श्री योगवशिष्ठ महारामायण भाग – ४

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योग वशिष्ठ महारामायण : हे रामजी, ज्ञानवान उस उत्तम पद में विराजता है जिसकी अपेक्षा से चंद्रमा और सूर्य पाताल में भासते हैं |

बापूजी इतना व्यापक, इतनी ऊचाई में उसकी चेतना व्याप्त रहती है की चंद्रमा और सुर्य भी पाताल में भासते हैं | इतना ज्ञानी उत्तम पद में, उचें में होते हैं | यह साधारण आदमी के समझ में ही नहीं आएगा |यह वशिष्ठ जी कह रहे हैं,…किसको कि रामजी को बता रहे हैं, जो विनोद में, मजाक में भी झूठ नहीं बोलते थे ऐसे सत्यनिष्ठ रामजी के आगे उपदेश देना कोई साधारण गुरु का काम नहीं है और रामजी कोई ऐरे-गैर को गुरु नहीं बनाते, अपने-से कई गुना ऊँचे होते हैं वहीँ मत्था टिकता है | गुरु का स्थान कोई ऐरे-गैर नहीं ले सकता, गुरु की जगह ऐसा-वैसा नहीं भर सकता है | कितनी भी सत्ता हो, कितना भी चतुराई का ढोल पीटे, फिर भी गुरु के लिये जो हृदय में जगह है, गुरु के सिंघासन पर किसी को बिठाया थोड़ी जाता है, कोई बैठ ही नहीं सकता |

योग वशिष्ठ महारामायण : हे रामजी, त्रणवत जानकर जिसने जगत को त्याग दिया है और सदा आत्मतत्व में स्थित है उनको किसकी उपमा दीजिए ?

बापूजी : त्रणवत समझ के, जगत की सत्यता को त्याग दिया चित्त से और सदैव अत्मस्तिथि है, लेता-देता,खाता-पिता, करता-कराता फिर भी अपने शुद्ध–बुद्ध स्वरुप में रहता हैं उस महापुरुष को किसकी उपमा दीजिए | अष्टावक्र कहते हैं जनक को “तस्य तुलना के न जायते |” उस ब्रह्मवेत्ता की तुलना किससे करोगे?…जनक !

योग वशिष्ठ महारामायण : हे रामजी! उस ईश्वर आत्मा को कौन तोल सकता है ? जब दूसरे उसके सामान कोई हो तब तो तोलें !

बापूजी : उस इश्वर आत्मा ब्रह्मवेत्ता को कौन तोल सकता है? किससे तोलोगे? उसके समान कोई बाट हो तभी तो तोलोगे | अच्छा किसी को परेशान होना हो अशांत होना हो तो आत्मज्ञानी गुरु के लिये फरियाद करे कि हमारा तो कुछ नही हुआ, हमको तो कोई लाभ नहीं हुआ, ये कुछ नही हुआ… तो कुछ नहीं हो जायेगा उसको और जो उसके प्रति आदर भाव और विधेयात्मक विचार करेगा उसकी तो बहुत प्रगति होगी और निषेधात्मक विचार करेगा तो निषेद्ध ही हो जायेगा | प्रकृति बड़ा ठीक गणित लगा देती है |

योग वशिष्ठ महारामायण : हे रामजी! जितने भी तेजस्वी बलवान हैं उन सबों में तत्ववेत्ता सर्वोत्तम है |

बापूजी : तेजस्वी, बलवान, यशस्वी, बुद्धिमान जितने भी धरती पर हैं उन सब से ब्रह्मज्ञानी सबसे ऊँचे है |

योग वशिष्ठ महारामायण उसके आगे सब लघू हो जाते हैं और उस पुरुष को संसार के किसी भी पदार्थ की अपेक्षा नही रहती |

बापूजी : उसके आगे सब लघू हो जाते हैं | जैसे कीढ़ी से मकोड़ा बड़ा है, मकोड़े से चूहा बड़ा है, चूहे से कबूतर बड़ा है, कबूतर से फलाना पक्षी बड़ा है, उससे फलाना ढोर बड़ा है… सबसे बड़ा हाथी लेकिन सुमेरु पर्वत के आगे हाथी भी लघु हो जाता है |

