सर्वश्रेष्ठ कौन ? -प.पू.संत श्री आशारामजी बापू

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सर्वश्रेष्ठ कौन ?

धन्य माता पिता धन्यो, गोत्रं धन्यं कुलोदभव,
धन्या च वसुधा दैवी, यत्रस्यात गुरुभकततः । ।
………. हरी ॐ हरी ॐ हरि ॐ (देव-हास्य प्रयोग)

        हरि सम  जग कछु वस्तु नहीं, प्रेम पंथ सम पंथ
सदगुरु  सम सज्जन नहीं गीता सम नहीं ग्रन्थ ।

हरि…….. जो हर देश में,  हर काल में, हर वस्तु में, हर व्यक्ति में प्राणरूप चैतन्य परमेश्वर है उसका नाम है हरि  ।  हरि के समान ये जगत कोई महत्वपूर्ण वस्तु नहीं है  । हरि को महत्व न देकर जगत को महत्व देते है इसीलिए जगत हावी हो जाता है, दुःख देता है, तनाव देता है -मानसिक तनाव, शारीरिक तनाव, बौधिक तनाव  । इनका कोई वैज्ञानिक उपाय नहीं है| नींद की गोलिया देते हैं| मनोवैज्ञानिक कभी कुछ घुमा फिर कर दवाइयों की तरफ ले जाते हैं| इन सभी तनावों से मुक्त होना हो तो सत्संग है और हरि का महत्त्व समझ में आ जाये तो मानसिक तनाव, शारीरिक तनाव और बौधिक तनाव की पोल खुल जाती है| अपने शरीर की योग्यता से अधिक श्रम करेंगे कि मुझे अधिक फल मिले और अधिक सुखी हो जाऊं अधिक सुख का दरिया अंतरात्मा में है.. हरि में है ।

हरि सम जग कछु वस्तु नहीं
महान सिकंदर यात्रा करते करते उस जगह पर पहुंचा जहाँ तीनो तनाव दूर से भाग जाएँ ऐसे हरि मे विश्रांति पाए हुए.. ऐसे डायोजनिस का क्षेत्र… संत को दया आ गयी संकरी गली से जहाँ से सिकंदर गुजरने वाला था उसने अपने पैर पसारे रास्ता रोक कार्यक्रम कर दिया| मंत्रियों ने बता दिया कि कोई है अलबेला संत.. पैर पसार के लेट गए हैं.. रास्ता रोक कर बंद कर दिया उन्होंने ।
” हूँ…… महान सिकंदर का रास्ता बंद… कौन है वो ?”
” पधारिये ”
आग बबूला होते हुए आया था वो, क्योंकि जगत और शरीर को सच्चा मानने का अज्ञान था लेकिन एक मध्यरात्री (अमावस्या की और पूनम की मुलाकात ) शरीर को ‘मै’ मानना और दूसरों की कत्ले-आम करके और मिल्कियत लूट कर बड़ा बनाना इस अन्धकार में.. समझ के अंध घोड़े पर रवाना हो चूका था अपने को ही बोलता था कि मैं महान सिकंदर हूँ ।
वो, जिसको “हरि सम जग कछु वस्तु नहीं” ऐसी समझ हो गयी थी, ऐसे महापुरुष की आँखों में झाँका । बड़ी मादकता छलक रही थी, बड़ा प्रेम प्रसारित हो रहा था । आया था आग बबूला लेकिन नजर पड़ते ही शीतल लहर दौड़ गयी शरीर में ।
“आप कौन हैं? इधर पैर पसार कर लेटे हुए ?”
महापुरुष ने चोट की| “तू कौन है ?” आप नहीं, तू कौन है । लेकिन हरि में स्थित थे डायोजनिस ।
“मैं महान सिकंदर हूँ, विश्व-विजेता ….. आगे से आगे बढ़ रहा हूँ ।”
मसखरी के लहजे में, हंस पड़े संत, “अच्छा! महान सिकंदर और विश्व-विजय ? पागल है, आज तक किसी ने विश्व विजय किया है क्या ? जिसने भी कोशिश किया,  विश्व विजय करते करते अधूरे मर गए| विश्व विजय कहाँ होती है ? सिकंदर! जब भी विजय होती है, अपने पर होती है । दुःख आये, सुख आये, विकार आये, चिंता आये, इनके आने जाने पर जो विजय पा लेता है, वही विजयी होता है । जैसा ख्याल आये, चल पड़े तो पतंगा भी जानता है, कुत्ता भी जानता है । जैसा विचार आया उधर पूंछ हिलाई, ऐसे लोग विजयी नहीं होते हैं| अपने पर जो विजय पा ले वही विश्व-विजयी माने जाते हैं । अपने पर विजय करना आसान है.. विश्व पर विजय करना असंभव है।
बुद्धिमान तो था लाखों लोगों की सेना को नियंत्रण करता था पर निरुतर हो गया । टुकुर टुकुर उस महापुरुष को देख रहा है कि बात तो तुम्हारी ठीक लगती है । बोले, “अपने पर विजय पा ले तू।“
बोले- “मेरा एक सवाल है| तुम्हारे पास सेना नहीं है, राजमहल नहीं है, दासियाँ और रानियाँ नहीं है । जिनके पास ये सब कुछ होता है वो उतने खुश नहीं होते जितने तुम खुश नजर आ रहे हो । इसका क्या रहस्य है ?” बोले- “यही रहस्य है अपने पर विजय….. तुम्हारा सूत्रधार कौन है ? अहंकार सूत्रधार है तो नचाएगा, मार-काट कराएगा । काम तुम्हारा सूत्रधार है तो कमर तोड़ेगा, लोभ सूत्रधार है तो संग्रह-संग्रह कराएगा । तुम्हारे सूत्रधार तुमको नचाने वाले काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद-मत्स्य, अहंकार अगर ये तुमको नचा रहे है तो विशव-विजय नहीं ये बड़ी विश्व-पराजय है । लेकिन तुम इनके अधीन नहीं होते और तुम्हारा सूत्रधार हरि है तो सिकंदर, बेशक विश्व विजयी हो जाओगे । तुम्हारे रथ का संचालक कौन है? लोफर, बदमाश, लफंगे हैं कि श्री हरि हैं ? “
ध्यान से सुनना, एक तो अपना संकल्प ऊंचा होना चाहिए, नीचा नहीं होना चाहिए । नीच संकल्प तुमको देर सवेर नीचा गिरा देगा । संकल्प ऊंचा होना चाहिए । दूसरी बात कि संकल्प दृढ होना चाहिए और तीसरी बात संकल्प जहाँ से उठता है वहां आराम पाने की कला आ जाये, निसंकल्प हो जाये वो आदमी विश्व-विजयी हो जायेगा । इसके अलावा विश्व-विजयी होने का कोई दूसरा उपाय नहीं है ।
श्रीकृष्ण कहते हैं – आत्मन: आत्मनो बंधू वो आदमी अपने आप का बंधू है जो अपने अन्तर आत्मा में विश्रांति पाता है । शुभ संकल्प, दृढ संकल्प और नि-संकल्प ये तीन बात आ गयी तो खाली हाथ व्यक्ति, अनपढ़ व्यक्ति लेकिन दुनिया उसके पीछे चलेगी और हथियार हैं, गाड़ियाँ है , मोटरें है, सोने की लंका है, लेकिन रावण तीरों का निशाना बन गया विश्व-विजयी नहीं हुआ । हिरन्यकश्यप ने सोने की हिरान्यपूर नगरी बनाई लेकिन नरसिंह के कोप का निशाना बन गया मारा गया । प्रहलाद निहत्थे थे और सन्मान मिला शाबरी भीलन निहत्थी थी, गुरु के द्वार गयी तो श्री राम जी शबरी के झूठे बेर खा रहे हैं । मीरा का तो जेठ विरोधी था, राज्य विरोधी, सिपाही विरोधी । निंदा करने वालों की संख्या का कोई अंत नहीं फिर भी मीरा विश्व-विजयी हो गयी । विष अमृत हो गया, सांप नौलखा हार हो गया । मुसीबत देनो वालो से मीरा के हृदय में मुसीबत नहीं आयी ।

डायोजनिस बोलते है कि विश्व-विजय – शुभ संकल्प, दृढ-संकल्प और नि-संकल्प से होती है । किसी को मार के, काट के, छीन के,  ढेर बना के ऊपर बैठ गए तो विश्व-विजय नहीं है तुम्हारी । शैतान का तू बंदी है । अहंकार शैतान है । मैं बड़ा हूँ, मैं बड़ा हूँ …I shout you shout. Who will carry dirt out? “मैं भी रानी, तू भी रानी, कौन भरेगा घर का पानी” जहां दो महिलायें घर में महत्वाकांक्षी होती है उस घर में तो तौबा हो जाती है । जहाँ दो भाई विपरीत इरादे के हैं तो वो घर नरक बन जाता है लेकिन जहाँ दसियों आदमी संवादित है तो वो घर वैकुण्ठ हो जाता है ।
हरि सम जग कछु वस्तु नहीं, प्रेम पंथ सम पंथ
परमात्मा प्रेम का पंथ ऐसा सुंदर है.. ऐसा सुहाना है कि आप नरक में जाओ तो नरक भी स्वर्ग में बदल जाये, अपने अन्दर में छुपे हुए प्रेम को उभारो, बांटो, चमकाओ । एम् छे.. एम् छे… फलाना छे…. ऐसा करके फ़रियाद और नकारात्मक विचारों के गंदगीमय ढक्कन मत खोलो ।

