श्री योगवशिष्ठ महारामायण भाग – ५

IMG-20131223-WA0002योग वशिष्ठ महारामायण : हे रामजी, जो कोई उनके निकट आता है वह भी शीतल हो जाता है क्योंकि वे सदा निरावरण स्तिथ होते हैं | ज्ञानवान सबका आश्रय दाता है |

बापूजी : देखो जी अभी सुना था कि पाशवी अंश, मानवी अंश और ईश्वरीय अंश तीन अंशों का घटक हमारा मनुष्य शरीर है | तो जिसको अपने ईश्वरीय अंश का पूरा ज्ञान हो गया उसे ज्ञानवान कहते हैं | उसके संग से मानव को बहुत लाभ होता है… उसके शरीर से अध्यात्मिक ओरा निकलती हैं उसकी निगाहों से अध्यात्मिक ओरा निकलती है, उसकी वाणी से आत्मिक अनुभव संपन्न वचन निकलते हैं | उसका चित्त उसका ईश्वरीय अनुभव सबका आश्रय स्थान होता है |उसके चित्त में प्रसन्नता, शांति, वैराग्य, मुदिता आदि सद्गुण स्वाभाविक निवास करते हैं ऐसे ज्ञानवान जहाँ रहते हैं वो जगह भी उस आभामंडल से संपन्न हो जाती है | इक्ष्वाकु राजा ने मनु महाराज का आवाहन किया कि राज-पाठ तो भोगा, सोने की थाली में भोजन कर के भी देखा,सुंद्रियों और ललनाओं से चवर डुलवा के भी देखा लेकिन महाराज आयुष्य तो नाश हो रही है,मौत आकर ग्रास कर लेगी | तब मनु महाराज ने कृपा कर के कहा कि तुम नित्या अंतर्मुख रहो तुम्हारा राग और द्वेष चला जायेगा | हेय-उपादेय ये छोड़ना, ये पकड़ना इसीमें जीव झक मारके खत्म हो जाता है | अपने आत्मा को न छोड़ना है न पकड़ना है, उसको तो खाली जानकर विश्रांति पाना है | अपने आत्मा के बिना, स्व के सुख के बिना, कहीं पकड़ो और छोडो | अच्छी चीज़ है तो पकड़ो, और पकड़ा है तो उसको सम्हाल-सम्हाल के मरो, बुरी चीज़ है तो उसको छोड़ो और धकेल-धकेल के मरो | अपना आत्मा न अच्छा है न बुरा है, अपना आत्मा तो अपना आपा ही है |ईश्वरीय अंश, उस ईश्वरीय अंश को ज्यो का त्यों जताने वाले पुरुष ज्ञानवान कहे जाते है | ज्ञान-मान जहाँ एको नाही, देखत ब्रह्म सामान सब माहि | कहिये तासो परम वैरागी, तन सैम सिद्धि तीन गुण त्यागी ||

योग वशिष्ठ महारामायण : वशिष्ठजी बोले हे रामजी, संत जन परम शांत, गम्भीर और ऊँचे अनुभव रूपी फल से युक्त वृक्ष के समान है | उनकी यश, कीर्ति और शुभ आचार फूल और पत्ते हैं, ऐसे संत जनों की संगती जब प्राप्त होती है, तब जगत के राग-द्वेष रूपी तम मिट जाते है | जैसे किसी मयूर के सिर पर भारी बोझ लदा हो, और वह तपन से दुखी हो, पर वृक्ष की शीतल छाया प्राप्त होने पर, वह शीतल हो जाता है | फल खाकर तृप्त होता है और थकान का कष्ट दूर हो जाता है | वैसे ही संतो के संग से मनुष्य सुख को प्राप्त होता है. जैसे चन्द्रमा की किरणों से मनुष्य…

