वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई

रानी लक्ष्मीबाईरानी लक्ष्मीबाई के अंतिम पल कैसे बीते? आगे पढिये…

मनु का विवाह सन् 1842 में झाँसी के राजा गंगाधर राव निवालकर के साथ बड़े ही धूम-धाम से सम्पन्न हुआ। विवाह के बाद इनका नाम लक्ष्मीबाई रखा गया। इस प्रकार काशी की कन्या मनु, झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई बन गई। 1851 में उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई किन्तु विधाता ने तो उन्हे किसी खास प्रयोजन से धरती पर भेजा था। पुत्र की खुशी वो ज्यादा दिन तक न मना सकीं दुर्भाग्यवश शिशु तीन माह का होतो होते चल बसा। गंगाधर राव ये आघात सह न सके। लोगों के आग्रह पर उन्होने एक पुत्र गोद लिया जिसका नाम दामोदर राव रक्खा गया। गंगाधर की मृत्यु के पश्चात जनरल डलहौजी ने दामोदर राव को झांसी का उत्तराधिकारी मानने से इंकार कर दिया। रानी लक्ष्मीबाई ये कैसे सहन कर सकती थीं। उन्होने अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध का बिगुल बजा दिया और घोषणा कर दी कि मैं अपनी झांसी अंग्रेजों को नही दूंगी।tweet this,brahmacharya

जून १८५७ से मार्च १८५८ तक १० माह की अवधि में लक्ष्मीबाई ने झान्सी का प्रशासन ब्रिटिशों से अपने हाथों में लेने के बाद, उसमें काफी सुधार किया। खजाना भर गया। सेना सुव्यवस्थित हो गई। पुरुषों की सेना की बराबरी में महिलाओं की भी सेना थी। रानी ने अपनी कुछ तोपों के नाम रखे थे “गर्जना , “भवानीशंकर” और “चमकती बिजली”। ये तोपें महिलाओं एवं पुरुषों द्वारा बारी-बारी से दागी जाती थी। पुराने शस्त्र तेज किए गए। नए शस्त्र तैयार किए गए। उन दिनों झाँसी में प्रत्येक घर में युद्ध की तैयारियाँ हो रही थी और सब कुछ महारानी के मार्गदर्शन में किया जा रहा था। २३ मार्च १८५८ में सर हयूरोज की सेना ने युद्ध की घोषणा कर दी। १०-१२ दिनों में ही झासी का छोटा-सा राज्य विजय के प्रकाश और पराजय की छाया में डोलता रहा। एक सफलता पर जहाँ राहत मिलती थीं वहीं दूसरे क्षण पराजय का आघात लगता था। अनेक वफादार सरदार धाराशायी हो गए। दुर्भाग्य से बाहर से कोई सहायता नहीं मिली।

युद्ध की देवी

जब अंगेर्जों की शक्ति बढ़ी और हयूरोज की सेना ने झाँसी में प्रवेश किया तब रानी ने स्वय शस्त्र उठाया। उसने पुरुषों के वस्त्र पहिने और वह युद्ध की देवी के समान लड़ी। जब भी वह लड़ी उसने अंग्रेजों की सेना को झुका दिया। उसकी सेनाओं के संगठन और पुरुष के समान उसकी लड़ाई ने हयूरोज को चकित कर दिया। जब स्थिति नियंत्रण के बाहर हुई तब उसने राजदरबारियों को बुलाया और उनके समक्ष उसने अपने सुझाव रखे :”हमारे कमांडर और हमारे बहादुर सैनिक और तोप दागनेवाले सैनिक अब हमारे साथ नहीं है। किले में जो ४००० सैनिक थे उनमें से अब ४०० भी नहीं बचे हैं। किला अब मजबूत नहीं है। अतः हमें यथाशीघ्र यह स्थान छोड़ देना चाहिए। हमें एक सेना का गठन करना चाहिए और तब पुनः हमला करना चाहिए। ” सभी इस बात पर सहमत हो गए। कुछ योद्धाओं के साथ रानी शत्रुओ की पंक्तियों को चीरती हुई झाँसी से निकल गई। बोकर नामक एक ब्रिटिश अधिकारी एक सैनिक टुकड़ी के साथ उसके पीछे पीछे चला। लड़ाई में वह स्वयं घायल हो गया था और पीछे हट गया था। रानी के घोड़े की मुत्यु हो गई थी। उसके बाद भी वह हताश नहीं हुई और काल्पी जाकर तात्या टोपे और रावसाहेब से मिल गई।

