मधुर व्यवहार

madhur vyavhar

Sant Shri Asharamji Bapu

असत्य, निंदा, चुगलखोरी और कठोरता – यह वाणी के पाप हैं | संभाषण के चार दोष हैं :
1. हुक्म चलाते हो ऐसा बोलना
2. चिल्लाते हुए बोलना
3. अश्लील शब्द बोलना और
4. कटु बोलना |
हित, मिट, शांत, मधुर और प्रिय भाषण – यह पाँच वाणी के गुण हैं |
आप अमानी रहो | औरों को मान दो |
जो व्यक्ति धर्मानुसार आचरण करता हो और लोक-कल्याण के कार्यों में रत हो, उसके यद्यपि दर्शन न किए हुए हों तब भी केवल नाम सुन-सुनकर भी लोग उसे हृदय से प्रेम करने लग जाते हैं |
बातचीत के दौरान क्रूरतापूर्वक बात नहीं करनी चाहिए | किसीको नीचा देखना पड़े ऐसे शब्द भी नहीं बोलने चाहिए | जिस कथन से किसीको उद्वेग हो ऐसी रूखी बात पापियों के लोक में ले जानेवाली होती है | अतः ऐसी बात नहीं करनी चाहिए | वचनरूपी बाण मुँह से निकलते हैं और उससे बिंधकर मनुष्य रात-दिन शोकमग्न रहता है | इसलिए जो वचन सामने वाले को उद्वेग पहुँचाते हों, उन्हें कदापि नहीं बोलना चाहिए | बाणों से बंधा हुआ और कुल्हाड़ी से कटा हुआ वन तो फ़िर से अंकुरित हो जाता है किंतु कटुवचनरूपी शस्त्र से किया हुआ भयंकर घाव कभी भी भरता नहीं | नाना प्रकार के बाण देह में गहरे उतर गये हों तो भी चिकित्सक उन्हें बाहर निकल सकता है किंतु वचनरूपी बाण निकालना कठिन है क्योंकि वह हृदय के अंदर लगा होता है |
तप, इन्द्रियसंयम, सत्य भाषण और मनोनिग्रह के द्वारा हृदय की ग्रंथि खोलकर प्रिय और अप्रिय के लिए हर्ष-शोक नहीं करना चाहिए |
सुनने से उद्वेग पैदा कर दे ऐसे नरक में ले जानेवाले निष्ठुर वचन कदापि नहीं बोलने चाहिए | कोई असभ्य व्यक्ति यदि कटुवचनरूपी बाणों की वर्षा करे तो भी विद्वान मनुष्य को शांत रहना चाहिए | जो सामनेवाले के क्रोधित हो जाने पर भी स्वयं प्रसन्न ही रहता है वह क्रोधित व्यक्ति के पुण्य ग्रहण कर लेता है | जगत में निन्दनीय और आवेश उत्पन्न करने के कारण अप्रिय लगनेवाले क्रोध को जो नियंत्रित कर लेता है, चित में कोई विकार या दोष आने नहीं देता, सदैव प्रसन्न ही रहता है और दूसरों के दोष नहीं देखता वह मनुष्य उसकी तरफ़ शत्रुभाव रखनेवाले के पुण्य ले लेता है | दूसरों के द्वारा कटुवचन कहे गये हों तो भी उनके लिए कठोर या अप्रिय कुछ भी नहीं बोलता, सदा समत्व में स्थित रहता है और सामनेवाले का बुरा भी नहीं चाहता ऐसे महात्मा के दर्शन के लिए देवतागण भी लालायित रहते हैं |