श्री योगवशिष्ठ महारामायण भाग – ३

g66योगवशिष्ठ महारामायण : हे रामजी ! जिस पुरुष को बड़े भोग प्राप्त हुए हैं, और उसने इंद्रियों को जीता नहीं, तो वो शोभा नहीं पाता है । जो त्रिलोकी का राज्य प्राप्त किया और इन्द्रियां ना जीती, तो उसकी भी कुछ प्रशंसा नहीं । जो बड़ा शूरवीर है और उसने इंद्रियों को नहीं जीता तो उसकी भी शोभा कुछ नहीं ।

बापूजी : बड़ा शूरवीर है और उसने इंद्रियों को नहीं जीता तो उसकी भी शोभा कुछ नहीं । बड़ा राज्य है लेकिन सयंम नही तो कोई शोभा नहीं । बड़ा धन है, बड़ा परिवार है लेकिन आत्मसुख नहीं तो कोई सुख नहीं । आत्म शांति, आत्म सुख, आत्म ज्ञान ।

योगवशिष्ठ महारामायण : जिसकी बड़ी आयु है और उसने इन्द्रियां नहीं जीती तो उसका वो जीना भी व्यर्थ है । रामजी, जिस प्रकार इन्द्रियां जीती जाती हैं, और आत्म पद प्राप्त होता है सो सुनो । इस पुरुष का सवरूप अचिंत चिन मात्र है । उसमें जो संवित जगी है, उस ज्ञान संवित का अंतरकरण और दृश्य जगत से संबंध हुआ है, उसी का नाम जीव पड़ा है ।

बापूजी : जो चैतन्य परमात्मा है उससे जो संवित, फुरणहुत हुआ और जगत की तरफ गया और जीने की इच्छा हुई तो नाम जीव पड़ा । नहीं तो है तो शुद्ध परमात्मा । Every Man is God playing fool. सब भगवान का स्वरुप हैं लेकिन मूर्खों की नाई खेल रहे हैं । मैं दुखी हूँ, मैं ये करूं, वो करूं । वाईन पियेगा, विस्की पियेगा, सिगरेट पियेगा तो मजा आएगा । डॉलर मिलेगा तो मजा आएगा । मजा इसमें नहीं है, मजा तो soul (आत्मा) में, अपने आप में है । सब भगवद् स्वरूप हैं लेकिन खेल रहे हैं पागलों के जैसे । सब सपना हो गया, सब सपने में बदल रहा है, अच्छा बुरा-सब फुरना मात्र है| । सपने को देखने वाला अपना परमात्मा साक्षी है |

योगवशिष्ठ महारामायण : हे रामजी, जहाँ से चित्त जगता है वहीं चित्त को स्थिर करो, तब इंद्रियों का भी आभाव हो जायेगा । इंद्रियों का नायक मन है । जब मन रूपी मतवाले हाथी को वैराग्य और अभ्यास रूपी जंजीर से जकड़कर वश करोगे, तभी तुम्हारी जय होगी और इन्द्रियाँ रोकी जा सकेंगी । जैसे राजा को वश करने से सारी सेना भी वश हो जाती है, वैसे ही मन को स्थिर करने से सब इन्द्रियाँ वश हो जाएँगी । हे रामजी, जिस-जिस ओर मन जावे उस-उस ओर से उसे रोको । जब दृश्य जगत की ओर से मन को रोकोगे तब वृत्ति, संवित ज्ञान की ओर आवेगी । और जब वृत्ति ज्ञान की ओर आये तब तुमको परम उदारता प्राप्त होगी और शुद्ध आत्मसत्ता का ज्ञान होगा ।

बापूजी :  जहाँ-जहाँ मन जाये उसको रोको अपने आत्मा में, ज्ञान में, शांति-आनंद मिलेगा, परम उदार स्वरुप का अनुभव होगा । जो मन में आये ऐसा कर लिया, भोग लिया, खा लिया, तो धीरे-धीरे तमोगुण बढ़ जायेगा, क्रीडक योनि में जायेगा । मन में आया वो भोगा, थोड़ा छोड़ा, तो रजोगुण बढ़ जायेगा, मनुष्य जन्म में भटकेगा | मन में आया लेकिन सात्विक किया और बाकि को रोका सत्वगुण आयेंगे लेकिन मन को भगवान में रोक दिया, आत्मा में, यह साधन सबका बाप है | जैसे राजा वश हो जाता है तो सारी सेना वश हो जाती है, ऐसे ही मन वश हो गया तो इन्द्रियाँ यह-वह-सब..वश हो जाता है | रोज अभ्यास करना चाहिए ध्यान करने का श्वासों-श्वास के द्वारा, जप के द्वारा, एक-टक देखने के द्वारा,अभ्यास करें | २ घंटे गृहस्थी को रोज ध्यान करना चाहिये और जो सब कुछ छोड़ कर साधू बन गये हैं, उनको कम से कम ४ घंटे रोज ध्यान में गुजारने चाहिए | इधर से उधर – इधर से उधर, ४ घंटे ध्यान करें, ६ घंटे सोये तो १० घंटे हुए | ८ घंटे सेवा करे कमाए खाये तो १८ घंटे हुए, फिर भी ६ घंटे फालतू हैं और ८ घंटा तत्परता से काम करे तो जो १२ घंटे में नहीं होता उतना ८ घांटों में हो जायेगा |जो समय का दुरूपयोग करता है, समय उसी को खा जाता है|

