देवउठी एकादशी – ११ नवम्बर २०१६

Ekadashiभगवान श्रीकृष्ण ने कहा : हे अर्जुन ! मैं तुम्हें मुक्ति देनेवाली कार्तिक मास के शुक्लपक्ष की ‘प्रबोधिनी एकादशी’ के सम्बन्ध में नारद और ब्रह्माजी के बीच हुए वार्तालाप को सुनाता हूँ ।
एक बार नारदजी ने ब्रह्माजी से पूछा : ‘हे पिता ! ‘प्रबोधिनी एकादशी’ के व्रत का क्या फल होता है, आप कृपा करके मुझे यह सब विस्तारपूर्वक बतायें । 

’ब्रह्माजी बोले : हे पुत्र ! जिस वस्तु का त्रिलोक में मिलना दुष्कर है, वह वस्तु भी कार्तिक मास के शुक्लपक्ष की ‘प्रबोधिनी एकादशी’ के व्रत से मिल जाती है । इस व्रत के प्रभाव से पूर्व जन्म के किये हुए अनेक बुरे कर्म क्षणभर में नष्ट हो जाते है । हे पुत्र ! जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक इस दिन थोड़ा भी पुण्य करते हैं, उनका वह पुण्य पर्वत के समान अटल हो जाता है । देवउठी एकादशी उनके पितृ विष्णुलोक में जाते हैं । ब्रह्महत्या आदि महान पाप भी ‘प्रबोधिनी एकादशी’ के दिन रात्रि को जागरण करने से नष्ट हो जाते हंप । 

हे नारद ! मनुष्य को भगवान की प्रसन्नता के लिए कार्तिक मास की इस एकादशी का व्रत अवश्य करना चाहिए । जो मनुष्य इस एकादशी व्रत को करता है, वह धनवान, योगी, तपस्वी तथा इन्द्रियों को जीतनेवाला होता है, क्योंकि एकादशी भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय है । 

इस एकादशी के दिन जो मनुष्य भगवान की प्राप्ति के लिए दान, तप, होम, यज्ञ (भगवान्नामजप भी परम यज्ञ है। ‘यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि’ । यज्ञों में जपयज्ञ मेरा ही स्वरुप है।’ – श्रीमद्भगवदगीता ) आदि करते हैं, उन्हें अक्षय पुण्य मिलता है । 

इसलिए हे नारद ! तुमको भी विधिपूर्वक विष्णु भगवान की पूजा करनी चाहिए । देवउठी एकादशी इस एकादशी के दिन मनुष्य को ब्रह्ममुहूर्त में उठकर व्रत का संकल्प लेना चाहिए और पूजा करनी चाहिए । देवउठी एकादशी रात्रि को भगवान के समीप गीत, नृत्य, कथा-कीर्तन करते हुए रात्रि व्यतीत करनी चाहिए । 

‘प्रबोधिनी एकादशी’ के दिन पुष्प, अगर, धूप आदि से भगवान की आराधना करनी चाहिए, भगवान को अर्ध्य देना चाहिए । देवउठी एकादशी इसका फल तीर्थ और दान आदि से करोड़ गुना अधिक होता है । 

जो गुलाब के पुष्प से, बकुल और अशोक के फूलों से, सफेद और लाल कनेर के फूलों से, दूर्वादल से, शमीपत्र से, चम्पकपुष्प से भगवान विष्णु की पूजा करते हैं, वे आवागमन के चक्र से छूट जाते हैं । इस प्रकार रात्रि में भगवान की पूजा करके प्रात:काल स्नान के पश्चात् भगवान की प्रार्थना करते हुए गुरु की पूजा करनी चाहिए और सदाचारी व पवित्र ब्राह्मणों को दक्षिणा देकर अपने व्रत को छोड़ना चाहिए । 

