श्री योगवशिष्ठ महारामायण भाग – ७

tera_prabhuयोग वशिष्ठ महारामायण : जो मनुष्य लेता है. देता है और सारे कार्य करता है, पर जिसके चित को अनात्म-अभिमान स्पर्श नहीं करता है उसको समाहित चित कहते हैं ।

बापूजी : लेता-देता, खाता-पिता सब व्यवहार करता है, लेकिन अविद्या वाली, अनात्म वाली वस्तु जिसके चित में सत बुद्धि नहीं करती वो मुक्त आत्मा है । प्रारब्ध वेग से दुःख आएगा, मान आएगा, सुख आएगा, निंदा आएगा, लांछन आएगा लेकिन सत्य बुद्धि नहीं है क्योंकी सत्य आत्मा है उसमे स्थिति हो गयी तो देह को और बाहर की चीजों को सत नहीं मानेगा । उसका कोई कुछ बिगाड़ नहीं सकता ।

जो आत्मा में स्थित होकर चेष्टा करता है उसको पाप नहीं लगता । उसको पुण्य का अभिमान नहीं होता । वो मुक्त आत्मा है । हाय सीता, हाय सीता, करके रामजी चिल्ला रहे हैं लेकिन ये लवर-लवरियों का चिल्लाना नहीं है । कोई लवर बोले देखो रामजी अपनी औरत के लिए रो रहे हैं तो हम भी अपनी औरत के लिए रोये तो क्या हुआ । तेरे को रोना है तो रो, रामजी रोते हैं लेकिन तू ऐसे रोयेगा तो रोता ही रहेगा फिर ।

योग वशिष्ठ महारामायण : जो पुरुष इष्ट की कामना नहीं करता और अनिष्ट में दुखी भी नहीं होता है, दोनों अवस्थाओं में सम रहता है उसको समाहित चित कहते हैं ।

बापूजी : वो जीवन-मुक्त है, खुली आँख उसकी समाधि है । वो समाहित चित है ।

योग वशिष्ठ महारामायण : इष्ट की कामना नहीं करता और अनिष्ट में दुखी भी नहीं होता है दोनों अवस्थाओं में सम रहता है उसको समाहित चित कहते हैं ।

बापूजी :  वो जीवन-मुक्त है, खुली आँख उसकी समाधि है । वो समाहित चित है । जो सुख के लिए इच्छा नहीं करता और दुःख से डरता-काँपता नहीं है, अपने सहेज स्वभाव में तटस्थ है, वो तो पूर्ण पुरुष है । जो सुख में सुखी, दुःख में दुखी, वो तो दो पैसे का है । लोहे जैसा – तपाया तो गर्म और पानी में डाला तो ठंडा । जो दुखी में दुखी नहीं होता और सुख में सुखी रहता है वो सोने जैसा है । जो सुख-दुःख में सम रहता है वो हीरे जैसा है । और जो सुख-दुःख सबको सपना समझता है वो तो शहंशाह है । शहंशाह की तिजोरी में कई हीरे होते है ।

योग वशिष्ठ महारामायण :  हे रामजी जिसके हृदय रूपी आकाश में विवेक रूपी चन्द्रमा सदैव प्रकाशता रहता है वह पुरुष शरीर नहीं, मानो शिर-समुद्र है ।

बापूजी : जिसको ऐसा ज्ञान हो गया वो शरीर नहीं मनो शिर-समुद्र है जो उसके निकट आता है वो गोते मरता है ।तस्य तुलना के न जायते॥ उस ज्ञानी महापुरुष की जिसको आत्म साक्षात्कार हुआ है उसकी तुलना तुम किससे करोगे ?तस्य तुलना के न जायते ।उसकी तुलना तुम किससे करोगे ?स तरतिवो तो तरता है,लोकान तारयतिऔर लोगों को तार लेता है ।स अमृतों भवतिवह अमृतमय हो जाता है और औरों को अमृत का स्वाद चखा देता है । वो मनो शिर-समुद्र है ।

योग वशिष्ठ महारामायण : हृदय में सदैव विष्णु विराजते हैं । जो कुछ उनको भोगना था वो उन्होंने भोगा और जो कुछ देखना था वह देख लिया है । फिर भोगने और देखने की कोई तृष्णा नहीं रहती ।

