संत कबीरजी जयंती – २ जून २०१५

kabirjayantiसंत कबीरजी की वाणी

कबीरजी कहते है :
माया का सुख चार दिन, कहें तू गहे गँवार |
सपने पायो राज धन, जात न लागै बार ||

माया का सुख चार दिन का है | जैसे सपने में राज्य-धन आदि मिला… आँख खुली तो चला गया|  ऐसे ही यहाँ आँख बंद ( मृत्यु ) हुई तो माया का सुख चला गया | हे गँवार ! तू कब तक इसमें उलझेगा ? –
इस प्रकार का विवेक साथ रहता है तब मनुष्य इन पाँचो वैरियों से बाहर निकलता है |
इन पाँचो से बन्धिया, फिर फिर धरै शरीर |
जो यह पाँचो बसि करै, सोई लागै तीर ||

काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार – इन पाँचो से सभी बँधे है | कोई काम से बँधा है तो कोई क्रोध से, कोई लोभ से बँधा है तो कोई मोह से तो कोई अहंकार से बँधा है | इन पाँचो को वश करने की कला जिसको आ जाती है, वही मुक्त होता है | ये पाँचो बुरे नहीं है, उपयोगी हैं किंतु हम इनका सदुपयोग नहीं करते तो ये हमारा ही उपभोग कर लेते है | काम बुरा होता तो भगवान पैदा ही क्यों करते ?  क्रोध बुरा होता तो भगवान पैदा ही क्यों करते ? लोभ बुरा होता तो भगवान पैदा ही क्यों करते ? ‘काम’ नही होता तो सृष्टि की प्रवृति कैसे होती ?
भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं कहा है :
धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ ||
‘हे भरतश्रेष्ठ ! सब भूतों में धर्म के अनुकूल अर्थात् शास्त्र के अनुकूल काम मैं हूँ |’ (गीता: ७.११)

धर्म के अनुकूल होकर कामना पूर्ति करने की मना नहीं है, आवश्यकताओं की पूर्ति करने की मना नहीं है लेकिन जब हम धर्म के विरुद्ध कामनाओं की पूर्ति में लग जाते है तो कामनाएँ हमें अपना दास बना लेती है |
आप अहंकार करें तो इस बात का करें कि ‘मैं अमर आत्मा हूँ, चैतन्य हूँ, शरीर नहीं हूँ | शरीर की मौत के बाद भी रहता हूँ | मैं परमात्मा का सनातन अंश हूँ |’ – यह अहंकार तारने वाला है | परंतु ‘मैं सेठ हूँ …. मैं नौकर हूँ…मैं काला हूँ… मैं गोरा हूँ…’ – यह देह को ‘मैं’ मानने वाला अहंकार दुःखदायी है | ऐसे ही धन, पद, सत्ता, सौंदर्य आदि का अहंकार भी देह को ‘मैं’ मानने से ही होता है |
अहंकार है तो एक छोटा-सा शब्द पर न जाने कितने-कितने विस्तारों में हमको भटकाता रहता है | जैसे – बेटे या बेटी की शादी करनी है | व्यवस्था है ५० हजार रूपये की किंतु अहंकार बोलेगा कि रूपये उधार लाओ और शादी करो | कर्ज लेकर भी आदमी अच्छा दिखना चाहता है, इसको दंभ बोलते है |

घर में अपने ढंग से पूजा-पाठ करे रहे है और कोई भक्त मिलने आ गया तो पूजा-पाठ लंबा हो गया, यह दंभ है | दान कर रहे है और कोई देख रहा है तो उसके सामने ज्यादा दान किया – यह दंभ है | कोई संयमी है चाय नहीं पीता, प्याज नहीं खाता पर जहाज में ऐसा खाने-पीने वालों के बीच बैठा है तो कोई उसको बुद्धू न माने इसलिए न चाहते हुये भी वह ऐसा खा–पी लेता है तो यह भी दंभ है | है तो साधक परंतु अभक्तों के बीच रहते है, इसलिए ऐसा-वैसा खा-पी लेते है – यह भी दंभ है |

काम, क्रोध, लोभ, मोह तथा अहंकार – इन पाँचो का उपयोग नहीं सदुपयोग करो | कामना करनी है तो ईश्वर से मिलने की, अपने आत्मदेव को जानने की कामना करो| क्रोध करना है तो अपने दोषों पर क्रोध करो| लोभ करना है तो ध्यान–भजन का लोभ करो| मोह करना है तो आत्मा से करो|  अहंकार करना है तो ‘मैं अमर आत्मा हूँ’ या ‘मैं ईश्वर का शाश्वत, सनातन वंशज हूँ’ – ऐसा अहंकार करो |

जो पाँच विकार संसार की तरफ घसीट ले जाते है, इन्हें संसार के स्वामी के विषय में लगा दो तो वे पाँचो विकार निर्विकार नारायण से मिला देंगे |जब–जब मन में निषेधात्मक, नकारात्मक विचार आयें, संसार के व्यक्तियों और वस्तुओं से सुख लेने के विचार आये, तब-तब मन को परमात्म-चिंतन में लगा दो |

कोई पूछता है : ‘बाबाजी ! क्या हम खाएं-पीयें नहीं ?’

