मेरे गुरु महान…

गुरु ,hindu,om,asharam bapu,asaram ji

किसी नदी को समुद्र के संगम के निकट निहारने वालों को शायद ही खयाल आता होगा कि यह शांत, सौम्य, सुखी, सरिता कभी तो पर्वत के ऊपर से नीचे बहती हुई, पत्थरों से टकराती हुई, मार्ग में अनेक अवरोधों को सहन करती हुई, सतत् पुरुषार्थ करती हुई, साहसपूर्ण, एकाकी कदम आगे बढ़ाती हुई, हृदय में आशा का तंतु बाँधती हुई आखिर में समुद्र-मिलन के उसके महान ध्येय तक पहुँच सकी है। ठीक उसी प्रकार विश्वप्रसिद्ध संत श्री आशाराम जी बापू, जिन्होंने आज परब्रह्म-परमात्मरूपी महासागर में संगम-आत्मैक्य कर लिया है, वे भी कभी ‘परथम पहेलुं मस्तक मूकी, वळती लेवुं नाम जोने. संत दारा शीश समरपे, ते पामे रस पीवा जोने.’ (पूर्णता को प्राप्त संत प्रीतमदास जी का यह वचन है कि अपने पुत्र-परिवार, धन-सम्पदा आदि सहित अपने शीश यानी अपने देहाभिमान को भी परमात्मा को, सदगुरु को समर्पित करने की तैयारी रखो फिर पूर्ण ज्ञान की, परमात्मप्राप्ति की अपेक्षा करना। ऐसे शूरवीर साधक को ही भगवद्-रस पीने का सौभाग्य प्राप्त होता है।)- ऐसे अटल निश्चय को हृदय में धारण करके परमात्मप्राप्ति को ही अपने जीवन का ध्रुव लक्ष्य बनाकर अपनी माता, भाई-बहन, पत्नी आदि सभी को छोड़ के गुरु मिलन के उद्देश्य से निकल पड़े थे। आज अनेक आश्रमों, समितियों एवं सेवा-प्रवृत्तियों के मार्गदर्शक व प्रेरणास्थान तथा करोड़ों शिष्यों के सदगुरु पूजनीय संतशिरोमणि श्री आशाराम जी बापू को देखने वाले इसकी कदाचित कल्पना भी न कर पायेंगे कि बापू जी अपनी साधनाकाल में किस प्रकार सदगुरु साँईं श्री लीलाशाह जी के श्रीचरणों में पहुँचकर उनकी अग्निपरीक्षा में उत्तीर्ण हुए थे। शिखर के जगमगाते हुए कलश के तेज को देखने वालों को शिखर की नींव के निर्माण में जो तपश्चर्या हुई है वह कहाँ दिख पाती है !

माता पिता के सुसंस्कार कहो या पूर्वजन्म की दैवी सम्पदा, छोटी उम्र में ही पूज्य बापू जी संसार की असत्यता को जानकर प्रभु-मिलन की तीव्र उत्कंठा के साथ केदारनाथ, वृंदावन जैसे तीर्थों में गये परंतु सच्चा मार्ग और मार्गदर्शक नहीं मिले। वन और गिरी-गुफाओं में घूमते-घूमते आखिर नैनिताल में ब्रह्मनिष्ठ संत भगवत्पाद लीलाशाह जी बापू के आश्रम में पहुँचे। उनके दर्शन करके ही पूज्य श्री को प्रतीति हो गयी कि अब मेरी खोज पूर्ण हो गयी ! पूज्यपाद लीलाशाह जी ने भी पूज्य श्री की तीव्र तड़प देखकर उन्हें शिष्यरूप में स्वीकार किया।

नैनिताल की पहाड़ी पर स्थित गुरु-आश्रम से प्रतिदिन सुबह पगडंडी से नीचे उतर के बाल्टियाँ भर के पानी लाकर पेड़-पौधों को सींचना, बाजार से दूध व सब्जियाँ लाना, बर्तन साफ करना, गुरु जी के आये हुए पत्रों को पढ़ना व गुरु जी द्वारा लिखवाये उत्तर लिखना, गुरु जी को शास्त्र पढ़कर सुनाना जैसी सारी सेवाएँ हँसते-हँसते तत्परता से पूज्य श्री ने अंगिकार कर लीं।

चार फीट की छोटी कुटिया पूज्य श्री को रहने के लिए दी गयी, जिसमें सीधे खड़े भी रहा जा सकता था. अंदर झुककर जाना पड़ता था। रात तो सोते समय पैर भी पूरे लम्बे नहीं कर सकते थे। मूँग की दाल उबाल कर खा के दिन बिताते थे। इतने कठोर परिश्रम के बाद भी ब्रह्मज्ञान पाने की तड़प थी तो आखिर संवत् 2021 आश्विन शुक्ल दूज के दिन दोपहर को ढाई बजे पूज्य लीलाशाह जी महाराज का हृदय करूणा कृपा से छलका और अपने प्रिय शिष्य को ‘स्व’ स्वरूप में प्रतिष्ठित करा के आत्मधन से इतना मालामाल कर दिया कि आज लाखो-करोड़ों लोगों में बाँटने पर भी वह खजाना खूटता ही नहीं है। वास्तव में, अदभुत होता है सदगुरुओं का आत्मिक प्रसाद !

सच्चिदानंद परमात्मा के वास्तविक स्वरूप के ज्ञान को हस्तामलकवत् करने वाले, जिस स्थिति में कुछ भी प्राप्त करना, त्याग करना अथवा भोगना शेष नहीं रहता उस स्थिति में विराजमान पूज्य बापू जी अपनी इस ऊँचाई का रहस्योद्घाटन करते हुए कहते हैं-

हम न हँसकर सीखे हैं, न रोकर सीखे हैं।

जो कुछ भी सीखे हैं, गुरु के होकर सीखे हैं।।

बापू जी ने अपने गुरुदेव के प्रति स्नेह, श्रद्धा एवं अहोभाव व्यक्त करते हुए जब भावविभोर हो जाते हैं तब अपने सदगुरु के महाप्रयाण के क्षणों में उनका मस्तक अपनी गोद में होने की घटना का अचूक स्मरण करते हैं और स्वयं को परम सौभाग्यशाली अनुभव करते हैं।

ऐसे सुहृदय, पूजनीय संत के जीवन-दर्शन द्वारा परब्रह्म-परमात्मा के साक्षात्कार का सौभाग्य सबको प्राप्त हो यही अभ्यर्थना !