बापूजी : संतो के संग से सुख को प्राप्त होता है | महाराज हमको वाइन मिल जाता है तो हम सुखी होते हैं, हमको ५ स्टार होटल मिल जाती है तो सुखी हो जाते हैं, तो संतो के संग से ही सुख मिलता है, तो वैसे दूसरों को नहीं मिलता है क्या! दूसरों को हर्ष मिलता है | जहाँ हर्ष है वहाँ शोक रहेगा| सुख हृदय की चीज़ है लेकिन शब्दों के साथ अन्याय हो जाता है जहाँ शास्त्रीय ढंग से सुख कहा गया है, वो आत्मिक सुख की बात है वहाँ सुविधाजन्य जो सुख है, उसे हर्ष बोलते हैं | जितना हर्ष लेगा उतना शोक होगा…जितना बाहर से सुख लेगा उतना ही बाहर से डरपोक रहेगा, खिन्न रहेगा और निष्तेज हो जायेगा और जितना सच्चा सुख लेगा उतना बलवान रहेगा, आत्मिक बल से संपन्न रहेगा | तो संतो के संग से हृदय का सुख मिलता है और बाहर से सुविधा मिलती है |सुविधा में और सुख में फर्क है | सुविधा इन्द्रियगत ज्ञान के जगत में आबध्द करती है और सुख जीवात्मा को परमात्मा से मिलाता है | भीड़-भाड़ से डरते है, क्यों ? के भाई शांति प्रिय हैं |लेकिन जिसको आत्मिक सुख पूरा मिल गया, उसके लिए भीड़ हो, चाहे एकांत हो सब में“उठत बैठत वोई उटाने, कहत कबीर हम उसी ठिकाने” |युद्ध के मैदान में बंसी बज रही है, ऐसा सुख स्वरुप कृष्ण का अपना आपा है | तो संतो के संग से आंतरिक सुख की प्राप्ति होती है और ज्यो-ज्यो सुख में विश्रांति पाता है उतना-उतना आत्मिक बल बढ़ता है | रिद्धि-सिद्धियाँ भी विश्रांति की ही जननी हैं | विश्रांति आंतरिक सुख की गहरी अवस्था | विश्रांति ही रिद्धि-सिद्धियों की उद्गम भूमि है, चित की विश्रांति प्रसाद की जननी है और वो प्रसाद ही सारे सिद्धियों के द्वार खोल देता है |

योग वशिष्ठ महारामायण : हे रामजी! फूलों के बगीचे और सुंदर फूलों की शैया आदि विषयों से भी ऐसा निर्भय सुख नहीं प्राप्त होता जैसा संतों की संगति से प्राप्त होता है | हे रामजी ! कभी वसंत ऋतु भी सुख का स्थान हो, नंदन वन भी सुख का स्थान हो, उर्वशी आदि अप्सरायें पास आयी हों, चंद्रमा निकला हो, काम-धेनु विद्यमान हो और इन्द्रियों के सारे सुख प्राप्त हों, तो भी वह शांति प्राप्त नही होगी, जो ज्ञानवान के संग से प्राप्त होती है |
बापूजी : ये आंतरिक शांति, सोने की खाट हो, रेशम की नवार हो, पूनम की रात हो, केवड़े का इत्र छिड़का हो और अप्सरा आकर चम्पी-चरण करे और चरण-चम्पी करती हुई अप्सरा गले लगे, सारे भोग तैयार हो,फिर भी संतों के संग से जो आत्मिक सुख मिलता है, उसके सामने वो नगण्य है. उनसे तो परिणाम में दुःख, कलेश, अशक्ति, दीनता, हीनता मिलेगी और संतो के सत्संग-सानिध्य से परिणाम में पवित्र सुख के द्वार खुलते-खुलते परमात्मा मिलेंगे | शुकदेव जी महाराज देवतओं को मना करते हैं, कि तुम सत्संग के अधिकारी नही हो, तुम्हारे लिए संकल्प नही करूंगा | देवता बोलते है कि स्वर्ग का अमृत,तुम्हारे परीक्षित को हम दे देते हैं और बदले में हमको आप अपने सत्व का, अपने सत्संग रूपी सत्व का, कथा का अमृत दीजिये | शुखदेव जी कहते हैं की स्वर्ग का अमृत पीनेिने से तो पुण्य नाश होता है, अप्सरायें मिलती हैं और सत्व का सत्संग, सत्संग का अमृत तो पाप नाश करता है और अंत में परमात्मा दिलाता है | तो देवता लोग तुम बड़े चालबाज़ हो कोहिनूर लेकर कांच का टुकड़ा देना चाहते हो | शुखदेव जी ने इंकार कर दिया, ये है सत्व सुख, आत्मिक सुख…बिनु रघुवीर पद जिय की जरनी ना जाई…उस आत्मपद के बिना अंतरात्मा की, जीव की प्यास नही जायेगी, तपन नही जायेगी |संसार तापे तप्तानां, योगो परम औषध:| संसार के ताप में तपने वाले जीवों के लिए परमात्मा ध्यान, परमात्मा योग परम औषध कहा गया है| गुरु के अनुभव को झेल लेना ही गुरु पद की पूजा है | ऐसा नहीं कि पैर धोके पीना, तो जिनको भी आगे बढ़ना है, वो ध्यान-योग शिविर १-२ अटेंड करे, गुरु मंत्र मिला है तो उसको जपे बाकि सब खटपट में नही पड़े, नहीं तो भ्रमित हो जाओगे… संशय में नहीं जाना | इसीलिए तो रामकृष्ण देव को भी गुरु करना पड़ा…भगवान राम को भी गुरु की बात माननी पड़ी “वे राम थी मोटा होई जे गुरु की बात न माने हलो, जे कृष्ण भगवान नि मोटा है जो गुरु नि बात न माने हलो” |