योगवशिष्ठ महारामायण : हे रामजी, इन्द्रियाँ और मन रूपी चील पक्षी हैं जब इनको विषय भोग नहीं होते तब उर्ध्व को उड़ते हैं और जब विषय प्राप्त होते हैं तब नीचे को आ गिरते हैं |

बापूजी : जैसे चील, गिद्ध जब कुछ होता नहीं तो आकाश की ओर ऊपर उड़ते हैं लेकिन जब देखते हैं मरा हुआ साँप , मरा हुआ ढोर, विषय तो धड़ाक नीचे…ऐसे ही मन विषय विकार नहीं तो बैठे हैं ध्यान में तो ऊँचा उठता है और जब संसार का चस्का लगता है तो फिर गिरता है नीचे | एक पंडित ने बिल्ली पाल रखी थी, भागवद की कथा करे और बिल्ली को बिठाये पास में… बिल्ली हो पास में और भागवद की कथा.. भागवद की कथा प्रारम्भ करे तो बिल्ली के माथे पर दीया हो उसको जला दे और बिल्ली को हाथ घुमावे की भागवद कथा सुनने वाली मुख्य यजमान महारानी बिल्ली बैठिये…बैठे रहेगी ना ! बिल्ली पाली हुई थी पूँछ हिलाती थी | पंडित जी कथा करते ..कथा करते ..जब तक कथा चलती रहती और बिल्ली हिले डुले नहीं और दीया उसके सिर पर ..एक आध घंटे कथा हो जाती | पब्लिक बहुत बढ़ने लगी, पंडित की कथा तो कथा लेकिन वो पंडित की बिल्ली देखने आते थे कि बिल्ली कथा सुनती है और उसके सिर पर दीया-दीपक रखते और बिल्ली हिलती नही है… कैसा यह ? तो कथा में भीड़ होने लगी तो किसी ने जाकर किसी गुरु, संत को बताया की पंडित के पास तो बहुत लोग आते हैं |आकर्षित करने के लिये एक युक्ति है उसने बिल्ली पाला है और उसके सिर पर दीया रखते हैं और जब तक कथा चलती है बिल्ली ध्यान से कथा सुनती है | गुरु ने कहा अब तुम ऐसा करो कि तुम कथा सुनने चले जाओ और एक चूहा ले जाओ पिंजरे में और कथा सुनने जाओ तब तक तो पिंजरा ढक कर ले जाना | जब बैठो बिल्ली के सामने और थोड़ी-सी कथा शुरू हो तो धीरे-से जिसमें चूहा छुपा है वह पिंजरे का …धीरे से पिंजरे का कवर , वस्त्र हटा तो बिल्ली को चूहा दिखेगा और फिर क्या होता है दीये का और पंडित की कथा का मेरे को बताना | भगत ने ऐसा किया, वह ले गया ढक के कोई सामान है ऐसा ..बराबर बिल्ली के सामने बैठा और पंडित ने अपना श्लोक शुरू किया कथा “अथ श्रीमद् भागवतं चतुर्दश अध्याय आरम्भ, द्वितीया स्कंध चतुर्दश अध्याय, अच्युतम वासुदेवाय”…. पंडित ने कथा शुरू की तो भगत ने पिजरे पर से पर्दा हटाया और पर्दा हटाते ही बिल्ली कूदी और बस !!! ..ऐसे ही हमारे बुद्धि और मन जब तक विषय-विकार नहीं तब तक भले सीधे-सज्जन लगते हैं और जो विषय-विकार, यह-वह आये तो फिर सब भूल जाते हैं क्योंकि निर्विकार भगवान के स्वरुप का अभ्यास नहीं है और सच्चे सुख के तरफ तत्परता नही है | वशिष्ठ जी गुरु हैं राम जैसा सतशिष्य हैं |