जो मनुष्य चातुर्मास्य व्रत में किसी वस्तु को त्याग देते हैं, उन्हें इस दिन से पुनः ग्रहण करनी चाहिए । जो मनुष्य ‘प्रबोधिनी एकादशी’ के दिन विधिपूर्वक व्रत करते हैं, उन्हें अनन्त सुख मिलता है और अंत में स्वर्ग को जाते हैं ।

भीष्मपञ्चक व्रत – (१० नवम्बर से १४ नवम्बर २०१६)

bhishma

||श्रीहरि:||
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
अग्निपुराण
अध्याय – २०५
भीष्मपञ्चक-व्रत

अग्निदेव कहते है – अब मैं सब कुछ देनेवाले व्रतराज ‘भीष्मपञ्चक’ विषय में कहता हूँ | कार्तिक के शुक्ल पक्ष की एकादशी को यह व्रत ग्रहण करें | पाँच दिनोंतक तीनों समय स्नान करके पाँच तिल और यवों के द्वारा देवता तथा पितरों का तर्पण करे | फिर मौन रहकर भगवान् श्रीहरि का पूजन करे | देवाधिदेव श्रीविष्णु को पंचगव्य और पंचामृत से स्नान करावे और उनके श्री अंगों में चंदन आदि सुंगधित द्रव्यों का आलेपन करके उनके सम्मुख घृतयुक्त गुग्गुल जलावे ||१-३||

प्रात:काल और रात्रि के समय भगवान् श्रीविष्णु को दीपदान करे और उत्तम भोज्य-पदार्थ का नैवेद्ध समर्पित करे | व्रती पुरुष ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ इस द्वादशाक्षर मन्त्र का एक सौ आठ बार (१०८) जप करे | तदनंतर घृतसिक्त तिल और जौ का अंत में ‘स्वाहा’ से संयुक्त ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’इस द्वादशाक्षर मन्त्र से हवन करे | पहले दिन भगवान् के चरणों का कमल के पुष्पों से, दुसरे दिन घुटनों और सक्थिभाग (दोनों ऊराओं) का बिल्वपत्रों से, तीसरे दिन नाभिका भृंगराज से, चौथे दिन बाणपुष्प, बिल्बपत्र और जपापुष्पोंद्वारा एवं पाँचवे दिन मालती पुष्पों से सर्वांग का पूजन करे | व्रत करनेवाले को भूमिपर शयन करना चाहिये |

एकादशी को गोमय, द्वादशी को गोमूत्र, त्रयोदशी को दधि, चतुर्दशी को दुग्ध और अंतिम दिन पंचगव्य आहार करे | पौर्णमासी को ‘नक्तव्रत’ करना चाहिये | इसप्रकार व्रत करनेवाला भोग और मोक्ष – दोनों का प्राप्त कर लेता है |

भीष्मपितामह इसी व्रत का अनुष्ठान करके भगवान् श्रीहरि को प्राप्त हुए थे, इसीसे यह ‘भीष्मपञ्चक’ के नाम से प्रसिद्ध है |

ब्रह्माजी ने भी इस व्रत का अनुष्ठान करके श्रीहरि का पूजन किया था | इसलिये यह व्रत पाँच उपवास आदिसे युक्त हैं ||४-९||

इसप्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘भीष्मपञ्चक-व्रत का कथन’ नामक दो सौ पाँचवाँ अध्याय पूरा हुआ ||२०५||

-ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ –

और भी सुनिये –
परम पूज्य संत श्री आशारामजी बापूजी का सत्संग

संक्षिप्त जीवन – योगिराज स्वामी लीलाशाहजी

dadaguru1

सिंधु देश समय समय पर ऐसे लालों को जन्म देता रहा है, जिन पर मनुष्य जाती को गर्व है| एक सौ तेरह वर्ष पहले एक ऐसा लाल सिंधु ने उत्पन्न किया, जिन्होंने अपनी सुगंध केवल सिंध और हिन्दी में ही नहीं, अपितु विदेशों में भी फैलाई | उन पर संधियों को गर्व है | आज भी वे अपने ह्रदय के भीतर स्वामीजी के लिए विश्वास, सम्मान एवं श्रद्धा रखते हैं और उमंग एवं उत्साह से उनकी पवित्र स्मृति में मेले लगते हैं और उनके नाम पर कुर्बान जाते हैं |

