत शक्तिशाली होता है और वह तो सात थे फिर भी भाग खड़े हुये।

आबू की गुफा में जब हम रहते थे तो लोगो ने बताया कि यहाँ रीछ रहता है और कईयों को झपट कर मार चुका है। मैं वहां रहता था और जब भी रीछ की आवाज आती तो मैं दरवाजा बंद कर देता था फिर देखा कि इस तरह भय से तो काम नही चलेगा, दरवाजा खुला रखना शुरू कर दिया। ऐसा करते करते ॐ कार का मन्त्र जाप शुरू किया और जप करते करते करते, जिधर वो गया था उधर ही गया मैं, तो उसने मुझे कुछ भी नही कहा। एक बार सुबह के तीन-चार बजे थे, रीछ बोलता हुआ जा रहा था तो मैं भी उधर गया पर उसने कुछ नही कहा, सांप भी कुछ नही कहता था। एक बार ब्रह्मपुरी में जहाँ अपनी कुटिया आश्रम है, वहा मैं घूमने जाता रहता हूँ, झाड़ी में से उसने मुझे देखा, मैंने नही देखा था, बड़ा टाइगर था और भूखा, इतना बड़ा कि मुझे खा जाए तो उसका नाश्ता तो हो जाये, पूरा पेट फिर भी न भरे। मेरे पास कोई हथियार भी नहीं था, उसने तो मेरे को देखा लेकिन मैं तो उसका रास्ता पार कर के चला गया तो वो मेरे को दीखा। भगवान कैसी प्रेरणा देता है टाइगर को कि बापू को नहीं…. भूखा है तो आगे जा, इधर नही। वो चाहता तो बड़े आराम से मुझे… मेरे पास तो उसे मारने के लिए कोई पत्थर तक भी नही था, लेकिन सभी का नियामक भगवान है, सबको नियंत्रण करने वाला वो आत्मदेव है। उसके इस नियंत्रण में भी विभाग होते हैं।

वासना” या “विवेक” —- निर्णय आपका

एक होता है विवेक, दूसरी होती है इच्छा या वासना, तीसरी होती है आवश्यकता| जैसे आवश्यकता है-भूख लगी है, तो रोटी सब्जी खा लिया, लेकिन वासना है कि ऐसी रोटी, ऐसी सब्जी, ऐसी चटनी…ये है वासना, इच्छा । लेकिन विवेक है कि भूख लगी है पर आज एकादशी है, एकादशी को अन्न नही खाना चाहिये, अन्न खाना और खिलाना पाप है।

नामदेव के यहाँ फकीर आये और बोले कि हमको भोजन करना है, तो वह बोले कि माफ़ करना, आज एकादशी है, हमारे यहाँ उपवास है हम अन्न खाते नही और खिलाते भी नही, पाप लगता है और एकादशी के दिन चावल खाना तो पाप भी लगता है और बीमारी भी लगती है तो यह विवेक है। अगर अंदर इच्छा है कि मेरे को तो चावल का टेस्ट मिले, इडली खाते हैं… इडली तो चावल को भी विकृत करके बनता है। पेट में गड़बड़ होती है। चावल खाना, इडली खाना, डोसा खाना, कॉफी, चाय तबीयत के लिए अच्छा नही है, तो एक तरफ तो विवेक कहता है कि ये खाने से पेट खराब होता है और दूसरी तरफ है वासना कि खाना चाहिये।

एक तरफ वासना है और एक तरफ विवेक है। वासना जोर मारती है तो विवेक को दबा कर खाना खाते हैं और अगर विवेक है तो वासना को दबा कर संयम में रहते हैं। भगवान दोनों को सत्ता देते हैं। वासना है, तो ऐसा विचार भी देंगे कि ऐसा बनाओ, ऐसा खाओ और विवेक है तो उसको भी कि नही, ऐसा नही करना चाहिये, उसको भी सत्ता देंगे। जैसे लाईट है न, गीजर को भी पावर देता है कि पानी गरम करना है तो ये लो, और फ्रिज को भी पावर देगा कि पानी ठंडा करना है, यह लो। ऐसे ही भगवान भी सबको सत्ता देते हैं कि लो, जैसा तुमको करना है करो, फिर जैसा फल आएगा उसे भुगतना। चोर जब चोरी करता है तो प्लानिंग बनाता है, उसकी बुद्धि में भी कनेक्शन तो भगवान का ही है। साधक जब साधना करता है तो उसकी बुद्धि को भी प्रेरणा तो भगवान से ही मिलती है। पकड़ने वाले को भी आईडिया भी वही देता है और चोर को भी प्रेरणा वही देता है। भयभीत होने वाले को भय भी वही देता है, भयभीत करने वाले को चाहे वह टाइगर हो, शेर हो, में भी वही है और हिरण जो डरता है उसमे भी वही है। डराने की शक्ती भी वही है – भयकृतम भयनाश्म” भयभीत करने में भी और भय का नाश करने में भी शक्ति उसी की है।

“तुम कल दारू पी रहे थे न ? ऐ लड़के…एयरपोर्ट पर तू कल दारू पी रहा था न, चल खड़ा हो जा, तू दारू पी के कपडे फैक के डांस कर रहा था, तू ही था न…. अरे! हमने तुम्हे देखा था वहां, तू ही था ?”