ज्योति बुझने के पूर्व

काल्पी में भी रानी सेना जुटाने में लगी थी। हयूरोज ने काल्पी की घेराबँदी की। जब पराजय निश्चित दिखाई दी तब रावसाहेब, तात्या तथा अन्य लोग रानी के साथ, ग्वालियर की ओर चल पड़े। वे गोपालपुर पहुँचे। रात्रि में रावसाहेब, तात्या और बान्दा के नवाब की बैठक हुई। दूसरे दिन वे रानी से मिले। उनका इरादा युद्ध करने का नहीं था। रानी ने कहा,” हम जहाँ तक किले के अंदर रहे हमने अंग्रेजो का सामना किया। हमें लड़ाई जारी रखनी चाहिए। ग्वालियर का किला समीप है। यह सत्य है कि, वहाँ के राजा का झुकाव अंग्रेजो की ओर है, परंतु मैं जानती हूँ कि सेना और जनता अंग्रेजों के विरुद्ध है। इसके अलावा, वहाँ बँदूकों और गोला बारूदों का भारी भंडार है।” रानी का झुकाव स्वीकार हुआ। जब तात्या एक छोंटी सेना के साथ ग्वालियर पहुँचे तो वहाँ की अधिकांश सेना उनके साथ हो गई। ग्वालियर का राजा भाग खड़ा हुआ और उसने आगरा जाकर अंग्रेज़ो से संरक्षण माँगा।

युद्ध का अंत

हयूरोज प्रतीक्षा करने के लिए तैयार नहीं था। १७ जून,१८५८ को लड़ाई पुन: आरंभ हुई। रानी ने पुरुषों के वस्त्र पहने और तैयार हो गई। हयूरोज ने एक चाल चली। वह महाराजा जयाजीराव सिंधिया को, जोकि ग्वालियर से भाग गया था और आगरा में ब्रिटिश संरक्षण में रह रहा था, लेकर ग्वालियर आया।

अब पेशवाओं में कुछ विवेक जागा। वे रानी लक्ष्मीबाई के समक्ष आने में लज्जित थे। अंतत : उन्होने तात्या टोपे को भेजा। जब उन्होने क्षमा याचना की तब रानी ने उनके समक्ष युद्ध की अपनी योजना रखी। तात्या टोपे ने उसे स्वीकार कर लिया। यद्यपि रानी की सेना संख्या में कम थी, सरदारों का असाधारण साहस, युद्ध की व्यूह रचना और रानी के पराक्रम ने ब्रिटिश सेना को परास्त किया। इस दिन की विजय रानी के कारण ही हुई। दूसरे दिन ( १८ तारीख को ) सूर्योदय के पूर्व ही अंग्रेजों युद्ध का बिगुल बजाया। महाराजा जयाजीराव द्वारा घोषित क्षमादान से प्रभावित सैनिक अंग्रेजों के साथ सम्मिलित हो गए। यह भी सूचना मिली की रवासाहेब के अंतर्गत जो दो ब्रिगेड थीं उन्होने पुन: अग्रेजों के साथ अपनी निष्ठा प्रकट की।