स्वामीजी का रहन सहन बिल्कुल विचित्र एवं आकर्षक था | कुछ समय पहाड़ों पर बिताकर, निचे उतरते थे और तत्पश्चात् एक शहर से दूसरे शहर तक रटन करते रहते थे | वे चेले बनाने के लिए चक्कर नहीं लगते थे और न तो धन दौलत बटोरने के लिए रटन करते थे| उन्हें अपनी कोई इच्छा तमन्ना अथवा लालच न थी | वे शिष्य तो किसी को कहते न थे | भाई शब्द उनकी जिव्हा पर था| धन दौलत इकठ्ठी नहीं करते थे, जो पैसा उन्हें मिलता, वह परोपकार के कार्यों में दे देते थे |

स्वामीजी शांत स्वरूप थे | उन्हें एकान्तवास बहुत प्रिय था| कहीं भी जाते थे तो शहर से बाहर, शोरगुल से दूर, एकांत स्थान पर रहते थे | उन्होंने बहुत तपस्या की थी और मौन का मजा प्राप्त किया था | कवि मंधाराम मस्तान ने अपनी सिन्धी कविता में ठीक ही लिखा है, जिसका अर्थ है कि “धन्य हैं वे पहाड़ और गुफाएं, जिनके भीतर आपने आसन जमाया, धन्य हैं वे जंगल, जहां आपने मजा लूटा और स्वयं में सच खोज निकला |”

“मस्ताना” ने इस महापुरुष की महिमा गाते हुए ठीक ही लिखा है – “मनठार! आप त्याग एवं तपस्या की मूर्ति थे | सादगी, संयम, सत्य के सच्चे अवतार थे| आप दया, धेर्य के एक अमूल्य झरने थे, मधुरता और आनन्द के आकर थे |”

महापुरुष कृपालु होते हैं, उनका दिल दया से पूर्ण होता है और दुःखियों के दुःख दूर करने के लिए स्वयं को कष्टों में डालते हैं| इस महान संत के रटन का भी यही कारण था | स्वामीजी का कार्य क्षेत्र अपार था | वे रटन करते हुए ज्ञान गंगा बहते रहते थे और जिज्ञासु उनका उपदेशामृत प्राप्त करके वाह-वाह करते रहते थे | उनके उपदेश का मुख्य स्वर था – “स्वयं को पहेचानो – आनन्द प्राप्त करो |”

स्वामीजी का समस्त जीवन यज्ञमय था | उनका सम्पूर्ण जीवन लोगों के हित करने में ही बीता | फूल तो बगीचे में बहुत, किंतु सदैव सुगन्धित गुलाब के फूल थोड़े, जो शोभा के साथ सुगंध देकर, लोगों के मन को शीतल करें और उनके दिमाग को ताजगी प्रदान करें |

स्वामीजी यथार्थ अर्थों में मनुष्य, लोक-उपकारक, सत् पुरूष, जगत् रूपी बाग़ के सदा बहार और कभी न कुम्हलाने वाले फूल थे | उनकी महिमा पूर्ण रूप से वर्णन करने की इस लेखनी में शक्ति नहीं |

स्वामीजी का जन्म सिंधु प्रान्त के हैदराबाद जिले के टंडे बागे तहसील में महराब चांदिए नामक गाँव में ब्रह्म क्षत्रिय कुल में २३ फाल्गुन संवत १९३७ (सन् १८८० ई. ) में हुआ था | उनके पिता का नाम श्री टोपणदास और माता का नाम श्रीमति हेमीबाई था | नामकरण संस्कार में लीलाराम नाम निकला था |

