निज ज्ञान का आदर – दुर्लभ सत्संग

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  • मनुष्य का विवेक
  • सब परमात्मा का स्वरुप
  • शरीर में ही स्वस्थ मन तथा आत्मा का निवास
  • शरीर को मैं मानना ही मूर्खता
  • परमात्मा सबका सहारा
  • परमात्मा – आनंद का सागर
  • संसार से वैराग्य
  • पति-पत्नी का मधुर व्यवहार
  • प्राप्त वस्तुओं का सदुपयोग
  • ईश्वर की सुन्दर व्यवस्था
  • ईश्वर सत्य है

साधक की साधना कब पूर्ण होती है ?

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  • तीर्थ यात्रा से भव की शुद्धि
  • उपासना से मन शांत
  • ऋषि विश्वामित्र की एकाग्रता
  • मन-बुद्धि से आत्मा की सत्ता का प्रतिपादन
  • अंतर करण के 3  दोष
  • नामदेवजी की कथा
  • आत्मज्ञान की प्राप्ति
  • कालीमाता ने ली बलि
  • ब्राह्मी स्थिति प्राप्त कर , कार्य करें न शेष
  • जीवन परिवर्तनशील
  • राग-द्वेष से मुक्ति

आत्मज्ञान – पूज्य बापूजी की ज्ञानमयी अमृतवाणी

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आत्मज्ञान के प्रकाश से अँधेरी अविद्या को मिटाओ – पूज्य बापूजी की ज्ञानमयी अमृतवाणी