योग वशिष्ठ महारामायण हे रामजी ! जैसे सूर्य के उदय हुये सूर्य मुखी कमल प्रफुल्लित हो आते हैं तैसे  ही वह पुरुष पूर्णिमा के चन्द्रमावत दैवी गुणों से शोभायमान हो जाता है | बहुत कहने से क्या है…ज्ञात ज्ञेय पुरुष आकाश वत हो जाता है वह न उदय होता है और ना कभी अस्त होता है, विचार करके जिसने आत्मा तत्व को जाना है वह उस पद को प्राप्त होता है जहां ब्रह्मा, विष्णु और रूद्र स्तिथ होते हैं |

बापूजी : ब्रह्मा, विष्णु और रूद्र जिस आत्मपद में स्थित हैं, उसी पद में वो ज्ञानवान स्तिथ होता है |

योग वशिष्ठ महारामायण : जहां ब्रह्मा, विष्णु और रूद्र स्थित होते हैं, वहीँ वह आत्म तत्ववेत्ता स्थित होते हैं और सभी उन पर प्रसन्न होते हैं | प्रकट आकार उनका भस्ता है हृदय अहंकार से रहित होता है |

बापूजी : हाँ…उनका प्रकट आकार भासता है कि यह हैं लीलाशाह बापूजी पांच फुट के, साढ़े पांच फुट के | प्रकट आकार तो भासता है पर हृदय में अहंकार शुन्य हैं कि ये देह है, इतना ही देह मैं हूँ ऐसा नहीं, वो जो हैं,वो हैं |

योग वशिष्ठ महारामायण : हे रामजी ! ब्रह्महत्या से भी ज्ञानवान पुरुष को कुछ पाप नहीं लगता और जो अश्वमेघ यज्ञ करे तो भी कुछ पुण्य नहीं होता |

बापूजी : ज्ञानी को सारा संसार मिलकर भी कोई मदद नहीं कर सकता और सारा संसार उल्टा होकर टंग जाए तो भी ज्ञानी की हानि नहीं कर सकता और उसे शूली पर चढ़ा सकता है, सुकरात को ज़हर दे सकता है लेकिन उसके शरीर को तंग कर सकता है उसको नहीं कर सकता | सारा संसार मिलकर ज्ञानी की मदद नहीं कर सकता | हाँ…लोग बोलते हैं, बापू कोई काम-काज हो तो हमारी मदद कि ज़रूरत हो तो…और बोलते भी हैं आपने तो बड़ी मदद किया भाई…जैसी दुनिया है ऐसा वो खेल खेल कर चला जाता है |

योग वशिष्ठ महारामायण : हे रामजी, उनके निश्चय में जगत जीव कोई नहीं और वह चारों प्रयोजन धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष की पूर्णता को प्राप्त होते हैं | किसी और से भी उनको न्यूनता नहीं होती वह सर्व सम्पदा संपन्न विराजमान होते हैं | जैसे पूर्णमासी का चंद्रमा न्यूनताओं से रहित होकर विराजता है तैसे ही यद्यपि वह भोगों को सेवते हैं, तो भी वह उनको दुःख दायक नहीं होते |

बापूजी : यद्यपि वह भोगों को सेवता है, रथ में बैठेगा, राजा होकर राज्य करेगा, योद्धा हो कर युद्ध करेगा, भिक्षुक होकर भीख मांगेगा सब करते कराते भी अपने चित्त में कहीं कर्तृत्व भाव से लेपायमान नहीं होता |

योग वशिष्ठ महारामायण हे रामजी, ऐसे ज्ञान वान पुरुष विष्णु नारायण के अंग हो जाते हैं | जैसे सुमेरु पर्वत वायु से चलायमान नहीं होता वैसे ही वह ज्ञानवान पुरुष दुखों से कभी भी चलायमान नहीं होते | ऐसे जो ज्ञान वान पुरुष हैं…