बापूजी : जो भोगना था वो भोग लिया और जो देखना था वह देख लिया है । फिर भोगने और देखने की कोई तृष्णा नहीं रहती । मनन नितध्यासन करके अपने को जान लिया तो सबके हृदय का आत्म स्वभाव ज्यों का त्यों । तो ये आत्म विषय में बुद्धि एक बार स्थित हो जाये, जग गए तो फिर ज्ञान नहीं होता । धारणा-ध्यान एक बार हो जाये, ऋद्धि-सिद्धि आ जाये और खर्च हो जाये तो आदमी ठन-ठन पाल हो जाता है । धन मिल जाये, आदमी मरता है तो छोड़कर ही मरता है फिर ठन-ठन पाल होता है । सौंदर्य,शक्ति और सत्ता मिलती है फिर भी कभी बुढ़ापे में आदमी ठन-ठन पाल होता है । लेकिन आत्म विषय में बुद्धि एक बार हो गयी, तो फिर ठन-ठन पाल नहीं होता है । और वो लोग अभागे हैं जिनको कोई कहने वाला नहीं होता, जिसके ऊपर अनुशासन नहीं । अनुशासन हीन व्यक्ति या तो स्वयं विवेकी हो या तो विवेकी के मार्गदर्शन में चले । जो आत्म-विवेक करके जगे हैं ऐसे पुरुष परम-स्वतंत्र हैं बाकी स्वतंत्र होना चाहेगा तो मन का गुलाम हो जायेगा ।

बच्चा अगर चाहे बचपन से ही स्वतंत्र हो तो पद-लिखकर काबिल ही नहीं होगा । बच्चा नहीं चाहेगा के मैं पढ़ने का झंझट मोल लूँ । बच्चा तो स्नान करना भी नहीं चाहेगा । माँ उसको पुचकारके, हुँकार के । और जो अति पराधीन होते हैं उनका विकास नहीं होता । किसी ना किसी के आधीन, किसी ना किसी की शरणागति होती है । अब शरणागति ज्ञानी की है के अज्ञानी की है ? स्वार्थी की है के निस्वार्थी की है ? हैं शरणागति है के उत्तम शरणागति है ? जैसे कैकई ने मंथरा की बात मानी तो मंथरा की शरणागति हुई । तो हैं शरणागति का परिणाम हैं आया ।

रामकृष्ण ने उत्तम शरणागति माँगी, माँ काली की तो माँगी लेकिन काली से भी आगे की यात्रा रामकृष्ण की हुई, गुरु तोतापुरी की शरणागति हुई । तो परिणाम ब्रह्मविचार आया । तो आप किसकी शरण हो ? किसकी बात मानते हो ? लापरवाह आदमी की, बेदरकार आदमी की, अज्ञानी की, मुर्ख की शरणागति लेते हो के सतर्क, ज्ञानवान की लेते हो ? त्त्व आप सतर्क रहते हैं तो अपने मन की शरणागति रहता है । जो जाकी शरणी गहे ताको ताकि लाज, उलटे बहाव मछली चले, बह चलो गजराज । मछली उलटे वेग में भी ऊपर को चलती है , वेग के उलटे में चलती है और हाथी बह जाता है । क्योंकी मछली पानी की शरण है । ऐसे ही जो ईश्वर की शरण है, शास्त्र की शरण है, ज्ञानवान की शरण है, तो उन्नति होगी । अपने मन की शरण में है तो २ साल, ३ साल किया साधन भजन जो थोड़ा बहुत सेवा और फिर जैसा मन में आये वैसा करने लगे । तो पहले की कमाई तो चट हो गयी और नया जीवन क्या पता कैसे गिरेगा ?

वो कहते हैं ना धोबी का कुत्ता ना घर का ना घाट का । वो साधारण अज्ञानी जैसा भी नहीं रहेगा और आत्मज्ञान भी नहीं पाया । आत्मा का भी अनुभव नहीं है तो ना उधर सेट होगा ना उधर सेट होगा । ऐसे ही जानकार महापुरुष ही जान सकते हैं । जैसे माता-पिता जानते हैं के बच्चा अब इधर जा रहा है तो आगे क्या-क्या है उसको नहीं समझ में आता है । अपनी मैं के साथ बच्चा खेलता है । अंगारों को चमकता हुआ समझकर उनमे हाथ डालेगा । गटर में जा रहा है । तो बच्चे को देखने वाले माँ-बाप हैं,तो बच्चा अभी माँ-बाप की शरण है तो वो ख्याल रखते हैं ।

ऐसे ही गुरु भी ख्याल रखते हैं अपने मन का । उत्तम शरणागति, उत्तम विचार और उत्तम में उत्तम विचार है आत्म-विचार । उत्तम में उत्तम है ब्रह्मज्ञान । तो ब्रह्म परमात्मा के विषय का ज्ञान पाकर ज्ञान मिटा दे अपना । फिर कोई डर नहीं पतन का ।
तो पानी ८० डिग्री पर गर्म हो गया, ७० पर ८० पर, और फिर छोड़ दिया तो फिर डाऊन हो जायेगा । अगर २०-२५-३० टका और कर लिया तो वो पूरा हो गया काम उसका । ये बात जो जानते हैं, जो मानते हैं वो कर लेते हैं बाकि के लोग खप जाते हैं अपने मन के इरादे पुरे करते करते । और मन के इरादे पुरे हुए तो भी संसार में भटकते हैं । कौन सुखी है ?