खाने-पीने, पहनने-ओढने की मनाही नहीं है पर ये सब सुख बुद्धि से नहीं वरन निर्वाह बुद्धि से करो | वासनापूर्ति के लिए नहीं वरन वासना निवृति के लिए करें | अनेक जन्मों से पति-पत्नी, नर–मादा के सम्पर्क से जीव भटकता आया है, इसलिए उसमें कामवासना होना स्वाभाविक है | यदि विवेक-वैराग्य का बल हो तो आजीवन ब्रम्हचर्य-व्रत पाले, नहीं तो विवाह करके भी संयम से रहे | काम को राम में बदल दे |
मन गोरख मन गोविन्द, मन ही औधड सोय |
जो मन राखै जतन करि, आपै करता होय ||

मन की दृढ़ता से ही लोग गोरखनाथ जी जैसे योगी बन जाते है | मन के पुरुषार्थ से ही मनुष्य भगवान कहलाता है | मन को बिगाड़ कर लोग औघड़ बन जाते है | जो मन को यत्नपूर्वक अपने वश में रखता है, वह स्वयं ईश्वर है |

‘हम औघड़ बने है… हम गोरखनाथ सम्प्रदाय के है… हम भगवान के सम्प्रदाय के है….’ तो मन जिससे मिलता है आपको वैसा बना देता है | इसलिए मन के साथ आत्मविचार रूपी मित्र जोड़ दो ताकि परमात्मा का साक्षात्कार करा दे |
मन पाँच विकारों में से कभी किसी के साथ तो कभी किसी के साथ जुड़ता रहेगा तो हमे खपा देगा किंतु मन अपने आत्म-परमात्म स्वरुप से जुड़ा तो हमारा कल्याण कर देगा |
मन दाता मन लालची, मन राजा मन रंक |
जो यह मन गुरु सों मिलै निसंक ||

मन ही दाता बनता है | मन ही लालची बनता है | मन ही राजा बनता है और मन ही रंक बनता है |यदि यह मन गुरु से मिले, गुरु के ज्ञान से मिले तो नि:संदेह गुरु बन जायेगा |
धन रहै न जीवन रहै, रहै न गाम न ठाम |
कबीर जग में जस रहै, करि दे किसी का काम ||

अंत में धन, जवानी, घर और गाँव कुछ नहीं रहेगा, जगत में केवल यश रहेगा | अत: किसी के काम आ जा | अपनी कामना मिटाने के लिए, अपनी वासना मिटाने के लिए सत्कर्म करने से चित्त में शांति आयेगी| मन में औदार्य सुख आयेगा, सात्त्विक गुण आयेंगे | उन सात्त्विक गुणों को सत्यस्वरूप परमातम को जानने में लगा देना चाहिए |
प्रीति रीति सब अर्थ की, परमारथ की नाहिं |
कहै कबीर परमारथी, बिरला कोइ कलि माहिं ||

संसार के सारे प्रेम-व्यवहार स्वार्थ के लिए है, परमार्थ के लिए नहीं | कबीरजी कहते है कि कलियुग में कोई विरला ही परमार्थी होता है |
बात बनाई जग ठग्यो, मन परमोधा नाहिं |
कहै कबीर मन लै गया, लाख चौराशी माहिं ||

जो ज्ञान की चिकनी-चुपड़ी बात बनाकर जगत को ठगते रहते है परंतु अपने मन को ज्ञानोपदेश कर शांत नहीं करते,
ऐसे लोगों को मन उन्हें चौरासी लाख योनियों में ले जाता है | किसी को डराकर, किसी को बहकाकर अथवा
बात बनाकर ठगना – यह भी तुम्हारा मन करता है और किसीका ज्ञान-ध्यान बढ़ाकर उसका कल्याण करना –
यह भी मन करता है | अत: मन को अपना मित्र बनाओ |

शीतल शब्द उचारिये, अहं आनिये नाहिं |
तेरा प्रीतम तुझहि में, दुसमन भी तुम माहिं ||

सदैव शीतल वाणी बोलो | अहंकार युक्त वचन न बोलो | अगर मन को सँवार दिया तो तेरा प्रीतम तुझमें ही है और अगर मन को बिगाड़ दिया तो तेरा दुश्मन भी तुझमें ही है | इसीलिए कहा गया है :

मन के हारे हार हैं, मन के जीते जीत |
कहै कबीर गुरु पाइये, मन ही के परतीत ||

मन के हार जाने से हार हो जाती है और मन के विजयी होने से विजय होती है | मन के दृढ़ श्रद्धा-विश्वास से ही समर्थ सद्गुरु मिलते है, जो जीवन-नैया के खिवैया है |