सर्वश्रेष्ठ कौन ?
देवलोक में सभा हुई कि इस समय इस युग में धरती पर सब से श्रेष्ठ महापुरुष कौन है, जो हर परिस्थति में, हर वस्तु में, हर व्यक्ति में, हर प्राणी में, हर जीव-जानवर में कितनी भी बुराई हो फिर भी अच्छाई खोज कर खुश रहता है और खुश रख सकता है, ऐसा विश्व-विजयी धरती पर कौन है ? कई संतो के, महापुरुषों के नाम आये लेकिन उसमें सर्वोपरि नाम, महापुरुषों के महापुरुष श्रीकृष्ण का नाम आया कि श्रीकृष्ण विश्व-विजयी हैं । विश्व की कोई परिस्थति श्रीकृष्ण को दुख नहीं दे सकती और  विश्व की कोई परिस्थिति श्रीकृष्ण को आकर्षित नहीं कर सकती । गंदे से गन्दी वस्तु हो, परिस्थिति हो , उसमे अच्छे को देखकर अपने हृदय में से अच्छाई को छलका दें, वो श्रीकृष्ण हैं । भूरी भूरी प्रशंसा की । दुसरे देवों को लगा कि ऐसा कैसे हो सकता है? गंदे में गन्दा प्राणी हो जीव हो, जानवर हो उसमें से  श्रीकृष्ण अच्छाई निकाल लेते हैं । “मैं श्रीकृष्ण की परीक्षा लूँगा|” जैसे सिकंदर की संकरी गली में डायोजनिस ने पैर पसार लिए, ऐसे ही उस देवता ने, जहाँ श्रीकृष्ण वृन्दावन की कुञ्ज गलियों से गुजर रहे थे, संकरी गली में उस देवता ने कुत्ते का रूप धारण कर लेट गया । कुत्ता भी ऐसा कि पूंछ कटी है , शरीर पर घाव पड़े हैं, चर्म रोग ऐसा कि कुत्ते के सारे बाल ही जिस्म में चले गए हैं, देवता ने संकल्प करके ऐसा भद्दा, ऐसा भद्दा रूप बनाया कि श्रीकृष्ण ऐसे गंदे शरीर मे क्या अच्छा देखते । बोले-“परीक्षा करनी है|” मख्खियां भिनभिना रही हैं, सफेद कीड़े घावों पर छटपटा रहे हैं, शरीर से बदबू आ रही है जो निकले, नाक दबोच कर निकले । छी… छी….छी.. कितना पापी, कितना गन्दा, कितना अभागा| सब अपना दिल गन्दा करके जा रहे हैं ।
श्रीकृष्ण कहते हैं – “तुम्हारा चेहरा क्यों ख़राब करते हो ?” बोले – “ देखो श्रीकृष्ण! ये कितना पापी जीव है? कितना गन्दा है? कितना अभागा है ?” श्रीकृष्ण कहते है, “अरे पागल! देखो, उसके दांत कितने चमक रहे है,  उन्हें देख कर आनंदित नहीं हो सकते हो ? दांत तो चमक रहे है, ऐसी अवस्था में भी उसके दांत चमक रहे है, ये भी तो उसके किसी पुण्य का फल है न ? इसलिए प्रसन्न रहो । “
श्रीकृष्ण ने अपने पर विजय पायी थी, अपने दिल को बुरा नहीं होने देते थे । महाभारत का युद्ध होता है, बंसी बजाई, घोड़ों की मालिश कर रहे हैं, घावों को भर रहे हैं, तीर निकाल रहे हैं और प्रसन्न हो रहे हैं कि ये भी कर्मयोग हो रहा हैं । कुब्जा जा रही है धुल उडाती जा रही है कुब्जा, उसके सुंदर सुहावने बाल मटमैले हो रहे है और श्री कृष्ण कहते हैं – “ सुन्दरी..” उसने देखा कि मैं तो कुब्जा हूँ, कुरूप हूँ । ये तो छोरे छोरे आ रहे है कोई सुन्दरी तो दिखती नहीं…. अपना क्या ? फिर चली तो श्रीकृष्ण कहते हैं “ ऐ सुन्दरी!”  फिर से झाँका तो  ‘सुन्दरी …सुन्दरी ।“ –श्रीकृष्ण ने कहा, “सुना अनसुना करती है क्या ?”  वह बोली- “बोलो सुंदर …” बोले- “कंस को अंगराज लगाती हो, मालिश कराती हो, स्नान कराती हो , हमें भी लगा दो जरा अंगराज|” बोली – “ लो सुंदर” श्रीकृष्ण ने तो तिलक किया अपने ग्वाल मित्रों को भी किया । कुब्जा तो कुबड़ी थी कुबड़ी| श्रीकृष्ण ने कुब्जा के पैर पर अपना पैर रखा और उसकी ठोड़ी, मुंडी पकड़ के यूं झटका दिया तो कुब्जा सीधी और सुंदर हो गई । किसी भी शास्त्र और पुराण में ये नहीं आता कि कुब्जा ने किसी जन्म में कोई तपस्या की थी और उसका फल श्रीकृष्ण का स्पर्श और सौन्दर्य मिल गया ।
नहीं, जो अपने पर विजयी है जिसने
हरि सम जग कछु वस्तु नहीं, प्रेम पंथ सम पंथ
सदगुरु सम सज्जन नहीं, गीता सम नहीं ग्रन्थ

ये समझ लिया । जैसे चंद्रमा अनायास शीतलता बरसाता है, सर्दियों में अनायास ठंडी हवायें चलती हैं, दरिया मे अनायास लहरे उठती हैं, ऐसे ही जिसने आत्मविश्रांति पायी है, अपना सौन्दर्य पाया है उस पुरुष की आँखों से, उस पुरुष को छू कर आने वाली हवा भी दो काम करती है एक तो उसका स्पर्श गुण है और दूसरा जहाँ से गुजरेगी वहां की गंध बांटती हुई जाएगी । गुलाब से गुजरेगी तो गुलाब बांटेगी| डीजल से गुजरेगी तो डीजल बांटेगी| पेट्रोल से गुजरेगी तो पेट्रोल बांटती जाती है । तो केवल बाहर का स्पर्श और गंध नहीं, उसके श्वासोश्वास से आपके विचारों का कुप्रभाव सुप्रभाव भी बांटती हुई जाती है । तो जितने कुप्रभाव वाले लोग हैं उनके दर्शन सानिध्य से भी सुप्रभाव वाला भी विचलित हो जाता है और जितने सुंदर प्रभाव वाले संत महात्मा उनके संपर्क से जो हवा गुजरती है वो वातावरण को खुशनुमा कर देती है । इसी बात को कबीर जी ने कहा –
“कबीरा दर्शन संत के, साहिब आवे याद ।
लेखे में वही घड़ी, बाकी के दिन बाद||”