मिथ्या प्रपंच देख दुःख जिन आन जीय ।
देवन को देव तू तो सब सुखराशि है ॥
अपने अज्ञान ते जगत सारो तू ही रचा ।
सबको संहार कर आप अविनाशी है ॥
यह संसार मिथ्या व भ्रममात्र है लेकिन अविद्या के कारण सत्य भासता है । नश्वर शरीर में अहंबुद्धि तथा परिवर्तनशील परिस्थितियों में सत्यबुद्धि हो गयी है इसीलिये दुःख एवं क्लेश होता है । वास्तव में देखा जाये तो परिस्थितियाँ बदलती रहती हैं लेकिन परिस्थितियों का जो आधार है, अधिष्ठान है वह नहीं बदलता ।
‘बचपन बदल गया । किशोरावस्था बदल गयी । जवानी बदल गयी । अब बुढ़ापे ने घेर रखा है… लेकिन यह भी एक दिन बदल जायेगा । इन सबके बदलने पर भी जो नहीं बदलता, वह अबदल चेतन आत्मा ‘मैं’ हूँ और जो बदलता है वह माया है…’ सदाचार व आदर के साथ ऐसा चिंतन करने से बुद्धि स्वच्छ होती है और बुद्धि के स्वच्छ होने से ज्ञान का प्रकाश चमकने लगता है ।
जिनके भाल के भाग्य बड़े, अस दीपक ता उर लसके ।
‘यह ज्ञान का दीपक उन्हीं के उर-आँगन में जगमगाता है, जिनके भाल के भाग्य-सौभाग्य ऊँचे होते हैं ।’ उन्हीं भाग्यशालियों के हृदय में ज्ञान की प्यास होती है और सद्गुरु के दिव्य ज्ञान व पावन संस्कारों का दीपक जगमगाता है । पातकी स्वभाव के लोग सद्गुरु के सान्निध्य की महिमा क्या जानें ? पापी आदमी ब्रह्मविद्या की महिमा क्या जाने ? संसार को सत्य मानकर अविद्या का ग्रास बना हुआ, देह के अभिमान में डूबा हुआ यह जीव आत्मज्ञान की महिमा बतानेवाले संतों की महिमा क्या जाने ?
पहले के जमाने में ऐसे आत्मज्ञान में रमण करनेवाले महापुरुषों की खोज में राजा-महाराजा अपना राज-पाट तक छोड़कर निकल जाते थे और जब ऐसे महापुरुष को पाते थे तब उन्हें सदा के लिये अपने हृदय-सिंहासन पर स्थापित करके उनके द्वार पर ही पड़े रहते थे । गुरुद्वार पर रहकर सेवा करते, झाड़ू-बुहारी लगाते, भिक्षा माँगकर लाते और गुरुदेव को अर्पण करते । गुरु उसमें से प्रसाद के रूप में जो उन्हें देते, उसीको वे ग्रहण करके रहते थे । थोड़ा-बहुत समय बचता तो गुरु कभी-कभार आत्मविद्या के दो वचन सुना देते । इस प्रकार वर्षों की सेवा-साधना से उनकी अविद्या शनैः-शनैः मिटती और उनके अंतर में आत्मविद्या का प्रकाश जगमगाने लगता ।
आत्मविद्या सब विद्याओं में सर्वोपरि विद्या है । अन्य विद्याओं में अष्टसिद्धियाँ एवं नवनिधियाँ बड़ी ऊँची चीजें हैं । पूरी पृथ्वी के एकछत्र सम्राट से भी अष्टसिद्धि-नवनिधि का स्वामी बड़ा होता है लेकिन वह भी आत्मविद्या पाने के लिये ब्रह्मज्ञानी महापुरुष की शरण में रहता है ।
हनुमानजी के पास अष्टसिद्धियाँ एवं नवनिधियाँ थीं फिर भी आत्मविद्या पाने के लिये वे श्रीरामजी की सेवा में तत्परता से जुटे रहे और अंत में भगवान श्रीराम द्वारा आत्मविद्या पाने में सफल भी हुए । इससे बड़ा दृष्टांत और क्या हो सकता है ? हनुमानजी बुद्धिमानों में अग्रगण्य थे, संयमियों में शिरोमणि थे, विचारवानों में सुप्रसिद्ध थे, व्यक्तियों को परखने में बड़े कुशल थे, छोटे-बड़े बन जाना, आकाश में उड़ना आदि सिद्धियाँ उनके पास थीं, फिर भी आत्म-साक्षात्कार के लिये उन्होंने श्रीरामजी की जी-जान से सेवा की । हनुमानजी कहते हैं : 
राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ बिश्राम…
हनुमानजी की सारी सेवाएँ तब सफल हो गयीं जब श्रीरामजी का हृदय छलका और उन्होंने ब्रह्मविद्या देकर हनुमानजी की अविद्या को सदा-सदा के लिये दूर कर दिया ।
मानव संसार को सत्य मानकर उसीमें उलझा हुआ है और अपना कीमती जीवन बरबाद कर रहा है । जो वास्तव में सत्य है उसकी उसे खबर नहीं है और जो मिथ्या है उसीको सत्य मानकर, उसीमें आसक्ति रखकर फँस गया है ।
जो विद्यमान न हो किन्तु विद्यमान की नाईं भासित हो, उसको अविद्या कहते हैं । इस अविद्या से ही अस्मिता, राग-द्वेष एवं अभिनिवेश पैदा होते हैं । अविद्या ही सब दुःखों की जननी है ।
अविद्या, अस्मिता, राग-द्वेष और अभिनिवेश – इनको ‘पंच क्लेश’ भी कहते हैं । पंच क्लेश आने से षड्-विकार भी आ जाते हैं । उत्पत्ति (जन्मना), स्थिति (दिखना), वृद्धि (बढ़ना), रुग्णता (बीमार होना), क्षय (वृद्ध होना) और नष्ट होना- ये षड्विकार अविद्या के कारण ही अपने में भासते हैं । इन षड्-विकारों के आते ही अनेक कष्ट भी आ जाते हैं और उन कष्टों को झेलने में ही जीवन पूरा हो जाता है । फिर जन्म होता है एवं वही क्रम शुरू हो जाता है । इस प्रकार एक नहीं, अनेकों जन्मों से जीव इसी शृंखला में, जन्म-मरण के दुष्चक्र में फँसा है । 
गंगोत्री से लेकर गंगासागर तक गंगा नदी में जितने रेत के कण होंगे उसे कोई भले ही गिन ले लेकिन इस अविद्या के कारण यह जीव कितने जन्म भोगकर आया है, इसका अनुमान नहीं लगाया जा सकता ।
इस जन्म-मरण के दुःखों से सदा के लिये छूटने का एकमात्र उपाय यही है कि अविद्या को आत्मविद्या से हटानेवाले सत्पुरुषों के अनुभव को अपना अनुभव बनाने के लिए लग जाना चाहिए । जैसे, भूख को भोजन से तथा प्यास को पानी से मिटाया जाता है, ऐसे ही अज्ञान को, अँधेरी अविद्या को आत्मज्ञान के प्रकाश से मिटाया जा सकता है । 
ब्रह्मविद्या के द्वारा अविद्या को हटानेमात्र से आप ईश्वर में लीन हो जाओगे । फिर हवाएँ आपके पक्ष में बहेंगी, ग्रह और नक्षत्रों का झुकाव आपकी ओर होगा, पवित्र लोकमानस आपकी प्रशंसा करेगा एवं आपके दैवी कार्य में मददगार होगा । बस, आप केवल उस अविद्या को मिटाकर आत्मविद्या में जाग जाओ । फिर लोग आपके दैवी कार्य में भागीदार होकर अपना भाग्य सँवार लेंगे, आपका यशोगान करके अपना चित्त पावन कर लेंगे । अगर अविद्या हटाकर उस परब्रह्म परमात्मा में दो क्षण के लिये भी बैठोगे तो बड़ी-से-बड़ी आपदा टल जायेगी ।
जो परमात्मदेव का अनुभव नहीं करने देती उसीका नाम अविद्या है । ज्यों-ज्यों आप बुराइयों को त्यागकर उन्हें दुबारा न करने का हृदयपूर्वक संकल्प करके ब्रह्मविद्या का आश्रय लेते हैं, ईश्वर के रास्ते पर चलते हैं त्यों-त्यों आपके ऊपर आनेवाली मुसीबतें ऐसे टल जाती हैं जैसे कि सूर्य को देखकर रात्रि भाग जाती है । 
वसिष्ठजी महाराज कहते हैं : ‘‘हे रामजी ! जिनको संसार में रहकर ही ईश्वर की प्राप्ति करनी हो, उन्हें चाहिए कि वे अपने समय के तीन भाग कर दें : आठ घंटे खाने-पीने, सोने, नहाने-धोने आदि में लगायें, आठ घंटे आजीविका के लिये लगायें एवं बाकी के आठ घंटे साधना में लगायें… सत्संग, सत्शास्त्र-विचार, संतों की संगति एवं सेवा में लगायें । जब शनैः शनैः अविद्या मिटने लगे तब पूरा समय अविद्या मिटाने के अभ्यास में लगा दें ।’’ 
इस प्रकार ब्रह्मज्ञानी सद्गुरु के कृपा-प्रसाद को पचाकर तथा आत्मविद्या को पाकर अविद्या के अंधकार से, जगत के मिथ्या प्रपंच से सदा के लिये छूट सकते हैं ।