अभी ५ वर्ष के ही बालक थे कि उनकी माता परलोक सिधार गई | लीलाराम लगभग १० वर्ष के हुए तो उनके पिता का भी स्वर्गवास हुआ |

उस समय कई लोगों को शिक्षा लेने का चाव न था और न आवश्यक सुविधाएं ही थीं | अतः इस बालक को बी स्कूल की कोई शिक्षा प्राप्त न हुई | अभी १२ वर्ष के ही हुए कि उन्हें उनकी बुआ के बेटे भाई लखुमल की दुकान पर छोड़ा गया |

स्वामीजी को पूर्व जन्म के संस्कारों से बचपन में ही इश्वर प्रेम की लगन थी | तब आप मंदिरों में जाते थे, संतों के संग में रहने की रूचि रखते थे तथा इश्वर नाम स्मरण, और कीर्तन किया करते थे |

संत रतन भक्त ने शरीर छोड़ा तो उनकी गद्दी पर उसके चेले भक्त तौंरमल को बिठाया गया | कुछ समय पश्चात् उसकी मृत्यु हो गई | इस पर दरबार के शिष्य सेवकों ने श्री लीलाराम को लाकर गद्दी पर बिठाया, किन्तु वहां मन न लगा | प्रभु की खोज करने की उनकी तमन्ना थी, अतः उन्होंने सांसारिक सभी बातों को छोड़ने का निश्चय किया |

अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिये वे टंडो जान मुहम्मद पहुंचे और अपने बहिनोई के भाई आसंदास के घर में रहने लगे | वहां हिन्दी भाषा सीखी और तत्पश्चात् वेदांत के ग्रंथों के अभ्यास में लग गये |

नगर के बाहर संत हंस निवार्ण का आश्रम था, जहां एक बड़े विद्वान और ज्ञानी पुरूष स्वामी परमानन्द जी रहते थे | उनसे उनहोंने बहुत कुछ प्राप्त किया | श्री लीलाराम एक और विद्या में उन्नति करते गये, दूसरी और उनमें त्यागवृति बढ़ती गई | श्री लीलाराम के चचेरे भाइयों और बहिनोई को यह बात अच्छी न लगी, अतः उनकी सगाई की बातें चलने लगी | किन्तु श्री लीलाराम ने उन्हें स्पष्ट बता दिया कि “मैं आयु पर्यंत ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करूँगा और सन्यासी होकर रहूंगा |”

उसके पश्चात् वे लोक लाज छोड़कर खादी के कपड़े पहनकर टंडो जान मुहम्मद खान में संत श्री केशवरामजी के पास पहुंचे और उनसे आध्यात्मिक विद्या प्राप्त करने लगे | बहुत सा समय आत्म चिन्तन में बिताते थे | उस समय वे साधु लीलाराम के नाम से चारों और प्रसिद्ध हो गये थे | तत्पश्चात् गुरु की आज्ञानुसार उनहोंने तलहार में आकर संत रतन भक्त का स्थान बसाया |

थोड़े समय बाद साधु लीलाराम जी उत्तर भारत में पहाड़ों पर चले गये | वहां सन्तों, महात्माओं और योगियों का खूब संग किया | कई वर्ष हरिद्वार, ऋषिकेश, उत्तरकाशी, हिमालय की गुफाओं, तिब्बत आदि स्थानों का रटन करते रहे | अब वे साधु लीलाराम के नाम से नहीं अपितु स्वामी लीलाशाह जी के नाम से प्रसिद्ध होते गये |

