श्री योगवशिष्ठ महारामायण भाग – १

ghyanwardhak

ये योगवशिष्ठ महारामायण है । भगवान रामजी १६ साल की उम्र के थे, यात्रा करने गये । यात्रा करके १ साल के बाद जब लौटे यात्रा की फलश्रुति, यात्रा का फल उनके हृदय में प्रकट हुआ । कई नदियाँ देखी, कई पोखरे देखे, कई तालाब देखे, कई बड़े महल खंडर में बदलते देखे । युवक बुढ़ापे में ढलते देखे । बूढ़े मौत की शरण होते देखे । और मौत उनकी हड्डी-पिंजर श्मशानघाट पर जलाकर आग में विसर्जित भी देखी हड्डियां । कइयों के हाथ बहते, जलते देखे । रामजी आकर एकांत में बैठ गये चुप-चाप । जिस संसार के पीछे इतनी भाग-दौड़ है उसका अंत तो देखो ।

जवानी में लोग बड़े-बड़े तरंगों पर उछलते हैं के हम डॉकटर बनेंगें, वकील बनेंगें, नेता बनेंगें, कोई कुछ,कोई कुछ । लेकिन अंत में बुढ़ापे की ढलान और मृत्यु सबको राख में मिला देती है । तो ऊँचे-ऊँचे तरंगों, पदवियों पर उछलने के बाद भी शरीर की तो यही हालत हो जाती है ।ऐसी कोई सार चीज नहीं दिखाई देती है जिसको पाकर हम निश्चिन्त हो जायेजिसको पाकर कुछ पाना बाकि ना रहे ऐसी कोई स्तिथि दिखती नही है । दिन को रात निगल जाता है । रात को दिन निगल जाता है । ऐसे करते-करते आयुष्य पूरी हो जाती है । जिस शरीर को खिलाते-पिलाते पदवियां दिलाते वो एक दिन श्मशान में, घर में लाचार हालत में, बुढ़ापे में, लाचार हालत में पड़ जाता है । पद, प्रतिष्ठा, अधिकार होते हैं । लोग अपना काम बनवा लेते हैं । लेकिन काम बनाने वाली हमारी योगयता और जिनके काम बनते हैं वो भी तो सारे निकम्मे हो जाते हैं ।

उमा कहूँ मैं अनुभव अपना,सत्य हरि भजन जगत सब सपना कोई सपने देखे और पूरा भी करें तो भी अंत में क्या ? कोई मिलियनर होने के सपने देखे और हो भी गया, फिर उसके पैसे कोई ले भागता है । ये झापा-झपी चलती रहती है । सुबह का बचपन हँसते देखा,दोपहर की मस्त जवानी,शाम का बुढ़ापा ढलते देखा,रात को खत्म कहानी । अमीरी में जिये तो क्या और गरीबी में जिये तो क्या ?  महलों में पलकर श्मशान में गिर तो क्या और झोपड़ों में पलकर श्मशान में गये तो क्या । आखिर ये शरीर श्मशान और कब्रिस्तान का । पथिक हो जाता है, संसार में कोई सार चीज नहीं दिखती । असार-असार में लोग भटक रहे हैं और मैं भी उन्हीं की नाई भटकूँगा ? क्या सार है ? ऐसा सोचते-विचारते रामचन्द्रजी विवेक को जगा लिए थे । विवेक जगा फिर किसी चीज में राग करने जैसा नहीं लगा । विवेक कम होता है तभी राग दीखता है ये मिल जाये, वो मिल जाये । तीव्र विवेक जगे तो देखेगा के अपनी जिंदगी खपा रहे हैं । १६ साल की उम्र में जब रामजी यात्रा करके लौटे तो उन्हें लगा के मंत्री और इर्द-गिर्द के लोग सब संसार में रमे हुए हैं और उन्हें कहते के ये क्या तुम रमे हुए हो ? ये सब मौत की तरफ घसीटे जा रहे हैं । कुछ सार नहीं दीखता जिसमें मैं मन लगाऊँ ।