गुरु का आदर – परम पूज्य संत श्री आशारामजी बापू

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Mantra data Guru Ka Aadar (मंत्र दाता गुरु का आदर ) – Sant Shri Asaram ji Bapu

मंत्र दाता गुरु का आदर ( भगवान वेदव्यास जी जीवन प्रसंग )

व्यासजी का भील के पुत्र से मंत्र का दान लेना ….और गुरुपद को सम्मान देना ….

नमस्ते व्यास विशाल बुद्धि ….

* नैमिषारन्य में वेद व्यास जी एकांत वास, शास्त्र लेखन व ८८००० ऋषियों को सत्संग सुनाते थे | व्यास जी सुबह सूर्योदय से पहले घूमने निकले, तो देखा कि एक शबर जाति का भील होठों से कुछ मंत्र बडबडा रहा है, उसके मन्त्र के प्रभाव से वह पेड़ झुक रहा है |

* उस बूढ़े ने खजूर के झुके हुए पेड़ से खजूर का रस निकाला | व्यास जी को आश्चर्य हुआ कि इसके पास इस मन्त्र की सिद्धि है | व्यास जी उसकी ओर तेजी से बढ़े तो वो बूढ़ा भी भांप गया कि ये मेरे से मन्त्र दीक्षा लेने आ रहे हैं, वो भी तेज़ी से भागा | वो भागते भागते घर पहुंचा और घर वालों को बोला कि भगवान वेद व्यास जी आ रहे हैं, मैं पीछे के दरवाज़े से निकल जाता हूँ, तुम उनको बहाना बनाके रवाना कर देना, तो मै आऊंगा | कुटुम्बियों ने ऐसा ही किया | व्यास जी वापिस चले गए |