योग वशिष्ठ महारामायण :  वशिष्ठ जी बोले हे राम जी, अपने पुरुषार्थ का आश्रय करो नहीं तो सर्प, कीट आदि की नीच योनियों को प्राप्त होगे |

बापूजी : वशिष्ठ जी गुरु हैं, राम जैसा शिष्य है फिर भी सावधान करते हैं पुरुषार्थ का आश्रय करो नहीं तो सर्प,कीट, पतंग नीच योनियों को प्राप्त होगे |

योग वशिष्ठ महारामायण : जो अल्प भी बुद्धि सत्य मार्ग की ओर होती है, तो बड़े-बड़े संकटों को दूर कर देती है जैसे छोटी नाव भी नदी से उतार देती है | संसार रूपी समुद्र के तरने को अपना बुद्धि रूपी जहाज़ है और तप, तीर्थ आदि शुभ आचार से जहाज़ चलता है | हे राम जी जो बोध से रहित, चल ऐश्वर्य से भी बड़ा है उसको तुच्छ अज्ञान भी नष्ट कर डालता है |

बापूजी जैसे नाव भी बड़े सागर को पार करा देती है ऐसे बल करके अपना, संसार से तर जाना चाहिये | छोटी-सी युक्ति का आश्रय ले कर भी विवेक वैराग्य बढ़ाना चाहिये सावधानी-साधना बढ़ानी चाहिये | ऐसा अपना बल पूर्वक कार्य कर के कल्याण करना चाहिये |

योग वशिष्ठ महारामायण कर्मो के फल की इच्छा भी ना हो और कर्मो से नीरसता भी ना हो |

बापूजी हाँ, क्या सार बात है !! कर्म के फल की इच्छा भी ना हो और नीरसता भी ना हो | बेदरकर, पलायन वादी से तो स्वार्थी अच्छा और स्वार्थी से निःस्वार्थी अच्छा | बेदरकर, पलायन वादी से तो तत्पर स्वार्थी अच्छा और स्वार्थी से नि:स्वार्थी अच्छा |

योग वशिष्ठ महारामायण वशिष्ठ जी बोले हे रामजी, जो पुरुष अद्वैत निष्ठ हैं उनके हृदय से त्याग और ग्रहण की भ्रांति चली जाती है | वे उस भ्रम से रहित हो कर प्रारब्ध के अनुसार चेष्ठा करते हैं जो कुछ स्वाभाविक क्रिया उनकी होती है | जब तुझको विवेक से आत्म-तत्व का प्रकाश होगा तब तू संसार की तुच्छ वृत्तियों में ना डूबेगा जैसे गोपद के जल में हाथी नहीं डूबता तैसे ही तू राग-द्वेष में ना डूबेगा जिसको देह में ..

बापूजी : गाय के खुर जितना गड्डा हो तो हाथी क्या डूबेगा उसमें ?! ऐसे ही जिसका विवेक हो गया उसके लिये संसार गोपद की नाई हो जाता है फिर वह संसार का लेते-देते खाते-पीते व्यवहार करते हुये भी उसमें सत्य बुद्धि नहीं रहेगा, आसक्ति नहीं होगी, ममता नहीं रहेगी |

योग वशिष्ठ महारामायण : परम आकाश ही जिसका हृदय मात्र विवेक है और बुद्धि उसकी सखी है जिसके निकट विवेक और बुद्धि हैं वे परम व्यव्हार करते हुये भी संकट को कभी भी प्राप्त नहीं होते |

बापूजी जिनके पास बुद्धि सात्विक है और विवेक है | कोई भी काम करो तो धैर्य से, सात्विक बुद्धि से, रात को,देर रात को निर्णय करना, देर रात को भोजन करना, देर रात को कोई निर्णय करना, कल के लिये ठीक नहीं है | सुबह सात्विक बुद्धि हो तब निर्णय करें | जो भी काम करें खूब निर्णय विचार कर के करें|

योग वशिष्ठ महारामायण तत्ववेत्ताओं के संग से जैसा अमृत मिलता है वैसा शीर समुद्र से भी नहीं मिलता, वह जो देवताओं की सेवा से भी नहीं मिलता | जिसका आदि अंत नहीं और जो अनंत और अमृत सार है, ऐसा अमृत तत्ववेत्ताओं के संग से मिलता है |

