श्रीकृष्ण-अवतार का उद्देश्य

krishajanmashtmiश्रीकृष्ण-अवतार का उद्देश्य

मनुष्य को दुःख तीन बातों से होता है – एक कंस से दुःख होता है, दूसरा काल से और तीसरा अज्ञान से दुःख होता है। मथुरा के लोग कंस से दुःखी थे, यह संसार ही मथुरा है। कंस के दो रूप हैं – एक तो खपे-खपे (और चाहिए, और चाहिए…) में खप जाय और दूसरे का चाहे कुछ भी हो जाय, उधर ध्यान न दे। यह कंस का स्थूल रूप है। दूसरा है कंस का सूक्ष्म रूप – ईश्वर की चीजों में अपनी मालिकी करके अपने अहं की विशेषता मानना कि ‘मैं धनवान हूँ, मैं सत्तावान हूँ…।’ यह अंदर में भाव होता है।

दुसरा है काल का दुःख। यह कलियुग का काल है; इस काल में अमुक-अमुक समय में, अमुक-अमुक वस्तु से, अमुक-अमुक स्थान में व्यक्ति दुःख पाता है। दूषित काल है, प्रदोषकाल है तो उस काल में व्यक्ति पीड़ा पाता है, दुःख पाता है। यह काल का दुःख है कि अभी तो कर लिया लेकिन समय पाकर दुःख होगा। अभी तो निंदा कर ली, सुन ली लेकिन समय पाकर अशांति होगी, दुःख होगा, नरकों में पड़ेंगे, आपस में लड़ेंगे, उपद्रव होगा।

तीसरा होता है अज्ञानजन्य दुःख। अज्ञान क्या है? हम जो हैं उसको हम नहीं जानते और हम जो नहीं हैं उसको हम मैं मानते हैं तो

अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः।

‘अज्ञान के द्वारा ज्ञान ढका हुआ है उसीसे सब अज्ञानी मनुष्य मोहित हो रहे हैं।’ (गीता – 5.15)
krishnaकितने बचपन आये, कितनी बार मृत्यु आयी, कितने जन्म आये और गये फिर भी हम हैं… तो हम नित्य हैं, चैतन्य हैं, शाश्वत हैं, अमर हैं। इस बात को न जानना यह अज्ञान है।
तो कंस से, काल से और अज्ञान से छुटकारा – यह है श्रीकृष्ण-अवतार का उद्देश्य। श्रीकृष्ण कंस को तो मारते हैं, काल से अपने भक्तों की रक्षा करते हैं और ज्ञान से अज्ञान हर के भक्तों को ब्रह्मज्ञान देते हैं। यह श्रीकृष्ण-अवतार है।

तो अब क्या करना है? अपना उद्देश्य बना लें कि हमारे अंतःकरण में श्रीकृष्ण-अवतार हो, भगवदावतार हो, भगवद्ज्ञान का प्रकाश हो, भगवत्सुख का प्रकाश हो तो भगवदाकार वृत्ति पैदा होगी। जैसे घटाकार वृत्ति से घट दिखता है, ऐसे ही भगवदाकार वृत्ति बनेगी, ब्रह्माकार वृत्ति बनेगी तब ब्रह्म-परमात्मा का साक्षात्कार होगा। तो भगवद्ज्ञान, भगवत्प्रेम और भगवद्विश्रांति सारे दुःखों को सदा के लिए उखाड़ के रख देगी। इसलिए ब्रह्मज्ञान का सत्संग सुनना चाहिए, उसका निदिध्यासन करके विश्रांति पानी चाहिए।