फिर से चलते हैं डायोजनिस के पास, सिकंदर कहता है – “तुम्हारी बाते तो अच्छी लगती हैं लेकिन एक बार मुझे विजयी तो होना है|” बोले – “विजय करके तू वापिस नहीं लौट सकता है|”
“मुझे तुम्हारी बात अच्छी लगती है जो तुमने पाया वो मैं पाना चाहता हूँ सत्संग के द्वारा आत्मविजय  । बड़ा सुखी जीवन है तुम्हारा, तुम को छू कर आ रही हवायें भी सुख फैलाती हैं तुम्हारी आँखों से भी सुख की तरंगे फैल रही हैं तुम्हारे श्वासोश्वास से भी सुख फैलता है । मैं मानता हूँ लेकिन ….क्या मैं अब जा सकता हूँ ?”
“ हाँ , जाओ, पर वापिस नहीं लौटोगे”
और फिर वापिस नहीं लौटा रास्ते में ही मर गया । बाहर विजय करके कोई वापिस लौटा हो, संभव नहीं । मौत की खाई में ही गया  । सोने की लंका मिल गयी, सोने की हिरान्यपूरी मिल गयी लेकिन सत्संग नहीं मिला तो धिक्कार है उस मिले हुए पर ।
शबरी भीलन को मतंग गुरु का सत्संग मिला है, मीराबाई को रैदास गुरु का सत्संग मिला है, रजा जनक को अष्टावक्र गुरु का सत्संग मिला है, राजा परीक्षत को शुकदेवजी का सत्संग मिला है, देव ऋषि नारद को संतो का सत्संग मिला है । देव ऋषि नारद कहते है कि अगले जनम में मैं दासी-पुत्र था | बाल्यकाल में पिताजी मर गए मैं तब पांच साल का था । माँ गुलामी करती थी पक्की नौकरी नहीं थी कोई भी बुला लेवे एक दिन, दो दिन, चार दिन नौकरी करने हेतु । कहीं संत पधारे थे । उनके सत्संग में पानी छांटना, बुहारी लगाना, मेरी माँ की वहां सेवा थी । पांच साल के बच्चे को घर पे क्या छोड़ जाये तो साथ में ले जाती थी । माँ तो पैसे के कारण चाकरी में व्यस्त थी और मैं वहां बैठा रहता था संत के दर्शन करने हेतू । जाति छोटी थी, उम्र छोटी थी, अक्ल छोटी थी, विद्या तो थी नहीं लेकिन बड़े में बड़े हरि में शांत हुए, हरि को छू कर आने वाले सत्संग की वाणी से मेरे कान पवित्र हुए, मेरे नेत्र पवित्र हुए और जब संत सामूहिक कीर्तन कराते तो सत्संग के तुमुल ध्वनी के प्रभाव से मेरा तन पवित्र, मन पवित्र हो गया| जब संत जा रहे थे तो मैनें कहा “बापजी मने साथ ले चलो, थारी सेवा करने”  बोले- “अभी छोटा है, घर में रह कर भजन करना|” मैंने कहा – “घर में मेरी माँ| माला करने बैठूंगा तो बोलेगी ये क्या करता है ? सत्संग में जाऊँगा तो रोकेगी|” बोले- “नहीं, रोकेगी नहीं, रोके तो भी तुम करते रहना । भगवान की भक्ति का रास्ता मिला है तो छोड़ना नहीं और तेरे को विघ्न करे तो माँ का स्वभाव या तो भगवान बदल देंगे नहीं तो भगवान उसका शरीर बदल देंगे । भगवान अपने भक्तों की रक्षा करते हैं, आज से तेरा नाम हरिदास रखते हैं । ले प्रसाद|” संत के हाथ की चीज मिल गयी । अब वो हरिदास “हरि….हरि…हरि..हरि” जपता है । थोड़े दिन में माँ ने रोकना-टोकना चालू किया । भैंस को चारा डालने गई| उसमे बैठा था गोप महाराज! गोप महाराज मतलब नाग महाराज| ज्योंही चारा लेने गई तो नाग देवता दबे और काटा । मैं तो कुछ जानता नहीं था| पंचो को बुलाकर कहा – जैसे आपको ठीक लगे करो । पंचों ने उसकी अन्त्येष्टी की, जो चीज घर पर थी, बेची, करी । दिशाओं का पता नहीं था लेकिन मैं उत्तर दिशा की तरफ चल पड़ा । हरि…हरि…हरि…हरि .. हरि सम जग कछु वस्तु नहीं । जगत में तो सब मरने वाले आते हैं| ऐसा कोई संयोग नहीं जिसमे वियोग न हो| ऐसा कोई शरीर नहीं जिसकी मौत न हो | ऐसा कोई सम्बन्ध नहीं जिसका वियोग न हो| ऐसा कोई सुख नहीं जो दुःख में न बदले| ये संसार सपना है| सत्संग की बात याद आती थी सब सपना है और उसको देखने वाला हरि मेरा अपना है । शरीर मरने के बाद भी जीवात्मा में साथ हरि का सम्बन्ध रहता है । कुटुम्बियों का सम्बन्ध तो अग्नि-संस्कार होते ही कट जाता है लेकिन आत्मा और परमात्मा.. हरि का सम्बन्ध रहता है । हरि सम जग कछु वस्तु नहीं –जगत तो बनता बिगड़ता रहता है, दुःख देता है, कर्म बंधन देता है लेकिन हरि बनते नहीं, बिगड़ते नहीं, कर्म-बंधन नहीं देते । भक्ति का रस देते है, सत्संग देते हैं और अपने से मिलाते हैं| हरि सम जग कछु वस्तु नहीं, प्रेम पंथ सम पंथ|| हरि मेरे अपने हैं । अगले जन्म के पिता नहीं है| अगले जन्म की माता नहीं है| अगले जन्म के रिश्तेदार नहीं है लेकिन अगले जन्म का मेरा आत्मा परमात्मा अभी भी है । बचपन के खिलौने और मित्र अभी नहीं है लेकिन बचपन को जानने वाला हरि अभी भी है ।
उसी समय पता लगा कि अरे! धीन्गला धीन्गली बाहर से सुंदर लगते है.. कपडे हटाओ तो ऐ छी छी छी गंदगी । सड़े गले फटे कपडे| ऐसे ही ये चमड़ा हटाओ तो ये क्या है मांस है, मल है, मूत्र है हड्डियाँ है| ऐ छी …छी…छी । उस हरि के कारण ये हाड मांस का पिंजर भी प्यारा लगता है । आँखों में चमक है तो ये हरि कि चेतना है| जीभ में स्वाद है तो उस प्यारे की सत्ता है । कहने सुनने का सामर्थ्य हरि का है| मन में सोचने की शक्ति मेरे हरि की है । सब कुछ बदल जाता है लेकिन मेरा हरि ज्यों का त्यों है, म्हारा वालूड़ा ….. अखिल ब्रह्मांड में एक तू श्रीहरी, जुजवे रूपे अनंत भासे । अनेक-अनेक रूपों में तू अनंत है । जीरो का बल्ब हो, सौ का हो, पचास का हो, हजार का हो इस का बल्ब.. उसका बल्ब हो लेकिन रौशनी एक है|
“कबीरा कुआँ एक है, पनिहारी अनेक ।
न्यारे न्यारे बर्तनों में पानी एक का एक||”
सभी का ह्रदय उसी की सत्ता से चलता है| सभी की आँख उसी की सत्ता से देखती है । गीजर अलग, फ्रीज अलग, पंखा अलग, ट्यूब लाईट अलग, माइक अलग, कपडे प्रेस करने वाला साधन अलग लेकिन बिजली सब में एक|
“कबीरा कुआँ एक है, पनिहारी अनेक ।
न्यारे न्यारे बर्तनों में पानी एक का एक ||”
न्यारे न्यारे हृदयों में चैतन्य एक का एक । न्यारे न्यारे घड़ों में, न्यारे-न्यारे बर्तनों में आकाश एक का एक, न्यारे-न्यारे तरंगो, बुलबुलों झाग भंवरों में पानी एक का एक….. वाह प्रभु वाह ।

रात्री-शयन कैसा हो ?
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय: । रात को सोते समय आप लोफरों से हाथ मिलाकर नहीं सोओ| वो तुम्हे नोच लेंगे.. सतायेंगे अथवा थकान से हाथ मिलाकर खाई में मत गिरो| मैं थका हूँ.. ऐसा करके पलंग पर मत गिरो । मै दुखी हूँ, मैं चिंतित हूँ, मैं माई हूँ, मैं भाई हूँ| तुच्छ लोगों से हाथ मिलाकर नींद में मत जाओ । मैं भगवान् का हूँ, भगवान् मेरे हैं| मैं अब तुम्हारी शरण आ रहा हूँ । भगवान् बोलते हैं – “त्वमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत: ।
तत्प्रसादात परमशान्ति स्थानम प्राप्ति शाश्वतं”
हे अर्जुन तुम सर्वभाव से मेरी शरण में आओ । हम प्रभु के प्रभु हमारा । प्रभु! तुम सत्य स्वरूप हो| प्रभु! तुम चैतन्य स्वरूप हो| प्रभु! तुम आनंद स्वरूप हो| प्रभु! आप हर जगह हमेशा हो इसीलिए आप का नाम हरि है । आप ही ब्रह्मा का आत्मा, विष्णु का आत्मा, शिव का आत्मा हो इसीलिए आप का नाम केशव है – क माना ब्रह्मा, श माना शिव, व् माना विष्णु । आप ब्रह्मा, शिव और विष्णु की आत्मा हो । आपका नाम गोविन्द भी है – गो माना इन्द्रियों के द्वारा आप ही की चेतना का विस्तार होता है । इन्द्रियाँ थकती हैं, मन में आती हैं, मन थकता है तो बुद्धी में और बुद्धी थकती है तो आप में आती है| आप उनका पालन-पोषण करते है इसलिए आप गोपाल हैं । गोविन्द बोलो हरि गोपाल बोलो, राधारमण हरि गोविन्द बोलो ।
अच्युतम केशवम । राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री सब के पद च्युत हो जाते हैं । इन्द्रदेव का भी पद च्युत हो जाता है लेकिन आप अच्युत हो| आप केशव हो ।
अच्युतम केशवम रामनारायणं कृष्ण दामोदरं वासुदेवम हरि,
श्रीधरं माधवम गोपिकावल्लभम जानकीनायकम रामचन्द्रमहरि ।
हे म्हारा वालूड़ा, हे प्रभु …..

हे प्रभु आनंद-दाता ज्ञान हमको दीजिये,
शीघ्र सारे दुर्गुणों को दूर हमसे कीजिये …..