योग वशिष्ठ महारामायण : हे भगवन ! व्यथित दिनों के श्रम से आप श्रमित हैं और आपका शरीर अति कृश-सा हो गया है |

बापूजी : देखो कितना ख्याल करते हैं गुरूजी का शिष्य, कि आपने इतने दिन बीते हैं, परिश्रम से आपका शरीर कृश हो गया है | खान-पान शयन में अस्त-व्यस्तता हो गयी है तो गुरु जी आपका परिश्रम देखके हमको… फिर धीरे-से क्या बोलते हैं आगे…

योग वशिष्ठ महारामायण : हे भगवन! व्यथित दिनों के श्रम से आप श्रमित हैं और आपका शरीर अति कृश सा हो गया है |

बापूजी : देखो वशिष्ठ भी बेचारे कृश हो गए, परिश्रम से, चेलों के उद्धार के लिये |

योग वशिष्ठ महारामायण : इस निमित्त, हे मुनीश्वर! आप विश्राम कीजिये हे भगवन!

बापूजी : सब बोलो..

योग वशिष्ठ महारामायण : हे भगवन! व्यथित दिनों के श्रम से आप श्रमित हैं |

बापूजी : आप सब लोग सच बोल रहे हैं…

योग वशिष्ठ महारामायण : व्यथित दिनों के श्रम से आप श्रमित हैं और आपका शरीर भी अति कृश सा हो गया है |

बापूजी : हाँ पेट अंदर चला गया है…

योग वशिष्ठ महारामायण : हे मुनीश्वर, इस निमित् अब आप विश्राम कीजिये |

बापूजी : हम आपकी बात मानते हैं…चलो …हम आपकी बात, आपकी प्रार्थना बिलकुल मानते हैं |

योग वशिष्ठ महारामायण : हे मुनीश्वर अपने जो आनंदित वचन कहे हैं वे प्रकट रूप हैं और आपके उपदेश रूपी अमृत की वर्षा से हम सब आनंदवान हुये हैं |

बापूजी : हाँ… यह भी सच्ची बात है |

योग वशिष्ठ महारामायण : हमारे हृदय का तम दूर होकर शीतल चित्त हुआ है जैसे चन्द्रमा की किरणों से तम और तपन दोनों निवृत्त हो जाते हैं तैसे ही आपके अमृत वचनों से हम अज्ञान रूपी तप और तपन से निवृत हुये हैं |

बापूजी : ज्ञानी बोलता है तो आनंद के निमित्त ही बोलता है, सुख ही बरसाता है तो आपके वचनों से हमें आनंद सुख मिला, तम मिट रहा है… परिश्रम से आपका शरीर थोड़ा कृश-सा भी हो गया है तो आप आराम करो लेकिन हमको आपके परिश्रम से क्या फायदा हुआ है की हमारा चित्त प्रसन्न हुआ है, हमें कुछ समझने को मिला है, कुछ संयम के पाठ मिले हैं, कुछ समझ के पाठ मिले हैं कुछ गहराईयों की यात्रा हुई है…कुछ आत्मिक उड़ानें हुई हैं |

योग वशिष्ठ महारामायण : रामजी की ओर मुख करके दशरथ जी ने कहा, “हे राघव जो काल संतों की संगती में व्यतीत होता है वही सफल होता है और जो दिन सत्संग के बिना व्यतीत होता है वह वृथा चला जाता है” |

बापूजी : वृथा..कला दिन है वह!!

योग वशिष्ठ महारामायण : रामजी बोले- हे मुनीश्वर! सहस्त्र सूर्य एकत्र उदय होकर भी हृदय के तम को दूर नहीं कर सकते पर वह तम आपने दूर किया है | सहस्त्र चंद्रमा इखट्टे उदय हो तो भी हृदय की तपन निवृत नहीं कर सकते |

