श्री योगवशिष्ठ महारामायण भाग – २

guruji55योगवशिष्ठ महारामायण : मैंने तुझसे ३ शरीर कहे थे – उत्तम, मध्यम और अधम । सात्विक, राजस और तामस यही ३ गुण ३ देह के हैं । यही सबके कारण जगत में स्थित हैं । जब तामसी संकल्प से मिलता है तब नीच रूप पाप चेष्टा करके महाकृपणता को प्राप्त होता है । और मृतक होकर कृमि और नीच योनि में जन्म पाता है । जब राजसी संकल्प से मिलता है, तब लोक व्यवहार अर्थात स्त्री, पुत्र आदि के राग से रंजीत होता है,और पाप कर्म नहीं करता है, तो मृतक होकर संसार में मनुष्य शरीर पाता है । जब सात्विकी भाव में स्तिथ होता है, तब ब्रह्मज्ञान परायण होता है, इसीलिए मन से मन को वश करके भीतर-बाहर जो दृश्य का अर्थ चेतन चित में स्थित करके उस संस्कार को निवृत करके शांत आत्मा हो ।

बापूजी : मनुष्य जन्मता है, फिर उसमें अपने कुल-धर्म के अनुसार संस्कार पड़ते हैं । कोई झूलेलाल का, कोई गणपति का, कोई रामजी का, कोई शिवजी का, कोई अल्लाह का भगत बनते हैं । भगत तो बन गये लेकिन आदत सबकी अलग-अलग होती है । किसी की सात्विक, राजस, और तामसी आदत होती है । जैसा संग मिलता है वैसी आदत पुष्ट होती है । जैसा रिलेशन, कम्पनी, साहित्य मिलता है, खान-पान,रहना-करना । १० प्रकार के साधनों का असर पड़ता है । जैसे माता-पिता के, दादा-दादी, नाना-नानी स्वभाव का बच्चे पर असर पड़ता है ऐसे ही खान-पान का, शास्त्र का, मंत्र का, संग का प्रभाव पड़ता है ।
    तो इसमें ३ मुख्य गुण होते हैं । सात्विक, राजसी और तामसी स्वभाव । जो आया वो खा लिया, जो आया वो बोल दिया, जो दिल में आया कर डाला कुछ सोचा नहीं । जिसकी तामसी आदत है आलस्य,निद्रा, झूठ, कपट तो ये तामसी, राजसी स्वभाव के लोग हैं । तामसी स्वभाव अगर छुपा-छुपा के करते गये तो मरेगा तो कीड़क योनि में जायेगा, साँप, मेंढ़क, पतंगिया, छछूंदर, दूसरी ऐसी तमस प्रधान योनि होती हैं ।जिनका राजसी स्वभाव बन जाता है, राजसी स्वभाव का बहलिया होता है और पाप ज्यादा नहीं करते तो मरने के बाद मनुष्य योनि में आते हैं । राजसी स्वभाव में लोभ, काम, क्रोध होता है लेकिन साथ-साथ में पाप से बचता रहता है । जब भूल कर लेता है तो पश्चयताप कर लेता है । ऐसे जमा-उधर गाड़ी चलती है वो राजसी स्वभाव के होते हैं । राजसी स्वभाव में भी सात्विक का अंश ज्यादा है तो ऊँचे कुल का होगा । और तामसी स्वभाव ज्यादा है तो नीच योनि का मनुष्य होगा । कहीं अनपढ़ वातावरण में, झोपड़-पटी में, शराबी-कबाबी के घर में । अथवा तो राजसी है लेकिन कुछ शुभ कर्म ज्यादा हैं तो किसी संत के, भक्त के, अच्छे कुल के संस्कार वाले में जन्म लेगा ।
         अगर सात्विक स्वभाव ज्यादा बन गया, जप, ध्यान, परोपकार, सेवा की आदत पड़ गयी, सादगी से रहने की पवित्र आदत पड़ गयी, सत्य बोलने की आदत पड़ गयी, सयंमी रहने की आदत पड़ गयी तो वो सात्विक हो गया । तो मरने के बाद देव लोक में दिव्य भोग भोगेगा खूब सुख भोगेगा बाद में या तो श्रीमान, पवित्र कुल में जन्म लेगा या तो किसी योगी के घर जन्म लेगा । और बचपन से ही उसको ऐसे संस्कार, वातावरण मिल जायेगा के वो भगवान को पा लेगा । लेकिन जो सात्विक स्वभाव के हैं, और स्वर्ग नहीं चाहते हैं, ईश्वर ही चाहते हैं, मुक्ति ही चाहते हैं तो फिर वे देवताओं के भोगों को तुच्छ समझने वाले, सात्विक स्वभाव वाले खोजते हैं के मुक्ति कैसे मिले, भगवान कैसे मिलें ?