बोला, “नही था…”

“अरे…दारू पी के डांस कर रहा था ५.३० बजे, जब फ्लाईट से उतरे हम”

“हम नहीं थे”

“अरे.. हमने देखा”

“बाबा, कोई दूसरा होगा”

वह भयभीत नहीं होता तो निर्भयता भी वही देता है। अगर पीया होता तो भय भी वही देता है। गलत काम करते हैं तो भय भी वही देता है और अगर झूठा आरोप है तो बल भी वही देता है।

“अब तुम डर गए क्या कि मेरी बात खुल गयी? नही न…”

अरे नही, पीया ही नही इसने तो…. हम तो केवल दृष्टांत देने के लिए ऐसा बोल रहे थे।

एक लड़के का विवाह होने वाला था। दाढ़ी-वाढी सब करके स्नान करना था तो लोटा ले के वह शौच के लिए चला गया। उस जमाने में फ्लश सिस्टम नही था, धूप का समय था, बेर के पेड़ के नीचे बैठ गया। एक दो बेर गिरे हुये थे उठा के खा लिए। एक तरफ तो पेट का गोदाम खाली हो रहा है और दूसरी तरफ वो गोदाम भर रहा है। उधर उसके लिए तो नाचने वाली नाच गा रही थी, वह लड़का वहां जब आया तो वह नर्तकी समझ गयी कि यह दूल्हा है। उसको तो पता ही नही था कि बेर क्या होता है पर….उसने गाना शुरू किया, “बलमा की बात मैं तो जान गई रे….जान गई रे…पहचान गई रे…..जान गई रे….२” वह घबरा गया और उसे चुप कराने के लिए झट से अंगूठी निकाल के दे दी। नर्तकी को लगा कि मेरी एक लाइन सुनकर ही इसे कितनी पसंद आ गई इसलिए झट से फिर से उसने गाना शुरू किया, “बलमा की बात मैं तो जान गई रे….जान गई रे…पहचान गई रे…..जान गई रे…मैं तो कह दूंगी रे” अब उसने सोचा कि लगता है कि इसने सब देख लिया था अगर इसने सबको बता दिया तो मेरी तो शादी टूट जायेगी इसलिए उसने फ़ौरन अपनी चेन भी उतार कर उसे दे दी, ये देखकर वह तो और भी जोर जोर से गाने लगी, “मैं तो कह दूंगी रे, मैं तो कह दूंगी रे बलमा की बात… मैं जान गई रे, मैं तो पहचान गई रे” अब वह घबरा गया और कुछ देने को उसके पास नही था इसलिए खड़ा हो गया और बोला, “ कहना है तो कह दे, केवल तीन बेर ही तो खाए थे और इतना कुछ दिया, फिर भी बोलती है कह दूंगी, कहना है तो जा कह दे सब को, केवल तीन बेर ही तो खाए कोई चोरी किया है क्या? भूख लगी थी, उधर से पेट खाली हो रहा था तो थोडा खा लिया…” बलमा की तो बलमा ही जाने, पर उसको भयभीत करने वाला भी तो वही है। उसने सोचा था कि किसी को पता नही चलेगा पर उसको क्या पता था कि आशारामजी बापू तक भी बात पंहुच जायेगी…सब लोग जान गए, तो कितना भी छिपाओ पर उस छुपे हुये को खोलने वाला भी वही है। चोर हैं, आतंकवादी है कितना छिपाते है लेकिन सच निकलवाने वाले निकलवा लेते हैं। भय देने वाला और भय को नाश करने वाला, विवेक देने वाला और विवेक को पुष्ट करने वाला और वासना के अनुसार फल देने वाला भी वही है, आगे जैसे तुम्हारी मर्जी…। जैसा विचार है ऐसा करने लग गए तो धीरे धीरे देखने का स्वाद आ गया, ये अच्छा है, ये अच्छा है…मर जायेगा तो पतंगे की योनी में जायेगा, देखता रह कि प्रकाश कितना अच्छा है। कई पतंगे दीये की लौ में जल जल कर मरते हैं फिर भी विवेक नही होता, क्योंकि वासना का प्रभाव होता है। अगर इच्छा को महत्व दिया, वासना को महत्त्व दिया तो बुद्धी कमजोर हो जायेगी और अगर विवेक को महत्व दिया तो बुद्धि बलवान होती है।