वैसे ५० साल के आसपास ये विवेक जगता है सब का । रामजी का १६ वर्ष में जगा । ध्रुव, सुकरात का जल्दी हुआ । रामजी उसी में खोये रहते थे ।

यज्ञ का ध्वंस करवाने वाले मारीच आदि राक्षस विश्वामित्र तो तंग कर रहे थे । विश्वामित्रजी ने सोचा दशरथ राजा धर्मात्मा हैं, मैं उनसे मदद लूँ । ज्यों ही राजा दशरथ जी ने विश्वामित्रजी को देखा त्यों ही वे अपने आसन से उठे और दंडवत प्रणाम करते हुए विश्वामित्रजी से मिले । इतना आदर रखते थे आत्मज्ञानी पुरुष का । विश्वामित्रजी को लाये, पैर धुलाए आरती किया । फिर पूछा मैं क्या सेवा करूं ?बोले जो मैं मागूँगा आप दोगे ? बोले महाराज आपके लिए तो ये राज्य भी कम है और मैं और मेरा राज्य आपके चरणों में हाज़िर है । बोले वो नहीं चाहिए, तुम्हारे राम और लक्ष्मण दे दो । ये सुनते ही दशरथ राजा मूर्छित जैसे हो गये । कहने लगे महाराज ये मत माँगो और कुछ माँग लो । विश्वामित्रजी ने आँख दिखाई के अच्छा खाली घर से साधू खाली जाता है । अभागा आदमी क्या जाने साधू की सेवा? साधू के दैवी कार्य में भागीदारी कौन अभागा कर सकता है ? हम ये चले । दशरथ घबराये के संत रूठके, नाराज होकर जाए तो अभीष्ठ है । फिर वशिष्ठ महाराज ने बात सम्भाली । और उन्होंने दशरथ को समझाया के विश्वामित्र स्वयं समर्थ हैं राक्षसों को श्राप देने में । लेकिन संत लोहे से लोहा काटना चाहते हैं, सोने से लोहा नहीं । आपके राजकुमारों को प्रसिद्ध भी करेंगें और ताड़का आदि का वध भी करांगे । भले राम, लक्ष्मण कोमल हैं, मक्खन के पिंड हैं लेकिन इनके पास वज्र जैसा तपोबल है । राम,लक्ष्मण इनको अर्पण करने में ही आपकी शोभा है । तो बोले राम को विवेक जगा है और वे संसार से उपराम हो बैठे हैं । विश्वामित्र जी ने कहा साधो ! साधो ! जब विवेक जगो तो हम रामजी को ज्ञानी बना के भेज देंगें । कर्म बंधन से पार कर देंगें । ब्रह्मज्ञानी होकर राज करे । ब्रह्म ज्ञान पाये पहले । पहले ये कर लें, वो कर लें, तो ईश्वर में प्रीति कम है, विवेक की जागृति कम है । जगत की जागृति ज्यादा है । तब ये नश्वर के खिलौने पहले बराबर खेल लूँ तब बाद में हीरों को पहचानूँगा तो अभी बालक है । रामजी १६ वर्ष के बालक होते हुए बड़े महाबुजुर्ग हो गये । वशिष्ठजी ने कहा साधो ! साधो !

रामजी को जब लाये तो उन्होंने अपने हृदय के विचार प्रकट किये । वो हो गया वैराग्य प्रकरण १ । फिर विश्वामित्र, वशिष्ठ ने उनको उपदेश देकर उनके वैराग्य कि सरहाना करके, जैसे बीज होता है तो बो कर उनमें सिंचाई की जाती है वैसे ही उन में संस्कार सींचे । तो दूसरा प्रकरण बन गया, मुमुक्षु प्रकरण । फिर ये जगत उतपति कैसे हुई, कैसे सृष्टि का मूल हुआ है ये उपदेश दिया गया । तो उतपति प्रकरण बन गया । फिर आत्मा में स्तिथि और अनात्मा से उपराम होना तो स्तिथि प्रकरण बन गया । फिर उपदेश का सिलसिला बढ़ता गया तो उप्शन प्रकरण बन गया । विश्रांति परमात्मा में, दुःख-सुख में सब एक । आखरी छटा बन गया निर्वाण प्रकरण । जैसे तेल खत्म हो गया तो दिया निर्वाण हो गया ऐसे मन की दौड़, मन की भटक निर्वाण हो गयी । जब चाहे मन, विकारों का उपयोग कर लिया, छोड़ दिया तो बैठ गये । दौड़ेगा नहीं फिर, ऐसी स्थिति तो पाएं । योगवशिष्ठ इस के लिए बहुत अच्छा है । ये संसार तो देख लिया अब वो देखो जिससे सारा संसार है ।