भगवत प्राप्ति की इच्छा वाले दो प्रकार के होते हैं । एक तो सगुण, साकार भगवान को पाना चाहें,कृष्ण, राम, शिव, गणपति भगवान । तो उन्हीं की पूजा करते-करते मर जायेंगें तो उन्ही के लोक में जायेंगे । दूसरे वो होते हैं भगवान जिससे भगवान हैं, शिव जिससे शिव हैं, गुरु जिससे गुरु हैं, वो महान तत्व क्या है ? उसकी जिज्ञासा होती है । तो फिर ब्रह्मज्ञानी के सम्पर्क में उनकी रूचि होंगी, वो खोज लेंगें, वहाँ पहुँच जायेंगें । फिर ब्रह्मज्ञान का विचार करेंगें । कृष्णजी का, रामजी का नहीं, ब्रह्मज्ञानी गुरु ने जैसा उपदेश दिया है उसी प्रकार ब्रह्म परमात्मा की उपासना, आराधना करेंगें ।
         ब्रह्म परमात्मा की उपासना, आराधना करने वालों में भी २ प्रकार के लोग होते हैं । एक तीव्र साधन करता है, दूसरा मंद करता है । तीव्र साधन वाला तो जल्दी ब्रह्म परमात्मा को पा लेगा, और जिसका ढीला साधन है तो मरते दम तक परमात्मा का साक्षात्कार तो नहीं कर सकेगा, लेकिन साक्षात्कार की इच्छा है । तो मरने के बाद अगर उसकी साधना एकदम मंद है, तो सवर्ग का सुख भोगकर फिर आकर किसी अच्छे वातावरण में यात्रा करेगा ।
      अगर उसकी तीव्र साधना है, तर-तीव्र नहीं तीव्र तो मरने के बाद बरहम लोक में जायेगा । जैसे गुरु को आश्रम में रहने का वातावरण मिलता है वैसे ही शिष्यों को मिल जाता है, जिस धरती पे गुरु रहते हैं,उस धरती पे शिष्य रहते हैं । तो ऐसे ही जैसे ब्रह्माजी को मिलता है ऐसे ही बरह्मलोक का वातावरण,सुख सामग्री वहाँ रहने वालों को भी मिल जाता है । लेकिन ब्रह्माजी के अधिकार अपने रहते हैं, ब्रह्म लोक निवासी के अपने रहते हैं । जब प्रलय होता है, तब ब्रह्म लोक निवासी, ब्रह्माजी का तत्व ज्ञान का उपदेश सुनके उस ब्रह्म परमात्मा में लीन हो जाते हैं । जिसकी सत्ता से तमाम सूरज, आकाश गंगाएं और पुरे ब्रह्माण्ड चलते हैं, उस परब्रह्म का आखरी उपदेश, क्योंकि पहले तो सुन के आया धरती पर से,लेकिन कच्चा रह गया । तो आखरी उपदेश ब्रह्माजी का सुनके ब्रह्म लोक को, ब्रह्म परमात्मा को पा लेगा ।
        पेड़-पौधा बनेगा, छछूंदर बने, जैसा भी हो जो मन में आये वो करो, जैसा इंद्रियों में आये वो करो । तो तिरक योनि । अच्छा रहो, संयत रहो और कुछ मन में आया वो तो मनुष्य योनि में । और एकदम दृढ़ता से चलो तो देव योनि । उससे भी ऊपर उठो तो परमात्मा को पा लो ।
       जैसे पत्थर से चट्टान का गिरना आसान होता है, चढ़ना महेनत है । पानी का नीचे बहना आसान है,चढ़ने में पुरुषार्थ है । ऐसे ही झूठ में, कपट में, निंदा में, गद्दारी में, मन का गिरना आसान है । लेकिन गद्दारी नहीं करना, झूठ नहीं बोलना, कपट नहीं करना उसमे पुरुषार्थ चाहिए । इसकी निंदा, उसकी निंदा,इसने क्या करा, उसने क्या करा, अपनी खोपड़ी में संसार को भरेगा । छल-कपट भरता है, बेईमानी भरता है तो तमोगुण आ जायेगा । ईमानदारी रखता है, सेवा करता है और जप-ध्यान करता है रजोगुण,सतोगुण आएगा । और थोड़ा श्रद्धा दृढ़ करता है, गुरु की कृपा पचाता है तो तीनों गुणों से पार होने के ज्ञान में प्रीति हो जाएगी | तो गुरु किसी को नज़दीक नहीं लाते, गुरु किसी को दूर नहीं करते हैं ऐसे ही भगवान् किसी में ज्यादा हों, किसी में कम हों ऐसा नहीं है | भगवान् को जो भजते हैं उनमें भी भगवान् उतने ही हैं और जो भगवान् को गाली देते हैं उनमे भी भगवान् उतने ही हैं |