बापूजी : विश्वामित्र ब्रह्मऋषि  बनना चाहते थे और लोगो ने तो हाँ बोल दी | वशिष्ठ जी ने कहा नहीं, अभी उनमें रजोगुण है, विलासी राजा में से विश्वामित्र बने हैं | अभी ब्रह्म ऋषि नहीं, अभी तो राज ऋषि हैं | अरे! हम राज ऋषि कैसे? उनका इतना किया फिर भी वशिष्ठ जी ब्रह्म ऋषि नहीं बोल रहे थे | पहले राजवी तो थे, लड़ाई-झगड़ा, मार-काट तो पहले ही था उनका, एक शौक था हॉबी थी | वशिष्ठ जी के बेटे मार डाले, वशिष्ठ जी के बेटे मार दिए | एक दिन वशिष्ठ जी पुत्र शोक में गए गंगा में कूदने को, तो गंगा जी का पानी कम हो गया | फिर वहाँ से दूर चले गए और पत्थर बांध के हर गंगे ! तो गंगा प्रकट हो गयीं, बोले आप तो ब्रह्मवेत्ता हैं, आपको तो हर्ष-शोक नहीं और आपके पुत्र मरने का शोक करके आप आत्मा हत्या कर रहे हैं | बोले चल री, तू क्या मेरे को उपदेश देती है, मैं थोड़े ही मर रहा हूँ, ये तो मेरे चित्त को मैं…| गंगा जी ने हाथ जोड़ लिए वशिष्ठ जी डेढ़ लाख वर्ष जिये | कल्प करते-करते-करते चवन ऋषि साठ हज़ार वर्ष जिए | अब डेढ़ लाख वर्ष जिए हुए महापुरुषों का कितना निचोड़ होगा ! कितना ऊँचा अनुभव होगा !

योग वशिष्ठ महारामायण हे रामजी, ऐसे जो ज्ञानवान पुरुष हैं, वे वन में विचरते है और नगर, द्वीप आदि नाना प्रकार के स्थानों में भी फिरते हैं |

बापूजी कभी वन में रहें, कभी नगरो में रहें, कई स्थानों में रहें, अपने चित में दुःख नहीं होता उनको | तरती शोकं आत्मवेत्ता| आत्मवेत्ता सारे शोक समुद्र से तर जाता है |

योग वशिष्ठ महारामायण और शत्रुओं को मारकर शासन भी करते हैं |

बापूजी : राज्य  करते हैं, शत्रुओं को बराबर ठिकाने लगाकर शासन भी करते हैं |

योग वशिष्ठ महारामायण कितने श्रुति, स्मृति के अनुसार कर्म करते हैं, कोई भोग भोगते हैं, कोई विरक्त होकर स्थित होते हैं |

बापूजी : कोई खूब भोग भोगकर, ठाठ से, मौज से रहते हैं, कोई बिल्कुल सादगी से रहते हैं | कोई ललनओं के साथ विचरण करते हैं तो कोई विरक्त होकर रहते हैं | कोई स्वर्ग में अप्सराओं के गीत-नाच देखते हैं तो कोई भूमण्डल की गिरी-गुफा में समाधी में मस्ती में बैठे हैं तो कोई आचार्य बनकर दूसरों को उस रंग में रंगने में लगे हैं | ऐसे आचार्य भी कभी देखो तो भीड़ में, कभी एकांत में, कभी लेने में, तो कभी देने में तो कभी सब फेंक कर चल देने में भी कोई संकोच नहीं |