स्वामी जी अब लोक सेवा के कार्यों की ओर अधिक ध्यान देने लगे | सिन्धु के दक्षिण भाग में योग क्रियाओं के साथ राष्ट्र भाषा हिन्दी के प्रचार पर बल देते रहे | कन्या पाठशालाएं खुलवाई| लाड़ में हरिजन उद्धार के लिए स्वामी जी ने बहुत प्रयत्न किया | उत्तर काशी में कई पुल बनवाये, अतः ग्रामीण लोग उन्हें बहुत आशीर्वाद देने लगे | उसके पश्चात् स्वामीजी समस्त सिन्ध में रटन करते रहे और जिज्ञासुओं को आत्मज्ञान देते रहे |

स्वामीजी ने सिन्धी साहित्य की भी महान सेवा की| कुछ छोटी पुस्तकें उन्होंने स्वयं लिखीं| उनकी प्रेणना से सिन्ध में वेदान्त प्रचार मण्डल स्थापित हुआ | कराची से प्रोफेसर गोकुलदासजी भागिया के सम्पादकत्व में एक उच्च कोटि का मासिक पत्र “तत्वज्ञान” प्रकाशित होने लगा |

सन् १९४७ ई. में देश के विभाजन के पश्चात् सिन्धी भटकने लगे और बहुत ही दुःखी रहने लगे |

स्वामीजी ने उसी समय जल्दी जल्दी दौरे करके सिन्धियों का मार्गदर्शन किया और उनके बसने में भी सहायता की | उन्हें समझाया कि दुःख परीक्षा के लिए आते हैं, अतः शान्ति अवं शुक्र न छोडिये |

कुछ वर्षों बाद उनकी प्रेणना से अजमेर से सिन्धी में “आत्मदर्शन” नामक मासिक पत्र प्रकाशित होने लगा, जिसके सम्पादक श्री प्रभुदास ब्रह्मचारी जी रहे | दिसम्बर १९७७ में उनका देहावसान हो गया और बाद में दीपचन्द्र बेलानी “आत्मदर्शन” का सम्पादन व संचालन करने लगे | अप्रैल १९९८ में उनके देहावसान के बाद भी पत्रिका का कार्य सुचारू रूप से चल रहा है |

स्वामी जी की यात्राएं भारत तक ही सीमित नहीं रही | वे ३ जनवरी १९६१ ई. में मलाया की यात्रा पर गये | सिंगापुर, कोलालम्पुर और अन्य नगरों में जाकर वेदान्त एवं योग संदेश दिया | दूसरी बार ९ फरवरी १९६१ और तीसरी बार भी २८ सितम्बर १९७२ ई. में वे हांगकांग की यात्रा पर गये और वहां से जापान, मलेशिया, सिंगापुर, फिलपाईन, जकार्ता और कोलम्बो में अपने उपदेशामृत की वर्षा की | वहां टी.वी. पर योगासन और योग क्रियाएं भी करके दिखाई |

स्वामी केवल ज्ञानी नहीं थे, किन्तु महान देशभक्त और कर्मयोगी भी थे | आप स्वदेशी व्रत का पालन करने वाले थे और सदैव खादी का प्रयोग करते थे | स्वतन्त्रता से पहले आपने इंडियन नेशनल कोंग्रेस को सुदृढ़ बनाने में सदैव योगदान दिया और सिन्ध में विधान सभा के लिए जो चुनाव हुए, उसमें कोंग्रेस को विजयी बनाने में आपका भी बड़ा हाथ रहा |

चीन के आक्रमण के कारण राष्ट्र रक्षाकोश में आपने स्वयं तो चन्दा दिया ही और लोगों को भी उदारता से धन देने की प्रेरणा करते रहे |

स्वामीजी जहां जाते थे, वहां लोगों को योगिक क्रियाएं सिखाते थे और प्राकृतिक साधनों से स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए प्रेरित करते रहते थे | स्वामीजी के शिष्य एवं श्रद्धालु केवल सिन्धी लोग ही नहीं है, अपितु अन्य जातियों के भी हैं |