नानक जी ने कहा-  करनी आपको आपनी, के–नेड़े, के–दूर |
अपनी करनी से मनुष्य अपने को भगवान् और गुरु के नज़दीक महसूस करता है | ख़ुशी, शक्ति, आनंद महसूस करता है और अपने ही कपट के कारण, अपने ही रजोगुण, तमोगुण, बेईमानी के कारण अपने को भगवान् से और गुरु से दूर महसूस करते हैं | करनी आपको आपनी, के–नेड़े, के–दूर | अपनी करनी से हम ईश्वर के, गुरु के नज़दीक अपने को महसूस करते हैं | जैसे एकलव्य था, तो द्रोणाचार्य तो बहुत दूर थे लेकिन एकलव्य द्रण-श्रद्धा से गुरु के चित्र को देखता था, एकलव्य ये नहीं सोचता था कि ये मिट्टी के मेरे हाथ से बनाये हुए द्रोणाचार्य हैं! नहीं…बनाया अपने हाथ से ही लेकिन भावना करके, गुरु से पूछ के, फिर तीर का निशाना लगाता था | तो द्रोणाचार्य के दूर होते हुए भी एकलव्य की एकाग्रता और श्रद्धा के कारण, उसकी अंतरात्म-चेतन में एकता हो गयी | अब दुर्योधन द्रोणाचार्य के नज़दीक रहते हुए भी अर्जुन जैसा नहीं बना और वो दूर रहते हुए भी अर्जुन से आगे निकल गया, तो उसकी श्रद्धा थी,गुरु में दृढ़ श्रद्धा थी | मूर्ति में, चर्च में, मंदिर में, मस्जिद में तो श्रद्धा हो जाएगी लेकिन हयात पुरुष में श्रद्धा होना बड़ा कठिन है और हो जाये तो टिकना बहुत कठिन है | क्योंकि आदमी का विचार उसको तोलेगा – मेरे को डाँटा और उनको ऐसो-वैसा । गुरु को शरीर मानेगा । उनके हित की और उनके आत्मा की ऊँचाई को वो नहीं जानते ।
     एक संत बोलते थे अपने शिष्य को के तुम्हारे पे तो भरोसा है, तुम्हारे कर्मों पे भरोसा नहीं । कब तुम्हारे हल्के कर्म तुम्हारी श्रद्धा को अश्रद्धा में बदल दें और तुम दोषारोपण करके खाई में गिर जाओ कुछ कह नहीं सकते ।
      तो रजोगुण से सत्वगुण बढ़िया है । रजोगुण अकेला नहीं रहता, उसमें सत्व भी रहता है । सत्वगुण अकेला नहीं रहता उसमें रजो, तमोगुण भी रहेगा । तीनों गुणों का मिश्रण है लेकिन सत्व जितना परसेंटेज ज्यादा, रज जितना ज्यादा, समझो ६०% सत्व है, ३०% रजोगुण है, १०% तमोगुण है, या तो ७०% तमोगुण, २०% रजोगुण है, १०% सत्वगुण तो डिफरेंट हो जायेगा । होता मिश्रण है । सत्वगुणी में भी तमोगुण होता है नहीं होगा तो नींद कैसे आएगी ? नींद तमस से ही आती है । बहुत नियम से प्राणायाम, जप, ध्यान, सात्विक खुराक खाये तो नींद कम आएगी, ध्यान ज्यादा आएगा और कई बार बीमारी में भी नींद कम हो जाती है तो सत्वगुण नहीं है । वो तो रोग अवस्था है उसमें थकान रहेगी । सत्वगुण बढ़ेगा तो थकान नहीं रहेगी, ज्ञान और फुर्ती रहेगी ।