आश्चर्यो त्रिभुवन जेई,राजे राजवताम युवे युवास्त्रे स्त्रियाः|

राजा मिले तो बड़े राजा… राजकारण की बात, युवान मिले तो बड़े जुवान, बालक मिले तो बालक, माइयां मिलें तो बड़ी सासु की नाईं उनको भी सम्भाले, क्यूंकि आत्मा सब कुछ बन के बैठा है | जो सब कुछ बन के बैठा है उसमें एकाकार हुए पुरुष को सब स्नेह करते हैं, सबको अपने ही लगते हैं | ज्ञानी के प्रति सबको अपनापन लगता है | सभी धर्म, सभी पंथ, सभी मतवालों को अपनापन लगेगा, जो भी उसके निकट आयंगे | ज्ञानवान से मिलो तो ऐसे नहीं लगेगा कि हम कोई नए महात्मा से मिले, लगेगा कि हाँ ये तो अपने ही हैं क्योकि उनकी नज़र में अपनत्व इतना परिपक्व है… भेद है ही नहीं ज्ञान की नज़र में |एक्स-रे मशीन एक बार फ़ोटो लेती है न… तो आपके रक्त के कण डिस्टर्ब हो जाते है, वहाँ रास्ता ही बन जाता है | सात-सात परतों को चीरकर हड्डियों का फ़ोटो लेती है एक्स-रे तो वे किरण एक प्रकार की परतों को धुंधला कर देते हैं | क्यों! सात-सात परतों का जब एक्स-रे लेती है फ़ोटो तो परतों को धुंधला कर देती है तो वो जड़ मशीन हड्डियों की फ़ोटो लेती है तो सात परतें धुंधुली हो जाती हैं तो ज्ञानी की नज़र पड़ती है तो आपके अंतःकरण, आपके आत्मा और उसके बीच जो ये अज्ञान की और दूसरी परते हैं, वो भी ज्ञानी की नज़र से धुंधली हो जाती हैं | ज्ञानी की दृष्टि से भी फायदा होता है, ज्ञानी की वाणी से भी फायदा होता है | ऐसा ज्ञानी बोले तो ठीक है… नहीं बोले खली बैठे रहे तभी भी बहुत लाभ होता है अपने को | रमण महर्षि चुपचाप बैठे रहते, मोरारजी भाई देसाई उनके चरणों में शांति से बैठे रहते, बड़ा लाभ होता है, शांति मिलती है | ये बात  तो मोरारजी भाई देसाई ने शिकागो के गणेश टेम्पल में कही थी, हम नहीं थे वहाँ… लोगों ने बाद में बताया | मोरारजी भाई देसाई बोलते हैं कि हमने आई.ए.एस. ऑफिसर से लेकर प्राइम मिनिस्टर पद तक की यात्रा की लेकिन आज भी मुझे कहना पड़ता है कि रमण महर्षि के चरणों में बैठने से जो शांति मिली थी, जो सुख ह्रदय का मिला था वैसा प्राइम मिनिस्टर पद में भी नहीं है | जिनकी हाजिरी मात्र से प्राइम मिनिस्टर पद का सुख भी तुच्छ हो जाता है | और एक दो व्यक्ति नहीं कई व्यक्तियों को वो सुख देते हैं, तो उनके पास कितना सुख होगा!! अपन जाते हैं, अपने जैसे हज़ारों-लाखों  को वो संतुष्ट और सुखी कर देते हैं | उनके पास आखिर ऐसी कौन-सी चीज़ है कि घटती ही नहीं! योगी तो बारह साल तप किया और सिद्धाई प्राप्त की पानी पर चलने की और अखबारों में डाल दिया कि हम सिद्ध योगी हैं, पानी पर चल सकते हैं | फलानी तारीख कांकरिया के पानी पर चल के दिखायंगे | अखबार में फ़ोटो आया, कांकरिया पर भीड़ हो गयी और डी.एस.पी. ने अपना फ़ोर्स पी.एस.आई. लगा दिए | डी.एस.पी. खुद भी नज़दीक खड़े हो गए कि अपन भी देखें और हुआ वही दिखाने गए तो अभी ब्रह्मज्ञान तो हुआ नहीं, अभी तो सिद्धाई के बल से प्रभाव डालना है | तो व्यक्तित्व है, परिछिन्नता है, ज्यों पानी में पैर रखे धूम गिरे, फिर दुबारा किया तो गिरे | मुँह बचा के भागे, ओये ओये करके!! तो कुछ विशेष व्यक्ति, व्यक्ति-विशेष बनकर प्रसिद्ध होना या कुछ पाना, ये तो जीव का काम है, ज्ञानी कुछ विशेष बनने की कोशिश नहीं करते, जो है उसी को जानकार, उसी में एकाकार होते हैं| तो सब विशेषों का बाप बन जाता है, सारे जो विशेष-विशेष व्यक्ति हैं, उनसे भी ज्ञानी जो निर्विशेष है वो सर्वोपरि विशेष हो जाता है | जोगी बने, तपस्वी बने, कुछ बने, सेठ बने, राजा बने लेकिन ज्ञानी तो एक साथ सब रूप में जो है उससे एक होकर सभी बना बनाया है | बिना मेहनत किये उसको तो राज्य मिल गया, वो तो योगी बना है, वो राजा बना है लेकिन जिससे बना है उसमें ज्ञानी एक हुआ है | तो ज्ञानी समझता है कि सभी हम बने बैठे हैं, तो मौज ही मौज है, मुफत में! उसको कुछ बनना नहीं पड़ता… ब्रह्मा होकर हम सृष्टि करते हैं, विष्णु होकार पालन करते हैं, शिव होकर संहार करते हैं | ज्ञानी जैसा तृप्त और कोई नहीं है | ज्ञानी को जो अनुभव होता है, आत्मवेत्ता को, उसकी बराबरी देव-सुख भी कुछ नहीं कर सकता, यक्ष-गन्धर्व भी कुछ नहीं, ऐसा होता है ज्ञानवान का सुख और सत्संग आत्मज्ञान का सुनकर उसी विचार को महत्व देना चाहिए |