रानी लक्ष्मीबाई ने रामचंद्र राव देशमुख को बुलाया और कहा: “आज युद्ध का अंतिम दिन दिखाई देता है। यदि मेरे मृत्यु हो जावे तो मेरे पुत्र दामोदर के जीवन को मेरे जीवन से अधिक मूल्यवान समझा जावे और इसकी देखभाल की जावे। ” एक और संदेश यह था : “यदि मेरी मृत्यु हो तो इस बात का ध्यान रहे कि मेरा शव उन लोगों के हाथ में न पड़े जो मेरे धर्म के नहीं।” हयूरोज की शक्ति अधिक थी क्रांतिकारियों की एक बड़ी सेना धराशायी हो गई। उनकी तोपें ब्रिटिश के हाथों में चली गई। ब्रिटिश सेना बाढ़ के समान किले में प्रविष्ट हो गई। रानी के समक्ष अब भागने के सिवाय कोई रास्ता नहीं था। घोड़े की लगाम अपने दांतों में दबाए हुए और दोनों हाथों से तलवार चलाती हुई रानी आगे बढ़ी कुछ पठान सरदार, रघुनाथ सिंह और रामचंद्र राव देशमुख भी उसके साथ चल पड़े। ब्रिटिश सेना ने उन्हें घेर लिया था। खून की धार बह रही थी। पश्चिम दिशा में अस्त होता हुआ सूर्य उसी रंग का दिखाई दे रहा था। अंधकार होता जा रहा था। एक ब्रिटिश सैनिक रानी के बहुत निकट आया और उसने रानी के सीने को लक्ष्य कर छूरा फैका। रानी ने सैनिक को मार डाला … पर उसके शरीर से खून बह रहा था, किन्तु विश्राम के लिए समय नहीं था। ब्रिटिश सेना उसका पीछा कर रही थी जब रानी स्वर्ण रेखा नहर पार करने ही वाली थी कि एक ब्रिटिश सैनिक की बँदूक से निकली गोली उसकी दाहिनी जांघ में आकार लगी। रानी ने बाएँ हाथ से तलवार चलाते हुए उस सैनिक को मार डाला।

क्रूर आघात – अंत

रानी के घोड़े ने भी सहायता नहीं दी। उसकी एक जांघ शून्य हो गई थी। पेट से खून बह रहा था। एक ब्रिटिश सैनिक की तलवार से, जोकि तेजी से उसकी ओर बढ़ा था, उसका दाहिना गाल चिर गया था, उसकी आँखें सुर्ख थी। इसके बाद भी उसने बाएँ हाथ से उस सैनिक का हाथ काट दिया। गुल मुहम्मद, जोकि रानी का अंगरक्षक था, उसके दुख को सहन नहीं कर सका। बहदुरी से लड़नेवाले इस योद्धा ने भी रोना शुरू कर दिया। रघुनाथ सिंह और रामचंद्र राव देशमुख ने रानी को घोड़े से उतारने में सहायता पहुँचाई। रघुनाथ सिंह ने कहा: “अब एक क्षण भी खोने का वक्त नहीं, हमें शीघ्र ही समीपवर्ती बाबा गंगादास के मठ पर पहुँचना चाहिए।”

झाँसी का भाग्य अस्त हो गया।

लक्ष्मीबाई ,lakshmi bai,रानी लक्ष्मीबाई १९ नवंबर १८३५ से १८ जून १८५८ तक २२ वर्ष ७ माह जीवित रही। वह काली रात में बिजली के समान प्रकट हुई और लुप्त हो गई। ब्रिटिश जनरल सर हयूरोज ने, जो रानी से कई बार लड़ा और बार-बार पराजित हुआ और अंत में जिसने रानी को पराजित किया, रानी की महानता के विषय में निम्नलिखिए विचार प्रकट किए “…सबसे बहादुर और सबसे महान सेनापति, रानी थी।tweet this,brahmacharya इस अमर शहीद को को सम्मानित करते हुए १९७७ में भारतीय डाक-तार विभाग ने डाक टिकट प्रकाशित किया जिसका चित्र दिया गया है।

कानपूर के नाना की, मुँहबोली बहन छबीली थी,
नाना के सँग पढ़ती थी वह, नाना के सँग खेली थी,
बरछी, ढाल, कृपाण, कटारी उसकी यही सहेली थी।
वीर शिवाजी की गाथायें उसको याद ज़बानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
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