त्रैगुना विषय वेदा। ये वेद, शास्त्र और संसार का जो व्यवहार है, तीन गुणों में होता है । और तीन गुण सत्ता लेट हैं प्रकृति से । तीन गुणों की साम्य अवस्था प्रकृति है । और प्रकृति सत्ता लाती है पुरुष की, परमात्मा की । जैसे आप और आपकी शक्ति एक ही है वैसे ही परमात्मा और प्रकृति की शक्ति एक ही है । जैसे दूध और दूध की सफेदी एक ही है, तेल और तेल की चिकनाहट एक ही है । ऐसे ही भगवान और भगवान की शक्ति एक ही है । इसीलिए भगवान को शक्ति रूप में भी मानते हैं और शिव रूप में भी मानते हैं । और शक्ति रूप में आद्य शक्ति कहते हैं । जहाँ से आद्य भगवान हैं, आदि नारायण,आद्य शक्ति । जैसे पुरे शरीर में आप व्यापक हैं ऐसे ही पुरे बृह्मांड में वो परमात्म चेतना व्यापक है । जैसे मिठाई की रग-रग में शककर व्यापक है, दूध की रग-रग में सफेदी व्यापक है ऐसे ही सारे बृह्मांड में परमात्म सत्ता व्यापक है । बोले जीव कितने है ? जैसे फलों में रस भरा है ऐसे ही सृष्टि में जीव भरे हैं । अवसर मिल जाता है तो स्थूल बन जाते हैं । स्थूल शरीर छोड़कर सूक्ष्म जीव तो बहुत होते हैं । अनु, बैक्टेरिया, ये-वो सब जीव ही जीव हैं । तो जीव ही जीव हैं तो चेतन कहाँ ? तो चेतन है तो जीव हैं । पानी है तभी तो तरंग है ।
भगवान को पाने की तड़प बड़ जाये, तो व्यवहार अच्छा होने लगेगा, संसार फीका होने लगेगा ।
मनुष्य का पूरा भाग्य कब खुला?  पैसा मिला तब भागयशाली ? पैसे तो कई गुंडों को मिल जाते हैं । पत्नी मिल जाये तो भागयशाली हैं क्या ? कई पापियों को भी पत्नी मिल जाती है । बेटा मिल गया तो भागयशाली है क्या ? कई चोरों और डाकुओं को भी बेटे होते हैं । सूत, दारा और सम्पति पापी को भी होती है । ये कोई बड़ी बात नहीं है ।
संत समागम हरि कथा तुलसी दुर्लभ दोए। भगवत कथा और संतों का सानिध्य ये दुर्लभ चीज है ।
भगवत कथा क्या?
भ- ग -वा- न : जिसकी सत्ता से सारी सृष्टि का भरण-पोषण होता है । वाणी वैखरी होती है, गमनागमन होता है । सब मिटने के बाद भी जो अमिट है वो परमात्मा का नाम भगवान है ।

संत समागम हरि कथा, हरि कथा कहो, भगवत कथा कहो । तुलसी दुर्लभ दोए । तो हरि क्या है,भगवान क्या है, उसका ज्ञान । कैसे मिले उसका साधन मिलने में मदद रूप हों ऐसा आशीर्वाद । तो भगवान का ज्ञान, भगवान मिलने का साधन और भगवान पाने में मदद संत के सानिध्य से मिलेगा । तो भगवान की कथा और संत का सानिध्य इससे बढ़कर त्रिलोकी में कोई चीज नहीं है ।

भगवान शिवजी भी बोलते हैं उमा संत समागम सम और ना लाभ कछु हान बिनु हरि कृपा उपजे नहीं गावहि वेद पुराण ।

संतों के सानिध्य समान और कोई लाभ नहीं । अब संत समागम ये नहीं के इधर आकर खड़े हो गये तो हो गया संत समागम ।विचारों को सुने, उनके अनुभव को अपना बनाने की कोशिश करें,ये है संत समागम । त समागम सम और ना लाभ कछु हान ॥ छल-कपट से भगवान नहीं मिलते । बनते भगत ठगते जगत पड़ते भव की जाल में । भगत बनते और ठगी करते तो और ज्यादा पाप लगता है । साधारण आदमी दारु पिए या चोरी करे और उसकी चोरी पकड़ी जाये तो उसको सजा मिला तो उससे ज्यादा पुलिस वाला चोरी करते पकड़ा जाये और साबित हो जाये तो उसको सजा ज्यादा मिलेगी । कानून को जनता है । बनावट करता है, बुद्धि में तमस ज्यादा है तो दूसरे के आधीन इसको चलना पड़ता है । रजस ज्यादा है तो कुछ चलेगा, कुछ चलायेगा । सात्विक है तो किसी कि जरूरत नहीं वो खुद दूसरे को चलायेगा, बुद्धि में सत्वगुण ज्यादा