बापूजी : हृदय का तम तो तब दूर होता है जब उत्तम साधक हो | सात्विक खुराक, सात्विक संयम और अवतारी हैं रामचन्द्र जी उनको भी कई समय तक अभ्यास करना हुआ, विचार करना पड़ा | जो सुन-सुना कर ब्रह्मज्ञानी हो जाते हैं उनको भ्रमज्ञान हो जाता है… ब्रह्मज्ञान नहीं होता | और कलयुग में तो बड़ा कठिन है आखरी यात्रा करना, पूरा ईश्वरीय अंश विकसित करना एक जरा-सी झलक भी पचती नहीं लोगों को | जरा-सी कृपा भी नहीं पचती तो पूरा ब्रह्मज्ञान तो बाबा !! लाखों-करोड़ों-करोड़ों में एक-आध पचा पाता है | तो एक होते हैं आम भक्त.. हजारों-लाखों की संख्या में, दूसरे होते हैं अन्तेवासी और तीसरे होते हैं सतगुरु के सत्-तत्व को पूर्ण रूप से पचाने वाले | जीवन में एक-आध मिल गया तो बहुत हो जाता है | भ्रांति में तो कई फंस जाते हैं | विवेकानंद बोलते हैं यहाँ इस आध्यात्मिकता में बड़ा में बड़ा खतरा है कि थोड़ा-सा किसी साधक को मिलता है तो भ्रम उसको हो जाता है की आह..मैं ब्रह्म हूँ… वह ब्रह्म नहीं भ्रम हो जाता है उसको | नानक जी कहते हैं- अरब-खरब दा लेखा गणे | नानक कोटिन में कोई जिन आपा चिन्या || अरब-ख़रब का लेखा करो तो, करोड़ों में कोई जिसने पूर्ण… पूरा प्रभु पहचाना |

योग वशिष्ठ महारामायण : विश्वामित्र जी बोले- हे मुनीश्वर! सब तीर्थों के स्नान और दूसरे कर्मों से भी मनुष्य ऐसा पवित्र नहीं होता जैसे आपके वचनों से हम पवित्र हुये हैं | आज हमारे कान भी पवित्र हुये हैं हमारे बहुत जन्मों के पुण्य इखट्टे हुए थे | उनके फल से ये आपके पावन वचन सुने हैं | हे भगवन! आपके वचन चंद्रमा की किरणों के सामान शीतल हैं | किन्तु उनसे भी अधिक है, हमारे जो चिरकाल के पुण्य थे उनका फल आज पाया हैं | वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! ज्ञानवान तीनों ताप रुपी उष्णता का नाश करने को पूर्णमासी के चंद्रमा के समान होता है | सुरत्ता और समता सौभाग्य रुपी जल का नीचा स्थान है | जैसे जल नीचे स्थान में स्वाभाविक ही चला जाता हैं, वैसे ही सुरत्ता में सौभाग्य स्वाभाविक होता है | जैसे चंद्रमा की किरणों के अमृत से चकोर तृप्त होता हैं, वैसे ही आत्मरुपी चंद्रमा की समता और सुरत्ता रुपी किरणों को पाकर ब्रह्मा आदि चकोर भी तृप्त होकर आनंदित होते हैं और जीते हैं | हे रामजी ! ज्ञानवान ऐसी कांति से पूर्ण होता हैं जो कभी भी क्षीण नहीं होती | पूर्णिमासी के चंद्रमा में उपाधि दिखती है, परन्तु ज्ञानवान के मुख में वैसी उपाधि नहीं जैसी उत्तम चिंतामणि की कांति होती हैं, वैसी ही ज्ञानवान कि कांति होती हैं जो राग-द्वेष से कभी भी क्षीण नहीं होती | समता ही मानो सौभाग्य रुपी कमल की खान हैं | समदृष्टि पुरुष ऐसे आनंद के लिए जगत में विचरता है और प्राकृत आचार को करता है | सब लोग उसके कर्तृत्व की स्तुति करते हैं | हे रामजी! ऐसा पुरुष ब्रह्मा आदि का भी पूजनीय होता है |

बापूजी: कैसी ऊंचाई है ! कि ऐसा पुरुष ब्रह्मा आदि का भी पूजनीय होता है|

योग वशिष्ठ महारामायण : हे रामजी सब लोग उसके कर्तृत्व की स्तुति करते हैं और ऐसा पुरुष ब्रह्मा आदि का भी पूजनीय होता है | सभी उसका मान करते हैं, सब उसके दर्शन की इच्छा करते हैं और दर्शन करके प्रसन्न होते हैं |

बापूजी : ऐसा पुरुष मिले तो मुझे बताना, जिसके दर्शन की सब इच्छा करें, दर्शन कर के प्रसन्न हों | जिसने पूर्ण आत्मा परमात्मा का अनुभव किया हो | ऐसा नहीं कि थोड़े दिन जा के बस, मैं आत्मा हूँ | जैसे चूहे हो मिल गया एक हल्दी का टुकड़ा और बोले मैं गाढ़ी हूँ,मैं कर्याणा मर्चेंट हूँ, ऐसा नहीं! ऐसा नहीं सच-मुच में कोई मिला हो और ब्रह्म परमात्मा का अनुभव हो, ऐसे पुरुष के दर्शन से सब लोग आनंदित होते हैं | उसकी वाणी सुखदायी होती है, उसकी चेष्ठा आत्मिक अनुभव देने वाली होती है |ऐसा पुरुष कहीं दिखे तो बोलो !