रामजी को परमात्मा का साक्षात्कार हो गया और वे विश्वामित्रजी के साथ चले । इसको बाल्मीकि रामायण भी बोलते हैं । रामतीर्थ ने इसी का बार-बार अध्यन किया था । और रामतीर्थ इतने उछले इस अनुभव में के जब वे अमेरिका गये तो वहाँ का प्रेसिडेंट रुसवेल रामतीर्थ से बड़ी शांति पाता है । आप भी शांत हो जाये परमात्मा में और दूसरों को भी शांति देने वाला ये सद्ग्रंथ है । इसको वेदांत का सिद्धांत ग्रंथ बोलते हैं ।

दूसरे होते हैं प्रक्रिया ग्रंथ । ये करो, वो करो, कब आचार्य बनो और फिर समझो ? ये तो वही सिद्धांत की बात । बार-बार योग वशिष्ठ महारामायण विचारने योग्य है ।

योगवशिष्ठ महारामायण : वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! संकल्प से कल्पित विषय का आनंद जब जीव को प्राप्त होता है, तब ऊँची ग्रिव्हा करके हर्षवान होता है । जैसे किसी वृक्ष के फल ऊँट के मुँह में आ लगे, और वो ऊँची ग्रिव्हा करके विचले तैसे ही अज्ञानी जीव विषयों की प्राप्ति में ऊँची ग्रिव्हा करके हर्षवान होते है । क्षण में जीव को विषय की प्राप्ति उपह्स्ती है और विशेष करके इष्ट की प्राप्ति में बढ़ते हैं । पर जब कोई दुःख होता है, तब प्रीति की प्रसन्नता उठ जाती है ।

बापूजी : बस ऐसे ही है । आँखों, जीभ, नाक को मजा अथवा तो सेक्स इंद्री को मजा आने की जो चीज होती है उधर जीव फिसल पड़ता है । जैसे पेड़-पौधे, हरी घास को देखकर ऊँट अपना डोक ऊँची करता है ऐसे ही अपना मन उधर को उछलता है, परिणाम का विचार नहीं करता और आयुष्य पूरी कर देता है । इसीलिए परिणाम का विचार करें तो उपयोगिता होगी अभी उपभोग करता है, मजा लेने को और मजा ही उसके लिए सजा है । जैसे मुर्ख मक्खी चाश्नी की कढ़ाई में मजा लेने को डूब मरती है, सयानी मक्खी किनारे-किनारे उपभोग करती है । ऐसे ही जो सयाने हैं जगत में रहते हुए जगत से निर्लेप होकर,उपयोग करके बाकी समय बचाकर परमात्मा को पा लेते हैं । और जो मुर्ख हैं वो डूब मरते हैं विकारों में । अपने को परिणाम का विचार कराने वाली मति के धनी बनाना चाहिए के आखिर कब तक, इतना भोगा, इतना मिला, इतनी वाह-वाही हो गयी कब तक ? इतने पैसे इकट्ठे हो गये आखिर कब तक ? इतने रिश्ते-नाते आखिर कब तक ? इस नश्वर शरीर का नाम करने के लिए आये । मैं कौन हूँशरीर मरने के बाद भी जो रहता है वो कौन हैऐसा विवेक,वैराग्य जगा के अपने आत्मा-परमात्मा को पा लेना चाहिए । जहाँ पे प्रकृति का बंधन सदा के लिए हट जाता हैमुक्त आत्मा हो जाता है ।