श्री योगवशिष्ठ महारामायण भाग – ६

bapuji_leelashahjiयोग वशिष्ठ महारामायण : भुशुण्डी जी बोले हे मुनीश्वर, केवल एक आत्म दृष्टि ही सबसे श्रेष्ठ है, जिसे पाने से सारे दुःख नष्ट हो जाते हैं और परम पद प्राप्त होता है ।

बापूजी : आत्म दृष्टि से सारे दुःख नष्ट हो जाते हैं । जगत की दृष्टि रखो तो कितनी भी सुविधा हो, जरा सी असुविधा और अंत में मृत्यु सब छीन लेता है । लेकिन आत्म दृष्टि रखने से, मृत्यु तो आत्मा की होती नहीं । और आत्मा क्षणिक नहीं है । संसार का सुख-दुःख क्षणिक है । संसार का लाभ-हानि क्षणिक है । लेकिन उसको ये प्रभावित करता है जो संसार को सत्य मानता है ।

जिसकी आत्मदृष्टि हो गयी है, आत्म-विचार से सम्पन्न होगया, आत्म-शांति से सम्पन्न हो गया,आत्म-ज्ञान से सम्पन्न हो गया, उसकी गहराई में कोई दुःख टिकता नहीं है ।जैसे सागर की गहराई में कोई तरंग नहीं है, ऊपर-ऊपर तरंग है । ऐसे ही उसके ऊपर-ऊपर व्यवहार का प्रभाव दीखता है, गहराई में कुछ नहीं । जैसे आकाश में पक्षी उड़ान भरते हैं, उनके कोई चिन्ह नहीं रहते, पानी में मछलियाँ चलती हैं, उसके कोई चिन्ह नहीं होते, ऐसे ही आत्म दृष्टि वाले की कोई आसक्ति या कोई पकड़ नहीं होती । धीरा की गति धीरा जाने, ब्रह्मज्ञानी की मत कौन बखाने, नानक ब्रह्मज्ञानी की गत ब्रह्मज्ञानी जाने । वह ब्रह्मज्ञान पाना सुलभ है और उसके बिना जो कुछ पाया सब मजूरी है ।

योग वशिष्ठ महारामायण : हे रामजी ज्ञानवान सदा स्व सत्ता को प्राप्त होता है । और सदा आनंद से पूर्ण रहता है । वो जो कुछ क्रियाएँ करता है सो सब उसका विलास रूप है । सारा जगत उसके लिए आनंद रूप है । शरीर रूपी रथ और इन्द्री रूपी अश्व है । मन रूपी रस्से से उन अश्वों को खींचते हैं । बुद्धि रूपी रथ भी वही है जिसमें रथ में वह पुरुष बैठा है । और इन्द्री रूपी अश्व अज्ञानियों को खोटे मार्ग में डाल देते हैं । ज्ञान वान के इंद्री रूपी अश्व ऐसे हैं के वे जहाँ भी जाते हैं वहां आनंद रूप हैं । किसी ठौर में भी खेद नहीं पाते । सब क्रियाओं में उनको विलास है और सर्वदा परमानंद से तृप्त रहते हैं । हे रामजी इसी दृष्टि का आश्रय करो के तुम्हारा हृदय भी पुष्ट हो । फिर संसार के इष्ट-अनिष्ट से चलायमान ना होगा ।

बापूजी : जैसे रथ होता है और उसके घोड़े होते हैं, डोर होती है, रथ चलाने वाला सारथी होता है, अंदर बैठा हुआ रथी होता है । ऐसे ही शरीर है रथ और इन्द्रियां हैं घोड़े और मन है सारथी और ये जीवात्मा, ज्ञानी ,रथी । अज्ञानी का रथ जहाँ घोड़े जाते हैं वहाँ अज्ञानी की ढील चली जाती है । लेकिन ज्ञानी का मन ऐसा होता है के घोड़े ठीक ढंग से चलाता है । जब घोड़े ठीक ठंग से चलते हैं तो रथ ठीक जगह पहुँचता है । आनंद रहता है, खड्ढ़ो से बच जाता है । रथ का जमाना था तो रथ का, अभी ड्राइवर का जमाना है तो ड्राइवर का दृष्टांत । तो देह तो है गाड़ी और मन है ड्राइवर ।

योग वशिष्ठ महारामायण : हे रामजी ! ये संसार रूपी सर्प अज्ञानियों के हृदय में दृढ हो गया है । वह योग रूपी गरुड़ी मंत्र करके नष्ट हो जाता है । अन्यथा नष्ट नहीं होता ।