* वेद व्यास जी बीसों बार गए | और बूढ़ा छटक जाये | उस बूढ़े का एक बेटा था कृपालु उसे दया आई कि आप इतने महान पुरुष, आप मेरे पिता जी से क्या लेना चाहते हैं ? व्यास जी बोले कि मैं तुम्हारे पिता से वो पेड़ झुकाने की विद्या सीखना चाहता हूँ, कृपालु बोला वो तो मुझे भी आती है मैं आपको देता हूँ |

* व्यास जी ने उससे श्रद्धा-पूर्वक मन्त्र लिया | आश्रम लौटते वक़्त व्यास जी ने मन्त्र के प्रभाव से नारियल का पेड़ झुकाया और दो नारियल ले लिए | जब वो बूढ़ा घर वापिस आया तो उसने पुछा कि तूने व्यास जी को क्या सिखाया | तो वो बोला कि मैंने उन्हें मन्त्र दे दिया | बूढ़े ने कहा उन्हें मन्त्र न देने के लिए तो मैं भागता था |

Lakshman Vs Meghnaath

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Lakshman kyu jeete or Meghnaath kyu hara? Ramji ne Meghnath ki patni ko diya uttar… asaramji bapu satsang

भगवान के लिये रोना भी एक साधन है -आसारामजी बापू

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Bhagwan ke liye rona bhi ek Sadhan hai -Pujya Asaram ji Bapu

भगवान के लिये रोना भी एक साधन है -आसारामजी बापू
१२० माला रोज जप करें और नीच कर्म का त्याग करे तो एक साल में साक्षात्कार.… 
हरी बाबा ने भक्तों को झूठ -मुठ भगवान के लिए रोने को कहाँ और फिर सचमुच सभी लोग भगवान के लिए रोने लगे.… 
अब कि बिछड़ी कब मिलेगी जाय पड़ेगी दूर …

 

 

 

योगिनी एकादशी

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योगिनी एकादशी

युधिष्ठिर ने पूछा : वासुदेव ! आषाढ़ के कृष्णपक्ष में जो एकादशी होती है, उसका क्या नाम है? कृपया उसका वर्णन कीजिये ।

भगवान श्रीकृष्ण बोले : नृपश्रेष्ठ ! आषाढ़ (गुजरात महाराष्ट्र के अनुसार ज्येष्ठ ) के कृष्णपक्ष की एकादशी का नाम ‘योगिनी’ है। यह बड़े बडे पातकों का नाश करनेवाली है। संसारसागर में डूबे हुए प्राणियों के लिए यह सनातन नौका के समान है । अलकापुरी के राजाधिराज कुबेर सदा भगवान शिव की भक्ति में तत्पर रहनेवाले हैं । उनका ‘हेममाली’ नामक एक यक्ष सेवक था, जो पूजा के लिए फूल लाया करता था । हेममाली की पत्नी का नाम ‘विशालाक्षी’ था । वह यक्ष कामपाश में आबद्ध होकर सदा अपनी पत्नी में आसक्त रहता था । एक दिन हेममाली मानसरोवर से फूल लाकर अपने घर में ही ठहर गया और पत्नी के प्रेमपाश में खोया रह गया, अत: कुबेर के भवन में न जा सका । इधर कुबेर मन्दिर में बैठकर शिव का पूजन कर रहे थे । उन्होंने दोपहर तक फूल आने की प्रतीक्षा की । जब पूजा का समय व्यतीत हो गया तो यक्षराज ने कुपित होकर सेवकों से कहा : ‘यक्षों ! दुरात्मा हेममाली क्यों नहीं आ रहा है ?’