सत्संग से विवेक बढ़ता है और मनमाने खान-पान से वासना बढ़ती है। मनमाना सम्भोग करने से वासना बढ़ती है, अत: संयम से… जैसे रात को एक से तीन के बीच जागना ठीक नही है बहुत नुक्सान होता है पति पत्नी के सम्बन्ध के लिए भी एक से तीन के समय में नही जागना चाहिये क्योंकि इस समय लीवर, नेत्र ज्योति और दिमाग का पोषण होता है। और इस समय एक से तीन के समय पति-पत्नी के सम्भोग संबध के लिए अगर जागते है तो बहुत अधिक नुक्सान होता है। अनिद्रा रोग लगता है, स्वभाव चिडचिडा हो जाता है, यादशक्ति कमजोर हो जाती है और रोगप्रतिकारक शक्ति कमजोर हो जाती है। ट्रक ड्राइवरों को देखो, उनके मालिक लोग आर० टी० ओ० को टेक्स भरते हैं, टोल-टैक्स भरते हैं फिर भी दो चार खाकी वर्दी वाले दर्जनों क्या सैंकड़ो ट्रकों को रोकते हैं, उनके डांटते है कि ऐसे नहीं.. ऐसे नही …और खूब पैसा लूटते हैं। हिंदुस्तान में हजारों नही लाखों ड्राइवरों को शोषित किया जाता है। किसी भी ड्राइवर के पास अपना बढ़िया मकान नहीं होगा, मंहगा फ्लैट नही होगा, है क्या? अपनी कार, अपना फ्लैट किसी ट्रक ड्राइवर के पास है क्या? क्योकि रात को दस बजे से तीन बजे तक निद्रा करने से प्रतिक्रिया शक्ति रहती है, आयुष्य अच्छा राहत है, ९ से ११ के बीच थकान मिटती है, ११ से एक के बीच शरीर में नए कण बनते हैं, नई कोशिकाओं का जन्म होता है और १ से ३ के बीच लीवर, दिमाग, नेत्र-ज्योति, बुद्धि-शक्ति, रोग प्रतिकारक शक्ति विकसित होती है। आजकल काल सेंटर में काम करने वाले युवक युवतीयां बेचारे रात को जागते हैं, बेचारे कुछ भी नही कर सकते। मैं तो कहूँगा कि अगर आप को दिन में काम करने के १०००० रूपये मिलते है, और काल सेंटर में जॉब करने से २५००० रूपये मिलते हैं क्योंकि अमेरिका वाले तो जागते है दिन में और उस समय हमारी रात होती है। जॉब तो मिली लेकिन वो बेचारे कुछ कर नही सकते, युवा धन और और युवती-धन का ह्रास हो रहा है, वे तनाव में आ रहे हैं। तो ये ज्ञान भी भगवान देता है लेकिन क्या करें, मजबूरी है और ये इच्छा वासना भी… इसलिए जितना हो सके, विवेक से काम लें, इच्छाओं को सीमित करो और ज्ञान को बढाओ तो बुद्धि बढ़ेगी, बल बढेगा।

ज्ञान बढाने के लिए सत्संग, विवेक, जप और परोपकार का आश्रय लो और भगवान को अपना मानो, अपने को भगवान का मानो। “मैं तो भगवान का हूँ और भगवान मेरे” तो इससे भगवद-शान्ति मिलेगी, भगवद-सामर्थ्य बढेगा और अगर इच्छा बढ़ गयी तो धीरे धीरे पतन हो जायेगा। भगवद-ज्ञान, भगवद-शान्ति और भगवद-सामर्थ्य बढ़ने से दुनिया की चीजें स्वयमेव खींच कर इधर आयेंगी और अगर इच्छा बढी तो आप इनके पीछे-पीछे भागते फिरोगे। जो लोग सत्संग में जाते है तो उनको शुरू में तो लगता है कि समय बर्बाद हुआ लेकिन वास्तव में हजार गुणा समय उससे सफल होता है। सत्संग में जाते हैं, जप-ध्यान करते हैं, दीक्षा लेते हैं तो उनका विवेक जगता है, समझ जगती है, आत्मा की मन की शुद्धि होती है, बुद्धि बलवान होती है।

पांच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं – आँख देखती है, अच्छा देखने के लिए आँख खींचती है, नाक सूंघता है, परफ्यूम चाहिये, सुगंध चाहिये, जीभ स्वाद के लिए ले जाती है, कान वाह-वाही के लिए और मूत्रेन्द्रीय सम्भोग के लिए गिराती है लेकिन विवेक करें कि पत्नी नहीं है और है तो मासिक से है या आज एकादशी है अथवा तो चातुर्मास है, इसलिए नही। विवेक को बल देंगे तो पत्नी की तबीयत भी अच्छी रहेगी और अपनी भी तबीयत अच्छी रहेगी। और अगर ‘अरे…चातुर्मास है तो क्या है, हम कोई बापूजी थोड़े ही हैं” तो फिर शक्तिहीनता आयेगी और जब शक्ति नही है तो “अरे जॉब नही मिलता”…….”घर में बरकत नही है”….अरे, आत्मा की शक्ति नही है, खाली कर दी शक्ति -भगवान भी उन्ही की सहायता करता है जो अपनी सहायता स्वयं करते हैं। कुछ भी असंभव नही है, सब संभव है।

