लाला लाजपत राय पुण्यतिथि – १७ नवम्बर २०१४

lala_laj[atraiलाला लाजपत राय जी बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे ! वह एक लेखक, राजनीतिग्य ,उत्कृष्ठ समाजसेवी ,पंजाब नॅशनल बैंक व लक्ष्मी इंश्योरेंस कंपनी के संस्थापक भी थे किन्तु उनकी सर्वाधिक प्रसिधी एक महान स्वतंत्रता सेनानी के रूप में ही है !

प्रारंभिक जीवन व समाज-सेवा
लाला जी का जन्म 28-जनवरी-1865 को पंजाब राज्य के मोंगा जिले के दुधिके गाँव में हुआ था ! उनके पिता श्री लाला राधा किशन आजाद जी सरकारी स्कूल में उर्दू के शिक्षक थे जबकि उनकी माता देवी गुलाब देवी धार्मिक महिला थीं !
लाला जी बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि थे व धन , आदि की अनेक कठिनाइयों के पश्चात् भी उन्होंने उच्च शिक्षा प्राप्त की ! 1880 में कलकत्ता यूनिवर्सिटी व पंजाब यूनिवर्सिटी की प्रवेश परीक्षाएं पास करने के बाद उन्होंने लाहोर गवर्नमेंट कॉलेज में दाखिला ले लिया व कानून की पढाई प्रारंभ की ! लेकिन घर की माली हालत ठीक न होने के कारन दो वर्ष तक उनकी पढाई बाधित रही !

लाहोर में बिताया गया समय लाला जी के जीवन में अत्यधिक महत्वपूर्ण साबित हुआ और यहीं उनके भावी जीवन की रूप-रेखा निर्मित हो गयी ! उन्होंने भारत के गौरवमय इतिहास का अध्ययन किया और महान भारतीयों के विषय में पढ़कर उनका हृदय द्रवित हो उठा ! यहीं से उनके मन में राष्ट्र प्रेम व राष्ट्र सेवा की भावना का बीजारोपण हो गया !कानून की पढाई के दौरान वह लाला हंसराज जी व पंडित गुरुदत्त जी जैसे क्रांतिकारियों के संपर्क में आये ! यह तीनों अच्छे मित्र बन गए और 1882 में आर्य समाज के सदस्य बन गए ! उस समय आर्य समाज समाज-सुधार की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा था और यह पंजाब के युवाओं में अत्यधिक लोकप्रिय था ! 1885 में उन्होंने लाहोर के गवर्नमेंट कॉलेज से द्वितीय श्रेणी में वकालत की परीक्षा पास की और हिसार में अपनी कानूनी प्रैक्टिस प्रारंभ कर दी ! प्रेक्टिस के साथ-साथ वह आर्य समाज के सक्रीय कार्यकर्ता भी बने रहे ! स्वामी दयानंद जी की म्रत्यु के पश्चात् उन्होंने अंग्लो-वैदिक कॉलेज हेतु धन एकत्रित करने में सहयोग किया ! आर्य समाज के तीन कक्ष्य थे : समाज सुधार, हिन्दू धर्म की उन्नति और शिक्षा का प्रसार ! वह अधिकांश समय आर्य समाज के सामाजिक कार्यों में ही लगे रहते ! वह सभी सम्प्रदायों की भलाई के प्रयास करते थे और इसी का नतीजा था की वह हिसार म्युनिसिपल्टी हेतु निर्विरोध चुने गए जहाँ की अधिकांश जनसँख्या मुस्लिम थी !

समाज-सेवा और राजनीतिक जीवन

लाला जी के मन में अब स्वतंत्रता की उत्कट भावना पैदा हो चुकी थी और इसीलिए 1888 में 23 वर्ष की आयु में उन्होंने समाज सेवा के साथ-साथ राजनीती में भी प्रवेश किया और भारतीय राष्ट्रिय कांग्रेस के सदस्य बन गए ! जब पंजाबी प्रतिनिधिमंडल के साथ उन्होंने इलहाबाद में कांग्रेस अधिवेशन में भाग लिया तो उनका जोरदार स्वागत हुआ और उनके उर्दू भाषण ने सभी का मन मोह लिया ! अपनी योग्यता के बल पर वह जल्द ही कांग्रेस के लोकप्रिय नेता बन गए !

लगभग इसी समय जब सर सैयद अहमद खान ने कांग्रेस से अलग होकर मुस्लिम समुदाय से यह कहना शुरू किया की उसे कांग्रेस में जाने की बजाय अंग्रेज सरकार का समर्थन करना चाहिए तब लाला जी ने इसके विरोध में उन्हें “कोहिनूर” नामक उर्दू साप्ताहिक में खुले पत्र लिखे जिन्हें काफी प्रशंसा मिली !