योग वशिष्ठ महारामायण : हे रामजी संसार समुद्र के तरने को ज्ञानवानों का संग करना और जो विकृत, निर्वैर पुरुष हैं उनकी भली प्रकार से टहल करना इससे अविद्या का अर्ध भाग नष्ट होगा |

बापूजी : तो आत्मविद्या कैसे मिले उसका उपाय बताते हैं राम के गुरूजी ।

योग वशिष्ठ महारामायण : संसार समुद्र के तरने को ज्ञानवानों का संग करना और जो विकृत, निर्वैर पुरुष हैं उनकी भली प्रकार से टहल करना इससे अविद्या का अर्ध भाग नष्ट होगा |

बापूजी :  जो निर्वैर पुरुष हैं, जिनको आत्मज्ञान मिल गया, पा लिया ऐसे पुरुषों का संग करना और ऐसे ब्रह्मज्ञानी महापुरुष की भली प्रकार से टहल करना, उसकी आज्ञा में रहना चाहिए । उनकी प्रसन्नता का ख्याल रखकर निर्णय करना चाहिए । तो आत्म-विषयी बुद्धि बनेगी । दिखावटी व्यवहार एक बात है, और वास्तविक में व्यवहार दूसरी बात है । ठाट-माट से शादी किया तो क्या सब ठाट-माट से शादी वाले जोड़े सब सुखी हो गए क्या ? जितने हमने देखे, जितने बड़े-बड़े होटलों में ठाट-माट से करते हैं उतने ही उनके जीवन में लगभग खिन्नता ज्यादा देखी जाती है । ठाट-माट से ख़ुशी का कोई संबंध नहीं है । ठाट-माट से शांति का कोई संबंध नहीं है । समझ से शांति का संबंध है । सच्चाई से शांति का संबंध है । सद्भाव से शांति का संबंध है । दिखावे से शांति का संबंध नहीं है । दिखावे से तो अहंकार का संबंध है । और अहंकार का विनाश के साथ संबंध है, अशांति के साथ संबंध है । तो आत्मविषयी बुद्धि होती है तो आत्मशांति से विचार करता है । लेकिन जगत विषयी बुद्धि होती है तो दे धमा-धम ।

दुःख भगवान ने नहीं बनाया, प्रकृति ने नहीं बनाया । जगत विषयी बुद्धि के कारण दुःख बना है । जगत में उलझ रहे हैं । ना खाने का कहते हैं तो बीमार पड़ेंगें । न सोचने का सोचते हैं, न करने का करते हैं तो अशांत होंगें ।

ऐसे ही अनात्म विषयी बुद्धि है तो आत्म विषयी बात लगती नहीं । संतों की बात दिल में लगती नहीं । मोह-माया की बातें ज्यादा घुसी हैं तो संतों की बात लगती नहीं । नहीं तो राम जैसे राम गुरुओं की आज्ञा के अनुसार राज-काज करते थे । और सीताजी को रामजी के साथ अर्धांग्नी के रूप में जाना था । वशिष्ठजी बोलते हैं के नहीं सीताजी गहने पहन के जाएँ । बकने वाले लोग बक रहे थे के ये महाराज क्या करते हैं ? जैसा पति ऐसा पत्नी को जाना चाहिए । हत्क्षेप किया वशिष्ठजी ने आके के सीता तो सजी-धजी महारानी होकर जाएगी । महाराज वल्कल हैं, राक्षस हैं, लुटेरे हैं जंगल में और सीता गहने पहनकर जाये, और राम तपस्वी का रूप लेकर जाये के हाँ ऐसे ही होगा । निंदा करने वालों ने तो खूब किया वशिष्ठजी की निंदा । लेकिन वशिष्ठजी ने हस्तक्षेप किया । सीता गहने पहन के ही गयी । और बाद में पता चला के यही गहने सीताजी फैकती-फैकती गयी और वही अंगूठी की निशानी रामजी ने हनुमान को दी और सीताजी को परिचय दिया कि हमारा दूत है । वशिष्ठजी ने हस्तक्षेप किया के वनवास सीताजी को नहीं मिला है, राम को मिला है । राम वनवासी होकर जाये, सीता वनवासी होकर नहीं जाएगी । लोग बोलने लगे इनका क्या जाता है पति-पत्नी में । मँगनी तो जनक राजा ने कराई,कन्या जनक की है और बेटा दशरथ का है । और वनवास कैकई के थ्रू है तो वशिष्ठ क्यों डिस्टर्ब करते हैं ? अरे मूर्खों वशिष्ठजी की कृपा है तो डिस्टर्ब करते हैं । डिस्टर्ब नहीं करते डिस्टर्ब से बचाते हैं ।