बापूजी : जिसका आदि नहीं, अंत नहीं और अमृत का सार है ऐसा सुख स्वरुप परमात्मा का ज्ञान और शांति माधुर्य और मस्ती | तत्ववेत्ता, परमात्मा प्राप्त महापुरुषों से जो सुख मिलता है, शांति मिलती है, ज्ञान मिलता है और आदि-अंत जिसका नहीं है उस अनंत का प्रकाश जो मिलता है वैसा शीर सागर के अमृत के पास नहीं है स्वर्ग की अप्सराओं के पास नही है, यक्ष, गंधर्व और किन्नरों के पास नहीं है | वशिष्ठ जी कहते हैं हे रामजी, मैंने चौदह लोकों में विचरण किया…कहीं सार नहीं है…गंधर्व गान करते फिरते है लेकिन जिससे गाया जाता है उस परमात्मा सुख का उनको पता नहीं है | उन गंधर्वों को धिक्कार है |यक्ष यक्षिणियों के पीछे याक्षिणियाँ यक्षों से सुख ढूंढते फिरते हैं लेकिन जो सुख-स्वरुप है उसका उनको पता नहीं है इसलिए उनको मेरा धिक्कार है |

योग वशिष्ठ महारामायण : वह मुक्त और उत्तम उदार चित्त पुरुष, मुक्ति रूप परमेश्वर हो जाता है | हे रामजी! मैंने चिरकाल पर्यंत अनेक शास्त्र विचारे हैं और उत्तम से उत्तम पुरुषों से चर्चा भी की है परंतु परस्पर यही निश्चय किया है कि भली प्रकार से वासनाओं का त्याग करें, इससे उत्तम पद पाने योग्य कोई नहीं | जो कुछ देखने योग्य है वह मैंने सब देखा है और दसों दिशाओं में मैं भ्रमा हूँ | कई जन यथार्थ दर्शी दृष्टि आये हैं और कितने हेय-उपादेय संयुक्त भी देखे हैं पर सभी यही यत्न करते हैं इससे भिन्न कुछ नहीं करते |सारे ब्रह्माण्ड का राज्य करें अथवा अग्नि और जल में प्रवेश करे पर ऐसे ऐश्वर्य से संपन्न होकर भी आत्मलाभ के बिना शांति प्राप्त नहीं होती |

बापूजी खाली गुजरात का नहीं, खाली भारत का नहीं, पूरी पृथ्वी का नहीं, पूरे ब्रह्माण्ड का राज्य मिल जाये |पूरे ब्रह्माण्ड का, चौदह लोकों का और आत्म शांति नहीं मिली तो भी ठनठन पाल हैं और आत्म-शांति मिली तो ब्रह्माण्ड के राजा का भी बाप का बाप |

योग वशिष्ठ महारामायण : वशिष्ठ जी बोले हे रामजी! बड़े बुद्धिमान और शांत भी वही हैं जिन्होंने अपने इन्द्रीय रूपी शत्रु जीते हैं और वही सुरमे हैं | उनको जरा, जन्म और मृत्यु का अभाव है वही पुरुष उपासना करने योग्य है |

बापूजी वैसे ही पुरुष उपासना करने योग्य है | भगवान का तो काल्पनिक चित्र किसी ने बनाया है लेकिन भगवान जहाँ अपनी महिमा में प्रकट हुये वे पुरुष तो साक्षात् हमारे पास हैं वे उपासना करने योग्य हैं,पूजने योग्य है | कट्ठ्वली उपनिषद में आता है जिसको इस लोक का यश और सुख सुविधा चाहिये वो भी ज्ञानवान का पूजन करे और परलोक में किसी ऊँचे लोक में जाना है तभी भी

यं यं लोकं मनसा संविभाति| विशुद्धसत्त्वः कामयते यांश्च कामान् ||” वो ज्ञानी अपने शिष्य के लिये भक्त के लिये मन से जिस-जिस लोक की भावना संकल्प कर देता हैं उसका शिष्य उसी उसी लोक में जायेगा |तं तं लोकं जयते तांश्च कामां| स्तस्मादात्मज्ञं ह्यर्चयेद् भूतिकामः।।अपनी कामना पूर्ण करने के लिये आत्मज्ञानी पुरुष का पूजन करें, अर्चन करें, उपासना करें | लेकिन हम तो कहते हैं कि आत्मज्ञानी पुरुष का पूजन अर्चन करो ये तो ठीक लेकिन आप ही आत्मज्ञानी हो जाओ मेरा उधर ज्यादा ध्यान है… घुमा-फिरा कर हमारा प्रयत्न उधर ही रहता है |