है तो । इसीलिए सत्वगुण वाले का, अक्ल वाले का पगार ज्यादा होता है । उसमें रजोगुण तो होता है लेकिन बुद्धि में सात्विक विशेष होती है । ज्यादा अक्ल वाले को मकान ये वो, प्राइम-मिनिस्टर को त्रिमूर्ति भवन रहने को मिलता है । राष्ट्रपति के लिए रोज का लाख रुपया खर्च हो जाये, इतना उनके पीछे खर्चा होता है खाने-पीने, सिक्योरटी । ३-४ करोड़ हो जाता है साल का । इसका मतलब ये नहीं के जिसका ज्यादा खर्चा उतनी उसकी बुद्धि सात्विक, ऐसा भी गणित नहीं है । लेकिन अक्ल और पुण्य साथ में हों तो चलता है प्रभाव । अक्ल हमेशा सत्वगुण से सबंध रखती है । तो आहार शुद्ध हो, सत्व शुद्धि । चटोरापण होता है तो बुद्धि डायुन हो जाती है ।
एक बार किसी भगत ने मनौती मानी थी, के आपको ५६ भोग खिलाएँगे । पहले तो टालता रहा फिर एक बार सोचा अपन भी तो ५६ भोग देख तो लेवे साथ में थोडा खा भी लेंगें । हमने उनको बोला अच्छा हम आयेंगें । तारीख तय हुई, उन्होंने बनाये और हम गए । सब्जियाँ १०-१२-१५, मिठाइयाँ ये-वो । थोडा-थोडा सोचा खा लें । और इतने बीमार हुए के ५६ भोगों के ५६ घंटे तो हमने बलिदान दे दिया । अब कहीं तबीयत ठिकाने आई । अलग-अलग वराइटी खाने से शरीर, कोई ५६ भोग बोलता है तो मेरे को वो याद आता है ।

अल्जेरिया में एक कॉन्ट्रॅक्ट्र था । उसको किसी ने भोज दिया । अलग-अलग ब्रॅंडी, वाइन, विस्की, ड्रिंक्स सबको दिए । उसका अपना पाला हुआ मंकी(बंदर) था । मंकी कॉपी करने में एक्सपर्ट होता है । सबने पीया तो मंकी ने भी पीया, मंकी की खोपड़ी तो इतनी सी । ये ऐतिहासिक घटना है । सबने पीने के बाद कुछ खाया लेकिन मंकी को तो चढ़ गयी, कुछ सूझे नहीं । इतना कूड़ा-फांदी किया, उसका बोस उसे घर ले गया । २-४ दिन तो बीमार सा रहा । कुछ महीने-२ महीने बाद फिर फंक्शन हुआ, तो मंकी को ले गये । सबको जैसे वाइन दिया तो उसको भी दिया । उसने नहीं लिया, तो उसके बोस ने उसे देने की कोशिश की और कहा ले पी-पी । उसने लेकर सब तोड़-फोड़ कर दी । सारे दारु पीने वाले दंग रह गये । बोले १ महीना पहले पिया था तो क्या हाल हुआ था उसको याद है, अपने को याद नहीं |एक बार पता चल गया के झूठ बोलने से अथवा वाइन पीने से बुद्धि भ्रष्ट हुई तो मंकी ने फिर वाइन को छुआ नहीं । मंकी ने फिर नहीं पिया दारु । तो इतना बंदर भी जनता है के जो पीने से नुकसान हुआ नहीं पीना चाहिए ।

जब सात्विक गुरु मिलते हैं, सात्विक खुराक खाते हैं, और सात्विक सच्चाई रखते हैं तो रजो और तमोगुण क्षीण होता है । फिर अकस्मात परब्रह्म परमात्मा का आनंद सामर्थ्य प्रकट होता है । ईश्वर तो मौजूद है । जैसे बादल हटने से सूरज दिख जाता है ऐसे ही रजो, तमोगुण हटने से परमात्मा का आनंद सामर्थ्य प्रकट होता है । जब एकांत में रहते थे, तब जो आया था उसीसे मौज कर रहे हैं । ध्यान,भजन, सेवा जब गुरु के आश्रम में रहते थे तो वो जो कमाई है उसीसे अपन भी सुखी और दूसरों की भी गाड़ी अच्छी चल्र रही है । उपवास में ध्यान, भजन, जप तो अच्छा होता है । क्योंकि पाचन शक्ति पचाने में नहीं लगेगी तो शरीर के दोष मिटाने में लगेगी, मन के दोष मिटने में लगेगी ।