योग वशिष्ठ महारामायण : हे रामजी जैसे वानर चपलता करता है वैसे ही आत्मतत्व से विमुख अहंकार रूपी वानर वासना से चपलता करता है । जैसे गेंद हाथ के प्रहार से नीचे और ऊपर उछलता है वैसे ही जीव वासना से जन्मांतरों में भटकता-फिरता है । कभी स्वर्ग, कभी पाताल और कभी भूलोक में आता है । स्थिर कभी नहीं होता । इससे वासना को त्यागकर आत्मपद में स्थित रहो । हे तात ये संसार यात्री की मंजिल है,देखते-देखते नष्ट हो जाती है । इसको देखकर इसमें प्रीति करना और इसे सत्य जानना ही अनर्थ है । इससे संसार को त्याग कर आत्मपद में स्थित हो रहो । चित की वृति जो संसरण करती है इसी का नाम संसार है ।

बड़ा आश्चर्य है के मिथ्या, वासना से जीव भटकते-फिरते हैं । दुःख भोगते हैं । और बारं-बार जन्म लेते हैं और मरते हैं । बड़ा आश्चर्य है के विषय-वासना के बस हुए जीव अविद्यमान जगत को भर्म से सत्य जानते हैं ।

हे साधो ! जो इस वासना रूपी संसार से तर गए हैं वे वास्तव में धन्य हैं । वे प्रत्यक्ष चन्द्रमा की तरह शांत हैं । जैसे चन्द्रमा अमृत रूप, शीतल और प्रकाशमान है और सबको प्रसन्न करता है वैसे ही ज्ञानी पुरुष भी ।

इससे तू धन्य है के तुझे आत्मपद पाने की इच्छा हुई है । ये संसार तृष्णा से जलता है । जिनकी चेष्टा तृष्णा संयुक्त है, उनको तू बिलाव जान । जैसे बिलाव तृष्णा से चूहे को पकड़ता है वैसे ही वे भी तृष्णा से युक्त चेष्टाएँ करते हैं । मनुष्य शरीर में यही विशेषता है कि वह किसी भी प्रकार से आत्मपद को प्राप्त कर ले । जो नर देह पाकर भी आत्मपद पाने की इच्छा ना करें तो वह पशु समान है । विकार रहित है, पर वो उसको विकारी जानता है ।

बापूजी : वास्तव में तुम ६ विकारों से रहित हो । कौन से ६ विकार? कि जायते-जन्मना, वर्धते-बढ़ना, परिवर्तन-बदलना, क्षीयते-क्षीण होना, विनश्यते-मर जाना । इस प्रकार के विकार शरीरों में हैं । तुम्हारे में नहीं । लेकिन जो तुम हो उसका पता नहीं है क्योंकी आत्म-विषयी बुद्धि नहीं है । और जो तुम नहीं हो अविद्यमान शरीर है उसको तुम मैं मानकर अविद्या में ही घूम रहे हो । तो ये षड्विकार शरीर में हैं । जन्मना, दिखना, बढ़ना, बदलना, परिणाम पाना, क्षीण होना और नष्ट होना । ये छह विकार शरीर के पीछे हैं । छह विकार शरीर के हैं । पाँच उर्मियाँ भूख, प्यास, सर्दी, गर्मी, क्षोभ ये सब मन के विकार हैं । प्राणों के और मन के विकार हैं । लेकिन जो मन के, तन के विकार हैं वो अपने मानते हैं और अपन क्या हैं उसका पता नहीं है । और सब महेनत कर-करके बिचारे थक रहे हैं । कोई शांति नहीं, कोई ईश्वर का ज्ञान नहीं, कोई पूर्ण जीवन से संतुष्ट नहीं । तो आत्म संतोषी मति बढ़ानी चाहिए ।

आत्म परमात्मा की सिद्धि, विधि से भी होती है और निषेध से भी होती है ।

$$$$$ ॐ ॐ ॐ प्रभुजी ॐ ॐ ॐ $$$$$