1892 में पंजाब हाईकोर्ट में वकालत करने हेतु वह हिसार से लाहोर चले गए ! यहाँ भी लालाजी राष्ट्र सेवा में जुटे रहे !

उन्होंने लेखन द्वारा भी अपना प्रेरक कार्य जरी रखा और शिवाजी, स्वामी दयानंद, मेजिनी, गैरीबाल्डी जैसे प्रसिद्ध लोगों की आत्मकथाएं अनुवादित व प्रकाशित कीं ! इन्हें पढ़कर अन्य लोगों ने भी स्वतंत्रता प्राप्ति हेतु संघर्ष की प्रेरणा प्राप्त की !

लाला जी जन सेवा के कार्यों में तो सदैव ही आगे रहते थे इसीलिए 1896 में जब सेन्ट्रल प्रोविंस में भयानक सूखा पड़ा तब लाला जी ने वहां अविस्मर्णीय सेवाकार्य किया ! जब वहां सैकड़ों निर्धन, अनाथ, असहाय मात्र इसाई मिशनरियों की दया पर निर्भर थे और वह उन्हें सहायता के बदले अपने धर्म में परिवर्तित कर रहीं थीं तब लाला जी ने अनाथों के लिए एक आन्दोलन चलाया व जबलपुर, बिलासपुर,आदि अनेक जिलों के 250 अनाथ बालकों को बचाया और उन्हें पंजाब में आर्य समाज के अनाथालय में ले आये ! उन्होंने कभी भी धन को सेवा से ज्यादा महत्व नहीं दिया और जब उन्हें प्रतीत हुआ की वकालत के साथ-साथ समाज सेवा के लिए अधिक समय नहीं मिल पा रहा है तो उन्होंने अपनी वकालत की प्रेक्टिस कम कर दी !

इसी प्रकार 1899 में जब पंजाब, राजस्थान, सेन्ट्रल प्रोविंस, आदि में और भी भयावह अकाल पड़ा और 1905 में कांगड़ा जिले में भूकंप के कारन जन-धन की भारी हानि हुई तब भी लालाजी ने आर्य समाज के कार्यकर्त्ता के रूप में असहायों की तन,मन,धन से सेवा-सहायता की !

उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन में महत्वपूर्ण योगदान दिया ! भारतीय राष्ट्रिय कांग्रेस में उन्होंने रचनात्मकता, राष्ट्र निर्माण व आत्मनिर्भरता पर जोर दिया ! कांग्रेस में वह बाल गंगाधर तिलक जी व बिपिनचंद्र पाल जी के साथ उग्रवादी विचारधारा से सहमत थे और यह तीनों ” लाल-बाल-पाल ” नाम से प्रसिद्ध थे ! जहाँ उदारवादी कांग्रेसी अंग्रेज सरकार की कृपा चाहते थे वहीँ उग्रवादी कांग्रेसी अपना हक़ चाहते थे ! लाला जी मानते थे की स्वतंत्रता भीख और प्रार्थना से नहीं बल्कि संघर्ष और बलिदान से ही मिलेगी !

बंगाल विभाजन के समय उन्होंने भी स्वदेशी, स्वराज और विरोध के राष्ट्रिय आन्दोलन में बढ़-चढ़ के भाग लिया था ! 1906 में जब कांग्रेस के उदारवादी और उग्रवादी धडों में विवाद हुआ तब उन्होंने मध्यस्थता करने का बहुत प्रयास किया ! 1907 में जब तिलक जी ने कांग्रेस के अध्यक्ष पद हेतु उनका नाम प्रस्तावित किया लेकिन विवाद की संभावना देखते हुए लाला जी ने अपना नाम आगे नहीं बढ़ने दिया !

लाला जी मानते थे की राष्ट्रिय हित के लिए विदेशों में भी भारत के समर्थन में प्रचार करने हेतु एक संगठन की जरूरत है ताकि पूरी दुनिया के सामने भारत का पक्ष रखा जा सके और अंग्रेज सरकार का अन्याय उजागर किया जा सके ! इसीलिए 1914 में वह ब्रिटेन यात्रा पर गए ! यहाँ से वह अमेरिका गए जहाँ उन्होंने ” इन्डियन होम लीग सोसायटी ऑफ़ अमेरिका ” की स्थापना की और ” यंग इण्डिया ” नामक पुस्तक लिखी ! इसमें अंग्रेज सरकार का कच्चा चिटठा खोला गया था इसीलिए ब्रिटिश सरकार ने इसे प्रकाशित होने से पूर्व ही इंग्लॅण्ड और भारत में प्रतिबंधित कर दिया ! प्रथम विश्व युद्ध की समाप्ति के पश्चात् वह भारत वापस आ गए !