नेपोलियन बोनापार्ट किसी जगह पर रहता था| सैलून वाले के घर लौजिंग बोर्डिंग देता था। सैलून वाले की जो पत्नी थी वो स्मार्ट थी और नेपोलियन सुंदर था। वह उसके सामने नखरे करती लेकिन वह उधर देखता ही नही था। पढ़ के नेपोलियन सेनापति हो गया, वह फिर उसी अक्लोनी गाँव में फिर से गया। वह अब सेनापति था, खाकी वर्दी थी, काला चश्मा था, उसने उस औरत से पूछा, “तुम्हारे घर में कोई नेपोलियन रहता था ?”

बोली, “ हाँ… हाँ..”, वह उसे पहचान ही नही पायी।

“उसका स्वभाव कैसा था?”

“उसके पास दिल नाम की कोई चीज नही थी, मैं उसे बहुत प्यार करती थी लेकिन वह मेरी ओर देखता ही नही था”

नेपोलियन ने अपना चश्मा उतारा, और कहा, “अगर मैं तुम्हारी ओर देखता तो नाई होता, तेरी ओर नही देखा और संयम से रहा तो आज मैं सेनापति हूँ और इस देश का राजा हूँ। अरे! दिल क्या केवल सैक्स के लिए है? तुम मेरी जिन्दगी ख़त्म करने वाली थी पर मैं संयम से रहा तो देखो कहाँ से कहाँ पहुँच गया” यह सुन कर उस औरत की जुबान बंद हो गयी।

विवेक का आदर करके इच्छा, वासना को नियंत्रण में रखा जाये तो ऊपर उठा जा सकता है और यदि जैसा मन में आया वैसा कर लिया, वैसा खा लिया तो धीरे धीरे पतन हो जाता है। भगवान के गुरु वशिष्ठजी बोलते हैं कि हे रामजी, ये जो केंचुयें हैं, सांप हैं या जो भी पेट के बल से धरती पर रेंगने वाले जीव हैं, ये भी कभी मनुष्य थे लेकिन जैसा मन में आया वैसा खा लिया, जैसा मन में आया कर लिया, भगवान को नही मानना, मन्त्र-जाप नही करना, कोई नियम नही  करना… धीरे धीरे इनकी वासना बढ़ती गयी, मन तुच्छ हो गया, बुद्धि तुच्छ हो गयी, जीवन तुच्छ हो गया और जो अभी इंद्र होकर पूजे जाते हैं, ३३ करोड़ देवता जिनका आदर करते हैं वो भी मनुष्य थे, लेकिन संयमी रहे, गुरुमंत्र का जाप किया, साधना की, यज्ञ याज्ञ किया, इंद्र बनने के संकल्प से जिए तो इंद्र बन गए और जो इंद्र से भी ऊपर, आत्म-साक्षात्कारी गुरु बनने का संकल्प करते हैं और आत्म-वेता बन जाते हैं तो भगवान भी उनके शिष्य बन जाते हैं।

किसी ने ब्रह्मज्ञानी गुरु के बारे में बोल दिया कि हमारे गुरु तो भगवान हैं तो दूसरे ने कहा, “ऐसा तुम इसलिए बोलते हो कि तुम उनका आदर करते हो, अरे.., भगवान भी जिसका चेला बन सकता है, ऐसे ये वो आत्म-वेता गुरु हैं” भगवान के भी गुरु होते हैं। गुरु वशिष्ठ को भगवान बोलना- अरे! भगवान तो उनका शिष्य है। संदीपनी गुरु को भगवान बोलना, लीलाशाह गुरु को भगवान बोलना- अरे! भगवान तो उनके चेले बनते हैं, ऐसे महान होते हैं वो। अनुष्ठान किया, थोडा दूध लिया, ध्यान-भजन किया, स्वांस अंदर गया तो ॐ बाहर आया तो एक, श्वांस अंदर गया तो आनंद बाहर गया तो ॐ… इस प्रकार शान्ति पाया फिर गुरु का उपदेश सुना तो पता चला कि भगवान और जीव में क्या फर्क है। जीने की इच्छा, वासना है तो जीव हो गया और ये वासना मिटा कर अपने भगवद स्वभाव में टिका तो भगवान हो गया। भगवान अर्थात जो भगवद स्वरूप है, चैतन्य स्वरूप है।