योग वशिष्ठ महारामायण : हे रामजी ! जिसके हृदय से सब अर्थो की आस्था नष्ट हुई है, वह मुक्त और उत्तम उदारचित्त पुरुष मुक्तिरूप परमेश्वर हो जाता है | फिर चाहें वह समाधी में रहे अथवा कर्म करे या न करे | हे रामजी ! मैंने देखने योग्य सब कुछ देखा है | दासों-दिशाओं में भी भ्रमा हूँ | कई जन्म यथार्थ दर्शी दृष्टि आये हैं और कितने हेय-उपादेय संयुक्त देखे, पर सभी आत्मज्ञान के लिए यत्न करते हैं | इससे भिन्न कुछ नहीं करते | सब ब्रह्माण्ड का राज्य करें अथवा अग्नि और जल में प्रवेश करे, पर ऐसे ऐश्वर्यों से संपन्न होकर भी आत्मलाभ के बिना शांति कदापि प्राप्त नहीं होती |

बापूजी : सारे ब्रह्माण्ड का राज्य मिले भारत का तो क्या? फिर भी आत्माज्ञान के बिना, आत्मलाभ के बिना शांति नहीं होती | अमृत उसको बोलते हैं जो मृतक पर पड़े तो उसे जीवित कर दे | बन्दर मरे हुए थे,अमृत की वर्षा हुई तो जिन्दा हो गए ऐसे ही सुख उसको बोलते हैं कि दुःख में पड़े तो दुःख भी सुख हो जाए | जैसे अमृत मृतक पर पड़े तो मृतक ज़िंदा हो जाता है ऐसे ही जिसको अमृत पान करने को मिले उसका फिर दुःख रहता ही नहीं | उसके चित्त को क्षोभ-दुःख नहीं होता |

योग वशिष्ठ महारामायण : हे रामजी! जितने भी तेजस्वी बलवान हैं उन सभी में तत्व वेत्ता उत्तम है | उसके आगे सब लघु हो जाते हैं | और उस पुरुष को संसार के किसी भी पदार्थ की अपेक्षा नहीं रहती क्योंकि उसका चित्त सत्य-पथ को प्राप्त होता है | हे रामजी ! जिस पुरुष की आत्म पद में स्थिति हुई है वहसबसे उत्तमहो जाता है | जैसे सुमेरु पर्वत के निकट हाथी तुच्छ-सा भासता है, तैसे ही उसके निकट त्रिलोकी के सारे पदार्थ तुच्छ भासते हैं | वह ऐसे दिव्य तेज को प्राप्त होता है जिसको सूर्य भी प्रकाश नहीं कर सकता | वह परम प्रकाश रूप सब कलनाओं से रहित अद्वैत तत्व है | हे रामजी ! जिस पुरुष ने ऐसे स्वरुप को पाया है, उसने सब कुछ पा लिया है | और जिसने ऐसे स्वरुप को नहीं पाया उसने कुछ भी नहीं पाया | ज्ञानवान को देख कर हमको ज्ञान की वार्ता करते कुछ लज्जा नहीं आती | और जो उस ज्ञान से विमुख है, यद्यपि वह महाबाहू हो तो भी गर्धभ वत है |

बापूजी : गर्धभ माना Donkey (गधा) ! महाबाहू है, महाविद्वान है, महा प्रसिद्ध है, बड़ा धन वान है लेकिन आत्मा परमात्मा के ज्ञान और सुख में रूचि नहीं है तो संसार का बोझ उठा-उठा के खप जाएगा|

योग वशिष्ठ महारामायण : हे रामजी, जो बड़े ऐश्वर्य से संपन्न है और आत्मपद से विमुख है उसको विष्ठा के कीट से भी नीच जान | जीना उन्ही का श्रेष्ठ है जो आत्मपद के निमित्त यत्न करते हैं और जीना उनका वृथा है जो संसार क निमित यत्न करते हैं |

बापूजी : जो संसार क लिए यत्न करते हैं, नश्वर चीज़ों के लिए उनका जीना व्यर्थ है | मोघसा मोघकर्मा मोघज्ञाना विचेतसाम | सारा ज्ञान व्यर्थ हो जाया है, सारा जीवन व्यर्थ हो जाता है, सारे कर्म व्यर्थ हो जाते हैं क्योकि वो नश्वर के लिए करते हैं | अनित्य के लिए करते हैं इसलिए उनका सारा ज्ञान, सारा कर्म, मोघसा मोघकर्मा मोघज्ञाना विचेतसाम | श्रीकृष्ण ने कहा शाश्वत के लिए जो करते हैं वे ही धन्य हैं |