उन्होंने पंजाब में जलियांवाला नरसंहार के विरोध में असहयोग आन्दोलन का नेतृत्व किया ! उन्हें अनेक बार जेल जाना पड़ा लेकिन वह पीछे नहीं हटे ! जब चौरी-चौरा घटना के बाद गांधीजी ने असहयोग आन्दोलन स्थगित किया तब लाला जी इससे बहुत निराश हुए ! 1925 में वह केन्द्रीय विधान सभा के सदस्य भी चुने गए !

म्रत्यु
1928 में सात सदस्यीय सायमन कमीशन भारत आया जिसके अध्यक्ष सायमन थे ! इस कमीशन को अंग्रेज सरकार ने भारत में संवेधानिक सुधारों हेतु सुझाव देने के लिए नियुक्त किया था जबकि इसमें एक भी भारतीय नहीं था ! इस अन्याय पर भारत में तीव्र प्रतिक्रिया हुई और भारतीय राष्ट्रिय कांग्रेस ने पूरे देश में सायमन कमीशन के शांतिपूर्ण विरोध का निश्चय किया !
इसीलिए जब 30-अक्टूबर-1928 को सायमन कमीशन लाहोर पहुंचा तब वहां उसके विरोध में लाला जी ने मदन मोहन मालवीय जी के साथ शांतिपूर्ण जुलूस निकाला ! इसमें भगत सिंह जैसे युवा स्वतंत्रता सेनानी भी शामिल थे ! पुलिस ने इस अहिंसक जुलूस पर लाठी चार्ज किया ! इसी लाठीचार्ज में लालाजी को निशाना बनाकर उन पर जानलेवा हमला किया गया जिस से उन्हें घातक आघात लगा और अंतत: 17-नवम्बर-1928 को यह सिंह चिर-निद्रा में सो गया ! अपनी म्रत्यु से पूर्व लाला जी ने भविश्यवाणी की थी की ” मेरे शरीर पर पड़ी एक-एक लाठी अंग्रेज सरकार के ताबूत में अंतिम कील साबित होगी ! ” , जो की सच साबित हुई !

लाला जी की इस हत्या ने भगत सिंह, आदि क्रांतिकारियों को उद्वेलित कर दिया ! अभी तक वह गाँधी जी के अहिंसक आन्दोलन में जी-जान से जुड़े थे किन्तु जब उन्होंने देखा की शांतिपूर्ण विरोध पर भी दुष्ट अंग्रेज सरकार लाला जी जैसे व्यक्ति की हत्या कर सकती है तो उन्होंने इस अन्याय व अत्याचार का बदला लेने की ठान ली और लाला जी के हत्यारे अंग्रेज अधिकारी सौन्ड़ेर्स को मारकर ही दम लिया !

लाला जी की माँ श्रीमती गुलाब देवी की म्रत्यु टी.बी. के कारण हुई थी इसीलिए लाला जी ने 1927 में उनकी स्मृति में एक ट्रस्ट की स्थापना की जिसका उद्देश्य था महिलाओं के लिए टी.बी. होस्पीटल की स्थापना करना ! इस का निर्माण 1934 में पूरा हो गया और महात्मा गाँधी ने इसका उद्घाटन किया किन्तु दुर्भाग्यवश लाला जी इस सुअवसर पर जीवित न थे !

प्रेरणा व यादगार
1895 में लाला जी के सहयोग से “पंजाब नॅशनल बैंक” व लक्ष्मी इंश्योरेंस कंपनी की स्थापना हुई !उन्होंने राष्ट्रिय भावना के प्रचार हेतु उर्दू में “वंदे मातरम” और अंग्रेजी में “द पीपल” नामक साप्ताहिक समाचारपत्र निकाले !
उन्होंने अनाथ बालकों के लिए अनेक अनाथालयों की स्थापना की !उनके सहयोग से ही ” ऑल इण्डिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस” नामक श्रमिक संघ की स्थापना हुई और वह उसके प्रथम अध्यक्ष भी बने ! उनकी जन्मशती के अवसर पर पंजाबी समाज के व्यक्तियों द्वारा शिक्षा के प्रसार हेतु ” लाला लाजपत राय ट्रस्ट ” की स्थापना की गयी !
उनके नाम पर अनेक स्थानों, होस्पीटलों, संस्थानों, स्कूलों, आदि का नाम रखा गया है !
लाला जी सच्चे अर्थों में राष्ट्र प्रेमी थे ! वह केवल “पंजाब के सिंह” ही नहीं बल्कि पूरे भारत के सिंह थे जिनका जीवन हर भारतीय के लिए प्रेरणा का अविरल स्त्रोत है !