सत्संग से बहुत फायदा होता है, लाख लाख तीर्थ कर लो.. उसका भी महत्व है, तीर्थ करने जाना चाहिये लेकिन अगर सत्संग मिला तो उसके लाखों तीर्थ एक साथ हो जाते हैं, लाखों यज्ञ हो जाते हैं, लाखों रूपये का दान हो जाता है, सत्संग का इतना भारी महत्व है। स्नातं तेन सर्वतीर्थम – उसने सारे तीर्थों में स्नान कर लिया, दानम तेन सर्वदानम– उसने सब कुछ दान कर दिया, कृतं तेन सर्वयज्ञं– उसने सारे यज्ञ कर लिए, येन क्षणम मन: ब्रह्म विचारे स्थिरं| बड़ा गुरु मिल गया तब ब्रह्मज्ञान के विचार में जिस ने मन लगाया, तो उसके लाखों तीर्थ हो गये, लाखों यज्ञ हो गये लाखों स्नान हो गये, लाखों की उसके हाथों सद्गति हो गयी, सत्संग ऐसी बड़ी चीज है।

एक घड़ी आधी घड़ी, आधी में पुनि आध ।

                       तुलसी संगति साधू की हरे कोटि अपराध ।।   

सत्संग से करोडो पाप-ताप नष्ट हो जाते हैं। एक शराबी था और वो सत्संग के प्रभाव से राजा बलि बन गया। कहाँ तो एक शराबी और कहाँ एक महापुरुष राजा बलि हो गया| अभी भी कोई अच्छा काम करता है तो बोलते हैं कि इसने बड़ा बलिदान दिया है या देश के लिए इस सैनिक ने बलिदान दिया या पति की सेवा के लिए इस युवती ने अपने गहने-गांठो का बलिदान दिया तो इसमें भी बलि का नाम आता है।

एक शराबी था, वह अपना जन्मदिन मनाने के लिए किसी वेश्या के पास जा रहा था। रास्ते में एक संत रहते थे| उनकी कुटीया तो दूर थी पर रास्ते में कील कांटे किसी को चुभे नहीं इसलिए मिटटी में पत्थर दबा कर रास्ता बनाया हुआ था, तो वह शराबी उन पथरों से टकरा कर गिर पड़ा और मूर्छित हो गया। लगभग सवा महूर्त वह मूर्छा में रहा बाद में उसको लगा कि आज मैं अपने जन्मदिवस पर ऐसा कर्म करने जा रहा था, बहुत गलती की। वह वेश्या के पास चांदी की थाली में ड्राई फ्रूट ले जा रहा था, वह उसने दान कर दी।

कुछ समय के बाद वह जब मरा तो यमराज ने कहा, “और तो तुम्हारा कोई पुण्य नही है, पर संत जहाँ पर रहते थे, संत के चरण जहाँ पड़े थे, उस जगह पर सवा मुहूर्त तक तुम पड़े रहे थे और तुम्हारे हाथ में जो कुछ था, उसे तुमने दान कर दिया इसके लिए तुम्हे ऐश्वर्य मिलेगा और जितनी देर तुम संत के चरणों में रहे उतनी देर तुम्हे इंद्र के पद पर बिठाया जायेगा। तो तुम्हे पहले इंद्र बनना है या हजार वर्ष की नीच योनी भोगकर फिर इंद्र बनायें, जैसी तुम्हारी मर्जी ?”

बोला, “हजार साल नरक भोगूं फिर सवा मुहूर्त के लिए इंद्र बन जाऊं, तो हजार साल के बाद सवा मुहूर्त का क्या फायदा। मैं पहले इंद्र बनूँगा”, तो वह इंद्र बन गया, अब उसने सोच कि सवा मुहूर्त के बाद तो ये सब छूट जाना है, इतने समय के लिए भोगों का क्या भोग करना। उसने महर्षि वशिष्ठ का आवाहन किया और कामधेनु गाय गुरु वशिष्ठ को दान कर दी, उचेश्रवा घोडा गुरु विश्वामित्र को दे दिया, कौंडल्या ऋषि को चिंतामणी दे दी, इस प्रकार अलग अलग महापुरुषों को बुला कर स्वर्ग की अच्छी अच्छी चीज भेंट कर दी। पूर्व-इंद्र अपना सर कूटते हुये गुरु बृहस्पति के पास गया कि इसने तो केवल सवा मुहूर्त में इंद्र के राज्य का सब कुछ लुटा दिया।

गुरु बृहस्पति ने कहा कि देखो इसने सवा मुहूर्त में अपना विवेक जगाये रखा, वासना को, इच्छा को बल नही दिया कि ये सब छूट जायेगा और इसलिए अच्छा काम करो। अगर कोई इच्छा को या वासना को बल देता है तो धीरे धीरे उसका पतन होता जाता है, पर इसने भोग भोगा नही और उपयोग किया, ये उपभोग नही उपयोग करता है।