योग वशिष्ठ महारामायण : हे रामजी ! चित्त में जो राग रुपी मलिनता है उसे जब वैराग्य रुपी झाड़ू से झाड़िए, तभी चित्त निर्मल होगा | जब स्नेह रुपी संकल्प फूलता है तब भाव-अभाव रुपी जगत फ़ैल जाता है | जैसे जल में तेल के बूँद फ़ैल जाते हैं और जैसे बांस से अग्नि निकल कर बांस को दग्ध कर देती है, वैसे ही मन के संकल्प उपज कर इसी को खा जाते हैं | हे रामजी, आत्मा में जो देश, काल पदार्थ भासित होते हैं, यही अविद्या है, पुरुषार्थ से इसका अभाव करो | रामजी ने पूछा- हे मुनीश्वर ! जिन चार भागों से आत्म पद प्राप्त होता है, वह काल का क्रम क्या है? मुनीश्वर बोले, हे रामजी! संसार समुद्र के तरने को ज्ञानवानों का संग करना और जो विकृत निर्वैर पुरुष हैं उनकी भली प्रकार से टहल करना इससे अविद्या का अर्ध भाग नष्ट होगा | तीसरा भाग मनन करके और चतुर्थ भाग अभ्यास करके नष्ट होगा|…पर जब जागता है तब उसे भ्रम जानिये |

बापूजी : देखो बहुत सार बात आ गयी इसमें, मनुष्य जीवन दुर्लभ है लेकिन जवानी में…बुढ़ापे में तो अंग जर्जरिभूत होते हैं | बुढ़ापे में जर्जरिभूत हों उसके पहले ही जवानी में भी होते हैं | जैसे बारिश के दिन में पाचन तंत्र कमजोर होता है और रोज़ खाता है उतना कहाँ जाएगा ? सुबह शरीर टूटने लगेगा | फिर भी सावधान नहीं हुआ तो बुखार आ जाएगा और बुखार रहा तो इंजेक्शन लगेगा | तो अजीर्ण का रस जो कच्चा रह गया वो आगे चल के बीमारियाँ करेगा | तो शरीर टूटता है तो उपवास, भूख कम लगती है तो अदरक और शहद का मिश्रण करके, संत कृपा चूर्ण डाल कर, गुन-गुना पानी कर के लें | ये मौसम ऐसा है कि थोड़ा खुराक़ कम करना चाहिए | हफ्ते में एक-आध उपवास करना चाहिए | बुढ़ापे में तो शरीर जीर्ण होता ही है, बीमारी पकड़ती है लेकिन जवानी में भी लापरवाही करते हैं तो बीमारी पकड़ती है | तो फिर सुमिरन कब करेंगे? आत्मसुख कब पाएंगे? बचपन में तो अज्ञानता रहती है, बुढ़ापे में बीमारियाँ रहती हैं | जवानी में काम, क्रोध, लोभ, इर्ष्या… तो मनुष्य जन्म व्यर्थ हो जाता है | तो मनुष्य जीवन व्यर्थ न हो इसलिए गुरु महाराज समझा रहे हैं वशिष्ठजी |

योग वशिष्ठ महारामायण : हे रामजी, संत जन संसार समुद्र के पार के पर्वत के समान हैं | जैसे जहाज के आश्रय से समुद्र के पार होते हैं, वैसे ही संत जन संसार समुद्र से पार करने वाले हैं | जिनको संतजनों का आश्रय हुआ है वे ही तरे हैं | संतजन संसार समुद्र के पार के पर्वत हैं | जैसे समुद्र में बहुत जल होता है, तो बड़े तरंग उछलते हैं और उसमें बड़े मच्छ रहते हैं, पर जब उसका प्रवाह उछलता है तब पर्वत उस प्रवाह को रोक देता है और उछलने नहीं देता, वैसे ही जीव के चित्त रुपी समुद्र में इच्छायें और संकल्प रुपी तरंगे और राग द्वेष रुपी मच्छ रहते हैं |

बापूजी : जैसे सागर में तरंग उछलती हैं और पहाड़ है तो उन तरंगो की उछ्लाहट को सह कर उन तरंगों को शांत कर देता है | ऐसे ही हमारे ह्रदय में भी Desire (इच्छा), वासनाएं और राग द्वेष की तरंगें उछलती हैं | संत लोग वह पर्वत हैं जो हमारे चित्त को अशांति से बचाकर परमात्म-शांति के तरफ मोड़ते हैं | इसलिए जिन्होंने संतों का संग किया है, उनके वचन माने हैं, वे तो तर गए और जो मनमुख हुए वे तो फंस गए संसार में | कोई प्रेत होकर भटकता है तो राजा अज अजगर होकर भटक रहा है |