सत्संग की बात पकड़ के आप थोड़े दिन लग जाओ । रात्री को सोते समय मैं भगवान में शयन करूंगा जैसे बच्चा माँ की गोद में ऐसे ही जीवात्मा परमात्मा की गोद में शयन करूंगा| मैं भगवान की शरण में जा रहा हूँ| भगवान् मेरे हैं मैं भगवान का हूँ । दुःख मेरा नहीं है दुख तो नासमझी का है, पाप का है| सुख मेरा नहीं है पुण्य का है लेकिन दोनों को जानने वाला चैतन्य प्रभु मेरा अपना है ॐ ॐ ॐ । श्रीकृष्ण कहते हैं –
सुखम यदि वा दुखम सयोगी परमोमता: |
सुखद अवस्था को भी सच्चा न मानो| दुखद अवस्था भी सच्ची नहीं.. आती है, चली जाती है । दोनों अवस्था आती-जाती है| फिर भी जो नहीं आता-जाता है वो आत्मदेव सच्चा है । हरि ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ प्रभुजी ॐ ॐ ॐ ( देव-हास्य प्रयोग)

देव-ऋषि नारद कहते हैं – माँ को तो सांप ने काटा, उसकी तो अंत्येष्टि की| मैं तो चलता गया जहाँ भी भूख लगे और गाँव देखूं तो “नारायण हरि……. नारायण हरि …..नारायण हरि । मिल जाए खाने को” ।  यात्रा करते-करते एक सूखा प्रदेश, शुष्क प्रदेश आया जैसे उत्तर-प्रदेश, राजस्थान । कहीं पर्वत देखे, कहीं धूल देखी, कही नदियाँ देखी, कहीं खाइयाँ देखी । कहीं लाल मिट्टी तो कहीं काली मिट्टी । सब लांघते-लांघते गंगा तट पर पहुंचा । भूख लगी.. थक भी गया था । गंगाजी का सत्संग में सुना था, सब तीर्थों में गंगाजी श्रेष्ठ है । पीपल के वृक्ष के नीचे बैठ पुकारने लगा  “भगवान दर्शन दो, दर्शन दो, दर्शन दो” तड़प लगी थी – “हे प्रभु, हे म्हारा वालूड़ा, हे म्हारा प्रभु अपना साकार दर्शन दो” ।  खूब-खूब प्रार्थना करता-करता बेसुध हो गया| बाहर का जगत भूल गया । प्रकाश दिखा और हृदय मे आवाज आई कि “पुत्र … अभी तू मेरे स्वभाव को नहीं समझ सकेगा, नहीं देख सकेगा । थोडा समय और कोशिश करो| अगले जन्म में मैं तुम्हे अपना ख़ास सत्संग करने वाला देव-ऋषि नारद बना दूंगा” । व्यासजी जिनका स्वागत करते हैं श्रीकृष्ण जिनका स्वागत करते है, वो दासीपुत्र में से देव-ऋषि नारद बन गए| सत्संग कहाँ से कहाँ पहुंचा देता है ।

आप लोगो ने आणंद का नाम तो सुना होगा| आणंद से थोड़ी दूरी पर संगीसर है.. मैं वहां गया था प्रीतमदास महाराज की समाधी देखने । ये प्रीतमदास महाराज कंवरभाई के लाल थे । पिता का नाम प्रताप सिंह था । अमदावाद से २५ कि०मी० दूर बावला में जन्म हुआ था । सूरदास बालक, पांच साल की उम्र में तो माँ बाप भी चले गए| वो डफली बजाते और भीख मांगते । संगीसर वाले माई-बापजी ऐसे ही थे । ऐसे करते करते किसी दयालू सत्संगियों ने कहा कि तू हमारे साथ ही चल । जो जन्म-जन्म का पाप-ताप उतारे वो हरि कथा कहते..
हरि कथा ही कथा बाकी तो व्यथा ही व्यथा ।
हरि के नाम में अद्भुत शक्ति है| प्रीतमदास भी हरिकथा कहते । सत्संग करते-करते वो समझ गए हरिनाम की शक्ति| साथ ही गुरु से गुरुमंत्र मिल जाए तो गुरुमंत्र सिद्ध हो जाए ….
गुरुदीक्षा, गुरुमंत्र मुखे यस्य, तस्य सिद्धि न अन्यथा ।
गुरुलाभात सर्वलाभो गुरु हि नस्तुभालीषा”,

शिवजी का वचन है – जिसके जीवन में गुरुदीक्षा है उसे सर्वलाभ प्राप्त है और जिसके जीवन में गुरुदीक्षा.. गुरुमंत्र नहीं है उसका जीवन व्यर्थ है । राजा नृग मरने के बाद गिरगिट हो गया, सूखे कूएं मे छटपटा रहा था| राजा अज मरने के बाद अजगर के योनी में भटक रहा है । इटली का राजा मुसोलीन मरने के बाद भूत होकर तालाब किनारे भटकता है ।  अब्राह्म लिंकन, प्रेसिडेंट ऑफ अमेरिका , मै अमेरिका कई बार गया तो उसकी यश गाथा गाने वाली कई संस्थाओ को देखा लेकिन वो बेचारा प्रेत होकर भटक रहा है व्हाइट हाउस मे । जिसको भी जीवन में गुरुदीक्षा नहीं मिली कितना भी राजाधिराज हो.. महाराज हो.. लंकेश हो.. हिरन्यकश्यप हो.. हिटलर हो.. सिकंदर हो लेकिन
हरि सम जग कछु वस्तु नहीं ।

गुरु ने कहा कि बेटा! मैं संत नहीं हूँ, कथाकार हूँ और कथा कहके मैं अपनी आजीविका चलाता हूँ । मेरे पास मन्त्र-शक्ति विज्ञान नहीं है । सुना सुनाया मन्त्र तेरे को पकड़ा दू तो तेरे को फायदा नहीं होगा । केबल से लाईट नहीं जलेगी.. पावर हॉउस से जुडी हुई वायर से लाईट जलेगी । जिसने आत्मा परमात्मा का  साक्षात्कार किया है ऐसा गुरु मिल जाए ।  घुमते-घुमते महंत भाई रामजी से गुरुदीक्षा मिली| गोविन्द रामजी से तो हरि कथा सुने| भाई रामजी ने गुरुदीक्षा दी और भाई रामजी ने बताया कि एसे प्राणायाम करना| ऐसे श्वास अन्दर जाए तो भगवान का नाम, श्वास बाहर जाए तो गिनती । रात को सोते समय भगवान में शयन करना आदि आ जाए तो जल्दी उसकी यात्रा होवे । जो भीख मांग रहा था रेलवे स्टेशन पर.. वो प्रीतम सूरदास में से संत प्रीतम दास हो गए ।
“आनन्द मंगल करूं आरती हरि गुरु संतनि सेवा,
कहे प्रीतम औखो अरसारी हरि राजहन हरि देवा,
आनन्द मंगल करूं आरती हरि गुरु संतन सेवा”
५२ आश्रम बनाये, सूरदास थे पर मंत्रजाप किया था| उद्देश्य में शुद्धि, उद्देश्य में दृढ़ता और नि:संकल्पता होनी चाहिए ।

मनमुख का नहीं कोई ठिकाना

मन मे जो आये ऐसा करते गये तो जीवन बर्बाद हो जाता है । कुछ साधुओं ने अनुष्ठान किया| मन्त्र जपा । जपते-जपते मन्त्र १२००० बार जपा । एकादशी के दिन कोई फलाहार दे गया वटाटा ओरैया| साधू के मन में हुआ कि वटाटा तो रोज खाते हैं.. कोई सेठ आता और काजू किशमिश दे जाता तो कितना अच्छा होता । जब काजू-किशमिश का संकल्प हुआ तो किसी अनजान व्यक्ति को प्रभु ने प्रेरित किया कि जाओ साधुओं में काजू किशमिश बांटो । उसने काजू-किशमिश दिया| साधू बड़े खुश हुये कि हमारा संकल्प फला लेकिन ये तुच्छ चीजों का संकल्प है । तुम्हारा प्रेरक स्वाद है न, जीभ का स्वाद, आँख का स्वाद, नाक का स्वाद, मूत्रेन्द्रिय का स्वाद, स्पर्श-इंद्री का स्वाद, ये तुम्हारे प्रेरक लोफर हैं । लोफर तुम को वापिस गिरा देंगे जन्म मरण के चक्कर में । तुम्हारा प्रेरक सूत्रधार सद्गुरु है, वेद है, शास्त्र है कि तुम्हारी कल्पना तुम्हारी सूत्रधार है ? संकल्प ऊंचा होना चाहिए तो लोफरों से बच जायेगे| दूसरा ऊंचा संकल्प हो और दृढ संकल्प हो इससे तुम्हारी शक्ती का विकास होगा । मैं कभी कोई संकल्प करता तो उसको छोड़ता नहीं था.. पूरा करता था| अभी मैं भोजन करता हूँ न तो कोई मिश्री पाउडर की डब्बी देते हैं लड़के घी से भर कर, मैं खोलता हूँ तो मेरे चिकने हाथ होने के कारण नहीं खुलती । लड़के खोलने को बोलते है तो कहता हूँ नहीं जो तुम कर सकते हो.. मैं भी कर सकता हूँ| ऐसा वैसा करके मैं खुद खोलूँगा… काहे को…| हमारे से नहीं हुआ तो दुसरे का संकल्प काम करे.. नहीं, अपना संकल्प दृढ होना चाहिए ।