थोड़ी देर बाद वहां एक आदमी आया और बोला कि अब तुमको हजार वर्ष का नरक नही हो सकता क्योंकि तुमने किसी वस्तु का उपभोग नहीं किया, उपयोग किया इसलिए तुम्हारा दैत्यराज विरोचन के घर राजकुमार के रूप में जन्म होगा, मनुष्य-योनी में नही, दैत्य योनी में… ।  वह बोला, “मुझे ये सब याद रहे… मैं राजा बलि बनूँ तो भी मुझे ये याद रहे कि उपभोग फंसाता है, उपयोग महान बनाता है” बोले, “एवमस्तु”| अब वह उधर भी अच्छे काम करने लग गया तो उसका प्रभाव बढ़ गया तो स्वर्ग-लोक भी राजा बलि के अन्दर आ गया।

बलि राजा तो अच्छे थे, लेकिन उसके प्रबंधक दैत्य ऐसे नही थे। जो दूसरे दैत्य थे वे रौब मारते थे और मनुष्यों को सताते थे तो मनुष्यों ने सभी देवी-देवताओं को प्रार्थना की और उन देवताओं ने भगवान से प्रार्थना की तो भगवान बोले कि जैसे रावण और कंस ने जुल्म किया और मैंने अवतार लेकर उन्हें मारा, इस प्रकार मैं बलि राजा को नहीं मार सकता हूँ, क्योंकि वह तो दानवीर है। मैं बलि के पास वामन रूप धार कर जाऊँगा। वामन याने छोटा। जब बलिराजा ने दान मांगने को बोला तो वह बोले कि दान में तीन कदम पृथ्वी लूँगा, जब वह दान देने लगा तो भगवान ने विशाल रूप धारण कर लिया। एक पैर में पूरी पृथ्वी और एक पैर में स्वर्ग नाप लिया और फिर बोले कि बता अब, तीसरा पैर किधर रखूँ? बलि राजा ने कहा कि मुझ पर ही अपना पैर रखिये।

उसकी पत्नी विन्ध्यामली आई। वामन भगवान बोले, “तुम्हारे पति ने अपना सब कुछ दान में दे दिया क्या इसलिए तू यहाँ आई है कि इस पर तुम्हारा भी ह़क बनता है?”

वह बोली, “नहीं, सारी दुनिया को देने वाला आज मेरे पति से कुछ मांगने को आया है, मैं कितनी भाग्यशाली हूँ। मैं प्रणाम करने को आई हूँ |”

स्वर्ग से प्रहलाद वहां आये, तो उनसे पूछा, “क्या तुम अपने पोते के पक्ष में कुछ बोलना चाहते हो?”

प्रहलाद ने कहा कि “नहीं, देने वाले को सब कुछ देकर भी देने वाले के पास कुछ न कुछ बचता है। जीव अपने आप का दाता नही हो सकता, कितना भी दान-पुण्य कर ले, लेकिन फिर भी कुछ न कुछ अपनापन रहता है न इसलिए मैं भी अपने आप को आपको अर्पण करने आया हूँ। कितना भी दान-पुण्य किया तो भी ‘मैं’ तो बचेगा न…. और अगर ‘मैं’ बचेगा तो फिर जन्मेगा और मरेगा, इसलिए वह अपने ‘मैं’ को भी आपको दे रहा है। इसलिये मैं इनको शाबाश देने आया हूँ और आपका दर्शन करने आया हूँ…”

गुरु का अपना महत्व है, गुरु को लेते देते अपना ‘मैं’ भी दे देते हैं और अगर ‘मैं’ भी चिदानुभूत है तो महान हो जाता है। घड़ा टूटता है तो घड़े के आकाश का महाकाश में विलय हो जाता है, अपना ‘मैं’ फूटता है तो व्यापक ब्रह्म, व्यापक चैतन्य, व्यापक ॐकार में विलीन हो जाता है। अभी तो मैं जीव हूँ, लेकिन जब ‘मैं’ अर्पित हो गया तो ‘मैं’ रहा नही, जीव भी नही रहा वह ब्रह्म हो गया, इसको बोलते हैं ‘ब्राह्मीस्थिती”…. हमने भी अपने आपको गुरु को अर्पित कर दिया तो गुरुजी तो समझ गए। वह ज्यादा बात नहीं करते थे लेकिन गुरुजी की कृपा हो गयी तो फिर