योग वशिष्ठ महारामायण : वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! ऐसी दृष्टि का आश्रय करो जो दुःख का नाश करती है | नि:संग सन्यासी होकर अपने सब कर्म और चेष्ठाओं को ब्रह्मअर्पण करो | जिसमें यह सब है और जिससे यह सब है ऐसी सत्ता को तुम परमात्मा जानो | जड़ शरीर से कर्म स्वाभाविक होते हैं | जैसे वायु स्फुरण स्वाभाविक होता है वैसे ही शरीर से कर्म स्वाभाविक होते हैं | हे रामजी | जो मूर्ख अज्ञानी हैं, वह ऐसे कर्मों का आरम्भ करते हैं जिनका कल्प-पर्यन्त नाश न हो | वे देह इन्द्रियों के अभिमान का प्रतिबिंभ आप में मानते हैं कि मैं करता हूँ, मैं भोक्ता हूँ और योग से प्राणवायु स्थिर होती है |

बापूजी : यह बहुत सूक्ष्म बात है, उत्तम बात है, उत्तम पद को पाने के लिए है | चाहें कितना भी जगत का वैभव इकठ्ठा कर लें फिर भी इस पद को पाए बिना आदमी अंतर आत्मा का सुख या शांति नहीं पाता |

योग वशिष्ठ महारामायण : हे रामजी, जब तुझको विवेक से आत्मतत्व का प्रकाश होगा तब तू संसार की तुच्छ वृत्तियों में न डूबेगा | जैसे गोपद के जल में हाथी नहीं डूबता तैसे ही तू भी राग द्वेष में न डूबेगा |

बापूजी : परमात्म शांति में ऐसा सुख होता है जैसे गाय के खुर तक के पानी में हाथी डूबे नहीं ऐसे ही तुम्हारा मन संसार की किसी परिस्थिति में न डूबे |

योग वशिष्ठ महारामायण : जिसको देह में अभिमान है और चित्त में वासना है वही तुच्छ संसार की वृत्तियों में डूबता है इससे जितना अनात्म भाव दृश्य है तब तक विगत जिवर होकर जीता है |

बापूजी : जिसको इस प्रकार अभ्यास करके अंतरात्मा का सुख मिलता है, वह जब तक जीता है तो ताप के बिना ह्रदय में तपन नहीं होती, शोक नहीं होता | चित्त का शीतल होना बड़ी तपस्या का फल है, ह्रदय में शांति पाना अपने आप में सुखी रहना, अपने आप के ध्यान में आनंदित होना, ये बड़ी तपस्या का फल है | तीर्थों में जाते हैं तो धर्म लाभ होता है-
तीर्थ नहाये एक फल, संत मिले फल चार |
सतगुरु मिले अनंत फल, कहत कबीर विचार ||
सत्गुरुओं का ज्ञान मिले और सत्गुरुओं की कृपा मिले तो अनंत फल होता है | इच्छा पूरी, श्रद्धा सब पूरी, रब रहया संग हजूरी | सारी इच्छायें पूरी हो जाती हैं जिसकी द्रण श्रद्धा होती है | श्रद्धा से भगवद जप ध्यान करे, श्रद्धा से संतों का सत्संग करें, कल्याण हो जाता है, बहुत मंगल हो जाता है |

योग वशिष्ठ महारामायण : हे रामजी, कोई पदार्थ श्रेष्ठ नहीं, न पृथ्वी का राज्य श्रेष्ठ है, न देवताओं का रूप श्रेष्ठ है, न नागों का पाताल लोक श्रेष्ठ है, न शास्त्रों का पठन-मनन श्रेष्ठ है, न काव्य का जानना श्रेष्ठ है, न पुरातन कथा क्रम वर्णन करना ही श्रेष्ठ है और न बहुत जीना श्रेष्ठ है, न मूढ़ता से मर जाना श्रेष्ठ है | न नरक में पड़ना श्रेष्ठ है और न इस त्रिलोकी में और कोई भी पदार्थ श्रेष्ठ है | जहाँ संत का मन स्थित है वाही श्रेष्ठ है |

बापूजी : संत का मन अंतरात्मा में रहता है वही श्रेष्ठ है | बहुत काव्यों का पढना, बहुत धन को इखट्टा करना, त्रिलोकी का राज्य प्राप्त करना ये श्रेष्ठ नहीं है | ये तो Tension(चिंता का कारण) है |श्रेष्ठ वही है जहाँ संत का मन परमात्मा में विश्रांति पता है वही श्रेष्ठ है | राम के गुरुदेव बोलते हैं | त्रिलोकी का राज्य पाना तो तुम्हारे बस की बात नहीं है लेकिन अंतर्मुख होना तुम्हारे हाथ की बात है | सारे काव्यों में विद्वान बनना सबके हाथ की बात नहीं है लेकिन सब परमात्मा का सुमिरन ध्यान करके महान बनना सबके हाथ की बात है | जो तुम्हारे हाथ की बात है वो तुम कर डालो, जो उसके हाथ की बात है वो अपने आप कर लेगा |