यक्षों ने कहा: राजन् ! वह तो पत्नी की कामना में आसक्त हो घर में ही रमण कर रहा है । यह सुनकर कुबेर क्रोध से भर गये और तुरन्त ही हेममाली को बुलवाया । वह आकर कुबेर के सामने खड़ा हो गया । उसे देखकर कुबेर बोले : ‘ओ पापी ! अरे दुष्ट ! ओ दुराचारी ! तूने भगवान की अवहेलना की है, अत: कोढ़ से युक्त और अपनी उस प्रियतमा से वियुक्त होकर इस स्थान से भ्रष्ट होकर अन्यत्र चला जा ।’

कुबेर के ऐसा कहने पर वह उस स्थान से नीचे गिर गया । कोढ़ से सारा शरीर पीड़ित था परन्तु शिव पूजा के प्रभाव से उसकी स्मरणशक्ति लुप्त नहीं हुई । तदनन्तर वह पर्वतों में श्रेष्ठ मेरुगिरि के शिखर पर गया । वहाँ पर मुनिवर मार्कण्डेयजी का उसे दर्शन हुआ । पापकर्मा यक्ष ने मुनि के चरणों में प्रणाम किया । मुनिवर मार्कण्डेय ने उसे भय से काँपते देख कहा : ‘तुझे कोढ़ के रोग ने कैसे दबा लिया ?’

यक्ष बोला : मुने ! मैं कुबेर का अनुचर हेममाली हूँ । मैं प्रतिदिन मानसरोवर से फूल लाकर शिव पूजा के समय कुबेर को दिया करता था । एक दिन पत्नी सहवास के सुख में फँस जाने के कारण मुझे समय का ज्ञान ही नहीं रहा, अत: राजाधिराज कुबेर ने कुपित होकर मुझे शाप दे दिया, जिससे मैं कोढ़ से आक्रान्त होकर अपनी प्रियतमा से बिछुड़ गया । मुनिश्रेष्ठ ! संतों का चित्त स्वभावत: परोपकार में लगा रहता है, यह जानकर मुझ अपराधी को कर्त्तव्य का उपदेश दीजिये ।

मार्कण्डेयजी ने कहा: तुमने यहाँ सच्ची बात कही है, इसलिए मैं तुम्हें कल्याणप्रद व्रत का उपदेश करता हूँ । तुम आषाढ़ मास के कृष्णपक्ष की ‘योगिनी एकादशी’ का व्रत करो । इस व्रत के पुण्य से तुम्हारा कोढ़ निश्चय ही दूर हो जायेगा ।

भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं: राजन् ! मार्कण्डेयजी के उपदेश से उसने ‘योगिनी एकादशी’ का व्रत किया, जिससे उसके शरीर का कोढ़ दूर हो गया । उस उत्तम व्रत का अनुष्ठान करने पर वह पूर्ण सुखी हो गया ।

नृपश्रेष्ठ ! यह ‘योगिनी’ का व्रत ऐसा पुण्यशाली है कि अठ्ठासी हजार ब्राह्मणों को भोजन कराने से जो फल मिलता है, वही फल ‘योगिनी एकादशी’ का व्रत करनेवाले मनुष्य को मिलता है । ‘योगिनी’ महान पापों को शान्त करनेवाली और महान पुण्य फल देनेवाली है । इस माहात्म्य को पढ़ने और सुनने से मनुष्य सब पापों से मुक्त हो जाता है ।

Ekadashi Vrat Dates एकादशी व्रत तिथियाँ

Ekadashi Fast – Vrat Kathayen – एकादशी व्रत कथायें

Ekadashi Vratam

एकादशी व्रत विधि और व्रत खोलने का विधि

ब्रह्म सिध्धांत – पुराना दुर्लभ सत्संग – आशारामजी बापू

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मुख्य अंश ;

  • ब्रह्मज्ञानी ही परब्रह्म परमात्मा
  • सन्यासईश्वार प्राप्ति की और
  • संसार एक झूठा सपना, यहाँ कोई अपना
  • समय पर जाग जाओ
  • शांतमान ही आत्मज्ञान का अधिकारी
  • ध्यान- एक रास्ता ईश्वर प्राप्ति की और
  • संत सतायें तीनों जायें, तेज बल और वंश
  • वसंत ऋतूविकास का ऋतु
  • आप अमर थे, है और रहेंगे
  • ब्रह्मज्ञानी का निवास स्थानपरंतीरथ