योग वशिष्ठ महारामायण हे रामजी, जैसे माता की पुत्र पर दया और ममता होती है, वैसे ही वे सब पर दया करते हैं | जैसे कमलों के निकट भँवरा जाता है तो वे उनको विश्राम का स्थान देते हैं और सुगंध से उनको संतुष्ट करते हैं | वैसे ही संत जन निहाल कर देते हैं | हे रामजी संत जन इस लोक और परलोक में भी सुख देने वाले हैं | जिन पुरुषों में ऐसे गुण पाइए, वे ही सच्चे संत हैं | जैसे जहाज के आश्रय से समुद्र के पार हो जाते हैं, वैसे ही संत जन संसार समुद्र से पार करने वाले हैं | जिनको संत जनों का आश्रय हुआ है, वे ही लोग तरे हैं |

बापूजी : संत पुरुषों का आश्रय मिला है वे ही तरे हैं | जैसे जहाज़ के आश्रय से दरिया पार कर लेते हैं लोग ऐसे ही संत का संग, सानिध्य, आश्रय मिलता है तो तर जाते हैं | हम भी अपनी साधना-बल से कुछ भी करते, तो इतना नहीं मिलता जितना गुरु की कृपा से हमे मिला |

योग वशिष्ठ महारामायण : हे रामजी, महापुरुष और संत जनों का युक्ति रुपी जहाज़ है, उसी से संसार रुपी समुद्र तर जावेगा और उपाय कोई नहीं |

बापूजी : और उपाय कोई नहीं है, और उपाय कोई हो ही नहीं सकता | तन सुखाय पिंजर कियो, धरे रैन-दिन ध्यान, तुलसी मिटे न वासना बिना विचारे ज्ञान मनमाना साधन करने जाए कितना भी, उससे कुछ नहीं होता | गुरु कृपा ही केवलं शिष्यस्य परम मंगलम मंगल तो अपने ताप से कर सकता है, परम मंगल, परम तत्व का ज्ञान गुरु कृपा से होता है | कर्म कोटिनाम, यज्ञ जप तप क्रिया, ताः सर्व सफल देवी गुरु संतोष मात्रतः पूरे कल्प तक के यज्ञ जप तप व्रत का सार यह है की आप आत्मवेत्ता महापुरुष के ह्रदय में आपके लिए संतोष हो | महापुरुष का हृदय आपके प्रति ज्ञान भाव के संकल्प करने को उद्यत | सारे पूजा-पाठ व्रत नियमों का फल यही है कि तुम्हारे हृदय में परमात्मा को पाने की प्यास पैदा हो और तुम्हारा ऐसा आचरण हो कि ज्ञानवां के चित्त से छलके वो परमात्मा |

योग वशिष्ठ महारामायण : हे रामजी, ज्ञानवान गुरु सत्शास्त्रों का उपदेश करे और शिष्य अपने अनुभव से ज्ञान पावे | अर्थात गुरु अपना अनुभव और शास्त्र जब ये तीनों इखट्टे मिलें तभी परम कल्याण होता है |

बापूजी : अपना अनुभव, अपना पुरुषार्थ सत आचरण का, शास्त्र सम्मत और गुरु की कृपा | शिष्य का पुरुषार्थ एक पंख, गुरु की कृपा दूसरा पंख, एक पंख कितना भी बलवान हो, दूसरा पंक बलबान न हो तो नहीं हो सकता |

योग वशिष्ठ महारामायण : हे रामजी, जिस देश में संत जन रुपी वृक्ष नहीं हैं और जिनकी फलों सहित शीतल छायाँ नहीं है |उस निर्जन मरुस्थल में एक दिन भी न रहिये |