बापूजी : ये संसार रूपी साँप अज्ञानी के हृदय में कुंडली मार के बैठा है । कुंडली मार के बैठो या फन फैला के गरुड़ को देखते ही रवाना । योग वशिष्ठ में आता है के भगवान राम के गुरु ध्यान से उठे तो एक विद्याधरी आई, उसने प्रार्थना की कि मेरे पति ध्यान समाधि में बैठे और उनको विवाह की इच्छा हुई । मेरे को उत्पन्न किया और बाद में समाधि में इतने विरक्त हो गए के मेरी तरफ देखते ही नहीं । चलकर उनको समझाइये । वशिष्ठ ब्राह्मण गए तो वो विद्याधरी एक पहाड़ी की शीला में घुसी लेकिन वशिष्ठ जी तो बाहर ही खड़े रहे । फिर वो वापस लौटी के महाराज आइये । बोले के इस पत्थर की चट्टान में मैं कैसे घुसूँ ? बोले आप मेरी वृति से तादाद में कीजिये तो इस सृष्टि में प्रति सृष्टि है । जैसे आप इस सृष्टि में रहते हो, और आपके अंदर सपने की सृष्टि है । आप रहते हो, आप एक जीव दिखते हो । लेकिन आपके अंदर कई जीवाणु हैं । ऐसे ही सृष्टि में प्रति सृष्टियाँ हैं । ये जो हमको दिखती हैं उतनी सृष्टि नहीं । आकाश गंगा में कई सूर्य हैं । और कई सृष्टियाँ हैं जो इधर का मानव नहीं जान पाता है, वो लोग हमको देख लेते हैं और हम उनको नहीं देख पाते हैं । ऐसी भी सृष्टियाँ हैं ।

योग वशिष्ठ महारामायण : वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! ऐसा कल्याण पिता, माता, और मित्र भी ना करेंगें । और तीर्थ आदि सुकृत्य से भी ना होगा जैसा कल्याण बारं-बार विचारने से मेरा ये उपदेश करेगा ।

बापूजी : ऐसा कल्याण, ऐसा मंगल तो माता, पिता भी नहीं कर सकेंगें, तीर्थ भी नहीं करेंगें, जितना कल्याण बारं-बार मेरा ये उपदेश को विचारने से होगा, वशिष्ठजी कहते हैं ।

योग वशिष्ठ महारामायण : हे रामजी जो अपना दुःख दूर करना चाहें, वह मेरा ये उपदेश विचारें ।

बापूजी : जो अपना दुःख सदा के लिए दूर करना चाहें और परम-सुख पाना चाहें, वो मेरे इन विचारों को, मेरे सत्संग को विचारें । दुःख सदा के लिए मिट जायेंगें । जितना गहरा विचारेगा । सुनते तो हैं, लेकिन मनन करे, विचार करे, टिकाये । ये क्या सुना अनसुना किया फिर अड़ के खड़ा हो जाये तो कलयुग हो जायेगा । सतयुग में, अभी सात्विक वातावरण इसी को मनन करें बार-बार । सुनने से १० गुना मनन । मनन करें उससे १०० गुना नितध्यासन ।

योग वशिष्ठ महारामायण : संतों के वचनों का निषेद करना मुक्ति फल का नाश करने वाला और अंहता रूपी पिशाच को उपजाने वाला है ।

बापूजी : संतों के वचनों का निषेद करना, संतों की आज्ञा का उलंघन करना मुक्ति फल को हटाने वाला और मुसीबत को देने वाला है । और संतों के वचनों का मनन करना मुक्ति फल को देने वाला है और मुसीबतों को हटाने वाला है । हे रामजी ऐसा त्रिभुवन में कौन है जो संत की आज्ञा का उलंघन करके सुखी रह सके ? वो तो घोर कलयुग में जायेगा, अशांत हो जायेगा ।

योग वशिष्ठ महारामायण : इसलिए हे रामजी संतों की शरण में जाएँ और अहंता को दूर करें । इसमें कोई भी कष्ट नहीं ।