ब्राह्मीस्थिति प्राप्त कर कार्य रहे न शेष ।

मोह कभी न ठग सके, इच्छा नही लवलेश ।।  

इच्छा ‘मैं’ में होती है, ब्रह्म में नही होती, ब्रह्म तो सब की इच्छा पूरी करने वाला होता है। ब्रह्म में इच्छा नही होती कि मुझे ये सुख दो वह तो सुख का दाता हो गया।  सूरज को ऐसा नही होता कि मुझे प्रकाश मिले, चन्द्रमा को ऐसा नही होता कि मुझे चांदनी मिले, ऐसे ही आत्मा-ब्रह्म को सुख की लालच नही होती, दुःख का भय नही होता। सुन कर मजा लें, अपने आपका मजा है। जरा भोग के मजा लें, ज्ञानी भी खाते समय…’हाँ… हाँ.. अच्छा हुआ, आज बढ़िया बोला” लेकिन अन्दर से समझता है कि आनंद तो मेरा अपना है, इसको तो महत्व दिया है.. अच्छा है… तो मैने अच्छा किया तभी अच्छा है। तुम्हारा चैतन्य जिसको महत्व देता है वह महत्वपूर्ण हो जाता है। तुम महत्व न दो क्या है उसमें… हम अगर जमीन को महत्व देते तो वो जमीन हैदराबाद की, शमशाबाद की कितने हजारों रूपये की…पर इधर महत्व नही है तो थोडा डाउन है। एयरपोर्ट बना तो महत्व हो गया। तो, तुम्ही महत्व बनाते हो, तुम्ही महत्व बढाते हो, तुम्ही प्रभावित होते हो।

सपने में तुम्ही ने सब कुछ बनाया। जिस जिस चीज को तुम महत्व देते हो तुम उसके आगे छोटे हो जाते हो। आँख खुली तो महत्व देने वाली वस्तु और प्रभावित होने वाले तुम दोनों ही हो होकर बदल गये, फिर भी भगवान ज्यों का त्यों, आपका अपना चैतन्य भगवान तो विद्यमान है न । बोलते हैं भगवान तो दुनिया बनाता है, हम तो कुछ नहीं बना सकते। अरे, तुम रोटी में से कितने जीव बना रहे हो, धरती पर इतने मनुष्य नही जितने तुम्हारे शरीर में बेक्टीरिया के रूप में जीव है। बाल बनाते हैं, मकान बनाते हैं । भगवान कही बाहर बैठ कर कुछ नही बनाता, पेड़ में रहकर रस बनाता है, फल बनाता है फूल बनाता है, भैंस में दूध बनाता है, मनुष्य में बच्चे बच्चियाँ बनाता है ये सब भगवान नहीं बना रहा क्या? भगवान कही उधर हैं अथवा दो हाथ पैर वाले हैं, नही वास्तव में तो भगवान सर्व-व्यापक हैं, वह सबका आत्मा है| जैसे घड़े का जो आकाश है वही तो महाकाश है, ऐसे ही आत्मा इतना ही नहीं है वास्तव में परमात्मा और आत्मा एक ही है। उसका ज्ञान सुने तो बहुत भारी विवेक जगता है, इसको बोलते हैं आत्म-ज्ञान…

आत्म-ज्ञान से बढ़कर कोई ज्ञान नहीं, आत्म-लाभ से बढ़कर कोई लाभ नहीं, आत्म-सुख से बड़ा कोई सुख नही, इंद्र का सुख भी इसके सामने कुछ नही। रावण ने सोने की लंका बना ली, लेकिन शबरी को गुरुकृपा मिली शबरी के जूठे बेर रामजी खाते हैं और रावण को तीरों का निशाना बनना पड़ा क्योंकि रावण तो इच्छा के अधीन था, और सुन्दरी मिले.. और सुन्दरी मिले, जबकि शबरी को कोई इच्छा नही थी| इच्छारहित, वासनारहित, निश्चिन्त, तनावरहित… जो मिल गया खा लिया, जिधर नींद आई, सो गया, जो वाह-वाही हुई या निंदा हुई सब सपना, तो शबरी का आत्मा विकसित हो गया। रावण को तो ये चाहिये, ये चाहिये, वो चाहिये…. । तो ये बातें सत्संग से समझ में आती हैं, उपवास करने से भी इतना ज्ञान नही मिलता, तीर्थ में जाने से इतना ज्ञान नही मिलता जो सत्संग में जाने से मिलता है।

गंगाजी चली गई ब्रह्माजी के पास, बोली, “हर हर-गंगे कह के सब पापी लोग अपने पाप मुझ में छोड़ जायेंगे, मेरा भविष्य कितना खराब होगा, आप मेरी रक्षा करो” ब्रह्माजी ने थोडा ध्यान लगाया और अपनी आत्मा में शांत हुये फिर बोले, “देवी, तुम्हारे दुःख का अंत हो गया, सब लोग स्नान करके अपने पाप तुम में छोड़ेंगे लेकिन आत्म-साक्षात्कारी पुरुष भी तो तुम में स्नान करेंगे, जब वे चरण डालेंगे तो तुम्हारे पाप ताप नष्ट हो जायेंगे क्योंकि संत स्वयं तीर्थंकर होते है” कबीर जी ने भी बोला है,