भजन्तेमाम दृढवृता – जो मुझे दृढ़ता से भजता है, जिधर मन आया उधर चल पड़ा तो तुम्हारे में, कुत्ते में और पतंगे में क्या फर्क है? शास्त्रोचित कदम उठाओ| भविष्य का विचार करके, परिणाम का विचार करके निर्णय लो । गंगा गये तो गंगादास, यमुना गए तो यमुनादास, नर्मदा गए तो नर्बदा शंकर, जटाधारियों में गए तो जटाशंकर… तो पतन हो जायेगा । दृढ इरादा –ये हम नहीं खायेंगे, ये गलत काम हम नहीं कर सकते, क्यूंकि ये कर्म तो लोफरों को उचित हैं । हम साधक हैं, तो शुद्ध संकल्प और दृढ संकल्प, ऐसे करते करते एक अवस्था ऐसी आएगी कि संकल्प जहाँ से उठता है उसमे एकाकार हो जाओगे ।

बोले- सब भगवान है.. ये मानना अच्छा है कि मैं भगवान का हूँ ये मानना अच्छा है ? वासुदेव: सर्वमिति – वेद-शास्त्र बोलते हैं और हम भगवान् के वंशज है तो भगवान हमारे – ऐसा मानने में लाभ है कि “सब वासुदेव है”| अरे! पहले तुम मैं भगवान् का हूँ, भगवान मेरा है, ये मानना शुरू करो । तुम भगवान के हो तो तुम लोफरों के नहीं रहोगे, मन-मुखता के नहीं रहोगे । जब मन में आया, थोडा अहम का अपमान हुआ तो चल फिर एकांतवास में । तुम लोफरों के हवाले हो, जैसा मन में आया वैसा करा तो मन में आएगा काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार| अरे! तुम एक बूँद से तो चले थे और अब तुम्हारी इज्जत और बे-इज्जती| तो भैया! जरा ईश्वर के हवाले हो के जीओ । तो एक तो शुभ संकल्प, दूसरा दृढ संकल्प । हम गुरूजी के आश्रम में गए तो दूसरे पुराने लोगों को लगा कि गुरूजी हम पर ज्यादा प्रसन्न हैं तो सब पुराने लोग मिलकर मुझको भगाने में लग गये । मैं जूनियर था और बाकि सब सीनियर । कुछ का कुछ कहें, कुछ का कुछ साजिश रचें, कुछ का कुछ बनावें – षडयंत्र रचें । लेकिन मैंने भागने का तो सोचा ही नहीं । आखिर मे गुरुदेव ने मेरी गोद में ही महायात्रा की और जो ख़ास था, उसको डबल लगा तो डेढ़ घंटा डबल में ही बैठा रहा, गुरूजी चल बसे । करनी आपो आपनी….| तो एक तो शुभ संकल्प, दूसरा दृढ संकल्प और तीसरा  निसंकल्प… तो नारायण के साथ एकाकारता हो जाती है । आमी बोलते, वेद बोलतो | हम जो बोलते हैं वेद की वाणी है । नानक बोले सहज स्वभाव । फिर आपके दर्शन हरि दर्शन हो जायेंगे । आपकी वाणी हरि की वाणी हो जायेगी । आपका हिलना डुलना लोगों के लिए मंगलमय हो जायेगा । हरि तो निर्गुण निराकार है लेकिन साकार रूप हरि का संत ही तो है ।

अभी एक संत बाई हो गई । थोड़े दिन पहले उसका शरीर शांत हुआ, कानपुर में रहती थी बाई । सत्संग सुना गुरुदीक्षा ली । स्वामी राम की एक संस्था है, उसके गुरु उस बाई के भी गुरु थे । बाई का बेटा था डाक्टर चन्दन साहब, बड़ा मशहूर । ७८-८० साल की बाई ने आवाज लगाई-“चंदू , ऐ चंदू”  वो तो चन्दन साहब थे.. डाक्टर चन्दन साहब.. लेकिन माँ के आगे तो चंदू ही थे । “चंदू, बेटा चंदू”
“हाँ, माँ जी”
“तेरी पत्नी को बुला, तेरे जमाई को बुला और बेटी भी आई है, सबको बुलाओ । अब हम जा रहे हैं अपने देश”
“माँ, ये क्या बोलती है|”
“अब बाते लम्बी मत करो, बैठो । आ जाओ बैठो सब| देखो, ये शरीर मरण-धरमा है|”
“माँ, माँ तुम माफ़ करो । मैं डाक्टर हो कर भी तुम को ठीक नहीं कर सका|”
“ अरे, बेटे, ये एलोपैथी की दवाई है । बिल्ली निकालने गए तो ऊँट घुस गया|”
“माँ, माँ तू ये क्या बोलती है ?”
“सुनो, एक बिल्ली मर गयी थी| ब्राह्मणी ने देखा कि मरी बिल्ली को कौन उठाये । वो गयी गाँव में कि कोई बिल्ली को उठा के बाहर छोड़ जावे । गई तो सही, लेकिन जाते-जाते दरवाजा बंद नहीं किया  और पीछे से बीमार ऊँट अन्दर घुस गया । ऊँट ने भी वहीं दम छोड़ा । बिल्ली मरी को उठाने के लिए गई थी किसी को बुलाने, देखा तो ऊँट मरा पड़ा है|”
ऐसे ही छोटे मोटे दुःख और चिता को निकलने के लिए  “मैं बुद्धिमान हूँ, मैं विद्वान हूँ, मैं प्रसिद्ध हूँ, मैं ऐसा हूँ, मैं वैसा हूँ” – ये ऊँट बड़ा भारी है । इसको बाहर निकालना हरेक के बस की बात नहीं है । छोटी मोटी तकलीफ को निकालने के लिए “मैं विद्वान हूँ, मैं ग्रेजुएट हूँ, मैं एम०ए० हूँ, मैं बी०ए० बी०एड० हूँ, मैं डी० लिट् हूँ ।“………….
“ बाबा जी दुनिया के पांच देशों ने मिलकर मुझको सर्वोपरि विद्वान बताया, लेकिन आपकी दीक्षा के बिना मेरा जीवन व्यर्थ था बापूजी!!! अभी मेरे को ऐसा लगता है, ऐसा लगता है ….”-ये कहने वाला आदमी अभी भी जीवित है । रूप-नारायण उनका नाम है, मेरठ में रहते है । पांच देशों में सर्वोपरि विद्वान… बापू से दीक्षा लिया था ।

हरि सम जग कुछ वस्तु नहीं, प्रेम पंथ सम पंथ

भगवान् में प्रेम कैसे हो ? जब आवश्यकता से अधिक भूख लगती है तो रोटी बड़ी प्यारी लगती है । प्यास में पानी प्यारा,  गर्मी में ठंडी हवा प्यारी, और चारों तरफ से मुसीबतों में घिर गए तो वहां सांत्वना और साथ देने वाला प्यारा पर इन सब प्यारों से भी प्यारा भगवान हमारी आवश्यकता है । आवश्यकता प्यारी हो जाती है तो भगवान की आवश्यकता मानो और भगवान को अपना मानो । भगवान की आवश्यकता और भगवान को अपना मानने से भगवान में प्यार उत्पन्न हो जाता है और प्रेम से थोडा भी भजन करेंगे तो जल्दी फलेगा ।

चन्दन की माँ को सब शगुन मिल गए थे| “चंदू, देखो हम जा रहे है”  बाई बोलती हैं ।
“माँ, नहीं जाने दूंगी”, बहू बोलती है ।
“माँ, ये क्या बोलती हो ?
“दादी माँ “ बहू की बेटी बोलती है ।
“अरे बेटे, अब रोने धोने से मैं फँसने वाली नहीं हूँ कि पोती रो रही है, बहु रो रही है, बेटा रो रहा है, मेरे को बचाओ । मैं जानती हूँ कि मेरी तो कभी मौत ही नहीं होती । मेरे को तो भगवान भी नहीं मार सकते मैं तो अमर आत्मा हूँ और शरीर को तो भगवान ने भी नहीं रखा तो मेरे को क्या बख्शेंगे । भगवान के होते हुए कौशल्या चली गयी, सुमित्रा चली गयी, कैकेयी चली गयी तो तुम्हारे लिए मेरे को भगवान बचाये, मैं ऐसी गुहार भी नहीं लगाऊँगी । मेरी तो कभी मौत ही नहीं हो सकती ये शरीर तो टिकेगा नहीं” ।
अब ध्यान से सुनो, जन्म-मरण शरीर का होता है, दुःख-सुख मन को होता है, बीमारी-तंदरुस्ती शरीर की होती है, चिंता चित्त करता है । “मैं चिंतित हूँ, मैं बीमार हूँ, मैं दुखी हूँ” ये अज्ञानी लोग  मानते हैं । जब दुःख आये तो समझ लेना कि मन में दुःख आया, दुःख नहीं होगा । मन के दुःख को देखोगे तो मैं दुखी नहीं हूँ । दुख नहीं होगा, दुःख भी जल्दी भागेगा । सुखी होकर दुःख मिटाने वाले के दुःख दब जाते हैं, तो क्या करें – मैं भगवान् का हूँ, भगवान् मेरे हैं …हरि ॐ हरि ॐ हरि ॐ …ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ….(देव-हास्य प्रयोग)