बापूजी : जहाँ संत रुपी विशाल वृक्ष नहीं है और उनकी करुना कृपा की छायाँ नहीं है उस देश को मरुभूमि समझ कर त्याग दो | और जहाँ संत का संग सानिध्य मिले, खाने-पीने को न मिले, चांडाल के घर की भिक्षा ठीकरे में लेकर खानी पड़े, लेकिन संत जनों का संग मिलता है तो वहाँ रहना चाहिए | क्योंकि अन्य ऐश्वर्य भोगने वाला तो अंत में नरकों में जाएगा लेकिन संत का संग वाला तो अंत में परमात्मा से मिलेगा इसलिए उज्जवल भविष्य है | चांडाल के घर की भिक्षा ठीकरे में खानी पड़े, और संत का सानिध्य मिलता है तो वो जगह नही छोड़ना, अन्य ऐश्वर्यों का त्याग कर दें,क्योंकि अन्य ऐश्वर्य अंत में गर्क में डाल देंगे और संत का सानिध्य अंत में अनंत से मिला देगा |इसलिए कहते हैं-

सम्राट के साथ राज्य करना भी बुरा है न जाने कब रुला दे|
फ़क़ीर के साथ भीख मांग के रहना भी अच्छा है न जाने कब मिला दे |

योगवशिष्ठमहारामायण: हे रामजी उनमें उदारता, धीरज, संतोष, वैराग्य, समता, मित्रता. मुदिता और उपेक्षा है |

बापूजी: वे अच्छे से मित्रता करते हैं | जो निपट निराला है वो उपेक्षा करते हैं | तो यह जो ज्ञानवान के लक्षण हैं, योग वशिष्ठ बार बार पढ़ें और सात्विक भोजन करें और जप-ध्यान करें तो परमात्मा का साक्षात्कार हो जाए |

योग वशिष्ठ महारामायण : वशिष्ठ जी बोले, हे रामजी! जिनके हृदय रूपी आकाश में आत्म-विवेक रूपी चंद्रमा प्रकाशता है वह पुरुष शरीर नही मानो क्षीर समुन्द्र है, उसके हृदय में साक्षात विष्णु विराजते हैं | जो कुछ उनको भोगना था वो उन्होने भोगा और जो कुछ देखना था वह भी देखा फिर उन्हे भोगने और देखने की तृष्णा नहीं रहती | और आत्म-रूप, आत्म-बोध से आनंदित होता है |

बापूजी : तुरियावस्था में स्तिथ होकर हर्षवान होता है, ज्ञानवान होता है | तो तुरिया क्या है ? तीन अवस्था आती हैं, अभी जो बोल रहे हैं इसको जागृत अवस्था बोलते हैं, रात को स्वप्न आता है उसको स्वप्न अवस्था बोलते हैं और गहरी नींद होती है उसको सुषुप्ति अवस्था बोलते हैं | ये तीन अवस्था में सब लोग जीते हैं | ज्ञानी तुरिया अवस्था में पहुँच जाता है | जो जागृत को जनता है, स्वप्ने को जनता है और सुषुप्ति को जनता है उसमें ज्ञानी जगें हैं वो तुरिया अवस्था है | इसका वर्णन क्यों करते हैं कि तुम भी उस तुरियावस्था में जगो | जागृत आया बदल गया, स्वप्ना आया बदल गया, सुषुप्ति आई बदल गयी…तुरिया… तुरियावस्था में ज्ञानवान के आत्मा और वैसे वास्तव में सब तुरिया में ही हैं | कल की जागृत चली गयी तो तुम थोड़ी चले गये, कल का स्वप्ना चला गया तुम थोड़ी गये, सुषुप्ति गयी तुम थोड़ी गये! लेकिन कल जैसा था उस समय तुम उसमय हो गये | ज्ञानी उसमें जागृत रहता है…तुरियावस्था में और अज्ञानी लोगों को तुरियावस्था की पता नही इसीलिए ज़्यादा दुख भोगता है और करा-कराया सब चट हो जाता है उसका और ज्ञानी सभी दुखों के बीच भी सुखी रहता है क्योंकि अवस्था है सब बदलती हैं, डटा रहता है |