आपकी प्रेरणा से ही गौशालाएं, व्यायामशालएं, सत्संग, धर्मशालाएं आदि शुभकार्य विभिन्न स्थानों पर होते रहते और अब भी चल रहे हैं | आगरा में आपकी प्रेरणा से स्थापित “श्रीकृष्ण गौशाला” एक आदर्श गौशाला है | उसके साथ एक कुआं, खेत, बगीचा, अतिथिगृह, सत्संग सभा तथा पुस्तकालय भी है |

वैसे स्वामीजी कद के छोटे थे| आपका रंग सांवला था | मुँह पर चेचक के दाग़ थे | देखने में भोले-भाले थे, फिर भी आपका व्यक्तित्व अत्यन्त ही आकर्षक था | आपके नेत्रों में विचित्र चमक थी | आपके असंख्य अनुयायी और श्रद्धालु थे, फिर भी आप में कोई अभिमान नहीं था, नम्रशील थे | आपका वाणी पर बहुत संयम था | संभल-संभल कर धीरे-धीरे बोलते थे | आपके उपदेशों में कोई दिखावा न था | आप जो कुछ बोलते थे, वह आपके दिल के तहों से निकलता था | अतः श्रोताओं पर आपके प्रवचनों का अच्छा प्रभाव पड़ता था |

आपका व्यक्तिगत जीवन बड़ा ही उच्च कोटी का था | आपका रहन सहन बिल्कुल सादा था | जो खादी का एक चोगा पहनते थे, वह भी स्वयं ही सी लेते थे | कई श्रद्धालु और शिष्य उनकी सेवा करने को तरसते थे, लेकिन आप किसी से भी अपनी सेवासुश्रुषा नहीं लेते थे| अपने कपड़े भी स्वयं ही धोते थे |

गर्मियों के दिनों में नैनीताल पहाड़ पर रहते हुए जलाने के लिए लकड़ियां स्वयं चुन लाते थे | थकावट होने पर टांगों को थपकियां स्वयं लगाते थे | निचे कोई नर्म गद्दा आदि नहीं बिछाते थे |

आपका भोजन बहुत ही सादा था, वह भी दिन में केवल एक बार | रोटी बहुत चबाकर खाते थे | प्रायः नंगे पाव चलते थे | किन्तु १०-१२ वर्ष की आयु में भी चलने में ऐसे तेज़ थे कि जवान भी पीछे रह जाते थे प्रतिदिन कई मील टहलते थे और आसन एवं योग की क्रियाएं करते थे | इन्द्रिय संयम ही उनके स्वास्थ्य का रहस्य था |

स्वामीजी यदि चाहते तो सब प्रकार की सुख सामग्री उनके लिए उपस्थित हो सकती थी, किन्तु वे वितरागी महात्मा थे | उन्होंने अपने लिए कही भी कोई स्थान नहीं बनवाया |

स्वामी जी की यह शिक्षा नहीं थी कि लोग घर छोड़कर जंगल में बसें अथवा सन्यासी बनकर रहें | वे प्रवचनों में कहा करते थे:-

काहे रे वन खोजन जाई,
सर्व कला समर्थ अलेपा,
सदा तोही संग सहाई |

वे प्रवचनों की समाप्ति पर श्रोताओं से प्राथना करवाते थे-

हे भगवान! हमें सुबुद्धि दो, शक्ति दो, निरोगता दो ताकि अपना अपना कर्तव्य पालन करके सुखी रहें |”

ऐसे महान योगी अवं सन्त ९४ वर्ष की आयु में ४ नवम्बर १९७३ (८ कार्तिक संवत २०२०) प्रातः पालनपुर (गुजरात) में ब्रह्मलीन हुए | उनके पार्थिव शरीर को आदिपुर (गांधीधाम) के ‘स्वामी लीलाशाह आश्रम’ में भूमि समाधि दी गई |