जब सुख पैदा होगा तो दुःख नहीं टिकेगा, मन में ये योग्यता है कि जब सुख होगा तो दुःख नहीं होगा, जब दुख का चिंतन करोगे तो सुख नहीं टिकेगा । काहे को दुख का चिंतन करना| तो पहले शुभ चिंतन, फिर दृढ चिंतन, फिर चिंतन जहाँ से होकर विलय हो जाता है उसमे विश्रांती – ये जीवन का सार है ।
“अब तुमने तो उपाय किया लेकिन ये शरीर है, जाने वाला है । अब तुम दरवाजा बंद करके चले जाओ मैं अन्दर से कड़ा नहीं लगाऊँगी, नहीं तो तुम को तुडवाना पड़ेगा । एक घंटे बाद दरवाजा खोलना”. माई बोलती है ।
“माँ, मैं नहीं जाने दूंगी”
“चंदू, इन को समझा”
चंदू जानते थे कि माँ आध्यात्मिक गुरु कि पक्की सत्संगी है और सत्संग पचाया है । मेरी माँ दिखती तो माँ है लेकिन गुरु के सत्संग को पचाया है ।
“जैसी गुरु की आज्ञा” कह कर आ गया । पीठ देकर नहीं निकले शिवजी की आज्ञा है, पीछे पैर करके निकल गए । चौखट को प्रणाम किया ।
गुरु महाराज और आत्मवेत्ता पुरुषों के यहाँ जब सिर झुकता है और उनकी चौखट को अथवा चरण-रज को नमस्कार करते हैं तो जितने रज-कण लगते हैं उतने जन्मों के पाप-ताप मिटते हैं, उतने अश्वमेघ यज्ञ होते हैं । वशिष्ठ जी महाराज के चरणों में जाते थे राजा दशरथ तो आश्रम की चौखट पे मत्था टेकते थे वहां । गुरु की महिमा तो साधक जाने दशरथ जाने, निगुरा क्या जाने ।
“तीरथ नहाये एक फल, संत मिले फल चार| सदगुरु मिले अनंत फल,…” जिस फल का अंत न हो अनंत फल … । वैशाख मास की त्रयोदशी, चतुर्दशी और पूर्णिमा इन तीन दिनों को पुष्कर्णी दिवस कहते है.. अथाह पुण्य देते हैं । जल में तिल डालकर ठंडा जल पहले सिर पर चढ़ावे| सिर की गर्मी पैरों से निकल जावे । जो लोग पहले पैर पर पानी डालते है गर्मी सिर पर चढती है । एक तो पैर की गर्मी सिर पर चढ़ने से सिरदर्द होता है और दूसरा अभागे मोबाईल भी सिरदर्द की खान हैं ।
अब मोबाईल के सिरदर्द को टक्कर मारने वाला भजन गायेंगे सुरेश “ जोगी रे” । इससे मोबाईल से होने वाले सिरदर्द को टक्कर मारने वाली ऊर्जा पैदा होती है तो ये वैशाख मास की त्रयोदशी, चतुर्दशी और पूर्णिमा – जो वैशाख मास का स्नान… एक मास न कर पाए तो ये तीन दिन स्नान कर ले, तीन दिन न कर पाए तो दो दिन, दो दिन न कर पाए तो कल का दिन तो है और आज शाम को भी तुम स्नान करना कैसे स्नान करोगे – “ मैं भगवान् का हूँ, भगवान् मेरे हैं” चार प्रकार के स्नान होते हैं –भस्म स्नान होता है, वायु स्नान होता है, जल स्नान होता है और भगवद-चिंतन स्नान भी होता है । भगवद-चिंतन स्नान करके सोना । ॐ ॐ ॐ हरि ॐ ॐ ॐ ..

मेरे साथ मिलकर करना – ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ —-( दीर्घ ॐ गुंजन उच्चारण प्रयोग ) ।

माई ने सुना था सत्संग और अब तुमने भी सुना है| देखो, सत्संग से कैसी-कैसी युक्तियाँ मिल जाती हैं । सात बार ये प्रयोग करने से जीव अनत ब्रह्मांडो के पार उस परमात्मा से एकाकार हो जाता है । मरने से पहले अगर सात बार ये गुंजन हो गया तो फिर चिंता की बात नहीं है और फिर तुलसी की कंठी है तो सदगति में संदेह नहीं है । मृतक व्यक्ति को तुलसी की लकड़ी से अग्नि-दाह कर दें, तुलसी की लकड़ी और छोटी मोटी घास मिलाकर – कैसा भी पापी हो दुर्गति नहीं होगी । मृतक व्यक्ति के लिए और कुछ नहीं कर सकते तो खाली तुलसी की लकड़ी से संस्कार कर दें । उस की हड्डियाँ गंगा जी में, नर्मदा जी में डालो.. अच्छा है अगर नहीं भी डाल सकते तो आवले के रस में धो डालो, सद्गति हो जायेगी|

माई तो ॐ कार का चिंतन करके निसंकल्प हो गयी । पहले शुभ संकल्प था फिर दृढ संकल्प और फिर नि-संकल्प का अभ्यास तो था ही, ईश्वर में शांत हो गई| जैसे सांप केंचुली छोड़ता है अथवा आप वस्त्र बदलते हैं । घड़ा टूटता है तो घड़े का आकाश महाकाश में, आत्मा शरीर से निकल कर पारब्रह्म परमात्म में एकाकार हो गयी । एक घंटे बाद चंदू ने और उसकी पत्नी ने दरवाजा खोला, देखा तो माँ तो बैठी है ।
“माँ, माँ ..”
डाक्टर तो डाक्टर था, हाथ लगाया तो बोला कि माँ ने तो अपनी लीला समेट ली, माँ तो गई । लेकिन माँ कैसी लग रही है, आँखे खुली हैं, हंसती दिख रही है । नीचे के लोकों से प्राण निकलते हैं तो नीच गति होती है ऊपर के लोको से प्राण निकलते है तो सदगति होती है । अभी भी माँ के कमरे में जाते है तो लगता है मानो ॐ ॐ ॐ …… याद आती है तो मन शांत हो जाता है । वो हवा स्पर्श भी करती है और वो हवा जहाँ से गुजरती है वो सुगंध स्वभाव, संस्कार लेकर बांटती जाती है । पेट्रोल की, डीजल की केरोसिन की या तरबूज की, आम की सुगंध तो थोड़ी देर रहती है लेकिन विचारों का प्रभाव बहुत लम्बा रहता है । वर्षों के वर्ष,  सैंकड़ों वर्ष बीत जाते है फिर भी वो विचारों का प्रभाव रहता है ।

श्रीरामजी और लक्ष्मणजी यात्रा कर रहे थे| एकाएक लक्ष्मण के मन में स्वार्थ के विचार आ गये  “बनवास मिला है तो आपको मिला है| मैं आपके पीछे इतनी सेवा करू, मेरे को क्या मिलेगा? मेरा अपना हक मुझे मिलना चाहिये”
रामजी सुनकर चकित हो गये लेकिन रामजी को जानने में देर नहीं लगी कि…. बोले- “अच्छा, लखन, जरा स्नान करके फिर बात करो तो..” स्नान करने गए नदी में तो “प्रभू, यह मैं क्या बोल रहा हूँ ? आप तो मुझे छोड़ कर आना चाहते थे| मैंने सेवा की प्रार्थना की और मै अब ऐसा कैसे बोला, मुझे माफ़ कर दो”

बोले – “चलो लखन, आओ, उसी धरती की जगह खड़े रहो”
वहां खड़े रहे तो फिर लक्ष्मण के मन में गड़बड़ ।
रामजी ने बताया कि शुम्भ व निशुम्भ दो भाई थे । उन्होंने खूब तपस्या की थी| दोनों भाइयों का आपस में स्नेह था । तपस्या के बल से ब्रह्मा जी ने वरदान दिया कि तुम अमर हो ऐसा तो नहीं बोल सकते और कोई शर्त रखो तो बोले कि हम एक-दुसरे भाई को मारे तब मरें और हमारा तो आपस में प्रेम है हम लड़ेंगे नहीं और अमर हो जायेंगे । तामसी व्यक्तियों को ताकत आती है तो दूसरों को सता कर बड़ा बनना चाहते है । फिर महान सिकंदर बनना चाहते हैं और सत्संगी दूसरों को नष्ट करके बड़ा नहीं बनते, दूसरों में जो बडापन छिपा है.. उसी का ज्ञान, आनंद, प्रेम लेकर सर्व-व्यापी बड़े को पा लेते हैं । ब्रह्मा जी को प्रार्थना किया तो ब्रह्मा जी ने तिलोत्तमा नाम की अप्सरा भेजी, बड़ी सुंदर थी । बड़े भाई को बोले – मैं तो तुम को वर चुकी हूँ, पर छोटा मुझ पर बुरी नजर रखता है । छोटे को बोले कि मैं उस बूढ़े से क्यों शादी करू, मैं सुन्दरी तुम सुंदर, मैं युवती तुम युवक.. लेकिन तुम्हारा भाई मेरे को अपनी पत्नी बनाना चाहता है । धीरे धीरे दोनों के मन मे जहर भरा| दोनों के अंदर एक दुसरे के लिए नफरत हुई और फिर “तू अपने को क्या समझता है” “तू अपने को क्या समझता है” और दे धडाधड… दोनों आपस में लड़ कर मरे जहाँ, तू अब वहीं पर खड़ा है लक्ष्मण, इसलिए तेरे मन में ऐसे विचार आये । कितने साल बीत गए फिर वो वायु – देवता का उस जगह पर कितना गहरा प्रभाव है ।
कथा-कीर्तन जा घर नहीं, संत नहीं मेहमान
वा घर जमडा डेरा बिना, सांझ पड़े शमशान ।।
कथा कीर्तन जा घर भयो संत भये मेहमान
वा घर प्रभु वासा कीनो, वा घर वैकुण्ठ समान ।।