तीर्थ नहाए एक फल, संत मिले फल चार ।

सद्गुरु मिले अनंत फल, कहत कबीर विचार ।। 

यह तन विष की बेल है, गुरु अमृत की खान ।

सीस दिए सद्गुरु मिले, तो भी सस्ता जान ।।

सद्गुरु मेरा सूरमा, करे शब्द की चोट ।

मारे गोला प्रेम का, हरे भरम की खोट ।।

ये भ्रम ही तो है कि मैं लड़की हूँ, मैं लड़का हूँ, मैं हैदराबादी हूँ…. नही, ये सब तो हो हो कर बदल जाता है। कई शरीर मिले और छूट गए। कई अच्छे भाव भी आते हैं व कई ऐसे वैसे भाव भी आते हैं, चले जाते हैं और कई अच्छे कर्म, बुरे कर्म, मिश्रित कर्म भी सुख दुःख देकर चले जाते हैं, लेकिन मैं अपने आप से जाता हूँ क्या? अपने आप को छोड़ सकते हैं क्या? अच्छे कर्म भी छूट जाते हैं, सुख भी छूट जाते हैं, दुःख भी छूट जाते हैं लेकिन जो कभी नही छूटता वो कौन है….सोऽम …वो मैं हूँ, अमर आत्मा । गुरुदेव के द्वारा ये आखरी चाबी लगती है तो व्यापक ब्रह्म का साक्षात्कार हो जाता है। इसलिए सोने की लंका मिल जाए फिर भी आदमी निर्दुख नही होता, इंद्र-पद मिल जाता है फिर भी पतन हो जाता है, लेकिन आत्म-साक्षात्कार हो जाए तो

उठत बैठत उही उठाने, कहत कबीर हम उसी ठिकाने” 

ब्रह्म-ज्ञानी सदा निर्लेपा | वह सदा निर्लेप होता है। अपनी इच्छा न हो तो भी दुसरे की भलाई के लिए, जैसे डाक्टर किसी को इंजेक्शन भी दे देता है, मुझे इससे सुख मिलेगा इसलिए नही अपितु मरीज ठीक हो जाए, इसलिए इंजेक्शन दे देता है| ऐसे ही माँ अगर बच्चे को डांटती है तो अपने सुख के लिए अपितु बच्चे के भले के लिए। ऐसे ही संत लोग जो भी व्यवहार करते हैं, दूसरों की भलाई के लिए। कथाकार होगा तो सोच सकता है कि मेरा भला हो लेकिन अगर संत है तो सामने वाले का भला हो, ऐसा सोचता है। अपना भला तो हो गया लेकिन जिसने दूसरे का भला नही किया, वो किसी का भला क्या करेगा। स्वयं आत्म-साक्षात्कार नही किया तो दूसरे को क्या कराएगा

“कन्या मन्या उर्रर… तुम मेरे चेले, मैं तुम्हारा गुरर,

दक्षिणा धर, तू चाहे तरर, चाहे मरर” ।

नही, नही….. सच्चा सद्गुरु तो सूरमा होता है, लेंगे तो भी हमारी के लिए और कुछ देंगे तो भी हमारी भलाई के लिए। इसलिए विवेकानंद बोलते हैं “ १२ कोस, २४ मील, या ३८ किलोमीटर पैदल जाना पड़े तो भी मैं जाऊँगा लेकिन आत्म-साक्षात्कारी पुरुष के दर्शन से, उनकी निगाहों से आत्म-अनुभव की जो तरंगे उठती हैं, उन्हें छूकर आने वाली वायु के स्पर्श से जो फायदा होता है, वह तीर्थ में स्नान करने से नही होता”

मुझे एक बात पर बड़ी हँसी आती है। दिल्ली के एक भगत बोले कि बापूजी, आपका बद्रीनाथ में सत्संग हो जाये तो बहुत लोगो को फायदा होगा| बद्रीनाथ का दर्शन और बापूजी का सत्संग… मैंने डांट कर कहा, “चुप रह”| बोला, “बापूजी, हम तैयारी कर लेंगे”, मैंने फिर कहा, “चुप रह” अब अगर चुप रह, चुप रह कह कर अगर उसे डांटा नही होता और अगर मैं हाँ बोल देता और हम वहां जाते, और ये जो बादल वहां फटा, हमारे लाखों लोग जो सत्संग सुनने आते तो जो गड़बड़ वहां हुई, होती तो ….? अच्छी डांट खाई उसने…. बोला, “ बापूजी बद्रीनाथ सत्संग की आज्ञा दे दो, हम लोग सब व्यवस्था..” मैंने कहा, “अरे, चुप रह”, अब कहता है अच्छा हुआ, अगर हाँ बोलते तो …., हैदराबाद वाले भी आते थे बद्रीनाथ में, वो भी अब बोलते हैं…. हरि… हरि ॐ… जीव तो अपनी भलाई के लिए बोलेगा लेकिन जिसको आत्म-साक्षात्कार हुआ वह सबकी भलाई के लिए बोलेगा, सब का भला होता है।

हरि ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ…..

 

About Asaram Bapuji

Asumal Sirumalani Harpalani, known as Asaram Bapu, Asharam Bapu, Bapuji, and Jogi by his followers, is a religious leader in India. Starting to come in the limelight in the early 1970s, he gradually established over 400 ashrams in India and abroad.