बापूजी : राम के गुरूजी रामजी को कह रहे हैं के संतों की शरण में जाओ । रामजी से बड़पन क्या है अपना ? राम जैसों को भी सत्संग की जरूरत है । ऐसा नहीं के वशिष्ठ महाराज के चरणों में गए । बनवास था वशिष्ठजी नहीं थे तो भरद्वाज जैसे ज्ञानी महापुरुषों के चरणों में रहे । अगस्त आदि ऋषियों के पास गए । जब रामजी को भी सत्संग और संतों का सानिध्य चाहिए तो दूसरे व्यक्ति की तो बात ही क्या है? वशिष्ठ दसों दिशा घूमे । वशिष्ठ के पास वो सामर्थ्य था, लोक-लोकांतर, स्वर्ग की सभाओं में भी जा सकते थे । स्वर्ग में जो चर्चा होती थी उसमें भी भाग लेते थे वशिष्ठजी महाराज । चिरंजीवियों में सबसे श्रेष्ठ कौन है के लोमश ऋषि । बोले उससे भी श्रेष्ठ, काकभुशुंडिजी । कई युग बीते हुए उन्होंने देखे हैं । लोमशजी से भी ज्यादा युग बिताये उन्होंने से भी ज्यादा युग बिताये होंगें । वशिष्ठ महाराज आ गए सुमेरु पर्वत के उस स्वर्णमय स्थान में । काकभुशुंडिजी ने कहा के महाराज आपने स्वर्ग में चिरंजीवियों की चर्चा में मेरा नाम सुनाया अब दर्शन देने को पधारे हैं, आपकी क्या सेवा करूँ ? मेरे दीर्घ होने का कारण ये है के मैंने प्राण-अपान की गति को सम किया । और चिरकाल अभ्यास किया । चितकला को जीता । वशिष्ठजी ने काकभुशुंडिजी का संवाद रामजी को सुनाया । के स्वर्ग में हुई थी चर्चा और मैं गया काकभुशुंडिजी से पूछने को के ऐसा पद आपने कैसे पाया । जो प्रलय हो जाये तो शरीर को छोड़कर तुम्हारी चितवृति टिक जाये सूक्ष्म में । फिर सृष्टि हो तो फिर अपने संकल्प से शरीर बना लेते हैं । काकभुशुंडिजी बोलते हैं १२ वख्त मैंने राम अवतार देखें हैं, १६ वख्त श्री कृष्ण अवतार मैंने देखें हैं, जो कुछ थोड़ा-थोड़ा सिमरन में आता है । ३ बार वेद व्यासजी आये और महाभारत लिखा है । वाल्मीकि रामायण लिखने वाले वाल्मीकिजी भी कई बार आएं हैं । ऐसी भी सृष्टियाँ थी के पुरुष के गर्भ से बालक जन्म लेता था । स्त्रियां व्यापर करती थी । ऐसे भी हमने युग देखें ।लेकिन सार ये है के भली प्रकार, वासनाओं को क्षय करके परमात्मा में शांत हुए बिना और कोई सार नहीं है। सारी त्रिलोकी का राज्य कर ले, अथवा अग्नि में प्रवेश कर ले, जल में प्रवेश कर ले, इतनी शक्तियां-सिद्धियां पा ले फिर भी आत्म-शांति के बिना कोई सार नहीं ।

राग जिसके प्रति है वस्तु, व्यक्ति के प्रति उससे बंधेगा राग । राग दीनता लाएगा, फसायेगा । द्वेष जलन लाएगा, हिंसा करेगा । जैलसी करेगा, दूसरे के प्रति द्वेष करेगा । जो समझता है के दूसरे मेरे दुःख का कारण हैं, वो जलेगा । किसी को अपने दुःख का कारण नहीं मानना चाहिए । दुःख-सुख का कारण दूसरे को मानने से राग-द्वेष होगा । राग-द्वेष से जलन होगी, बंधन होगा । वित राग, भय क्रोध,जिसका राग व्यथित होगया उसका भय भी व्यथित हो जायेगा, क्रोध भी व्यथित हो जायेगा ।

मुनि मोक्ष परायणा, मननशील मुनि मोक्ष प्रयाण हो जाता है । तो वासना का क्षय, राग मिटाकर वासना का क्षय करें, उससे जो परमात्मशांति मिलती है, अंतरात्मा का सुख मिलता है वो अदभुद है । बड़े-बड़े बुद्धिमानों से सलाह किया, बड़े-बड़े विचारवानों से चर्चा की, सत्संग की । कई योगी, जटी-मुनियों से मिले लोक-लोकांतर में यात्रा करने वाले ।
वशिष्ठ महाराज का अनुभव सत्य है । वासना-क्षय, मनो-नाश, बोध ये तीन बातें वैदिक हैं । वासना क्षय हो जाये । मनो-नाश, मन के भावों का नाश हो जाये और बोध हो जाये – मैं कौन हूँ ? यहां के विषय में, इसके विषय में, उसके विषय में संदेह हो सकता है के ये था के नहीं, वो हो सकता है के नहीं । लेकिन मैं हूँ के नहीं – जो मैं हूँ तो क्या हूँ ? वहाँ वासना रहित होकर देखो तो मैं वहीँ हूँ जिसको मौत नहीं मार सकती । मैं वो हूँ जहाँ दुःख फटक नहीं सकता, सुख फटक नहीं सकता । दुःख-सुख चित को होते हैं, रोग, पीड़ा, बीमारी शरीर को होती है, भूख-प्यास प्राणों को लगती है । मैं उसको देखने वाला सत-चित आनंद ईश्वर का अविभाज्य अंग हूँ । हे वासनाएँ दूर हटो, हे जगत को चाहने वाली इच्छाएँ दूर हटो । हमारा सुख स्वरूप अपना आप है । इस प्रकार का ज्ञान पाकर जो सुखी हुए हैं वहीँ परम लाभ को पाएं हैं । संसार सपना, सर्वेश्वर-चैतन्य अपना ।