एक बात मानो, बेल के फल की बहुत भारी महिमा है । बेल के फल का शरबत बनायें और दूसरा पलाश के फूलों का शरबत, अथवा दोनों का मिश्रण करें तो बैठे बैठे ये शरबत खाना है, ग्लास मुंह से नहीं लगाना ऊपर से घूँट ले के जैसे खाना, पीना नही  । बेल और पलाश दोनों का बहुत फायदा है । बेलफल का बड़ा भारी गुण है और शिवजी का प्रिय है । पेट की खराबी ठीक हो जावे, गर्मी ठीक हो जावे आँखों की जलन ठीक हो जाये ।  पलाश और बेल, अकेला पलाश भी बहुत अच्छा है, पलाश के शर्बत की  बोतल मिले तो लेना चाहिए इसके बड़े भारी गुण हैं ।
योगी यान्चिद सततं आत्मा । सतत उस आत्मा का चिंतन करो । दिन भर तो लोफर तुमको सताते हैं लेकिन सुबह दोपहर शाम रात को सोते समय अपने हितैषी नारायण में बैठो । उनकी प्रेरणा से जीवन की नैया चलने दो । ॐ शान्ति … योगी यान्चिद सततं आत्मा रशिचिता एकाकियतचित्तात्मा निराश्रिय परिग्रह । एकांत में रहो.. परिग्रह करो । ऐसा करना है वैसा करना है….. हरि ॐ तत्सत, अभी तो ध्यान करो मन तू राम भजन कर.. जग मरवा दे, नर्क पड़े तो पद्व दे, तू राम भजन कर । भगवान का चिंतन, उच्चारण करके फिर शांत हो जाओ । श्वास अन्दर जाए तो भगवान का नाम बाहर आये तो गिनती । मन इधर उधर जाए तो थोडा भगवान का नाम ले, और देव-हास्य प्रयोग अथवा कीर्तन करें – ॐ ॐ ॐ ॐॐ..हरि ॐ  ॐ ॐ….. मेरे ॐ ॐ ॐ … ॐॐ प्यारे ॐ ॐ ….प्रभु ॐ ॐ ॐ ….ॐ ॐ ॐ ॐ( हरि ॐ संकीर्तन ) ।

Family Of Sant Shri Asaram Bapu Expressing Their Faith Towards Asaram Bapuji

laxmidevi

Family Of Sant Shri Asaram Bapu Expressing their Faith Towards Bapuji.

Media Has Spread False News Against Sant Shri Asharamji Bapu and His Family . They Have Shown The Conflict Between All Of Them . This Is The Truth Which Shows the Emotion Of A Wife , Son And Daughter Towards A Spirtual Saint H.H Sant Shri Asharamji Bapu .

साँच को आँच नहीं – प. पू. संत श्री आशारामजी बापू

sanch ko aanch nahi

Sant Asaram ji Bapu – साँच को आँच नहीं ( Pure gold does not fear the flame )

सत को आँच नहीं होती और झूठ को पैर नहीं होते | हम किसीका बुरा सोचे नहीं, चाहे नहीं, करें नहींफिर कोई कुछ भी करें तो सब का मंगल सब का भला !

व्यर्थ की जानकारियाँ क्यों ? -प.पू.संत श्री आशारामजी बापू

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व्यर्थ की जानकारियाँ क्यों ?

ओम …… ॐ  | ओम नारायण हरि | और फिर कोई ना सुने, जिव्हा, होंठ भी ना हिले और शांत मन में वही मंत्र स्फुरित हो जैसे मैं बोलता हूँ वैसे आप बोलो प्यार से ओम…… चुप हो गए | वही भीतर चले और शांत हो रहे हैं हम उस ओम स्वरूप इश्वर में | ये भी अपने आप में स्वतंत्र साधन है | विश्रांति योग देने में सक्षम साधन | ओम…… | चुप हो गए औए हृदय में चले | २-४ बार ….. | जितनी देर बाहर उच्चारण किया उससे थोडा समय ज्यादा भीतर उच्चारण किया और उससे भी ज्यादा शांत हो गए | ना किंचित अपि चिन्तयेत ||

ये सारी शिक्षाओ से भी ऊँची शिक्षा है |  सारी आपा-धापी के कर्मों से बहुत ऊँचा कर्म है | ओम माना वो अंतर आत्मा परमेश्वर | जिसकी सत्ता हर वस्तु में, हर परिस्थिति में, हर देश में, हर काल में है |

एक महात्मा सत्संग करते थे | किसी नास्तिक को लगा के ये क्या बात है ? क्यों लोगों का समय खराब करना ? और प्रार्थना और भगवान ये सब क्या है ? व्यंग में, विनोद में, कटाक्ष के भाव में उलझा हुआ नास्तिक था | लेकिन महात्मा को देखकर मजा आता था | सत्संगियों के बीच बैठकर उसको अच्छा तो लगता था | लेकिन ये सब क्या है ? व्हाट इस थिस ? महात्माजी का सत्संग था, उसने अपने घर से २ नारंगी उठाई | जहां सत्संगी थे उधर जा रहा था | रस्ते में एक माई लेटी थी, बूढी थी ८० साल की | उसके हाथ जेब में गए और दोनों नारंगी उठकर हाथ फैलाई माई के हाथ पे रख दी | जब वो सत्संग से लौटा, देखा वो माई बड़ी प्रसन्नता से, बडे चाव से नारंगी चूस रही थी | बोला क्या खा रही हो ? बोले भई क्या खाऊ ? मैंने अपने पिता से जो चीज माँगी भेज दी उन्होंने | गैस हो गया था | तबियत जरा अच्मचा रहा था | मैं क्या मुझ बुढिया के पास कहाँ पैसे और कहाँ खरीद करने को जाऊँ ? हे पिता नारंगी भेज दे और मैंने तो एक माँगी | मैं लेटी थी और मेरे हाथ में दो नारंगी रख गया | नास्तिक के कपाट खुल गए | कि बुढिया का मेरा कोई परिचय नही था | वो कौन प्रेरक है जो मेरे को प्रेरणा दी, २ नारंगी मैंने जेब से उठाई और बुढिया सोई थी और उसके हाथ पे रखी | एक-आध घंटे के बाद लौटता हूँ तो बुढिया नारंगी खा रही है | कौन है तुम्हारा पिता, तुम ८० साल की | बोले वो पिता वही है जो प्रार्थना सुन लेता है | और उसी के अनुसार किसी को भी प्रेरित करके अपने प्यारों को तृप्त करता है | वो ही तो है परमात्मा |  नास्तिक के कपाट खुल गए कि मैं आज तक चीख रहा था, चिल्ला रहा था के प्रार्थना-व्रार्थ्ना में कुछ नही रखा | ये हरि ओम, हरि ओम में कुछ नही रखा | अब ये माई को तो पता नही, मेरे को भी पता नही, वो कौन प्रेरक है जो मेरे को २ नारंगी उठवाई और फिर सीधा मैं इस माई के हाथ में रख के गया सत्संग सुनने व्यंग में, मजाक में | और फिर प्रेरणा मिली माई से बात करने की | मेरे भ्रम को दूर करने वाला और माई के मनोरथ को पूर्ण करने वाला वो कोई आकृति वाला नही है | सारी आकृतियाँ जिससे चलती हैं महात्मा ने कहा वही परमेश्वर है |

उच्च शिक्षा और तुच्छ शिक्षा, साधारण पढ़ाई और ऊँची पढ़ाई जरा समझ लें | ऊँची पढ़ाई किसको कहते हैं और तुच्छ पढ़ाई किसको कहते हैं ?

