Raksha Kavach – Part- 1

EkadashiPart- 1

Part- 2

सत्संग के मुख्य अंश –
रक्षा – कवच
आप पद्मासन में, सिद्धासन में जैसे आपको ठीक लगे, ज्ञानमुद्रा में बैठे | ऊँगली अँगूठे के नीचे लेना, ऊँगली सीधी, दोनों हाथ घुटने पे | अगर आप सिद्धासन में बैठते है, ब्रह्मासन में बैठते है तो बायीं हथेली, दाही ऊपर और हाथ रखे जाय | ऐसा नहीं की दाही हथेली नीचे | दाही ऊपर होनी चाहिये सिद्धासन में बैठे हो तो | फिर क्या करें – आप प्राणायम करें | श्वास लें.. लें.. लें.. लें….. और खुप ले रोके…रोके… रोके… खूब रोके और उसमें भावना करें की मैं भगवत तेज ‘हरि’ का नाम अथवा ‘ॐकार’ का मन्त्र अथवा ‘इष्ट मन्त्र’ जपते जायें और श्वास रोकते रखे | और भावना करें की मेरे चारों तरफ मन्त्र शक्ति का एक कवच का सूक्ष्म वेव्ह जैसे लक्ष्मण ने लक्ष्मण रेखा खीँच ली, रावण नहीं घुस सका क्योंकि रक्षाकवच था | मन्त्र से रक्षाकवच आ गया था लक्ष्मण रेखामें | ऐसे आपने अपने ईर्द-गुर्द गोलाकार में वासना के तरंगों से, विकारों के तरगों से रक्षा करनेवाला “भगवत आश्रय कवच” बना लिया चारों तरफ भगवत सत्ता का | श्वास रोका और वो कवच बनाने का संकल्प किया नाम जपते-जपते | फिर श्वास अपने छोड़ दिया | फिर जहाँ छोड़ा वहाँ से लिया खूब लिया… खूब लिया, रोका भी खूब और भावना उस कवच की थी | तो तेजोमय कवच प्रकाश … जैसे सूर्य के किरणों में सप्तरंग है ऐसे प्रकाश के वेव्ह्स आपके जप के प्रभाव से, भावना के प्रभाव से आपके रोम से पोसे निकलेंगे, बनेंगे और चारों तरफ धीरे-धीरे प्रकाश की आभा बन जायेंगी | उस प्रकाश में आप सप्तरंग जैसे इन्द्रधनुष्य | सप्तरंग की आभामंडल की आप दृढ़ भावना करें | ये आप करते रहिये-करते रहिये, प्रतिदिन करे | अभ्यास दृढ़ होने के बाद आप कैसे भी वातावरण में जायेंगे, बस.. जरासा उस कवच का चिन्तन करते आपकी रक्षा होगी |