सदगुरू-महिमा

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गुरु बिनु भव निधि तरै न कोई जौं बरंचि संकर सम होई ||      -संत तुलसीदासजी

हरिहर आदिक जगत में पूज्यदेव जो कोय सदगुरू की पूजा किये सबकी पूजा होय ||

-निश्चलदासजी महाराज

सहजो कारज संसार को गुरू बिन होत नाँही हरि तो गुरू बिन क्या मिले, समझ ले मन माँही ||

-संत कबीरजी संत

सरनि जो जनु परै सो जनु उधरनहार संत की निंदा नानका बहुरि बहुरि अवतार ||

-गुरू नानक देवजी

“गुरूसेवा सब भाग्यों की जन्मभूमि है और वह शोकाकुल लोगों को ब्रह्ममय कर देती है | गुरुरूपी सूर्य अविद्यारूपी रात्रि का नाश करता है और ज्ञानाज्ञान रूपी सितारों का लोप करके बुद्धिमानों को आत्मबोध का सुदिन दिखाता है |”

-संत ज्ञानेश्वर महाराज

“सत्य के कंटकमय मार्ग में आपको गुरू के सिवाय और कोई मार्गदर्शन नहीं दे सकता |”

– स्वामी शिवानंद सरस्वती

“कितने ही राजा-महाराजा हो गये और होंगे, सायुज्य मुक्ति कोई नहीं दे सकता | सच्चे राजा-महाराज तो संत ही हैं | जो उनकी शरण जाता है वही सच्चा सुख और सायुज्य मुक्ति पाता है |”

-समर्थ श्री रामदास स्वामी

“मनुष्य चाहे कितना भी जप-तप करे, यम-नियमों का पालन करे परंतु जब तक सदगुरू की कृपादृष्टि नहीं मिलती तब तक सब व्यर्थ है |”

-स्वामी रामतीर्थ

प्लेटो कहते है कि : “सुकरात जैसे गुरू पाकर मैं धन्य हुआ |”

इमर्सन ने अपने गुरू थोरो से जो प्राप्त किया उसके महिमागान में वे भावविभोर हो जाते थे |

श्री रामकृष्ण परमहंस पूर्णता का अनुभव करानेवाले अपने सदगुरूदेव की प्रशंसा करते नहीं अघाते थे |

पूज्यपाद स्वामी श्री लीलाशाहजी महाराज भी अपने सदगुरूदेव की याद में स्नेह के आँसू बहाकर गदगद कंठ हो जाते थे | पूज्य बापूजी भी अपने सदगुरूदेव की याद में कैसे हो जाते हैं यह तो देखते ही बनता है | अब हम उनकी याद में कैसे होते हैं यह प्रश्न है | बहिर्मुख निगुरे लोग कुछ भी कहें,साधक को अपने सदगुरू से क्या मिलता है इसे तो साधक ही जानते हैं |