तुच्छ पढ़ाई वो है जो तुच्छ शरीर को मैं माने और तुच्छ वस्तुओं की तरफ तुम्हारी इच्छाएँ, ख्वाइशे, वासनाएँ बढाएँ | एम.बी.ए. कर लो मतलब गंजे आदमी को भी कंघी बेच दो | नागालेंड में जो कपड़े नही पहनते उनको कपड़े धोने वाला साबुन पकड़ा दो | पैसे निकालो | ये तुच्छ शिक्षा है |

कबीरजी उच्च शिक्षा बोलते हैं | कबीरा आप ठगाइयो और ना ठ्गियो कोई | आप ठगे सुख उपजे और ठगे दुःख होए | तो उच्च शिक्षा क्या है ? उच्च शिक्षा है, महत्वपूर्ण शिक्षा है, शुद्ध प्रेम, आनंद कैसे बढ़े ? उसका उपाय और उसके तरफ की यात्रा |

उत्साही दृष्टि कैसे बढ़े ? कैसी भी परिस्थिति आये, हार कर उद्विघन होकर भागा-भागी ना करे | लेकिन परस्थिति के सर पर पैर रखके अपने लक्ष्य की तरफ बढ़ते जाये, फिसले नही | दुःख कैसे मिटे ? ये उच्च शिक्षा का उद्देश्य है | दुःख आये लेकिन हम तक दुःख ना पहुंचे, ये क्या कला है ? ये उच्च शिक्षा बताती है | आत्मविश्वास और एकाग्रता कैसे पाये ? ये उच्च शिक्षा का उद्देश्य है | महत्वहीन शिक्षा क्या है, अनावश्यक डिग्रियाँ, पढ़ते रहें, डिग्री तो ले लें | डिग्री तो मिल जाये और डिग्री लेके भटक रहें हैं | अनावश्यक डिग्रियाँ लेना, व्यर्थ चीजों को याद करना, व्यर्थ विषयों में उलझते रहना | व्यर्थ विषयों को याद रखना | व्यर्थ जानकारी एकत्रित करना | और किसी के क्षणिक प्रभाव में आ जाना | किसी का रूप, लावण्य देखकर इम्प्रेस हो जाना | किसी का कुछ देखकर प्रभावित हो जाना | लट्टू हो जाना | ये महत्वहीन शिक्षा है | जगतराम अनपढ़, गवार था | नाम तो जगतराम था पर अनपढ़, गवार था | हरिहर बाबा को कहा बाबा, मैं तो अनपढ़, गवार | मेरा भला हो जायेगा क्या ? मैं पढा-लिखा कुछ नही हूँ | और बाहर की योग्यताओ से दुःख नही मिटते | दुःखहारी प्रभु मेरे हैं | मैं पढा-लिखा हूँ या नही हूँ लेकिन तुम्हारा हूँ | मैं तुम्हारा हूँ | भीतर ओम……. | शांत हो गया और उस शांति से भीतर में भगवान का प्रसाद आया | महाराज भगवान कैसे हैं मैं तो नही जानता | मोको तो आप ही भगवान लगो | ओम….. | महाराज दिखे, महाराज से मन ही मन बाते करे | धीरे-धीरे मन शांत और गुरु भाव में इतना एकाग्र की जो होने वाला हो वो बोल देवे | जो मन में सोचे वो चीज, वस्तु, परिस्थिति आजाये | क्योंकी उच्च शिक्षा के मूल तक पहुंच गया |

आप जो लेते हैं वो प्राण, प्राण-अपान की क्रिया से सब व्यवहार चलता है | जैसे पौधा है तो उसकी प्राण शक्ति उपर ले आती है उसके पत्ते, फुल, टहनियाँ | और अपान शक्ति जड़े नीचे को जाती हैं | ऐसे ही आपके जीवन में भी चंद्र, सूर्य का प्रभाव | प्राण-अपान का प्रभाव जैसे सूर्य से आकर्षित चंदा और चंदा में सूर्य का प्रभाव | तो आपकी जो प्राण-अपान शक्ति चल रही है या जीवन चल रहा है | जब अपान का महत्व बढता है, नीचे के केन्द्रों में जीते हैं और दुष्ट वासनाओं की पूर्ति में लगते हैं | तमोगुण की प्रधानता होती है | वो नारिकीय जीवन का अधिकारी हो जाता है | कैसा भी करो, खाओ, पियो, भोगो, वार-तिथि का पता नही | अपान के आकर्षण में चलेगा, देखा जायेगा | हम नही मानते, ये अपान का आकर्षण नीचे के केन्द्रों में जीने वाले व्यक्ति को उलझा देता है | तमस होता है फिर |

रजस होता है तो कुछ में फिसलता है, कुछ में टिकता है |

जब सत्वगुण बढता है तो अपान के आकर्षण से, नीचे के केन्द्रों से, बातों से आकर्षित नही होता | भजन्ते माम दृढ़ व्रतः || दृढ़ता होगी, वो स्वर्गीय सुख का अधिकारी और तत्वज्ञानी गुरु मिल जाये तो आत्म साक्षात्कार कर ले | उन्नति की लिए प्राण को महत्व दो और अवन्ती के लिए अपान | तो अपन जब हरि ओम बोलते हैं तो प्राण उपर आते हैं | हरि, ओम, राम इन शब्दों से प्राण शक्ति हमारी उपर के तरफ चलती है |

मनुष्य का जन्म प्रज्ञा, बुद्धि, और कर्म का मिश्रण है | बुद्धि से निर्णय करेगा और इन्द्रियों से कर्म करेगा | बुद्धि और कर्म के मिश्रण से जो कर्म करके, बुद्धि से निर्णय करके कर्म करके सुखी होना चाहता है, डिग्रीयां पाकर सुखी होना चाहता है, पति पाकर, पत्नी पाकर, भोग पाकर, वाह-वाही पाकर सुखी होना चाहता है, उसको सुखद अवस्था तो मिलती है लेकिन उसका प्राण और मति प्रवृति की तरफ है | संसार के तरफ | और संसार फिर अपान में ले जायेगा | लेकिन जो वासना पूर्ति की इच्छा छोड़ने वाला सत्संग समझ लेता है कि वासना पूर्ति का सुख पतन की तरफ ले जायेगा, लेकिन वासना निवृति का सुख परमात्मा में ले जाता है | तो फिर वो वासना, अपनी इच्छा पूरी हो तो उस पचड़े में नही पड़ता | इच्छा निवृत हो उस सूझ-बूझ  में पड़ता है | तो बोले भगवान को पाने की इच्छा भी नही करे | भगवान को पाने की इच्छा सारी इच्छा को मिटाने का एक सबल साधन है | सारी इच्छा मिट गयी तो फिर भगवान को पाने की इच्छा भी अपने-आप शांत हो जाती है | भगवान ही प्रकट हो जाते हैं | तो संकल्प पूरा करके सुखी होना, वे लोग चमचों के चक्कर में आ जाते हैं | परिस्थिति के चक्कर में आ जाते हैं | राग-द्वेष के चक्कर में आ जाते हैं | एक बार राजा बन जाऊँ, ५ साल के लिए, बाबाजी आशीर्वाद करो | ५ साल हो गए फिर बाबा फिर से दया करो, फिर से दया करो, अब फिर फिर करते बाबा की जरूरत ही नही है | बाबा को कुचलो | ये अपान वृति जीव को अधोगति की तरफ ले जाती है |

संकल्प की निवृति की तरफ महत्व देते हो तो आपको अंदर का सुख मिलेगा | अंदर का सामर्थ्य मिलेगा और जीते-जी आप परिस्थितियों के प्रभाव से आप मुक्त हो जायेंगे | मरने का भय नही रहेगा, जीने की आशा नही रहेगी | जीवन में एक अवर्णीय शांति, अवर्णीय सामर्थ्य | कोई खोज-खोज के भी नी बता सके और आप जो बताएँगे वही बात सच्ची निकलेगी | नानक बोले सहज स्वभाव | वासना रहित जीवन में सहज स्वभाव | परमात्म ज्ञान, परमात्म हो जाते हो तुम | तो महत्वपूर्ण शिक्षा प्रेम, आनंद, उत्साह, दूरदृष्टि, सत्य संकल्प, सत्य परिणाम, सत्य वाक्य और महत्वपूर्ण शिक्षण | अनावश्क डिग्रीयां, अनावश्क सुचना, अनावश्क बोलना, हाथ हिलाते रहना, ये करना, मान नही है तो तुच्छ जीवन है तो चंचलता है | ये जन लो, वो सीख लो, वो सीख लो | जहाज में भी बैठेंगे तो बोलो थोड़ी देर शांत हो जाओ | तो वो पढेंगे, वो पढेंगे | बस खोपड़ी में भरो, भरो…. | नॉलेज, नॉलेज क्या कचरा भर के ? खिन्न हो जाते हैं | विश्रांति ओम….. | मन इधर-उधर जाता है तो दीर्घ उच्चरण फिर प्लुत या हर्ष उच्चारण |  जैसे भी मन शांत हो | इच्छाओ की गुलामी ना हो | परम आत्म शांति बढ़ जाये | व्यर्थ की जानकारियों में दिमाग खराब ना करें |

Will Asaram Bapuji Get Justice From Judiciary

Pujya #Bapuji is innocent , Sant Shri Asharmji Bapu is framed in a fake & bogus case by an Adult girl due to POCSO misuse #कानून_का_दुरूपयोग

POCSO misuse

Innocent Hindu Sant Shri Asaramji Bapu

POCSO misuse and such Harsh punishment to an 82 Years old Innocent Hindu Saint Asaram Bapu Ji. #Bapuji fought strongly against missionaries and stopped conversions in India the reason he was targeted and now given #UnjustifiedVerdict !! We have hopes from High Court now !!

ज्ञानी की महिमा – आशारामजी बापू

ज्ञानी को सारा संसार मिल कर भी कोई मदद नहीं कर सकता। और सारा संसार उल्टा हो के टंग जाए तो भी ज्ञानी की हानि नहीं कर सकता। – Pujya Sant Shri Asaramji Bapu

Gyani ki mahima

ज्ञानी की महिमा