योग वशिष्ठ महारामायण : पूर्ण आनंद को प्राप्त हुआ हूँ । संतों की संगति चन्द्रमा की चांदनी सी शीतल और अमृत की नाई आनंद को देने वाली है । ऐसा कौन है जो संत के संग से आनंद को प्राप्त ना हो ? अर्थात सभी आनंद को प्राप्त होते हैं । हे मुनीश्वर संत का संग, चन्द्रमा के अमृत से भी अधिक है । क्योंकी वो तो शीतल गौण है, हृदय की तपन नहीं मिटाता है । और संत का संग अन्त:करण की तपन मिटाता है । वह अमृत, क्षीर-समुद्र मंथन के क्षोभ से निकलता है और संत का संग सहज में सुख से प्राप्त होता है और आत्मानंद को प्राप्त कराता है । इससे यह परम-उत्तम है । मैं तो इससे उत्तम और कोई भी वस्तु नहीं मानता । संत का संग सबसे उत्तम है । संत भी वे ही हैं जिनकी आरंभ में रमणीय सारी इच्छाएँ निवृत हुई है । अर्थात अविचार से जो दृश्य पदार्थ सुंदर जान पड़ते हैं और नाशवान हैं, वे उनको तुच्छ प्रतीत होते हैं । वे सदा आत्मानंद से स्थित हैं । वे अद्वैत-निष्ठ हैं । उनकी द्वैत-कलना नहीं रही । वे सदा आनंद में स्थित हैं ।ऐसे पुरुष संत कहाते हैं। हे मुनीश्वर उन संतों की संगति ऐसी है जैसी चिंतामणि होती है, जिसके पाने से सारे दुःख नष्ट हो जाते हैं । उनके वचन स्निग्ध, कोमल, और आत्म रस से पूर्ण, हृदय-गम्य और उचित होते हैं । उनका हृदय महा-गंभीर, उदार, धैर्यवान और सदा आत्मानंद से तृप्त है ।

बापूजी : धैर्यवान, उदार, और आत्मानंद से तृप्त । ज्यों-ज्यों छोटी-छोटी बातों में उलझना बंद हो जायेगा त्यों-त्यों हृदय की महानता बढ़ती जाएगी । उदारता, आनंद से आत्मुभव से पूर्ण । चन्द्रमा शीतल है लेकिन हृदय की तपन नहीं मिटाता । हे मुनीश्वर, सत्पुरुषों का संग अमृत से भी ज्यादा हितकारी है । अमृत तो सागर-मथने से निकला था । और ये संत की वाणी तो परमात्मा को छूकर निकलती है । स्वर्ग का अमृत पिने से तो पुण्य क्षीण होता है लेकिन सत्संग का अमृत पिने से पाप-ताप निवृत होकर आत्मरस की प्राप्ति होती है । इससे बढ़कर दुनिया में और कोई लाभ नहीं है ।

जैसे चिंतामणि से जो चिंतन करो वो प्राप्त हो जाता है, ऐसे ही संत के संग से जीव वांछित को पा लेता है देर-सवेर । जितनी दृढ़ भावना, दृढ़ श्रद्धा-भक्ति होता है उतना ही जीव अपना परम कल्याण साध लेता है ।

जिसका मन दृढ़ आत्म स्वभाव में है, उसका नाश मृत्यु भी नहीं कर सकती, मृत्यु का बाप भी उधर नहीं पहुँच सकता । ऐसा आत्म-पद है । पाप-ताप, शोक तो क्या, दुश्मन-शत्रु क्या, मौत का बाप भी नहीं पहुँच सकता है ।