स्वामीजी अब शारीरिक रूप से इस संसार में नहीं रहे, लेकिन उनका नाम इस संसार में सदैव अमर रहेगा | स्वामीजी की स्मृति में कई नगरों एवं गांवों में कार्य केन्द्र चल रहे हैं | देश विदेश में उनका जन्म दिवस और वर्षगांठ उत्साह से मनाये जाते हैं | आदिपुर समाधि स्थल पर निवार्ण दिवस के उपलक्ष में तीन दिन मेला लगता है, जिसमें हजारों श्रद्धालु सम्मिलित होते हैं |

भगवान हम सबको शक्ति एवं सदबुद्धि प्रदान करे ताकि हम स्वामीजी के जीवन से प्रेरणा लेकर सच्चे मानव एवं सेवक बनने का प्रयत्न करें और अपने मनुष्य जीवन को सफल बनाने के मार्ग में आगे बढ़ते रहें, इसी में ही सबका कल्याण निहित है |

आँवला (अक्षय ) नवमी है फलदायी… (९ नबम्बर २०१६ )

aanvalaआँवला (अक्षय)  नवमी है फलदायी

भारतीय सनातन पद्धति में पुत्र रत्न की प्राप्ति के लिए महिलाओं द्वारा आँवला नवमी की पूजा को महत्वपूर्ण माना गया है। कहा जाता है कि यह पूजा व्यक्ति के समस्त पापों को दूर कर पुण्य फलदायी होती है। जिसके चलते कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की नवमी को महिलाएं आँवले के पेड़ की विधि-विधान से पूजा-अर्चना कर अपनी समस्त मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए प्रार्थना करती हैं।

vishnu_24आँवला नवमी को अक्षय नवमी के रूप में भी जाना जाता है। इस दिन द्वापर युग का प्रारंभ हुआ था। कहा जाता है कि आंवला भगवान विष्णु का पसंदीदा फल है। आंवले के वृक्ष में समस्त देवी-देवताओं का निवास होता है। इसलिए इस की पूजा करने का विशेष महत्व होता है।

व्रत की पूजा का विधान :-

अक्षय नवमी पूजा मुहूर्त – सुबह ६: ४२ से  दोपहर १२ : २२ तक 

* नवमी के दिन महिलाएं सुबह से ही स्नान ध्यान कर आँवलाके वृक्ष के नीचे पूर्व दिशा में मुंह करके बैठती हैं।
* इसके बाद वृक्ष की जड़ों को दूध से सींच कर उसके तने पर कच्चे सूत का धागा लपेटा जाता है।
* तत्पश्चात रोली, चावल, धूप दीप से वृक्ष की पूजा की जाती है।
* महिलाएं आँवले के वृक्ष की १०८ परिक्रमाएं करके ही भोजन करती हैं

आँवला नवमी की कथा :-
वहीं पुत्र रत्न प्राप्ति के लिए आँवला पूजा के महत्व के विषय में प्रचलित कथा के अनुसार एक युग में किसी वैश्य की पत्नी को पुत्र रत्न की प्राप्ति नहीं हो रही थी। अपनी पड़ोसन के कहे अनुसार उसने एक बच्चे की बलि भैरव देव को दे दी। इसका फल उसे उल्टा मिला। महिला कुष्ट की रोगी हो गई।

इसका वह पश्चाताप करने लगे और रोग मुक्त होने के लिए गंगा की शरण में गई। तब गंगा ने उसे कार्तिक शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को आँवला के वृक्ष की पूजा कर आँवले के सेवन करने की सलाह दी थी।

जिस पर महिला ने गंगा के बताए अनुसार इस तिथि को आँवला की पूजा कर आँवला ग्रहण किया था, और वह रोगमुक्त हो गई थी। इस व्रत व पूजन के प्रभाव से कुछ दिनों बाद उसे दिव्य शरीर व पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई, तभी से हिंदुओं में इस व्रत को करने का प्रचलन बढ़ा। तब से लेकर आज तक यह परंपरा चली आ रही है।