योग वशिष्ठ महारामायण : हे रामजी, जैसे हाथी कीचड से अपने बल से ही निकलता है, तैसे ही अपना उद्धार आप करो |संसार रुपी गढ़धे में मन रुपी बैल गिर गया है । जैसे हाथी कीचड़ से अपने बल से ही निकलता है तैसे ही अपना उद्धार आप करो | संसार रुपी गड्ढ़े में मन रुपी बैल गिरा है जिससे अंग जीर्ण हो गए हैं |

बापूजी : हाँ, संसार रुपी गड्ढ़े में मन रुपी बैल गिरा है । ज्यों निकलता है त्यों ही बुड्ढा हो गया । उसके अंग जर्जरिभूत हो रहे हैं । दल-दल में गिरा, उस बैल को किसी का साथ-सहकार हो और अपना पुरुषार्थ हो और पैर चलाये नहीं तो कितना रस्सी बाँधकर घसीटोगे ? बैल अपना बल करे और रस्सी वाला अपना,निकल जाये । ऐसे ही अपना मन संसार रूपी गड्ढे में गिरा है, दल-दल में, कीचड़ में । मन रूपी बैल संसार रूपी कीचड़ में गिरा है तो उसको अपना पुरुषार्थ करके, साथ-सहकार लेकर शास्त्र का, गुरु का बाहर निकालना चाहिए । अपना पुरुषार्थ, शास्त्र और संत इनका आदर सहित पालन करके मन रूपी गड्ढे से । मन रूपी बैल को संसार रूपी गड्ढे से निकालना है ।

योग वशिष्ठ महारामायण : वशिष्ठ जी बोले हे रामजी जब तक आत्म ज्ञान नहीं होता तब तक शास्त्रों के अनुसार आनंदित आचार में विचरें । शास्त्रों के अर्थ में अभ्यास करें । और मन को राग-द्वेष आदि से मौन करें । तब पाने योग्य अजन्मे शुद्ध और शांत रूप को प्राप्त होता है । हे रामजी, तुम चित से शास्त्र और संतों के गुणों में चिर पर्यन्त चलो ।

बापूजी : शास्त्रों में और संतों के वचन पर चिर पर्यन्त चलो । लम्बा समय तक आदर से चलो । क्यों के अज्ञान, वासनाएँ, मन मुखता दीर्घ कालीन है । चिर काल तक चलो ।

योग वशिष्ठ महारामायण : हे रामजी जैसे हाथी कीचड़ से अपने बल से ही बाहर निकलता है, तैसे ही अपना उद्धार आप ही करो । हे रामजी, जब गुरु के वचन सुनकर उनके अनुसार पुरुषार्थ करें, तभी परम पद प्राप्त होता है और जय होती है ।

बापूजी : हाँ, गुरु के वचन सुनकर उनके अनुसार पुरुषार्थ करें, तभी परम पद प्राप्त होता है ।

योग वशिष्ठ महारामायण : हे रामजी अभ्यास और वैराग्य के बल से इस मन रूपी बैल को निकलकर अपना उद्धार आप करो ।

बापूजी : हाँ, मन रूपी बैल को निकलकर अपना उद्धार आप करो । अभ्यास, जो सुना है, जो साधन गुरु ने दिया है, उसका अभ्यास करो । और फिर वैराग्य का आश्रय लो । किसी भी चीज में, वस्तु में, व्यक्ति में,परिस्थिति में राग बंधन का कारण है ।

योग वशिष्ठ महारामायण : हे रामजी जिस पुरुष को अपने मन पर भी दया नहीं उपजती के संसार दुःख से निकले वह मनुष्य का आकार है परन्तु राक्षस है ।

बापूजी : अपने पर भी दया नहीं होती के संसार से निकले । मौत से बचें, बार-बार जन्मने-मरने से निकलें । अशांति से बचें । भविष्य में मुसीबतें आएँगी । पशु योनि में जाना पड़ेगा । ये दुःख होग। पशु योनि से बचें । जिनको अपने पे दया नहीं है वो मनुष्य की आकृति तो हैं लेकिन हैं दैत्य, राक्षस । भगवान ने कहा मोहिनी प्रकृति वाले, आसुरी प्रकृति वाले, राक्षसी प्रकृति वाले । मोहिनी प्रकृति वाले अपना कुछ बिगड़ता-सुधरता नहीं लेकिन फिर भी कुछ गड़-बड़ कर देना ।